श्रीरामचरितमानस — पृष्ठ 1001–1010
श्रीरामचरितमानस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1001–1010
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* उत्तरकाण्ड * ९९९ हे पक्षिराज! सुनिये, अब मैं अपने प्रथम जन्मके चरित्र कहता हूँ, जिन्हें सुनकर प्रभुके चरणोंमें प्रीति उत्पन्न होती है, जिससे सब क्लेश मिट जाते हैं ॥ ९ ६ ( क ) ॥
पूरुब कल्प एक प्रभु जुग कलिजुग मल मूल ।
नर अरु नारि अधर्म रत सकल निगम प्रतिकूल ॥ ९ ६ ( ख ) ॥
हे प्रभो! पूर्वके एक कल्पमें पापोंका मूल युग कलियुग था, जिसमें पुरुष और स्त्री सभी अधर्मपरायण और वेदके विरोधी थे ॥ ९ ६ ( ख) ॥
तेहिं कलिजुग कोसलपुर जाई । जन्मत भयउँ सूद्र तनु पाई ॥
सिव सेवक मन क्रम अरु बानी । आन देव निंदक अभिमानी ॥
उस कलियुगमें मैं अयोध्यापुरीमें जाकर शूद्रका शरीर पाकर जन्मा । मैं मन, वचन और कर्मसे शिवजीका सेवक और दूसरे देवताओंकी निन्दा करनेवाला अभिमानी था ॥१ ॥
धन मद मत्त परम बाचाला । उग्रबुद्धि उर दंभ बिसाला ॥
जदपि रहेउँ रघुपति रजधानी । तदपि न कछु महिमा तब जानी ॥
मैं धनके मदसे मतवाला, बहुत ही बकवादी और उग्रबुद्धिवाला था; मेरे हृदयमें बड़ा भारी दम्भ था । यद्यपि मैं श्रीरघुनाथजीकी राजधानीमें रहता था, तथापि मैंने उस समय उसकी महिमा कुछ भी नहीं जानी ॥२ ॥
अब जाना मैं अवध प्रभावा । निगमागम पुरान अस गावा ॥
कवनेहुँ जन्म अवध बस जोई । राम परायन सो परि होई ॥
अब मैंने अवधका प्रभाव जाना । वेद, शास्त्र और पुराणोंने ऐसा गाया है कि किसी भी जन्ममें जो कोई भी अयोध्यामें बस जाता है, वह अवश्य ही श्रीरामजीके परायण हो जायगा ॥३ ॥
अवध प्रभाव जान तब प्रानी । जब उर बसहिं रामु धनुपानी ॥
सो कलिकाल कठिन उरगारी । पाप परायन सब नर नारी ॥
अवधका प्रभाव जीव तभी जानता है, जब हाथमें धनुष धारण करनेवाले श्रीरामजी उसके हृदयमें निवास करते हैं । हे गरुड़जी! वह कलिकाल बड़ा कठिन था । उसमें सभी नर- नारी पाप- परायण ( पापोंमें लिप्त ) थे ॥ ४ ॥
दो० - कलिमल ग्रसे धर्म सब लुप्त भए सदग्रंथ ।
दंभिन्ह निज मति कल्पि करि प्रगट किए बहु पंथ ॥ ९ ७ ( क ) ॥
कलियुगके पापोंने सब धर्मोंको ग्रस लिया, सद्ग्रन्थ लुप्त हो गये, दम्भियोंने अपनी बुद्धिसे कल्पना कर- करके बहुत-से पंथ प्रकट कर दिये ॥ ९ ७ ( क ) ॥
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* *१००० रामचरितमानस
भए लोग सब मोहबस लोभ ग्रसे सुभ कर्म ।
सुनु हरिजान ग्यान निधि कहउँ कछुक कलिधर्म ॥ ९ ७ ( ख ) ॥
सभी लोग मोहके वश हो गये, शुभकर्मोंको लोभने हड़प लिया । हे ज्ञानके भण्डार! हे श्रीहरिके वाहन! सुनिये, अब मैं कलिके कुछ धर्म कहता हूँ ॥ ९ ७ ( ख ) ॥
बरन धर्म नहिं आश्रम चारी । श्रुति बिरोध रत सब नर नारी ॥
द्विज श्रुति बेचक भूप प्रजासन । कोउ नहिं मान निगम अनुसासन ॥
कलियुगमें न वर्णधर्म रहता है, न चारों आश्रम रहते हैं । सब पुरुष - स्त्री वेदके विरोधमें लगे रहते हैं । ब्राह्मण वेदोंके बेचनेवाले और राजा प्रजाको खा डालनेवाले होते हैं । वेदकी आज्ञा कोई नहीं मानता ॥१ ॥
मारग सोइ जा कहुँ जोइ भावा । पंडित सोइ जो गाल बजावा ॥
मिथ्यारंभ दंभ रत जोई । ता कहूँ संत कहइ सब कोई ॥
जिसको जो अच्छा लग जाय, वही मार्ग है । जो डींग मारता है, वही पण्डित है । जो मिथ्या आरम्भ करता ( आडम्बर रचता ) है और जो दम्भमें रत है, उसीको सब कोई संत कहते हैं ॥२ ॥
सोइ सयान जो परधन हारी । जो कर दंभ सो बड़ आचारी ॥
जो कह झूठ मसखरी जाना । कलिजुग सोइ गुनवंत बखाना ॥
जो [ जिस किसी प्रकारसे ] दूसरेका धन हरण कर ले, वही बुद्धिमान् है । जो दम्भ करता है वही बड़ा आचारी है । जो झूठ बोलता है और हँसी-दिल्लगी करना जानता है, कलियुगमें वही गुणवान् कहा जाता है ॥३ ॥
निराचार जो श्रुति पथ त्यागी । कलिजुग सोइ ग्यानी सो बिरागी ॥
जाकें नख अरु जटा बिसाला । सोइ तापस प्रसिद्ध कलिकाला ॥
जो आचारहीन है और वेदमार्गको छोड़े हुए है, कलियुगमें वही ज्ञानी और वही वैराग्यवान् है । जिसके बड़े - बड़े नख और लंबी - लंबी जटाएँ हैं, वही कलियुगमें प्रसिद्ध तपस्वी है ॥४ ॥
दो० – असुभ बेष भूषन धरें भच्छाभच्छ जे खाहिं ।
तेइ जोगी तेइ सिद्ध नर पूज्य ते कलिजुग माहिं ॥ ९ ८ ( क ) ॥
जो अमङ्गल वेष और अमङ्गल भूषण धारण करते हैं और भक्ष्य- अभक्ष्य (खाने योग्य और न खाने योग्य ) सब कुछ खा लेते हैं, वे ही योगी हैं, वे ही सिद्ध हैं और वे ही मनुष्य कलियुगमें पूज्य हैं ॥ ९ ८ ( क ) ॥
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* उत्तरकाण्ड * १००१
सो० - जे अपकारी चार तिन्ह कर गौरव मान्य तेइ ।
मन क्रम बचन लबार तेइ बकता कलिकाल महुँ ॥ ९ ८ ( ख ) ॥
जिनके आचरण दूसरोंका अपकार ( अहित ) करनेवाले हैं, उन्हींका बड़ा गौरव होता है और वे ही सम्मानके योग्य होते हैं । जो मन, वचन और कर्मसे लबार (झूठ बकनेवाले ) हैं, वे ही कलियुगमें वक्ता माने जाते हैं ॥ ९ ८ ( ख ) ॥
नारि बिबस नर सकल गोसाईं । नाचहिं नट मर्कट की नाईं ॥
सूद्र द्विजन्ह उपदेसहिं ग्याना । मेलि जनेऊ लेहिं कुदाना ॥
हे गोसाईं! सभी मनुष्य स्त्रियोंके विशेष वशमें हैं और बाजीगरके बंदरकी तरह [ उनके नचाये ] नाचते हैं । ब्राह्मणोंको शूद्र ज्ञानोपदेश करते हैं और गलेमें जनेऊ डालकर कुत्सित दान लेते हैं ॥१ ॥
सब नर काम लोभ रत क्रोधी । देव बिप्र श्रुति संत बिरोधी ॥
गुन मंदिर सुंदर पति त्यागी । भजहिं नारि पर पुरुष अभागी ॥
सभी पुरुष काम और लोभमें तत्पर और क्रोधी होते हैं । देवता, ब्राह्मण, वेद और संतोंके विरोधी होते हैं । अभागिनी स्त्रियाँ गुणोंके धाम सुन्दर पतिको छोड़कर परपुरुषका सेवन करती हैं ॥२ ॥
सौभागिनीं बिभूषन हीना । बिधवन्ह के सिंगार नबीना ॥
गुर सिष बधिर अंध का लेखा । एक न सुनइ एक नहिं देखा ॥
सुहागिनी स्त्रियाँ तो आभूषणोंसे रहित होती हैं, पर विधवाओंके नित्य नये शृङ्गार होते हैं । शिष्य और गुरुमें बहरे और अंधेका -सा हिसाब होता है । एक ( शिष्य ) गुरुके उपदेशको सुनता नहीं, एक ( गुरु ) देखता नहीं ( उसे ज्ञानदृष्टि प्राप्त नहीं है ) ॥३ ॥
हरइ सिष्य धन सोक न हरई । सो गुर घोर नरक महुँ परई ॥
मातु पिता बालकन्हि बोलावहिं । उदर भरै सोइ धर्म सिखावहिं ॥
जो गुरु शिष्यका धन हरण करता है, पर शोक नहीं हरण करता, वह घोर नरकमें पड़ता है ।
माता- पिता बालकोंको बुलाकर वही धर्म सिखलाते हैं, जिससे पेट भरे ॥४ ॥
दो० - ब्रह्म ग्यान बिनु नारि नर कहहिं न दूसरि बात ।
कौड़ी लागि लोभ बस करहिं बिप्र गुर घात ॥ ९९ ( क ) ॥
स्त्री- पुरुष ब्रह्मज्ञानके सिवा दूसरी बात नहीं करते, पर वे लोभवश कौड़ियों ( बहुत थोड़े लाभ ) के लिये ब्राह्मण और गुरुकी हत्या कर डालते हैं ॥ ९९ ( क ) ॥
बादहिं सूद्र द्विजन्ह सन हम तुम्ह ते कछु घाटि ।
जानइ ब्रह्म सो बिप्रबर आँखि देखावहिं डाटि ॥ ९९ ( ख ) ॥
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* * १००२ रामचरितमानस शूद्र ब्राह्मणोंसे विवाद करते हैं [ और कहते हैं ] कि हम क्या तुमसे कुछ कम हैं? जो ब्रह्मको जानता है वही श्रेष्ठ ब्राह्मण है । [ऐसा कहकर] वे उन्हें डाँटकर आँखें दिखलाते हैं ॥ ९९ ( ख ) ॥ पर त्रिय लंपट कपट सयाने ॥ मोह द्रोह ममता लपटाने ॥
तेइ अभेदबादी ग्यानी नर । देखा मैं चरित्र कलिजुग कर ॥
जो परायी स्त्रीमें आसक्त, कपट करनेमें चतुर और मोह, द्रोह और ममतामें लिपटे हुए हैं, वे ही मनुष्य अभेदवादी ( ब्रह्म और जीवको एक बतानेवाले ) ज्ञानी हैं । मैंने उस कलियुगका यह चरित्र देखा ॥१ ॥
आपु गए अरु तिन्हहू घालहिं । जे कहूँ सत मारग प्रतिपालहिं ॥
कल्प कल्प भरि एक एक नरका । परहिं जे दूषहिं श्रुति करि तरका ॥
वे स्वयं तो नष्ट हुए ही रहते हैं; जो कहीं सन्मार्गका प्रतिपालन करते हैं, उनको भी वे नष्ट कर देते हैं । जो तर्क करके वेदकी निन्दा करते हैं, वे लोग कल्प- कल्पभर एक-एक नरकमें पड़े रहते हैं ॥२ ॥
जे बरनाधम तेलि कुम्हारा । स्वपच किरात कोल कलवारा ॥
नारि मुई गृह संपति नासी । मूड़ मुड़ाइ होहिं संन्यासी ॥
तेली, कुम्हार, चाण्डाल, भील, कोल और कलवार आदि जो वर्णमें नीचे हैं, स्त्रीके मरनेपर अथवा घरकी सम्पत्ति नष्ट हो जानेपर सिर मुँड़ाकर संन्यासी हो जाते हैं ॥३ ॥
ते प्रिन्ह सन आपु पुजावहिं । उभय लोक निज हाथ नसावहिं ॥
बिप्र निरच्छर लोलुप कामी । निराचार सठ बृषली स्वामी ॥
वे अपनेको ब्राह्मणोंसे पुजवाते हैं और अपने ही हाथों दोनों लोक नष्ट करते हैं । ब्राह्मण अपढ़, लोभी, कामी, आचारहीन, मूर्ख और नीची जातिकी व्यभिचारिणी स्त्रियोंके स्वामी होते हैं ॥४ ॥
सूद्र करहिं जप तप ब्रत नाना । बैठि बरासन कहहिं पुराना ॥
सब नर कल्पित करहिं अचारा । जाइ न बरनि अनीति अपारा ॥
शूद्र नाना प्रकारके जप, तप और व्रत करते हैं तथा ऊँचे आसन ( व्यासगद्दी ) पर बैठकर पुराण कहते हैं । सब मनुष्य मनमाना आचरण करते हैं । अपार अनीतिका वर्णन नहीं किया जा सकता ॥ ५ ॥
दो० – भए बरन संकर कलि भिन्नसेतु सब लोग ।
करहिं पाप पावहिं दुख भय रुज सोक बियोग ॥ १०० ( क ) ॥
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* उत्तरकाण्ड * १००३ कलियुगमें सब लोग वर्णसंकर और मर्यादासे च्युत हो गये । वे पाप करते हैं और [उनके फलस्वरूप ] दुःख, भय, रोग, शोक और [प्रिय वस्तुका ] वियोग पाते हैं ॥१०० ( क ) ॥
श्रुति संमत हरि भक्ति पथ संजुत बिरति बिबेक ।
तेहिं न चलहिं नर मोह बस कल्पहिं पंथ अनेक ॥ १०० ( ख ) ॥
वेदसम्मत तथा वैराग्य और ज्ञानसे युक्त जो हरिभक्तिका मार्ग है, मोहवश मनुष्य उसपर नहीं चलते और अनेकों नये-नये पंथोंकी कल्पना करते हैं ॥ १०० (ख ) ॥
छं० — बहु दाम सँवारहिं धाम जती । बिषया हरि लीन्हि न रहि बिरती ॥
तपसी धनवंत दरिद्र गृही । कलि कौतुक तात न जात कही ॥
संन्यासी बहुत धन लगाकर घर सजाते हैं । उनमें वैराग्य नहीं रहा, उसे विषयोंने हर लिया । तपस्वी धनवान् हो गये और गृहस्थ दरिद्र । हे तात! कलियुगकी लीला कुछ कही नहीं जाती ॥ १ ॥
कुलवंति निकारहिं नारि सती । गृह आनहिं चेरि निबेरि गती ॥
सुत मानहिं मातु पिता तब लौं । अबलानन दीख नहीं जब लौं ॥
कुलवती और सती स्त्रीको पुरुष घरसे निकाल देते हैं और अच्छी चालको छोड़कर घरमें दासीको ला रखते हैं । पुत्र अपने माता-पिताको तभीतक मानते हैं जबतक स्त्रीका मुँह नहीं दिखायी पड़ा ॥२ ॥
ससुरारि पिआरि लगी जब तें । रिपुरूप कुटुंब भए तब तें ॥
नृप पाप परायन धर्म नहीं । करि दंड बिडंब प्रजा नितहीं ॥
जबसे ससुराल प्यारी लगने लगी, तबसे कुटुम्बी शत्रुरूप हो गये । राजा लोग पापपरायण हो गये, उनमें धर्म नहीं रहा । वे प्रजाको नित्य ही [बिना अपराध ] दण्ड देकर उसकी विडम्बना ( दुर्दशा) किया करते हैं ॥३ ॥
धनवंत कुलीन मलीन अपी । द्विज चिन्ह जनेउ उघार तपी ॥
नहिं मान पुरान न बेदहि जो । हरि सेवक संत सही कलि सो ॥
धनी लोग मलिन ( नीच जातिके ) होनेपर भी कुलीन माने जाते हैं । द्विजका चिह्न जनेऊमात्र रह गया और नंगे बदन रहना तपस्वीका । जो वेदों और पुराणोंको नहीं मानते, कलियुगमें वे ही हरिभक्त और सच्चे संत कहलाते हैं ॥ ४ ॥
कबि बूंद उदार दुनी न सुनी । गुन दूषक ब्रात न कोपि गुनी ॥
कलि बारहिं बार दुकाल परै । बिनु अन्न दुखी सब लोग मरे ॥
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* *१००४ रामचरितमानस कवियोंके तो झुंड हो गये, पर दुनियामें उदार ( कवियोंका आश्रयदाता) सुनायी नहीं पड़ता । गुणमें दोष लगानेवाले बहुत हैं, पर गुणी कोई भी नहीं है । कलियुगमें बार- बार अकाल पड़ते हैं । अन्नके बिना सब लोग दुखी होकर मरते हैं ॥ ५ ॥
दो० – सुनु खगेस कलि कपट हठ दंभ द्वेष पाषंड ।
मान मोह मारादि मद ब्यापि रहे ब्रह्मंड ॥ १०१ ( क ) ॥
हे पक्षिराज गरुड़जी! सुनिये, कलियुगमें कपट, हठ ( दुराग्रह ), दम्भ, द्वेष, पाखण्ड, मान, मोह और काम आदि ( अर्थात् काम, क्रोध और लोभ ) और मद ब्रह्माण्डभरमें व्याप्त हो गये ( छा गये ) ॥ १०१ ( क ) ॥
तामस धर्म करहिं नर जप तप ब्रत मख दान ।
देव न बरषहिं धरनीं बए न जामहिं धान ॥ १०१ ( ख ) ॥
मनुष्य जप, तप, यज्ञ, व्रत और दान आदि धर्म तामसी भावसे करने लगे । देवता ( इन्द्र) पृथ्वीपर जल नहीं बरसाते और बोया हुआ अन्न उगता नहीं ॥ १०१ (ख) ॥
छं० – अबला कच भूषन भूरि छुधा । धनहीन दुखी ममता बहुधा ॥
सुख चाहहिं मूढ़ न धर्म रता । मति थोरि कठोरि न कोमलता ॥
स्त्रियोंके बाल ही भूषण हैं ( उनके शरीरपर कोई आभूषण नहीं रह गया ) और उनको भूख बहुत लगती है ( अर्थात् वे सदा अतृप्त ही रहती हैं । ) वे धनहीन और बहुत प्रकारकी ममता होनेके कारण दुखी रहती हैं । वे मूर्ख सुख चाहती हैं, पर धर्ममें उनका प्रेम नहीं है । बुद्धि थोड़ी है और कठोर है; उनमें कोमलता नहीं है ॥ १ ॥
नर पीड़ित रोग न भोग कहीं । अभिमान बिरोध अकारनहीं ॥
लघु जीवन संबतु पंच दसा । कलपांत न नास गुमानु असा ॥
मनुष्य रोगोंसे पीड़ित हैं, भोग ( सुख ) कहीं नहीं है । बिना ही कारण अभिमान और विरोध करते हैं । दस- पाँच वर्षका थोड़ा -सा जीवन है, परन्तु घमंड ऐसा है मानो कल्पान्त ( प्रलय ) होनेपर भी उनका नाश नहीं होगा ॥ २ ॥
कलिकाल बिहाल किए मनुजा । नहिं मानत क्वौ अनुजा तनुजा ॥
नहिं तोष बिचार न सीतलता । सब जाति कुजाति भए मगता ॥
कलिकालने मनुष्यको बेहाल ( अस्त- व्यस्त ) कर डाला । कोई बहिन - बेटीका भी विचार नहीं करता । [ लोगोंमें ] न सन्तोष है, न विवेक है और न शीतलता है । जाति, कुजाति सभी लोग भीख माँगनेवाले हो गये ॥३ ॥
इरिषा परुषाच्छर लोलुपता । भरि पूरि रही समता बिगता ॥
सब लोग बियोग बिसोक हए । बरनाश्रम धर्म अचार गए ॥
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* उत्तरकाण्ड * १००५ ईर्ष्या ( डाह ), कडुवे वचन और लालच भरपूर हो रहे हैं, समता चली गयी । सब लोग वियोग
और विशेष शोकसे भरे पड़े हैं । वर्णाश्रम धर्मके आचरण नष्ट हो गये ॥ ४ ॥
दम दान दया नहिं जानपनी । जड़ता परबंचनताति घनी ॥
तनु पोषक नारि नरा सगरे । परनिंदक जे जग मो बगरे ॥
इन्द्रियोंका दमन, दान, दया और समझदारी किसीमें नहीं रही । मूर्खता और दूसरोंको ठगना यह बहुत अधिक बढ़ गया । स्त्री- पुरुष सभी शरीरके ही पालन-पोषणमें लगे रहते हैं । जो परायी निन्दा करनेवाले हैं, जगत्में वे ही फैले हैं ॥ ५ ॥
दो० –- सुनु ब्यालारि काल कलि मल अवगुन आगार ।
गुनउ बहुत कलिजुग कर बिनु प्रयास निस्तार ॥ १०२ ( क ) ॥
हे सर्पोंके शत्रु गरुड़जी! सुनिये, कलिकाल पाप और अवगुणोंका घर है । किन्तु कलियुगमें एक गुण भी बड़ा है कि उसमें बिना ही परिश्रम भवबन्धनसे छुटकारा मिल जाता है ॥ १०२ ( क ) ॥
कृतजुग त्रेताँ द्वापर पूजा मख अरु जोग ।
जो गति होड़ सो कलि हरि नाम ते पावहिं लोग ॥ १०२ ( ख ) ॥
सत्ययुग, त्रेता और द्वापरमें जो गति पूजा, यज्ञ और योगसे प्राप्त होती है, वही गति कलियुगमें लोग केवल भगवान्के नामसे पा जाते हैं ॥ १०२ ( ख) ॥
कृतजुग सब जोगी बिग्यानी । करि हरि ध्यान तरहिं भव प्रानी ॥
त्रेताँ बिबिध जग्य नर करहीं । प्रभुहि समर्पि कर्म भव तरहीं ॥
सत्ययुगमें सब योगी और विज्ञानी होते हैं । हरिका ध्यान करके सब प्राणी भवसागरसे तर जाते हैं । त्रेतामें मनुष्य अनेक प्रकारके यज्ञ करते हैं और सब कर्मोंको प्रभुके समर्पण करके भवसागरसे पार हो जाते हैं ॥ १ ॥
द्वापर करि रघुपति पद पूजा । नर भव तरहिं उपाय न दूजा ॥
कलिजुग केवल हरि गुन गाहा । गावत नर पावहिं भव थाहा ॥
द्वापरमें श्रीरघुनाथजीके चरणोंकी पूजा करके मनुष्य संसारसे तर जाते हैं, दूसरा कोई उपाय नहीं है । और कलियुगमें तो केवल श्रीहरिकी गुणगाथाओंका गान करनेसे ही मनुष्य भवसागरकी थाह पा जाते हैं ॥२ ॥
कलिजुग जोग न जग्य न ग्याना । एक अधार राम गुन गाना ॥
सब भरोस तजि जो भज रामहि I। प्रेम समेत गाव गुन ग्रामहि ॥
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* *१००६ रामचरितमानस कलियुगमें न तो योग और यज्ञ है और न ज्ञान ही है । श्रीरामजीका गुणगान ही एकमात्र आधार है । अतएव सारे भरोसे त्यागकर जो श्रीरामजीको भजता है और प्रेमसहित उनके गुणसमूहोंको गाता है, ॥ ३ ॥
सोइ भव तर कछु संसय नाहीं । नाम प्रताप प्रगट कलि माहीं ॥
कलि कर एक पुनीत प्रतापा । मानस पुन्य होहिं नहिं पापा ॥
वही भवसागरसे तर जाता है, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं । नामका प्रताप कलियुगमें प्रत्यक्ष है । कलियुगका एक पवित्र प्रताप ( महिमा ) है कि मानसिक पुण्य तो होते हैं, पर [ मानसिक ] पाप नहीं होते ॥ ४ ॥
दो० - कलिजुग सम जुग आन नहिं जौं नर कर बिस्वास ।
गाइ राम गुन गन बिमल भव तर बिनहिं प्रयास ॥ १०३ ( क ) ॥
यदि मनुष्य विश्वास करे, तो कलियुगके समान दूसरा युग नहीं है । [ क्योंकि] इस युगमें श्रीरामजीके निर्मल गुणसमूहोंको गा-गाकर मनुष्य बिना ही परिश्रम संसार [ रूपी समुद्र ] से तर जाता है ॥ १०३ ( क ) ॥
प्रगट चारि पद धर्म के कलि महुँ एक प्रधान ।
जेन केन बिधि दीन्हें दान करइ कल्यान ॥ १०३ ( ख ) ॥
धर्मके चार चरण ( सत्य, दया, तप और दान ) प्रसिद्ध हैं, जिनमेंसे कलिमें एक [ दानरूपी ] चरण ही प्रधान है । जिस किसी प्रकारसे भी दिये जानेपर दान कल्याण ही करता है ॥ १०३ ( ख ) ॥
नित जुग धर्म होहिं सब केरे । हृदयँ राम माया के प्रेरे ॥
सुद्ध सत्व समता बिग्याना । कृत प्रभाव प्रसन्न मन जाना ॥
श्रीरामजीकी मायासे प्रेरित होकर सबके हृदयोंमें सभी युगोंके धर्म नित्य होते रहते हैं । शुद्ध सत्त्वगुण, समता, विज्ञान और मनका प्रसन्न होना, इसे सत्ययुगका प्रभाव जाने ॥१ ॥
सत्व बहुत रज कछु रति कर्मा । सब बिधि सुख त्रेता कर धर्मा ॥
बहु रज स्वल्प सत्व कछु तामस । द्वापर धर्म हरष भय मानस ॥
सत्त्वगुण अधिक हो, कुछ रजोगुण हो, कर्मोंमें प्रीति हो, सब प्रकारसे सुख हो, यह त्रेताका धर्म है । रजोगुण बहुत हो, सत्त्वगुण बहुत ही थोड़ा हो, कुछ तमोगुण हो, मनमें हर्ष और भय हो, यह द्वापरका धर्म है ॥२ ॥
तामस बहुत रजोगुन थोरा । कलि प्रभाव बिरोध चहुँ ओरा ॥
बुध जुग धर्म जानि मन माहीं । तजि अधर्म रति धर्म कराहीं ॥
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* * उत्तरकाण्ड १००७ तमोगुण बहुत हो, रजोगुण थोड़ा हो, चारों ओर वैर- विरोध हो, यह कलियुगका प्रभाव है । पण्डित लोग युगोंके धर्मको मनमें जान ( पहिचान) कर, अधर्म छोड़कर धर्ममें प्रीति करते हैं ॥ ३ ॥
काल धर्म नहिं ब्यापहिं ताही । रघुपति चरन प्रीति अति जाही ॥
नट कृत बिकट कपट खगराया । नट सेवकहि न ब्यापइ माया ॥
जिसका श्रीरघुनाथजीके चरणोंमें अत्यन्त प्रेम है, उसको कालधर्म ( युगधर्म ) नहीं व्यापते । हे पक्षिराज! नट ( बाजीगर) का किया हुआ कपट -चरित्र ( इन्द्रजाल) देखनेवालोंके लिये बड़ा विकट ( दुर्गम ) होता है, पर नटके सेवक ( जंभूरे) को उसकी माया नहीं व्यापती ॥४ ॥
दो० - हरि माया कृत दोष गुन बिनु हरि भजन न जाहिं ।
भजिअ राम तजि काम सब अस बिचारि मन माहिं ॥ १०४ ( क ) ॥
श्रीहरिकी मायाके द्वारा रचे हुए दोष और गुण श्रीहरिके भजन बिना नहीं जाते । मनमें ऐसा विचारकर, सब कामनाओंको छोड़कर ( निष्कामभावसे ) श्रीरामजीका भजन करना चाहिये ॥ १०४ ( क ) ॥
तेहिं कलिकाल बरष बहु बसेउँ अवध बिहगेस ।
परेउ दुकाल बिपति बस तब मैं गयउँ बिदेस ॥ १०४ ( ख ) ॥
हे पक्षिराज! उस कलिकालमें मैं बहुत वर्षोंतक अयोध्यामें रहा । एक बार वहाँ अकाल पड़ा, तब मैं विपत्तिका मारा विदेश चला गया ॥ १०४ ( ख) ॥
गयउँ उजेनी सुनु उरगारी । दीन मलीन दरिद्र दुखारी ॥
गएँ काल कछु संपति पाई । तहँ पुनि करउँ संभु सेवकाई ॥
हे सर्पोंके शत्रु गरुड़जी! सुनिये । मैं दीन, मलिन ( उदास), दरिद्र और दुखी होकर उज्जैन गया । कुछ काल बीतनेपर कुछ सम्पत्ति पाकर फिर मैं वहीं भगवान् शंकरकी आराधना करने लगा ॥१ ॥
बिप्र एक बैदिक सिव पूजा । करइ सदा तेहि काजु न दूजा ॥
परम साधु परमारथ बिंदक ॥ संभु उपासक नहिं हरि निंदक ॥
एक ब्राह्मण वेदविधिसे सदा शिवजीकी पूजा करते, उन्हें दूसरा कोई काम न था । वे परम साधु और परमार्थके ज्ञाता थे, वे शम्भुके उपासक थे, पर श्रीहरिकी निन्दा करनेवाले न थे ॥ २ ॥
तेहि सेवउँ मैं कपट समेता । द्विज दयाल अति नीति निकेता ॥
बाहिज नम्र देखि मोहि साईं । बिप्र पढ़ाव पुत्र की नाईं ॥
मैं कपटपूर्वक उनकी सेवा करता । ब्राह्मण बड़े ही दयालु और नीतिके घर थे । हे स्वामी! बाहरसे नम्र देखकर ब्राह्मण मुझे पुत्रकी भाँति मानकर पढ़ाते थे ॥ ३ ॥
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* *१००८ रामचरितमानस
संभु मंत्र मोहि द्विजबर दीन्हा । सुभ उपदेस बिबिध बिधि कीन्हा ॥
जपउँ मंत्र सिव मंदिर जाई । हृदयँ दंभ अहमिति अधिकाई ॥
उन ब्राह्मणश्रेष्ठने मुझको शिवजीका मन्त्र दिया और अनेकों प्रकारके शुभ उपदेश किये । मैं
शिवजीके मन्दिरमें जाकर मन्त्र जपता । मेरे हृदयमें दम्भ और अहंकार बढ़ गया ॥४ ॥
दो० –- मैं खल मल संकुल मति नीच जाति बस मोह ।
हरिजन द्विज देखें जरउँ करउँ बिष्नु कर द्रोह ॥ १०५ ( क ) ॥
मैं दुष्ट, नीच जाति और पापमयी मलिन बुद्धिवाला मोहवश श्रीहरिके भक्तों और द्विजोंको देखते ही जल उठता और विष्णुभगवान्से द्रोह करता था ॥१०५ ( क ) ॥
सो० – गुर नित मोहि प्रबोध दुखित देखि आचरन मम ।
मोहि उपजइ अति क्रोध दंभिहि नीतिकि भावई ॥ १०५ ( ख ) ॥
गुरुजी मेरे आचरण देखकर दुखित थे । वे मुझे नित्य ही भलीभाँति समझाते, पर [ मैं कुछ भी नहीं समझता, उलटे ] मुझे अत्यन्त क्रोध उत्पन्न होता । दम्भीको कभी नीति अच्छी लगती है? ॥१०५ (ख) ॥
एक बार गुर लीन्ह बोलाई । मोहि नीति बहु भाँति सिखाई ॥
सिव सेवा कर फल सुत सोई । अबिरल भगति राम पद होई ॥
एक बार गुरुजीने मुझे बुला लिया और बहुत प्रकारसे [ परमार्थ ] नीतिकी शिक्षा दी कि हे पुत्र! शिवजीकी सेवाका फल यही है कि श्रीरामजीके चरणोंमें प्रगाढ़ भक्ति हो॥१ ॥
रामहि भजहिं तात सिव धाता । नर पावर कै केतिक बाता ॥
जासु चरन अज सिव अनुरागी । तासु द्रोहँ सुख चहसि अभागी ॥
हे तात! शिवजी और ब्रह्माजी भी श्रीरामजीको भजते हैं [ फिर ] नीच मनुष्यकी तो बात ही कितनी है? ब्रह्माजी और शिवजी जिनके चरणोंके प्रेमी हैं, अरे अभागे! उनसे द्रोह करके तू सुख चाहता है? ॥२ ॥
हर कहुँ हरि सेवक गुर कहेऊ । सुनि खगनाथ हृदय मम दहेऊ ॥
अधम जाति मैं बिद्या पाएँ । भयउ जथा अहि दूध पिआएँ ॥
गुरुजीने शिवजीको हरिका सेवक कहा । यह सुनकर हे पक्षिराज! मेरा हृदय जल उठा । नीच जातिका मैं विद्या पाकर ऐसा हो गया जैसे दूध पिलानेसे साँप ॥३ ॥
मानी कुटिल कुभाग्य कुजाती । गुर कर द्रोह करउँ दिनु राती ॥
अति दयाल गुर स्वल्प न क्रोधा । पुनि पुनि मोहि सिखाव सुबोधा ॥