श्रीगणेशाय नमः।

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ — पृष्ठ 781–790

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 781–790

पृष्ठ 781

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१५६२ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे पूर्वक बीत गया । इक्ष्वाकुवंशी नरेशोंकी उस सुरम्य राजधानी- के प्रेमपूर्वक सत्कारसे उनका वह समय सुखपूर्वक बीत

में वे वानर और राक्षस बड़े हर्ष और प्रेमसे रहते थे । श्रीराम- रहा था ॥ २ ९ -३० ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे एकोनचत्वारिंशः सर्गः ॥ ३ ९ ॥ इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें उन्तालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ३ ९ ॥ चत्वारिंशः सर्गः वानरों, रीछों और

तथा स्म तेषां वसतामृक्षवानररक्षसाम् ।

राघवस्तु महातेजाः सुग्रीवमिदमब्रवीत् ॥ १ ॥

इस तरह वहाँ सुखपूर्वक निवास करते हुए रीछों, वानरों और राक्षसों मेंसे सुग्रीवको सम्बोधित करके महातेजस्वी श्रीरघुनाथजीने इस प्रकार कहा - ॥ १ ॥

गम्यतां सौम्य किष्किन्धां दुराधर्षा सुरासुरैः ।

पालयख सहामात्यै राज्यं निहतकण्टकम् ॥ २ ॥

' सौम्य! अब तुम देवताओं तथा असुरोंके लिये भी दुर्जय किष्किन्धापुरीको जाओ और वहाँ मन्त्रियोंके साथ रह-कर अपने निष्कण्टक राज्यका पालन करो ॥ २ ॥

अङ्गदं च महाबाहो प्रीत्या परमया युतः ।

पश्य त्वं हनुमन्तं च नलं च सुमहाबलम् ॥ ३ ॥

सुषेणं श्वशुरं वीरं तारं च बलिनां वरम् ।

कुमुदं चैव दुर्धर्षे नीलं चैव महाबलम् ॥ ४ ॥

वीरं शतबलि चैव मैन्दं द्विविदमेव च ।

गजं गवाक्षं गवयं शरभं च महाबलम् ॥ ५ ॥

ऋक्षराजं च दुर्धर्ष जाम्बवन्तं महाबलम् ।

पश्य प्रीतिसमायुक्तो गन्धमादनमेव च ॥ ६ ॥

' महाबाहो! अङ्गद और हनुमान्को भी तुम अत्यन्त प्रेमपूर्ण दृष्टिसे देखना | महाबली नल, अपने श्वशुर वीर सुषेण, बलवानोंमें श्रेष्ठ तार, दुर्धर्षं वीर कुमुद, महाबली नील, वीर शतबलि, मैन्द, द्विविद, गज, गवाक्ष, गवय, महाबली शरभ, महान् बल - पराक्रमसे युक्त दुर्जय वीर ऋक्षराज जाम्बवान् तथा गन्धमादनपर भी तुम प्रेमपूर्ण दृष्टि रखना ॥ ३-६ ॥

ऋषभं च सुविक्रान्तं प्लवङ्गं च सुपाटलम् ।

केसरिं शरभं शुम्भं शङ्खचूडं महाबलम् ॥ ७ ॥

' परम पराक्रमी ऋषभ, वानर सुपाटल, केसरी, शरभ, शुम्भ तथा महाबली शंखचूड को भी प्रेमपूर्ण दृष्टिसे देखना ॥

ये ये मे सुमहात्मानो मदर्थे त्यक्तजीविताः ।

पश्य त्वं प्रीतिसंयुक्तो मा चैषां विप्रियं कृथाः ॥ ८ ॥

" इनके सिवा जिन - जिन महामनस्वी वानरोंने मेरे लिये अपने प्राणोंकी बाजी लगा दी थी, उन सबपर तुम प्रेमदृष्टि रखना । कभी उनका अप्रिय न करना ' ॥ ८ ॥

एवमुक्त्वा च सुग्रीवमाश्लिष्य च पुनः पुनः ।

विभीषणमुवाचाथ रामो मधुरया गिरा ॥ ९ ॥

राक्षसोंकी बिदाई ऐसा कहकर श्रीरामने सुग्रीवको बारंबार हृदयसे लगाया और फिर मधुर वाणी में विभीषण से कहा- ॥ ९ ॥

लङ्कां प्रशाधि धर्मेण धर्मशस्त्वं मतो मम ।

पुरस्य राक्षसानां च भ्रातुर्वैश्रवणस्य च ॥ १० ॥

' राक्षसराज! तुम धर्मपूर्वक लङ्काका शासन करो । मैं तुम्हें धर्मज्ञ मानता हूँ । तुम्हारे नगरके लोग, सब राक्षस तथा तुम्हारे भाई कुबेर भी तुम्हें धर्मज्ञ ही समझते हैं ॥ १० ॥

माच बुद्धिमधर्मे त्वं कुर्या राजन् कथंचन ।

बुद्धिमन्तो हि राजानो ध्रुवमश्नन्ति मेदिनीम् ॥ ११ ॥

' राजन्! तुम किसी तरह भी अधर्म में मन न लगाना । जिनकी बुद्धि ठीक है, वे राजा निश्चय ही दीर्घकालतक पृथ्वी-का राज्य भोगते हैं ॥ ११ ॥

अहं च नित्यशो राजन् सुग्रीवसहितस्त्वया ।

स्मर्तव्यः परया प्रीत्या गच्छ त्वं विगतज्वरः ॥ १२ ॥

' राजन्! तुम सुग्रीवसहित मुझे सदा याद रखना । अब निश्चिन्त होकर प्रसन्नतापूर्वक यहाँसे जाओ ' ॥ १२ ॥

रामस्य भाषितं श्रुत्वा ऋक्षवानरराक्षसाः ।

साधुसाध्विति काकुत्स्थं प्रशशंसुः पुनः पुनः ॥ १३ ॥

श्रीरामचन्द्र जी का यह भाषण सुनकर रोछों, वानरों और राक्षसोंने ' धन्य धन्य ' कहकर उनकी बारंबार प्रशंसा की ।

तव बुद्धिर्महाबाहो वीर्यमद्भुतमेव च ।

माधुर्ये परमं राम स्वयम्भोरिव नित्यदा ॥ १४ ॥

वे बोले - ' महाबाहु श्रीराम! स्वयम्भू ब्रह्माजीके समान आपके स्वभाव में सदा परम मधुरता रहती है । आपकी बुद्धि और पराक्रम अद्भुत हैं ' ॥ १४ ॥

तेषामेवं ब्रुवाणानां वानराणां च रक्षसाम् ।

हनूमान् प्रणतो भूत्वा राघवं वाक्यमब्रवीत् ॥ १५ ॥

वानर और राक्षस जब ऐसा कह रहे थे, उसी समय हनुमानजी विनम्र होकर श्रीरघुनाथजीसे बोले - ॥ १५ ॥

स्नेहो मे परमो राजंस्त्वयि तिष्ठतु नित्यदा ।

भक्तिश्च नियता वीर भावो नान्यत्र गच्छतु ॥ १६ ॥

' महाराज! आपके प्रति मेरा महान् स्नेह सदा बना रहे । वीर! आपमें ही मेरी निश्चल भक्ति रहे । आपके सिवा और कहीं मेरा आन्तरिक अनुराग न हो । १६ ॥ यावद् रामकथा वीर चरिष्यति महीतले ।

पृष्ठ 782

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उत्तरकाण्डे चत्वारिंशः सर्गः १५६३ तावच्छरीरे वत्स्यन्तु प्राणा मम न संशयः ॥ १७ ॥

‘ वीर श्रीराम! इस पृथ्वीपर जबतक रामकथा प्रचलित रहे, तबतक निःसंदेह मेरे प्राण इस शरीरमें ही बसे रहें ।

यच्चैतच्चरितं दिव्यं कथा रघुनन्दन ।

तन्ममाप्सरसो राम श्रावयेयुर्नरर्षभ ॥ १८ ॥

' रघुकुलनन्दन नरश्रेष्ठ श्रीराम! आपका जो यह दिव्य चरित्र और कथा है, इसे अप्सराएँ मुझे गाकर सुनाया करें ॥१८ ॥

तच्छ्रुत्वा ततो वीर तव चर्यामृतं प्रभो ।

उत्कण्ठां तां हरिष्यामि मेघलेखामिवानिलः ॥ १ ९ ॥

' वीर प्रभो! आपके उस चरितामृतको सुनकर मैं अपनी उत्कण्ठाको उसी तरह दूर करता रहूँगा, जैसे वायु बादलोंकी पंक्तिको उड़ाकर दूर ले जाती है ' ॥ १ ९ ॥

एवं ब्रुवाणं रामस्तु हनूमन्तं वरासनात् ।

उत्थाय सखजे स्नेहाद् वाक्यमेतदुवाच ह ॥ २० ॥

हनुमानजी के ऐसा कहनेपर श्रीरघुनाथजीने श्रेष्ठ सिंहासन से उठकर उन्हें हृदयसे लगा लिया और स्नेहपूर्वक इस प्रकार कहा ॥ २० ॥

एवमेतत् कपिश्रेष्ठ भविता नात्र संशयः ।

चरिष्यति कथा यावदेषा लोके च मामिका ॥ २१ ॥

तावत् ते भविता कीर्तिः शरीरेऽप्यसवस्तथा ।

लोका हि यावत्स्थास्यन्ति तावत् स्थास्यन्ति मे कथाः ॥

‘ कपिश्रेष्ठ! ऐसा ही होगा, इसमें संशय नहीं है । संसारमें मेरी कथा जबतक प्रचलित रहेगी, तबतक तुम्हारी कीर्ति अमिट रहेगी और तुम्हारे शरीर में प्राण भी रहेंगे ही । जबतक ये लोक बने रहेंगे, तबतक मेरी कथाएँ भी स्थिर रहेंगी ॥ २१-२२ ॥

एकैकस्योपकारस्य प्राणान् दास्यामि ते कपे ।

शेषस्येहोपकाराणां भवाम ऋणिनो वयम् ॥ २३ ॥

' कपे! तुमने जो उपकार किये हैं, उनमेंसे एक - एकके लिये मैं अपने प्राण निछावर कर सकता हूँ । तुम्हारे शेष उपकारों के लिये तो मैं ऋणी ही रह जाऊँगा ॥ २३ ॥

मदङ्गे जीर्णतां यातु यत् त्वयोपकृतं कपे ।

नरः प्रत्युपकाराणामापत्स्वायाति पात्रताम् ॥ २४ ॥

' कपिश्रेष्ठ! मैं तो यही चाहता हूँ कि तुमने जो - जो उपकार किये हैं, वे सब मेरे शरीर में ही पच जायें । उनका बदला चुकानेका मुझे कभी अवसर न मिले; क्योंकि पुरुषमें उपकारका बदला पानेकी योग्यता आपत्तिकालमें ही आती है । ( मैं नहीं चाहता कि तुम भी संकट में पड़ो और मैं तुम्हारे उपकारका बदला चुकाऊँ ) ॥२४ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये

ततोऽस्य हारं चन्द्राभं मुच्य कण्ठात् स राघवः ।

वैदूर्यतरलं कण्ठे बबन्ध च हनूमतः ॥ २५ ॥

इतना कहकर श्रीरघुनाथजीने अपने कण्ठसे एक चन्द्रमा-के समान उज्ज्वल हार निकाला, जिसके मध्यभागमें वैदूर्य-मणि थी । उसे उन्होंने हनुमान जीके गले में बाँध दिया || २५ ||

तेनोरसि निबद्धेन हारेण महता कपिः ।

रराज हेमशैलेन्द्रश्चन्द्रेणाक्रान्तमस्तकः ॥ २६ ॥

वक्षःस्थलसे सटे हुए उस विशाल हारसे हनुमानजी उसी तरह सुशोभित हुए, जैसे सुवर्णमय गिरिराज सुमेरु के शिखर-पर चन्द्रमाका उदय हुआ हो ॥ २६ ॥

श्रुत्वा तु राघवस्यैतदुत्थायोत्थाय वानराः ।

प्रणम्य शिरसा पादी निर्जग्मुस्ते महाबलाः ॥ २७ ॥

श्रीरघुनाथजी के ये विदाई के शब्द सुनकर वे महाबली-वानर एक - एक करके उठे और उनके चरणोंमें सिर झुकाकर प्रणाम करके वहाँसे चल दिये ॥ २७ ॥

सुग्रीवः स च रामेण निरन्तरमुरोगतः ।

विभीषणश्च धर्मात्मा सर्वे ते वाष्पविक्लवाः ॥ २८ ॥

सुग्रीव और धर्मात्मा विभीषण श्रीरामके हृदयसे लग गये और उनका गाढ़ आलिंगन करके बिदा हुए । उस समय वे सब - के - सब नेत्रोंसे आँसू बहाते हुए श्रीरामके भावी विरह से व्यथित हो उठे थे ॥ २८ ॥

सर्वे च ते बाष्पकलाः साधुनेत्रा विचेतसः ।

सम्मूढा इव दुःखेन त्यजन्तो राघवं तदा ॥ २ ९ ॥

श्रीरामको छोड़कर जाते समय वे सभी दुःखसे किंकर्तव्य विमूढ़ तथा अचेत से हो रहे थे । किसीके गले से आवाज नहीं निकलती थी और सभीके नेत्रोंसे अश्रु झर रहे थे ॥ २ ९ ॥

कृतप्रसादास्तेनैवं राघवेण महात्मना ।

जग्मुः स्वं स्वं गृहं सर्वे देही देहमिव त्यजन् ॥ ३० ॥

महात्मा श्रीरघुनाथजीके इस प्रकार कृपा एवं प्रसन्नता-पूर्वक बिदा देनेपर वे सब वानर विवश हो उसी प्रकार अपने-अपने घरको गये, जैसे जीवात्मा विवशतापूर्वक शरीर छोड़कर, परलोकको जाता है ॥ ३० ॥

ततस्तु ते राक्षस ऋक्षवानराः प्रणम्य रामं रघुवंशवर्धनम् । वियोगजाश्रुप्रति पूर्णलोचनाः प्रतिप्रयातास्तु यथा निवासिनः ॥ ३१ ॥

वे राक्षस, रीछ और वानर रघुवंशवर्धन श्रीरामको प्रणाम करके नेत्रों में वियोगके आँसू लिये अपने - अपने निवासस्थानको लौट गये || ३१ ॥ उत्तरकाण्डे चत्वारिंशः सर्गः ॥ ४० ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्वरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें चालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ४० ॥

पृष्ठ 783

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१५६४ श्रीमदूवाल्मीकीयरामायणे एकचत्वारिंशः सर्गः कुबेरके भेजे हुए पुष्पक विमानका आना और श्रीरामसे पूजित एवं अनुगृहीत होकर अदृश्य हो जाना, भरतके द्वारा श्रीरामराज्यके विलक्षण प्रभावका वर्णन

विसृज्य च महाबाहुर्ऋक्षवानर राक्षसान् ।

भ्रातृभिः सहितो रामः प्रमुमोद सुखं सुखी ॥ १ ॥

रीछों, वानरों और राक्षसोंको बिदा करके भाइयोसहित सुखस्वरूप महाबाहु श्रीराम सुख और आनन्दपूर्वक वहाँ रहने लगे ॥ १ ॥

अथापराह्नसमये भ्रातृभिः सह राघवः ।

शुश्राव मधुरां वाणीमन्तरिक्षान्महाप्रभुः ॥ २ ॥

एक दिन अपराह्नकालमें ( दोपहर के बाद ) अपने भाइयोंके साथ बैठे हुए महाप्रभु श्रीरघुनाथजीने आकाशसे यह मधुर वाणी सुनी - ॥ २ ॥

सौम्य राम निरीक्षख सौम्येन वदनेन माम् ।

कुबेरभवनात् प्राप्तं विद्धि मां पुष्पकं प्रभो ॥ ३ ॥

' सौम्य श्रीराम! आप मेरी ओर प्रसन्नतापूर्ण मुखसे दृष्टिपात करने की कृपा करे । प्रभो! आपको विदित होना चाहिये कि मैं कुबेरके भवनसे लौटा हुआ पुष्पक विमान हूँ ॥

तव शासनमाज्ञाय गतोऽस्मि भवनं प्रति ।

उपस्थातुं नरश्रेष्ठ स च मां प्रत्यभाषत ॥ ४ ॥

“ नरश्रेष्ठ! आपकी आज्ञा मानकर मैं कुबेरकी सेवाके लिये उनके भवनमें गया था; परंतु उन्होंने मुझसे कहा-- ॥

निर्जितस्त्वं नरेन्द्रेण राघवेण महात्मना ।

निहत्य युधि दुर्धर्षे रावणं राक्षसेश्वरम् ॥ ५ ॥

" विमान | महात्मा महाराज श्रीरामने युद्धमें दुर्धर्षं राक्षसराज रावणको मारकर तुम्हें जीता है ॥ ५ ॥

ममापि परमा प्रीतिर्हते तस्मिन् दुरात्मनि ।

रावणे सगणे चैव सपुत्रे सहबान्धवे ॥ ६ ॥

“ पुत्रों, बन्धु बान्धवों तथा सेवकगणोंसहित उस दुरात्मा रावणके मारे जानेसे मुझे भी बड़ी प्रसन्नता हुई है ॥ ६ ॥

स त्वं रामेण लङ्कायां निर्जितः परमात्मना ।

वह सौम्य तमेव त्वमहमाज्ञापयामि ते ॥ ७ ॥

“ सौम्य! इस तरह परमात्मा श्रीरामने लङ्कामें रावणके साथ - साथ तुमको भी जीत लिया है; अतः मैं आज्ञा देता हूँ, तुम उन्हीं की सवारीमें रहो ॥ ७ ॥

परमो ह्येष मे कामो यत् त्वं राघवनन्दनम् 1 ।

वर्लोकस्य संयानं गच्छस्व विगतज्वरः ॥ ८ ॥

“ घुकुलको आनन्दित करनेवाले श्रीराम सम्पूर्ण जगत् के आश्रय हैं । तुम उनकी सवारीके काम आओ —यह मेरी सबसे बड़ी कामना है । इसलिये तुम निश्चिन्त होकर जाओ ' ॥ ८ ॥

सोऽहं शासनमाज्ञाय धनदस्य महात्मनः ।

त्वत्सकाशमनुप्राप्तो निर्विशङ्कः प्रतीच्छ माम् ॥ ९ ॥

" इस प्रकार मैं महात्मा कुबेरकी आज्ञा पाकर ही आपके पास आया हूँ, अतः आप मुझे निःशङ्क होकर ग्रहण करें ॥ ९ ॥

अधृष्यः सर्वभूतानां सर्वेषां धनदाशया ।

चराम्यहं प्रभावेण तवाज्ञां परिपालयन् ॥ १० ॥

“ मैं सभी प्राणियों के लिये अजेय हूँ और कुबेरकी आज्ञा के अनुसार मैं आपके आदेशका पालन करता हुआ अपने प्रभावसे समस्त लोकों में विचरण करूँगा ' ॥ १० ॥

एवमुक्तस्तदा रामः पुष्पकेण महाबलः ।

उवाच पुष्पकं दृष्ट्रा विमानं पुनरागतम् ॥ ११ ॥

पुष्पकके ऐसा कहनेपर महाबली श्रीरामने उस विमानको पुनः आया देख उससे कहा— ॥ ११ ॥

यद्येवं स्वागतं तेऽस्तु विमानवर पुष्पक ।

आनुकूल्याद् धनेशस्य वृत्तदोषो न नो भवेत् ॥ १२ ॥

' विमानराज पुष्पक! यदि ऐसी बात है तो मैं तुम्हारा स्वागत करता हूँ । कुबेरकी अनुकूलता होनेसे हमें मर्यादा-भङ्गका दोष नहीं लगेगा ' ॥ १२ ॥

लाजैश्चैव तथा पुष्पैर्धूपैश्चैव सुगन्धिभिः ।

पूजयित्वा महाबाहू राघवः पुष्पकं तदा ॥ १३ ॥

ऐसा कहकर महाबाहु श्रीरामने लावा, फूल, धूप और चन्दन आदिके द्वारा पुष्पकका पूजन किया ॥ १३ ॥

गम्यतामिति चोवाच आगच्छ त्वं स्मरे यदा ।

सिद्धानां च गतौ सौम्य मा विषादेन योजय ॥ १४ ॥

प्रतिघातश्च ते मा भूद् यथेष्टं गच्छतो दिशः । और कहा - ' अब तुम जाओ । जब मैं स्मरण करूँ, तब आ जाना । आकाशमें रहना और अपनेको मेरे वियोगसे दुखी न होने देना ( मैं यथासमय तुम्हारा उपयोग करता रहूँगा ) । स्वेच्छासे सम्पूर्ण दिशाओंमें जाते समय तुम्हारी किसीसे टक्कर न हो अथवा तुम्हारी गति कहीं प्रतिहत न हो ' ॥ १४३ ॥

एवमस्त्विति रामेण पूजयित्वा विसर्जितम् ॥ १५ ॥

अभिप्रेतां दिशं तस्मात् प्रायात् तत् पुष्पकं तदा । पुष्पकने ' एवमस्तु ' कहकर उनकी आज्ञा शिरोधार्य कर ली । इस प्रकार श्रीरामने उसका पूजन करके जब उसे जानेकी आज्ञा दे दी, तब वह पुष्पक वहाँसे अपनी अभीष्ट दिशाको चला गया ॥ १५३ ॥

एवमन्तर्हिते तस्मिन् पुष्पके सुकृतात्मनि ॥ १६ ॥

भरतः प्राञ्जलिर्वाक्यमुवाच रघुनन्दनम् । इस प्रकार पुण्यमय पुष्पक विमानके अदृश्य हो जानेपर भरतजीने हाथ जोड़कर श्रीरघुनाथजीसे कहा- ॥ १६३ ॥

पृष्ठ 784

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उत्तरकाण्डे द्विचत्वारिंशः सर्गः १५६५ विबुधात्मनि दृश्यन्ते त्वयि वीर प्रशासति ॥ १७ ॥

अमानुषाणि सत्त्वानि व्याहतानि मुहुर्मुहुः । ' वीरवर! आप देवस्वरूप हैं । इसीलिये आपके शासन-कालमें मनुष्येतर प्राणी भी बारंबार मनुष्योंके समान सम्भाषण करते देखे जाते हैं । १७३ ॥ अनामयश्च मर्त्यानां साम्रो मासो गतो ह्ययम् ॥ १८ ॥

जीर्णानामपि सत्त्वानां मृत्युर्नायाति राघव ।

अरोगप्रसवा नार्यो वपुष्मन्तो हि मानवाः ॥ १ ९ ॥

' आपके राज्यपर अभिषिक्त हुए एक माससे अधिक हो गया, तबसे सभी लोग नीरोग दिखायी देते हैं । बूढ़े प्राणियों के पास भी मृत्यु नहीं फटकती है । स्त्रियाँ बिना कष्ट सहे प्रसव करती । सभी मनुष्योंके शरीर हृष्ट - पुष्ट दिखायी देते हैं ॥ १८-१९ । हर्षश्चाभ्यधिको राजञ्जनस्य पुरवासिनः । इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये काले वर्षति पर्जन्यः पातयन्नमृतं पयः ॥ २० ॥

' राजन्! पुरवासियों में बड़ा हर्ष छा रहा है । मेघ अमृतके समान जल गिराते हुए समयपर वर्षा करते हैं ॥ २० ॥

वाताश्चापि प्रवान्त्येते स्पर्शयुक्ताः सुखाः शिवाः ।

ईदृशो नश्चिरं राजा भवेदिति नरेश्वरः ॥ २१ ॥

कथयन्ति पुरे राजन् पौरजानपदास्तथा । ' हवा ऐसी चलती है कि इसका स्पर्श शीतल एवं सुखद जान पड़ता है । राजन्! नगर और जनपद के लोग इस पुरीमें कहते हैं कि हमारे लिये चिरकालतक ऐसे ही प्रभावशाली राजा रहें ॥ २१३ ॥

एता वाचः सुमधुरा भरतेन समीरिताः ।

श्रुत्वा रामो मुदा युक्तो बभूव नृपसत्तमः ॥ २२ ॥

भरतकी कही हुई ये सुमधुर बातें सुनकर नृपश्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजी बड़े प्रसन्न हुए ॥ २२ ॥

उत्तरकाण्डे एकचत्वारिंशः सर्गः ॥ ४१ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें इकतालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ४१ ॥

द्विचत्वारिंशः सर्गः अशोकवनिका में श्रीराम और सीताका विहार प्रकट करना और स विसृज्य ततो रामः पुष्पकं हेमभूषितम् प्रविवेश महाबाहुरशोकवनिकां तदा सुवर्णभूषित पुष्पक विमानको बिदा करके श्रीरामने अशोक - वनिका ( अन्तःपुरके विहार योग्य में प्रवेश किया ॥ १ ॥

चन्दनागुरुचूतैश्च तुङ्गकालेयकैरपि देवदारुवनैश्चापि समन्तादुपशोभिताम् चन्दन, अगुरु, आम, तुङ्ग, ( नारियल ), श्रीरामका

।

॥ १ ॥

महाबाहु उपवन )

।

॥ २ ॥

कालेयक ( रक्तचन्दन ) तथा देवदारु - वन सब ओरसे उसकी शोभा बढ़ा रहे थे ॥ २ ॥

चम्पकाशोकपुंनागमधूकपनसासनैः शोभितां पारिजातैश्च विधूमज्वलनप्रभैः ॥ ३ ॥

चम्पा, अशोक, पुंनाग, महुआ, कटहल, असन तथा धूमरहित अग्निके समान प्रकाशित होनेवाले पारिजातसे वह वाटिका सुशोभित थी ॥ ३ ॥

लोधनीपार्जुनैर्नागैः सप्तपर्णातिमुक्तकैः ।

मन्दारकदलीगुल्मलताजालसमावृताम् ॥ ४ ॥

लोध, कदम्ब, अर्जुन, नागकेसर, छितवन, अतिमुक्तक, मन्दार, कदली तथा गुल्मों और लताओंके समूह उसमें सब ओर व्याप्त थे || ४ ||

प्रियङ्गुभिः कदम्बैश्च तथा च बकुलैरपि ।

जम्बूभिर्दाडिमैश्चैव कोविदारैश्च शोभिताम् ॥ ५ ॥

, गर्भिणी सीताका तपोवन देखने की इच्छा इसके लिये स्वीकृति देना प्रियङ्गु, धूलिकदम्ब, बकुल, जामुन, अनार और कोविदार आदि वृक्ष उस उपवनको सुशोभित करते थे ॥ ५ ॥

सर्वदा कुसुमै रम्यैः फलवद्भिर्मनोरमैः ।

दिव्यगन्धरसोपेतैस्तरुणाङ्कुरपल्लवैः ॥ ६ ॥

सदा फूल और फल देनेवाले रमणीय, मनोरम, दिव्य रस और गन्धसे युक्त तथा नूतन अङ्कुर - पल्लवोंसे अलंकृत वृक्ष भी उस अशोकवनिकाकी शोभा बढ़ा रहे थे ॥ ६ ॥

तथैव तरुभिर्दिव्यैः शिल्पिभिः परिकल्पितैः ।

चारुपल्लवपुष्पाढयैर्मत्त भ्रमरसंकुलैः ॥ ७ ॥

वृक्ष लगाने की कला में कुशल मालियोंद्वारा तैयार किये गये दिव्य वृक्ष, जिनमें मनोहर पल्लव तथा पुष्प शोभा पाते थे और जिनके ऊपर मतवाले भ्रमर छा रहे थे, उस उपवन-की श्री वृद्धि कर रहे थे ॥ ७ ॥

कोकिलैर्भृङ्गराजैश्च नानावर्णैश्च पक्षिभिः ।

शोभितां शतशश्चित्रां चूतवृक्षावतंसकैः ॥ ८ ॥

कोकिल, भृङ्गराज आदि रंग - बिरंगे सैकड़ों पक्षी उस वाटिकाकी शोभा थे, जो आम्रकी डालियोंके अग्रभागपर बैठ-कर वहाँ विचित्र सुषुमाकी सृष्टि कर रहे थे ॥ ८ ॥

शातकुम्भनिभाः केचित् केचिदग्निशिखोपमाः ।

नीलाञ्जननिभाश्चान्ये भान्ति तत्र रूम पादपाः ॥ ९ ॥

कोई वृक्ष सुवर्णके समान पीले, कोई अग्नि शिखाके समान उज्ज्वल और कोई नीले अञ्जनके समान श्याम थे,

पृष्ठ 785

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१५६६ श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे जो स्वयं सुशोभित होकर उस उपवनकी शोभा बढ़ाते थे ॥ ९ ॥

सुरभीणि च पुष्पाणि माल्यानि विविधानि च ।

दीर्घिका विविधाकाराः पूर्णाः परमवारिणा ॥ १० ॥

वहाँ अनेक प्रकारके सुगन्धित पुष्प और गुच्छ दृष्टि-गोचर होते थे । उत्तम जलसे भरी हुई भाँति - भाँति की बावड़ियाँ देखी जाती थीं ॥ १० ॥

माणिक्यकृत सोपानाः स्फाटिकान्तरकुट्टिमाः ।

फुल्लपद्मोत्पलवनाश्चक्रवाकोपशोभिताः ॥ ११ ॥

जिनमें माणिक्यकी सीढ़ियाँ बनी थीं । सीढ़ियों के बाद कुछ दूरतक जलके भीतर की भूमि स्फटिक मणिसे बँधी हुई थी । उन बावड़ियोंके भीतर खिले हुए कमल और कुमुदके समूह शोभा पाते थे, चक्रवाक भी उनकी शोभा बढ़ा रहे थे ।

दात्यूहशुकसंघुष्टा हंससारसनादिताः ।

तरुभिः पुष्पशबलैस्तीरजैरुपशोभिताः ॥ १२ ॥

पपीहे और तोते वहाँ मीठी बोली बोल रहे थे । हंसों और सरसोंके कलरव गूँज रहे थे । फूलोंसे चितकबरे दिखायी देनेवाले तटवर्ती वृक्ष उन्हें शोभासम्पन्न बना रहे थे ॥ १२ ॥

प्राकारैर्विविधाकारैः शोभिताश्च शिलातलैः ।

तत्रैव च वनोद्देशे वैदूर्यमणिसंनिभैः ॥ १३ ॥

शाद्वलैः परमोपेतां पुष्पितद्रुमकाननाम् । वे भाँति - भाँति के परकोटों और शिलाओंसे भी सुशोभित थीं । वहीं वनप्रान्त में नीलमके समान रंगवाली हरी - हरी घासें उस वाटिकाका शृङ्गार कर रही थीं । वहाँके वृक्षोंका समुदाय फूलों के भारसे लदा हुआ था ॥ १३३ ॥

तत्र संघर्षजातानां वृक्षाणां पुष्पशालिनाम् ॥ १४ ॥

प्रस्तराः पुष्पशबला नभस्तारागणैरिव । वहाँ मानो परस्पर होड़ लगाकर खिले हुए पुष्पशाली वृक्षों के झड़े हुए फूलोंसे काले - काले प्रस्तर उसी तरह चित-कबरे दिखायी देते थे, जैसे तारोंके समुदायसे अलंकृत आकाश || १४ || नन्दनं हि यथेन्द्रस्य ब्राह्मं चैत्ररथं यथा ॥ १५ ॥

तथाभूतं हि रामस्य काननं संनिवेशनम् । - जैसे इन्द्रका नन्दन और ब्रह्माजीका बनाया हुआ कुबेर-का चैत्ररथ वन सुभोभित होता है, उसी प्रकार सुन्दर भवनों

से विभूषित श्रीराम का वह क्रीडा - कानन शोभा पा रहा था ।

बह्रासन गृहोपेतां लतागृहसमावृताम् ॥ १६ ॥

अशोकवनिकां स्फीतां प्रविश्य रघुनन्दनः ।

आसने च शुभाकारे पुष्पप्रकरभूषिते ॥ १७ ॥

कुथास्तरणसंस्तीर्णे रामः संनिषसाद ह । वहाँ अनेक ऐसे भवन बने थे, जिनके भीतर बैठनेके लिये बहुत - से आसन सजाये गये थे । वह वाटिका अनेक लतामण्डपोंसे सम्पन्न दिखायी देती थी । उस समृद्धिशालिनी अशोकवनिका में प्रवेश करके रघुकुलनन्दन श्रीराम पुष्पराशिसे विभूषित एक सुन्दर आसनपर बैठे, जिसपर कालीन बिछा था ॥ १६-१७३ ॥ सीतामादाय हस्तेन मधु मैरेयकं शुचि ॥ १८ ॥

पाययामास काकुत्स्थः शचीमिव पुरंदरः । जैसे देवराज इन्द्र शचीको सुधापान कराते हैं, उसी प्रकार ककुत्स्थ कुलभूषण श्रीरामने अपने हाथसे पवित्र पेय मधु लेकर सीताजीको पिलाया ॥ १८३ ॥

मांसानि च सुमृष्टानि फलानि विविधानि च ॥ १ ९ ॥ रामस्याभ्यवहारार्थ किंकरास्तूर्णमाहरन् । सेवकगण श्रीरामके भोजनके लिये वहाँ तुरंत ही राजो-चित भोग्य पदार्थ ( भाँति - भाँतिकी रसोई ) तथा नाना प्रकारके फल ले आये ॥ १ ९ ३ ॥ उपानृत्यंश्च राजानं नृत्यगीतविशारदाः ॥ २० ॥

अप्सरोरगसंघाश्च किंनरीपरिवारिताः । उस समय राजा रामके समीप नृत्य और गीतकी कला में निपुण अप्सराएँ और नाग कन्याएँ किन्नरियोंके साथ मिल-कर नृत्य करने लगीं ॥ २०३ ॥

दक्षिणा रूपवत्यश्च स्त्रियः पानवशं गताः ॥ २१ ॥

उपानृत्यन्त काकुत्स्थं नृत्यगीतविशारदाः । नाचने - गाने में कुशल और चतुर बहुत - सी रूपवती स्त्रियाँ मधुपानजनित मदके वशीभूत हो श्रीरामचन्द्रजी के निकट अपनी नृत्य - कलाका प्रदर्शन करने लगीं ॥। २१३ ॥ मनोऽभिरामा रामास्ता रामो रमयतां वरः ॥ २२ ॥

रमयामास धर्मात्मा नित्यं परमभूषिताः । दूसरोंके मनको रमानेवाले पुरुषों में श्रेष्ठ धर्मात्मा श्रीराम सदा उत्तम वस्त्राभूषणोंसे भूषित हुई उन मने ऽभिराम रमणियों-को उपहार आदि देकर संतुष्ट रखते थे || २२३ ॥ स तया सीतया सार्धमासीनो विरराज ह ॥ २३ ॥

अरुन्धत्या इवासीनो वसिष्ठ इव तेजसा । उस समय भगवान् श्रीराम सीतादेवीके साथ सिंहासनपर विराजमान हो अपने तेजसे अरुन्धतीके साथ बैठे हुए वसिष्ठजी के समान शोभा पाते थे ॥ २३३ ॥

एवं रामो मुदा युक्तः सीतां सुरसुतोपमाम् ॥ २४ ॥

रमयामास वैदेही महन्यहनि देववत् । यो श्रीराम प्रतिदिन देवताके समान आनन्दित रहकर देवकन्याके समान सुन्दरी विदेहनन्दिनी सीताके साथ रमण करते थे || २४३ ॥ तथा तयोर्विहरतोः सीताराघवयोश्चिरम् ॥ २५ ॥

अत्यक्रामच्छुभः कालः शैशिरो भोगदः सदा ।

प्राप्तयोर्विविधान् भोगानतीतः शिशिरागमः ॥ २६ ॥

इस प्रकार सीता और रघुनाथजी चिरकालतक विहार करते रहे । इतनेही में सदा भोग प्रदान करनेवाला शिशिर-ऋतुका सुन्दर समय व्यतीत हो गया । भाँति - भाँति के भोगोंका

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उत्तरकाण्डे त्रिचत्वारिंशः सर्गः १५६७ उपभोग करते हुए उन राजदम्पतिका वह शिशिरकाल बीत गया ॥ २५-२६ ॥

पूर्वाह्णे धर्मकार्याणि कृत्वा धर्मेण धर्मवित् ।

शेषं दिवसभागार्धमन्तःपुरगतोऽभवत् ॥ २७ ॥

धर्मज्ञ श्रीराम दिनके पूर्वभागमें धर्मके अनुसार धार्मिक कृत्य करते थे और शेष आधे दिन अन्तःपुरमें रहते थे ।

सीतापि देवकार्याणि कृत्वा पौर्वाह्निकानि वै ।

श्वश्रूणामकरोत् पूजां सर्वासामविशेषतः ॥ २८ ॥

सीताजी भी पूर्वाह्नकालमें देवपूजन आदि करके सब सासुओंकी समानरूपसे सेवा - पूजा करती थीं ॥ २८ ॥

अभ्यगच्छत् ततो रामं विचित्राभरणाम्बरा ।

त्रिविष्टपे सहस्राक्षमुपविष्टं यथा शची ॥ २ ९ ॥

तत्पश्चात् विचित्र वस्त्राभूषणोंसे विभूषित हो श्रीरामचन्द्र-जीके पास चली जाती थीं । ठीक उसी तरह, जैसे स्वर्ग में शची सहस्राक्ष इन्द्रकी सेवामें उपस्थित होती हैं ॥ २ ९ ॥

दृष्ट्वा तु राघवः पत्नीं कल्याणेन समन्विताम् ।

प्रहर्षमतुलं लेभे साधुसाध्विति चाब्रवीत् ॥ ३० ॥

इन्हीं दिनों श्रीरामचन्द्रजीने अपनी पत्नीको गर्भके मङ्गलमय चिह्नसे युक्त देखकर अनुपम हर्षं प्राप्त किया और कहा — ' बहुत अच्छा, बहुत अच्छा ' ॥ ३० ॥

अब्रवीच्च वरारोहां सीतां सुरसुतोपमाम् ।

अपत्यलाभो वैदेहि त्वय्ययं समुपस्थितः ॥ ३१ ॥

किमिच्छसि वरारोहे कामः किं क्रियतां तव । फिर वे देवकन्याके समान सुन्दरी सीतासे बोले-' विदेहनन्दिनि! तुम्हारे गर्भ से पुत्र प्राप्त होनेका यह समय उपस्थित है । वरारोहे! बताओ, तुम्हारी क्या इच्छा है? मैं तुम्हारा कौन - सा मनोरथ पूर्ण करूँ ११ ॥ ३१३ ॥

स्मितं कृत्वा तु वैदेही रामं वाक्यमथाब्रवीत् ॥ ३२ ॥

तपोवनानि पुण्यानि द्रष्टुमिच्छामि राघव ।

गङ्गातीरोपविष्टानामृषीणामुग्रतेजसाम् ॥ ३३ ॥

फलमूलाशिनां देव पादमूलेषु वर्तितुम् ।

एष मे परमः कामो यन्मूलफलभोजिनाम् ॥ ३४ ॥

अप्येकरात्रिं काकुत्स्थ निवसेयं तपोवने । इसपर सीताजीने मुसकराकर श्रीरामचन्द्रजीसे कहा-" रघुनन्दन! मेरी इच्छा एक बार उन पवित्र तपोवनोंको देखनेकी हो रही है । देव! गङ्गातटपर रहकर फल - मूल खानेवाले जो उग्र तेजस्वी महर्षि हैं, उनके समीप ( कुछ दिन ) रहना चाहती हूँ । काकुत्स्थ! फल - मूलका आहार करनेवाले महात्माओंके तपोवनमें एक रात निवास करूँ, यही मेरी इस समय सबसे बड़ी अभिलाषा है ' ॥ ३२-३४३ ॥

तथेति च प्रतिज्ञातं रामेणाक्लिष्टकर्मणा ।

विस्रब्धा भव वैदेहि श्वो गमिष्यस्यसंशयम् ॥ ३५ ॥

अनायास ही महान् कर्म करनेवाले श्रीरामने सीताकी इस इच्छाको पूर्ण करने की प्रतिज्ञा की और कहा –‘विदेह-नन्दिनि । निश्चिन्त रहो । कल ही वहाँ जाओगी, इसमें संशय ' नहीं है ' ॥ ३५ ॥

एवमुक्त्वा तु काकुत्स्थो मैथिलीं जनकात्मजाम् ।

मध्यकक्षान्तरं रामो निर्जगाम सुहृद्वृतः ॥ ३६ ॥

मिथिलेशकुमारी जानकीसे ऐसा कहकर ककुत्स्थ कुल-नन्दन श्रीराम अपने मित्रोंके साथ बीचके खण्डमें चले गये || इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे. वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे द्विचत्वारिंशः सर्गः ॥ ४२ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें बयालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ४२ ॥

त्रिचत्वारिंशः सर्गः भद्रका पुरवासियोंके मुखसे सीता के विषय में सुनी हुई अशुभ चर्चासे श्रीरामको अवगत कराना

तत्रोपविष्टं राजानमुपासन्ते विचक्षणाः ।

कथानां बहुरूपाणां हास्यकाराः समन्ततः ॥ १ ॥

वहाँ बैठे हुए महाराज श्रीरामके पास अनेक प्रकारकी कथाएँ कहने में कुशल हास्यविनोद करनेवाले सखा सब ओरसे आकर बैठते थे ॥ १ ॥

विजयो मधुमत्तश्च काश्यपो मङ्गलः कुलः ।

सुराजिः कालियो भद्रो दन्तवक्त्रः सुमागधः ॥ २ ॥

उन सखाओंके नाम इस प्रकार हैं – विजय, मधुमत्त, काश्यप, मङ्गल, कुल, सुराजि, कालिय, भद्र, दन्तवक्त्र और सुमागध ॥ २ ॥

एते कथा बहुविधाः परिहाससमन्विताः ।

कथयन्ति स्म संहृष्टा राघवस्य महात्मनः ॥ ३ ॥

ये सब लोग बड़े हर्षसे भरकर महात्मा श्रीरघुनाथजीके सामने अनेक प्रकारकी हास्य - विनोदपूर्ण कथाएँ कहा करते थे ।

ततः कथायां कस्यचिद् राघवः समभाषत ।

काः कथा नगरे भद्र वर्तन्ते विषयेषु च ॥ ४ ॥

इसी समय किसी कथाके प्रसङ्गमें श्रीरघुनाथजीने पूछा-' भद्र! आजकल नगर और राज्य में किस बात की चर्चा विशेष रूपसे होती है? ॥ ४ ॥

मामाश्रितानि कान्याहुः पौरजानपदा जनाः ।

किं च सीतां समाश्रित्य भरतं किं च लक्ष्मणम् ॥ ५ ॥

किं नु शत्रुघ्नमुद्दिश्य कैकेयीं किं नु मातरम् ।

वक्तव्यतां च राजानो वने राज्ये व्रजन्ति च ॥ ६ ॥

' नगर और जनपद के लोग मेरे, सीताके, भरतके, लक्ष्मण-के तथा शत्रुघ्न और माता कैकेयीके विषयमें क्या - क्या बातें करते हैं? क्योंकि राजा यदि आचार - विचारसे हीन हों तो वे अपने राज्यमें तथा वनमें ( ऋषि - मुनियोंके आश्रम में ) भी

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१५६८ श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे निन्दा विषय बन जाते हैं — सर्वत्र उन्हींकी बुराइयोंकी चर्चा होती है ' ॥ ५-६ ॥

एवमुक्ते तु रामेण भद्रः प्राञ्जलिरब्रवीत् ।

स्थिताः शुभाः कथा राजन् वर्तन्ते पुरवासिनाम् ॥ ७ ॥

श्रीरामचन्द्रजी के ऐसा कहनेपर भद्र हाथ जोड़कर बोला-' महाराज! आजकल पुरवासियोंमें आपको लेकर सदा अच्छी ही चर्चाएँ चलती हैं ' ॥ ७ ॥

अमुं तु विजयं सौम्य दशग्रीववधार्जितम् ।

भूयिष्ठं स्वपुरे पौरैः कथ्यन्ते पुरुषर्षभ ॥ ८ ॥

' सौम्य! पुरुषोत्तम! दशग्रीव वधसम्बन्धी जो आपकी विजय है, उसको लेकर नगर में सब लोग अधिक बातें किया करते हैं ' ॥ ८ ॥

एवमुक्तस्तु भद्रेण राघवो वाक्यमब्रवीत् ।

कथयस्व यथातत्त्वं सर्वे निरवशेषतः ॥ ९ ॥

शुभाशुभानि वाक्यानि कान्याहुः पुरवासिनः ।

श्रुत्वेदानीं शुभं कुर्या न कुर्यामशुभानि च ॥ १० ॥

भद्रके ऐसा कहने पर श्रीरघुनाथजीने कहा - ' पुरवासी मेरे विषय में कौन - कौन - सी शुभ या अशुभ बातें कहते हैं, उन सबको यथार्थरूपसे पूर्णतः बताओ । इस समय उनकी शुभ बातें सुनकर जिन्हें वे शुभ मानते हैं उनका मैं आचरण करूँगा और अशुभ बातें सुनकर जिन्हें वे अशुभ समझते हैं, उन कृत्यों को त्याग दूँगा ॥ ९ -१० ॥

कथयस्व च विस्रब्धो निर्भयं विगतज्वरः ।

कथयन्ति यथा पौराः पापा जनपदेषु च ॥ ११ ॥

' तुम विश्वस्त और निश्चिन्त होकर बेखटके कहो । पुरवासी और जनपदके लोग मेरे विषयमें किस प्रकार अशुभ चर्चाएँ करते हैं ' ॥ ११ ॥

राघवेणैवमुक्तस्तु भद्रः सुरुचिरं वचः ।

प्रत्युवाच महाबाहुं प्राञ्जलिः सुसमाहितः ॥ १२ ॥

श्रीरघुनाथजीके ऐसा कहनेपर भद्रने हाथ जोड़कर एकाग्रचित्त हो उन महाबाहु श्रीरामसे यह परम सुन्दर बात कही - ॥ १२ ॥

शृणु राजन् यथा पौराः कथयन्ति शुभाशुभम् ।

चत्वरापणरथ्यासु वनेषूपवनेषु च ॥ १३ ॥

' राजन्! सुनिये, पुरवासी मनुष्य चौराहोंपर, बाजार में, सड़कों पर तथा वन और उपवनमें भी आपके विषय में किस प्रकार शुभ और अशुभ बातें कहते हैं? यह बता रहा हूँ । १३ ।

दुष्करं कृतवान् रामः समुद्रे सेतुबन्धनम् ।

अश्रुतं पूर्वकैः कैश्चिद् देवैरपि सदानवैः ॥ १४ ॥

' वे कहते हैं ' श्रीरामने समुद्रपर पुल बाँधकर दुष्कर कर्म किया है । ऐसा कर्म तो पहलेके किन्हीं देवताओं और दानवोंने भी नहीं सुना होगा ॥ १४ ॥

रावणश्च दुराधर्षो हतः सबलवाहनः ।

वानराश्च वशं नीता ऋक्षाश्च सह राक्षसैः ॥ १५ ॥

“ श्रीरामद्वारा दुर्धर्षं रावण सेना और सवारियोसहित मारा गया तथा राक्षसोंसहित रीछ और वानर भी वशमें कर लिये गये ॥ १५ ॥

हत्वा च रावणं संख्ये सीतामाहृत्य राघवः ।

अमर्ष पृष्ठतः कृत्वा स्ववेश्म पुनरानयत् ॥ १६ ॥

" " परंतु एक बात खटकती है, युद्ध में रावणको मारकर श्रीरघुनाथजी सीताको अपने घर ले आये । उनके मन में सीताके चरित्रको लेकर रोष या अमर्ष नहीं हुआ ॥ १६ ॥

कीदृशं हृदये तस्य सीतासम्भोगजं सुखम् ।

अङ्कमारोप्य तु पुरा रावणेन बलाद्धताम् ॥ १७ ॥

लङ्कामपि पुरा नीतामशोकवनिकां गताम् ।

रक्षसां वशमापन्नां कथं रामो न कुत्स्यति ॥ १८ ॥

अस्माकमपि दारेषु सहनीयं भविष्यति ।

यथा हि कुरुते राजा प्रजास्तमनुवर्तते ॥ १ ९ ॥

" " उनके हृदय में सीता - सम्भोगजनित सुख कैसा लगता होगा? पहले रावणने बलपूर्वक सीताको गोद में उठाकर उनका अपहरण किया था; फिर वह उन्हें लङ्कामें भी ले गया और वहाँ उसने अन्तःपुरके क्रीडा - कानन अशोकवनिकामें रक्खा । इस प्रकार राक्षसोंके वशमें होकर वे बहुत दिनोंतक रहीं तो भी श्रीराम उनसे घृणा क्यों नहीं करते हैं । अब हमलोगोंको भी स्त्रियोंकी ऐसी बातें सहनी पड़ेंगी; क्योंकि राजा जैसा करता है, प्रजा भी उसीका अनुकरण करने लगती है ' ॥१७- १ ९ ॥

एवं बहुविधा वाचो वदन्ति पुरवासिनः ।

नगरेषु च सर्वेषु राजन् जनपदेषु च ॥ २० ॥

' राजन्! इस प्रकार सारे नगर और जनपद में पुरवासी मनुष्य बहुत - सी बातें कहते हैं ' ॥ २० ॥

तस्यैवं भाषितं श्रुत्वा राघवः परमार्तवत् ।

उवाच सुहृदः सर्वान् कथमेतद् वदन्तु माम् ॥ २१ ॥

भद्रकी यह बात सुनकर श्रीरघुनाथजीने अत्यन्त पीड़ित होकर समस्त सुहृदोंसे पूछा - ' आपलोग भी मुझे बतावें, यह कहाँतक ठीक है ' ॥ २१ ॥

सर्वे तु शिरसा भूमावभिवाद्य प्रणम्य च ।

प्रत्यूचू राघवं दीनमेवमेतन्न संशयः ॥ २२ ॥

तब सबने धरतीपर मस्तक टेककर श्रीरामचन्द्रजीको प्रणाम करके दीनतापूर्ण वाणी में कहा - ' प्रभो! भद्रका यह कथन ठीक है, इसमें तनिक भी संशय नहीं है? ॥ २२ ॥

श्रुत्वा तु वाक्यं काकुत्स्थः सर्वेषां समुदीरितम् ।

विसर्जयामास तदा वयस्याञ्छत्रुसूदनः । २३ ॥

सबके मुखसे यह बात सुनकर शत्रुसूदन श्रीरामने तत्काल उन सब सुहृदोंको बिदा कर दिया ॥ २३ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे त्रिचत्वारिंशः सर्गः ॥ ४३ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें तैंतालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ४३ ॥

पृष्ठ 788

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उत्तरकाण्डे चतुश्चत्वारिंशः सर्गः १५६ ९ चतुश्चत्वारिंशः सर्गः श्रीरामके बुलाने से सब भाइयोंका उनके पास आना

विसृज्य तु सुहृद्वर्ग बुद्धया निश्चित्य राघवः ।

समीपे द्वाःस्थमासीनमिदं वचनमब्रवीत् ॥ १ ॥

मित्रमण्डलीको विदा करके श्रीरघुनाथजीने बुद्धि से विचार-कर अपना कर्तव्य निश्चित किया और निकटवर्ती द्वारपालसे इस प्रकार कहा ॥ १ ॥

शीघ्रमानय सौमित्रिं लक्ष्मणं शुभलक्षणम् ।

भरतं च महाभागं शत्रुघ्नमपराजितम् ॥ २ ॥

' तुम जाकर शीघ्र ही महाभाग भरत, सुमित्राकुमार शुभ-लक्षण लक्ष्मण तथा अपराजित वीर शत्रुघ्न को भी यहाँ बुला लाओ ' ॥ २ ॥

रामस्य वचनं श्रुत्वा द्वाःस्थो मूर्ध्नि कृताञ्जलिः ।

लक्ष्मणस्य गृहं गत्वा प्रविवेशानिवारितः ॥ ३ ॥

श्रीरामचन्द्रजीका यह आदेश सुनकर द्वारपालने मस्तक पर अञ्जलि बाँधकर उन्हें प्रणाम किया और लक्ष्मण के घर जाकर बेरोक - टोक उसके भीतर प्रवेश किया ॥ ३ ॥

उवाच सुमहात्मानं वर्धयित्वा कृताञ्जलिः ।

द्रष्टुमिच्छति राजा त्वां गम्यतां तत्र मा चिरम् ॥ ४ ॥

वहाँ हाथ जोड़ जय - जयकार करते हुए उसने महात्मा लक्ष्मण से कहा - ' कुमार! महाराज आपसे मिलना चाहते हैं । अतः शीघ्र चलिये, विलम्ब न कीजिये ' ॥ ४ ॥

वाढमित्येव सौमित्रिः कृत्वा राघवशासनम् ।

प्राद्रवद् रथमारुह्य राघवस्य निवेशनम् ॥ ५ ॥

तब सुमित्राकुमार लक्ष्मणने ' बहुत अच्छा ' कहकर श्रीरामचन्द्रजी के आदेशको शिरोधार्य किया और तत्काल रथ-पर बैठकर वे श्रीरघुनाथजीके महलकी ओर तीव्रगति से चले |

प्रयान्तं लक्ष्मणं दृष्ट्वा द्वाःस्थो भरतमन्तिकात् ।

उवाच भरतं तत्र वर्धयित्वा कृताञ्जलिः ॥ ६ ॥

विनयावनतो भूत्वा राजा त्वां द्रष्टुमिच्छति । लक्ष्मणको जाते देख द्वारपाल भरतके पास गया और उन्हें हाथ जोड़ वहाँ जय जयकार करके विनीतभावसे बोला-' प्रभो! महाराज आपसे मिलना चाहते हैं ' ॥ ६३ ॥

भरतस्तु वचः श्रुत्वा द्वाःस्थाद् रामसमीरितम् ॥ ७ ॥

उत्पपातासनात् तूर्ण पद्भ्यामेव महाबलः । श्रीरामके भेजे हुए द्वारपालके मुख से यह बात सुनकर महाबली भरत तुरंत अपने आसन से उठ खड़े हुए और पैदल ही चल दिये ॥ ७३ ॥

दृष्ट्वा प्रयान्तं भरतं त्वरमाणः कृताञ्जलिः ॥ ८ ॥

शत्रुघ्नभवनं गत्वा ततो वाक्यमुवाच ह । भरतको जाते देख द्वारपाल बड़ी उतावली के साथ शत्रुघ्न-के भवनमें गया और हाथ जोड़कर बोला- ॥ ८३ ॥

एह्यागच्छ रघुश्रेष्ठ राजा त्वां द्रष्टुमिच्छति ॥ ९ ॥

वा ० रा ० ५.११.१७-गतो हि लक्ष्मणः पूर्व भरतश्च महायशाः । ' रघुश्रेष्ठ! आइये, चलिये, राजा श्रीराम आपको देखना चाहते हैं । श्रीलक्ष्मणजी और महायशस्वी भरतजी पहले ही जा चुके हैं ' ॥ ९ ३ ॥ श्रुत्वा तु वचनं तस्य शत्रुघ्नः परमासनात् ॥ १० ॥

शिरसा वन्द्य धरणीं प्रययौ यत्र राघवः । द्वारपालकी बात सुनकर शत्रुघ्न अपने उत्तम आसन से उठे और धरती पर माथा टेककर मन - ही - मन श्रीरामकी वन्दना करके तुरंत उनके निवासस्थान की ओर चल दिये ॥ १०३ ॥

द्वाःस्थस्त्वागभ्य रामाय सर्वानेव कृताञ्जलिः ॥ ११ ॥

निवेदयामास तथा भ्रातॄन् स्वान् समुपस्थितान् । द्वारपालने आकर श्रीरामसे हाथ जोड़कर निवेदन किया कि प्रभो! आपके सभी भाई द्वारपर उपस्थित हैं ' ॥ ११३ ॥

कुमारानागताञ्छ्रुत्वा चिन्ताव्याकुलितेन्द्रियः ॥ १२ ॥

अवाङ्मुखो दीनमना द्वाःस्थं वचनमब्रवीत् ।

प्रवेशय कुमारांस्त्वं मत्समीपं त्वरान्वितः ॥ १३ ॥

एतेषु जीवितं मह्यमेते प्राणाः प्रिया मम । कुमारों का आगमन सुनकर चिन्तासे व्याकुल इन्द्रियवाले श्रीरामने नीचे मुख किये दुखी मनसे द्वारपालको आदेश दिया -- ' तुम तीनों राजकुमारोंको जल्दी मेरे पास ले आओ । मेरा जीवन इन्हीं पर अवलम्बित है । ये मेरे प्यारे प्राणस्वरूप हैं ' ॥ १२–१३३ ॥ आज्ञप्तास्तु नरेन्द्रेण कुमाराः शुक्लवाससः ॥ १४ ॥

प्रहाः प्राञ्जलयो भूत्वा विविशुस्ते समाहिताः । महाराजकी आज्ञा पाकर वे श्वेत वस्त्रधारी कुमार सिर झुकाये हाथ जोड़े एकाग्रचित्त हो भवनके भीतर गये ॥ १४३ ॥

ते तु दृष्ट्वा मुखं तस्य सग्रहं शशिनं यथा ॥ १५ ॥

संध्यागतमिवादित्यं प्रभया परिवर्जितम् । उन्होंने श्रीरामका मुख इस तरह उदास देखा, मानो चन्द्रमापर ग्रह लग गया हो । वह संध्याकालके सूर्यकी भाँति प्रभाशून्य हो रहा था ॥ १५३ ॥

बाष्पपूर्णे च नयने दृष्ट्वा रामस्य धीमतः ।

हतशोभं यथा पद्मं मुखं वीक्ष्य च तस्य ते ॥ १६ ॥

उन्होंने बारंबार देखा बुद्धिमान् श्रीरामके दोनों नेत्रों में आँसू भर आये थे और उनके मुखारविन्दकी शोभा छिन गयी थी ॥ १६ ॥

ततोऽभिवाद्य त्वरिताः पादौ रामस्य मूर्धभिः ।

तस्थुः समाहिताः सर्वे रामस्त्वश्रूण्यवर्तयत् ॥ १७ ॥

तदनन्तर उन तीनों भाइयोंने तुरंत श्रीराम के चरणों में मस्तक रखकर प्रणाम किया । फिर वे सब - के - सब प्रेम में

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१५७० श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे समाधिस्थ से होकर पड़ गये । उस समय श्रीराम आँसू बहा रहे थे ॥ १७ ॥

तान् परिष्वज्य बाहुभ्यामुत्थाप्य च महाबलः ।

आसनेष्वासतेत्युक्त्वा ततो वाक्यं जगाद ह ॥ १८ ॥

महाबली रघुनाथजीने दोनों भुजाओंसे उठाकर उन सबका आलिङ्गन किया और कहा-- ' इन आसनोंपर बैठो । ' जब वे बैठ गये, तब उन्होंने फिर कहा-- ॥ १८ ॥

भवन्तो मम सर्वस्वं भवन्तो जीवितं मम ।

भवद्भिश्च कृतं राज्यं पालयामि नरेश्वराः ॥ १ ९ ॥

' राजकुमारो! तुमलोग मेरे सर्वस्व हो । तुम्हीं मेरे जीवन हो और तुम्हारे द्वारा सम्पादित इस राज्यका मैं पालन करता हूँ ॥ १ ९ ॥ इस्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये

भवन्तः कृतशास्त्रार्था बुद्ध्या च परिनिष्ठिताः ।

सम्भूय च मदर्थोऽयमन्वेष्टव्यो नरेश्वराः ॥ २० ॥

' नरेश्वरो! तुम सभी शास्त्रोंके ज्ञाता और उनमें बताये कर्तव्यका पालन करनेवाले हो । तुम्हारी बुद्धि भी परिपक्व है । इस समय मैं जो कार्य तुम्हारे सामने उपस्थित करनेवाला हूँ, उसका तुम सबको मिलकर सम्पादन करना चाहिये ' ॥ २० ॥

तथा वदति काकुत्स्थे अवधानपरायणाः ।

उद्विग्नमनसः सर्वे किं नु राजाभिधास्यति ॥ २१ ॥

श्रीरामचन्द्रजीके ऐसा कहनेपर सभी भाई चौकन्ने हो गये । सबका चित्त उद्विग्न हो गया और सभी सोचने लगे-' न जाने महाराज हमसे क्या कहेंगे? ' ॥ २१ ॥

उत्तरकाण्डे चतुश्चत्वारिंशः सर्गः ॥ ४४ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के उत्तरकाण्डमें चौवालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ४४ ॥

पञ्चचत्वारिंशः सर्गः श्रीरामका भाइयोंके समक्ष सर्वत्र फैले हुए लोकापवादकी चर्चा करके सीताको वनमें छोड़ आनेके लिये

तेषां समुपविष्टानां सर्वेषां दीनचेतसाम् ।

उवाच वाक्यं काकुत्स्थो मुखेन परिशुष्यता ॥ १ ॥

इस प्रकार सब भाई दुखी मनसे वहाँ बैठे हुए थे 1 उस समय श्रीरामने सूखे मुखसे उनके सामने यह बात कही ।

शृणुत भद्रं वो मा कुरुध्वं मनोऽन्यथा ।

पौराणां मम सीतायां यादृशी वर्तते कथा ॥ २ ॥

" बन्धुओ! तुम्हारा कल्याण हो । तुम सब लोग मेरी बात सुनो । मनको इधर - उधर न ले जाओ । पुरवासियों के यहाँ मेरे और सीता के विषय में जैसी चर्चा चल रही है, उसीको बता रहा हूँ ॥ २ ॥

पौरापवादः सुमहांस्तथा जनपदस्य च ।

वर्तते मयि बीभत्सा सा मे मर्माणि कृन्तति ॥ ३ ॥

" इस समय पुरवासियों और जनपदके लोगोंमें सीताके सम्बन्धमें महान् अपवाद फैला हुआ है । मेरे प्रति भी उनका बड़ा घृणापूर्ण भाव है । उन सबकी वह घृणा मेरे मर्मस्थलको विदीर्ण किये देती है ॥ ३ ॥

अहं किल कुले जात इक्ष्वाकूणां महात्मनाम् ।

सीतापि सत्कुले जाता जनकानां महात्मनाम् ॥ ४ ॥

' मैं इक्ष्वाकुवंशी महात्मा नरेशोंके कुलमें उत्पन्न हुआ हूँ । सीताने भी महात्मा जनकों के उत्तम कुलमें जन्म लिया ॥ ४ ॥

जानासि त्वं यथा सौम्य दण्डके विजने वने ।

रावणेन हृता सीता स च विध्वंसितो मया ॥ ५ ॥

" सौम्य लक्ष्मण! तुम तो यह जानते ही हो कि किस प्रकार लक्ष्मणको आदेश देना रावण निर्जन दण्डकारण्यसे उन्हें हरकर ले गया था और मैंने उसका विध्वंस भी कर डाला ॥ ५ तत्र मे बुद्धिरुत्पन्ना जनकस्य अत्रोषितामिमां सीतामानयेयं ' उसके बाद लङ्कामें ही जानकी में यह विचार उत्पन्न हुआ था कि रह लेनेपर भी मैं इन्हें राजधानीमें प्रत्ययार्थं ततः सीता विवेश प्रत्यक्षं तव सौमित्रे देवानां ॥

सुतां प्रति ।

कथं पुरीम् ॥ ६ ॥

के विषयमें मेरे अन्तःकरण-इनके इतने दिनोंतक यहाँ कैसे ले जा सकूँगा ॥ ६ ॥

ज्वलनं तदा ।

हव्यवाहनः ॥ ७ ॥

अपापां मैथिलीमाह वायुञ्चाकाशगोचरः ।

चन्द्रादित्यौ च शंसेते सुराणां संनिधौ पुरा ॥ ८ ॥

ऋषीणां चैव सर्वेषामपापां जनकात्मजाम् । ' सुमित्रा कुमार! उस समय अपनी पवित्रताका विश्वास दिलाने के लिये सीताने तुम्हारे सामने ही अग्निमें प्रवेश किया था और देवताओंके समक्ष स्वयं अग्निदेवने उन्हें निर्दोष बताया था । आकाशचारी वायु, चन्द्रमा और सूर्यने भी पहले देवताओं तथा समस्त ऋषियोंके समीप जनकनन्दिनीको निष्पाप घोषित किया था ॥ ७-८३ ॥ एवं शुद्धसमाचारा देवगन्धर्वसंनिधौ ॥ ९ ॥

लङ्काद्वीपे महेन्द्रेण मम हस्ते निवेशिता । " इस प्रकार विशुद्ध आचारवाली सीताको देवताओं और गन्धर्वोके समीप साक्षात् देवराज इन्द्रने लङ्काद्वीपके अंदर मेरे हाथमें सौंपा था! ९ ३ ॥ अन्तरात्मा च मे वेत्ति सीतां शुद्धां यशस्विनीम् ॥ १० ॥

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उत्तरकाण्डे पञ्चचत्वारिंशः सर्गः ततो गृहीत्वा वैदेहीमयोध्यामहमागतः । “ मेरी अन्तरात्मा भी यशस्विनी सीताको शुद्ध समझती है । इसीलिये मैं इन विदेहनन्दिनीको साथ लेकर अयोध्या आया था ॥ १०३ ॥

अयं तु मे महान् वादः शोकश्च हृदि वर्तते ॥ ११ ॥

पौरापवादः सुमहांस्तथा जनपदस्य च । " परंतु अब यह महान् अपवाद फैलने लगा है ।

पुरवासियों और जनपद के लोगोंमें मेरी बड़ी निन्दा हो रही है ।

इसके लिये मेरे हृदयमें बड़ा शोक है ॥ ११३ ॥

अकीर्तिर्यस्य गीयेत लोके भूतस्य कस्यचित् ॥ १२ ॥

पतत्येवाधमाँल्लोकान् यावच्छब्दः प्रकीर्त्यते । " जिस किसी भी प्राणीकी अपकीर्ति लोकमें सबकी चर्चा-का विषय बन जाती है, वह अधम लोकों ( नरकों ) में गिर जाता है और जबतक उस अपयशकी चर्चा होती है तबतक वहीं पड़ा रहता है ॥ १२३ ॥

अकीर्तिर्निन्द्यते देवैः कीर्तिलोकेषु पूज्यते ॥ १३ ॥

कीर्त्यर्थे तु समारम्भः सर्वेषां सुमहात्मनाम् । ' देवगण लोकोंमें अपकीर्तिकी निन्दा और कीर्तिकी प्रशंसा करते हैं । समस्त श्रेष्ठ महात्माओंका सारा शुभ आयोजन उत्तम कीर्ति की स्थापना के लिये ही होता है ॥ १३३ ॥

अप्यहं जीवितं जह्यां युष्मान् वा पुरुषर्षभाः ॥ १४ ॥

अपवादभयाद्भीतः किं पुनर्जनकात्मजाम् । ‘ नरश्रेष्ठ बन्धुओ! मैं लोकनिन्दाके भयसे अपने प्राणोंको और तुम सबको भी त्याग सकता हूँ । फिर सीताको त्यागना कौन बड़ी बात है? ॥ १४३ ॥

तस्माद्भवन्तः पश्यन्तु पतितं शोकसागरे ॥ १५ ॥

नहि पश्याम्यहं भूतं किंचिद् दुःखमतोऽधिकम् । ‘ अतः तुमलोग मेरी ओर देखो । मैं शोक के समुद्र में गिर गया हूँ । इससे बढ़कर कभी कोई दुःख मुझे उठाना पड़ा हो, इसकी मुझे याद नहीं है ॥ १५३ ॥

श्वस्त्वं प्रभाते सौमित्रे सुमन्त्राधिष्ठितं रथम् ॥ १६ ॥

आरुह्य सीतामारोप्य विषयान्ते समुत्सृज । ' अतः सुमित्रा कुमार! कल सबेरे तुम सारथि सुमन्त्र के द्वारा संचालित रथपर आरूढ़ हो सीताको भी उसीपर चढ़ाकर इस राज्य की सीमा के बाहर छोड़ दो!! १६३ ॥ गङ्गायास्तु परे पारे वाल्मीकेस्तु महात्मनः ॥ १७ ॥

आश्रमो दिव्यसंकाशस्तमसातीरमाश्रितः ।

' गङ्गा के उस पार तमसाके तटपर महात्मा वाल्मीकिमुनि-का दिव्य आश्रम है ॥ १७३ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये १५७१ तत्रैतां विजने देशे विसृज्य रघुनन्दन ॥ १८ ॥

शीघ्रमागच्छ सौमित्रे कुरुष्व वचनं मम ।

न चास्मि प्रतिवक्तव्यः सीतां प्रति कथंचन ॥ १ ९ ॥

‘ रघुनन्दन! उस आश्रमके निकट निर्जन वनमें तुम सीताको छोड़कर शीघ्र लौट आओ । सुमित्रानन्दन! मेरी इस आज्ञाका पालन करो 1 । सीताके विषय में मुझसे किसी तरह कोई दूसरी बात तुम्हें नहीं कहनी चाहिये ॥ १८-१९ ॥

तस्मात् त्वं गच्छ सौमित्रे नात्र कार्या विचारणा ।

अप्रीतिर्हि परा मह्यं त्वयैतत् प्रतिवारिते ॥ २० ॥

' इसलिये लक्ष्मण! अब तुम जाओ । इस विषय में कोई सोच - विचार न करो 1 । यदि मेरे इस निश्चय में तुमने किसी प्रकारकी अड़चन डाली तो मुझे महान् कष्ट होगा ॥ २० ॥

शापिता हि मया यूयं पादाभ्यां जीवितेन च ।

ये मां वाक्यान्तरे ब्रूयुरनुनेतुं कथंचन ॥ २१ ॥

अहिता नाम ते नित्यं मदभीष्टविघातनात् । " मैं तुम्हें अपने चरणों और जीवनकी शपथ दिलाता हूँ, मेरे निर्णय के विरुद्ध कुछ न कहो । जो मेरे इस कथन के बीच-में कूदकर किसी प्रकार मुझसे अनुनय - विनय करनेके लिये कुछ कहेंगे, वे मेरे अभीष्ट कार्यमें बाधा डालने के कारण सदाके लिये मेरे शत्रु होंगे ॥ २१३ ॥

मानयन्तु भवन्तो मां यदि मच्छासने स्थिताः ॥ २२ ॥

इतोऽद्य नीयतां सीता कुरुष्व वचनं मम । ' यदि तुमलोग मेरा सम्मान करते हो और मेरी आज्ञामें रहना चाहते हो तो अब सीताको यहाँसे वनमें ले जाओ । मेरी इस आज्ञाका पालन करो ॥ २२३ ॥

पूर्वमुक्तोऽहमनया गङ्गातीरेऽहमाश्रमान् ॥ २३ ॥

पश्येयमिति तस्याश्च कामः संवर्त्यतामयम् । ' सीताने पहले मुझसे कहा था कि मैं गङ्गातटपर ऋषियों-के आश्रम देखना चाहती हूँ; अतः उनकी यह इच्छा भी पूर्ण की जाय ' ॥ २३३ ॥

एवमुक्त्वा तु काकुत्स्थो बाप्पेण पिहितेक्षणः ॥ २४ ॥

संविवेश स धर्मात्मा भ्रातृभिः परिवारितः ।

शोकसंविग्नहृदयो निशश्वास यथा द्विपः ॥ २५ ॥

इस प्रकार कहते - कहते श्रीरघुनाथजीके दोनों नेत्र आँसुओं से भर गये । फिर वे धर्मात्मा श्रीराम अपने भाइयोंके साथ महलमें चले गये । उस समय उनका हृदय शोकसे व्याकुल था और वे हाथी के समान लंबी साँस खींच रहे थे ॥ २४-२५ ॥ उत्तरकाण्डे पञ्चचत्वारिंशः सर्गः ॥ ४५ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें पैंतालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ४५ ॥