श्रीगणेशाय नमः।

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ — पृष्ठ 821–830

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 821–830

पृष्ठ 821

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१५ ९ ८ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे

भृग्वाङ्गिरसकुत्साद्या वसिष्ठश्च सकाश्यपः ।

धर्मपाठक मुख्याश्च सचिवा नैगमास्तथा ॥ ३३ ॥

एते चान्ये च बहवः पण्डितास्तत्र संगताः ।

अवध्यो ब्राह्मणो दण्डैरिति शास्त्रविदो विदुः ॥ ३४ ॥

ब्रुवते राघवं सर्वे राजधर्मेषु निष्ठिताः । उस सभा में भृगु, आङ्गिरस, कुत्स, वसिष्ठ और काश्यप आदि मुनि थे 1 । धर्मशास्त्रोंका पाठ करनेवाले मुख्य - मुख्य विद्वान् उपस्थित थे । मन्त्री और महाजन मौजूद थे — ये तथा और बहुत - से पण्डित वहाँ एकत्र हुए थे । राजधर्मों के ज्ञान-में परिनिष्ठित वे सभी विद्वान् श्रीरघुनाथजीसे बोले – ' भगवन्! ब्राह्मण दण्डद्वारा अवध्य है, उसे शारीरिक दण्ड नहीं मिलना चाहिये, यही समस्त शास्त्रज्ञोंका मत है ' ॥ ३३-३४३ ॥ अथ ते मुनयः सर्वे राममेवानुवंस्तदा ॥ ३५ ॥

राजा शास्ता हि सर्वस्य त्वं विशेषेण राघव ।

त्रैलोक्यस्य भवाञ्शास्ता देवो विष्णुः सनातनः ॥ ३६ ॥

तदनन्तर वे सब मुनि उस समय श्रीरामसे ही बोले – " रघुनन्दन! राजा सबका शासक होता है । विशेषतः आप तो तीनों लोकोंपर शासन करनेवाले साक्षात् सनातन देवता भगवान् विष्णु हैं ' ॥ ३५-३६ ॥

एवमुक्ते तु तैः सर्वैः श्वा वै वचनमब्रवीत् ।

यदि तुष्टोऽसि मे राम यदि देयो वरो मम ॥ ३७ ॥

उन सबके ऐसा कहने पर कुत्ता बोला – श्रीराम! यदि आप मुझपर संतुष्ट हैं, यदि आपको मुझे इच्छानुसार वर देना है तो मेरी बात सुनिये ॥ ३७ ॥

प्रतिज्ञातं त्वया वीर किं करोमीति विश्रुतम् ।

प्रयच्छ ब्राह्मणस्यास्य कौलपत्यं नराधिप ॥ ३८ ॥

कालअरे महाराज कौलपत्यं प्रदीयताम् । ' वीर नरेश्वर! आपने प्रतिज्ञापूर्वक पूछा है कि मैं आपका कौन - सा कार्य सिद्ध करूँ । इस प्रकार आप मेरी इच्छा पूर्ण करनेको प्रतिज्ञाबद्ध हो चुके हैं । अतः मैं कहता हूँ कि इस ब्राह्मणको कुलपति ( महन्त ) बना दीजिये । महाराज! इसे कालञ्जरमें एक मठका आधिपत्य ( वहाँकी महन्थी ) प्रदान कर दीजिये || ३८३ ॥ एतच्छ्रुत्वा तु रामेण कौलपत्येऽभिषेचितः ॥ ३ ९ ॥ प्रययौ ब्राह्मणो हृष्टो गजस्कन्धेन सोऽर्चितः । यह सुनकर श्रीरामने उसका कुलपतिके पदपर अभिषेक कर दिया । इस प्रकार पूजित हुआ वह ब्राह्मण हाथीकी पीठ -पर बैठकर बड़े हर्ष के साथ वहाँसे चला गया ॥ ३ ९ ३ ॥ अथ ते रामसचिवाः स्मयमाना वचोऽब्रुवन् ॥ ४० ॥

वरोऽयं दत्त एतस्य नायं शापो महाद्युते । तब श्रीरामचन्द्रजीके मन्त्री मुस्कराते हुए बोले— ' महातेजस्वी महाराज! यह तो इसे बर दिया गया है, शाप या दण्ड नहीं ' ॥ ४०३ ॥

एवमुक्तस्तु सचिवै रामो वचनमब्रवीत् ॥ ४१ ॥

न यूयं गतितत्त्वज्ञाः श्वा वै जानाति कारणम् । मन्त्रियोंके ऐसा कहनेपर श्रीरामने कहा - " किस कर्मका क्या परिणाम होता है अथवा उससे जीवकी कैसी गति होती है, इसका तत्त्व तुमलोग नहीं जानते । ब्राह्मणको मठाधीशका पद क्यों दिया गया? इसका कारण यह कुत्ता जानता है ' ॥ ४१३ ॥

अथ पृष्टस्तु रामेण सारमेयोऽब्रवीदिदम् ॥ ४२ ॥

अहं कुलपतिस्तत्र आसं शिष्टान्न भोजनः ।

देवद्विजातिपूजायां दासीदासेषु राघव ॥ ४३ ॥

संविभागी शुभरतिर्देवद्रव्यस्य रक्षिता ।

विनीतः शीलसम्पन्नः सर्वसत्त्वहिते रतः ॥ ४४ ॥

तत्पश्चात् श्रीराम के पूछनेपर कुत्तेने इस प्रकार कहा— रघुनन्दन! मैं पहले जन्म में कालञ्जरके मठमें कुलपति ( मठाधीश ) था । वहाँ यज्ञशिष्ट अन्नका भोजन करता, देवता और ब्राह्मणोंकी पूजा में तत्पर रहता, दास - दासियों को उनका न्यायोचित भाग बाँट देता, शुभ कर्मोंमें अनुरक्त रहता, देवसम्पत्तिकी रक्षा करता तथा विनय और शीलसे सम्पन्न होकर समस्त प्राणियोंके हित - साधन में संलग्न रहता था ॥ ४२-४४ ॥

सोऽहं प्राप्त इमां घोरामवस्थामधमां गतिम् ।

एवं क्रोधान्वितो विप्रस्त्यक्तधर्माहिते रतः ॥ ४५ ॥

क्रुद्धो नृशंसः परुष अविद्वांश्चाप्यधार्मिकः ।

कुलानि पातयत्येव सप्त सप्त च राघव ॥ ४६ ॥

' तो भी मुझे यह घोर अवस्था एवं अधम गति प्राप्त हुई । फिर जो ऐसा क्रोधी है, धर्मको छोड़ चुका है, दूसरोंके अहितमें लगा हुआ है तथा क्रोध करनेवाला, क्रूर, कठोर, मूर्ख और अधर्मी है, वह ब्राह्मण तो मठाधीश होकर अपने साथ ही ऊपर और नीचे की सात - सात पीढ़ियोंको भी नरकमें गिराकर ही रहेगा ॥ ४५-४६ ॥

तस्मात् सर्वास्ववस्थासु कौलपत्यं न कारयेत् ।

यमिच्छेन्नरकं नेतुं सपुत्रपशुबान्धवम् ॥ ४७ ॥

देवेष्वधिष्ठितं कुर्याद् गोषु च ब्रह्मणेषु च । " इसलिये किसी भी दशामें मठाधीशका पद नहीं ग्रहण करना चाहिये । जिसे पुत्र, पशु और बन्धु बान्धवसहित नरक में गिरा देने की इच्छा हो, उसे देवताओं, गौओं और ब्राह्मणों का अधिष्ठाता बना दे ॥ ४७३ ॥

ब्रह्मस्वं देवताद्रव्यं स्त्रीणां बालधनं च यत् ॥ ४८ ॥

दत्तं हरति यो भूय इष्टैः सह विनश्यति । ' जो ब्राह्मणका, देवताका, स्त्रियोंका और बालकों का धन हर लेता है तथा जो अपनी दान की हुई सम्पत्तिको फिर वापस ले लेता है, वह इष्टजनों सहित नष्ट हो जाता है ॥४८३ ॥

ब्राह्मणद्रव्यमादत्ते देवानां चैव राघव ॥ ४ ९ ॥

पृष्ठ 822

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उत्तरकाण्डे षष्टितमः सर्गः १५ ९९ सद्यः पतति घोरे वै नरकेऽवीचिसंज्ञके । रघुनन्दन! जो ब्राह्मणों और देवताओंका द्रव्य हड़प लेता है, वह शीघ्र ही अवीचि नामक घोर नरकमें गिर जाता है ॥ ४ ९ ३ ॥ मनसापि हि देवस्वं ब्रह्मस्वं च हरेत्तु यः ॥ ५० ॥

निरयान्निरयं चैव पतत्येव नराधमः । " जो देवता और ब्राह्मणको सम्पत्तिको हर लेनेका विचार भी मनमें लाता है, वह नराधम निश्चय ही एक नरकसे दूसरे नरकमें गिरता रहता है ' ॥ ५०३ ॥

तच्छ्रुत्वा वचनं रामो विस्मयोत्फुल्ललोचनः ॥ ५१ ॥

श्वाप्यगच्छन्महातेजा यत एवागतस्ततः । कुत्ते का यह वचन सुनकर श्री रामचन्द्रजीके नेत्र आश्चर्य से खिल उठे और वह महातेजस्वी कुत्ता भी जिधर से आया था, उधर ही चला गया ॥ ५१३ ॥

मनस्वी पूर्वजात्या स जातिमात्रोऽपदूषितः ।

वाराणस्यां महाभागः प्रायं चोपविवेश ह ॥ ५२ ॥

वह पूर्वजन्ममें बड़ा मनस्वी था, परंतु इस जन्ममें वह कुत्तेकी योनि में उत्पन्न होनेके कारण दूषित हो गया था । उस महाभाग कुत्तेने काशीमें जाकर प्रायोपवेशन कर लिया ( अन्न - जल छोड़कर अपने प्राण त्याग दिये ) ॥ ५२ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे प्रक्षिप्तः सर्गः ॥ २ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें प्रक्षिप्त सर्ग २ पूरा हुआ ॥ षष्टितमः सर्गः श्रीराम के दरबार में च्यवन आदि ऋषियोंका शुभागमन, श्रीरामके द्वारा उनका सत्कार करके उनके अभीष्ट कार्यको पूर्ण करनेकी प्रतिज्ञा तथा ऋषियोंद्वारा उनकी प्रशंसा न र 1 1

तयोः संवदतोरेवं रामलक्ष्मणयोस्तदा ।

वासन्तिकी निशा प्राप्ता न शीता न च धर्मदा ॥ १ ॥

श्रीराम और लक्ष्मण परस्पर इस प्रकार कथा - वार्ता करते हुए प्रतिदिन प्रजापालन के कार्यमें लगे रहते थे । एक समय वसन्त ऋतुकी रात आयी, जो न अधिक सर्दी लानेवाली थी और न गर्मी ॥ १ ॥

ततः प्रभाते विमले कृतपूर्वाह्निकक्रियः ।

अभिचक्राम काकुत्स्थो दर्शनं पौरकार्यवित् ॥ २ ॥

वह रात बीतने पर जब निर्मल प्रभातकाल आया, तब पुरवासियोंके कार्योंको जाननेवाले श्रीरघुनाथजी पूर्वाह्नकाल के नित्यकर्म - संध्या - वन्दन आदि से निवृत्त हो बाहर निकलकर प्रजाजनोंके दृष्टिपथमें आये ॥ २ ॥

ततः सुमन्त्रस्त्वागम्य राघवं वाक्यमब्रवीत् ।

एते प्रतिहता राजन् द्वारि तिष्ठन्ति तापसाः ॥ ३ ॥

भार्गवं च्यवनं चैव पुरस्कृत्य महर्षयः ।

दर्शनं ते महाराज चोदयन्ति कृतत्वराः ॥ ४ ॥

उसी समय सुमन्त्रने आकर श्रीरामचन्द्रजीसे कहा-' राजन्! ये तपस्वी महर्षि भृगुपुत्र च्यवन मुनिको आगे करके द्वारपर खड़े हैं । द्वारपालोंने इनका भीतर आना रोक दिया है । महाराज! इन्हें आपके दर्शनकी जल्दी लगी हुई है और ये अपने आगमन की सूचना देने के लिये हमें बारंबार प्रेरित करते हैं ॥ ३-४ ॥

प्रीयमाणा नरव्याघ्र यमुनातीरवासिनः ।

तस्य तद्वचनं श्रुत्वा रामः प्रोवाच धर्मवित् ॥ ५ ॥

प्रवेश्यन्तां महाभागा भार्गवप्रमुखा द्विजाः । ‘ पुरुषसिंह! ये सब महर्षि यमुनातटपर निवास करते हैं और आपसे विशेष प्रेम रखते हैं । ' सुमन्त्रकी यह बात सुनकर धर्मज्ञ श्रीरामने कहा – ' सूत! भार्गव च्यवन आदि सभी महाभाग ब्रह्मर्षियोंको भीतर बुलाया जाय ' ॥ ५३ ॥

राज्ञस्त्वाज्ञां पुरस्कृत्य द्वाःस्थो मूर्ध्ना कृताञ्जलिः ॥ ६ ॥

प्रवेशयामास तदा तापसान् सुदुरासदान् । राजाकी यह आज्ञा शिरोधार्य कर के द्वारपालने मस्तक पर दोनों हाथ जोड़ लिये और उन अत्यन्त दुर्जय तेजस्वी तापसों-को वह राजभवन के भीतर ले आया ॥ ६३ ॥

शतं समधिकं तत्र दीप्यमानं स्वतेजसा ॥ ७ ॥

प्रविष्टं राजभवनं तापसानां महात्मनाम् ।

ते द्विजाः पूर्णकलशैः सर्वतीर्थाम्बुसत्कृतैः ॥ ८ ॥

गृहीत्वा फलमूलं च रामस्याभ्याहरन् बहु । उन तपस्वी महात्माओंकी संख्या सौसे अधिक थी । वे सब - के - सब अपने तेजसे प्रकाशित हो रहे थे । उन सबने राजभवनमें प्रवेश किया और समस्त तीर्थोंके जलसे भरे हुए बड़ोंके साथ बहुत - से फल - मूल लेकर श्रीरामचन्द्रजीको भेंट किये ॥ ७-८३ ॥ प्रतिगृह्य तु तत् सर्वं रामः प्रीतिपुरस्कृतः ॥ ९ ॥

तीर्थोदकानि सर्वाणि फलानि विविधानि च ।

उवाच च महाबाहुः सर्वानेव महामुनीन् ॥ १० ॥

महाबाहु श्रीरामने बड़ी प्रसन्नता के साथ वह सारा उपहार - वे सारे तीर्थजल और नाना प्रकारके फल लेकर उन सभी महामुनियोंसे कहा - ॥ ९ -१० ॥

इमान्यासनमुख्यानि यथार्हमुपविश्यताम् ।

रामस्य भाषितं श्रुत्वा सर्व एव महर्षयः ॥ ११ ॥

वृसीषु रुचिराख्यासु निषेदुः काञ्चनीषु ते ।

पृष्ठ 823

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१६०० श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे ' महात्माओ! ये उत्तमोत्तम आसन प्रस्तुत हैं । आपलोग यथायोग्य इन आसनोंपर बैठ जायँ । " श्रीरामचन्द्रजीका यह वचन सुनकर वे सभी महर्षि रुचिर शोभासे सम्पन्न उन सुवर्णमय आसनोंपर बैठे ॥ ११३ ॥

उपविष्टानृषींस्तत्र परपुरंजयः ।

प्रयतः प्राञ्जलिर्भूत्वा राघवो वाक्यमब्रवीत् ॥ १२ ॥

उन महर्षियों को वहाँ आसनोंपर विराजमान देख शत्रु-नगरीपर विजय पानेवाले श्रीरघुनाथजीने हाथ जोड़ संयतभाव-से कहा- ॥ १२ ॥

किमागमन कार्य वः किं करोमि समाहितः ।

आज्ञाप्योऽहं महर्षीणां सर्वकामकरः सुखम् ॥ १३ ॥

' महर्षियो! किस कामसे यहाँ आपलोगोंका शुभागमन हुआ है? मैं एकाग्रचित्त होकर आपकी क्या सेवा करूँ? यह सेवक आपकी आज्ञा पाने के योग्य है । आदेश मिलनेपर मैं बड़े सुखसे आपकी सभी इच्छाओंको पूर्ण कर सकता हूँ ॥१३ ॥

इदं राज्यं च सकलं जीवितं च हृदि स्थितम् ।

सर्वमेतद् द्विजार्थ मे सत्यमेतद् ब्रवीमि वः ॥ १४ ॥

" यह सारा राज्य इस हृदयकमलमें विराजमान यह जीवात्मा तथा यह मेरा सारा वैभव ब्राह्मणोंकी सेवा के लिये ही है, मैं आपके समक्ष यह सच्ची बात कहता हूँ ' ॥ १४ ॥

तस्य तद्वचनं श्रुत्वा साधुकारो महानभूत् ।

ऋषीणामुग्रतपसां यमुनातीरवासिनाम् ॥ १५ ॥

श्रीरघुनाथजी के ये वचन सुनकर उन यमुनातीर निवासी उग्र तपस्वी महर्षियोंने उच्चस्वर से उन्हें साधुवाद दिया ॥ १५ ॥

ऊचुश्चैव महात्मानो हर्षेण महता वृताः ।

उपपन्नं नरश्रेष्ठ तवैव भुवि नान्यतः ॥ १६ ॥

फिर वे महात्मा बड़े हर्षके साथ बोले- ' नरश्रेष्ठ! इस भूमण्डलमें ऐसी बातें आपके ही योग्य हैं । दूसरे किसीके मुख-से इस तरह की बात नहीं निकलती ॥ १६ ॥

बहवः पार्थिवा राजन्नतिक्रान्ता महाबलाः ।

कार्यस्य गौरवं मत्वा प्रतिज्ञां नाभ्यरोचयन् ॥ १७ ॥

' राजन्! हम बहुत - से महाबली राजाओंके पास गये; परंतु उन्होंने कार्य के गौरवको समझकर उसे सुनने के बाद भी ' करूँगा ' ऐसी प्रतिज्ञा करनेकी रुचि नहीं दिखायी ॥ १७ ॥

त्वया पुनर्ब्राह्मण गौरवादियं कृता प्रतिज्ञा ह्यनवेक्ष्य कारणम् । ततश्च कर्ता ह्यसि नात्र संशयो महाभयात् त्रातुमृषस्त्वमर्हसि ॥ १८ ॥

' परंतु आपने हमारे आनेका कारण जाने बिना ही केवल ब्राह्मणोंके प्रति आदरका भाव होनेसे हमारा काम करनेकी प्रतिज्ञा कर डाली है; इसलिये आप अवश्य यह काम कर

सकेंगे, इसमें संशय नहीं है । आप ही महान् भयसे ऋषियों-को बचा सकेंगे ' ॥ १८ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे षष्टितमः सर्गः ॥ ६० ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्ड में साठवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ६० ॥

एकषष्टितमः सर्गः ऋषियोंका मधुको प्राप्त हुए वर तथा लवणासुरके वल और अत्याचारका वर्णन करके उससे प्राप्त होनेवाले भय को दूर करने के

बुद्धिरेवमृषिभिः काकुत्स्थो वाक्यमब्रवीत् ।

किं कार्य ब्रूत मुनयो भयं तावदपैतु वः ॥ १ ॥

इस प्रकार कहते हुए ऋषियोंसे प्रेरित हो श्रीरामचन्द्रजी-ने कहा- ' महर्षियो! बताइये, आपका कौन - सा कार्यं मुझे सिद्ध करना है! आपलोगों का भय तो अभी दूर हो जाना चाहिये ॥ १ ॥

तथा ब्रुवति काकुत्स्थे भार्गवो वाक्यमब्रवीत् ।

भयानां शृणु यन्मूलं देशस्य च नरेश्वर ॥ २ ॥

श्रीरघुनाथजीके ऐसा कहनेपर भृगुपुत्र च्यवन बोले-‘ नरेश्वर! समूचे देशपर और हमलोगोंपर जो भय प्राप्त हुआ है, उसका मूल कारण क्या है, सुनिये ॥ २ ॥

पूर्व कृतयुगे राजन् दैतेयः सुमहामतिः ।

लोलापुत्रोऽभवज्ज्येष्ठो मधुर्नाम महासुरः ॥ ३ ॥

' राजन्! पहले सत्ययुगमें एक बड़ा बुद्धिमान् दैत्य था । लिये श्रीरघुनाथजीसे प्रार्थना करना वह लोलाका ज्येष्ठ पुत्र था । उस महान् असुरका नाम था मधु ॥ ३ ॥

ब्रह्मण्यश्च शरण्यश्च बुद्ध्या च परिनिष्ठितः । सुरैश्च परमोदारैः ' वह बड़ा ही ब्राह्मण उसकी बुद्धि सुस्थिर थी । के साथ भी उसकी ऐसी तुलना नहीं थी ॥ ४ ॥

स मधुर्वीर्यसम्पन्नो बहुमानाश्च रुद्रेण प्रीतिस्तस्यातुलाभवत् ॥ ४ ॥

- भक्त और शरणागतवत्सल था । अत्यन्त उदार स्वभाववाले देवताओं-गहरी मित्रता थी, जिसकी कहीं

धर्म च सुसमाहितः ।

दत्तस्तस्याद्भुतो वरः ॥ ५ ॥

' मधु बल- विक्रम सम्पन्न था और एकाग्रचित्त होकर धर्मके अनुष्ठान में लगा रहता था । उसने भगवान् शिवकी बड़ी आराधना की थी, जिससे उन्होंने उसे अद्भुत घर प्रदान किया था ॥ ५ ॥

पृष्ठ 824

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उत्तरकाण्डे एकषष्टितमः सर्गः १६०१ I 7

शूलं शूलाद् विनिष्कृष्य महावीर्य महाप्रभम् ।

ददौ महात्मा सुप्रीतो वाक्यं चैतदुवाच ह ॥ ६ ॥

' महामना भगवान् शिवने अत्यन्त प्रसन्न हो अपने शूलसे एक चमचमाता हुआ परम शक्तिशाली शूल प्रकट करके उसे मधुको दिया और यह बात कही ॥ ६ ॥

त्वयायमतुलो धर्मो मत्प्रसादकरः कृतः ।

प्रीत्या परमया युक्तो ददाम्यायुधमुत्तमम् ॥ ७ ॥

“ तुमने मुझे प्रसन्न करनेवाला यह बड़ा अनुपम धर्म किया है; अतः मैं अत्यन्त प्रसन्न होकर तुम्हें यह उत्तम आयुध प्रदान करता हूँ ॥ ७ ॥

यावत् सुरैश्च विप्रैश्च न विरुध्येर्महासुर ।

तावच्छूलं तवेदं स्यादन्यथा नाशमेष्यति ॥ ८ ॥

“ महान् असुर! जबतक तुम ब्राह्मणों और देवताओंसे विरोध नहीं करोगे, तभीतक यह शूल तुम्हारे पास रहेगा, अन्यथा अदृश्य हो जायगा ॥ ८ ॥

यश्च त्वामभियुञ्जीत युद्धाय विगतज्वरः ।

तं शूलो भस्मसात्कृत्वा पुनरेष्यति ते करम् ॥ ९ ॥

" जो पुरुष निःशङ्क होकर तुम्हारे सामने युद्ध के लिये आयेगा, उसे भस्म करके यह शूल पुनः तुम्हारे हाथमें लौट आयेगा ' ॥ ९ ॥

एवं रुद्राद् वरं लब्ध्वा भूय एव महासुरः ।

प्रणिपत्य महादेवं वाक्यमेतदुवाच ह ॥ १० ॥

“ भगवान् रुद्रसे ऐसा वर पाकर वह महान् असुर महादेव-जीको प्रणाम करके फिर इस प्रकार बोला --- ॥ १० ॥

भगवन् मम वंशस्य शूल मेतदनुत्तमम् ।

भवेत् तु सततं देव सुराणामीश्वरो ह्यसि ॥ ११ ॥

“ भगवन्! देवाधिदेव! आप समस्त देवताओंके स्वामी हैं; अतः आपसे प्रार्थना है कि परम उत्तम शूल मेरे वंशजोंके पास भी सदा रहे ' ॥। ११ ॥

तं ब्रुवाणं मधुं देवः सर्वभूतपतिः शिवः ।

प्रत्युवाच महादेवो नैतदेवं भविष्यति ॥ १२ ॥

' ऐसी बात कहनेवाले उस मधुसे समस्त प्राणियों के अधिपति महान् देवता भगवान् शिवने इस प्रकार कहा— ' ऐसा तो नहीं हो सकता ॥ १२ ॥

मा भूत् ते विफला वाणी मत्प्रसादकता शुभा ।

भवतः पुत्रमेकं तु शूलमेतद् भविष्यति ॥ १३ ॥

" " परंतु मुझे प्रसन्न जानकर तुम्हारे मुखसे जो शुभ वाणी निकली है, वह भी निष्फल न हो; इसलिये मैं वर देता हूँ कि तुम्हारे एक पुत्र के पास यह शूल रहेगा ॥ १३ ॥

यावत् करस्थः शूलोऽयं भविष्यति सुतस्य 1 अवध्यः सर्वभूतानां शूलहस्तो भविष्यति ॥ १४ ॥

" " यह शूल जबतक तुम्हारे पुत्रके हाथमें मौजूद रहेगा, तबतक वह समस्त प्राणियोंके लिये अवध्य बना रहेगा ' ॥ १४ ॥

वा ० रा ० ५. १२.३-एवं मधुर्वरं लब्ध्वा देवात् सुमहदद्भुतम् ।

भवनं सोऽसुरश्रेष्ठः कारयामास सुप्रभम् ॥ १५ ॥

' महादेवजीसे इस प्रकार अत्यन्त अद्भुत वर पाकर असुरश्रेष्ठ मधुने एक सुन्दर भवन तैयार कराया, जो अत्यन्त दीप्तिमान् था ॥ १५ ॥

तस्य पत्नी महाभागा प्रिया कुम्भीनसीति या ।

विश्वावसोरपत्यं साप्यनलायां महाप्रभा ॥ १६ ॥

' उसकी प्रिय पत्नी महाभागा कुम्भीनसी थी, जो विश्वावसु-की संतान थी । उसका जन्म अनलाके गर्भसे हुआ था । कुम्भीनसी बड़ी कान्तिमती थी ॥ १६ ॥

तस्याः पुत्रो महावीर्यो लवणो नाम दारुणः ।

बाल्यात्प्रभृति दुष्टात्मा पापान्येव समाचरत् ॥ १७ ॥

' उसका पुत्र महापराक्रमी लवण है, जिसका स्वभाव बड़ा भयंकर है । वह दुष्टात्मा बचपन से ही केवल पापाचार में प्रवृत्त रहा है ॥ १७ ॥

तं पुत्रं दुर्बिनीतं तु दृष्ट्रा क्रोधसमन्वितः ।

मधुः स शोकमापेदे न चैनं किंचिदब्रवीत् ॥ १८ ॥

' अपने पुत्रको उद्दण्ड हुआ देख मधु क्रोधसे जलता रहता था । उसे बेटे की दुष्टता देखकर बड़ा शोक हुआ, तथापि वह इससे कुछ नहीं बोला ॥ १८ ॥

स विहाय इमं लोकं प्रविष्टो वरुणालयम् ।

शूलं निवेश्य लवणे वरं तस्मै न्यवेदयत् ॥ १ ९ ॥

' अन्तमें वह इस देशको छोड़कर समुद्र में रहने के लिये चला गया । चलते समय उसने वह शूल लवणको दे दिया और उसे वरदानकी बात भी बता दी ॥ १ ९ ॥

स प्रभावेण शूलस्य दौरात्म्येनात्मनस्तथा ।

संतापयति लोकांस्त्रीन् विशेषेण च तापसान् ॥ २० ॥

' अब वह दुष्ट उस शूलके प्रभावसे तथा अपनी दुष्टता के कारण तीनों लोकोंको विशेषतः तपस्वी मुनियोंको बड़ा संताप दे रहा है ॥ २० ॥

एवंप्रभावो लवणः शूलं चैव तथाविधम् ।

श्रुत्वा प्रमाणं काकुत्स्थ त्वं हि नः परमा गतिः ॥ २१ ॥

' उस लवणासुरका ऐसा प्रभाव है और उसके पास वैसा शक्तिशाली शूल भी है । रघुनन्दन! यह सब सुनकर यथोचित कार्य करने में आप ही प्रमाण हैं और आप ही हमारी परम गति हैं ॥ २१ ॥

बहवः पार्थिवा राम भयातैर्ऋषिभिः पुरा ।

अभयं याचिता वीर त्रातारं न च विद्महे ॥ २२ ॥

' श्रीराम! आजसे पहले भयसे पीड़ित हुए ऋषि अनेक राजाओं के पास जा - जाकर अभयकी भिक्षा माँग चुके हैं; परंतु वीर रघुवीर! अबतक हमें कोई रक्षक नहीं मिला ॥

पृष्ठ 825

वाल्मीकि रामायण — खण्ड २, पृष्ठ 825 का मूल पृष्ठ
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१६०२ श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे ते वयं रावणं श्रुत्वा हतं सबलवाहनम् ।

त्रातारं विद्महे तात नान्यं भुवि नराधिपम् ।

तत् परित्रातुमिच्छामो लवणाद् भयपीडितान् ॥ २३ ॥

' तात! हमने सुना है कि आपने सेना और सवारियों-सहित रावणका संहार कर डाला है; इसलिये हम आपहीको अपनी रक्षा करनेमें समर्थं समझते हैं, भूतलपर दूसरे किसी राजाको नहीं । अतः हमारी इच्छा है कि आप भयसे पीड़ित हुए महर्षियोंकी लवणासुरसे रक्षा करें ॥ २३ ॥

इ राम निवेदितं तु ते भयजं कारणमुत्थितं च यत् । विनिवारयितुं भवान् क्षमः कुरु तं काममहीनविक्रम ॥ २४ ॥

' बल- विक्रमसे सम्पन्न श्रीराम! इस प्रकार हमारे सामने जो भयका कारण उपस्थित हो गया है, वह हमने आपके आगे निवेदन कर दिया । आप इसे दूर करने में समर्थ हैं, अतः हमारी यह अभिलाषा पूर्ण करें ॥ २४ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे एकषष्टितमः सर्गः ॥ ६१ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकान्यके उत्तरकाण्डमें इकसठवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ६१ ॥

द्विषष्टितमः सर्गः श्रीरामका ऋषियोंसे लवणासुरके आहार - विहारके विषयमें पूछना और शत्रुघ्न की रुचि जानकर उन्हें लवण वध

तथोक्ते तानृषीन् रामः प्रत्युवाच कृताञ्जलिः ।

किमाहारः किमाचारो लवणः क्व च वर्तते ॥ १ ॥

ऋषियोंके इस प्रकार कहनेपर श्रीरामचन्द्रजीने उनसे हाथ जोड़कर पूछा - ' लवणासुर क्या खाता है? उसका आचार-व्यवहार कैसा है — रहने - सहनेका ढंग क्या है? और वह कहाँ रहता है? ' ॥ १ ॥

राघवस्य वचः श्रुत्वा ऋषयः सर्व एव ते ।

ततो निवेदयामासुर्लक्षणो ववृधे यथा ॥ २ ॥

श्रीरघुनाथजी की यह बात सुनकर उन सभी ऋषियोंने जिस तरह के आहार व्यवहार से लवणासुर पला था, वह सब कह सुनाया ॥ २ ॥

आहारः सर्वसत्त्वानि विशेषेण च तापसाः ।

आचारो रौद्रता नित्यं वासो मधुवने तथा ॥ ३ ॥

वे बोले – ' प्रभो! उसका आहार तो सभी प्राणी हैं; परंतु विशेषतः वह तपस्वी मुनियोंको खाता है । उसके आचार-व्यवहार में बड़ी क्रूरता और भयानकता है और वह सदा मधुवनमें निवास करता है ॥ ३ ॥

हत्वा बहुसहस्राणि सिंहव्याघ्रमृगाण्डजान् ।

मानुषांश्चैव कुरुते नित्यमाहारमाह्निकम् ॥ ४ ॥

' वह प्रतिदिन कई सहस्र सिंह, व्याघ्र, मृग, पक्षी और मनुष्यों को मारकर खा जाता है ॥ ४ ॥

ततोऽन्तराणि सत्त्वानि खादते स महाबलः ।

संहारे समनुप्राप्ते व्यादितास्य इवान्तकः ॥ ५ ॥

' संहारकाल आनेपर मुँह बाकर खड़े हुए यमराजके समान वह महाबली असुर दूसरे दूसरे जीवोंको भी खाता रहता है ' ॥ ५ ॥

तच्छ्रुत्वा राघवो वाक्यमुवाच स महामुनीन् ।

घातयिष्यामि तद् रक्षो व्यपगच्छतु वो भयम् ॥ ६ ॥

के कार्य में नियुक्त करना उनका यह कथन सुनकर श्रीरघुनाथजीने उन महामुनियों-से कहा - " महर्षियो! मैं उस राक्षसको मरवा डालूँगा । आपलोगोंका भय दूर हो जाना चाहिये ' ॥ ६ ॥

प्रतिज्ञाय तथा तेषां मुनीनामुग्रतेजसाम् ।

स भ्रातृन् सहितान् सर्वानुवाच रघुनन्दनः ॥ ७ ॥

इस प्रकार उन उग्र तेजस्वी मुनियोंके समक्ष प्रतिज्ञां करके रघुकुलनन्दन श्रीरामने वहाँ एकत्र हुए अपने सब भाइयों-से पूछा- ॥ ७ ॥

को हन्ता लवणं वीरः कस्यांशः स विधीयताम् ।

भरतस्य महाबाहोः शत्रुघ्नस्य च धीमतः ॥ ८ ॥

' बन्धुओ! लवणको कौन वीर मारेगा? उसे किसके हिस्से में रक्खा जाय - महाबाहु भरतके या बुद्धिमान् शत्रुघ्नके ' ॥

राघवेणैवमुक्तस्तु भरतो वाक्यमब्रवीत् ।

अहमेनं वधिष्यामि ममांशः स विधीयताम् ॥ ९ ॥

रघुनाथजीके इस प्रकार पूछनेपर भरतजी बोले- ' भैया!

मैं इस लवणका वध करूँगा । इसे मेरे हिस्सेमें रक्खा जाय ' ॥

भरतस्य वचः श्रुत्वा धैर्यशौर्यसमन्वितम् ।

लक्ष्मणावरजस्तस्थौ हित्वा सौवर्णमासनम् ॥ १० ॥

शत्रुघ्नस्त्वत्रवीद् वात्र्यं प्रणिपत्य नराधिपम् ।

कृतकर्मा महाबाहुर्मध्यमो रघुनन्दन ॥ ११ ॥

भरतजीके ये धीरता और वीरतापूर्ण शब्द सुनकर शत्रुघ्नजी सोनेका सिंहासन छोड़कर खड़े हो गये और महाराज श्रीरामको प्रणाम करके बोले— ' रघुनन्दन! महाबाहु मझले भैया तो बहुत से कार्य कर चुके हैं । १०-११ ॥

आर्येण हि पुरा शून्या त्वयोध्या परिपालिता ।

संतापं हृदये कृत्वा आर्यस्यागमनं प्रति ॥ १२ ॥

' पहले जब अयोध्यापुरी आपसे सूनी हो गयी थी, उस समय आपके आगमन कालतक हृदयमें अत्यन्त संताप

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उत्तरकाण्डे त्रिषष्टितमः सर्गः १६०३ लिये इन्होंने अयोध्यापुरीका पालन किया था ॥ १२ ॥

दुःखानि च बहूनीह अनुभूतानि पार्थिव ।

शयानो दुःखशय्यासु नन्दिग्रामे महायशाः ॥ १३ ॥

फलमूलाशनो भूत्वा जटी चीरधरस्तथा । ' पृथ्वीनाथ! महायशस्वी भरतने नन्दिग्राममें दुःखद शय्यापर सोते हुए पहले बहुत - से दुःख भोगे हैं । ये फल-मूल खाकर रहते थे और सिरपर जटा बढ़ाये चीर वस्त्र धारण करते थे ॥ १३३ ॥

अनुभूयेदृशं दुःखमेष राघवनन्दनः ॥ १४ ॥

प्रेष्ये मयि स्थिते राजन् न भूयः क्लेशमाप्नुयात् । ' महाराज! ऐसे - ऐसे दुःख भोगकर ये रघुकुलनन्दन भरत मुझ सेवकके रहते हुए अब फिर अधिक क्लेश न उठावें ' ॥ १४३ ॥

तथा ब्रुवति शत्रुघ्ने राघवः पुनरब्रवीत् ॥ १५ ॥

एवं भवतु काकुत्स्थ क्रियतां मम शासनम् ।

राज्ये त्वामभिषेक्ष्यामि मधोस्तु नगरे शुभे ॥ १६ ॥

शत्रुघ्न के ऐसा कहनेपर श्रीरघुनाथजी फिर बोले-' काकुत्स्थ! तुम जैसा कहते हो, वैसा ही हो । तुम्हीं मेरे इस आदेशका पालन करो । मैं तुम्हें मधुके सुन्दर नगरमें राजाके पदपर अभिषिक्त करूँगा ॥ १५-१६ ॥

निवेशय महाबाहो भरतं यद्यवेक्षसे ।

शूरस्त्वं कृतविद्यश्च समर्थश्च निवेशने ॥ १७ ॥

' महाबाहो! यदि तुम भरतको क्लेश देना ठीक नहीं समझते तो इनको यहीं रहने दो । तुम शूरवीर हो, अस्त्र - विद्या-के ज्ञाता हो तथा तुममें नूतन नगर निर्माण करने की शक्ति है ॥ १७ ॥

नगरं यमुनाजुष्टं तथा जनपदाञ्शुभान् ।

यो हि वंशं समुत्पाट्य पार्थिवस्य निवेशने ॥ १८ ॥

न विधत्ते नृपं तत्र नरकं स हि गच्छति । ' तुम यमुनाजीके तटपर सुन्दर नगर बसा सकते हो और उत्तमोत्तम जनपद की स्थापना कर सकते हो । जो किसी राजा-के वंशका उच्छेद करके उसकी राजधानीमें दूसरे राजाको स्थापित नहीं करता, वह नरकमें पड़ता है ॥ १८३ ॥

सत्वं हत्वा मधुसुतं लवणं पापनिश्चयम् ॥ १ ९ ॥

राज्यं प्रशाधि धर्मेण वाक्यं मे यद्यवेक्षसे ।

उत्तरं च न वक्तव्यं शूर वाक्यान्तरे मम ॥ २० ॥

बालेन पूर्वजस्याज्ञा कर्तव्या नात्र संशयः ।

अभिषेकं च काकुत्स्थ प्रतीच्छस्व ममोद्यतम् ।

वसिष्ठप्रमुखैर्विप्रैर्विधिमन्त्रपुरस्कृतम् ॥ २१ ॥

' अतः तुम मधुके पुत्र पापात्मा लवणासुरको मारकर धर्म-पूर्वक वहाँके राज्यका शासन करो । शूरवीर! यदि तुम मेरी बात मानने योग्य समझो तो मैं जो कुछ कहता हूँ, उसे चुप-चाप स्वीकार करो 1 । बीचमें बात काटकर कोई उत्तर तुम्हें नहीं देना चाहिये । बालकको अवश्य ही अपने बड़ोंकी आशाका पालन करना चाहिये । शत्रुघ्न! वसिष्ठ आदि मुख्य-मुख्य ब्राह्मण विधि और मन्त्रोच्चारणके साथ तुम्हारा अभिषेक करेंगे । मेरी आज्ञासे प्राप्त हुए इस अभिषेकको तुम स्वीकार करो ' ॥ १ ९ -२१ ॥ इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे द्विषष्टितमः सर्गः ॥ ६२ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें बासठवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ६२ ॥

त्रिषष्टितमः सर्गः प श्रीरामद्वारा शत्रुघ्नका राज्याभिषेक तथा उन्हें

एवमुक्तस्तु रामेण परां व्रीडामुपागमत् ।

शत्रुघ्नो वीर्यसम्पन्नो मन्दं मन्दमुवाच ह ॥ १ ॥

श्रीरामचन्द्रजीके ऐसा कहने पर बल- विक्रमसे सम्पन्न शत्रुघ्न बड़े लज्जित हुए और धीरे - धीरे बोले- ॥ १ ॥

अधर्म व काकुत्स्थ अस्मिन्नर्थे नरेश्वर ।

कथं तिष्ठत्सु ज्येष्ठेषु कनीयानभिषिच्यते ॥ २ ॥

' ककुत्स्थ कुलभूषण नरेश्वर! इस अभिषेकको स्वीकार करनेमें तो मुझे अधर्म जान पड़ता है । भला, बड़े भाइयोंके रहते हुए छोटेका अभिषेक कैसे किया जा सकता है? ॥२ ॥

अवश्यं करणीयं च शासनं पुरुषर्षभ ।

तव चैव महाभाग शासनं दुरतिक्रमम् ॥ ३ ॥

' तथापि पुरुषप्रवर | महाभाग! आपकी आज्ञाका पालन तो मुझे अवश्य करना ही चाहिये । आपका शासन किसीके लिये भी दुर्लवय है ॥ ३ ॥

लवणासुर के शूलसे बचने के उपायका प्रतिपादन

त्वत्तो मया श्रुतं वीर श्रुतिभ्यश्च मया श्रुतम् ।

नोत्तरं हि मया वाच्यं मध्यमे प्रतिजानति ॥ ४ ॥

' वीर! मैंने आपसे तथा वेदवाक्योंसे भी यह बात सुनी है । वास्तव में मझले भैयाके प्रतिज्ञा कर लेनेपर मुझे कुछ नहीं बोलना चाहिये था ॥ ४ ॥

व्याहृतं दुर्वचो घोरं हन्तास्मि लवणं मृधे ।

तस्यैवं मे दुरुक्तस्य दुर्गतिः पुरुषर्षभ ॥ ५ ॥

' मेरे मुँह से ये बड़े ही अनुचित शब्द निकल गये कि मैं लवणको मारूँगा । पुरुषोत्तम! उस अनुचित कथनका ही परिणाम है कि मेरी इसप्रकार दुर्गति हो रही है ( मुझे बड़ोंके होते हुए अभिषिक्त होना पड़ता है ) ॥ ५ ॥

उत्तरं नहि वक्तव्यं ज्येष्ठेनाभिहिते पुनः ।

अधर्मसहितं चैव परलोकविवर्जितम् ॥ ६ ॥

' बड़े भाईके बोलने पर मुझे फिर कुछ उत्तर नहीं देना

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१६०४ श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे चाहिये था; ( अर्थात् भैया भरतने जब लवणको मारनेका निर्णय कर लिया, तब मुझे उसमें दखल नहीं देना चाहिये था ) परंतु मैंने इस नियमका उल्लङ्घन किया, इसीलिये आपने ऐसा ( राज्याभिषेकविषयक ) आदेश दे दिया । जो स्वीकार कर लेनेपर मेरे लिये अधर्मयुक्त होनेके कारण परलोकके लाभसे भी वञ्चित करनेवाला है । तथापि आपकी आज्ञा मेरे लिये दुर्लङ्घय है; अतः मुझे इसको स्वीकार करना ही पड़ेगा ॥ ६ ॥

सोऽहं द्वितीयं काकुत्स्थ न वक्ष्यामीति चोत्तरम् ।

मा द्वितीयेन दण्डो वै निपतेन्मयि मानद ॥ ७ ॥

' काकुत्स्थ! अब आपकी जो आज्ञा हो चुकी, उसके विरुद्ध मैं दूसरा कोई उत्तर नहीं दूँगा । मानद! कहीं ऐसा न हो कि दूसरा कोई उत्तर देनेपर मुझे इससे भी कठोर दण्ड भोगना पड़े ॥ ७ ॥

कामकारो ह्यहं राजंस्तवास्मि पुरुषर्षभ ।

अधर्म जहि काकुत्स्थ मत्कृते रघुनन्दन ॥ ८ ॥

" राजन्! पुरुषप्रवर रघुनन्दन! मैं आपकी इच्छाके अनुसार ही कार्य करूँगा । किंतु इसमें मेरे लिये जो अधर्मं प्राप्त होता हो, उसका नाश आप करें ' ॥ ८ ॥

एवमुक्ते तु शूरेण शत्रुघ्नेन महात्मना ।

रामः संहृष्टो भरतं लक्ष्मणं तथा ॥ ९ ॥

उवाच शूरवीर महात्मा शत्रुघ्न के ऐसा कहनेपर श्रीरामचन्द्रजी बड़े प्रसन्न हुए और भरत तथा लक्ष्मण आदिसे बोले ॥ ९ ॥

सम्भारानभिषेकस्य आनयध्वं समाहिताः ।

अद्यैव पुरुषव्याघ्रमभिषेक्ष्यामि राघवम् ॥ १० ॥

" तुम सब लोग बड़ी सावधानी के साथ राज्याभिषेककी सामग्री जुटाकर ले आओ । मैं अभी रघुकुलनन्दन पुरुषसिंह शत्रुघ्नका अभिषेक करूँगा ॥ १० ॥

पुरोधसं च काकुत्स्थ नैगमानृत्विजस्तथा ।

मन्त्रिणश्चैव तान् सर्वानानयध्वं ममाज्ञया ॥ ११ ॥

' काकुत्स्थ! मेरी आज्ञासे पुरोहित, वैदिक विद्वानों, ऋत्विजों तथा समस्त मन्त्रियोंको बुला लाओ ' ॥ ११ ॥

तथाकुर्वन्महारथाः ।

राज्ञः शासनमाज्ञाय पुरस्कृत्य पुरोधसम् ॥ १२ ॥

अभिषेक समारम्भं प्रविष्टा राजभवनं राजानो ब्राह्मणास्तथा । महाराजकी आज्ञा पाकर महारथी भरत और लक्ष्मण आदिने वैसा ही किया । वे पुरोहितजीको आगे करके अभिषेक-हुआ, जो श्रीरघुनाथजी तथा समस्त पुरवासियोंके हर्षको बढ़ानेवाला था ॥ १३३ ॥

अभिषिकस्तु काकुत्स्थो बभौ चादित्यसंनिभः ॥ १४ ॥

अभिषिक्तः पुरा स्कन्दः सेन्द्रैरिव दिवौकसैः । जैसे पूर्वकालमें इन्द्र आदि देवताओंने स्कन्दका देवसेना-पतिके पदपर अभिषेक किया था, उसी तरह श्रीराम आदिने वहाँ शत्रुघ्नका राजाके पदपर अभिषेक किया । इस प्रकार अभिषिक्त होकर शत्रुघ्नजी सूर्यके समान सुशोभित हुए १४३ अभिषिके तु शत्रुध्ने रामेणाक्लिष्टकर्मणा ॥ १५ ॥

पौराः प्रमुदिताश्चासन् ब्राह्मणाश्च बहुश्रुताः । क्लेशरहित कर्म करनेवाले श्रीरामके द्वारा जब शत्रुघ्नका राज्याभिषेक हुआ, तब उस नगर के निवासियों और बहुश्रुत ब्राह्मणोंको बड़ी प्रसन्नता हुई ॥ १५३ ॥

कौसल्या च सुमित्रा च मङ्गलं केकयी तथा ॥ १६ ॥

चक्रुस्ता राजभवने याश्चान्या राजयोषितः । इस समय कौसल्या, सुमित्रा और कैकेयी तथा राज्य-भवनकी अन्य राजमहिलाओंने मिलकर मङ्गलकार्य सम्पन्न किया ॥ १६३ ॥

ऋषयश्च महात्मानो यमुनातीरवासिनः ॥ १७ ॥

हतं लवणमाशंसुः शत्रुघ्नस्याभिषेचनात् । शत्रुघ्नजीका राज्याभिषेक होनेसे यमुनातीरनिवासी महात्मा ऋषियोंको यह निश्चय हो गया कि अब लवणासुर मारा गया ॥ १७३ ॥

ततोऽभिषिक्तं शत्रुघ्नमङ्कमारोप्य राघवः ।

उवाच मधुरां वाणीं तेजस्तस्याभिपूरयन् ॥ १८ ॥

अभिषेकके पश्चात् शत्रुघ्नको गोद में बिठाकर श्रीरघुनाथ-जीने उनका तेज बढ़ाते हुए मधुर वाणीमें कहा ॥१८ ॥

अयं शरस्त्वमोघस्ते दिव्यः परपुरंजयः ।

अनेन लवणं सौम्य हन्तासि रघुनन्दन ॥ १ ९ ॥

" रघुनन्दन! सौम्य शत्रुघ्न! मैं तुम्हें यह दिव्य अमोघ बाण दे रहा हूँ । तुम इसके द्वारा लवणासुरको अवश्य मार डालोगे ॥ १ ९ ॥

सृष्टः शरोऽयं काकुत्स्थ यदा शेते महार्णवे ।

स्वयंभूरजितो दिव्यो यं नापश्यन् सुरासुराः ॥ २० ॥

अदृश्यः सर्वभूतानां तेनायं हि शरोत्तमः ।

सृष्टः क्रोधाभिभूतेन विनाशार्थं दुरात्मनोः ॥ २१ ॥

मधुकैटभयोर्वीर विधाते सर्वरक्षसाम् ।

स्रष्टुकामेन लोकांस्त्रींस्तौ चानेन हतौ युधि ॥ २२ ॥

की सामग्री साथ लिये राजभवनमें आये । उनके साथ ही तो हत्वा जनभोगार्थे कैटभं तु मधुं तथा । बहुत - से राजा और ब्राह्मण भी वहाँ आ पहुँचे ॥ १२३ ॥ अनेन शरमुख्येन ततो लोकांश्चकार सः ॥ २३ ॥

ववृधे शत्रुघ्नस्य महात्मनः ॥ १३ ॥ ' काकुत्स्थ! पिछले प्रलयकालमें जब किसीसे भी पराजित

ततोऽभिषेको राघवस्य पुरस्य च । न होनेवाले अजन्मा एवं दिव्य रूपधारी भगवान् विष्णु महान् सम्प्रहर्षकरः श्रीमान् आरम्भ एकार्णवके जलमें शयन करते थे, उस समय उन्हें देवता और तदनन्तर महात्मा शत्रुघ्न का वैभवशाली अभिषेक

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उत्तरकाण्डे चतुःषष्टितमः सर्गः १६०५ असुर कोई नहीं देख पाते थे । वे सम्पूर्ण भूतोंके लिये अदृश्य थे 1 । वीर! उसी समय उन भगवान् नारायणने ही कुपित हो दुरात्मा मधु और कैटभ के विनाश तथा समस्त राक्षसोंके संहार-के लिये इस दिव्य, उत्तम एवं अमोघ बाणकी सृष्टि की थी । उस समय वे तीनों लोकोंकी सृष्टि करना चाहते थे और मधु, कैटभ तथा अन्य सब राक्षस उसमें विघ्न उपस्थित कर रहे थे | अतः भगवान्ने इसी बाणसे मधु और कैटभ दोनोंको युद्धमें मारा था । इस मुख्य बाणसे मधु और कैटभ दोनों को मारकर भगवान्ने जीवके कर्मफल - भोगकी सिद्धिके लिये विभिन्न लोकोंकी रचना की । २०-२३ ॥

नायं मया शरः पूर्व रावणस्य वधार्थिना ।

मुक्तः शत्रुघ्न भूतानां महान् हासो भवेदिति ॥ २४ ॥

' शत्रुघ्न! पहले मैंने रावणका वध करनेके लिये भी इस बाणका प्रयोग नहीं किया था; क्योंकि इसके द्वारा बहुत - से प्राणियोंके नष्ट हो जाने की आशङ्का थी ॥ २४ ॥

यच्च तस्य महच्छूलं त्र्यम्बकेण महात्मना ।

दत्तं शत्रुविनाशाय मधोरायुधमुत्तमम् ॥ २५ ॥

तत् संनिक्षिप्य भवने पूज्यमानं पुनः पुनः ।

दिशः सर्वाः समासाद्य प्राप्नोत्याहारमुत्तमम् ॥ २६ ॥

' लवणके पास जो महात्मा महादेवजीका शत्रुविनाशके लिये दिया हुआ मधुका दिव्य, उत्तम एवं महान् शूल है, उसका वह प्रतिदिन बारंबार पूजन करता है और उसे महलमें ही गुप्तरूपसे रखकर समस्त दिशाओंमें जा - जाकर अपने लिये उत्तम आहारका संग्रह करता है ॥ २५-२६ ॥

यदा तु युद्धमाकाङ्क्षन् कश्चिदेनं समाह्वयेत् ।

तदा शूलं गृहीत्वा तु भस्म रक्षः करोति हि ॥ २७ ॥

' जब कोई युद्ध की इच्छा रखकर उसे बलकारता है, तब वह राक्षस उस शूलको लेकर अपने विपक्षीको भस्म कर देता है ॥ २७ ॥

स त्वं पुरुषशार्दूल तमायुधविनाकृतम् ।

अप्रविष्टं पुरं पूर्व द्वारि तिष्ठ धृतायुधः ॥ २८ ॥

' पुरुषसिंह! जिस समय वह शूल उसके पास न हो और वह नगर में भी न पहुँच सका हो, उसी समय पहले से ही नगरके द्वारपर जाकर अस्त्र - शस्त्र धारण किये उसकी प्रतीक्षा में डटे रहो ॥ २८ ॥

अप्रविष्टं च भवनं युद्धाय पुरुषर्षभ ।

आह्वयेथा महाबाहो ततो हन्तासि राक्षसम् ॥ २ ९ ॥

' महाबाहु पुरुषोत्तम! यदि उस राक्षसको महलमें घुसने-से पहले ही तुम युद्ध के लिये ललकारोगे, तब अवश्य उसका वध कर सकोगे ॥ २ ९ ॥

अन्यथा क्रियमाणे तु ह्यवध्यः स भविष्यति ।

यदि त्वेवं कृतं वीर विनाशमुपयास्यति ॥ ३० ॥

" ऐसा न करनेपर वह अवध्य हो जायगा । वीर! यदि तुमने ऐसा किया तो उस राक्षसका विनाश होकर ही रहेगा ॥

एतत् ते सर्वमाख्यातं शूलस्य च विपर्ययः ।

श्रीमतः शितिकण्ठस्य कृत्यं हि दुरतिक्रमम् ॥ ३१ ॥

" इस प्रकार मैंने तुम्हें उस शूलसे बचनेका उपाय तथा अन्य सब आवश्यक बातें बता दीं; क्योंकि श्रीमान् भगवान् नील-कण्ठके विधानको पलटना बड़ा कठिन काम है ' ॥ ३१ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे त्रिषष्टितमः सर्गः ॥ ६३ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें तिरसठवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ६३ ॥

चतुःषष्टितमः सर्गः श्रीरामकी आज्ञा के अनुसार शत्रुघ्नका सेनाको आगे भेजकर एक मासके पश्चात् स्वयं

एवमुक्त्वा च काकुत्स्थं प्रशस्य च पुनः पुनः ।

पुनरेवापरं वाक्यमुवाच रघुनन्दनः ॥ १ ॥

शत्रुनजीको इस प्रकार समझाकर और उनकी बारंबार प्रशंसा करके रघुकुलनन्दन श्रीरामने पुनः यह बात कही ॥

इमान्यश्वसहस्राणि चत्वारि पुरुषर्षभ ।

रथानां द्वे सहस्रे च गजानां शतमुत्तमम् ॥ २ ॥

अन्तरापणवीथ्यश्च नानापण्योपशोभिताः ।

अनुगच्छन्तु काकुत्स्थं तथैव नटनर्तकाः ॥ ३ ॥

' पुरुषप्रवर! ये चार हजार घोड़े, दो हजार रथ, सौ हाथी और रास्ते में तरह - तरह के सामानकी दूकानें लगानेवाले बनिये लोग विक्रयकी आवश्यक वस्तुओंके साथ तुम्हारे साथ भी प्रस्थान करना जायँगे । साथ ही मनोरञ्जनके लिये नट और नर्तक भी रहेंगे ॥ २-३ ॥

हिरण्यस्य सुवर्णस्य नियुतं पुरुषर्षभ ।

आदाय गच्छ शत्रुघ्न पर्याप्तधनवाहनः ॥ ४ ॥

' पुरुषश्रेष्ठ शत्रुघ्न! तुम दस लाख स्वर्णमुद्रा लेकर जाओ । इस तरह पर्याप्त धन और सवारियाँ अपने साथ रक्खो ॥ ४ ॥

बलं च सुभृतं वीर हृष्टतुष्टमनुद्धतम् ।

सम्भाषासम्प्रदानेन रञ्जयस्व नरोत्तम ॥ ५ ॥

" इस सेनाका भलीभाँति भरण - पोषण किया गया है । यह हर्षं तथा उत्साहसे पूर्ण, संतुष्ट और उद्दण्डतासे रहित होकर भाशा-

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१६०६ श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे के अधीन रहनेवाली है । नरश्रेष्ठ! इसे मधुर भाषणसे और धन देकर प्रसन्न रखना ॥ ५ ॥

नह्यर्थास्तत्र तिष्ठन्ति न दारा न च बान्धवाः ।

सुप्रीतो भृत्यवर्गस्तु यत्र तिष्ठति राघव ॥ ६ ॥

" रघुनन्दन! अत्यन्त प्रसन्न रक्खे गये सेवक समूह ( सैनिक ) जहाँ ( जिस संकटकालमें ) खड़े होते या साथ देते हैं, वहाँ न तो धन टिक पाता है, न स्त्री ठहर सकती है और न भाई - बन्धु ही खड़े हो सकते हैं ( अतः उन सबको सदा संतुष्ट रखना चाहिये ) ॥ ६ ॥

अतो हृष्टजनाकीर्णा प्रस्थाप्य महतीं चमूम् ।

एक एव धनुष्पाणिर्गच्छ त्वं मधुनो वनम् ॥ ७ ॥

यथा त्वां न प्रजानाति गच्छन्तं युद्धकाङ्क्षिणम् ।

लवणस्तु मधोः पुत्रस्तथा गच्छेरशङ्कितम् ॥ ८ ॥

' इसलिये हृष्ट - पुष्ट मनुष्योंसे भरी हुई इस विशाल सेना-को आगे भेजकर तुम पीछेसे अकेले ही केवल धनुष हाथमें लेकर मधुवनको जाना और इस तरह यात्रा करना, जिससे मधुपुत्र लवणको यह संदेह न हो कि तुम युद्धकी इच्छासे वहाँ जा रहे हो । तुम्हारी गतिविधिका उसे पता नहीं चलना चाहिये ॥ ७-८ ॥

न तस्य मृत्युरन्योऽस्ति कश्चिद्धि पुरुषर्षभ ।

दर्शनं योऽभिगच्छेत स वध्यो लवणेन हि ॥ ९ ॥

' पुरुषोत्तम! मैंने जो बताया है, उसके सिवा उसकी मृत्युका दूसरा कोई उपाय नहीं है; क्योंकि जो भी शूलसहित लवणासुरके दृष्टिपथमें आ जाता है, वह अवश्य उसके द्वारा मारा जाता है ॥ ९ ॥

स ग्रीष्म अपयाते तु वर्षारात्र उपागते ।

हन्यास्त्वं लवणं सौम्य स हि कालोऽस्य दुर्मतेः ॥१० ॥

' सौम्य! जब ग्रीष्म ऋतु निकल जाय और वर्षाकाल आ जाय, उस समय तुम लवणासुरका वन करना; क्योंकि उस दुर्बुद्धि राक्षसके नाशका वही समय है ॥ १० ॥

महर्षींस्तु पुरस्कृत्य प्रयान्तु तव सैनिकाः ।

यथा ग्रीष्मावशेषेण तरेयुर्जाह्नवीजलम् ॥ ११ ॥

' तुम्हारे सैनिक महर्षियोंको आगे करके यहाँसे यात्रा करें, जिससे ग्रीष्म ऋतु बीतते - बीतते वे गङ्गाजीको पार कर जायँ ॥ ११ ॥

तत्र स्थाप्य बलं सर्व नदीतीरे समाहितः ।

अग्रतो धनुषा सार्धं गच्छ त्वं लघुविक्रम ॥ १२ ॥

' शीघ्रपराक्रमी वीर! फिर सारी सेनाको वहीं गङ्गाजीके तटपर ठहराकर तुम धनुषमात्र लेकर पूरी सावधानी के साथ अकेले ही आगे जाना ' ॥ १२ ॥

एवमुक्तस्तु रामेण शत्रुघ्नस्तान् महाबलान् ।

सेनामुख्यान् समानीय ततो वाक्यमुवाच ह ॥ १३ ॥

श्रीरामचन्द्रजीके ऐसा कहनेपर शत्रुघ्नजीने अपने प्रधान सेनापतियोंको बुलाया और इस प्रकार कहा- ॥ १३ ॥

एते वो गणिता वासा यत्र तत्र निवत्स्यथ ।

स्थातव्यं चाविरोधेन यथा बाधा न कस्यचित् ॥ १४ ॥

' देखो, मार्गमें जहाँ - जहाँ डेरा डालना है, उन पड़ावोंका

निश्चय कर लिया गया है । तुम्हें वहीं निवास करना होगा ।

जहाँ भी ठहरो, विरोधभावको मनसे निकाल दो, जिससे किसी-को कष्ट न पहुँचे ' ॥ १४ ॥

तथा तांस्तु समाज्ञाप्य प्रस्थाप्य च महद्बलम् ।

कौसल्यां च सुमित्रां च कैकेयीं चाभ्यवादयत् ॥ १५ ॥

इस प्रकार उन सेनापतियोंको आज्ञा दे अपनी विशाल सेनाको आगे भेजकर शत्रुघ्नने कौसल्या, सुमित्रा तथा कैकेयी-को प्रणाम किया ॥ १५ ॥

रामं प्रदक्षिणीकृत्य शिरसाभिप्रणम्य च ।

लक्ष्मणं भरतं चैव प्रणिपत्य कृताञ्जलिः ॥ १६ ॥

तत्पश्चात् श्रीरामकी परिक्रमा करके उनके चरणों में मस्तक झुकाया । फिर हाथ जोड़कर भरत और लक्ष्मणकी भी वन्दना की ॥ १६ ॥

पुरोहितं वसिष्ठं च शत्रुघ्नः प्रयतात्मवान् ।

रामेण वाभ्यनुज्ञातः शत्रुघ्नः शत्रुतापनः ।

प्रदक्षिणमथ कृत्वा निर्जगाम महाबलः ॥ १७ ॥

तदनन्तर मनको संयममें रखकर शत्रुघ्नने पुरोहित वसिष्ठको नमस्कार किया । फिर श्रीरामकी आज्ञा ले उनकी परिक्रमा करके शत्रुओंको संताप देनेवाले महाबली शत्रुघ्न अयोध्या से निकले ॥ १७ ॥

प्रस्थाप्य सेनामथ सोऽग्रतस्तदा

गजेन्द्र वाजिप्रवरौघसंकुलाम् ।

उवास मासं तु नरेन्द्र पाश्र्वत-स्त्वथ प्रयातो रघुवंशवर्धनः ॥ १८ ॥

गजराजों और श्रेष्ठ अश्वोंके समुदायसे भरी हुई विशाल सेनाको आगे भेजकर रघुवंशकी वृद्धि करनेवाले शत्रुघ्न एक मासतक महाराज श्रीरामके पास ही रहे । उसके बाद उन्होंने वहाँसे प्रस्थान किया ॥ १८ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे चतुःषष्टितमः सर्गः ॥ ६४ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें चौसठवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ६४ ॥

पृष्ठ 830

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उत्तरकाण्डे पञ्चषष्टितमः सर्गः १६०७ पञ्चषष्टितमः सर्गः महर्षि वाल्मीकिका शत्रुघ्नको सुदासपुत्र कल्माषपादकी कथा सुनाना

प्रस्थाप्य च बलं सर्व मासमात्रोषितः पथि ।

एक एवाशु शत्रुघ्नो जगाम त्वरितं तदा ॥ १ ॥

अपनी सेनाको आगे भेजकर अयोध्या में एक माह रहनेके पश्चात् शत्रुघ्न अकेले ही वहाँसे मधुवनके मार्गपर प्रस्थित हुए । वे बड़ी तेजी के साथ आगे बढ़ने लगे ॥ १ ॥

द्विरात्रमन्तरे शूर उष्य राघवनन्दनः ।

वाल्मीकेराश्रमं पुण्यमगच्छद् वासमुत्तमम् ॥ २ ॥

रघुकुलको आनन्दित करनेवाले शूरवीर शत्रुघ्न रास्तेमें दो रात बिताकर तीसरे दिन महर्षि वाल्मीकिके पवित्र आश्रम-पर जा पहुँचे । वह सबसे उत्तम वासस्थान था ॥ २ ॥

सोऽभिवाद्य महात्मानं वाल्मीकिं मुनिसत्तमम् ।

कृताञ्जलिरथो भूत्वा वाक्यमेतदुवाच ह ॥ ३ ॥

वहाँ उन्होंने हाथ जोड़ मुनिश्रेष्ठ महात्मा वाल्मीकिको प्रणाम करके यह बात कही ॥ ३ ॥

भगवन् वस्तुमिच्छामि गुरोः कृत्यादिहागतः ।

श्वः प्रभाते गमिष्यामि प्रतीचीं वारुणीं दिशम् ॥ ४ ॥

' भगवन्! मैं अपने बड़े भाई श्रीरघुनाथजीके कार्यसे इधर आया हूँ । आज रातको यहाँ ठहरना चाहता हूँ और कल सबेरे वरुणदेवद्वारा पालित पश्चिम दिशाको चला जाऊँगा ॥

शत्रुघ्नस्य वचः श्रुत्वा प्रहस्य मुनिपुङ्गवः ।

प्रत्युवाच महात्मानं स्वागतं ते महायशः ॥ ५ ॥

शत्रुघ्नकी यह बात सुनकर मुनिवर वाल्मीकिने उन महात्माको हँसते हुए उत्तर दिया- ' महायशस्वी वीर! तुम्हारा स्वागत है ॥ ५ ॥

स्वमाश्रममिदं सौम्य राघवाणां कुलस्य वै ।

आसनं पाद्यमर्घ्य च निर्विशङ्कः प्रतीच्छ मे ॥ ६ ॥

' सौम्य! यह आश्रम रघुवंशियोंके लिये अपना ही घर है । तुम निःशङ्क होकर मेरी ओरसे आसन, पाद्य और अर्ध्य स्वीकार करो ' ॥ ६ ॥

प्रतिगृह्य तदा पूजां फलमूलं च भोजनम् ।

भक्षयामास काकुत्स्थस्तृप्तिं च परमां गतः ॥ ७ ॥

तब वह सत्कार ग्रहण करके शत्रुघ्नने फल - मूलका भोजन किया । इससे उन्हें बड़ी तृप्ति हुई ॥ ७ ॥

स भुक्त्वा फलमूलं च महर्षि तमुवाच ह ।

पूर्वा यज्ञविभूतीयं कस्याश्रमसमीपतः ॥ ८ ॥

फल - मूल खाकर वे महर्षिसे बोले – “ मुने! इस आश्रमके निकट जो यह प्राचीनकालका यज्ञ - वैभव ( यूप आदि उप-करण ) दिखायी देता है, किसका है— किस यजमान नरेशने यहाँ यज्ञ किया था? ' ॥ ८ ॥

तत् तस्य भाषितं श्रुत्वा वाल्मीकिर्वाक्यमब्रवीत् ।

शत्रुघ्न शृणु यस्येदं बभूवायतनं पुरा ॥ ९ ॥

उनका यह प्रश्न सुनकर वाल्मीकिजी ने कहा – ' शत्रुघ्न! पूर्वकालमें जिस यजमान नरेशका यह यज्ञमण्डप रहा है, उसे बताता हूँ, सुनो ॥ ९ ॥

युष्माकं पूर्वको राजा सुदासस्तस्य भूपतेः ।

पुत्रो वीरसहो नाम वीर्यवानतिधार्मिकः ॥ १० ॥

' तुम्हारे पूर्वज राजा सुदास इस भूमण्डलके स्वामी हो गये हैं । उन भूपालके वीरसह ( मित्रसह ) नामक एक पुत्र हुआ, जो बड़ा पराक्रमी और अत्यन्त धर्मात्मा था ॥ १० ॥

स बाल एव सौदासो मृगयामुपचक्रमे ।

चञ्चूर्यमाणं ददृशे स शूरो राक्षसद्वयम् ॥ ११ ॥

' सुदासका वह शूरवीर पुत्र बाल्यावस्था में ही एक दिन शिकार खेलने के लिये वनमें गया । वहाँ उसने दो राक्षस देखे, जो सब ओर बारंबार बिचर रहे थे ॥ ११ ॥

शार्दूलरूपिणौ घोरौ मृगान् बहुसहस्रशः ।

भक्षमाणाव संतुष्टौ पर्याप्तिं नैव जग्मतुः ॥ १२ ॥

' वे दोनों घोर राक्षस बाघका रूप धारण करके कई

हजार मृर्गोको मारकर खा गये । फिर भी संतुष्ट नहीं हुए ।

उनके पेट नहीं भरे ॥ १२ ॥

स तु तौ राक्षसौ दृष्ट्रा निर्मृगं च वनं कृतम् ।

क्रोधेन महताविष्टो जघानैकं महेषुणा ॥ १३ ॥

' सौदासने उन दोनों राक्षसोंको देखा । साथ ही उनके द्वारा मृगशून्य किये गये उस वनकी अवस्थापर दृष्टिपात किया । इससे वे महान् क्रोधसे भर गये और उनमेंसे एकको विशाल बाणसे मार डाला ॥ १३ ॥

विनिपात्य तमेकं तु सौदासः पुरुषर्षभः ।

विज्वरो विगतामर्षो हतं रक्षो ह्युदैक्षत ॥ १४ ॥

' एकको धराशायी करके वे पुरुषप्रवर सौदास निश्चिन्त हो गये । उनका अमर्ष जाता रहा और वे उस मरे हुए राक्षसको देखने लगे ॥ १४ ॥

निरीक्षमाणं तं दृष्ट्वा सहायं तस्य रक्षसः ।

संतापमकरोद् घोरं सौदासं चेदमब्रवीत् ॥ १५ ॥

‘ उस राक्षसके मरे हुए साथीको जब सौदास देख रहे थे, उस समय उनकी ओर दृष्टिपात करके उस दूसरे राक्षसने मन-ही - मन घोर संताप किया और सौदाससे इस प्रकार कहा- ॥

यस्मादनपराधं तं सहायं मम जघ्निवान् ।

तस्मात् तवापि पापिष्ठ प्रदास्यामि प्रतिक्रियाम् ॥ १६ ॥

" महापापी नरेश! तूने मेरे निरपराध साथीको मार डाला है, इसलिये मैं तुझसे भी इसका बदला लूँगा ' ॥ १६ ॥

एवमुक्त्वा तु तद् रक्षस्तत्रैवान्तरधीयत ।

कालपर्याययोगेन राजा मित्रसहोऽभवत् ॥ १७ ॥

' ऐसा कहकर वह राक्षस वहीं अन्तर्धान हो गया और