Ramayana 2 — पृष्ठ 811–820
वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 811–820
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१५८८ श्रीमदूवाल्मीकीय रामायणे
तौ परस्परशापेन देहमुत्सृज्य धार्मिकौ ।
अभूतां नृपविप्रर्षी वायुभूतौ तपोधनौ ॥ ४ ॥
" सुमित्रानन्दन! एक दूसरे के शापसे देह त्याग करके तपस्या के धनी वे धर्मात्मा राजर्षि और ब्रह्मर्षि वायुरूप हो गये ॥ ४ ॥
अशरीरः शरीरस्य कृतेऽन्यस्य महामुनिः ।
वसिष्ठस्तु महातेजा जगाम पितुरन्तिकम् ॥ ५ ॥
' महातेजस्वी महामुनि वसिष्ठ शरीर रहित हो जानेपर दूसरे शरीरकी प्राप्ति के लिये अपने पिता ब्रह्माजीके पास गये ॥ ५ ॥
सोऽभिवाद्य ततः पादौ देवदेवस्य धर्मवित् ।
पितामहमथोवाच वायुभूत इदं वचः ॥ ६ ॥
' धर्मके ज्ञाता वायुरूप वसिष्ठजीने देवाभिदेव ब्रह्माजीके चरणों में प्रणाम करके उन पितामइसे इस प्रकार कहा - ॥६ ॥
भगवन् निमिशापेन विदेहत्वमुपागमम् ।
देवदेव महादेव वायुभूतोऽहमण्डज ॥ ७ ॥
“ ब्रह्माण्डकटाहसे प्रकट हुए देवाधिदेव महादेव! भगवन्! मैं राजा निमिके शापसे देहहीन हो गया हूँ; अतः वायुरूपमें रह रहा हूँ ॥ ७ ॥
सर्वेषां देहहीनानां महद् दुःखं भविष्यति ।
लुप्यन्ते सर्वकार्याणि हीनदेहस्य वै प्रभो ॥ ८ ॥
देहस्यान्यस्य सद्भावे प्रसादं कर्तुमर्हसि । “ प्रभो! समस्त देहहीनोंको महान् दुःख होता है और होता रहेगा; क्योंकि देहहीन प्राणी के सभी कार्यं लुप्त हो जाते हैं । अतः दूसरे शरीरकी प्राप्ति के लिये आप मुझपर कृपा करें ' ॥ ८३ ॥
तमुवाच ततो ब्रह्मा स्वयंभूरमितप्रभः ॥ ९ ॥
मित्रावरुणजं तेज आविश त्वं महायशः ।
अयोनिजस्त्वं भविता तत्रापि द्विजसत्तम ।
धर्मेण महता युक्तः पुनरेष्यसि मे वशम् ॥ १० ॥
' तब अमित तेजस्वी स्वयम्भू ब्रह्माने उनसे कहा—— ' महायशस्वी द्विजश्रेष्ठ! तुम मित्र और वरुणके छोड़े हुए तेज ( वीर्य ) में प्रविष्ट हो जाओ । वहाँ जानेपर भी तुम अयोनिज रूपसे ही उत्पन्न होओगे और महान् धर्मसे युक्त हो पुत्ररूपसे मेरे वशमें आ जाओगे ( मेरे पुत्र होनेके कारण तुम्हें पूर्ववत् प्रजापतिका पद प्राप्त होगा । ) ॥ ९ -१० ॥
एवमुक्तस्तु देवेन अभिवाद्य प्रदक्षिणम् ।
कृत्वा पितामहं तूर्ण प्रययौ वरुणालयम् ॥ ११ ॥
' ब्रह्माजीके ऐसा कहनेपर उनके चरणों में प्रणाम तथा उनकी परिक्रमा करके वायुरूप वसिष्ठजी वरुणलोकको चले गये ॥ ११ ॥
तमेव कालं मित्रोऽपि वरुणत्वमकारयत् ।
क्षीरोदेन सहोपेतः पूज्यमानः सुरेश्वरैः ॥ १२ ॥
“ उन्हीं दिनों मित्रदेवता भी वरुणके अधिकारका पालन कर रहे थे | वे वरुणके साथ रहकर समस्त देवेश्वरोंद्वारा पूजित होते थे ॥ १२ ॥
एतस्मिन्नेव काले तु उर्वशी परमाप्सराः ।
यदृच्छया तमुद्देशमागता सखिभिर्वृता ॥ १३ ॥
' इसी समय अप्सराओंमें श्रेष्ठ उर्वशी सखियोंसे घिरी हुई अकस्मात् उस स्थान पर आ गयी ॥ १३ ॥
तां दृष्ट्वा रूपसम्पन्नां क्रीडन्तीं वरुणालये ।
तदाविशत् परो हर्षो वरुणं चोर्वशीकृते ॥ १४ ॥
' उस परम सुन्दरी अप्सराको क्षीरसागर में नहाती और जलक्रीडा करती देख वरुण के मनमें उर्वशीके लिये अत्यन्त उल्लास प्रकट हुआ ॥ १४ ॥
सतां पद्मपलाशाक्षी पूर्णचन्द्रनिभाननाम् ।
वरुणो वरयामास मैथुनाया सरोवराम् ॥ १५ ॥
' उन्होंने प्रफुल्ल कमलके समान नेत्र और पूर्ण चन्द्रमाके समान मनोहर मुखवाली उस सुन्दरी अप्सराको समागम के लिये आमन्त्रित किया ॥ १५ ॥
प्रत्युवाच ततः सा तु वरुणं प्राञ्जलिः स्थिता ।
मित्रेणाहं वृता साक्षात् पूर्वमेव सुरेश्वर ॥ १६ ॥
' तब उर्वशीने हाथ जोड़कर वरुणसे कहा-- ' सुरेश्वर! साक्षात् मित्रदेवताने पहलेसे ही मेरा वरण कर लिया है ' ॥ १६ ॥
वरुणस्त्वत्रवीद वाक्यं कन्दर्पशरपीडितः ।
इदं तेजः समुत्स्त्रक्ष्ये कुम्भेऽस्मिन् देवनिर्मिते ॥ १७ ॥
एवमुत्सृज्य सुश्रोणि त्वय्यहं वरवर्णिनि ।
कृतकामो भविष्यामि यदि नेच्छसि सङ्गमम् ॥ १८ ॥
" यह सुनकर वरुणने कामदेवके बाणोंसे पीड़ित होकर कहा – “ सुन्दर रूप रंगवाली सुश्रोणि! यदि तुम मुझसे समागम करना नहीं चाहतीं तो मैं तुम्हारे समीप इस देव-निर्मित कुम्भमें अपना यह वीर्यं छोड़ दूँगा और इस प्रकार छोड़कर ही सफलमनोरथ हो जाऊँगा ' ॥ १७-१८ ॥
तस्य तल्लोकनाथस्य वरुणस्य सुभाषितम् ।
उर्वशी परमप्रीता श्रुत्वा वाक्यमुवाच ह ॥ १ ९ ॥
' लोकनाथ वरुणका यह मनोहर वचन सुनकर उर्वशीको बड़ी प्रसन्नता हुई और वह बोली- ॥ १ ९ ॥
काममेतद् भवत्वेवं हृदयं मे त्वयि स्थितम् ।
भावश्चाप्यधिकं तुभ्यं देहो मित्रस्य तु प्रभो ॥ २० ॥
" प्रभो! आपकी इच्छा के अनुसार ऐसा ही हो । मेरा हृदय विशेषतः आपमें अनुरक्त है और आपका अनुराग भी मुझमें अधिक है; इसलिये आप मेरे उद्देश्य से उस कुम्भमें वीर्याधान कीजिये । इस शरीरपर तो इस समय मित्रका अधिकार हो चुका है ' ॥ २० ॥
उर्वश्या एवमुक्तस्तु रेतस्तन्महदद्भुतम् ।
ज्वलदग्निसमप्रख्यं तस्मिन् कुम्भे न्यवासृजत् ॥ २१ ॥
' उर्वशीके ऐसा कहनेपर वरुणने प्रज्वलित अग्निके समान
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उत्तरकाण्डे सप्तपञ्चाशः सर्गः १५८ ९ प्रकाशमान अपने अत्यन्त अद्भुत तेज ( वीर्यं ) को उस कुम्भमें डाल दिया ॥ २१ ॥
उर्वशी त्वगमत् तत्र मित्रो वै यत्र देवता ।
तां तु मित्रः सुसंक्रुद्ध उर्वशीमिदमब्रवीत् ॥ २२ ॥
' तदनन्तर उर्वशी उस स्थानपर गयी, जहाँ मित्रदेवता विराजमान थे । उस समय मित्र अत्यन्त कुपित हो उस उर्वशीसे इस प्रकार बोले – ॥ २२ ॥
मयाभिमन्त्रिता पूर्व कस्मात् त्वमवसर्जिता ।
पतिमन्यं वृतवती किमर्थं दुष्टचारिणि ॥ २३ ॥
" दुराचारिणि । पहले मैंने तुझे समागमके लिये आमन्त्रित किया था; फिर किसलिये तूने मेरा त्याग किया और क्यों दूसरे पतिका वरण कर लिया? ॥ २३ ॥
अनेन दुष्कृतेन त्वं मत्क्रोधकलुषीकृता ।
मनुष्यलोकमास्थाय कंचित् कालं निवत्स्यसि ॥ २४ ॥
" अपने इस पापके कारण मेरे क्रोधसे कलुषित हो तू कुछ कातक मनुष्यलोक में जाकर निवास करेगी ॥ २४ ॥
बुधस्य पुत्रो राजर्षिः काशिराजः पुरूरवाः ।
तमभ्यागच्छ दुर्बुद्धे स ते भर्ता भविष्यति ॥ २५ ॥
“ दुर्बुद्धे! बुधके पुत्र राजर्षि पुरुरवा, जो काशिदेशके राजा हैं, उनके पास चली जा, वे ही तेरे पति होंगे ' ॥२५ ॥
ततः सा शापदोषेण पुरूरवसमभ्यगात् ।
प्रतिष्ठाने पुरूरवं बुधस्यात्मजमौरसम् ॥ २६ ॥
' तब वह शाप - दोषसे दूषित हो प्रतिष्ठानपुर ( प्रयाग-झूसी ) में बुधके औरस पुत्र पुरूरवाके पास गयी ॥ २६ ॥
तस्य जज्ञे ततः श्रीमानायुः पुत्रो महाबलः ।
नहुषो यस्य पुत्रस्तु बभूवेन्द्रसमद्युतिः ॥ २७ ॥
' पुरूरवाके उर्वशीके गर्भसे श्रीमान् आयु नामक महाबली पुत्र हुआ, जिसके पुत्र इन्द्रतुल्य तेजस्वी महाराज नहुष 11
वज्रमुत्सृज्य वृत्राय श्रान्तेऽथ त्रिदिवेश्वरे ।
शतं वर्षसहस्राणि येनेन्द्रत्वं प्रशासितम् ॥ २८ ॥
' वृत्रासुरपर वज्रका प्रहार करके जब देवराज इन्द्र ब्रह्म-हत्याके भयसे दुखी हो छिप गये थे, तब नहुषने ही एक लाख वर्षोंतक ' इन्द्र ' पदपर प्रतिष्ठित हो त्रिलोकीके राज्यका शासन किया था ॥ २८ ॥
सा तेन शापेन जगाम भूमि तदोर्वशी चारुदती सुनेत्रा । बहूनि वर्षाण्यवसच्च सुभ्रूः शापक्षयादिन्द्रसदो ययौ च ॥ २ ९ ॥ ' मनोहर दाँत और सुन्दर नेत्रवाली उर्वशी मित्रके दिये हुए उस शापसे भूतलपर चली गयी । वहाँ वह सुन्दरी बहुत वर्षों तक रही । फिर शापका क्षय होनेपर इन्द्रसभामें चली गयी ' ॥ २ ९ ॥ इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे षट्पञ्चाशः सर्गः ॥ ५६ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें छप्पनवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ५६ ॥
सप्तपञ्चाशः सर्गः वसिष्ठका नूतन शरीर - धारण और
तां श्रुत्वा दिव्यसंकाशां कथामद्भुतदर्शनाम् ।
लक्ष्मणः परमप्रीतो राघवं वाक्यमब्रवीत् ॥ १ ॥
उस दिव्य एवं अद्भुत कथाको सुनकर लक्ष्मणको बड़ी
प्रसन्नता हुई । वे श्रीरघुनाथजीसे बोले - ॥ १ ॥
निक्षिप्तदेह काकुत्स्थ कथं तौ द्विजपार्थिवौ ।
संयोगं जग्मतुर्देवसम्मतौ ॥ २ ॥
" काकुत्स्थ! वे ब्रह्मर्षि वसिष्ठ तथा राजर्षि निमि जो देवताओं द्वारा भी सम्मानित थे, अपने - अपने शरीर को छोड़कर फिर नूतन शरीर से किस प्रकार संयुक्त हुए? ' ॥ २ ॥
तस्य तद् भाषितं श्रुत्वा रामः सत्यपराक्रमः ।
तां कथां कथयामास वसिष्ठस्य महात्मनः ॥ ३ ॥
उनका यह प्रश्न सुनकर सत्यपराक्रमी श्रीरामने महात्मा वसिष्ठके शरीर - ग्रहणसे सम्बन्ध रखनेवाली उस कथाको पुनः कहना आरम्भ किया- ॥ ३ ॥
यः स कुम्भो रघुश्रेष्ठ तेजःपूर्णो महात्मनोः ।
तस्मिंस्तेजोमयौ विप्रो सम्भूतावृषिसत्तमौ ॥ ४ ॥
निमिका प्राणियोंके नयनों में निवास ' घुश्रेष्ठ! महामना मित्र और वरुणदेवता के तेज ( वीर्य ) से युक्त जो वह प्रसिद्ध कुम्भ था, उससे दो तेजस्वी ब्राह्मण प्रकट हुए । वे दोनों ही ऋषियोंमें श्रेष्ठ थे ॥ ४ ॥
पूर्व समभवत् तत्र अगस्त्यो भगवानृषिः ।
नाहं सुतस्तवेत्युक्त्वा मित्रं तस्मादपाक्रमत् ॥ ५ ॥
' पहले उस घटसे महर्षि भगवान् अगस्त्य उत्पन्न हुए और मित्रसे यह कहकर कि मैं आपका पुत्र नहीं हूँ ' वहाँसे अन्यत्र चले गये ॥ ५ ॥
तद्धि तेजस्तु मित्रस्य उर्वश्याः पूर्वमाहितम् ।
तस्मिन् समभवत् कुम्भे तत्तेजो यत्र वारुणम् ॥ ६ ॥
‘ वह मित्रका तेज था, जो उर्वशीके निमित्तसे पहले ही उस कुम्भमें स्थापित किया गया था । तत्पश्चात् उस कुम्भमें वरुणदेवताका तेज भी सम्मिलित हो गया था ॥ ६ ॥
कस्यचित् त्वथ कालस्य मित्रावरुणसम्भवः ।
वसिष्ठस्तेजसा युक्तो जज्ञे इक्ष्वाकुदैवतम् ॥ ७ ॥
' तत्पश्चात् कुछ कालके बाद मित्रावरुणके उस वीर्यसे
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१५ ९ ० श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे तेजस्वी वसिष्ठमुनिका प्रादुर्भाव हुआ । जो इक्ष्वाकुकुलके देवता ( गुरु या पुरोहित ) हुए ॥ ७ ॥
तमिक्ष्वाकुर्महातेजा जातमात्रमनिन्दितम् ।
वत्रे पुरोधसं सौम्य वंशस्यास्य हिताय नः ॥ ८ ॥
' सौम्य लक्ष्मण! महातेजस्वी राजा इक्ष्वाकुने उनके वहाँ जन्म ग्रहण करते ही उन अनिन्द्य मुनि वसिष्ठका हमारे इस कुलके हितके लिये पुरोहितके पदपर वरण कर लिया ॥ ८ ॥
एवं त्वपूर्व देहस्य वसिष्ठस्य महात्मनः ।
कथितो निर्गमः सौम्य निमेः शृणु यथाभवत् ॥ ९ ॥
' सौम्य! इस प्रकार नूतन शरीरसे युक्त वसिष्ठमुनिकी उत्पत्तिका प्रकार बताया गया । अब निमिका जैसा वृत्तान्त है, वह सुनो ॥ ९ ॥
eg विदेहं राजानमृषयः सर्व एव ते ।
तं च ते याजयामासुर्यज्ञदीक्षां मनीषिणः ॥ १० ॥
' राजा निमिको देहसे पृथक् हुआ देख उन सभी मनीषी ऋषियोंने स्वयं ही यज्ञकी दीक्षा ग्रहण करके उस यज्ञको पूरा किया ॥ १० ॥
तं च देहं नरेन्द्रस्य रक्षन्ति स्म द्विजोत्तमाः ।
गन्धैर्माल्यैश्च वस्त्रैश्च पौरभृत्यसमन्विताः ॥ ११ ॥
' उन श्रेष्ठ ब्रह्मर्षियोंने पुरवासियों और सेवकों के साथ रह-कर गन्ध, पुष्प और वस्त्रों सहित राजा निमिके उस शरीरको तेलके कड़ाह आदिमें सुरक्षित रक्खा ॥ ११ ॥
ततो यज्ञे समाप्ते तु भृगुस्तत्रेदमब्रवीत् ।
आनयिष्यामि ते चेतस्तुष्टोऽस्मि तव पार्थिव ॥ १२ ॥
' तदनन्तर जब यज्ञ समाप्त हुआ, तब वहाँ भृगुने कहा-' राजन्! ( राजाके शरीरके अभिमानी जीवात्मन्! ) मैं तुम पर बहुत संतुष्ट हूँ, अतः यदि तुम चाहो तो तुम्हारे जीव-चैतन्यको मैं पुनः इस शरीरमें ला दूँगा ' ॥ १२ ॥
सुप्रीताश्च सुराः सर्वे निमेश्चेतस्तदानुवन् ।
वरं वरय राजर्षे व ते चेतो निरूप्यताम् ॥ १३ ॥
" भृगुके साथ ही अन्य सब देवताओंने भी अत्यन्त प्रसन्न होकर निमिके जीवात्मासे कहा- ' राजर्षे! वर माँगो | तुम्हारे जीव- चैतन्यको कहाँ स्थापित किया जाय ' । १३ ॥
एवमुक्तः सुरैः सर्वैर्निमेश्चेतस्तदाब्रवीत् ।
नेत्रेषु सर्वभूतानां वसेयं सुरसत्तमाः ॥ १४ ॥
' समस्त देवताओंके ऐसा कहनेपर निमिके जीवात्माने उस समय उनसे कहा - ' सुरश्रेष्ठ! मैं समस्त प्राणियोंके नेत्रों-में निवास करना चाहता हूँ ' ॥ १४ ॥
बाढमित्येव विबुधा निमेश्चेतस्तदानुवन् ।
नेत्रेषु सर्वभूतानां वायुभूतश्चरिष्यसि ॥ १५ ॥
' तब देवताओंने निमिके जीवात्मासे कहा- ' बहुत अच्छा, तुम वायुरूप होकर समस्त प्राणियोंके नेत्रों में विचरते रहोगे ॥ १५ ॥
त्वत्कृते च निमिष्यन्ति चक्षूंषि पृथिवीपते ।
वायुभूतेन चरता विश्रामार्थ मुहुर्मुहुः ॥ १६ ॥
" " पृथ्वीनाथ! वायुरूपसे विचरते हुए आपके सम्बन्धसे जो थकावट होगी, उसका निवारण करके विश्राम पाने के लिये प्राणियोंके नेत्र बारंबार बंद हो जाया करेंगे ' ॥ १६ ॥
एवमुक्त्वा तु विबुधाः सर्वे जग्मुर्यथागतम् ।
ऋषयोऽपि महात्मानो निमेर्देहं समाहरन् ॥ १७ ॥
अरणि तत्र निक्षिप्य मथनं चक्रुरोजसा । ' ऐसा कहकर सब देवता जैसे आये थे, वैसे चले गये; फिर महात्मा ऋषियोंने निमिके शरीरको पकड़ा और उसपर अरणि रखकर उसे बलपूर्वक मथना आरम्भ किया ॥ १७३ ॥
मन्त्रहो मैर्महात्मानः पुत्रहेतोर्निमेस्तदा ॥ १८ ॥
अरण्यां मथ्यमानायां प्रादुर्भूतो महातपाः ।
मथनामिथिरित्याहुर्जननाजनकोऽभवत् ॥ १ ९ ॥
यस्माद् विदेहात् सम्भूतो वैदेहस्तु ततः स्मृतः ।
एवं विदेहराजश्च जनकः पूर्वकोऽभवत् ।
मिथिर्नाम महातेजास्तेनायं मैथिलोऽभवत् ॥ २० ॥
' पूर्ववत् मन्त्रोच्चारणपूर्वक होम करते हुए उन महात्माओं-ने जब निमिके पुत्रकी उत्पत्तिके लिये अरणि - मन्थन आरम्भ किया, तब उस मन्थनसे महातपस्वी मिथि उत्पन्न हुए । इस अद्भुत जन्मका हेतु होनेके कारण वे जनक कहलाये तथा विदेह ( जीव रहित शरीर ) से प्रकट होनेके कारण उन्हें वैदेह भी कहा गया । इस प्रकार पहले विदेहराज जनकका नाम महातेजस्वी मिथि हुआ, जिससे यह जनकवंश मैथिल कहलाया ॥ १८-२० ॥ इति सर्वमशेषतो मया कथितं सम्भवकारणं तु सौम्य । नृपपुङ्गवशापजं द्विजस्य द्विजशापाच्च यदद्भुतं नृपस्य ॥ २१ ॥
' सौम्य लक्ष्मण! राजाओंमें श्रेष्ठ निमिके शापसे ब्राह्मण वसिष्ठका और ब्राह्मण वसिष्ठके शापसे राजा निमिका जो अद्भुत जन्म घटित हुआ, उसका सारा कारण मैंने तुम्हें कह सुनाया ' ॥ २१ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे सप्तपञ्चाशः सर्गः ॥ ५७ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें सत्तावनवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ५७ ॥
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उत्तरकाण्डे अष्टपञ्चाशः सर्गः १५ ९ १ अष्टपञ्चाशः सर्गः ययातिको शुक्राचार्यका शाप
एवं ब्रुवति रामे तु लक्ष्मणः परवीरहा ।
प्रत्युवाच महात्मानं ज्वलन्तमिव तेजसा ॥ १ ॥
श्रीरामके ऐसा कहनेपर शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले लक्ष्मणने तेजसे प्रज्वलित होते हुए - से महात्मा श्रीरामको सम्बोधित करके इस प्रकार कहा- ॥ १ ॥
महदद्भुतमाश्चर्य विदेहस्य पुरातनम् ।
निर्वृत्तं राजशार्दूल वसिष्ठस्य मुनेश्च ह ॥ २ ॥
‘ नृपश्रेष्ठ! राजा विदेह ( निमि ) तथा वसिष्ठ मुनिका पुरातन वृत्तान्त अत्यन्त अद्भुत और आश्चर्यजनक है ॥ २ ॥
निमिस्तु क्षत्रियः शूरो विशेषेण च दीक्षितः ।
न क्षमं कृतवान् राजा वसिष्ठस्य महात्मनः ॥ ३ ॥
" परंतु राजा निमि क्षत्रिय, शूरवीर और विशेषतः यज्ञकी दीक्षा लिये हुए थे; अतः उन्होंने महात्मा वसिष्ठके प्रति उचित बर्ताव नहीं किया ' ॥ ३ ॥
एवमुक्तस्तु तेनायं रामः क्षत्रियपुङ्गवः ।
उवाच लक्ष्मणं वाक्यं सर्वशास्त्रविशारदम् ॥ ४ ॥
रामो रमयतां श्रेष्ठो भ्रातरं दीप्ततेजसम् । लक्ष्मणके इस तरह कहनेपर दूसरों के मनको रमाने ( प्रसन्न रखने ) वालोंमें श्रेष्ठ क्षत्रियशिरोमणि श्रीरामने सम्पूर्ण शास्त्रोंके ज्ञाता और उद्दीप्त तेजस्वी भ्राता लक्ष्मणसे कहा- ॥ ४३ ॥
न सर्वत्र क्षमा वीर पुरुषेषु प्रदृश्यते ॥ ५ ॥
सौमित्रे दुःसहो रोषो यथा क्षान्तो ययातिना ।
सत्त्वानुगं पुरस्कृत्य तन्निबोध समाहितः ॥ ६ ॥
' वीर सुमित्राकुमार! सभी पुरुषोंमें वैसी क्षमा नहीं दिखायी देती, जैसी राजा ययातिमें थी । राजा ययातिने सत्त्वगुण के अनुकूल मार्गका आश्रय ले दुःसह रोषको क्षमा कर लिया था । वह प्रसंग बताता हूँ, एकाग्रचित्त होकर सुनो ॥ ५-६ ॥
नहुषस्य सुतो राजा ययातिः पौरवर्धनः ।
तस्य भार्याद्वयं सौम्य रूपेणाप्रतिमं भुवि ॥ ७ ॥
" सौम्य! नहुष के पुत्र राजा ययाति पुरवासियों, प्रजाजनों-की वृद्धि करनेवाले थे । उनके दो पत्नियाँ थीं, जिनके रूपकी इस भूतलपर कहीं तुलना नहीं थी ॥ ७ ॥
एका तु तस्य राजर्षेर्नाहुषस्य पुरस्कृता ।
शर्मिष्ठा नाम दैतेयी दुहिता वृषपर्वणः ॥ ८ ॥
' नहुनन्दन राजर्षि ययातिकी एक पत्नीका नाम शर्मिष्ठा था, जो राजाके द्वारा बहुत ही सम्मानित थी । शर्मिष्ठा दैत्य-कुलकी कन्या और वृषपर्वाकी पुत्री थी ॥ ८ ॥
अन्या तूशनसः पत्नी ययातेः पुरुषर्षभ ।
न तु सा दयिता राज्ञो देवयानी सुमध्यमा ॥ ९ ॥
तयोः पुत्रौ तु सम्भूतौ रूपवन्तौ समाहितौ ।
शर्मिष्ठाजनयत् पूरुं देवयानी यदुं तदा ॥ १० ॥
' पुरुषप्रवर! उनकी दूसरी पत्नी शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी थी । देवयानी सुन्दरी होनेपर भी राजाको अधिक प्रिय नहीं थी । उन दोनों के ही पुत्र बड़े रूपवान् हुए । शर्मिंष्ठाने पूरुको जन्म दिया और देवयानीने यदुको 1 । वे दोनों बालक अपने चित्तको एकाग्र रखनेवाले थे ॥ ९ -१० ॥
पूरुस्तु दयितो राज्ञो गुणैर्मातृकृतेन च ।
ततो दुःखसमाविष्टो यदुर्मातरमब्रवीत् ॥ ११ ॥
' अपनी माताके प्रेमयुक्त व्यवहारसे और अपने गुणों से पूरु राजाको अधिक प्रिय था । इससे यदुके मनमें बड़ा दुःख हुआ । वे मातासे बोले— ॥ ११ ॥
भार्गवस्य कुले जाता देवस्याक्लिष्टकर्मणः ।
सहसे हृद्रतं दुःखमवमानं च दुःसहम् ॥ १२ ॥
" मा! तुम अनायास ही महान् कर्म करनेवाले देवस्वरूप शुक्राचार्य कुलमें उत्पन्न हुई हो तो भी यहाँ हार्दिक दुःख और दुःसह अपमान सहती हो ॥ १२ ॥
आवां च सहितौ देवि प्रविशाव हुताशनम् ।
राजा तु रमतां सार्धं दैत्यपुण्या बहुक्षपाः ॥ १३ ॥
" अतः देवि! हम दोनों एक साथ ही अग्निमें प्रवेश कर जायँ । राजा दैत्यपुत्री शर्मिष्ठा के साथ अनन्त रात्रियोंतक रमते रहें ॥ १३ ॥
यदि वा सहनीयं ते मामनुज्ञातुमर्हसि ।
क्षम त्वं न क्षमिष्येऽहं मरिष्यामि न संशयः ॥ १४ ॥
" यदि तुम्हें यह सब कुछ सहन करना है तो मुझे ही प्राणत्यागकी आज्ञा दे दो । तुम्हीं सहो । मैं नहीं सहूँगा 1 । मैं निःसंदेह मर जाऊँगा ॥ १४ ॥
पुत्रस्य भाषितं श्रुत्वा परमार्तस्य रोदतः ।
देवयानी तु संक्रुद्धा सस्मार पितरं तदा ॥ १५ ॥
' अत्यन्त आर्त होकर रोते हुए अपने पुत्र यदुकी यह बात सुनकर देवयानीको बड़ा क्रोध हुआ और उन्होंने तत्काल अपने पिता शुक्राचार्यजीका स्मरण किया ॥ १५ ॥
इङ्गितं तदभिज्ञाय दुहितुर्भार्गवस्तदा ।
आगतस्त्वरितं तत्र देवयानी स्म यत्र सा ॥ १६ ॥
" शुक्राचार्य अपनी पुत्रीकी उस चेष्टाको जानकर तत्काल उस स्थानपर आ पहुँचे, जहाँ देवयानी विद्यमान थी ॥ १६ ॥
दृष्ट्वा चाप्रकृतिस्थां तामप्रहृष्टामचेतनाम् ।
पिता दुहितरं वाक्यं किमेतदिति चाब्रवीत् ॥ १७ ॥
' बेटीको अस्वस्थ अप्रसन्न और अचेत - सी देखकर पिताने पूछा - " वत्से! यह क्या बात है? ' ॥ १७ ॥
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१५ ९ २ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे
पृच्छन्तमसकृत् तं वै भार्गवं दीप्ततेजसम् ।
देवयानी तु संक्रुद्धा पितरं वाक्यमब्रवीत् ॥ १८ ॥
अहमग्नि विषं तीक्ष्णमपो वा मुनिसत्तम ।
भक्षयिष्ये प्रवेक्ष्ये वा न तु शक्ष्यामि जीवितुम् ॥ १ ९ ॥
" उद्दीप्त तेजवाले पिता भृगुनन्दन शुक्राचार्य जब बारंबार इस प्रकार पूछने लगे, तब देवयानीने अत्यन्त कुपित होकर उनसे कहा- ' मुनिश्रेष्ठ! मैं प्रज्वलित अग्नि या अगाध जल-में प्रवेश कर जाऊँगी अथवा विष खा लूँगी; किंतु इस प्रकार अपमानित होकर जीवित नहीं रह सकूँगी ॥ १८-१९ ॥
न मां त्वमवजानीषे दुःखितामवमानिताम् ।
वृक्षस्यावशया ब्रह्मंश्छिद्यन्ते वृक्षजीविनः ॥ २० ॥
“ आपको पता नहीं है कि मैं यहाँ कितनी दुखी और अपमानित हूँ । ब्रह्मन्! वृक्षके प्रति अवहेलना होनेसे उसके आश्रित फूलों और पत्तोंको ही तोड़ा और नष्ट किया जाता है ( इसी तरह आपके प्रति राजाकी अवहेलना होनेसे ही मेरा यहाँ अपमान हो रहा है ) ॥ २० ॥
अवज्ञया च राजर्षिः परिभूय च भार्गव ।
मय्यां प्रयुङ्क्ते हि न च मां बहु मन्यते ॥ २१ ॥
" भृगुनन्दन! राजर्षि ययाति आपके प्रति अनादरका भाव रखने के कारण मेरी भी अवहेलना करते हैं और मुझे अधिक आदर नहीं देते हैं ' ॥ २१ ॥
तस्यास्तद् वचनं श्रुत्वा कोपेनाभिपरीवृतः ।
व्याहर्तुमुपचक्राम भार्गवो नहुषात्मजम् ॥ २२ ॥
' देवयानीकी यह बात सुनकर भृगुनन्दन शुक्राचार्यको बड़ा क्रोध हुआ और उन्होंने नहुषपुत्र ययातिको लक्ष्य करके इस प्रकार कहना आरम्भ किया- ॥ २२ ॥
यस्मान्मामवजानीषे नाहुष त्वं दुरात्मवान् ।
वयसा जरया जीर्णः शैथिल्यमुपयास्यसि ॥ २३ ॥
" नहुषकुमार! तुम दुरात्मा होने के कारण मेरी अवहेलना करते हो, इसलिये तुम्हारी अवस्था जरा - जीर्ण वृद्ध के समान हो जायगी - तुम सर्वथा शिथिल हो जाओगे ' ॥ २३ ॥
एवमुक्त्वा दुहितरं समाश्वास्य स भार्गवः ।
पुनर्जगाम ब्रह्मर्षिर्भवनं स्वं महायशाः ॥ २४ ॥
• ' राजासे ऐसा कहकर पुत्रीको आश्वासन दे महायशस्वी ब्रह्मर्षि शुक्राचार्य पुनः अपने घरको चले गये ॥ २४ ॥
स एवमुक्त्वा द्विजपुङ्गवाश्यः सुतां समाश्वास्य च देवयानीम् । पुनर्ययौ सूर्यसमानतेजा दत्त्वा च शापं नहुषात्मजाय ॥ २५ ॥
' सूर्य के समान तेजस्वी तथा ब्राह्मणशिरोमणियों में अग्र गण्य शुक्राचार्य देवयानीको आश्वासन दे नहुषपुत्र ययातिको ऐसा कहकर उन्हें पूर्वोक्त शाप दे फिर चले गये ' ॥ २५ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डेऽष्टपञ्चाशः सर्गः ॥ ५८ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्धरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें अट्ठावनवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ५८ ॥
एकोनषष्टितमः सर्गः ययातिका अपने पुत्र पुरुको अपना बुढ़ापा देकर बदले में उसका यौवन लेना और भोगों से तृप्त होकर पुनः दीर्घकाल के बाद उसे उसका यौवन लौटा देना, पूरुका अपने पिताकी गद्दीपर अभिषेक तथा यदुको शाप
श्रुत्वा तूशनसं क्रुद्धं तदार्तो नहुषात्मजः ।
जरां परमिकां प्राप्य यदुं वचनमब्रवीत् ॥ १ ॥
शुक्राचार्य कुपित होनेका समाचार सुनकर नहुषकुमार ययातिको बड़ा दुःख हुआ । उन्हें ऐसी वृद्धावस्था प्राप्त हुई, जो दूसरेकी जवानी से बदली जा सकती थी । उस विलक्षण जरावस्थाको पाकर राजाने यदुसे कहा -- ॥ १ ॥
यो त्वमसि धर्मज्ञो मदर्थं प्रतिगृह्यताम् ।
जरा परमिका पुत्र भोगे रंस्ये महायशः ॥ २ ॥
' यदो! तुम धर्मके ज्ञाता हो 1 । मेरे महायशस्वी पुत्र! तुम मेरे लिये दूसरेके शरीरमें संचारित करने के योग्य इस जरा-बस्थाको ले लो । मैं भोगोंद्वारा रमण करूँगा - अपनी भोगविषयक इच्छाको पूर्ण करूँगा ॥ २ ॥
न तावत् कृतकृत्योऽस्मि विषयेषु नरर्षभ ।
अनुभूय तदा कामं ततः प्राप्स्याम्यहं जराम् ॥ ३ ॥
' नरश्रेष्ठ! अभीतक मैं विषयभोगोंसे तृप्त नहीं हुआ हूँ । इच्छानुसार विषयसुखका अनुभव करके फिर अपनी वृद्धावस्था मैं तुमसे ले लूँगा ' ॥ ३ ॥
यदुस्तद्वचनं श्रुत्वा प्रत्युवाच नरर्षभम् ।
पुत्रस्ते दयितः पूरुः प्रतिगृह्णातु वै जराम् ॥ ४ ॥
उनकी यह बात सुनकर यदुने नरश्रेष्ठ ययातिको उत्तर दिया – “ आपके लाड़ले बेटे पूरु ही इस वृद्धावस्थाको ग्रहण करें ॥ ४ ॥
बहिष्कृतोऽहमर्थेषु संनिकर्षाच्च पार्थिव ।
प्रतिगृह्णातु वै राजन् यैः सहाश्नासि भोजनम् ॥ ५ ॥
' पृथ्वीनाथ! मुझे तो आपने घनसे तथा पास रहकर लाड़-प्यार पानेके अधिकारसे भी वञ्चित कर दिया है; अतः जिनके साथ बैठकर आप भोजन करते हैं, उन्हीं लोगोंसे युवावस्था ग्रहण कीजिये ॥ ५ ॥
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उत्तरकाण्डे एकोनषष्टितमः सर्गः १५ ९ ३
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा राजा पूरुमथाब्रवीत् ।
इयं जरा महाबाहो मदर्थे प्रतिगृह्यताम् ॥ ६ ॥
यदुकी यह बात सुनकर राजाने पूरुसे कहा - ' महाबाहो! मेरी सुख - सुविधा के लिये तुम इस वृद्धावस्थाको ग्रहण कर लो ' ॥ ६ ॥
नाहुषेणैवमुक्तस्तु पूरुः प्राञ्जलिरब्रवीत् ।
धन्योऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि शासनेऽस्मि तव स्थितः ॥
नहुष - पुत्र ययातिके ऐसा कहनेपर पूरु हाथ जोड़कर बोले – “ पिताजी! आपकी सेवाका अवसर पाकर मैं धन्य हो गया । यह आपका मेरे ऊपर महान् अनुग्रह है । आपकी आशाका पालन करने के लिये मैं हर तरहसे तैयार हूँ ॥ ७ ॥
पुरोर्वचनमाज्ञाय नाहुषः परया मुदा ।
प्रहर्षमतुलं लेभे जरां संक्रामयच्च ताम् ॥ ८ ॥
पूरुका यह स्वीकारसूचक वचन सुनकर नहुषकुमार ययातिको बड़ी प्रसन्नता हुई । उन्हें अनुपम हर्पं प्राप्त हुआ और उन्होंने अपनी वृद्धावस्था पूरुके शरीर में संचारित कर दी ॥ ८ ॥
ततः स राजा तरुणः प्राप्य यज्ञान् सहस्रशः ।
बहुवर्षसहस्राणि पालयामास मेदिनीम् ॥ ९ ॥
तदनन्तर तरुण हुए राजा ययातिने सहस्रों यज्ञका अनुष्ठान करते हुए कई हजार वर्षोंतक इस पृथ्वीका पालन किया ॥ ९ ॥
अथ दीर्घस्य कालस्य राजा पूरुमथाब्रवीत् ।
आनयस्व जरां पुत्र न्यासं निर्यातयस्व मे ॥ १० ॥
इसके बाद दीर्घकाल व्यतीत होनेपर राजाने पूरुसे कहा-' बेटा! तुम्हारे पास धरोहरके रूपमें रक्खी हुई मेरी वृद्धावस्था को मुझे लौटा दो ॥ १० ॥
न्यासभूता मया पुत्र त्वयि संक्रामिता जरा ।
तस्मात् प्रतिगृहीष्यामि तां जरां मा व्यथां कृथाः ॥ ११ ॥
' पुत्र! मैंने वृद्धावस्थाको धरोहरके रूपमें ही तुम्हारे
शरीरमें संचारित किया था; इसलिये उसे वापस ले लूँगा ।
तुम अपने मनमें दुःख न मानना ॥ ११ ॥
प्रीतश्चास्मि महाबाहो शासनस्य प्रतिग्रहात् ।
त्वां चाहमभिषेक्ष्यामि प्रीतियुक्तो नराधिपम् ॥ १२ ॥
' महाबाहो! तुमने मेरी आज्ञा मान ली, इससे मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई । अब मैं बड़े प्रेमसे राजाके पदपर तुम्हारा अभिषेक करूँगा ' ॥ १२ ॥
एवमुक्त्वा सुतं पूरुं ययातिर्नहुषात्मजः ।
देवयानीसुतं क्रुद्धो राजा वाक्यमुवाच ह ॥ १३ ॥
अपने पुत्र पूरुसे ऐसा कहकर नहुषकुमार राजा ययाति देवयानी के बेटेसे कुपित होकर बोले - ॥ १३ ॥
राक्षसस्त्वं मया जातः क्षत्ररूपो दुरासदः ।
प्रतिहंसि ममाज्ञां त्वं प्रजार्थे विफलो भव ॥ १४ ॥
वा ० रा ० ५. १२.२-' यदो! मैंने दुर्जय क्षत्रियके रूपमें तुम जैसे राक्षसको जन्म दिया । तुमने मेरी आज्ञाका उल्लङ्घन किया है, अतः तुम अपनी संतानोंको राज्याधिकारी बनानेके विषय में विफल-मनोरथ हो जाओ ॥ १४ ॥
पितरं गुरुभूतं मां यस्मात् त्वमवमन्यसे ।
राक्षसान् यातुधानांस्त्वं जनयिष्यसि दारुणान् ॥ १५ ॥
' मैं पिता हूँ, गुरु हूँ; फिर भी तुम मेरा अपमान करते हो, इसलिये भयंकर राक्षसों और यातुधानोंको तुम जन्म दोगे ॥ १५ ॥
न तु सोमकुलोत्पन्ने वंशे स्थास्यति दुर्मतेः ।
वंशोऽपि भवतस्तुल्यो दुर्विनीतो भविष्यति ॥ १६ ॥
' तुम्हारी बुद्धि बहुत खोटी है । अतः तुम्हारी संतान सोमकुलमें उत्पन्न वंशपरम्परामें राजाके रूपसे प्रतिष्ठित नहीं होगी । तुम्हारी संतति भी तुम्हारे ही समान उद्दण्ड होगी ' ॥
तमेवमुक्त्वा राजर्षिः पूरुं राज्यविवर्धनम् ।
अभिषेकेण सम्पूज्य आश्रमं प्रविवेश ह ॥ १७ ॥
यदुसे ऐसा कहकर राजर्षि ययातिने राज्यकी वृद्धि करने-वाले पूरुको अभिषेक के द्वारा सम्मानित करके वानप्रस्थ - आश्रम-में प्रवेश किया ॥ १७ ॥
ततः कालेन महता दिष्टान्तमुपजग्मिवान् ।
त्रिदिवं स गतो राजा ययातिर्नहुषात्मजः ॥ १८ ॥
तदनन्तर दीर्घकालके पश्चात् प्रारब्ध भोगका क्षय होने पर नहुषपुत्र राजा ययातिने शरीरको त्याग दिया और स्वर्गलोकको प्रस्थान किया ॥ १८ ॥
पुरुश्चकार तद् राज्यं धर्मेण महता वृतः ।
प्रतिष्ठाने पुरवरे काशिराज्ये महायशाः ॥ १ ९ ॥
उसके बाद महायशस्वी पूरुने महान् धर्मसे संयुक्त हो काशिराजकी श्रेष्ठ राजधानी प्रतिष्ठानपुरमें रहकर उस राज्यका पालन किया ॥ १ ९ ॥
यदुस्तु जनयामास यातुधानान् सहस्रशः ।
पुरे क्रौञ्चवने दुर्गे राजवंशबहिष्कृतः ॥ २० ॥
राजकुलसे बहिष्कृत यदुने नगरमें तथा दुर्गम क्रौञ्चवनमें सहस्रों यातुधानोंको जन्म दिया ॥ २० ॥
एष तूशनसा मुक्तः शापोत्सर्गो ययातिना ।
धारितः क्षत्रधर्मेण यं निमिश्चक्षमे न च ॥ २१ ॥
शुक्राचार्यके दिये हुए इस शापको राजा ययातिने क्षत्रिय-धर्मके अनुसार धारण कर लिया । परंतु राजा निमिने वसिष्ठ-जीके शापको नहीं सहन किया ॥ २१ ॥
एतत्ते सर्वमाख्यातं दर्शनं सर्वकारिणाम् ।
अनुवर्तामहे सौम्य दोषो न स्याद् यथा नृगे ॥ २२ ॥
सौम्य! यह सारा प्रसंग मैंने तुम्हें सुना दिया । समस्त कृत्योंका पालन करनेवाले सत्पुरुषोंकी दृष्टि ( विचार ) का ही हम अनुसरण करते हैं, जिससे राजा
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१५ ९ ४ श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे नृगकी भाँति हमें भी दोष न प्राप्त हो ॥ २२ ॥ चन्द्रमाके समान मनोहर मुखवाले श्रीराम जब इस
इति कथयति रामे चन्द्रतुल्याननेन प्रकार कथा कह रहे थे, उस समय आकाशमें दो - ही - एक तारे प्रविरलतरतारं व्योम यज्ञे तदानीम् । रह गये । पूर्व दिशा अरुण किरणोंसे रञ्जित हो लाल दिखायी अरुणकिरणरक्ता दिग् बभौ चैव पूर्वा देने लगी, मानो कुसुमरंगमें रँगे हुए अरुण वस्त्रसे उसने कुसुमरसविमुक्तं वस्त्रमागुण्ठितेव ॥२३ ॥ अपने अङ्गोंको ढक लिया हो ॥ २३ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे एकोनषष्टितमः सर्गः ॥ ५ ९ ॥ इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्धरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें उनसठवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ५ ९ ॥ प्रक्षिप्तः सर्गः १ * श्रीरामके द्वारपर कार्यार्थी कुत्तेका आगमन और श्रीरामका उसे दरवारमें लानेका आदेश
ततः प्रभाते विमले कृत्वा पौर्वाहिकों क्रियाम् ।
धर्मासनगतो राजा रामो राजीवलोचनः ॥ १ ॥
राजधर्मानवेक्षन् वै ब्राह्मणैर्ने गमैः सह ।
पुरोधसा वसिष्ठेन ऋषिणा कश्यपेन च ॥ २ ॥
तदनन्तर निर्मल प्रभातकालमें पूर्वाह्णकालोचित संध्या-वन्दन आदि नित्य कर्म करके कमलनयन राजा श्रीराम राज-धर्मो का पालन ( प्रजाजनोंके विवादका निपटारा ) करनेके लिये वेदवेत्ता ब्राह्मणों, पुरोहित वसिष्ठ तथा कश्यप मुनिके साथ राजसभामें उपस्थित हो धर्म ( न्याय ) के आसन पर विराजमान हुए ॥ १-२ ॥ मन्त्रिभिर्व्यवहारज्ञैस्तथान्यैर्धर्मपाठकैः नीतिज्ञैरथ सभ्यैश्च राजभिः सा सभा वृता ॥ ३ ॥
वह सभा व्यवहारका ज्ञान रखनेवाले मन्त्रियों, धर्म-शास्त्रोंका पाठ करनेवाले बिद्वानों, नीतिज्ञों, राजाओं तथा अन्य सभासदोंसे भरी हुई थी ॥ ३ ॥
सभा यथा महेन्द्रस्य यमस्य वरुणस्य च ।
शुशुभे राजसिंहस्य रामस्याक्लिष्टकर्मणः ॥ ४ ॥
अनायास ही महान् कर्म करनेवाले राजसिंह श्रीरामकी वह सभा इन्द्र, यम और वरुणकी सभाके समान शोभा पाती थी ॥ ४ ॥
अथ रामोऽब्रवीत् तत्र लक्ष्मणं शुभलक्षणम् ।
निर्गच्छ त्वं महाबाहो सुमित्रानन्दवर्धन ॥ ५ ॥
कार्यार्थिनश्च सौमित्रे व्याहर्तुं त्वमुपाक्रम । वहाँ बैठे हुए भगवान् श्रीरामने शुभलक्षणसम्पन्न लक्ष्मण-से कहा - " माता सुमित्रा का आनन्द बढ़ानेवाले महाबाहु वीर! तुम बाहर निकलो और देखो कि कौन - कौन - से कार्यार्थी उपस्थित हैं । सुमित्राकुमार! तुम उन कार्यार्थियोंको बारी-बारीसे बुलाना आरम्भ करो ' ॥ ५३ ॥
रामस्य भाषितं श्रुत्वा लक्ष्मणः शुभलक्षणः ॥ ६ ॥
द्वारदेशमुपागम्य कार्यिणश्चाह्वयत् स्वयम् ।
न कश्चिदब्रवीत् तत्र मम कार्यमिहाद्य वै ॥ ७ ॥
श्रीरामचन्द्रजीका यह आदेश सुनकर शुभलक्षण लक्ष्मणने द्वारदेशपर आकर स्वयं ही कार्यार्थियोंको पुकारा, परंतु कोई भी वहाँ यह न कह सका कि मुझे यहाँ कोई कार्य है ॥ ६-७ ॥
नाधयो व्याधयश्चैव रामे राज्यं प्रशासति ।
पक्कसस्या वसुमती सर्वौषधिसमन्विता ॥ ८ ॥
श्रीरामके राज्य शासन करते समय न तो कहीं किसीको शारीरिक रोग होते थे और न मानसिक चिन्ताएँ ही सताती थीं । पृथ्वीपर सब प्रकारकी ओषधियाँ ( अन्न - फल आदि ) उत्पन्न होती थीं और पकी हुई खेती शोभा पाती थी ॥ ८ ॥
न बालो म्रियते तत्र न युवा न च मध्यमः ।
धर्मेण शासितं सर्वे न च बाधा विधीयते ॥ ९ ॥
श्रीरामके राज्यमें न तो बालककी मृत्यु होती थी न युवककी और न मध्यम अवस्थाके पुरुषकी ही । सबका धर्म-पूर्वक शासन होता था । किसीके सामने कभी कोई बाधा नहीं आती थी ॥ ९ ॥
दृश्यते न च कार्यार्थी रामे राज्यं प्रशासति ।
लक्ष्मणः प्राञ्जलिर्भूत्वा रामायैवं न्यवेदयत् ॥ १० ॥
श्रीरामके राज्य शासन कालमें कभी कोई कार्यार्थी ( अभियोग लेकर आनेवाला पुरुष ) दिखायी नहीं देता था । लक्ष्मणने हाथ जोड़कर श्रीरामचन्द्रजीको राज्यकी ऐसी स्थिति बतायी ॥
अथ रामः प्रसन्नात्मा सौमित्रिमिदमब्रवीत् ।
भूय एव तु गच्छ त्वं कार्यिणः प्रविचारय ॥ ११ ॥
तदनन्तर प्रसन्नचित्त हुए श्रीरामने सुमित्राकुमारसे पुनः इस प्रकार कहा — ' लक्ष्मण! तुम फिर जाओ और कार्यार्थी पुरुषोंका पता लगाओ ॥ ११ ॥
सम्यक्प्रणीतया नीत्या नाधर्मो विद्यते क्वचित् ।
तस्माद् राजभयात् सर्वे रक्षन्तीह परस्परम् ॥ १२ ॥
' भलीभाँति उत्तम नीतिका प्रयोग करनेसे राज्यमें कहीं अधर्मं नहीं रह जाता है । अतः सभी लोग राजा के भयसे यहाँ एक दूसरेकी रक्षा करते हैं ॥ १२ ॥
* कुछ प्रतियोंमें यहाँ तीन सर्ग और मिलते हैं, जिनपर संस्कृत टीकाकारोंकी व्याख्या न मिलनेसे इन्हें प्रक्षिप्त बताया गया है । इनमें से दो सर्ग उपयोगी होने के कारण यहाँ अनुवादसहित दिये जा रहे हैं ।
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उत्तरकाण्डे प्रक्षिप्तः सर्गः १ १५ ९ ५
बाणा इव मया मुक्ता इह रक्षन्ति मे प्रजाः ।
तथापि त्वं महाबाहो प्रजा रक्षस्व तत्परः ॥ १३ ॥
‘ यद्यपि राजकर्मचारी मेरे छोड़े हुए बार्णो के समान यहाँ प्रजाकी रक्षा करते हैं, तथापि महाबाहो! तुम स्वयं भी तत्पर रहकर प्रजाका पालन किया करो ' ॥ १३ ॥
एवमुक्तस्तु सौमित्रिर्निर्जगाम नृपालयात् ।
अपश्यद् द्वारदेशे वै श्वानं तावदवस्थितम् ॥ १४ ॥
तमेव वीक्षमाणं वै विक्रोशन्तं मुहुर्मुहुः ।
लक्ष्मणस्तं वै स पप्रच्छाथ वीर्यवान् ॥ १५ ॥
श्रीराम के ऐसा कहनेपर सुमित्राकुमार लक्ष्मण राजभवन से बाहर निकले | बाहर आकर उन्होंने देखा, द्वारपर एक कुत्ता खड़ा है, जो उन्हींकी ओर देखता हुआ बारंबार भूँक रहा है । उसे इस प्रकार देखकर पराक्रमी लक्ष्मणने उससे पूछा- ॥ १४-१५ ॥
किं ते कार्य महाभाग ब्रूहि विस्रब्धमानसः ।
लक्ष्मणस्य वचः श्रुत्वा सारमेयोऽभ्यभाषत ॥ १६ ॥
' महाभाग! तुम निर्भय होकर बताओ, तुम्हारा क्या काम है? ' लक्ष्मणका यह वचन सुनकर कुत्तेने कहा - ॥१६ ॥
सर्वभूतशरण्या रामायाक्लिष्टकर्मणे । भवभयदात्रे च तस्मै वक्तु ं समुत्सहे ॥ १७ ॥
" जो समस्त भूतोंको शरण देनेवाले और क्लेशरहित कर्म करनेवाले हैं, जो भयके अवसरों पर भी अभय देते हैं, उन भगवान् श्रीराम के समक्ष ही मैं अपना काम बता सकता हूँ ' ॥
एतच्छ्रुत्वा च वचनं सारमेयस्य लक्ष्मणः ।
राघवाय तदाख्यातुं प्रविवेशालयं शुभम् ॥ १८ ॥
कुत्तेका यह कथन सुनकर लक्ष्मणने श्रीरघुनाथजीको इसकी सूचना देनेके लिये सुन्दर राजभवनमें प्रवेश किया ॥
निवेद्य रामस्य पुनर्निर्जगाम नृपालयात् ।
वक्तव्यं यदि ते किंचित् तत्वं ब्रूहि नृपाय वै ॥ १ ९ ॥
श्रीरामको उसकी बात बताकर लक्ष्मण पुनः राजभवन से बाहर निकल आये और उससे बोले – ' यदि तुम्हें कुछ कहना है तो चलकर राजासे ही कहो ' ॥ १ ९ ॥
लक्ष्मणस्य वचः श्रुत्वा सारमेयोऽभ्यभाषत ।
देवागारे नृपागारे द्विजवेश्मसु वै तथा ॥ २० ॥
वह्निः शतक्रतुश्चैव सूर्यो वायुश्च तिष्ठति ।
नात्र योग्यास्तु सौमित्रे योनीनामधमा वयम् ॥ २१ ॥
लक्ष्मणकी वह बात सुनकर कुत्ता बोला- ' सुमित्रा-नन्दन! देवालय, राजभवनमें तथा ब्राह्मण के घरोंमें अग्नि, इन्द्र, सूर्य और वायुदेवता सदा स्थित रहते हैं; अतः हम अधमयोनिके जीव स्वेच्छासे वहाँ जाने के योग्य नहीं हैं ॥
प्रवेष्टुं नात्र शक्ष्यामि धर्मो विग्रहवान् नृपः ।
सत्यवादी रणपटुः सर्वसत्त्वहिते रतः ॥ २२ ॥
“ मैं इस राजभवन में प्रवेश नहीं कर सकूँगा; क्योंकि राजा श्रीराम धर्मके मूर्तिमान् स्वरूप हैं । वे सत्यवादी, संग्राम-कुशल और समस्त प्राणियोंके हितमें तत्पर रहनेवाले हैं || २२ ||
पाडण्यस्य पदं वेत्ति नीतिकर्ता स राघवः ।
सर्वज्ञः सर्वदर्शी च रामो रमयतां वरः ॥ २३ ॥
' वे संधि - विग्रह आदि छहों गुणोंके प्रयोगके अवसरोंको जानते हैं । श्रीरघुनाथजी न्याय करनेवाले हैं । वे सर्वज्ञ और सर्वदर्शी हैं । श्रीराम दूसरोंके मनको रमानेवाले पुरुषोंमें श्रेष्ठ हैं ॥ २३ ॥
स समः स च मृत्युश्च स यमो धनदस्तथा ।
वह्निः शतक्रतुश्चैव सूर्यो वै वरुणस्तथा ॥ २४ ॥
' वे ही चन्द्रमा हैं, वे ही मृत्यु हैं, वे ही यम, कुबेर, अग्नि, इन्द्र, सूर्य और वरुण हैं ॥ २४ ॥
तस्य त्वं ब्रूहि सौमित्रे प्रजापालः स राघवः ।
अनाशप्तस्तु सौमित्रे प्रवेष्टुं नेच्छयाम्यहम् ॥ २५ ॥
' सुमित्रानन्दन । श्रीरघुनाथजी प्रजापालक हैं । आप उनसे कहिये । मैं उनकी आज्ञा प्राप्त किये बिना इस भवन में प्रवेश करना नहीं चाहता ' ॥ २५ ॥
आनृशंस्यान्महाभागः प्रविवेश महाद्युतिः ।
नृपालयं प्रविश्याथ लक्ष्मणो वाक्यमब्रवीत् ॥ २६ ॥
यह सुनकर महातेजस्वी महाभाग लक्ष्मणने दयावश राज-भवनमें प्रवेश करके कहा— ॥ २६ ॥
श्रूयतां मम विज्ञाप्यं कौसल्यानन्दवर्धन ।
यन्मयोक्तं महाबाहो तव शासनजं विभो ॥ २७ ॥
' कौसल्याका आनन्द बढ़ानेवाले महाबाहु श्रीरघुनाथजी! मेरा यह निवेदन सुनिये । आपने जो आदेश दिया था, उसके अनुसार मैंने बाहर जाकर कार्यार्थीको पुकारा ॥ २७ ॥
श्वा वै ते तिष्ठतेद्वारि कार्यार्थी समुपागतः ।
लक्ष्मणस्य वचः श्रुत्वा रामो वचनमब्रवीत् ।
सम्प्रवेशय वै क्षिप्रं कार्यार्थी योऽत्र तिष्ठति ॥ २८ ॥
" इस समय आपके द्वारपर एक कुत्ता खड़ा है, जो कार्यार्थी होकर आया है । ' लक्ष्मण की यह बात सुनकर श्रीरामने कहा — ' यहाँ जो भी कार्यार्थी होकर खड़ा है, उसे शीघ्र इस सभा के भीतर ले आओ ' ॥ २८ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकान्ये उत्तरकाण्डे प्रक्षिप्तः सर्गः ॥ १ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें प्रक्षिप्त सर्ग १ पूरा हुआ ||
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१५ ९ ६ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे प्रक्षिप्तः सर्गः २ कुत्तेके प्रति श्रीरामका न्याय, उसकी इच्छाके अनुसार उसे मारनेवाले ब्राह्मणको मठाधीश बना देना और कुत्तेका मठाधीश होने का दोष बताना
श्रुत्वा रामस्य वचनं लक्ष्मणस्त्वरितस्तदा ।
मतिमान् राघवाय न्यवेदयत् ॥ १ ॥
श्वानमाहूय श्रीरामका यह वचन सुनकर बुद्धिमान् लक्ष्मणने तत्काल उस कुत्ते को बुलाया और श्रीरामको उसके आने की सूचना दी ।
समागतं श्वानं रामो वचनमब्रवीत् ।
विवक्षितार्थं मे ब्रूहि सारमेय न ते भयम् ॥ २ ॥
वहाँ आये हुए कुत्ते की ओर देखकर श्रीरामने कहा—
‘ सारमेय! तुम्हें जो कुछ कहना है, उसे मेरे सामने कहो ।
यहाँ तुम्हें कोई भय नहीं है ' ॥ २ ॥
अथापश्यत तत्रस्थं रामं श्वा भिन्नमस्तकः ।
ततो दृष्ट्वा स राजानं सारमेयोऽब्रवीद् वचः ॥ ३ ॥
कुत्तेका मस्तक फट गया था । उसने राजसभा में बैठे हुए महाराज श्रीरामकी ओर देखा और देखकर इस प्रकार कहा || ३ ॥
राजैव कर्ता भूतानां राजा चैव विनायकः ।
राजा सुप्तेषु जागर्ति राजा पालयति प्रजाः ॥ ४ ॥
' राजा ही समस्त प्राणियोंका उत्पादक और नायक है । राजा सबके सोते रहनेपर भी जागता है और प्रजाओंका पालन करता है ॥ ४ ॥
नीत्या सुनीतया राजा धर्म रक्षति रक्षिता ।
न पालयेद् राजा क्षिप्रं नश्यन्ति वै प्रजाः ॥ ५ ॥
यदा ' राजा सबका रक्षक है । वह उत्तम नीतिका प्रयोग करके सबकी रक्षा करता है । यदि राजा पालन न करे तो समस्त प्रजाएँ शीघ्र नष्ट हो जाती हैं ॥ ५ ॥
राजा कर्ता च गोप्ता च सर्वस्य जगतः पिता ।
राजा कालो युगं चैव राजा सर्वमिदं जगत् ॥ ६ ॥
" राजा कर्ता, राजा रक्षक और राजा सम्पूर्ण जगत्का पिता है । राजा काल और युग है तथा राजा यह सम्पूर्ण जगत् है ॥ ६ ॥
धारणाद् धर्ममित्याहुर्धर्मेण विधृताः प्रजाः ।
यस्माद् धारयते सर्व त्रैलोक्यं सचराचरम् ॥ ७ ॥
' धर्मं सम्पूर्ण जगत् को धारण करता है, इसीलिये उसका नाम धर्म है । धर्मने ही समस्त प्रजाको धारण कर रक्खा है; क्योंकि वही चराचर प्राणियोंसहित सारी त्रिलोकीका आधार है ॥
धारणाद् विद्विषां चैव धर्मेणारञ्जयन् प्रजाः ।
धारणमित्युक्तं स धर्म इति निश्चयः ॥ ८ ॥
तस्माद्' राजा अपने द्रोहियोंको भी धारण करता है ( अथवा वह दुष्टोंको भी मर्यादामें स्थापित करता है ) तथा वह धर्मके द्वारा प्रजाको प्रसन्न रखता है; इसलिये उसके शासनरूप कर्म को धारण कहा गया है और धारण ही धर्मं है, यह शास्त्रका सिद्धान्त है ॥ ८ ॥
एष राजन् परो धर्मः फलवान् प्रेत्य राघव ।
नहि धर्माद् भवेत् किंचिद् दुष्प्रापमिति मे मतिः ॥९ ॥
" रघुनन्दन! यह प्रजापालनरूप परम धर्म राजाको पर-लोक में उत्तम फल देनेवाला होता है । मेरा तो यह दृढ़ विश्वास है कि धर्मसे कुछ भी दुर्लभ नहीं है ॥ ९ ॥
दानं दया सतां पूजा व्यवहारेषु चार्जवम् ।
एष राम परो धर्मो रक्षणात् प्रेत्य चेह च ॥ १० ॥
' श्रीराम! दान, दया, सत्पुरुषोंका सम्मान और व्यवहार-में सरलता यह परम धर्म है । प्रजाजनोंकी रासे होनेवाला उत्कृष्ट धर्मं इहलोक और परलोकमें भी सुख देनेवाला होता है ।
त्वं प्रमाणं प्रमाणानामसि राघव सुव्रत ।
विदितश्चैव ते धर्मः सद्भिराचरितस्तु वै ॥ ११ ॥
' उत्तम व्रतका पालन करनेवाले रघुनन्दन । आप समस्त प्रमाणके भी प्रमाण हैं । सत्पुरुषोंने जिस धर्मका आचरण किया है, वह आपको भलीभाँति विदित ही है ॥ ११ ॥
धर्माणां त्वं परं धाम गुणानां सागरोपमः ।
अज्ञानाश्च मया राजन्नुक्तस्त्वं राजसत्तम ॥ १२ ॥
' राजन्! आप धर्मोके परम धाम और गुणके सागर हैं । नृपश्रेष्ठ! मैंने अज्ञानवश ही आपके सामने धर्मकी व्याख्या की है ॥ १२ ॥
प्रसादयामि शिरसा नत्वं क्रोद्धुमिहार्हसि ।
शुनः स वचनं श्रुत्वा राघवो वाक्यमब्रवीत् ॥ १३ ॥
" इसके लिये मैं आपके चरणोंमें मस्तक रखकर क्षमा चाहता और आपसे प्रसन्न होनेके लिये प्रार्थना करता हूँ । आप यहाँ मुझपर कुपित न हों । ' कुत्तेकी यह बात सुनकर श्रीरघुनाथजी बोले— ॥ १३ ॥
किं ते कार्य करोम्यद्य ब्रूहि विस्रब्धं मा चिरम् ।
रामस्य वचनं श्रुत्वा सारमेयोऽब्रवीदिदम् ॥ १४ ॥
' तुम निर्भय होकर बताओ । आज मैं तुम्हारा कौन - सा कार्य सिद्ध करूँ । अपना काम बताने में विलम्ब न करो । ' श्रीराम की यह बात सुनकर कुत्ता बोला ॥ १४ ॥
धर्मेण राष्ट्रं विन्देत धर्मेणैवानुपालयेत् ।
धर्माच्छरण्यतां याति राजा सर्वभयापहः ॥ १५ ॥
इदं विज्ञाय यत् कृत्यं श्रूयतां मम राघव । ‘ रघुनन्दन! राजा धर्मंसे ही राज्य प्राप्त करे और धर्मसे ही निरन्तर उसका पालन करे । धर्मसे ही राजा सबको शरण देनेवाला और सबका भय दूर करनेवाला होता है ।
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उत्तरकाण्डे प्रक्षिप्तः सर्गः २ १५ ९ ७ ऐसा जानकर आप मेरा जो कार्य है, उसे सुनिये ॥ १५३ ॥
भिक्षुः सर्वार्थसिद्धश्च ब्राह्मणावसथे वसन् ॥ १६ ॥
तेन दत्तः प्रहारो मे निष्कारणमनागसः । " प्रभो! सर्वार्थसिद्ध नामसे प्रसिद्ध एक भिक्षु है, जो ब्राह्मणोंके घरमें रहा करता है । उसने आज अकारण मुझपर प्रहार किया है । मैंने उसका कोई अपराध नहीं किया था ' ॥ एतच्छ्रुत्वा तु रामेण द्वाःस्थः सम्प्रेषितस्तदा ॥ १७ ॥
आनीतश्च द्विजस्तेन सर्वसिद्धार्थकोविदः । कुत्तेकी यह बात सुनकर श्रीरामने तत्काल एक द्वारपाल भेजा और उस सर्वार्थसिद्ध नामक विद्वान् भिक्षु ब्राह्मणको बुलवाया ॥ १७३ ॥
अथ द्विजवरस्तत्र रामं दृष्ट्वा महाद्युतिः ॥ १८ ॥
किं ते कार्य मया राम तद् ब्रूहि त्वं ममानघ । श्रीरामको देखकर उस महातेजस्वी श्रेष्ठ ब्राह्मणने पूछा— ' निष्पाप रघुनन्दन! मुझसे आपको क्या काम है ११ ॥ १८३ ॥
एवमुक्तस्तु विप्रेण रामो वचनमब्रवीत् ॥ १ ९ ॥
त्वया दत्तः प्रहारोऽयं सारमेयस्य वै द्विज ।
किं तवापकृतं विप्र दण्डेनाभिहतो यतः ॥ २० ॥
ब्राह्मण के इस प्रकार पूछनेपर श्रीराम बोले— ' ब्रह्मन्! आपने इस कुत्ते के सिरपर जो यह प्रहार किया है, उसका क्या कारण है? विप्रवर! इसने आपका क्या अपराध किया था, जिसके कारण आपने इसे डंडा मारा है १ । १ ९ -२० ॥
क्रोधः प्राणहरः शत्रुः क्रोधो मित्रमुखो रिपुः ।
क्रोधो ह्यसिर्महातीक्ष्णः सर्वे क्रोधोऽपकर्षति ॥ २१ ॥
' क्रोध प्राणहारी शत्रु है ॥ क्रोधको मित्रर्मुख शत्रु बताया गया है । क्रोध अत्यन्त तीखी तलवार है तथा क्रोध सारे सद्गुणोंको खींच लेता है ॥ २१ ॥
तपते यजते चैव यच्च दानं प्रयच्छति ।
क्रोधेन सर्वं हरति तस्मात् क्रोधं विसर्जयेत् ॥ २२ ॥
' मनुष्य जो तप करता, यज्ञ करता और दान देता है, उन सबके पुण्यको वह क्रोधके द्वारा नष्ट कर देता है । इसलिये क्रोधको त्याग देना चाहिये ॥ २२ ॥
इन्द्रियाणां प्रदुष्टानां हयानामिव धावताम् ।
कुर्वीत धृत्या सारथ्यं संहृत्येन्द्रियगोचरम् ॥ २३ ॥
“ दुष्ट घोड़ोंकी तरह विषयोंकी ओर दौड़नेवाली इन्द्रियों-को उन विषयोंकी ओरसे हटाकर धैर्यपूर्वक उन्हें नियन्त्रण में रक्खे ॥ २३ ॥
मनसा कर्मणा वाचा चक्षुषा च समाचरेत् ।
श्रेयो लोकस्य चरतो न द्वेष्टि न च लिप्यते ॥ २४ ॥
१. जो ऊपरसे मित्र आन पड़े किंतु परिणाममें शत्रु सिद्ध हो, बद्द ‘ मिश्रमुख ' शत्रु है । क्रोध अपने प्रतिद्वन्द्वीको सताने में सहायक-सा बनकर आता है, इसीलिये इसे मित्रमुख कहा गया है 1 ' मनुष्यको चाहिये कि वह अपने पास विचरनेवाले लोगों-की मन, वाणी, क्रिया और दृष्टिद्वारा भलाई ही करे । किसी-से द्वेष न रक्खे । ऐसा करने से वह पापसे लिप्त नहीं होता ॥
न तत् कुर्यादसिस्तीक्ष्णः सर्पो वा व्याहतः पदा ।
अरिर्वा नित्यसंक्रुद्धो यथाऽऽत्मा दुरनुष्ठितः ॥ २५ ॥
' अपना दुष्ट मन जो अनिष्ट या अनर्थ कर सकता है, वैसा तीखी तलवार, पैरोंतले कुचला हुआ सर्प अथवा सदा क्रोधसे भरा रहनेवाला शत्रु भी नहीं कर सकता ॥ २५ ॥
विनीतविनयस्यापि प्रकृतिर्न विधीयते ।
प्रकृतिं गूहमानस्य निश्चयेन कृतिर्भुवा ॥ २६ ॥
" जिसे विनयकी शिक्षा मिली हो, उसकी भी प्रकृति नयी नहीं बनती है । कोई अपनी दुष्ट प्रकृतिको कितना ही क्यों न छिपाये, उसके कार्य में उसकी दुष्टता निश्चय ही प्रकट हो जाती है ' ॥ २६ ॥
एवमुक्तः स विप्रो वै रामेणाक्लिष्टकर्मणा ।
द्विजः सर्वार्थसिद्धस्तु अब्रवीद् रामसंनिधौ ॥ २७ ॥
- क्लेशरहित कर्म करनेवाले श्रीरामके ऐसा कहनेपर सर्वार्थसिद्ध नामक ब्राह्मणने उनके निकट इस प्रकार कहा- ॥
मया दत्तप्रहारोऽयं क्रोधेनाविष्टचेतसा ।
भिक्षार्थमटमानेन काले विगतभैक्षके ॥ २८ ॥
रथ्यास्थितस्त्वयं श्वा वै गच्छ गच्छेति भाषितः ।
अथ स्वैरेण गच्छंस्तु रथ्यान्ते विषमं स्थितः ॥ २ ९ ॥
' प्रभो! मेरा मन क्रोधसे भर गया था, इसलिये मैंने इसे डंडे से मारा है । भिक्षाका समय बीत चुका था, तथापि भूखे रहने के कारण भिक्षा माँगने के लिये मैं द्वार - द्वार घूम रहा था । यह कुत्ता बीच रास्ते में खड़ा था । मैंने बार - बार कहा - ' तुम रास्ते से हट जाओ, हट जाओ ' फिर यह अपनी मौज से चला और सड़क के बीच में बेढंगे खड़ा हो गया ॥ २८-२९ ॥
क्रोधेन क्षुधयाविष्टस्ततो दत्तोऽस्य राघव ।
प्रहारो राजराजेन्द्र शाधि मामपराधिनम् ॥ ३० ॥
त्वया शस्तस्य राजेन्द्र नास्ति मे नरकाद्भयम् । " मैं भूखा तो था ही, क्रोध चढ़ आया । राजाधिराज रघुनन्दन! उस क्रोधसे ही प्रेरित होकर मैंने इसके सिरपर डंडा मार दिया । मैं अपराधी हूँ । आप मुझे दण्ड दीजिये । राजेन्द्र! आपसे दण्ड मिल जानेपर मुझे नरकमें पड़नेका डर नहीं रहेगा ' ॥ ३०३ ॥
अथ रामेण सम्पृष्टाः सर्व एव सभासदः ॥ ३१ ॥
किं कार्यमस्य वै व्रत दण्डो वै कोऽस्य पात्यताम् ।
सम्यक्प्रणिहिते दण्डे प्रजा भवति रक्षिता ॥ ३२ ॥
तब श्रीरामने सभी सभासदोंसे पूछा - ' आपलोग बतावें, इसके लिये क्या करना चाहिये? इसे कौन - सा दण्ड दिया जाय? क्योंकि भलीभाँति दण्डका प्रयोग होनेपर प्रजा सुरक्षित रहती है ' ॥ ३१-३२ ॥