श्रीगणेशाय नमः।

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ — पृष्ठ 791–800

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 791–800

पृष्ठ 791

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २, पृष्ठ 791 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

१५७२ श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे षट्चत्वारिंशः सर्गः लक्ष्मणका सीताको रथपर बिठाकर उन्हें वन में छोड़ने के लिये ले जाना और गङ्गाजीके

ततो रजन्यां व्युष्टायां लक्ष्मणो दीनचेतनः ।

सुमन्त्रमत्रवीद् वाक्यं मुखेन परिशुष्यता ॥ १ ॥

तदनन्तर जब रात बीती और सबेरा हुआ, तब लक्ष्मणने मन - ही - मन दुखी हो सूखे मुखसे सुमन्त्र से कहा - ॥ १ ॥

सारथे तुरगाशीघ्रान् योजयस्व रथोत्तमे ।

स्वस्तोर्ण राजवचनात् सीतायाश्वासनं शुभम् ॥ २ ॥

सीता हि राजरचनादाश्रमं पुण्यकर्मणाम् ।

मया नेया महर्षीणां शीघ्रमानीयतां रथः ॥ ३ ॥

' सारथे! एक उत्तम रथमें शीघ्रगामी घोड़ोंको जोतो और उस रथमें सीताजी के लिये सुन्दर आसन बिछा दो । मैं महाराजकी आज्ञा से सीतादेवीको पुण्यकर्मा महर्षियोंके आश्रमपर

पहुँचा दूँगा । तुम शीघ्र रथ ले आओ ' ॥ २-३ ॥

सुमन्त्रस्तु तथेत्युक्त्वा युक्तं परमवाजिभिः ।

रथं सुरुचिरप्रख्यं स्वास्तीर्ण सुखशय्यया ॥ ४ ॥

तब सुमन्त्र ' बहुत अच्छा ' कहकर तुरंत ही उत्तम घोड़ों-से जुता हुआ एक सुन्दर रथ ले आये, जिसपर सुखद शय्यासे युक्त सुन्दर बिछावन बिछा हुआ था ॥ ४ ॥

आनीयोवाच सौमित्रिं मित्राणां मानवर्धनम् ।

रथोऽयं समनुप्राप्तो यत्कार्य क्रियतां प्रभो ॥ ५ ॥

उसे लाकर वे मित्रोंका मान बढ़ानेवाले सुमित्राकुमारसे बोले -- ' प्रभो! यह रथ आ गया । अब जो कुछ करना हो कीजिये ' ॥ ५ ॥

एवमुक्तः सुमन्त्रेण राजवेश्मनि लक्ष्मणः ।

प्रविश्य सीतामासाद्य व्याजहार नरर्षभः ॥ ६ ॥

सुमन्त्र के ऐसा कहने पर नरश्रेष्ठ लक्ष्मण राजमहल में गये और सीताजी के पास जाकर बोले-- ॥ ६ ॥

त्वया किलैष नृपतिर्वरं वै याचितः प्रभुः ।

नृपेण च प्रतिज्ञातमाज्ञप्तञ्चाश्रमं प्रति ॥ ७ ॥

' देवि! आपने महाराजसे मुनियोंके आश्रमोंपर जानेके लिये वर माँगा था और महाराजने आपको आश्रमपर पहुँचाने-के लिये प्रतिज्ञा की थी ॥ ७ ॥

गङ्गातीरे मया देवि ऋषीणामाश्रमाञ्शुभान् ।

शीघ्रं गत्वा तु वैदेहि शासनात् पार्थिवस्य नः ॥ ८ ॥

अरण्ये मुनिभिर्जुष्टे अवनेया भविष्यसि । ' देवि! विदेहनन्दिनि! उस बातचीत के अनुसार मैं राजाकी आज्ञासे शीघ्र ही गङ्गातटपर ऋषियोंके सुन्दर आश्रमोंतक चलूँगा और आपको मुनिजनसेवित वन में पहुँचाऊँगा ' । ८३ ॥ एवमुक्ता तु वैदेही लक्ष्मणेन महात्मना ॥ ९ ॥

प्रहर्षमतुलं लेभे गमनं चाप्यरोचयत् । तटपर पहुँचना महात्मा लक्ष्मण के ऐसा कहनेपर विदेहनन्दिनी अनुपम हर्ष प्राप्त हुआ । वे चलने को तैयार हो गयीं वासांसि च महार्हाणि रत्नानि विविधानि च ॥ गृहीत्वा तानि वैदेही गमनायोपचक्रमे इमानि मुनिपत्नीनां दास्याम्याभरणान्यहम् ॥ वस्त्राणि च महार्हाणि धनानि विविधानि च सीताको ॥ ९ ३ ॥ १० ॥

।

११ ॥

। बहुमूल्य वस्त्र और नाना प्रकारके रत्न लेकर वैदेही सीता • वनकी यात्रा के लिये उद्यत हो गयीं और लक्ष्मणसे बोलीं- ' ये सब बहुमूल्य वस्त्र, आभूषण और नाना प्रकारके रत्न - धन मैं मुनि पत्नियों को दूंगी ' ॥ १०-११३ ॥ सौमित्रिस्तु तथेत्युक्त्वा रथमारोप्य मैथिलीम् ॥ १२ ॥

प्रययौ शीघ्रतुरगं रामस्याज्ञामनुस्मरन् । लक्ष्मणने ' बहुत अच्छा ' कहकर मिथिलेशकुमारी सीताको रथपर चढ़ाया और श्रीरघुनाथजीकी आज्ञाको ध्यान में रखते हुए उस तेज घोड़ोंवाले रथपर चढ़कर वे वनकी ओर चल दिये ॥ १२३ ॥

अब्रवीच तदा सीता लक्ष्मणं लक्ष्मिवर्धनम् ॥ १३ ॥

अशुभानि बहून्येव पश्यामि रघुनन्दन ।

नयनं मे स्फुरत्यद्य गात्रोत्कम्पश्च जायते ॥ १४ ॥

उस समय सीताने लक्ष्मीवर्धन लक्ष्मण से कहा ' रघुनन्दन! मुझे बहुत - से अपशकुन दिखायी देते हैं । आज मेरी दायीं आँख फड़कती है और मेरे शरीर में कम्प हो रहा है ।१३-१४ ।

हृदयं चैव सौमित्रे अस्वस्थमिव लक्षये ।

औत्सुक्यं परमं चापि अधृतिश्च परा मम ॥ १५ ॥

" सुमित्रा कुमार! मैं अपने हृदयको अस्वस्थ सा देख रही हूँ । मनमें बड़ी उत्कण्ठा हो रही है और मेरी अधीरता पराकाष्ठाको पहुँची हुई है ॥ १५ ॥

शून्यामेव च पश्यामि पृथिवीं पृथुलोचन ।

अपि स्वस्ति भवेत् तस्य भ्रातुस्ते भ्रातृवत्सल ॥ १६ ॥

' विशाललोचन लक्ष्मण! मुझे पृथ्वी सूनी - सी ही दिखायी देती है । भ्रातृवत्सल! तुम्हारे भाई कुशलसे रहें ॥ १६ ॥

श्वभ्रूणां चैव मे वीर सर्वासामविशेषतः ।

पुरे जनपदे चैव कुशलं प्राणिनामपि ॥ १७ ॥

' वीर! मेरी सब सासुएँ समान रूपसे सानन्द रहें । नगर और जनपद में भी समस्त प्राणी सकुशल रहें ' ॥ १७ ॥

इत्यञ्जलिकृता सीता देवता अभ्ययाचत ।

लक्ष्मणोऽर्थ ततः श्रुत्वा शिरसा वन्द्य मैथिलीम् ॥ १८ ॥

शिवमित्यब्रवीद्धृष्टो हृदयेन विशुष्यता । ऐसा कहती हुई सीताने हाथ जोड़कर देवताओंसे प्रार्थना

पृष्ठ 792

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २, पृष्ठ 792 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

उत्तरकाण्डे षट्चत्वारिंशः सर्गः १५७३ की । सोता की बात सुनकर लक्ष्मणने सिर झुकाकर उन्हें प्रणाम किया और ऊपरसे प्रसन्न हो मुर्झाये हुए हृदयसे कहा—— ' सबका कल्याण हो ' ॥ १८३ ॥

ततो वासमुपागम्य गोमतीतीर आश्रमे ॥ १ ९ ॥ प्रभाते पुनरुत्थाय सौमित्रिः सूतमत्रवीत् । तदनन्तर गोमतीके तटपर पहुँचकर एक आश्रम में उन सबने रात बितायी । फिर प्रातःकाल उठकर सुमित्रा कुमारने सारथिसे कहा -- ॥ १ ९ ३ ॥ योजयख रथं शीघ्रमद्य भागीरथीजलम् ॥ २० ॥

शिरसा धारयिष्यामि त्रियम्बक इवौजसा । ' सारथे! जल्दी रथ जोतो । आज मैं भागीरथीके जलको उसी प्रकार सिरपर धारण करूँगा; जैसे भगवान् शङ्करने अपने तेजसे उसे मस्तक पर धारण किया था ॥ २०३ ॥

सोऽश्वान् विचारयित्वा तु रथे युक्तान् मनोजवान् ॥२१ ॥

आरोहस्वेति वैदेहीं सूतः प्राञ्जलिरब्रवीत् । सारथिने मनके समान वेगशाली चारों घोड़ोंको टहलाकर रथमें जोता और विदेहनन्दिनी सीतासे हाथ जोड़कर कहा-' देवि! रथपर आरूढ़ होइये ॥ २१३ ॥

सा तु सूतस्य वचनादारुरोह रथोत्तमम् ॥ २२ ॥

सीता सौमित्रिणा सार्धं सुमन्त्रेण च धीमता ।

आससाद विशालाक्षी गङ्गां पापविनाशिनीम् ॥ २३ ॥

सूतके कहने से देवी सीता उस उत्तम रथपर सवार हुई । इस प्रकार सुमित्राकुमार लक्ष्मण और बुद्धिमान् सुमन्त्रके साथ विशाललोचना सीतादेवी पापनाशिनी गङ्गाके तटपर जा पहुँचीं ॥ २२-२३ ॥

अथार्धदिवसे गत्वा भागीरथ्या जलाशयम् ।

निरीक्ष्य लक्ष्मणो दीनः प्ररुरोद महास्वनः ॥ २४ ॥

दोपहरके समय भागीरथीकी जलधारातक पहुँचकर लक्ष्मण उसकी ओर देखते हुए दुखी हो उच्चस्वरसे फूट - फूट-कर रोने लगे ॥ २४ ॥

सीता तु परमायत्ता दृष्ट्वा लक्ष्मणमातुरम् ।

उवाच वाक्यं धर्मज्ञा किमिदं रुद्यते त्वया ॥ २५ ॥

जाह्नवीतीरमासाद्य चिराभिलषितं मम ।

हर्षकाले किमर्थ मां विषादयसि लक्ष्मण ॥ २६ ॥

लक्ष्मणको शोकसे आतुर देख धर्मज्ञा सीता अत्यन्त चिन्तित हो उनसे बोलीं- ' लक्ष्मण! यह क्या? तुम रोते क्यों हो? गङ्गाके तटपर आकर तो मेरी चिरकालकी अभिलाषा इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये पूर्ण हुई है । इस हर्ष के समय तुम रोकर मुझे दुखी क्यों करते हो १ ॥ २५-२६ ॥

नित्यं त्वं रामपार्खेषु वर्तसे पुरुषर्षभ ।

कच्चिद् विनाकृतस्तेन द्विरात्रं शोकमागतः ॥ २७ ॥

' पुरुषप्रवर । श्रीराम के पास तो तुम सदा ही रहते हो । क्या दो दिन तक उनसे बिछुड़ जानेके कारण तुम इतने शोकाकुल हो गये हो? ॥ २७ ॥

ममापि दयितो रामो जीवितादपि लक्ष्मण ।

न चाहमेवं शोचामि मैवं त्वं बालिशो भव ॥ २८ ॥

' लक्ष्मण! श्रीराम तो मुझे भी अपने प्राणोंसे बढ़कर प्रिय हैं; परंतु मैं तो इस प्रकार शोक नहीं कर रही हूँ । तुम ऐसे नादान न बनो ॥ २८ ॥

तारयख च मां गङ्गां दर्शयस्व च तापसान् ।

ततो मुनिभ्यो वासांसि दास्याम्याभरणानि च ॥ २ ९ ॥

' मुझे गङ्गाके उस पार ले चलो और तपस्वी मुनियोंके दर्शन कराओ । मैं उन्हें वस्त्र और आभूषण दूँगी ॥ २ ९ ॥

ततः कृत्वा महर्षीणां यथार्हमभिवादनम् ।

तत्र चैकां निशामुष्य यास्यामस्तां पुरीं पुनः ॥ ३० ॥

' तत्पश्चात् उन महर्षियोंका यथायोग्य अभिवादन करके वहाँ एक रात ठहरकर हम पुनः अयोध्यापुरीको लौट चलेंगे ॥ ३० ॥

ममापि पद्मपत्राक्षं सिंहोरस्कं कृशोदरम् ।

त्वरते हि मनो द्रष्टुं रामं रमयतां वरम् ॥ ३१ ॥

' मेरा मन भी सिंहके समान वक्षःस्थल, कृश उदर और कमलके समान नेत्रवाले श्रीरामको, जो मनको रमानेवालों में सबसे श्रेष्ठ हैं, देखनेके लिये उतावला हो रहा है ' ॥ ३१ ॥

तस्यास्तद् वचनं श्रुत्वा प्रमृज्य नयने शुभे ।

नाविकानाह्वयामास लक्ष्मणः परवीरहा ।

इयं च सज्जा नौश्चेति दाशाः प्राञ्जलयोऽब्रुवन् ॥ ३२ ॥

सीताजीका यह वचन सुनकर शत्रुवीरों का संहार करनेवाले लक्ष्मणने अपनी दोनों सुन्दर आँखें पोंछ लीं और नाविकों को बुलाया । उन मल्लाहोंने हाथ जोड़कर कहा - " प्रभो! यह नाब तैयार है ' ॥ ३२ ॥

तितीर्षुर्लक्ष्मणो गङ्गां शुभां नावमुपारुहत् ।

गङ्गां संतारयामास लक्ष्मणस्तां समाहितः ॥ ३३ ॥

लक्ष्मण गङ्गाजीको पार करनेके लिये सीताजीके साथ उस सुन्दर नौकापर बैठे और बड़ी सावधानी के साथ उन्होंने सीताको गङ्गाजीके उस पार पहुँचाया ॥ ३३ ॥

उत्तरकाण्डे षट्चत्वारिंशः सर्गः ॥ ४६ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें छियालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ४६ ॥

पृष्ठ 793

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २, पृष्ठ 793 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

१५७४ श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे सप्तचत्वारिंशः सर्गः लक्ष्मणका सीताजीको नावसे गङ्गाजी के उस पार पहुँचाकर बड़े दुःखसे उन्हें उनके त्यागे जाने की बात बताना

अथ नावं सुविस्तीर्णा नैषादी राघवानुजः ।

आरुरोह समायुक्तां पूर्वमारोप्य मैथिलीम् ॥ १ ॥

मल्लाहोंकी वह नाव विस्तृत और सुसज्जित थी ।

लक्ष्मणने उसपर पहले सीताजीको चढ़ाया, फिर स्वयं चढ़े ॥

सुमन्त्रं चैव सरथं स्थीयतामिति लक्ष्मणः ।

उवाच शोकसंतप्तः प्रयाहीति च नाविकम् ॥ २ ॥

उन्होंने रथसहित सुमन्त्रको वहीं ठहरने के लिये कह दिया और शोक संतप्त होकर नाविकसे कहा – ' चलो ' ॥ २ ॥

ततस्तीरमुपागम्य भागीरथ्याः स लक्ष्मणः ।

उवाच मैथिलीं वाक्यं प्राञ्जलिर्वाष्पसंवृतः ॥ ३ ॥

तदनन्तर भागीरथी के उस तटपर पहुँचकर लक्ष्मणके नेत्रों में आँसू भर आये और उन्होंने मिथिलेशकुमारी सीतासे हाथ जोड़कर कहा - ॥ ३ ॥

हृतं मे महच्छत्यं यस्मादार्येण धीमता ।

अस्मिन्निमित्ते वैदेहि लोकस्य वचनीकृतः ॥ ४ ॥

' विदेहनन्दिनि! मेरे हृदय में सबसे बड़ा काँटा यही खटक रहा है कि आज रघुनाथजीने बुद्धिमान् होकर भी मुझे वह काम सौंपा है, जिसके कारण लोकमें मेरी बड़ी निन्दा होगी ॥

श्रेयो हि मरणं मेऽद्य मृत्युर्वा यत्परं भवेत् ।

न चास्मिन्नीदृशे कार्ये नियोज्यो लोकनिन्दिते ॥ ५ ॥

" इस दशामें यदि मुझे मृत्युके समान यन्त्रणा प्राप्त होती अथवा मेरी साक्षात् मृत्यु ही हो जाती तो वह मेरे लिये परम कल्याणकारक होती । परंतु इस लोकनिन्दित कार्य में मुझे लगाना उचित नहीं था ॥ ५ ॥

प्रसीद च न मे पापं कर्तुमर्हसि शोभने ।

इत्यञ्जलिकृतो भूमौ निपपात स लक्ष्मणः ॥ ६ ॥

' शोभने! आप प्रसन्न हों । मुझे कोई दोष न दें ऐसा कहकर हाथ जोड़े हुए लक्ष्मण पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ६ ॥

रुदन्तं प्राञ्जलिं दृष्ट्रा काङ्क्षन्तं मृत्युमात्मनः ।

मैथिली भृशसंविग्ना लक्ष्मणं वाक्यमब्रवीत् ॥ ७ ॥

लक्ष्मण हाथ जोड़कर रो रहे हैं और अपनी मृत्यु चाह रहे हैं, यह देखकर मिथिलेशकुमारी सीता अत्यन्त उद्विग्न हो उठीं और लक्ष्मणसे बोलीं ॥ ७ ॥

किमिदं नावगच्छामि ब्रूहि तत्त्वेन लक्ष्मण ।

पश्यामि त्वां न च स्वस्थमपि क्षेमं महीपतेः ॥ ८ ॥

' लक्ष्मण! यह क्या बात है? मैं कुछ समझ नहीं पाती हूँ । ठीक - ठीक बताओ । महाराज कुशलसे तो हैं न । मैं देखती हूँ तुम्हारा मन स्वस्थ नहीं है ॥ ८ ॥

शापितोऽसि नरेन्द्रेण यत् त्वं संतापमागतः ।

तद् ब्रूयाः संनिधौ मह्यमहमाशापयामि ते ॥ ९ ॥

" मैं महाराजकी शपथ दिलाकर पूछती हूँ, जिस बात से

तुम्हें इतना संताप हो रहा है, वह मेरे निकट सच - सच बताओ ।

मैं इसके लिये तुम्हें आज्ञा देती हूँ ' ॥ ९ ॥

वैदेह्या चोद्यमानस्तु लक्ष्मणो दीनचेतनः ।

अवाङ्मुखो वाष्पगलो वाक्यमेतदुवाच ह ॥ १० ॥

विदेहनन्दिनीके इस प्रकार प्रेरित करनेपर लक्ष्मण दुखी मनसे नीचे मुँह किये अश्रुगद्गद कण्ठद्वारा इस प्रकार बोले ॥

श्रुत्वा परिषदो मध्ये ह्यपवादं सुदारुणम् ।

पुरे जनपदे चैव त्वत्कृते जनकात्मजे ॥ ११ ॥

रामः संतप्तहृदयो मां निवेद्य गृहं गतः । ' जनकनन्दिनि! नगर और जनपदमें आपके विषय में जो अत्यन्त भयंकर अपवाद फैला हुआ है, उसे राजसभामें सुनकर श्रीरघुनाथजीका हृदय संतप्त हो उठा और वे मुझसे सब बातें बताकर महल में चले गये ॥ ११३ ॥

न तानि वचनीयानि मया देवि तवाग्रतः ॥ १२ ॥

यानि राज्ञा हृदि न्यस्तान्यमर्षात्पृष्ठतः कृतः । " देवि! राजा श्रीरामने जिन अपवादवचनोंको दुःख न सह सकने के कारण अपने हृदयमें रख लिया है, उन्हें मैं आपके सामने बता नहीं सकता । इसीलिये मैंने उनकी चर्चा

छोड़ दी है । १२३ ॥

सा त्वं त्यक्का नृपतिना निर्दोषा मम संनिधौ ॥ १३ ॥

पौरापवादभीतेन ग्राह्यं देवि न तेऽन्यथा ।

आश्रमान्तेषु च मया त्यक्तव्या त्वं भविष्यसि ॥ १४ ॥

राज्ञः शासनमादाय तथैव किल दौहृदम् । ' आप मेरे सामने निर्दोष सिद्ध हो चुकी हैं तो भी महाराज-ने लोकापवादसे डरकर आपको त्याग दिया है । देवि! आप कोई और बात न समझें । अब महाराजकी आज्ञा मानकर तथा आपकी भी ऐसी ही इच्छा समझकर मैं आश्रमोंके पास ले जाकर आपको वहीं छोड़ दूँगा ॥ १३-१४३ ॥ तदेतज्जाह्नवीतीरे ब्रह्मर्षीणां तपोवनम् ॥ १५ ॥

पुण्यं च रमणीयं च मा विषादं कृथाः शुभे । " शुभे! यह रहा गङ्गाजीके तटपर ब्रह्मर्षियोंका पवित्र

एवं रमणीय तपोवन । आप विषाद न करें ॥ १५३ ॥

राज्ञो दशरथस्यैव पितुर्मे मुनिपुङ्गवः ॥ १६ ॥

सखा परमको विप्रो वाल्मीकिः सुमहायशाः ।

पादच्छायामुपागम्य सुखमस्य महात्मनः ।

उपवासपरैकाग्रा वस त्वं जनकात्मजे ॥ १७ ॥

" यहाँ मेरे पिता राजा दशरथके घनिष्ठ मित्र महायशस्वी

पृष्ठ 794

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २, पृष्ठ 794 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

उत्तरकाण्डे अष्टचत्वारिंशः सर्गः १५७५ ब्रह्मर्षि मुनिवर वाल्मीकि रहते हैं, आप उन्हीं महात्मा के श्रेयस्ते परमं देवि तथा कृत्वा भविष्यति ॥ १८ ॥

चरणोंकी छायाका आश्रय ले यहाँ सुखपूर्वक रहें 1 । जनकात्मजे! ' देवि! आप सदा श्रीरघुनाथजीको हृदयमें रखकर पाति-आप यहाँ उपवासपरायण और एकाग्र हो निवास करें ॥१६-१७ ॥ व्रत्यका अवलम्बन करें । ऐसा करनेसे आपका परम कल्याण पतिव्रतात्वमास्थाय रामं कृत्वा सदा हृदि । होगा ' ॥ १८ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे सप्तचत्वारिंशः सर्गः ॥ ४७ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें सैंतालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ४७ ॥

अष्टचत्वारिंशः -HAARAA सर्गः सीताका दुःखपूर्ण वचन, श्रीरामके लिये उनका संदेश, लक्ष्मणका जाना और सीताका रोना

लक्ष्मणस्य वचः श्रुत्वा दारुणं जनकात्मजा ।

परं विषादमागम्य वैदेही निपपात ह ॥ १ ॥

लक्ष्मणजीका यह कठोर वचन सुनकर जनक किशोरी सीताको बड़ा दुःख हुआ । वे मूर्छित होकर पृथ्वीपर गिर पड़ीं ॥ १ ॥

सा मुहूर्तमिवासंज्ञा बाष्पपर्याकुलेक्षणा ।

लक्ष्मणं दीनया वाचा उवाच जनकात्मजा ॥ २ ॥

दो घड़ीतक उन्हें होश नहीं हुआ । उनके नेत्रोंसे आँसुओंकी अजस्र धारा बहती रही । फिर होशमें आनेपर जनककिशोरी दीन वाणीमें लक्ष्मणसे बोलीं ॥२ ॥

मामिकेयं तनुर्नूनं सृष्टा दुःखाय लक्ष्मण ।

धात्रा यस्यास्तथा मेऽद्य दुःखमूर्तिः प्रदृश्यते ॥ ३ ॥

‘ लक्ष्मण! निश्चय ही विधाताने मेरे शरीरको केवल दुःख भोगने के लिये ही रचा है । इसीलिये आज सारे दुःखोंका समूह मूर्तिमान् होकर मुझे दर्शन दे रहा है ॥ ३ ॥

किं नु पापं कृतं पूर्व को वा दारैर्वियोजितः ।

याहं शुद्धसमाचारा त्यक्ता नृपतिना सती ॥ ४ ॥

“ मैंने पूर्वजन्ममें कौन - सा ऐसा पाप किया था अथवा किसका स्त्रीसे विछोह कराया था, जो शुद्ध आचरणवाली होनेपर भी महाराजने मुझे त्याग दिया है ॥ ४ ॥

पुरामाश्रमे वा रामपादानुवर्तिनी ।

अनुरुध्यापि सौमित्रे दुःखे च परिवर्तिनी ॥ ५ ॥

' सुमित्रानन्दन! पहले मैंने वनवासके दुःखमें पड़कर भी उसे सहकर श्रीरामके चरणोंका अनुसरण करते हुए आश्रममें रहना पसंद किया था ॥ ५ ॥

सा कथं ह्याश्रमे सौम्य वत्स्यामि विजनीकृता ।

आख्यास्यामि च कस्याहं दुःखं दुःखपरायणा ॥ ६ ॥

" किंतु सौम्य! अब मैं अकेली प्रियजनोंसे रहित हो किस तरह आश्रममें निवास करूँगी? और दुःखमें पड़नेपर किससे अपना दुःख कहूँगी ॥ ६ ॥

किं नु वक्ष्यामि मुनिषु कर्म चासत्कृतं प्रभो ।

कस्मिन् वा कारणे त्यक्ता राघवेण महात्मना ॥ ७ ॥

" प्रभो! यदि मुनिजन मुझसे पूछेंगे कि महात्मा श्रीरघुनाथ-जीने किस अपराधपर तुम्हें त्याग दिया है तो मैं उन्हें अपना कौन - सा अपराध बताऊँगी ॥ ७ ॥

न खल्वद्यैव सौमित्रे जीवितं जाह्नवीजले ।

त्यजेयं राजवंशस्तु भर्तुर्मे परिहास्यते ॥ ८ ॥

' सुमित्राकुमार! मैं अपने जीवनको अभी गङ्गाजीके जलमें विसर्जन कर देती; किंतु इस समय ऐसा अभी नहीं कर सकूँगी; क्योंकि ऐसा करने से मेरे पतिदेवका राजवंश नष्ट हो जायगा ॥ ८ ॥

यथाज्ञं कुरु सौमित्रे त्यज्य मां दुःखभागिनीम् ।

निदेशे स्थीयतां राज्ञः शृणु चेदं वचो मम ॥ ९ ॥

' किंतु सुमित्रानन्दन! तुम तो वही करो, जैसी महाराजने तुम्हें आज्ञा दी है । तुम मुझ दुखियाको यहाँ छोड़कर महाराजकी आज्ञाके पालनमें ही स्थिर रहो और मेरी यह बात सुनो ॥ ९ ॥

श्वश्रूणामविशेषेण प्राञ्जलिप्रग्रहेण च ।

शिरसा वन्द्य चरणौ कुशलं ब्रूहि पार्थिवम् ॥ १० ॥

' मेरी सब सासुओंको समानरूपसे हाथ जोड़कर मेरी ओरसे उनके चरणोंमें प्रणाम करना । साथ ही महाराजके भी चरणोंमें मस्तक नवाकर मेरी ओरसे उनकी कुशल पूछना ॥

शिरसाभिनतो ब्रूयाः सर्वासामेव लक्ष्मण ।

वक्तव्यश्चापि नृपतिर्धर्मेषु सुसमाहितः ॥ ११ ॥

' लक्ष्मण! तुम अन्तःपुरकी सभी वन्दनीया स्त्रियोंको मेरी ओरसे प्रणाम करके मेरा समाचार उन्हें सुना देना तथा जो सदा धर्मं - पालन के लिये सावधान रहते हैं, उन महाराजको भी मेरा यह संदेश सुना देना ॥ ११ ॥

जानासि च यथा शुद्धा सीता तत्त्वेन राघव ।

भक्त्या च परया युक्ता हिता च तव नित्यशः ॥ १२ ॥

पृष्ठ 795

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २, पृष्ठ 795 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

१५७६ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे. ‘ रघुनन्दन । वास्तवमें तो आप जानते ही कि सीता शुद्धचरित्रा है । सर्वदा ही आपके हितमें तत्पर रहती है और आपके प्रति परम प्रेमभक्ति रखनेवाली है ॥ १२ ॥

अहं त्यक्ता च ते वीर अयशोभीरुणा जने ।

यच्च ते वचनीयं स्यादपवादः समुत्थितः ॥ १३ ॥

मया च परिहर्तव्यं त्वं हि मे परमा गतिः । ' वीर! आपने अपयशसे डरकर ही मुझे त्यागा है; अतः लोगोंमें आपकी जो निन्दा हो रही है अथवा मेरे कारण जो अपवाद फैल रहा है, उसे दूर करना मेरा भी कर्तव्य है; क्योंकि मेरे परम आश्रय आप ही हैं ॥ १३३ ॥

वक्तव्यश्चैव नृपतिर्धर्मेण सुसमाहितः ॥ १४ ॥

यथा भ्रातृषु वर्तेथास्तथा पौरेषु नित्यदा ।

परमो ह्येष धर्मस्ते तस्मात् कीर्तिरनुत्तमा ॥ १५ ॥

' लक्ष्मण! तुम महाराजसे कहना कि आप धर्मपूर्वक बड़ी सावधानीसे रहकर पुरवासियोंके साथ वैसा ही बर्ताव करें, जैसा अपने भाइयोंके साथ करते हैं । यही आपका परम धर्म है और इसीसे आपको परम उत्तम यशकी प्राप्ति हो सकती है ॥ १४-१५ ॥

यत्तु पौरजने राजन धर्मेण समवाप्नुयात् ।

अहं तु नानुशोचामि स्वशरीरं नरर्षभ ॥ १६ ॥

' राजन्! पुरवासियोंके प्रति धर्मानुकूल आचरण करनेसे जो पुण्य प्राप्त होगा, वही आपके लिये उत्तम धर्म और कीर्ति है । पुरुषोत्तम! मुझे अपने शरीर के लिये कुछ भी चिन्ता नहीं है ॥ १६ ॥

यथापवादं पौराणां तथैव रघुनन्दन ।

पतिर्हि देवता नार्याः पतिर्बन्धुः पतिर्गुरुः ॥ १७ ॥

प्राणैरपि प्रियं तस्माद् भर्तुः कार्ये विशेषतः । " रघुनन्दन! जिस तरह पुरवासियों के अपवादसे बचकर रहा जा सके, उसी तरह आप रहें । स्त्रीके लिये तो पति ही देवता है, पति ही बन्धु है और पति ही गुरु है । इसलिये उसे प्राणोंकी बाजी लगाकर भी विशेषरूपसे पतिका प्रिय करना चाहिये ॥ १७३ ॥

इति मद्वचनाद् रामो वक्तव्यो मम संग्रहः ॥ १८ ॥

निरीक्ष्य माद्य गच्छ त्वमृतुकालातिवर्तिनीम् । ' मेरी ओरसे सारी बातें तुम श्रीरघुनाथजीसे कहना और आज तुम भी मुझे देख जाओ । मैं इस समय ऋतुकालका उल्लङ्घन करके गर्भवती हो चुकी हूँ ' ॥ १८३ ॥

एवं ब्रुवन्त्यां सीतायां लक्ष्मणो दीनचेतनः ॥ १ ९ ॥ शिरसा वन्द्य धरणीं व्याहर्तुं न शशाक ह । सीताके इस प्रकार कहने पर लक्ष्मणका मन बहुत दुखी हो गया । उन्होंने धरतीपर माथा टेककर प्रणाम किया । उस समय उनके मुखसे कोई भी बात नहीं निकल सकी ॥ १ ९ ३ ॥ प्रदक्षिणं च तां कृत्वा रुदन्नेव महास्वनः ॥ २० ॥

ध्यात्वा मुहूर्त तामाह किं मां वक्ष्यसि शोभने । उन्होंने जोर - जोरसे रोते हुए ही सीता माताकी परिक्रमा की और दो घड़ीतक सोच विचारकर उनसे कहा- ' शोभने! आप यह मुझसे क्या कह रही हैं? ॥ २०३ ॥

दृष्टपूर्व न ते रूपं पादौ दृष्टौ तवानघे ॥ २१ ॥

कथमत्र हि पश्यामि रामेण रहितां वने । ' निष्पाप पतिव्रते! मैंने पहले भी आपका सम्पूर्ण रूप कभी नहीं देखा है । केवल आपके चरणोंके ही दर्शन किये हैं । फिर आज यहाँ वनके भीतर श्रीरामचन्द्रजीकी अनुपस्थिति-में मैं आपकी ओर कैसे देख सकता हूँ ' ॥ २१३ ॥

इत्युक्त्वा तां नमस्कृत्य पुनर्नावमुपारुहत् ॥ २२ ॥

आरुरोह पुनर्नावं नाविकं चाभ्यचोदयत् । यह कहकर उन्होंने सीताजीको पुनः प्रणाम किया और फिर वे नावपर चढ़ गये । नावपर चढ़कर उन्होंने मल्लाहको उसे चलाने की आज्ञा दी ॥ २२३ ॥

स गत्वा चोत्तरं तीरं शोकभारसमन्वितः ॥ २३ ॥

सम्मूढ इव दुःखेन रथमध्यारुहद् द्रुतम् । शोक के भारसे दबे हुए लक्ष्मण गङ्गाजीके उत्तरी तटपर पहुँचकर दुःख के कारण अचेत से हो गये और उसी अवस्था-में जल्दी से रथपर चढ़ गये ॥ २३३ ॥

मुहुर्मुहुः परावृत्य दृष्ट्वा सीतामनाथवत् ॥ २४ ॥

चेष्टन्तीं परतीरस्थां लक्ष्मणः प्रययावथ । सीता गङ्गाजीके दूसरे तटपर अनाथकी तरह रोती हुई धरतीपर लोट रही थीं । लक्ष्मण बार - बार ओर देखते हुए चल दिये ॥ २४३ ॥

दूरस्थं रथमालोक्य लक्ष्मणं च निरीक्ष्यमाणां तूद्विग्नां सीतां शोकः रथ और लक्ष्मण क्रमशः दूर होते ओर बारंबार देखकर उद्विग्न हो उठीं ही उनपर गहरा शोक छा गया ॥ २५ ॥

मुँह घुमाकर उनकी

मुहुर्मुहुः ।

समाविशत् ॥२५ ॥

गये । सीता उनकी । उनके अदृश्य होते सा दुःखभारावनता यशखिनी यशोधरा नाथमपश्यती सती । रुरोद सा बर्हिणनादिते वने महाखनं दुःखपरायणा सती ॥ २६ ॥

अब उन्हें कोई भी अपना रक्षक नहीं दिखायी दिया । अतः यशको धारण करनेवाली वे यशस्विनी सती सीता दुःखके भारी भारसे दबकर चिन्तामग्न हो मयूरोंके कलनादसे गूँजते हुए उस वन में जोर - जोर से रोने लगीं ॥ २६ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डेऽष्टचत्वारिंशः सर्गः ॥ ४८ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्धरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें अड़तालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ४८ ॥

पृष्ठ 796

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २, पृष्ठ 796 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

। हैं रहे लौट लक्ष्मण छोड़कर वनमें घोर जानकीजीको

पृष्ठ 797

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २, पृष्ठ 797 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

इस पृष्ठ पर कोई पाठ नहीं मिला — ऊपर मूल चित्र देखें।

पृष्ठ 798

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २, पृष्ठ 798 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

उत्तरकाण्डे एकोनपञ्चाशः सर्गः १५७७ एकोनपञ्चाशः सर्गः मुनिकुमारोंसे समाचार पाकर वाल्मीकिका सीता के पास आ उन्हें सान्त्वना देना और आश्रम में लिवा ले जाना सीतां तु रुदतीं दृष्ट्वा ते तत्र मुनिदारकाः । ' भगवन्! ये साध्वी देवी अपने लिये कोई रक्षक ढूँढ़ प्राद्रवन् यत्र भगवानास्ते वाल्मीकिरुग्रधीः ॥ १ ॥ रही हैं । अतः आप इनकी रक्षा करें । उन मुनिकुमारोंकी

जहाँ सीता रो रही थीं, वहाँसे थोड़ी ही दूरपर ऋषियों- यह बात सुनकर धर्मेश महर्षिने बुद्धिसे निश्चित करके असली के कुछ बालक थे । वे उन्हें रोते देख अपने आश्रमकी ओर बातको जान लिया; क्योंकि उन्हें तपस्याद्वारा दिव्य दृष्टि प्राप्त दौड़े, जहाँ उग्र तपस्या में मन लगानेवाले भगवान् वाल्मीकि मुनि विराजमान थे ॥ १ ॥

अभिवाद्य मुनेः पादौ मुनिपुत्रा महर्षये ।

सर्वे निवेदयामासुस्तस्यास्तु रुदितस्वनम् ॥ २ ॥

उन सब मुनिकुमारोंने महर्षिके चरणोंमें अभिवादन करके उनसे सीताजीके रोनेका समाचार सुनाया ॥ २ ॥

अदृष्टपूर्वा भगवन् कस्याप्येषा महात्मनः ।

पत्नी श्रीरिव सम्मोहाद् विरौति विकृतानना ॥ ३ ॥

वे बोले – ' भगवन्! गङ्गातटपर किन्हीं महात्मा नरेशकी पत्नी हैं, जो साक्षात् लक्ष्मी के समान जान पड़ती हैं । इन्हें हमलोगोंने पहले कभी नहीं देखा था । वे मोहके कारण विकृतमुख होकर रो रही हैं ॥ ३ ॥

भगवन् साधु पश्येस्त्वं देवतामिव खाच्च्युताम् ।

नद्यास्तु तीरे भगवन् वरस्त्री कापि दुःखिता ॥ ४ ॥

' भगवन्! आप स्वयं चलकर अच्छी तरह देख लें । वे आकाशसे उतरी हुई किसी देवी - सी दिखायी देती हैं । प्रभो! गङ्गाजीके तटपर जो वे कोई श्रेष्ठ सुन्दरी स्त्री बैठी हैं, बहुत दुखी हैं ॥ ४ ॥

दृष्टास्माभिः प्ररुदिता दृढं शोकपरायणा ।

अनर्हा दुःखशोकाभ्यामेका दीना अनाथवत् ॥ ५ ॥

' हमने अपनी आँखों देखा है, वे बड़े जोर - जोर से रोती हैं और गहरे शोकमें डूबी हुईं हैं । वे दुःख और शोक भोगने के योग्य नहीं हैं । अकेली हैं, दीन हैं और अनाथकी तरह बिलख रही हैं ॥ ५ ॥

न होनां मानुषीं विद्मः सत्क्रियास्याः प्रयुज्यताम्

।

आश्रमस्याविदूरे च त्वामियं शरणं गता ॥ ६ ॥

‘ हमारी समझमें ये मानवी स्त्री नहीं हैं । आपको इनका सत्कार करना चाहिये । इस आश्रम से थोड़ी ही दूरपर होने के कारण ये वास्तवमें आपकी शरण में आयी हैं ॥ ६ ॥

त्रातारमिच्छते साध्वी भगवंस्त्रातुमर्हसि ।

तेषां तु वचनं श्रुत्वा बुद्ध्या निश्चित्य धर्मवित् ॥ ७ ॥

तपसा लब्धचक्षुष्मान् प्राद्रवद् यत्र मैथिली । वा ० रा ० ५.११.१८-थी । जानकर वे उस स्थानपर दौड़े हुए आये, जहाँ मिथिलेश-कुमारी सीता विराजमान थीं ॥ ७३ ॥

तं प्रयान्तमभिप्रेत्य शिष्या होनं महामतिम् ॥ ८ ॥

तं तु देशमभिप्रेत्य किंचित् पद्भ्यां महामतिः ।

अर्घ्यमादाय रुचिरं जाह्नवीतीरमागमत् ।

ददर्श राघवस्येष्टां सीतां पत्नीमनाथवत् ॥ ९ ॥

उन परम बुद्धिमान् महर्षिको जाते देख उनके शिष्य भी उनके साथ हो लिये । कुछ पैदल चलकर वे महामति महर्षि सुन्दर अर्ध्य लिये गङ्गातटवर्ती उस स्थानपर आये । वहाँ आकर उन्होंने श्रीरघुनाथजी की प्रिय पत्नी सीताको अनाथकी-सी दशामें देखा ॥ ८ - ९ ॥

तां सीतां शोकभारात वाल्मीकिर्मुनिपुङ्गवः ।

उवाच मधुरां वाणीं ह्रादयन्निव तेजसा ॥ १० ॥

शोकके भारसे पीड़ित हुई सीताको अपने तेजसे आह्लादित-सी करते हुए मुनिवर वाल्मीकि मधुर वाणीमें बोले –॥१० ॥

स्नुषा दशरथस्य त्वं रामस्य महिषी प्रिया ।

जनकस्य सुता राज्ञः स्वागतं पतिव्रते ॥ ११ ॥

" पतिव्रते! तुम राजा दशरथकी पुत्रवधू, महाराज श्रीरामकी प्यारी पटरानी और मिथिलाके राजा जनककी पुत्री हो । तुम्हारा स्वागत है ॥ ११ ॥

आयान्ती चासि विज्ञाता मया धर्मसमाधिना ।

कारणं चैव सर्व मे हृदयेनोपलक्षितम् ॥ १२ ॥

' जब तुम यहाँ आ रही थीं, तभी अपनी धर्मसमाधिके द्वारा मुझे इसका पता लग गया था । तुम्हारे परित्यागका जो सारा कारण है, उसे मैंने अपने मनसे ही जान लिया है ॥

तव चैव महाभागे विदितं मम तत्त्वतः ।

सर्वे च विदितं मह्यं त्रैलोक्ये यद्धि वर्तते ॥ १३ ॥

' महाभागे! तुम्हारा सारा वृत्तान्त मैंने ठीक - ठीक जान लिया है । त्रिलोकीमें जो कुछ हो रहा है, वह सब मुझे विदित है ॥ १३ ॥

अपापां वेद्मि सीते ते तपोलब्धेन चक्षुषा ।

विस्रब्धा भव वैदेहि साम्प्रतं मयि वर्तसे ॥ १४ ॥

पृष्ठ 799

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २, पृष्ठ 799 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

१५७८ श्रीमवाल्मीकीयरामायणे ' सीते! तपस्याद्वारा प्राप्त हुई दिव्य दृष्टिसे जानता हूँ कि तुम निष्पाप हो । अतः विदेहनन्दिनि! अब निश्चिन्त हो जाओ । इस समय तुम मेरे पास हो ॥ १४ ॥

आश्रमस्याविदूरे मे तापस्य स्तपसि स्थिताः ।

तास्त्वां वत्से यथा वत्सं पालयिष्यन्ति नित्यशः ॥ १५ ॥

" बेटी! मेरे आश्रमके पास ही कुछ तापसी स्त्रियाँ रहती. हैं, जो तपस्यामें संलग्न हैं । वे अपनी बच्ची के समान सदा तुम्हारा पालन करेंगी ॥ १५ ॥

इदमर्घ्य प्रतीच्छ त्वं विस्रब्धा विगतज्वरा ।

यथा स्वगृहमभ्येत्य विषादं चैव मा कृथाः ॥ १६ ॥

" यह मेरा दिया हुआ अर्ध्य ग्रहण करो और निश्चिन्त एवं निर्भय हो जाओ । अपने ही घरमें आ गयी हो, ऐसा समझकर विषाद न करो ' ॥ १६ ॥

श्रुत्वा तु भाषितं सीता मुनेः परममद्भुतम् ।

शिरसा वन्द्य चरणौ तथेत्याह कृताञ्जलिः ॥ १७ ॥

महर्षिका यह अत्यन्त अद्भुत भाषण सुनकर सीताने चरणोंमें मस्तक झुकाकर प्रणाम किया और हाथ जोड़ -उनके कर कहा - ' जो आज्ञा ' ॥ १७ ॥

तं प्रयान्तं मुनिं सीता प्राञ्जलिः पृष्ठतोऽन्वगात् ।

तं दृष्ट्वा मुनिमायान्तं वैदेह्या मुनिपत्नयः ।

उपाजग्मुर्मुदा युक्ता वचनं चेदमब्रुवन् ॥ १८ ॥

तब मुनि आगे - आगे चले और सीता हाथ जोड़े उनके पीछे हो लीं । विदेहनन्दिनीके साथ महर्षिको आते देख

स्वागतं ते मुनिश्रेष्ठ चिरस्यागमनं च ते ।

अभिवादयामस्त्वां सर्वा उच्यतां किं च कुर्महे ॥ १ ९ ॥

' मुनिश्रेष्ठ! आपका स्वागत है । बहुत दिनोंके बाद यहाँ आपका शुभागमन हुआ है । हम सभी आपको अभिवादन करती हैं । बताइये, हम आपकी क्या सेवा करें ' ॥ १ ९ ॥

तासां तद् वचनं श्रुत्वा वाल्मीकिरिदमब्रवीत् ।

सीतेयं समनुप्राप्ता पत्नी रामस्य धीमतः ॥ २० ॥

उनका यह वचन सुनकर वाल्मीकिजी बोले – ' ये परम बुद्धिमान् राजा श्रीरामकी धर्मपत्नी सीता यहाँ आयी हैं ।

स्नुषा दशरथस्यैषा जनकस्य सुता सती ।

अपापा पतिना त्यक्ता परिपाल्या मया सदा ॥ २१ ॥

' सती सीता राजा दशरथकी पुत्रवधू और जनककी पुत्री

हैं । निष्पाप होनेपर भी पतिने इनका परित्याग कर दिया है ।

अतः मुझे ही इनका सदा लालन - पालन करना है ॥ २१ ॥

इमां भवत्यः पश्यन्तु स्नेहेन परमेण हि ।

वाक्याच्च पूज्या वोऽस्तु विशेषतः ॥ २२ ॥

गौरवान्मम ' अतः आप सब लोग इनपर अत्यन्त स्नेह- दृष्टि रक्खें । मेरे कहने से तथा अपने ही गौरवसे भी ये आपकी विशेष आदरणीया हैं ' ॥ २२ ॥

मुहुर्मुहुश्च वैदेहीं परिदाय महायशाः ।

स्वमाश्रमं शिष्यवृतः पुनरायान्महातपाः ॥ २३ ॥

इस प्रकार बारंबार सीताजीको मुनिपत्नियोंके हाथमें मुनि पत्नियाँ उनके पास आयीं और बड़ी प्रसन्नता के साथ सौंपकर महायशस्वी एवं महातपस्वी वाल्मीकिजी शिष्योंके साथ इस प्रकार बोलीं ॥ १८ ॥ फिर अपने आश्रमपर लौट आये ॥ २३ ॥

श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे एकोनपञ्चाशः सर्गः ॥ ४ ९ ॥ इत्यार्षे आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें उनचासवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ४ ९ ॥ इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित 7614 पञ्चाशः सर्गः लक्ष्मण और सुमन्त्रकी बातचीत सम्प्रवेशिताम् । अभीसे सीताजीके विरहजनित संतापका कष्ट भोगना पड़ मैथिली सीतामाश्रमे घोरं लक्ष्मणो दीनचेतनः ॥ १ ॥ रहा है ॥ २ ॥

संतापमगद् आश्रम में प्रवेश हो ततो दुःखतरं किं नु राघवस्य भविष्यति ।

मिथिलेशकुमारी सीताका मुनिके विसृज्य जनकात्मजाम् ॥ ३ ॥

गया, यह देखकर लक्ष्मण मन - ही - मन बहुत दुखी हुए । उन्हें पत्नीं ' भला शुद्धसमाचारां , श्रीरघुनाथजीको इससे बढ़कर दुःख क्या होगा घोर संताप हुआ ॥ १ ॥ कि उन्हें अपनी पवित्र आचरणवाली धर्मपत्नी जनककिशोरी

अब्रवीच्च महातेजाः सुमन्त्रं मन्त्रसारथिम् । सीताका परित्याग करना पड़ा ॥ ३ ॥

सीता संतापजं दुःखं पश्य रामस्य सारथे ॥ २ ॥ व्यक्तं दैवादहं मन्ये राघवस्य विनाभवम् ।

महातेजस्वी लक्ष्मण मन्त्रणामें सहायता देनेवाले वैदेह्या सारथे नित्यं दैवं हि दुरतिक्रमम् ॥ ४ ॥

उस समय बोले - ' सूत! देखो तो सही, श्रीरामको " सारथे! रघुनाथजीको सीताका जो यह नित्य वियोग सारथि सुमन्त्रसे

पृष्ठ 800

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २, पृष्ठ 800 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

उत्तरकाण्डे पञ्चाशः सर्गः १५७ ९ प्राप्त हुआ है, इसमें मैं दैवको ही कारण मानता हूँ; क्योंकि दैवका विधान दुर्लङ्घय होता है ॥ ४ ॥

यो हि देवान् सगन्धर्वानसुरान् सह राक्षसैः ।

निहन्याद् राघवः क्रुद्धः स दैवं पर्युपासते ॥ ५ ॥

' जो श्रीरघुनाथजी कुपित होनेपर देवताओं, गन्धर्वों तथा राक्षसोंसहित असुरोंका भी संहार कर सकते हैं, वे ही दैवकी उपासना कर रहे हैं ( उसका निवारण नहीं कर पा रहे हैं ) ॥

पुरा रामः पितुर्वाक्याद् दण्डके विजने वने ।

उषित्वा नव वर्षाणि पञ्च चैव महाबने ॥ ६ ॥

“ पहले श्रीरामचन्द्रजीको पिताके कहनेसे चौदह वर्षोंतक विशाल एवं निर्जन दण्डकवन में रहना पड़ा है ॥ ६ ॥

ततो दुःखतरं भूयः सीताया विप्रवासनम् ।

पौराणां वचनं श्रुत्वा नृशंसं प्रतिभाति मे ॥ ७ ॥

' अब उससे भी बढ़कर दुःखकी बात यह हुई कि उन्हें सीताजीको निर्वासित करना पड़ा । परंतु पुरवासियोंकी बात सुनकर ऐसा कर बैठना मुझे अत्यन्त निर्दयतापूर्ण कर्म जान पड़ता है ॥ ७ ॥

को नु धर्माश्रयः सूत कर्मण्यस्मिन् यशोहरे ।

मैथिलीं समनुप्राप्तः पौरेहींनार्थवादिभिः ॥ ८ ॥

‘ सूत! सीताजीके विषयमें अन्यायपूर्ण बात कहनेवाले इन पुरवासियोंके कारण ऐसे कीर्तिनाशक कर्ममें प्रवृत्त होकर श्रीरामचन्द्रजीने किस धर्मराशिका उपार्जन कर लिया है? ॥

एता वाचो बहुविधाः श्रुत्वा लक्ष्मणभाषिताः ।

सुमन्त्रः श्रद्धया प्राज्ञो वाक्यमेतदुवाच ह ॥ ९ ॥

लक्ष्मणकी कही हुई इन अनेक प्रकारकी बातों को सुनकर बुद्धिमान् सुमन्त्रने श्रद्धापूर्वक ये वचन कहे ॥ ९ ॥

न संतापस्त्वया कार्यः सौमित्रे मैथिलीं प्रति ।

दृष्टमेतत् पुरा विप्रैः पितुस्ते लक्ष्मणाग्रतः ॥ १० ॥

' सुमित्रानन्दन! मिथिलेशकुमारी सीता के विषय में आपको संतप्त नहीं होना चाहिये । लक्ष्मण! यह बात ब्राह्मणोंने आपके पिताजी के सामने ही जान ली थी ॥ १० ॥

भविष्यति दृढं रामो दुःखप्रायो विसौख्यभाक् ।

प्राप्स्यते च महाबाहुर्विप्रयोगं प्रियैर्द्रुतम् ॥ ११ ॥

‘ उन दिनों दुर्वासाजीने कहा था कि ' श्रीराम निश्चय ही

अधिक दुःख उठायेंगे । प्रायः उनका सौख्य छिन जायगा ।

महाबाहु श्रीरामको शीघ्र ही अपने प्रियजनोंसे वियोग प्राप्त होगा ॥

त्वां चैव मैथिलीं चैव शत्रुघ्नभरतौ तथा ।

सत्यजिष्यति धर्मात्मा कालेन महता महान् ॥ १२ ॥

' सुमित्राकुमार! धर्मात्मा महापुरुष श्रीराम दीर्घकाल बीतते - बीतते तुमको, मिथिलेशकुमारीको तथा भरत और शत्रुघ्नको भी त्याग देंगे ॥ १२ ॥

इदं त्वयि न वक्तव्यं सौमित्रे भरतेऽपि वा ।

राज्ञा वो व्याहृतं वाक्यं दुर्वासा यदुवाच ह ॥ १३ ॥

“ दुर्वासाने जो बात कही थी, उसे महाराज दशरथने तुमसे, शत्रुघ्नसे और भरतसे भी कहनेकी मनाही कर दी थी ॥

महाजनसमीपे च मम चैव नरर्षभ ।

ऋषिणा व्याहृतं वाक्यं वसिष्ठस्य च संनिधौ ॥ १४ ॥

' नरश्रेष्ठ! दुर्वासामुनिने बहुत बड़े जनसमुदायके समीप मेरे समक्ष तथा महर्षि वसिष्ठके निकट वह बात कही थी ।

ऋषेस्तु वचनं श्रुत्वा मामाह पुरुषर्षभः ।

सूत न क्वचिदेवं ते वक्तव्यं जनसंनिधौ ॥ १५ ॥

" दुर्वासा मुनिकी वह बात सुनकर पुरुषप्रवर दशरथने मुझसे कहा था कि ' सूत! तुम्हें दूसरे लोगोंके सामने इस तरहकी बात नहीं कहनी चाहिये ' ॥ १५ ॥

तस्याहं लोकपालस्य वाक्यं तत्सुसमाहितः ।

नैव जात्वनृतं कुर्यामिति मे सौम्य दर्शनम् ॥ १६ ॥

‘ सौम्य! उन लोकपालक दशरथके उस वाक्यको मैं झूठा न करूँ ' यह मेरा संकल्प है । इसके लिये मैं सदा सावधान रहता हूँ ॥ १६ ॥

सर्वथैव न वक्तव्यं मया सौम्य तवाग्रतः ।

यदि ते श्रवणे श्रद्धा श्रूयतां रघुनन्दन ॥ १७ ॥

‘ सौम्य रघुनन्दन! यद्यपि यह बात मुझे आपके सामने सर्वथा ही नहीं कहनी चाहिये, तथापि यदि आपके मन में यह सुनने-के लिये श्रद्धा ( उत्सुकता ) हो तो सुनिये ॥ १७ ॥

यद्यप्यहं नरेन्द्रेण रहस्यं श्रावितं पुरा ।

तथाप्युदाहरिष्यामि दैवं हि दुरतिक्रमम् ॥ १८ ॥

येनेदमीदृशं प्राप्तं दुःखं शोकसमन्वितम् ।

न त्वया भरतस्याग्रे शत्रुघ्नस्यापि संनिधौ ॥ १ ९ ॥

‘ यद्यपि पूर्वकालमें महाराजने इस रहस्य को दूसरोंपर प्रकट न करनेके लिये आदेश दिया था, तथापि आज वह बात कहूँगा । दैवके विधानको लाँघना बहुत कठिन है; जिससे यह दुःख और शोक प्राप्त हुआ है । भैया! तुम्हें भी भरत और शत्रुघ्न के सामने यह बात नहीं कहनी चाहिये ' ॥ १८-१९ ॥

तच्छ्रुत्वा भाषितं तस्य गम्भीरार्थपदं महत् ।

तथ्यं ब्रूहीति सौमित्रिः सूतं तं वाक्यमब्रवीत् ॥ २० ॥

सुमन्त्रका यह गम्भीर भाषण सुनकर सुमित्राकुमार लक्ष्मणने कहा -- ' सुमन्त्रजी! जो सच्ची बात हो, उसे आप अवश्य कहिये ' || २० ॥ इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे पञ्चाशः सर्गः ॥ ५० ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें पचासवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ५० ॥