श्रीरामचरितमानस — पृष्ठ 1011–1020

श्रीरामचरितमानस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1011–1020

पृष्ठ 1011

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* उत्तरकाण्ड * १०० ९ अभिमानी, कुटिल, दुर्भाग्य और कुजाति मैं दिन- रात गुरुजीसे द्रोह करता । गुरुजी अत्यन्त दयालु थे, उनको थोड़ा- सा भी क्रोध नहीं आता । [ मेरे द्रोह करनेपर भी ] वे बार - बार मुझे उत्तम ज्ञानकी ही शिक्षा देते थे ॥ ४ ॥

जेहि ते नीच बड़ाई पावा । सो प्रथमहिं हति ताहि नसावा ॥

धूम अनल संभव सुनु भाई । तेहि बुझाव घन पदवी पाई ॥

नीच मनुष्य जिससे बड़ाई पाता है, वह सबसे पहले उसीको मारकर उसीका नाश करता है । हे भाई! सुनिये, आगसे उत्पन्न हुआ धुआँ मेघकी पदवी पाकर उसी अग्निको बुझा देता है ॥ ५ ॥

रज मग परी निरादर रहई । सब कर पद प्रहार नित सहई ॥

मरुत उड़ाव प्रथम तेहि भरई । पुनि नृप नयन किरीटन्हि परई ॥

धूल रास्तेमें निरादरसे पड़ी रहती है और सदा सब [ राह चलनेवालों ] के लातोंकी मार सहती है । पर जब पवन उसे उड़ाता ( ऊँचा उठाता ) है, तो सबसे पहले वह उसी ( पवन ) को भर देती है और फिर राजाओंके नेत्रों और किरीटों ( मुकुटों ) पर पड़ती है ॥ ६ ॥

सुनु खगपति अस समुझि प्रसंगा । बुध नहिं करहिं अधम कर संगा ॥

afa कोबिद गावहिं असि नीती । खल सन कलह न भल नहिं प्रीती ॥

हे पक्षिराज गरुड़जी! सुनिये, ऐसी बात समझकर बुद्धिमान् लोग अधम ( नीच ) का संग नहीं करते । कवि और पण्डित ऐसी नीति कहते हैं कि दुष्टसे न कलह ही अच्छा है, न प्रेम ही ॥७ ॥

उदासीन नित रहिअ गोसाईं । खल परिहरिअ स्वान की नाईं ॥

मैं खल हृदयँ कपट कुटिलाई । गुर हित कहइ न मोहि सोहाई ॥

हे गोसाईं! उससे तो सदा उदासीन ही रहना चाहिये । दुष्टको कुत्तेकी तरह दूरसे ही त्याग देना चाहिये । मैं दुष्ट था, हृदयमें कपट और कुटिलता भरी थी । [ इसीलिये यद्यपि ] गुरुजी हितकी बात कहते थे, पर मुझे वह सुहाती न थी ॥ ८ ॥

दो० - एक बार हर मंदिर जपत रहेउँ सिव नाम ।

गुर आयउ अभिमान तें उठि नहिं कीन्ह प्रनाम ॥ १०६ ( क ) ॥

एक दिन मैं शिवजीके मन्दिरमें शिवनाम जप रहा था । उसी समय गुरुजी वहाँ आये, पर अभिमानके मारे मैंने उठकर उनको प्रणाम नहीं किया ॥ १०६ ( क) ॥

सो दयाल नहिं कहेउ कछु उर न रोष लवलेस ।

अति अघ गुर अपमानता सहि नहिं सके महेस ॥ १०६ ( ख ) ॥

पृष्ठ 1012

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* *१०१० रामचरितमानस गुरुजी दयालु थे, [ मेरा दोष देखकर भी ] उन्होंने कुछ नहीं कहा; उनके हृदयमें लेशमात्र भी क्रोध नहीं हुआ । पर गुरुका अपमान बहुत बड़ा पाप है; अतः महादेवजी उसे नहीं सह सके ॥ १०६ (ख ) ॥

मंदिर माझ भई नभबानी । रे हतभाग्य अग्य अभिमानी ॥

जद्यपि तव गुर कें नहिं क्रोधा । अति कृपाल चित सम्यक बोधा ॥

मन्दिरमें आकाशवाणी हुई कि अरे हतभाग्य! मूर्ख! अभिमानी! यद्यपि तेरे गुरुको क्रोध नहीं है, वे अत्यन्त कृपालु चित्तके हैं और उन्हें [ पूर्ण तथा ] यथार्थ ज्ञान है, ॥ १ ॥

तदपि साप सठ दैहउँ तोही । नीति बिरोध सोहाड न मोही ॥

जौं नहिं दंड करौं खल तोरा । भ्रष्ट होइ श्रुतिमारग मोरा ॥

तो भी हे मूर्ख! तुझको मैं शाप दूँगा; [ क्योंकि ] नीतिका विरोध मुझे अच्छा नहीं लगता । अरे दुष्ट! यदि मैं तुझे दण्ड न दूँ, तो मेरा वेदमार्ग ही भ्रष्ट हो जाय ॥२ ॥

जे सठ गुर सन इरिषा करहीं । रौरव नरक कोटि जुग परहीं ॥

त्रिजग जोनि पुनि धरहिं सरीरा । अयुत जन्म भरि पावहिं पीरा ॥

जो मूर्ख गुरुसे ईर्ष्या करते हैं, वे करोड़ों युगोंतक रौरव नरकमें पड़े रहते हैं । फिर ( वहाँसे निकलकर ) वे तिर्यक् ( पशु, पक्षी आदि) योनियोंमें शरीर धारण करते हैं और दस हजार जन्मोंतक दुःख पाते रहते हैं ॥ ३ ॥

बैठि रहेसि अजगर इव पापी । सर्प होहि खल मल मति ब्यापी ॥

महा बिटप कोटर महुँ जाई । रहु अधमाधम अधगति पाई ॥

अरे पापी! तू गुरुके सामने अजगरकी भाँति बैठा रहा । रे दुष्ट! तेरी बुद्धि पापसे ढक गयी है, [ अत: ] तू सर्प हो जा । और अरे अधमसे भी अधम! इस अधोगति ( सर्पकी नीची योनि) को पाकर किसी बड़े भारी पेड़के खोखलेमें जाकर रह ॥४ ॥

दो० - हाहाकार कीन्ह गुर दारुन सुनि सिव साप ।

कंपित मोहि बिलोकि अति उर उपजा परिताप । १०७ ( क ) ॥

शिवजीका भयानक शाप सुनकर गुरुजीने हाहाकार किया । मुझे काँपता हुआ देखकर उनके हृदयमें बड़ा सन्ताप उत्पन्न हुआ ॥ १०७ ( क ) ॥

करि दंडवत सप्रेम द्विज सिव सन्मुख कर जोरि ।

बिनय करत गदगद स्वर समुझि घोर गति मोरि ॥ १०७ ( ख ) ॥

प्रेमसहित दण्डवत् करके वे ब्राह्मण श्रीशिवजीके सामने हाथ जोड़कर मेरी भयङ्कर गति ( दण्ड ) का विचार कर गद्गद वाणीसे विनती करने लगे- ॥ १०७ ( ख ) ॥

पृष्ठ 1013

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* उत्तरकाण्ड * १०११

नमामीशमीशान निर्वाणरूपं । विभुं व्यापकं ब्रह्म वेदस्वरूपं ॥

निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं । चिदाकाशमाकाशवासं भजेऽहं ॥

हे मोक्षस्वरूप, विभु, व्यापक, ब्रह्म और वेदस्वरूप, ईशान दिशाके ईश्वर तथा सबके स्वामी श्रीशिवजी! मैं आपको नमस्कार करता हूँ । निजस्वरूपमें स्थित ( अर्थात् मायादिरहित ), [ मायिक ] गुणोंसे रहित, भेदरहित, इच्छारहित, चेतन आकाशरूप एवं आकाशको ही वस्त्ररूपमें धारण करनेवाले दिगम्बर [ अथवा आकाशको भी आच्छादित करनेवाले ] आपको मैं भजता हूँ ॥१ ॥

। गिरा ग्यान गोतीतमीशं गिरीशं ॥निराकारमोंकारमूलं तुरीयं

करालं महाकाल कालं कृपालं । गुणागार संसारपारं नतोऽहं ॥

निराकार, ओङ्कारके मूल, तुरीय ( तीनों गुणोंसे अतीत ), वाणी, ज्ञान और इन्द्रियोंसे परे, कैलासपति, विकराल, महाकालके भी काल, कृपालु, गुणोंके धाम, संसारसे परे आप परमेश्वरको मैं नमस्कार करता हूँ॥२ ॥

तुषाराद्रि संकाश गौरं गभीरं । मनोभूत कोटि प्रभा श्री शरीरं ॥

स्फुरन्मौलि कल्लोलिनी चारु गंगा । लसद्भालबालेन्दु कंठे भुजंगा ॥

जो हिमाचलके समान गौरवर्ण तथा गम्भीर हैं, जिनके शरीरमें करोड़ों कामदेवोंकी ज्योति एवं शोभा है, जिनके सिरपर सुन्दर नदी गङ्गाजी विराजमान हैं, जिनके ललाटपर द्वितीयाका चन्द्रमा और गलेमें सर्प सुशोभित हैं ॥३ ॥

चलत्कुंडलं भ्रू सुनेत्रं विशालं । प्रसन्नाननं नीलकंठं दयालं ॥

मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं । प्रियं शंकरं सर्वनाथं भजामि ॥

जिनके कानोंमें कुण्डल हिल रहे हैं, सुन्दर भ्रुकुटी और विशाल नेत्र हैं; जो प्रसन्नमुख, नीलकण्ठ और दयालु हैं; सिंहचर्मका वस्त्र धारण किये और मुण्डमाला पहने हैं; उन सबके प्यारे और सबके नाथ [ कल्याण करनेवाले ] श्रीशङ्करजीको मैं भजता हूँ ॥ ४ ॥

प्रचंडं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं । अखंडं अजं भानुकोटिप्रकाशं ॥

त्रयः शूल निर्मूलनं शूलपाणिं । भजेऽहं भवानीपतिं भावगम्यं ॥

प्रचण्ड ( रुद्ररूप ), श्रेष्ठ, तेजस्वी, परमेश्वर, अखण्ड, अजन्मा, करोड़ों सूर्योंके समान प्रकाशवाले, तीनों प्रकारके शूलों ( दुःखों ) को निर्मूल करनेवाले, हाथमें त्रिशूल धारण किये, भाव ( प्रेम ) के द्वारा प्राप्त होनेवाले भवानीके पति श्रीशङ्करजीको मैं भजता हूँ॥५ ॥

कलातीत कल्याण कल्पान्तकारी । सदा सज्जनानन्ददाता पुरारी ॥

चिदानंद संदोह मोहापहारी । प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी ॥

पृष्ठ 1014

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* * १०१२ रामचरितमानस कलाओंसे परे, कल्याणस्वरूप, कल्पका अन्त ( प्रलय ) करनेवाले, सज्जनोंको सदा आनन्द देनेवाले, त्रिपुरके शत्रु, सच्चिदानन्दघन, मोहको हरनेवाले, मनको मथ डालनेवाले कामदेवके शत्रु, हे प्रभो! प्रसन्न हूजिये, प्रसन्न हूजिये ॥ ६ ॥

न यावद् उमानाथ पादारविन्दं । भजंतीह लोके परे वा नराणां ॥

न तावत्सुखं शान्ति सन्तापनाशं । प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासं ॥

जबतक पार्वतीके पति आपके चरणकमलोंको मनुष्य नहीं भजते, तबतक उन्हें न तो इहलोक और परलोकमें सुख - शान्ति मिलती है और न उनके तापोंका नाश होता है । अत: हे समस्त जीवोंके अंदर ( हृदयमें ) निवास करनेवाले प्रभो! प्रसन्न हूजिये ॥ ७ ॥

न जानामि योगं जपं नैव पूजां । नतोऽहं सदा सर्वदा शंभु तुभ्यं ॥

जरा जन्म दुःखौघ तातप्यमानं । प्रभो पाहि आपन्नमामीश शंभो ॥

मैं न तो योग जानता हूँ, न जप और न पूजा ही । हे शम्भो! मैं तो सदा- सर्वदा आपको ही नमस्कार करता हूँ । हे प्रभो! बुढ़ापा तथा जन्म [ मृत्यु ] के दुःखसमूहोंसे जलते हुए मुझ दुखीकी दुःखसे रक्षा मैं आपको नमस्कार करता हूँ ॥८ ॥

श्लोक –रुद्राष्टकमिदं कीजिये । हे ईश्वर! हे शम्भोप्रोक्तं! विप्रेण हरतोषये ।

ये पठन्ति नरा भक्त्या तेषां शम्भुः प्रसीदति ॥९ ॥

भगवान् रुद्रकी स्तुतिका यह अष्टक उन शङ्करजीकी तुष्टि ( प्रसन्नता ) के लिये ब्राह्मणद्वारा कहा गया । जो मनुष्य इसे भक्तिपूर्वक पढ़ते हैं, उनपर भगवान् शम्भु प्रसन्न होते हैं॥९॥

दो० - सुनि बिनती सर्बग्य सिव देखि बिप्र अनुरागु ।

पुनि मंदिर नभबानी भइ द्विजबर बर मागु ॥ १०८ ( क ) ॥

सर्वज्ञ शिवजीने विनती सुनी और ब्राह्मणका प्रेम देखा । तब मन्दिरमें आकाशवाणी हुई कि हे द्विजश्रेष्ठ! वर माँगो ॥ १०८ ( क ) ॥

जौं प्रसन्न प्रभु मो पर नाथ दीन पर नेहु ।

निज पद भगति देइ प्रभु पुनि दूसर बर देहु ॥ १०८ ( ख) ॥

[ ब्राह्मणने कहा— ] हे प्रभो! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं और हे नाथ! यदि इस दीनपर आपका स्नेह है, तो पहले अपने चरणोंकी भक्ति देकर फिर दूसरा वर दीजिये ॥ १०८ ( ख ) ॥

तव माया बस जीव जड़ संतत फिरइ भुलान ।

तेहि पर क्रोध न करिअ प्रभु कृपासिंधु भगवान ॥ १०८ ( ग ) ॥

पृष्ठ 1015

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* उत्तरकाण्ड * १०१३ हे प्रभो! यह अज्ञानी जीव आपकी मायाके वश होकर निरन्तर भूला फिरता है । हे कृपाके समुद्र भगवान्! उसपर क्रोध न कीजिये ॥ १०८ ( ग ) ॥

संकर दीनदयाल अब एहि पर होहु कृपाल ।

साप अनुग्रह होइ जेहिं नाथ थोरेहीं काल ॥ १०८ ( घ ) ॥

हे दीनोंपर दया करनेवाले [ कल्याणकारी ] शङ्कर! अब इसपर कृपालु होइये ( कृपा कीजिये ), जिससे हे नाथ! थोड़े ही समयमें इसपर शापके बाद अनुग्रह ( शापसे मुक्ति) हो जाय ॥ १०८ ( घ ) ॥

एहि कर होइ परम कल्याना । सोइ करहु अब कृपानिधाना ॥

बिप्र गिरा सुनि परहित सानी । एवमस्तु इति भइ नभबानी ॥

हे कृपानिधान! अब वही कीजिये, जिससे इसका परम कल्याण हो । दूसरेके हितसे सनी हुई ब्राह्मणकी वाणी सुनकर फिर आकाशवाणी हुई-' एवमस्तु ' ( ऐसा ही हो ) ॥१ ॥

जदपि कीन्ह एहिं दारुन पापा । मैं पुनि दीन्हि कोप करि सापा ॥

तदपि तुम्हारि साधुता देखी । करिहउँ एहि पर कृपा बिसेषी ॥

यद्यपि इसने भयानक पाप किया है और मैंने भी इसे क्रोध करके शाप दिया है, तो भी तुम्हारी साधुता देखकर मैं इसपर विशेष कृपा करूँगा ॥२ ॥

छमासील जे पर उपकारी । ते द्विज मोहि प्रिय जथा खरारी ॥

मोर श्राप द्विज ब्यर्थ न जाइहि । जन्म सहस अवस्य यह पाइहि ॥

हे द्विज! जो क्षमाशील एवं परोपकारी होते हैं, वे मुझे वैसे ही प्रिय हैं जैसे खरारि श्रीरामचन्द्रजी । हे द्विज! मेरा शाप व्यर्थ नहीं जायगा । यह हजार जन्म अवश्य पावेगा ॥३ ॥

जनमत मरत दुसह दुख होई । एहि स्वल्पउ नहिं ब्यापिहि सोई ॥

कवनेउँ जन्म मिटिहि नहिं ग्याना । सुनहि सूद्र मम बचन प्रवाना ॥

परन्तु जन्मने और मरनेमें जो दुःसह दुःख होता है, इसको वह दुःख जरा भी न व्यापेगा और किसी भी जन्ममें इसका ज्ञान नहीं मिटेगा । हे शूद्र! मेरा प्रामाणिक ( सत्य ) वचन सुन ॥४ ॥

रघुपति पुरीं जन्म तव भयऊ । पुनि तैं मम सेवाँ मन दयऊ ॥

पुरी प्रभाव अनुग्रह मोरें । राम भगति उपजिहि उर तोरें ॥

[ प्रथम तो ] तेरा जन्म श्रीरघुनाथजीकी पुरीमें हुआ । फिर तूने मेरी सेवामें मन लगाया । पुरीके प्रभाव और मेरी कृपासे तेरे हृदयमें रामभक्ति उत्पन्न होगी ॥५ ॥

सुनु मम बचन सत्य अब भाई । हरितोषन ब्रत द्विज सेवकाई ॥

अब जनि करहि बिप्र अपमाना । जानेसु संत अनंत समाना ॥

पृष्ठ 1016

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* * १०१४ रामचरितमानस हे भाई! अब मेरा सत्य वचन सुन । द्विजोंकी सेवा ही भगवान्‌को प्रसन्न करनेवाला व्रत है ।

अब कभी ब्राह्मणका अपमान न करना । संतोंको अनन्त श्रीभगवान्हीके समान जानना ॥६ ॥

इंद्र कुलिस मम सूल बिसाला । कालदंड हरि चक्र कराला ॥

जो इन्ह कर मारा नहिं मरई ॥ बिप्र द्रोह पावक सो जरई ॥

इन्द्रके वज्र, मेरे विशाल त्रिशूल, कालके दण्ड और श्रीहरिके विकराल चक्रके मारे भी जो नहीं मरता, वह भी विप्रदोहरूपी अग्निसे भस्म हो जाता है ॥७ ॥

अस बिबेक राखेहु मन माहीं । तुम्ह कहँ जग दुर्लभ कछु नाहीं ।

औरउ एक आसिषा मोरी । अप्रतिहत गति होइहि तोरी ॥

ऐसा विवेक मनमें रखना । फिर तुम्हारे लिये जगत्में कुछ भी दुर्लभ न होगा । मेरा एक और भी आशीर्वाद है कि तुम्हारी सर्वत्र अबाध गति होगी ( अर्थात् तुम जहाँ जाना चाहोगे, वहीं बिना रोक -टोकके जा सकोगे ) ॥८ ॥

दो० - सुनि सिव बचन हरषि गुर एवमस्तु इति भाषि ।

मोहि प्रबोधि गयउ गृह संभु चरन उर राखि ॥ १० ९ ( क ) ॥

[ आकाशवाणीके द्वारा ] शिवजीके वचन सुनकर गुरुजी हर्षित होकर ' ऐसा ही हो ' यह कहकर मुझे बहुत समझाकर और शिवजीके चरणोंको हृदयमें रखकर अपने घर गये ॥ १० ९ ( क ) ॥

प्रेरित काल बिंधि गिरि जाइ भयउँ मैं ब्याल ।

पुनि प्रयास बिनु सो तनु तजेउँ गएँ कछु काल ॥ १० ९ ( ख ) ॥

कालकी प्रेरणासे मैं विन्ध्याचलमें जाकर सर्प हुआ । फिर कुछ काल बीतनेपर बिना ही परिश्रम ( कष्ट ) के मैंने वह शरीर त्याग दिया ॥ १० ९ ( ख ) ॥

जोड़ तनु धरउँ तजउँ पुनि अनायास हरिजान ।

जिमि नूतन पट पहिरइ नर परिहरइ पुरान ॥ १० ९ ( ग ) ॥

हे हरिवाहन! मैं जो भी शरीर धारण करता, उसे बिना ही परिश्रम वैसे ही सुखपूर्वक त्याग देता था, जैसे मनुष्य पुराना वस्त्र त्याग देता है और नया पहिन लेता है ॥ १० ९ ( ग ) ॥

सिवँ राखी श्रुति नीति अरु मैं नहिं पावा क्लेस ।

एहि बिधि धरेउँ बिबिधि तनु ग्यान न गयउखगेस ॥ १० ९ ( घ ) ॥

शिवजीने वेदकी मर्यादाकी रक्षा की और मैंने क्लेश भी नहीं पाया । इस प्रकार हे पक्षिराज! मैंने बहुत- से शरीर धारण किये, पर मेरा ज्ञान नहीं गया ॥ १० ९ ( घ ) ॥

त्रिजग देव नर जोइ तनु धरऊँ । तहँ तहँ राम भजन अनुसरऊँ ॥

एक सूल मोहि बिसर न काऊ । गुर कर कोमल सील सुभाऊ ॥

पृष्ठ 1017

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* उत्तरकाण्ड * १०१५ तिर्यक् योनि ( पशु - पक्षी ), देवता या मनुष्यका, जो भी शरीर धारण करता, वहाँ - वहाँ ( उस-उस शरीरमें ) मैं श्रीरामजीका भजन जारी रखता । [इस प्रकार मैं सुखी हो गया ] परन्तु एक शूल मुझे बना रहा । गुरुजीका कोमल, सुशील स्वभाव मुझे कभी नहीं भूलता ( अर्थात् मैंने ऐसे कोमल-स्वभाव दयालु गुरुका अपमान किया, यह दुःख मुझे सदा बना रहा ) ॥१ ॥

चरम देह द्विज कै मैं पाई । सुर दुर्लभ पुरान श्रुति गाई ॥

खेलउँ तहँ बालकन्ह मीला । करउँ सकल रघुनायक लीला ॥

मैंने अन्तिम शरीर ब्राह्मणका पाया, जिसे पुराण और वेद देवताओंको भी दुर्लभ बताते हैं । मैं वहाँ ( ब्राह्मण- शरीरमें ) भी बालकोंमें मिलकर खेलता तो श्रीरघुनाथजीकी ही सब लीलाएँ किया करता ॥ २ ॥

प्रौढ़ भएँ मोहि पिता पढ़ावा । समझउँ सुनउँ गुनउँ नहिं भावा ॥

मन ते सकल बासना भागी । केवल राम चरन लय लागी ॥

सयाना होनेपर पिताजी मुझे पढ़ाने लगे । मैं समझता, सुनता और विचारता, पर मुझे पढ़ना अच्छा नहीं लगता था । मेरे मनसे सारी वासनाएँ भाग गयीं । केवल श्रीरामजीके चरणोंमें लव लग गयी ॥३ ॥

कहु खगेस अस कवन अभागी । खरी सेव सुरधेनुहि त्यागी ॥

प्रेम मगन मोहि कछु न सोहाई । हारेउ पिता पढ़ाई पढ़ाई॥

हे गरुड़जी! कहिये, ऐसा कौन अभागा होगा जो कामधेनुको छोड़कर गदहीकी सेवा करेगा? प्रेममें मग्न रहनेके कारण मुझे कुछ भी नहीं सुहाता । पिताजी पढ़ा- पढ़ाकर हार गये ॥ ४ ॥

भए कालबस जब पितु माता । मैं बन गयउँ भजन जनत्राता ॥

जहँ जहँ बिपिन मुनीस्वर पावउँ । आश्रम जाइ जाइ सिरु नावउँ ॥

जब पिता- माता कालवश हो गये ( मर गये ), तब मैं भक्तोंकी रक्षा करनेवाले श्रीरामजीका भजन करनेके लिये वनमें चला गया । वनमें जहाँ-जहाँ मुनीश्वरोंके आश्रम पाता, वहाँ - वहाँ जा-जाकर उन्हें सिर नवाता ॥५ ॥

बूझउँ तिन्हहि राम गुन गाहा । कहहिं सुनउँ हरषित खगनाहा ॥

सुनत फिरउँ हरि गुन अनुबादा । अव्याहत गति संभु प्रसादा ॥

हे गरुड़जी! उनसे मैं श्रीरामजीके गुणोंकी कथाएँ पूछता । वे कहते और मैं हर्षित होकर सुनता । इस प्रकार मैं सदा- सर्वदा श्रीहरिके गुणानुवाद सुनता फिरता । शिवजीकी कृपासे मेरी सर्वत्र अबाधित गति थी ( अर्थात् मैं जहाँ चाहता वहीं जा सकता था) ॥ ६ ॥

पृष्ठ 1018

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*:*१०१६ रामचरितमानस

छूटी त्रिबिधि ईषना गाढ़ी । एक लालसा उर अति बाढ़ी ॥

राम चरन बारिज जब देखौं । तब निज जन्म सफल करि लेखौं ॥

मेरी तीनों प्रकारकी ( पुत्रकी, धनकी और मानकी ) गहरी प्रबल वासनाएँ छूट गयीं और हृदयमें एक यही लालसा अत्यन्त बढ़ गयी कि जब श्रीरामजीके चरणकमलोंके दर्शन करूँ तब अपना जन्म सफल हुआ समझँ ॥७ ॥

जेहि पूँछउँ सोइ मुनि अस कहई । ईस्वर सर्ब भूतमय अहई ॥

निर्गुन मत नहिं मोहि सोहाई । सगुन ब्रह्म रति उर अधिकाई ॥

जिनसे मैं पूछता, वे ही मुनि ऐसा कहते कि ईश्वर सर्वभूतमय है । यह निर्गुण मत मुझे नहीं सुहाता था । हृदयमें सगुण ब्रह्मपर प्रीति बढ़ रही थी ॥८ ॥

दो० –- गुर के बचन सुरति करि राम चरन मनु लाग ।

रघुपति जस गावत फिरउँ छन छन नव अनुराग ॥ ११० ( क ) ॥

गुरुजीके वचनोंका स्मरण करके मेरा मन श्रीरामजीके चरणोंमें लग गया । मैं क्षण- क्षण नया-नया प्रेम प्राप्त करता हुआ श्रीरघुनाथजीका यश गाता फिरता था ॥ ११० ( क ) ॥

मेरु सिखर बट छायाँ मुनि लोमस आसीन ।

देखि चरन सिरु नायउँ बचन कहेउँ अति दीन ॥ ११० ( ख) ॥

सुमेरुपर्वतके शिखरपर बड़की छायामें लोमश मुनि बैठे थे । उन्हें देखकर मैंने उनके चरणोंमें सिर नवाया और अत्यन्त दीन वचन कहे ॥ ११० (ख ) ॥

सुनि मम बचन बिनीत मृदु मुनि कृपाल खगराज ।

मोहि सादर पूँछत भए द्विज आयहु केहि काज ॥ ११० ( ग ) ॥

हे पक्षिराज! मेरे अत्यन्त नम्र और कोमल वचन सुनकर कृपालु मुनि मुझसे आदरके साथ पूछने लगे— हे ब्राह्मण! आप किस कार्यसे यहाँ आये हैं ॥११० ( ग ) ॥

तब मैं कहा कृपानिधि तुम्ह सर्बग्य सुजान ।

सगुन ब्रह्म अवराधन मोहि कहहु भगवान ॥ ११० ( घ ) ॥

तब मैंने कहा— हे कृपानिधि! आप सर्वज्ञ हैं और सुजान हैं । हे भगवन्! मुझे सगुण ब्रह्मकी आराधना [की प्रक्रिया ] कहिये ॥ ११० ( घ ) ॥

तब मुनीस रघुपति गुन गाथा । कहे कछुक सादर खगनाथा ॥

ब्रह्मग्यान रत मुनि बिग्यानी । मोहि परम अधिकारी जानी ॥

तब हे पक्षिराज! मुनीश्वरने श्रीरघुनाथजीके गुणोंकी कुछ कथाएँ आदरसहित कहीं । फिर वे ब्रह्मज्ञानपरायण विज्ञानवान् मुनि मुझे परम अधिकारी जानकर- ॥१ ॥

पृष्ठ 1019

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* उत्तरकाण्ड * १०१७

लागे करन ब्रह्म उपदेसा । अज अद्वैत अगुन हृदयेसा ॥

अकल अनीह अनाम अरूपा । अनुभव गम्य अखंड अनूपा ॥

ब्रह्मका उपदेश करने लगे कि वह अजन्मा है, अद्वैत है, निर्गुण है और हृदयका स्वामी ( अन्तर्यामी ) है । उसे कोई बुद्धिके द्वारा माप नहीं सकता, वह इच्छारहित, नामरहित, रूपरहित अनुभवसे जाननेयोग्य, अखण्ड और उपमारहित है, ॥ । २ ॥

मन गोतीत अमल अबिनासी । निर्बिकार निरवधि सुख रासी ॥

सो तैं ताहि तोहि नहिं भेदा । बारि बीचि इव गावहिं बेदा ॥

वह मन और इन्द्रियोंसे परे, निर्मल, विनाशरहित, निर्विकार, सीमारहित और सुखकी राशि है । वेद ऐसा गाते हैं कि वही तू है ( तत्त्वमसि ), जल और जलकी लहरकी भाँति उसमें और तुझमें कोई भेद नहीं है ॥३ ॥

बिबिधि भाँति मोहि मुनि समुझावा । निर्गुन मत मम हृदयँ न आवा ॥

पुनि मैं कहेउँ नाइ पद सीसा । सगुन उपासन कहहु मुनीसा ॥

मुनिने मुझे अनेकों प्रकारसे समझाया, पर निर्गुण मत मेरे हृदयमें नहीं बैठा । मैंने फिर मुनिके चरणोंमें सिर नवाकर कहा- हे मुनीश्वर! मुझे सगुण ब्रह्मकी उपासना कहिये ॥४ ॥

राम भगति जल मम मन मीना । किमि बिलगाइ मुनीस प्रबीना ॥

सोइ उपदेस कहहु करि दाया । निज नयनन्हि देखौं रघुराया ॥

मेरा मन रामभक्तिरूपी जलमें मछली हो रहा है ( उसीमें रम रहा है ) । हे चतुर मुनीश्वर! ऐसी दशामें वह उससे अलग कैसे हो सकता है? आप दया करके मुझे वही उपदेश ( उपाय ) कहिये जिससे मैं श्रीरघुनाथजीको अपनी आँखोंसे देख सकूँ ॥५ ॥

भरि लोचन बिलोकि अवधेसा । तब सुनिहउँ निर्गुन उपदेसा ॥

मुनि पुनि कहि हरिकथा अनूपा । खंडि सगुन मत अगुन निरूपा ॥

[ पहले ] नेत्र भरकर श्रीअयोध्यानाथको देखकर, तब निर्गुणका उपदेश सुनूँगा । मुनिने फिर अनुपम हरिकथा कहकर, सगुण मतका खण्डन करके निर्गुणका निरूपण किया ॥६ ॥

तब मैं निर्गुन मत कर दूरी । सगुन निरूपउँ करि हठ भूरी ॥

उत्तर प्रतिउत्तर मैं कीन्हा । मुनि तन भए क्रोध के चीन्हा ॥

तब मैं निर्गुण मतको हटाकर ( काटकर ) बहुत हठ करके सगुणका निरूपण करने लगा । मैंने उत्तर- प्रत्युत्तर किया, इससे मुनिके शरीरमें क्रोधके चिह्न उत्पन्न हो गये ॥७ ॥

पृष्ठ 1020

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* *१०१८ रामचरितमानस

सुनु प्रभु बहुत अवग्या किएँ । उपज क्रोध ग्यानिन्ह के हिएँ ॥

अति संघरषन जौं कर कोई । अनल प्रगट चंदन ते होई ॥

हे प्रभो! सुनिये, बहुत अपमान करनेपर ज्ञानीके भी हृदयमें क्रोध उत्पन्न हो जाता है । यदि कोई चन्दनकी लकड़ीको बहुत अधिक रगड़े, तो उससे भी अग्नि प्रकट हो जायगी ॥ ८ ॥

दो० – बारंबार सकोप मुनि करइ निरूपन ग्यान ।

मैं अपने मन बैठ तब करउँ बिबिधि अनुमान ॥ १११ ( क ) ॥

मुनि बार- बार क्रोधसहित ज्ञानका निरूपण करने लगे । तब मैं बैठा-बैठा अपने मनमें अनेकों प्रकारके अनुमान करने लगा ॥ १११ ( क ) ॥

क्रोध कि द्वैतबुद्धि बिनु द्वैत कि बिनु अग्यान ।

मायाबस परिछिन्न जड़ जीव कि ईस समान ॥ १११ ( ख ) ॥

बिना द्वैतबुद्धिके क्रोध कैसा और बिना अज्ञानके क्या द्वैतबुद्धि हो सकती है? मायाके वश रहनेवाला परिच्छिन्न जड़ जीव क्या ईश्वरके समान हो सकता है? ॥ १११ ( ख ) ॥

कबहुँ कि दुख सब कर हित ताकें । तेहि कि दरिद्र परस मनि जाकें ॥

परद्रोही की होहिं निसंका । कामी पुनि कि रहहिं अकलंका ॥

सबका हित चाहनेसे क्या कभी दुःख हो सकता है? जिसके पास पारसमणि है, उसके पास क्या दरिद्रता रह सकती है? दूसरेसे द्रोह करनेवाले क्या निर्भय हो सकते हैं और कामी क्या कलङ्करहित ( बेदाग ) रह सकते हैं? ॥१ ॥

बंस कि रह द्विज अनहित कीन्हें । कर्म कि होहिं स्वरूपहि चीन्हें ॥

काहू सुमति कि खल सँग जामी । सुभ गति पाव कि परत्रिय गामी ॥

ब्राह्मणका बुरा करनेसे क्या वंश रह सकता है? स्वरूपकी पहिचान ( आत्मज्ञान ) होनेपर क्या [ आसक्तिपूर्वक ] कर्म हो सकते हैं? दुष्टोंके सङ्गसे क्या किसीके सुबुद्धि उत्पन्न हुई है? परस्त्रीगामी क्या उत्तम गति पा सकता है? ॥२ ॥

भव कि परहिं परमात्मा बिंदक । सुखी कि होहिं कबहुँ हरि निंदक ॥

राजु कि रहइ नीति बिनु जानें । अघ कि रहहिं हरिचरित बखानें ॥

परमात्माको जाननेवाले कहीं जन्म- मरण [ के चक्कर ] में पड़ सकते हैं? भगवान्‌की निन्दा करनेवाले कभी सुखी हो सकते हैं? नीति बिना जाने क्या राज्य रह सकता है? श्रीहरिके चरित्र वर्णन करनेपर क्या पाप रह सकते हैं? ॥३ ॥