Ramayana 2 — पृष्ठ 801–810

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 801–810

पृष्ठ 801

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१५८० श्रीमदूवाल्मीकीय रामायणे एकपञ्चाशः सर्गः मार्ग में सुमन्त्रका दुर्वासा के मुखसे सुनी हुई भृगुऋषि के शापकी कथा कहकर तथा भविष्य में होनेवाली कुछ बातें बताकर दुखी लक्ष्मणको शान्त करना

तथा संचोदितः सूतो लक्ष्मणेन महात्मना ।

तद् वाक्यमृषिणा प्रोक्तं व्याहर्तुमुपचक्रमे ॥ १ ॥

तब महात्मा लक्ष्मणकी प्रेरणासे सुमन्त्रजी दुर्वासाजी की कही हुई बात उन्हें सुनाने लगे - ॥ १ ॥

पुरा नाम्ना हि दुर्वासा अत्रेः पुत्रो महामुनिः ।

वसिष्ठस्याश्रमे पुण्ये वार्षिक्यं समुवास ह ॥ २ ॥

' लक्ष्मण! पहले की बात है, अत्रिके पुत्र महामुनि दुर्वासा वसिष्ठजीके पवित्र आश्रमपर रहकर वर्षाके चार महीने बिता रहे थे ॥ २ ॥

तमाश्रमं महातेजाः पिता ते सुमहायशाः ।

पुरोहितं महात्मानं दिदृक्षुरगमत् स्वयम् ॥ ३ ॥

' एक दिन आपके महातेजस्वी और महान् यशस्वी पिता उस आश्रमपर अपने पुरोहित महात्मा वसिष्ठजीका दर्शन करने-के लिये स्वयं ही गये || ३ ||

दृष्ट्रा सूर्यसंकाशं ज्वलन्तमिव तेजसा ।

उपविष्टं वसिष्ठस्य सव्यपार्श्वे महामुनिम् ॥ ४ ॥

‘ वहाँ उन्होंने वसिष्ठजीके वामभागमें बैठे हुए एक महा-मुनिको देखा, जो अपने तेजसे मानो सूर्य के समान देदीप्यमान हो रहे थे || ४ ||

तो मुनी तापसश्रेष्ठौ विनीतो ह्यभ्यवादयत् ।

स ताभ्यां पूजितो राजा खांगतेनासनेन च ॥ ५ ॥

पाद्येन फलमूलैश्व उवास मुनिभिः सह । ' तब राजाने उन दोनों तापसशिरोमणि महर्षियोंका विनयपूर्वक अभिवादन किया । उन दोनोंने भी स्वागतपूर्वक किमायुश्च हि मे रामः पुत्राश्चान्ये किमायुषः । " भगवन्! मेरा वंश कितने समयतक चलेगा? मेरे रामकी कितनी आयु होगी तथा अन्य सब पुत्रोंकी भी आयु कितनी होगी? ॥ ८३ ॥

रामस्य च सुताये स्युस्तेषामायुः कियद्भवेत् ॥ ९ ॥

काम्यया भगवन् ब्रूहि वंशस्यास्य गतिं मम । “ श्रीरामके जो पुत्र होंगे, उनकी आयु कितनी होगी? भगवन्! आप इच्छानुसार मेरे वंशकी स्थिति बताइये ' ॥ ९ ३ ॥ तच्छ्रुत्वा व्याहृतं वाक्यं राज्ञो दशरथस्य तु ॥ १० ॥

दुर्वासाः सुमहातेजा व्याहर्तुमुपचक्रमे ।

' राजा दशरथका यह वचन सुनकर महातेजस्वी दुर्वासा-मुनि कहने लगे-- ॥ १०३ ॥

शृणु राजन् पुरावृत्तं तदा देवासुरे युधि ॥ ११ ॥

दैत्याः सुरैर्भर्त्स्यमाना भृगुपत्नीं समाश्रिताः ।

तया दत्ताभयास्तत्र न्यवसन्नभयास्तदा ॥ १२ ॥

" राजन्! सुनिये, प्राचीन कालकी बात है, एक बार देवासुर संग्राममें देवताओंसे पीड़ित हुए दैत्योंने महर्षि भृगुकी पत्नीको शरण ली । भृगुपत्नीने उस समय दैत्योंको अभय दिया और वे उनके आश्रमपर निर्भय होकर रहने लगे ११-१२

तया परिगृहीतांस्तान् दृष्ट्वा क्रुद्धः सुरेश्वरः ।

चक्रेण शितधारेण भृगुपल्याः शिरोऽहरत् ॥ १३ ॥

" " भृगुपत्नीने दैत्योंको आश्रय दिया है, यह देखकर कुपित हुए देवेश्वर भगवान् विष्णुने तीखी धारवाले चक्रसे उनका सिर काट लिया ॥ १३ ॥

आसन देकर पाद्य एवं फल - मूल समर्पित करके राजाका सत्कार ततस्तां निहतां दृष्ट्रा पत्नीं भृगुकुलोद्वहः । किया । फिर वे वहाँ मुनियोंके साथ बैठे ॥ ५३ ॥ शशाप सहसा क्रुद्धो विष्णुं रिपुकुलार्दनम् ॥ १४ ॥

तेषां तत्रोपविष्टानां तास्ताः सुमधुराः कथाः ॥ ६ ॥ " अपनी पत्नीका वध हुआ देख भार्गववंशके प्रवर्तक

परमर्षीणां मध्यादित्यगतेऽहनि । भृगुजीने सहसा कुपित हो शत्रुकुलनाशन भगवान् विष्णुको बभूवुः' वहाँ बैठे हुए महर्षियोंकी दोपहर के समय तरह - तरह की शाप दिया ॥ १४ ॥

अत्यन्त मधुर कथाएँ हुई ॥ ६३ ॥ यस्मादवध्यां मे पत्नीमवधीः क्रोधमूच्छितः ।

ततः कथायां कस्यांचित् प्राञ्जलिः प्रग्रहो नृपः ॥ ७ ॥ तस्मात् त्वं मानुषे लोके जनिष्यसि जनार्दन ॥ १५ ॥

उवाच तं महात्मानमत्रेः पुत्रं तपोधनम् । तत्र पत्नीवियोगं त्वं प्राप्स्यसे बहुवार्षिकम् । किसी कथाके प्रसङ्गमें महाराजने हाथ जोड़कर “ जनार्दन! मेरी पत्नी वधके योग्य नहीं थी । परंतु आपने ‘ तदनन्तर पुत्र महात्मा दुर्वासाजी से विनयपूर्वक क्रोधसे मूर्च्छित होकर उसका वध किया है, इसलिये आपको अत्रिके तपोधन मनुष्यलोक में जन्म लेना पड़ेगा और वहाँ बहुत वर्षोंतक आप-पूछा- ॥ ७३ ॥ भविष्यति ॥ ८ ॥ को पत्नी वियोगका कष्ट सहना पड़ेगा ' ॥ १५३ ॥

भगवन् किंप्रमाणेन मम वंशो

पृष्ठ 802

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उत्तरकाण्डे एकपञ्चाशः सर्गः १५८१ शापाभिहतचेतास्तु स्वात्मना भावितोऽभवत् ॥ १६ ॥

अर्चयामास तं देवं भृगुः शापेन पीडितः । " " परंतु इस प्रकार शाप देकर उनके चित्तमें बड़ा पश्चात्ताप हुआ । उनकी अन्तरात्माने भगवान् से उस शापको स्वीकार कराने के लिये उन्होंकी आराधना करने को प्रेरित किया । इस तरह शापकी विफलताके भयसे पीड़ित हुए भृगुने तपस्याद्वारा भगवान् विष्णुकी आराधना की ॥ १६३ ॥

तपसाग्रऽऽधितो देवो ह्यब्रवीद् भक्तवत्सलः ॥ १७ ॥

लोकानां सम्प्रियार्थे तु तं शापं गृह्यमुक्तवान् । ' तपस्याद्वारा उनके आराधना करनेपर भक्तवत्सल भगवान् विष्णुने संतुष्ट होकर कहा -- ' महर्षे! सम्पूर्ण जगत्का प्रिय करनेके लिये मैं उस शापको ग्रहण कर लूँगा ' ॥ १७३ ॥

इति शप्तो महातेजा भृगुणा पूर्वजन्मनि ॥ १८ ॥

इहागतो हि पुत्रत्वं तव पार्थिवसत्तम ।

राम इत्यभिविख्यातस्त्रिषु लोकेषु मानद ॥ १ ९ ॥

“ इस तरह पूर्वजन्ममें ( विष्णु नामधारी वामन अवतार-के समय ) महातेजस्वी भगवान् विष्णुको भृगु ऋषिका शाप प्राप्त हुआ था । दूसरोंको मान देनेवाले नृपश्रेष्ठ! वे ही इस भूतलपर आकर तीनों लोकोंमें राम - नामसे विख्यात आपके पुत्र हुए हैं ॥ १८-१९ ॥

तत् फलं प्रास्यते चापि भृगुशापकृतं महत् ।

अयोध्यायाः पती रामो दीर्घकालं भविष्यति ॥ २० ॥

“ “ भृगुके शापसे होनेवाला पत्नी वियोगरूप जो महान् फल है, वह उन्हें अवश्य प्राप्त होगा । श्रीराम दीर्घकालतक अयोध्या के राजा होकर रहेंगे ॥ २० ॥

सुखिनश्च समृद्धाश्च भविष्यन्त्यस्य येऽनुगाः ।

दशवर्षसहस्राणि दशवर्षशतानि च ॥ २१ ॥

रामो राज्यमुपासित्वा ब्रह्मलोकं गमिष्यति । " उनके अनुयायी भी बहुत सुखी और धन - धान्यसे सम्पन्न होंगे । श्रीराम ग्यारह हजार वर्षोंतक राज्य करके अन्तमें ब्रह्मलोक ( वैकुण्ठ या साकेत धाम ) को पधारेंगे ॥ समृद्धैश्वाश्वमेधैश्व इष्ट्वा परमदुर्जयः ॥ २२ ॥

राजवंशांश्च बहुशो बहून् संस्थापयिष्यति ।

द्वौ पुत्रौ तु भविष्येते सीतायां राघवस्य तु ॥ २३ ॥

“ परम दुर्जय वीर श्रीराम समृद्धिशाली अश्वमेध यज्ञोंका बारंबार अनुष्ठान करके बहुत - से राजवंशोंकी स्थापना करेंगे । इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये श्रीरघुनाथजीको सीताके गर्भसे दो पुत्र प्राप्त होंगे ' ॥२२-२३ ॥

स सर्वमखिलं राज्ञो वंशस्याह गतागतम् ।

आख्याय सुमहातेजास्तूष्णीमासीन्महामुनिः ॥ २४ ॥

" ये सब बातें कहकर उन महातेजस्वी महामुनिने राजवंश-के विषयमें भूत और भविष्य की सारी बातें बतायीं । इसके बाद वे चुप हो गये ॥ २४ ॥

तूष्णींभूते तदा तस्मिन् राजा दशरथो मुनौ ।

अभिवाद्य महात्मानौ पुनरायात् पुरोत्तमम् ॥ २५ ॥

' उन दुर्वासा मुनिके चुप हो जानेपर महाराज दशरथ भी दोनों महात्माओं को प्रणाम करके फिर अपने उत्तम नगर में लौट आये ॥ २५ ॥

एतद् वचो मया तत्र मुनिना व्याहृतं पुरा ।

श्रुतं हृदि च निक्षिप्तं नान्यथा तद् भविष्यति ॥ २६ ॥

" इस प्रकार पूर्वकालसे दुर्वासा मुनिकी कही हुई ये सब बातें मैंने वहाँ सुनीं और अपने हृदयमें धारण कर लीं ( उन्हें

किसीपर प्रकट नहीं किया ) । वे बातें असत्य नहीं होंगी ॥ २६ ॥

सीतायाश्च ततः पुत्रावभिषेक्ष्यति राघवः ।

अन्यत्र न त्वयोध्यायां मुनेस्तु वचनं यथा ॥ २७ ॥

" जैसा दुर्वासा मुनिका वचन है, उसके अनुसार श्रीरघुनाथजी सीताके दोनों पुत्रोंका अयोध्यासे बाहर अभिषेक करेंगे, अयोध्या में नहीं ॥ २७ ॥

एवं गते न संतापं कर्तुमर्हसि राघव ।

सीतार्थे राघवार्थे वा दृढो भव नरोत्तम ॥ २८ ॥

' नरश्रेष्ठ रघुनन्दन! विधाताका ऐसा ही विधान होने के कारण आपको सीता तथा रघुनाथजी के लिये संताप नहीं करना चाहिये । आप धैर्य धारण करें ' ॥ २८ ॥

श्रुत्वा तु व्याहृतं वाक्यं सूतस्य परमाद्भुतम् ।

प्रहर्षमतुलं लेभे साधु साध्विति चाब्रवीत् ॥ २ ९ ॥

सूत सुमन्त्र के मुखसे यह अत्यन्त अद्भुत बात सुनकर लक्ष्मणको अनुपम हर्ष प्राप्त हुआ । वे बोले - " बहुत ठीक, बहुत ठीक ' ॥ २ ९ ॥

ततः संवदतोरेवं सूतलक्ष्मणयोः पथि ।

अस्तमर्के गते वासं केशिन्यां तावथोषतुः ॥ ३० ॥

मार्ग में सुमन्त्र और लक्ष्मण इस प्रकारकी बातें कर ही रहे थे कि सूर्य अस्ताचलको चले गये । तब उन दोनोंने केशिनी नदी के तटपर रात बितायी ॥ ३० ॥

उत्तरकाण्डे एकपञ्चाशः सर्गः ॥ ५१ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें इक्यावनवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ५१ ॥

पृष्ठ 803

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१५८२ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे द्विपञ्चाशः सर्गः के राजभवन में पहुँचकर लक्ष्मणका दुखी श्रीरामसे मिलना और उन्हें सान्त्वना देना अयोध्या

तत्र तां रजनीमुष्य केशिन्यां रघुनन्दनः ।

प्रभाते पुनरुत्थाय लक्ष्मणः प्रययौ तदा ॥ १ ॥

केशिनी के तटपर वह रात बिताकर रघुनन्दन लक्ष्मण प्रातःकाल उठे और फिर वहाँसे आगे बढ़े ॥ १ ॥

ततोऽर्धदिवसे प्राप्ते प्रविवेश महारथः ।

अयोध्यां रत्नसम्पूर्ण हृष्टपुष्टजनावृताम् ॥ २ ॥

दोपहर होते - होते उनके उस विशाल रथने रत्न - धनसे सम्पन्न तथा हृष्ट - पुष्ट मनुष्योंसे भरी हुई अयोध्यापुरीमें प्रवेश किया ॥ २ ॥।

सौमित्रिस्तु परं दैन्यं जगाम सुमहामतिः ।

रामपादौ समासाद्य वक्ष्यामि किमहं गतः ॥ ३ ॥

वहाँ पहुँचकर परम बुद्धिमान् सुमित्राकुमारको बड़ा दुःख हुआ । वे सोचने लगे — ' मैं श्रीरामचन्द्रजी के चरणोंके समीप जाकर क्या कहूँगा? ' ॥ ३ ॥

तस्यैवं चिन्तयानस्य भवनं शशिसंनिभम् ।

रामस्य परमोदारं पुरस्तात् समदृश्यत ॥ ४ ॥

वे इस प्रकार सोच - विचार कर ही रहे थे कि चन्द्रमाके समान उज्ज्वल श्रीरामका विशाल राजभवन सामने दिखायी दिया ॥ ४ ॥

राज्ञस्तु भवनद्वारि सोऽवतीर्य नरोत्तमः ।

अवाङ्मुखो दीनमनाः प्रविवेशानिवारितः ॥ ५ ॥

• राजमहल के द्वारपर रथसे उतरकर नरश्रेष्ठ लक्ष्मण नीचे मुख किये दुखी मनसे बेरोक - टोक भीतर चले गये ॥

स दृष्ट्रा राघवं दीनमासीनं परमासने ।

नेत्राभ्यामश्रुपूर्णाभ्यां ददर्शाग्रजमग्रतः ॥ ६ ॥

जग्राह चरणौ तस्य लक्ष्मणो दीनचेतनः ।

उवाच दीनया वाचा प्राञ्जलिः सुसमाहितः ॥ ७ ॥

आचारवाली, यशस्विनी जनककिशोरी सीताको गङ्गातटपर वाल्मीकिके शुभ आश्रम के समीप निर्दिष्ट स्थानमें छोड़कर पुनः आपके श्रीचरणोंकी सेवा के लिये यहाँ लौट आया हूँ ॥

मा शुचः पुरुषव्याघ्र कालस्य गतिरीदृशी ।

त्वद्विधा नहि शोचन्ति बुद्धिमन्तो मनस्विनः ॥ १० ॥

' पुरुषसिंह! आप शोक न करें । कालकी ऐसी ही गति है । आप जैसे बुद्धिमान् और मनस्वी मनुष्य शोक नहीं करते हैं ॥ १० ॥

सर्वे क्षयान्ता निचयाः पतनान्ताः समुच्छ्रयाः ।

संयोगा विप्रयोगान्ता मरणान्तं च जीवितम् ॥ ११ ॥

' संसारमें जितने संचय हैं, उन सबका अन्त विनाश है, उत्थानका अन्त पतन है, संयोगका अन्त वियोग है और जीवनका अन्त मरण है ॥ ११ ॥

तस्मात् पुत्रेषु दारेषु मित्रेषु च धनेषु च ।

नातिप्रसङ्गः कर्तव्यो विप्रयोगो हि तैर्ध्रुवम् ॥ १२ ॥

' अतः स्त्री, पुत्र, मित्र और धनमें विशेष आसक्ति नहीं करनी चाहिये; क्योंकि उनसे वियोग होना निश्चित है ॥१२ ॥

शक्तस्त्वमात्मनाऽऽत्मानं विनेतुं मनसा मनः ।

लोकान् सर्वाश्च काकुत्स्थ किं पुनः शोकमात्मनः ॥ १३ ॥

' ककुत्स्थ कुलभूषण! आप आत्मासे आत्माको, मनसे मनको तथा सम्पूर्ण लोकों को भी संयत रखनेमें समर्थ हैं; फिर अपने शोकको काबू में रखना आपके लिये कौन बड़ी बात है! ॥

नेदृशेषु विमुह्यन्ति त्वद्विधाः पुरुषर्षभाः ।

अपवादः स किल ते पुनरेष्यति राघव ॥ १४ ॥

' आप जैसे श्रेष्ठ पुरुष इस तरहके प्रसङ्ग आनेपर मोहित नहीं होते । रघुनन्दन! यदि आप दुखी रहेंगे तो वह अपवाद आपके ऊपर फिर आ जायगा ॥ १४ ॥

देखा श्रीरघुनाथजी दुखी होकर एक सिंहासनपर यदर्थं मैथिली त्यक्ता अपवाद्भयान्नृप ।

उन्होंने भरे हैं । इस अवस्था सोऽपवादः पुरे राजन् भविष्यति न संशयः ॥ १५ ॥

बैठे हैं और उनके दोनों नेत्र आँसुओंसे में बड़े भाईको सामने देख दुखी मनसे लक्ष्मणने उनके दोनों ‘ नरेश्वर! जिस अपवादके भयसे आपने मिथिलेशकुमारी-लिये और हाथ जोड़ चित्तको एकाग्र करके वे का त्याग किया है, निःसंदेह वह अपवाद इस नगर में फिर पैर पकड़ होने लगेगा ( लोग कहेंगे कि दूसरेके घरमें रही हुई स्त्रीका दीन वाणीमें बोले – ॥ ६-७ ॥ ये रात - दिन उसीकी चिन्तासे दुखी रहते हैं ) ॥ आर्यस्याज्ञां पुरस्कृत्य विसृज्य जनकात्मजाम् । त्याग करके

यथोद्दिष्टे वाल्मीकेराश्रमे शुभे ॥ ८ ॥ स त्वं पुरुषशार्दूल धैर्येण सुसमाहितः ।

गङ्गातीरे । त्यजेमां दुर्बलां बुद्धि संतापं मा कुरुष्व ह ॥ १६ ॥

तत्र तां च शुभाचारामाश्रमान्ते यशखिनीम् ॥ ९ ॥ ‘ अतः पुरुषसिंह! आप धैर्यसे चित्तको एकाग्र करके

पुनरप्यागतो वीर पादमूलमुपासितुम् शुभ इस दुर्बल शोक - बुद्धिका त्याग करें - संतप्त न हों ' ॥ १६ ॥

" वीर मद्दाराजकी आज्ञा शिरोधार्य करके मैं उन

पृष्ठ 804

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जानकीजीको वनमें छोड़कर लौटे हुए लक्ष्मणकी श्रीरामसे भेंट

पृष्ठ 805

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पृष्ठ 806

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उत्तरकाण्डे त्रिपञ्चाशः सर्गः १५८३

एवमुक्तः स काकुत्स्थो लक्ष्मणेन महात्मना ।

उवाच परया प्रीत्या सौमित्रिं मित्रवत्सलः ॥ १७ ॥

महात्मा लक्ष्मणके इस प्रकार कहनेपर मित्रवत्सल श्रीरघुनाथजीने बड़ी प्रसन्नताकै साथ उन सुमित्राकुमार-से कहा – ॥ १७ ॥

एवमेतन्नरश्रेष्ठ यथा वदसि लक्ष्मण ।

परितोषश्च मे वीर मम कार्यानुशासने ॥ १८ ॥

' नरश्रेष्ठ वीर लक्ष्मण! तुम जैसा कहते हो, ठीक ऐसी ही बात है । तुमने मेरे आदेशका पालन किया, इससे मुझे बड़ा संतोष है ॥ १८ ॥

निवृत्तिश्चागता सौम्य संतापश्च निराकृतः ।

भवद्वाक्यैः सुरुचिरैरनुनीतोऽस्मि लक्ष्मण ॥ १ ९ ॥

' सौग्य लक्ष्मण! अब मैं दुःखसे निवृत्त हो गया । संतापको मैंने हृदयसे निकाल दिया और तुम्हारे सुन्दर वचनों-से मुझे बड़ी शान्ति मिली है ' ॥ १ ९ ॥ इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे द्विपञ्चाशः सर्गः ॥ ५२ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें बावनवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ५२ ॥

त्रिपञ्चाशः सर्गः श्रीरामका कार्यार्थी पुरुषोंकी उपेक्षा से राजा नृगको मिलनेवाली शापकी कथा | सुनाकर लक्ष्मणको देखभालके लिये आदेश देना

लक्ष्मणस्य तु तद् वाक्यं निशम्य परमाद्भुतम् ।

सुप्रीतश्चाभवद् रामो वाक्यमेतदुवाच ह ॥ १ ॥

लक्ष्मणके उस अत्यन्त अद्भुत वचनको सुनकर श्रीराम-चन्द्रजी बड़े प्रसन्न हुए और इस प्रकार बोले ॥ १ ॥

दुर्लभस्त्वीदृशो बन्धुरस्मिन् काले विशेषतः ।

यादृशस्त्वं महाबुद्धिर्मम सौम्य मनोऽनुगः ॥ २ ॥

' सौम्य! तुम बड़े बुद्धिमान् हो । जैसे तुम मेरे मनका अनुसरण करनेवाले हो, ऐसा भाई विशेषतः इस समय मिलना कठिन है ॥ २ ॥

यच्च मे हृदये किंचिद् वर्तते शुभलक्षण ।

तन्निशामय च श्रुत्वा कुरुष्व वचनं मम ॥ ३ ॥

' शुभलक्षण लक्ष्मण! अब मेरे मनमें जो बात है, उसे सुनो और सुनकर वैसा ही करो ॥ ३ ॥

चत्वारो दिवसाः सौम्य कार्य पौरजनस्य च ।

अकुर्वाणस्य सौमित्रे तन्मे मर्माणि कृन्तति ॥ ४ ॥

' सौम्य! सुमित्राकुमार! मुझे पुरवासियोंका काम किये बिना चार दिन बीत चुके हैं, यह बात मेरे मर्मस्थलको विदीर्ण कर रही है ॥ ४ ॥

आहूयन्तां प्रकृतयः पुरोधा मन्त्रिणस्तथा ।

कार्यार्थिनश्च पुरुषाः स्त्रियो वा पुरुषर्षभ ॥ ५ ॥

' पुरुषप्रवर! तुम प्रजा, पुरोहित और मन्त्रियों को बुलाओ । जिन पुरुषों अथवा स्त्रियोंको कोई काम हो, उनको उपस्थित करो ॥ ५ ॥

पौरकार्याणि यो राजा न करोति दिने दिने ।

संवृते नरके घोरे पतितो नात्र संशयः ॥ ६ ॥

" जो राजा प्रतिदिन पुरवासियोंके कार्य नहीं करता, वह निस्संदेह सब ओरसे निश्छिद्र अतएव वायुसंचारसे रहित घोर नरक में पड़ता है है ॥। ६ ।

श्रूयते हि पुरा राजा नृगो नाम महायशाः ।

बभूव पृथिवीपालो ब्रह्मण्यः सत्यवाक् शुचिः ॥ ७ ॥

' सुना जाता है पहले इस पृथ्वीपर महायशस्वी राजा राज्य करते थे । भक्त, सत्यवादी तथा आचार - विचारसे स कदाचिद् गवां कोटीः सवत्साः नृदेवो भूमिदेवेभ्यः पुष्करेषु ' उन नरदेवने किसी समय पुष्कर को सुवर्णसे भूषित तथा बछड़ोंसे दान कीं ॥ ८ ॥

नृगनामसे प्रसिद्ध एक वे भूपाल बड़े ब्राह्मण-पवित्र थे ॥ ७ ॥

स्वर्णभूषिताः ।

ददौ नृपः ॥ ८ ॥

तीर्थमें जाकर ब्राह्मणों-युक्त एक करोड़ गौएँ

ततः सङ्गाद् गता धेनुः सवत्सा स्पर्शितानघ ।

ब्राह्मणस्याहिताग्नेस्तु दरिद्रस्योच्छवर्तिनः ॥ ९ ॥

‘ निष्पाप लक्ष्मण! उस समय दूसरी गौओंके साथ - साथ एक दरिद्र, उञ्छवृत्तिसे जीवन निर्वाह करनेवाले एवं अग्नि-होत्री ब्राह्मणकी बछड़ेसहित गाय वहाँ चली गयी और राजाने संकल्प करके उसे किसी ब्राह्मणको दे दिया ॥ ९ ॥

स नष्टां गां क्षुधार्तो वै अन्विषंस्तत्र तत्र ह ।

नापश्यत् सर्वराष्ट्रेषु संवत्सरगणान् बहून् ॥ १० ॥

' वह बेचारा ब्राह्मण भूखसे पीड़ित हो उस खोयी हुई । गायको बहुत वर्षोंतक सारे राज्योंमें जहाँ - तहाँ ढूँढ़ता फिरा; परंतु वह उसे नहीं दिखायी दी ॥ १० ॥

ततः कनखलं गत्वा जीर्णवत्सां निरामयाम् ।

दद्दशे तां स्विकां धेनुं ब्राह्मणस्य निवेशने ॥ ११ ॥

' अन्तमें एक दिन कनखल पहुँचकर उसने अपनी गाय

पृष्ठ 807

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श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे १५८४ एक ब्राह्मणके घरमें देखी । वह नीरोग और हृष्ट - पुष्ट थी, किंतु उसका बछड़ा बहुत बड़ा हो गया था ॥ ११ ॥

अथ तां नामधेयेन स्वकेनोवाच ब्राह्मणः ।

आगच्छ शबलेत्येवं सा तु शुश्राव गौः खरम् ॥ १२ ॥

' ब्राह्मणने अपने रक्खे हुए ' शबला ' नामसे उसको पुकारा – “ शबले! आओ! आओ । ' गौने उस स्वरको सुना ॥ १२ ॥

तस्य तं स्वरमाज्ञाय क्षुधार्तस्य द्विजस्य वै ।

अन्वगात् पृष्ठतः सा गौर्गच्छन्तं पावकोपमम् ॥ १३ ॥

" भूखसे पीड़ित हुए उस ब्राह्मणके उस परिचित स्वरको पहचानकर वह गौ आगे - आगे जाते हुए उस अग्नितुल्य तेजस्वी ब्राह्मणके पीछे हो ली ॥ १३ ॥

योऽपि पालयते विप्रः सोऽपि गामन्वगाद् द्रुतम् ।

गत्वा च तमृषिं चष्टे मम गौरिति सत्वरम् ॥ १४ ॥

स्पर्शिता राजसिंहेन मम दत्ता नृगेण ह । ' जो ब्राह्मण उन दिनों उसका पालन करता था, वह भी तुरंत उस गायका पीछा करता हुआ गया और जाकर उन ब्रह्मर्षिसे बोला- ' ब्रह्मन्! यह गौ मेरी है । मुझे राजाओंमें श्रेष्ठ नृगने इसे दानमें दिया है ' ॥ १४३ ॥

तयोर्ब्राह्मणयोर्वादो महानासीद् विपश्चितोः ॥ १५ ॥

विवन्दतौ ततोऽन्योन्यं दातारमभिजग्मतुः । ‘ फिर तो उन दोनों विद्वान् ब्राह्मणोंमें उस गौको लेकर महान् विवाद खड़ा हो गया । वे दोनों परस्पर लड़ते - झगड़ते हुए उन दानी नरेश नृगके पास गये ॥ १५३ ॥

तौ राजभवनद्वारि न प्राप्तौ नृगशासनम् ॥ १६ ॥

अहोरात्राण्यनेकानि वसन्तौ क्रोधमीयतुः । " वहाँ राजभवन के दरवाजेपर जाकर वे कई दिनों तक टिके रहे, परंतु उन्हें राजाका न्याय नहीं प्राप्त हुआ ( वे उनसे मिले ही नहीं ) । इससे उन दोनों को बड़ा क्रोध हुआ ॥१६३ ॥

ऊचतुश्च महात्मानौ तावुभौ द्विजसत्तमौ ॥ १७ ॥

क्रुद्धौ परमसंतप्तौ वाक्यं घोराभिसंहितम् । “ वे दोनों श्रेष्ठ महात्मा ब्राह्मण अत्यन्त संतप्त और कुपित हो राजाको शाप देते हुए यह घोर वाक्य बोले- ॥ १७३ ॥

अर्थिनां कार्यसिद्धयर्थं यस्मात्त्वं नैषि दर्शनम् ॥ १८ ॥

अदृश्यः सर्वभूतानां कृकलासो भविष्यसि ।

बहुवर्षसहस्राणि बहुवर्षशतानि च ॥ १ ९ ॥

कृकलीभूतो दीर्घकालं निवत्स्यसि । " " राजन्! अपने विवादका निर्णय कराने की इच्छासे आये हुए प्रार्थी पुरुषोंके कार्यकी सिद्धि के लिये तुम उन्हें दर्शन नहीं देते हो; इसलिये तुम सब प्राणियोंसे छिपकर रहनेवाले गिरगिट हो जाओगे और सहस्रों वर्षोंके दीर्घकालतक गड्ढे में गिरगिट होकर ही पड़े रहोगे ॥ १८-१९ ३ ॥ उत्पत्स्यते हि लोकेऽस्मिन् यदूनां कीर्तिवर्धनः वासुदेव इति ख्यातो विष्णुः पुरुषविग्रहः स ते मोक्षयिता शापाद् राजंस्तस्माद् भविष्यसि कृता च तेन कालेन निष्कृतिस्ते भविष्यति भारावतरणार्थं हि नरनारायणावुभौ उत्पत्स्येते महावीर्यौ कलौ युग उपस्थिते ॥ २० ॥

॥ २१ ॥

॥ २२ ॥

। “ जब यदुकुलकी कीर्ति बढ़ानेवाले वासुदेवनामसे विख्यात भगवान् विष्णु पुरुषरूपसे इस जगत् में अवतार लेंगे, उस समय वे ही तुम्हें इस शापसे छुड़ायेंगे, इसलिये इस समय तो तुम गिरगिट हो ही जाओगे, फिर श्रीकृष्णावतारके समयमें ही तुम्हारा उद्धार होगा । कलियुग उपस्थित होनेसे कुछ ही पहले महापराक्रमी नर और नारायण दोनों इस पृथ्वीका भार उतारने-के लिये अवतीर्ण होंगे ' ॥ २० – २२३ ॥ एवं तौ शापमुत्सृज्य ब्राह्मणौ विगतज्वरौ ॥ २३ ॥

तांगां हि दुर्बलां वृद्धां ददतुर्ब्राह्मणाय वै । " इस प्रकार शाप देकर वे दोनों ब्राह्मण शान्त हो गये । उन्होंने वह बूढ़ी और दुबली गाय किसी ब्राह्मणको दे दी २३ एवं स राजा तं शापमुपभुङ्क्ते सुदारुणम् ॥ २४ ॥

कार्यार्थिनां विमर्दो हि राज्ञां दोषाय कल्पते । ' इस प्रकार राजा नृग उस अत्यन्त दारुण शापका उपभोग कर रहे हैं । अतः कार्यार्थी पुरुषोंका विवाद यदि निर्णीत न हो तो वह राजाओंके लिये महान् दोषकी प्राप्ति करानेवाला होता है ॥ २४३ ॥

तच्छीघ्रं दर्शनं मद्यमभिवर्तन्तु कार्यिणः ॥ २५ ॥

सुकृतस्य हि कार्यस्य फलं नावैति पार्थिवः ।

तस्माद् गच्छ प्रतीक्षस्व सौमित्रे कार्यवाञ्जनः ॥ २६ ॥

' अतः कार्यार्थी मनुष्य शीघ्र मेरे सामने उपस्थित हों । प्रजापालन रूप पुण्यकर्मका फल क्या राजाको नहीं मिलता है? अवश्य प्राप्त होता है । अतः सुमित्रानन्दन! तुम जाओ, राजद्वारपर प्रतीक्षा करो कि कौन कार्यार्थी पुरुष आ रहा ' है ' ॥ २५-२६ ॥ श्वभ्रे त्वं आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे त्रिपञ्चाशः सर्गः ॥ ५३ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें तिरपनवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ५३ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित

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उत्तरकाण्डे चतुःपञ्चाशः सर्गः १५८५ चतुःपञ्चाशः सर्गः राजा नृगका एक सुन्दर गड्ढा बनवाकर अपने पुत्रको राज्य दे स्वयं उसमें प्रवेश करके शाप भोगना

समस्य भाषितं श्रुत्वा लक्ष्मणः परमार्थवित् ।

उवाच प्राञ्जलिर्वाक्यं राघवं दीप्ततेजसम् ॥ १ ॥

श्रीरामका यह भाषण सुनकर परमार्थवेत्ता लक्ष्मण दोनों हाथ जोड़कर उद्दीप्त तेजवाले श्रीरघुनाथजी से बोले- ॥ १ ॥

अल्पापराधे काकुत्स्थ द्विजाभ्यां शाप ईदृशः ।

महान् नृगस्य राजर्षेर्यमदण्ड इवापरः ॥ २ ॥

' ककुत्स्थ कुलभूषण! उन दोनों ब्राह्मणोंने थोड़ेसे ही अपराधपर राजर्षि नृगको द्वितीय यमदण्डके समान ऐसा महान् शाप दे दिया ॥ २ ॥

श्रुत्वा तु पापसंयुक्तमात्मानं पुरुषर्षभ ।

किमुवाच नृगो राजा द्विजौ क्रोधसमन्वितौ ॥ ३ ॥

' पुरुषप्रवर! अपनेको शापरूपी पापसे संयुक्त हुआ सुनकर राजा नृगने उन क्रोधी ब्राह्मणोंसे क्या कहा? ' ॥ ३ ॥

लक्ष्मणेनैवमुक्तस्तु राघवः पुनरब्रवीत् ।

शृणु सौम्य यथा पूर्व स राजा शापविक्षतः ॥ ४ ॥

लक्ष्मणके इस प्रकार पूछने पर श्रीरघुनाथजी फिर बोले— ' सौम्य! पूर्वकालमें शापग्रस्त होकर राजा नृगने जो कुछ कहा, उसे बताता हूँ, सुनो ॥ ४ ॥

अथाध्वनि गतौ विप्रौ विज्ञाय स नृपस्तदा ।

आहूय मन्त्रिणः सर्वान् नैगमान् सपुरोधसः ॥ ५ ॥

तानुवाच नृगो राजा सर्वाश्च प्रकृतीस्तथा ।

दुःखेन सुसमाविष्टः श्रूयतां मे समाहिताः ॥ ६ ॥

' जब राजा नृगको यह पता लगा कि वे दोनों ब्राह्मण चले गये और कहीं रास्तेमें होंगे, तब उन्होंने मन्त्रियोंको, समस्त पुरवासियोंको, पुरोहितोंको तथा समस्त प्रकृतियों को भी बुलाकर दुःखसे पीड़ित होकर कहा - ' आपलोग सावधान होकर मेरी बात सुनें-- ॥ ५-६ ॥

नारदः पर्वतश्चैव मम दत्त्वा महद्भयम् ।

गतौ त्रिभुवनं भद्रौ वायुभूतावनिन्दितौ ॥ ७ ॥

" नारद और पर्वत — ये दोनों कल्याणकारी और अनिन्द्य देवर्षि मेरे पास आये थे । वे दोनों ब्राह्मणोंके दिये हुए शाप-की बात बताकर मुझे महान् भय दे वायुके समान तीव्र गतिसे ब्रह्मलोकको चले गये ॥ ७ ॥

कुमारोऽयं वसुर्नाम स चेहाद्याभिषिच्यताम् ।

श्वभ्रं च यत् सुख स्पर्श क्रियतां शिल्पिभिर्मम ॥ ८ ॥

“ ये जो वसु नामक राजकुमार हैं, इन्हें इस राज्यपर अभिषिक्त कर दिया जाय और कारीगर मेरे लिये एक ऐसा गड्डा तैयार करें, जिसका स्पर्श सुखद हो ॥ ८ ॥

यत्राहं संक्षयिष्यामि शापं ब्राह्मणनिःसृतम् ।

वर्षघ्नमेकं श्वभ्रं तु हिमघ्नमपरं तथा ॥ ९ ॥

वा ० रा ० ५.१२.१-ग्रीष्मघ्नं तु सुखस्पर्शमेकं कुर्वन्तु शिल्पिनः । “ ब्राह्मणके मुखसे निकले हुए उस शापको वहीं रहकर मैं बिताऊँगा । एक गड्ढा ऐसा होना चाहिये, जो वर्षाके कष्ट-का निवारण करनेवाला हो । दूसरा सर्दीसे बचानेवाला हो और शिल्पी लोग तीसरा एक ऐसा गड्ढा तैयार करें जो गर्मी-का निवारण करे और जिसका स्पर्शं सुखदायक हो ॥ ९ ३ ॥ फलवन्तश्च ये वृक्षाः पुष्पवत्यश्च या लताः ॥ १० ॥

विरोप्यन्तां बहुविधाश्छायावन्तश्च गुल्मिनः ।

क्रियतां रमणीयं च श्वभ्राणां सर्वतोदिशम् ॥ ११ ॥

सुखमत्र वसिष्यामि यावत्कालस्य पर्ययः ।

पुष्पाणि च सुगन्धीनि क्रियन्तां तेषु नित्यशः ॥ १२ ॥

परिवार्य यथा मे स्युरध्यर्ध योजनं तथा । " जो फल देनेवाले वृक्ष हैं और फूल देनेवाली लताएँ हैं, उन्हें उन गड्डोंमें लगाया जाय । घनी छायावाले अनेक प्रकारके वृक्षोंका वहाँ आरोपण किया जाय । उन गड्डोंके चारों ओर डेढ़ - डेढ़ योजन ( छः - छः कोस ) की भूमि घेरकर खूब रमणीय बना दी जाय । जबतक शापका समय बीतेगा, तबतक मैं वहीं सुखपूर्वक रहूँगा । उन गड्डोंमें प्रतिदिन सुगन्धित पुष्प संचित किये जायँ ' ॥ १०-१२३ ॥ एवं कृत्वा विधानं स संनिवेश्य वसुं तदा ॥ १३ ॥

धर्मनित्यः प्रजाः पुत्र क्षत्रधर्मेण पालय । ' ऐसी व्यवस्था करके राजकुमार वसुको राजसिंहासन पर बिठाकर राजाने उस समय उनसे कहा- ' बेटा! तुम प्रति-दिन धर्मपरायण रहकर क्षत्रिय धर्मके अनुसार प्रजाका पालन करो ॥ १३३ ॥

प्रत्यक्षं ते तथा शापो द्विजाभ्यां मयि पातितः ॥ १४ ॥

नरश्रेष्ठ सरोषाभ्यामपराधेऽपि तादृशे । ' दोनों ब्राह्मणोंने मुझपर जिस प्रकार शापद्वारा प्रहार किया है, वह तुम्हारी आँखोंके सामने है । नरश्रेष्ठ! वैसे थोड़े से अपराधपर भी रुष्ट होकर उन्होंने मुझे शाप दे दिया है ॥ मा कृथास्त्वनुसंतापं मत्कृते हि नरर्षभ ॥ १५ ॥

कृतान्तः कुशलः पुत्र येनास्मि व्यसनीकृतः । “ पुरुषप्रवर! तुम मेरे लिये संताप न करो । बेटा! जिसने मुझे व्यसनी बनाया — संकट में डाला है, अपना किया हुआ वह प्राचीन कर्म ही अनुकूल - प्रतिकूल फल देनेमें समर्थ होता है ॥ १५३ ॥

प्राप्तव्यान्येव प्राप्नोति गन्तव्यान्येव गच्छति ॥ १६ ॥

लब्धव्यान्येव लभते दुःखानि च सुखानि च ।

पूर्वे जात्यन्तरे वत्स मा विषादं कुरुष्व ह ॥ १७ ॥

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१५८६ श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे “ वत्स! पूर्वजन्ममें किये गये कर्मके अनुसार मनुष्य उन्हीं वस्तुओंको पाता है, जिन्हें पानेका वह अधिकारी है । उन्हीं स्थानोंपर जाता है, जहाँ जाना उसके लिये अनिवार्य है तथा उन्हीं दुःखों और सुखोंको उपलब्ध करता है, जो उसके लिये नियत हैं; अतः तुम विषाद न करो ' ॥१६-१७ ॥

एवमुक्त्वा नृपस्तत्र सुतं राजा महायशाः ।

श्वभ्रं जगाम सुकृतं वासाय पुरुषर्षभ ॥ १८ ॥

' नरश्रेष्ठ! अपने पुत्रसे ऐसा कहकर महायशस्वी नरपाल राजा नृगने अपने रहने के लिये सुन्दर ढंगसे तैयार किये गये गड्ढे में प्रवेश किया ॥ १८ ॥

एवं प्रविश्येव नृपस्तदानीं श्वभ्रं महद्रत्नविभूषितं तत् । सम्पादयामास तदा महात्मा शापं द्विजाभ्यां हि रुषा विमुक्तम् ॥ १ ९ ॥ ' इस तरह उस रत्नविभूषित महान् गर्तमें प्रवेश करके उस समय महात्मा राजा नृगने ब्राह्मणोंद्वारा रोषपूर्वक दिये गये उस शापको भोगना आरम्भ किया ' ॥ १ ९ ॥ इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे चतुःपञ्चाशः सर्गः ॥ ५४ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें चौवनवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ५४ ॥

पञ्चपञ्चाशः सर्गः राजा निमि और वसिष्ठका एक दूसरेके शापसे देहत्याग

एष ते नृगशापस्य विस्तरोऽभिहितो मया ।

यद्यस्ति श्रवणे श्रद्धा शृणुष्वेहापरां कथाम् ॥ १ ॥

( श्रीरामने कहा ) ' लक्ष्मण! इस तरह मैंने तुम्हें राजा नृगके शापका प्रसङ्ग विस्तारपूर्वक बताया है । यदि सुननेकी इच्छा हो तो दूसरी कथा भी सुनो ' ॥ १ ॥

एवमुक्तस्तु रामेण सौमित्रिः पुनरब्रवीत् ।

तृप्तिराश्चर्यभूतानां कथानां नास्ति मे नृप ॥ २ ॥

श्रीरामके ऐसा कहनेपर सुमित्राकुमार फिर बोले— ' नरेश्वर! इन आश्चर्यजनक कथाओंके सुननेसे मुझे कभी तृप्ति नहीं होती है ' ॥ २ ॥

लक्ष्मणेनैवमुक्तस्तु राम इक्ष्वाकुनन्दनः ।

कथां परमधर्मिष्ठां व्याहर्तुमुपचक्रमे ॥ ३ ॥

लक्ष्मणके इस प्रकार कहनेपर इक्ष्वाकुकुलनन्दन श्रीरामने पुनः उत्तम धर्मंसे युक्त कथा कहनी आरम्भ की ॥ ३ ॥

आसीद् राजा निमिर्नाम इक्ष्वाकूणां महात्मनाम् ।

पुत्रो द्वादशमो वीर्ये धर्मे च परिनिष्ठितः ॥ ४ ॥

' सुमित्रानन्दन! महात्मा इक्ष्वाकु पुत्रोंमें निमि नामक एक राजा हो गये हैं, जो इक्ष्वाकु के बारहवें * पुत्र थे । वे पराक्रम और धर्म में पूर्णतः स्थिर रहनेवाले थे ॥ ४ ॥

स राजा वीर्यसम्पन्नः पुरं देवपुरोपमम् ।

निवेशयामास तदा अभ्याशे गौतमस्य तु ॥ ५ ॥

* श्रीमद्भागवत नवम स्कन्ध ६ । ४ ) में, विष्णुपुराण ( ४ । २ । ११ ) में तथा महाभारत ( अनुशासनपर्व २ । ५ ) में इक्ष्वाकुके सौ पुत्र बताये गये हैं । इनमें प्रधान थे – विकुक्षि, निमि और दण्ड । इस दृष्टिसे निमि द्वितीय पुत्र सिद्ध होते हैं; परंतु यहाँ मूलमें इनको बारहवाँ बताया गया है । सम्भव है गुण-विशेषके कारण ये तीन प्रधान कहे गये हों और अवस्था क्रमसे बारहवें ही हों । ' उन पराक्रमसम्पन्न नरेशने उन दिनों गौतम आश्रम के निकट देवपुरीके समान एक नगर बसाया ॥ ५ ॥

पुरस्य सुकृतं नाम वैजयन्तमिति श्रुतम् ।

निवेशं यत्र राजर्षिर्निमिश्चक्रे महायशाः ॥ ६ ॥

' महायशस्वी राजर्षि निमिने जिस नगरमें अपना निवास-स्थान बनाया, उसका सुन्दर नाम रक्खा गया वैजयन्त । इसी नामसे उस नगरकी प्रसिद्धि हुई ( देवराज इन्द्र के प्रासादका नाम वैजयन्त है, उसीकी समतासे निमिके नगरका भी यही नाम रक्खा गया था ) ॥ ६ ॥

तस्य बुद्धिः समुत्पन्ना निवेश्य सुमहापुरम् ।

यजेयं दीर्घसत्रेण पितुः प्रह्लादयन् मनः ॥ ७ ॥

' उस महान् नगरको बसाकर राजाके मनमें यह विचार उत्पन्न हुआ कि मैं पिताके हृदयको आह्लाद प्रदान करने के लिये एक ऐसे यज्ञ का अनुष्ठान करूँ, जो दीर्घकालतक चालू रहनेवाला हो ॥ ७ ॥

ततः पितरमामन्त्र्य इक्ष्वाकुं हि मनोः सुतम् ।

वसिष्ठं वरयामास पूर्व ब्रह्मर्षिसत्तमम् ॥ ८ ॥

अनन्तरं स राजर्षिर्निमिरिक्ष्वाकुनन्दनः ।

अत्रिमङ्गिरसं चैव भृगुं चैव तपोनिधिम् ॥ ९ ॥

' तदनन्तर इक्ष्वाकुनन्दन राजर्षि निमिने अपने पिता मनुपुत्र इक्ष्वाकुसे पूछकर अपना यज्ञ करानेके लिये सबसे पहले ब्रह्मर्षिशिरोमणि वसिष्ठजीका वरण किया । उसके बाद अत्रि, अङ्गिरा तथा तपोनिधि भृगुको भी आमन्त्रित किया ॥

तमुवाच वसिष्ठस्तु निमिं राजर्षिसत्तमम् ।

वृतोऽहं पूर्वमिन्द्रेण अन्तरं प्रतिपालय ॥ १० ॥

' उस समय महर्षि वसिष्ठ ने राजर्षियों में श्रेष्ठ निमिसे कहा-' देवराज इन्द्र ने एक यज्ञके लिये पहले से ही मेरा वरण कर लिया है; अतः वह यज्ञ जबतक समाप्त न हो जाय तबतक तुम मेरे आगमनकी प्रतीक्षा करो ' ॥ १० ॥

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उत्तरकाण्डे षट्पञ्चाशः सर्गः १५८७

अनन्तरं महाविप्रो गौतमः प्रत्यपूरयत् ।

वसिष्ठोऽपि महातेजा इन्द्रयज्ञमथाकरोत् ॥ ११ ॥

‘ वसिष्ठजीके चले जानेके बाद महान् ब्राह्मण महर्षि गौतमने आकर उनके कामको पूरा कर दिया । उधर महातेजस्वी वसिष्ठ भी इन्द्रका यज्ञ पूरा कराने लगे ॥ ११ ॥

निमिस्तु राजा विप्रांस्तान् समानीय नराधिपः ।

अयजद्धिमवत्पार्श्व स्वपुरस्य समीपतः ।

पञ्चवर्षसहस्राणि राजा दीक्षामथाकरोत् ॥ १२ ॥

‘ नरेश्वर राजा निमिने उन ब्राह्मणोंको बुलाकर हिमालयके पास अपने नगर के निकट ही यज्ञ आरम्भ कर दिया, राजा निमिने पाँच हजार वर्षोंतकके लिये यज्ञकी दीक्षा ली ॥१२ ॥

इन्द्रयज्ञावसाने तु वसिष्ठो भगवानृषिः ।

सकाशमागतो राज्ञो हौत्रं कर्तुमनिन्दितः ॥ १३ ॥

तदन्तरमथापश्यद् गौतमेनाभिपूरितम् उधर इन्द्र - यज्ञकी समाप्ति होनेपर अनिन्द्य भगवान् वसिष्ठ ऋषि राजा निमिके पास होतृकर्म करने के लिये आये । वहाँ आकर उन्होंने देखा कि जो समय प्रतीक्षाके लिये दिया था, उसे गौतमने आकर पूरा कर दिया ॥ १३३ ॥

कोपेन महताविष्टो वसिष्ठो ब्रह्मणः सुतः ॥ १४ ॥

स राज्ञो दर्शनाकाङ्क्षी मुहूर्त समुपाविशत् ।

तस्मिन्नहनि राजर्षिर्निद्रयापहृतो भृशम् ॥ १५ ॥

‘ यह देख ब्रह्मकुमार वसिष्ठ महान् क्रोधसे भर गये और राजा से मिलने के लिये दो घड़ी वहाँ बैठे रहे । परंतु उस दिन राजर्षि निमि अत्यन्त निद्राके वशीभूत हो सो गये थे ।

ततो मन्युर्वसिष्ठस्य प्रादुरासीन्महात्मनः ।

अदर्शन राजर्षेर्व्याहर्तुमुपचक्रमे ॥ १६ ॥

" राजा मिले नहीं, इस कारण महात्मा वसिष्ठ मुनिको बड़ा क्रोध हुआ । वे राजर्षिको लक्ष्य करके बोलने लगे - ॥

यस्मात् त्वमन्यं वृतवान् मामवज्ञाय पार्थिव ।

चेतनेन विनाभूतो देहस्ते पार्थिवैष्यति ॥ १७ ॥

‘ “ भूपाल निमे! तुमने मेरी अवहेलना करके दूसरे पुरोहित-का वरण कर लिया है, इसलिये तुम्हारा यह शरीर अचेतन होकर गिर जायगा ' ॥ १७ ॥

ततः प्रबुद्धो राजा तु श्रुत्वा शापमुदाहृतम् ।

ब्रह्मयोनिमथोवाच स राजा क्रोधमूर्च्छितः ॥ १८ ॥

' तदनन्तर राजाकी नींद खुबी । वे उनके दिये हुए शापकी बात सुनकर क्रोधसे मूर्छित हो गये और ब्रह्मयोनि वसिष्ठसे बोले – ॥ १८ ॥

अजानतः शयानस्य क्रोधेन कलुषीकृतः ।

उक्तवान् मम शापाग्नि यमदण्डमिवापरम् ॥ १ ९ ॥

“ मुझे आपके आगमनकी बात मालूम नहीं थी, इसलिये सो रहा था । परंतु आपने क्रोधसे कलुषित होकर मेरे ऊपर दूसरे यमदण्डकी भाँति शापाग्निका प्रहार किया है ॥ १ ९ ॥

तस्मात् तवापि ब्रह्मर्षे चेतनेन विनाकृतः ।

देहः स सुचिरप्रख्यो भविष्यति न संशयः ॥ २० ॥

“ अतः ब्रह्मर्षे । चिरन्तन शोभासे युक्त जो आपका शरीर है, वह भी अचेतन होकर गिर जायगा — इसमें संशय नहीं है ' ॥ २० ॥

इति रोषवशादुभौ तदानी-मन्योन्यं शपितौ नृपद्विजेन्द्रौ । सहसैव बभूवतुर्विदेहौ तत्तुल्याधिगतप्रभाववन्तौ ॥ २१ ॥

‘ इस प्रकार उस समय रोषके वशीभूत हुए वे दोनों

नृपेन्द्र और द्विजेन्द्र परस्पर शाप दे सहसा विदेह हो गये ।

उन दोनोंके प्रभाव ब्रह्माजी के समान थे ' ॥ २१ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे पञ्चपञ्चाशः सर्गः ॥ ५५ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें पचपनवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ५५ ॥

षट्पञ्चाशः सर्गः ब्रह्माजी के कहने से वसिष्ठका वरुणके वीर्यमें आवेश, वरुणका उर्वशी के समीप एक कुम्भमें अपने वीर्यका आधान तथा मित्रके शापसे उर्वशीका भूतल में राजा पुरूरवा के पास रहकर पुत्र उत्पन्न करना रामस्य भाषितं श्रुत्वा लक्ष्मणः परवीरहा । ‘ ककुत्स्थकुलभूषण! वे ब्रह्मर्षि और वे भूपाल दोनों उवाच प्राञ्जलिर्भूत्वा राघवं दीप्ततेजसम् ॥ १ ॥ देवताओंके भी सम्मानपात्र थे । उन्होंने अपने शरीरोंका

श्रीरामचन्द्रजीके मुख से कही गयी यह कथा सुनकर त्याग करके फिर नूतन शरीर कैसे ग्रहण किया? ॥ २ ॥

शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले लक्ष्मण उद्दीप्त तेजवाले श्रीरघुनाथ- लक्ष्मणेनैवमुक्तस्तु राम इक्ष्वाकुनन्दनः । जीसे हाथ जोड़कर बोले-- ॥ १ ॥ प्रत्युवाच महातेजा लक्ष्मणं पुरुषर्षभः ॥ ३ ॥

निक्षिप्य देही काकुत्स्थ कथं तौ द्विजपार्थिवौ । लक्ष्मणके इस प्रकार पूछने पर इक्ष्वाकुकुलनन्दन महा--पुनर्देहेन संयोगं जग्मतुर्देवसम्मतौ ॥ २ ॥ तेजस्वी पुरुषप्रवर श्रीरामने उनसे इस प्रकार कहा – ॥ ३ ॥