श्रीरामचरितमानस — पृष्ठ 991–1000

श्रीरामचरितमानस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 991–1000

पृष्ठ 991

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* उत्तरकाण्ड * ९८९ भक्तिहीन ब्रह्मा ही क्यों न हो, वह मुझे सब जीवोंके समान ही प्रिय है । परन्तु भक्तिमान् अत्यन्त नीच भी प्राणी मुझे प्राणोंके समान प्रिय है, यह मेरी घोषणा है ॥५ ॥

दो०- सुचि सुसील सेवक सुमति प्रिय कहु काहि न लाग ।

श्रुति पुरान कह नीति असि सावधान सुनु काग ॥ ८६ ॥

पवित्र, सुशील और सुन्दर बुद्धिवाला सेवक, बता, किसको प्यारा नहीं लगता? वेद और

पुराण ऐसी ही नीति कहते हैं । हे काक! सावधान होकर सुन ॥८६ ॥

एक पिता के बिपुल कुमारा । होहिं पृथक गुन सील अचारा ॥

कोउ पंडित कोउ तापस ग्याता । कोउ धनवंत सूर कोउ दाता ॥

एक पिता बहुत से पुत्र पृथक् पृथक् गुण, स्वभाव और आचरणवाले होते हैं । कोई पण्डित होता है, कोई तपस्वी, कोई ज्ञानी, कोई धनी, कोई शूरवीर, कोई दानी,॥ १ ॥

कोउ सर्बग्य धर्मरत कोई । सब पर पितहि प्रीति सम होई ॥

कोड पितु भगत बचन मन कर्मा । सपनेहुँ जान न दूसर धर्मा ॥

कोई सर्वज्ञ और कोई धर्मपरायण होता है । पिताका प्रेम इन सभीपर समान होता है । परन्तु इनमेंसे यदि कोई मन, वचन और कर्मसे पिताका ही भक्त होता है, स्वप्नमें भी दूसरा धर्म नहीं जानता, ॥ २ ॥

सो सुत प्रिय पितु प्रान समाना । जद्यपि सो सब भाँति अयाना ॥

एहि बिधि जीव चराचर जेते । त्रिजग देव नर असुर समेते ॥

वह पुत्र पिताको प्राणोंके समान प्रिय होता है, यद्यपि ( चाहे ) वह सब प्रकारसे अज्ञान ( मूर्ख ) ही हो । इस प्रकार तिर्यक् ( पशु- पक्षी ), देव, मनुष्य और असुरोंसमेत जितने भी चेतन और जड जीव हैं, ॥३ ॥

अखिल बिस्व यह मोर उपाया । सब पर मोहि बराबरि दाया ॥

तिन्ह महँ जो परिहरि मद माया । भजै मोहि मन बच अरु काया ॥

[ उनसे भरा हुआ] यह सम्पूर्ण विश्व मेरा ही पैदा किया हुआ है । अतः सबपर मेरी बराबर दया है । परन्तु इनमेंसे जो मद और माया छोड़कर मन, वचन और शरीरसे मुझको भजता है, ॥४ ॥

दो० - पुरुष नपुंसक नारि वा जीव चराचर कोइ ।

सर्ब भाव भज कपट तजि मोहि परम प्रिय सोइ ॥ ८७ ( क ) ॥

वह पुरुष हो, नपुंसक हो, स्त्री हो अथवा चर- अचर कोई भी जीव हो, कपट छोड़कर जो भी सर्वभावसे मुझे भजता है वही मुझे परम प्रिय है ॥ ८७ ( क ) ॥

पृष्ठ 992

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* *९९० रामचरितमानस

सो०– सत्य कहउँ खग तोहि सुचि सेवक मम प्रानप्रिय ।

अस बिचारि भजु मोहि परिहरि आस भरोस सब ॥ ८७ ( ख ) ॥

हे पक्षी! मैं तुझसे सत्य कहता हूँ, पवित्र ( अनन्य एवं निष्काम) सेवक मुझे प्राणोंके समान प्यारा है । ऐसा विचारकर सब आशा- भरोसा छोड़कर मुझीको भज ॥ ८७ ( ख ) ॥

कबहूँ काल न ब्यापिहि तोही । सुमिरेसु भजेसु निरंतर मोही ॥

प्रभु बचनामृत सुनि न अघाऊँ । तनु पुलकित मन अति हरषाऊँ ॥

तुझे काल कभी नहीं व्यापेगा । निरन्तर मेरा स्मरण और भजन करते रहना । प्रभुके वचनामृत सुनकर मैं तृप्त नहीं होता था । मेरा शरीर पुलकित था और मनमें मैं अत्यन्त ही हर्षित हो रहा था ॥ १ ॥

सो सुख जानइ मन अरु काना । नहिं रसना पहिं जाइ बखाना ॥

प्रभु सोभा सुख जानहिं नयना । कहि किमि सकहिं तिन्हहि नहिं बयना ॥

वह सुख मन और कान ही जानते हैं । जीभसे उसका बखान नहीं किया जा सकता । प्रभुकी शोभाका वह सुख नेत्र ही जानते हैं । पर वे कह कैसे सकते हैं? उनके वाणी तो है नहीं ॥ २ ॥

बहु बिधि मोहि प्रबोधि सुख देई । लगे करन सिसु कौतुक तेई ॥

सजल नयन कछु मुख करि रूखा । चितइ मातु लागी अति भूखा ॥

मुझे बहुत प्रकारसे भलीभाँति समझाकर और सुख देकर प्रभु फिर वही बालकोंके खेल करने लगे । नेत्रोंमें जल भरकर और मुखको कुछ रूखा [ -सा] बनाकर उन्होंने माताकी ओर देखा— [ और मुखाकृति तथा चितवनसे माताको समझा दिया कि ] बहुत भूख लगी है ॥३ ॥

देखि मातु आतुर उठि धाई । कहि मृदु बचन लिए उर लाई ॥

गोद राखि कराव पय पाना । रघुपति चरित ललित कर गाना ॥

यह देखकर माता तुरंत उठ दौड़ीं और कोमल वचन कहकर उन्होंने श्रीरामजीको छातीसे लगा लिया । वे गोदमें लेकर उन्हें दूध पिलाने लगीं और श्रीरघुनाथजी ( उन्हीं ) की ललित लीलाएँ गाने लगीं ॥ ४ ॥

सो० –- जेहि सुख लागि पुरारि असुभ बेष कृत सिव सुखद ।

अवधपुरी नर नारि तेहि सुख महुँ संतत मगन ॥ ८८ ( क ) ॥

जिस सुखके लिये [ सबको ] सुख देनेवाले कल्याणरूप त्रिपुरारि शिवजीने अशुभ वेष धारण किया, उस सुखमें अवधपुरीके नर-नारी निरन्तर निमग्न रहते हैं ॥ ८८ ( क ) ॥

सोई सुख लवलेस जिन्ह बारक सपनेहुँ लहेउ ।

ते नहिं गनहिं खगेस ब्रह्मसुखहि सज्जन सुमति ॥ ८८ ( ख ) ॥

पृष्ठ 993

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* उत्तरकाण्ड * ९९ १ उस सुखका लवलेशमात्र जिन्होंने एक बार स्वप्नमें भी प्राप्त कर लिया, हे पक्षिराज! वे सुन्दर बुद्धिवाले सज्जन पुरुष उसके सामने ब्रह्मसुखको भी कुछ नहीं गिनते ॥ ८८ ( ख ) ॥

मैं पुनि अवध रहेउँ कछु काला । देखेउँ बालबिनोद रसाला ॥

राम प्रसाद भगति बर पायउँ । प्रभु पद बंदि निजाश्रम आयउँ ॥

मैं और कुछ समयतक अवधपुरीमें रहा और मैंने श्रीरामजीकी रसीली बाललीलाएँ देखीं । श्रीरामजीकी कृपासे मैंने भक्तिका वरदान पाया । तदनन्तर प्रभुके चरणोंकी वन्दना करके मैं अपने आश्रमपर लौट आया ॥ १ ॥

तब ते मोहि न ब्यापी माया । जब ते रघुनायक अपनाया ॥

यह सब गुप्त चरित मैं गावा । हरि मायाँ जिमि मोहि नचावा ॥

इस प्रकार जबसे श्रीरघुनाथजीने मुझको अपनाया, तबसे मुझे माया कभी नहीं व्यापी । श्रीहरिकी मायाने मुझे जैसे नचाया, वह सब गुप्त चरित्र मैंने कहा ॥२ ॥

निज अनुभव अब कहउँ खगेसा । बिनु हरि भजन न जाहिं कलेसा ॥

राम कृपा बिनु सुनु खगराई । जानि न जाइ राम प्रभुताई ॥

हे पक्षिराज गरुड़! अब मैं आपसे अपना निजी अनुभव कहता हूँ । [ वह यह है कि] भगवान्के भजन बिना क्लेश दूर नहीं होते । हे पक्षिराज! सुनिये, श्रीरामजीकी कृपा बिना श्रीरामजीकी प्रभुता नहीं जानी जाती; ॥ ३ ॥

जानें बिनु न होइ परतीती । बिनु परतीति होइ नहिं प्रीती ॥

प्रीति बिना नहिं भगति दिढ़ाई । जिमि खगपति जल कै चिकनाई ॥

प्रभुता जाने बिना उनपर विश्वास नहीं जमता, विश्वासके बिना प्रीति नहीं होती और प्रीति बिना भक्ति वैसे ही दृढ़ नहीं होती जैसे हे पक्षिराज! जलकी चिकनाई ठहरती नहीं ॥४ ॥

सो०- बिनु गुर होइ कि ग्यान ग्यान कि होइ बिराग बिनु ।

गावहिं बेद पुरान सुख कि लहिअ हरि भगति बिनु ॥ ८ ९ ( क ) ॥

गुरुके बिना कहीं ज्ञान हो सकता है? अथवा वैराग्यके बिना कहीं ज्ञान हो सकता है? इसी तरह वेद और पुराण कहते हैं कि श्रीहरिकी भक्तिके बिना क्या सुख मिल सकता है? ॥ ८ ९ ( क) ॥

कोउ बिश्राम कि पाव तात सहज संतोष बिनु ।

चलै कि जल बिनु नाव कोटि जतन पचि पचि मरिअ ॥ ८ ९ ( ख ) ॥

हे तात! स्वाभाविक संतोषके बिना क्या कोई शान्ति पा सकता है? [ चाहे ] करोड़ों उपाय करके पच-पच मरिये; [फिर भी ] क्या कभी जलके बिना नाव चल सकती है? ॥ ८ ९ ( ख ) ॥

पृष्ठ 994

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* *९९ २ रामचरितमानस

बिनु संतोष न काम नसाहीं । काम अछत सुख सपनेहुँ नाहीं ॥

राम भजन बिनु मिटहिं कि कामा । थल बिहीन तरु कबहुँ कि जामा ॥

संतोषके बिना कामनाका नाश नहीं होता और कामनाओंके रहते स्वप्नमें भी सुख नहीं हो सकता । और श्रीरामके भजन बिना कामनाएँ कहीं मिट सकती हैं? बिना धरतीके भी कहीं पेड़ उग सकता है? ॥१ ॥

बिनु बिग्यान कि समता आवइ । कोउ अवकास कि नभ बिनु पावइ ॥

श्रद्धा बिना धर्म नहिं होई । बिनु महि गंध कि पावइ कोई ॥

विज्ञान ( तत्त्वज्ञान ) के बिना क्या समभाव आ सकता है? आकाशके बिना क्या कोई अवकाश ( पोल ) पा सकता है? श्रद्धाके बिना धर्म [का आचरण ] नहीं होता | क्या पृथ्वीतत्त्वके बिना कोई गन्ध पा सकता है? ॥२ ॥

बिनु तप तेज कि कर बिस्तारा । जल बिनु रस कि होइ संसारा ॥

सील कि मिल बिनु बुध सेवकाई । जिमि बिनु तेज न रूप गोसाँई ॥

तपके बिना क्या तेज फैल सकता है? जल-तत्त्वके बिना संसारमें क्या रस हो सकता है? पण्डितजनोंकी सेवा बिना क्या शील (सदाचार) प्राप्त हो सकता है? हे गोसाईं! जैसे बिना तेज ( अग्नि-तत्त्व ) के रूप नहीं मिलता ॥ ३ ॥

निज सुख बिनु मन होइ कि थीरा । परस कि होइ बिहीन समीरा ॥

कवनिउ सिद्धि कि बिनु बिस्वासा । बिनु हरि भजन न भव भय नासा ॥

निज - सुख ( आत्मानन्द ) के बिना क्या मन स्थिर हो सकता है? वायु-तत्त्वके बिना क्या स्पर्श हो सकता है? क्या विश्वासके बिना कोई भी सिद्धि हो सकती है? इसी प्रकार श्रीहरिके भजन बिना जन्म - मृत्युके भयका नाश नहीं होता ॥ ४ ॥

दो० – बिनु बिस्वास भगति नहिं तेहि बिनु द्रवहिं न रामु ।

राम कृपा बिनु सपनेहुँ जीव न लह बिश्रामु ॥ ९ ० ( क ) ॥

बिना विश्वासके भक्ति नहीं होती, भक्तिके बिना श्रीरामजी पिघलते ( ढरते ) नहीं और श्रीरामजीकी कृपाके बिना जीव स्वप्नमें भी शान्ति नहीं पाता ॥ ९ ० ( क ) ॥

सो० – अस बिचारि मतिधीर तजि कुतर्क संसय सकल ।

भजहु राम रघुबीर करुनाकर सुंदर सुखद ॥ ९ ० ( ख ) ॥

हे धीरबुद्धि! ऐसा विचारकर सम्पूर्ण कुतर्कों और सन्देहोंको छोड़कर करुणाकी खान सुन्दर और सुख देनेवाले श्रीरघुवीरका भजन कीजिये ॥ ९ ० ( ख ) ॥

पृष्ठ 995

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* उत्तरकाण्ड * ९९३

निज मति सरिस नाथ मैं गाई । प्रभु प्रताप महिमा खगराई ॥

कहेउँ न कछु करि जुगुति बिसेषी । यह सब मैं निज नयनन्हि देखी ॥

हे पक्षिराज! हे नाथ! मैंने अपनी बुद्धिके अनुसार प्रभुके प्रताप और महिमाका गान किया । मैंने इसमें कोई बात युक्तिसे बढ़ाकर नहीं कही है । यह सब अपनी आँखों देखी कही है ॥१ ॥

महिमा नाम रूप गुन गाथा । सकल अमित अनंत रघुनाथा ॥

निज निज मति मुनि हरि गुन गावहिं । निगम सेष सिव पार न पावहिं ॥

श्रीरघुनाथजीकी महिमा, नाम, रूप और गुणोंकी कथा सभी अपार एवं अनन्त हैं तथा श्रीरघुनाथजी स्वयं भी अनन्त हैं । मुनिगण अपनी- अपनी बुद्धिके अनुसार श्रीहरिके गुण गाते हैं । वेद, शेष और शिवजी भी उनका पार नहीं पाते ॥ २ ॥

तुम्हहि आदि खग मसक प्रजंता । नभ उड़ाहिं नहिं पावहिं अंता ॥

तिमि रघुपति महिमा अवगाहा । तात कबहुँ कोउ पाव कि थाहा ॥

आपसे लेकर मच्छरपर्यन्त सभी छोटे - बड़े जीव आकाशमें उड़ते हैं, किन्तु आकाशका अन्त कोई नहीं पाते । इसी प्रकार हे तात! श्रीरघुनाथजीकी महिमा भी अथाह है । क्या कभी कोई उसकी थाह पा सकता है? ॥ ३ ॥

रामु काम सत कोटि सुभग तन । दुर्गा कोटि अमित अरि मर्दन ॥

सक्र कोटि सत सरिस बिलासा । नभ सत कोटि अमित अवकासा ॥

श्रीरामजीका अरबों कामदेवोंके समान सुन्दर शरीर है । वे अनन्त कोटि दुर्गाओंके समान शत्रुनाशक हैं । अरबों इन्द्रोंके समान उनका विलास ( ऐश्वर्य ) है । अरबों आकाशोंके समान उनमें अनन्त अवकाश ( स्थान ) है ॥४ ॥

दो० – मरुत कोटि सत बिपुल बल रबि सत कोटि प्रकास ।

ससि सत कोटि सुसीतल समन सकल भव त्रास ॥ ९ १ ( क ) ॥

अरबों पवनके समान उनमें महान् बल है और अरबों सूर्योंके समान प्रकाश है । अरबों चन्द्रमाओंके समान वे शीतल और संसारके समस्त भयोंका नाश करनेवाले हैं ॥ ९ १ ( क ) ॥

काल कोटि सत सरिस अति दुस्तर दुर्ग दुरंत ।

धूमकेतु सत कोटि सम दुराधरष भगवंत ॥ ९ १ ( ख ) ॥

अरबों कालोंके समान वे अत्यन्त दुस्तर, दुर्गम और दुरन्त हैं । वे भगवान् अरबों धूमकेतुओं ( पुच्छल तारों ) के समान अत्यन्त प्रबल हैं ॥ ९ १ ( ख ) ॥

पृष्ठ 996

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* *९९४ रामचरितमानस

प्रभु अगाध सत कोटि पताला । समन कोटि सत सरिस कराला ॥

तीरथ अमित कोटि सम पावन । नाम अखिल अघ पूग नसावन ॥

अरबों पातालोंके समान प्रभु अथाह हैं । अरबों यमराजोंके समान भयानक हैं । अनन्तकोटि तीर्थोंके समान वे पवित्र करनेवाले हैं । उनका नाम सम्पूर्ण पापसमूहका नाश करनेवाला है ॥ १ ॥

हिमगिरि कोटि अचल रघुबीरा । सिंधु कोटि सत सम गंभीरा ॥

कामधेनु सत कोटि समाना । सकल काम दायक भगवाना ॥

श्रीरघुवीर करोड़ों हिमालयोंके समान अचल ( स्थिर ) हैं और अरबों समुद्रोंके समान गहरे हैं । भगवान् अरबों कामधेनुओंके समान सब कामनाओं ( इच्छित पदार्थों) के देनेवाले हैं ॥२ ॥

सारद कोटि अमित चतुराई । बिधि सत कोटि सृष्टि निपुनाई ॥

बिष्नु कोटि सम पालन कर्ता । रुद्र कोटि सत सम संहर्ता ॥

उनमें अनन्तकोटि सरस्वतियोंके समान चतुरता है । अरबों ब्रह्माओंके समान सृष्टिरचनाकी निपुणता है । वे करोड़ों विष्णुओंके समान पालन करनेवाले और अरबों रुद्रोंके समान संहार करनेवाले हैं ॥३ ॥

धनद कोटि सत सम धनवाना । माया कोटि प्रपंच निधाना ॥

भार धरन सत कोटि अहीसा । निरवधि निरुपम प्रभु जगदीसा ॥

वे अरबों कुबेरोंके समान धनवान् और करोड़ों मायाओंके समान सृष्टिके खजाने हैं । बोझ उठानेमें वे अरबों शेषोंके समान हैं । [ अधिक क्या ] जगदीश्वर प्रभु श्रीरामजी [ सभी बातोंमें ] सीमारहित और उपमारहित हैं ॥४ ॥

छं० —निरुपम न उपमा आन राम समान रामु निगम कहै ।

जिमि कोटि सत खद्योत सम रबि कहत अति लघुता लहै ॥

एहि भाँति निज निज मति बिलास मुनीस हरिहि बखानहीं ।

प्रभु भाव गाहक अति कृपाल सप्रेम सुनि सुख मानहीं ॥

श्रीरामजी उपमारहित हैं, उनकी कोई दूसरी उपमा है ही नहीं । श्रीरामके समान श्रीराम ही हैं, ऐसा वेद कहते हैं । जैसे अरबों जुगनुओंके समान कहनेसे सूर्य [ प्रशंसाको नहीं वरं ] अत्यन्त लघुताको ही प्राप्त होता है ( सूर्यकी निन्दा ही होती है ) । इसी प्रकार अपनी- अपनी बुद्धिके विकासके अनुसार मुनीश्वर श्रीहरिका वर्णन करते हैं । किन्तु प्रभु भक्तोंके भावमात्रको ग्रहण करनेवाले और अत्यन्त कृपालु हैं । वे उस वर्णनको प्रेमसहित सुनकर सुख मानते हैं ।

पृष्ठ 997

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* उत्तरकाण्ड * ९९५

दो० - रामु अमित गुन सागर थाह कि पावइ कोइ ।

संतन्ह सन जस किछु सुनेउँ तुम्हहि सुनायउँ सोइ ॥ ९ २ ( क ) ॥

श्रीरामजी अपार गुणोंके समुद्र हैं, क्या उनकी कोई थाह पा सकता है? संतोंसे मैंने जैसा कुछ सुना था, वही आपको सुनाया ॥ ९ २ ( क) ॥

सो० – भाव बस्य भगवान सुख निधान करुना भवन ।

तजि ममता मद मान भजिअ सदा सीतारवन ॥ ९ २ ( ख ) ॥

सुखके भण्डार, करुणाधाम भगवान् भाव ( प्रेम ) के वश हैं । [ अतएव ] ममता, मद और मानको छोड़कर सदा श्रीजानकीनाथजीका ही भजन करना चाहिये ॥ ९ २ ( ख) ॥

सुनि भुसुंडि के बचन सुहाए । हरषित खगपति पंख फुलाए ॥

नयन नीर मन अति हरषाना । श्रीरघुपति प्रताप उर आना ॥

भुशुण्डिजीके सुन्दर वचन सुनकर पक्षिराजने हर्षित होकर अपने पंख फुला लिये । उनके नेत्रोंमें [ प्रेमानन्दके आँसुओंका ] जल आ गया और मन अत्यन्त हर्षित हो गया । उन्होंने श्रीरघुनाथजीका प्रताप हृदयमें धारण किया ॥१ ॥

पाछिल मोह समुझि पछिताना । ब्रह्म अनादि मनुज करि माना ॥

पुनि पुनि काग चरन सिरु नावा । जानि राम सम प्रेम बढ़ावा ॥

वे अपने पिछले मोहको समझकर ( याद करके ) पछताने लगे कि मैंने अनादि ब्रह्मको मनुष्य करके माना । गरुड़जीने बार- बार काकभुशुण्डिजीके चरणोंपर सिर नवाया और उन्हें श्रीरामजीके ही समान जानकर प्रेम बढ़ाया ॥२ ॥

गुर बिनु भव निधि तरइ न कोई । जौं बिरंचि संकर सम होई ॥

संसय सर्प ग्रसेउ मोहि ताता । दुखद लहरि कुतर्क बहु ब्राता ॥

गुरुके बिना कोई भवसागर नहीं तर सकता, चाहे वह ब्रह्माजी और शंकरजीके समान ही क्यों न हो । [ गरुड़जीने कहा- ] हे तात! मुझे सन्देहरूपी सर्पने डस लिया था और [ साँपके डसनेपर जैसे विष चढ़नेसे लहरें आती हैं, वैसे ही ] बहुत- सी कुतर्करूपी दुःख देनेवाली लहरें आ रही थीं ॥३ ॥

तव सरूप गारुड़ि रघुनायक । मोहिजिआयउ जन सुखदायक ॥

तव प्रसाद मम मोह नसाना । राम रहस्य अनूपम जाना ॥

आपके स्वरूपरूपी गारुड़ी ( साँपका विष उतारनेवाले ) के द्वारा भक्तोंको सुख देनेवाले श्रीरघुनाथजीने मुझे जिला लिया । आपकी कृपासे मेरा मोह नाश हो गया और मैंने श्रीरामजीका अनुपम रहस्य जाना ॥४ ॥

पृष्ठ 998

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* *९९ ६ रामचरितमानस

दो० – ताहि प्रसंसि बिबिधि बिधि सीस नाइ कर जोरि ।

बचन बिनीत सप्रेम मृदु बोलेउ गरुड़ बहोरि ॥ ९ ३ ( क ) ॥

उनकी ( भुशुण्डिजीकी ) बहुत प्रकारसे प्रशंसा करके, सिर नवाकर और हाथ जोड़कर फिर गरुड़जी प्रेमपूर्वक विनम्र और कोमल वचन बोले— ॥ ९ ३ ( क) ॥

प्रभु अपने अबिबेक ते बूझउँ स्वामी तोहि ।

कृपासिंधु सादर कहहु जानि दास निज मोहि ॥ ९ ३ ( ख ) ॥

हे प्रभो! हे स्वामी! मैं अपने अविवेकके कारण आपसे पूछता हूँ । हे कृपाके समुद्र! मुझे अपना ‘ निज दास ' जानकर आदरपूर्वक ( विचारपूर्वक ) मेरे प्रश्नका उत्तर कहिये॥९ ३ ( ख ) ॥

तुम्ह सर्बग्य तग्य तम पारा । सुमति सुसील सरल आचारा ॥

ग्यान बिरति बिग्यान निवासा । रघुनायक के तुम्ह प्रिय दासा ॥

आप सब कुछ जाननेवाले हैं, तत्त्वके ज्ञाता हैं, अन्धकार ( माया ) से परे, उत्तम बुद्धिसे युक्त, सुशील, सरल आचरणवाले, ज्ञान, वैराग्य और विज्ञानके धाम और श्रीरघुनाथजीके प्रिय दास हैं ॥१ ॥

कारन कवन देह यह पाई । तात सकल मोहि कहहु बुझाई ॥

राम चरित सर सुंदर स्वामी । पायहु कहाँ कहहु नभगामी ॥

आपने यह काकशरीर किस कारणसे पाया? हे तात! सब समझाकर मुझसे कहिये । हे स्वामी! हे आकाशगामी! यह सुन्दर रामचरितमानस आपने कहाँ पाया, सो कहिये ॥ २ ॥

नाथ सुना मैं अस सिव पाहीं । महा प्रलयहुँ नास तव नाहीं ॥

मुधा बचन नहिं ईस्वर कहई । सोउ मोरें मन संसय अहई ॥

हे नाथ! मैंने शिवजीसे ऐसा सुना है कि महाप्रलयमें भी आपका नाश नहीं होता और ईश्वर

(शिवजी ) कभी मिथ्या वचन कहते नहीं । वह भी मेरे मनमें सन्देह है ॥३ ॥

अग जग जीव नाग नर देवा । नाथ सकल जगु काल कलेवा ॥

अंड कटाह अमित लयकारी । कालु सदा दुरतिक्रम भारी ॥

[ क्योंकि ] हे नाथ! नाग, मनुष्य, देवता आदि चर-अचर जीव तथा यह सारा जगत् कालका कलेवा है । असंख्य ब्रह्माण्डोंका नाश करनेवाला काल सदा बड़ा ही अनिवार्य है ॥४ ॥

सो० – तुम्हहि न ब्यापत काल अति कराल कारन कवन ।

मोहि सो कहहु कृपाल ग्यान प्रभाव कि जोग बल ॥ ९ ४ ( क ) ॥

पृष्ठ 999

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* उत्तरकाण्ड * ९९ ७ [ ऐसा वह ] अत्यन्त भयङ्कर काल आपको नहीं व्यापता ( आपपर प्रभाव नहीं दिखलाता) इसका क्या कारण है? हे कृपालु! मुझे कहिये, यह ज्ञानका प्रभाव है या योगका बल है? ॥ ९ ४ ( क ) ॥

दो० – प्रभु तव आश्रम आएँ मोर मोह भ्रम भाग ।

कारन कवन सो नाथ सब कहहु सहित अनुराग ॥ ९ ४ ( ख ) ॥

हे प्रभो! आपके आश्रममें आते ही मेरा मोह और भ्रम भाग गया । इसका क्या कारण है? हे नाथ! यह सब प्रेमसहित कहिये ॥ ९४ ( ख ) ॥

गरुड़ गिरा सुनि हरषेउ कागा । बोलेउ उमा परम अनुरागा ॥

धन्य धन्य तव मति उरगारी । प्रस्न तुम्हारि मोहि अति प्यारी ॥

हे उमा! गरुड़जीकी वाणी सुनकर काकभुशुण्डिजी हर्षित हुए और परम प्रेमसे बोले — हे सर्पोंके शत्रु! आपकी बुद्धि धन्य है! धन्य है! आपके प्रश्न मुझे बहुत ही प्यारे लगे ॥१ ॥

सुनि तव प्रस्न सप्रेम सुहाई । बहुत जनम कै सुधि मोहि आई ॥

सब निज कथा कहउँ मैं गाई । तात सुनहु सादर मन लाई ॥

आपके प्रेमयुक्त सुन्दर प्रश्न सुनकर मुझे अपने बहुत जन्मोंकी याद आ गयी । मैं अपनी सब

कथा विस्तारसे कहता हूँ । हे तात! आदरसहित मन लगाकर सुनिये ॥२ ॥

जप तप मख सम दम ब्रत दाना । बिरति बिबेक जोग बिग्याना ॥

सब कर फल रघुपति पद प्रेमा । तेहि बिनु कोउ न पावइ छेमा ॥

अनेक जप, तप, यज्ञ, शम ( मनको रोकना ), दम ( इन्द्रियोंको रोकना ), व्रत, दान, वैराग्य, विवेक, योग, विज्ञान आदि सबका फल श्रीरघुनाथजीके चरणोंमें प्रेम होना है । इसके बिना कोई कल्याण नहीं पा सकता ॥ ३ ॥

एहिं तन राम भगति मैं पाई । ताते मोहि ममता अधिकाई ॥

जेहि तें कछु निज स्वारथ होई । तेहि पर ममता कर सब कोई ॥

मैंने इसी शरीरसे श्रीरामजीकी भक्ति प्राप्त की है । इसीसे इसपर मेरी ममता अधिक है । जिससे अपना कुछ स्वार्थ होता है, उसपर सभी कोई प्रेम करते हैं ॥४ ॥

सो० – पन्नगारि असि नीति श्रुति संमत सज्जन कहहिं ।

अति नीचहु सन प्रीति करिअ जानि निज परम हित ॥ ९ ५ ( क ) ॥

हे गरुड़जी! वेदोंमें मानी हुई ऐसी नीति है और सज्जन भी कहते हैं कि अपना परम हित जानकर अत्यन्त नीचसे भी प्रेम करना चाहिये॥९ ५ ( क ) ॥

पाट कीट तें होइ तेहि तें पाटंबर रुचिर ।

कृमि पालइ सबु कोइ परम अपावन प्रान सम ॥ ९ ५ ( ख ) ॥

पृष्ठ 1000

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* *९९८ रामचरितमानस रेशम कीड़ेसे होता है, उससे सुन्दर रेशमी वस्त्र बनते हैं । इसीसे उस परम अपवित्र कीड़ेको भी सब कोई प्राणोंके समान पालते हैं ॥ ९ ५ ( ख ) ॥

स्वारथ साँच जीव कहुँ एहा । मन क्रम बचन राम पद नेहा ॥

सोइ पावन सोइ सुभग सरीरा । जो तनु पाइ भजिअ रघुबीरा ॥

जीवके लिये सच्चा स्वार्थ यही है कि मन, वचन और कर्मसे श्रीरामजीके चरणोंमें प्रेम हो । वही शरीर पवित्र और सुन्दर है जिस शरीरको पाकर श्रीरघुवीरका भजन किया जाय ॥ १ ॥

राम बिमुख लहि बिधि सम देही । कबि कोबिद न प्रसंसहिं तेही ॥

राम भगति एहिं तन उर जामी । ताते मोहि परम प्रिय स्वामी ॥

जो श्रीरामजीके विमुख है वह यदि ब्रह्माजीके समान शरीर पा जाय तो भी कवि और पण्डित उसकी प्रशंसा नहीं करते । इसी शरीरसे मेरे हृदयमें रामभक्ति उत्पन्न हुई । इसीसे हे स्वामी! यह मुझे परम प्रिय है ॥२ ॥

तजउँ न तन निज इच्छा मरना । तन बिनु बेद भजन नहिं बरना ॥

प्रथम मोहँ मोहि बहुत बिगोवा । राम बिमुख सुख कबहुँ न सोवा ॥

मेरा मरण अपनी इच्छापर है, परन्तु फिर भी मैं यह शरीर नहीं छोड़ता; क्योंकि वेदोंने वर्णन किया है कि शरीरके बिना भजन नहीं होता । पहले मोहने मेरी बड़ी दुर्दशा की । श्रीरामजीके विमुख होकर मैं कभी सुखसे नहीं सोया ॥ ३ ॥

नाना जनम कर्म पुनि नाना । किए जोग जप तप मख दाना ॥

कवन जोनि जनमेउँ जहँ नाहीं । मैं खगेस भ्रमि भ्रमि जग माहीं ॥

अनेकों जन्मोंमें मैंने अनेकों प्रकारके योग, जप, तप, यज्ञ और दान आदि कर्म किये हे गरुड़जी! जगत्में ऐसी कौन योनि है, जिसमें मैंने [ बार - बार ] घूम-फिरकर जन्म न लिया हो ॥४ ॥

देखेउँ करि सब करम गोसाईं । सुखी न भयउँ अबहिं की नाईं ॥

सुधि मोहि नाथ जन्म बहु केरी । सिव प्रसाद मति मोहँ न घेरी ॥

गुसाईं! मैंने सब कर्म करके देख लिये, पर अब ( इस जन्म ) की तरह मैं कभी सुखी नहीं हुआ । हे नाथ! मुझे बहुत से जन्मोंकी याद है । [ क्योंकि ] श्रीशिवजीकी कृपासे मेरी बुद्धिको मोहने नहीं घेरा ॥५ ॥

दो० – प्रथम जन्म के चरित अब कहउँ सुनहु बिहगेस ।

सुनि प्रभु पद रति उपजड़ जातें मिटहिं कलेस ॥ ९ ६ ( क ) ॥