श्रीरामचरितमानस — पृष्ठ 101–110
श्रीरामचरितमानस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 101–110
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* बालकाण्ड * ९९
ब्रह्मचर्ज ब्रत संजम नाना । धीरज धरम ग्यान बिग्याना ॥
सदाचार जप जोग बिरागा । सभय बिबेक कटकु सबु भागा ॥
ब्रह्मचर्य, नियम, नाना प्रकारके संयम, धीरज, धर्म, ज्ञान, विज्ञान, सदाचार, जप, योग, वैराग्य आदि विवेककी सारी सेना डरकर भाग गयी ॥ ४ ॥
छं० –- भागेउ बिबेकु सहाय सहित सो सुभट संजुग महि मुरे ।
सदग्रंथ पर्बत कंदरन्हि महुँ जाइ तेहि अवसर दुरे ॥
होनिहार का करतार को रखवार जग खरभरु परा ।
दुइ माथ केहि रतिनाथ जेहि कहुँ कोपि कर धनु सरु धरा ॥
विवेक अपने सहायकोंसहित भाग गया, उसके योद्धा रणभूमिसे पीठ दिखा गये । उस समय वे सब सद्ग्रन्थरूपी पर्वतकी कन्दराओंमें जा छिपे ( अर्थात् ज्ञान, वैराग्य, संयम, नियम, सदाचारादि ग्रन्थोंमें ही लिखे रह गये; उनका आचरण छूट गया ) । सारे जगत्में खलबली मच गयी [ और सब कहने लगे- ] हे विधाता! अब क्या होनेवाला है, हमारी रक्षा कौन करेगा? ऐसा दो सिरवाला कौन है, जिसके लिये रतिके पति कामदेवने कोप करके हाथमें धनुष -बाण उठाया है?
दो० - जे सजीव जग अचर चर नारि पुरुष अस नाम ।
ते निज निज मरजाद तजि भए सकल बस काम ॥ ८४ ॥
जगत्में स्त्री- पुरुष संज्ञावाले जितने चर- अचर प्राणी थे, वे सब अपनी - अपनी मर्यादा छोड़कर कामके वश हो गये ॥ ८४ ॥
सब के हृदयँ मदन अभिलाषा । लता निहारि नवहिं तरु साखा ॥
नदीं उमगि अंबुधि कहुँ धाईं । संगम करहिं तलाव तलाईं ॥
सबके हृदयमें कामकी इच्छा हो गयी I। लताओं ( बेलों ) को देखकर वृक्षोंकी डालियाँ झुकने लगीं । नदियाँ उमड़ - उमड़कर समुद्रकी ओर दौड़ीं और ताल-तलैयाँ भी आपसमें संगम करने ( मिलने-जुलने लगीं ॥ १ ॥
जहँ असि दसा जड़न्ह कै बरनी । को कहि सकइ सचेतन करनी ॥
पसु पच्छी नभ जल थल चारी । भए कामबस समय बिसारी ॥
जब जड ( वृक्ष, नदी आदि) की यह दशा कही गयी, तब चेतन जीवोंकी करनी कौन कह सकता है? आकाश, जल और पृथ्वीपर विचरनेवाले सारे पशु-पक्षी [ अपने संयोगका ] समय भुलाकर कामके वश हो गये ॥ २ ॥
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* *१०० रामचरितमानस
मदन अंध ब्याकुल सब लोका । निसि दिनु नहिं अवलोकहिं कोका ॥
देव दनुज नर किंनर ब्याला । प्रेत पिसाच भूत बेताला ॥
सब लोग कामान्ध होकर व्याकुल हो गये । चकवा-चकवी रात -दिन नहीं देखते । देव, दैत्य, मनुष्य, किन्नर, सर्प, प्रेत, पिशाच, भूत, बेताल— ॥ ३ ॥
इन्ह कै दसा न कहेउँ बखानी । सदा काम के चेरे जानी ॥
सिद्ध बिरक्त महामुनि जोगी । तेपि कामबस भए बियोगी ॥
ये तो सदा ही कामके गुलाम हैं, यह समझकर मैंने इनकी दशाका वर्णन नहीं किया । सिद्ध, विरक्त, महामुनि और महान् योगी भी कामके वश होकर योगरहित या स्त्रीके विरही हो गये ॥४ ॥
छं० — भए कामबस जोगीस तापस पावँरन्हि की को कहै ।
देखहिं चराचर नारिमय जे ब्रह्ममय देखत रहे ॥
अबला बिलोकहिं पुरुषमय जगु पुरुष सब अबलामयं ।
दुइ दंड भरि ब्रह्मांड भीतर कामकृत कौतुक अयं ॥
जब योगीश्वर और तपस्वी भी कामके वश हो गये, तब पामर मनुष्योंकी कौन कहे? जो समस्त चराचर जगत्को ब्रह्ममय देखते थे, वे अब उसे स्त्रीमय देखने लगे । स्त्रियाँ सारे संसारको पुरुषमय देखने लगीं और पुरुष उसे स्त्रीमय देखने लगे । दो घड़ीतक सारे ब्रह्माण्डके अंदर कामदेवका रचा हुआ यह कौतुक ( तमाशा ) रहा ।
सो० –धरी न काहूँ धीर सब के मन मनसिज हरे ।
जे राखे रघुबीर ते उबरे तेहि काल महुँ ॥ ८५ ॥
किसीने भी हृदयमें धैर्य नहीं धारण किया, कामदेवने सबके मन हर लिये । श्रीरघुनाथजीने जिनकी रक्षा की, केवल वे ही उस समय बचे रहे ॥ ८५ ॥
उभय घरी अस कौतुक भयऊ । जौ लगि कामु संभु पहिं गयऊ ॥
सिवहि बिलोकि ससंकेड मारू । भयउ जथाथिति सबु संसारू ॥।
दो घड़ीतक ऐसा तमाशा हुआ, जबतक कामदेव शिवजीके पास पहुँच गया । शिवजीको देखकर कामदेव डर गया, तब सारा संसार फिर जैसा -का-तैसा स्थिर हो गया ॥१ ॥
भए तुरत सब जीव सुखारे । जिमि मद उतरि गएँ मतवारे ॥
रुद्रहि देखि मदन भय माना । दुराधरष दुर्गम भगवाना ॥
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* बालकाण्ड * १०१ तुरंत ही सब जीव वैसे ही सुखी हो गये जैसे मतवाले ( नशा पिये हुए ) लोग मद ( नशा ) उतर जानेपर सुखी होते हैं । दुराधर्ष (जिनको पराजित करना अत्यन्त ही कठिन है ) और दुर्गम ( जिनका पार पाना कठिन है ) भगवान् ( सम्पूर्ण ऐश्वर्य, धर्म, यश, श्री, ज्ञान और वैराग्यरूप छः ईश्वरीय गुणोंसे युक्त) रुद्र ( महाभयङ्कर ) शिवजीको देखकर कामदेव भयभीत हो गया ॥ २ ॥
फिरत लाज कछु करि नहिं जाई । मरनु ठानि मन रचेसि उपाई ॥
प्रगटेसि तुरत रुचिर रितुराजा । कुसुमित नव तरु राजि बिराजा ॥
लौट जानेमें लज्जा मालूम होती है और करते कुछ बनता नहीं । आखिर मनमें मरनेका निश्चय करके उसने उपाय रचा । तुरंत ही सुन्दर ऋतुराज वसन्तको प्रकट किया । फूले हुए नये- नये वृक्षोंकी कतारें सुशोभित हो गयीं ॥३ ॥
बन उपबन बापिका तड़ागा । परम सुभग सब दिसा बिभागा ॥
जहँ तहँ जनु उमगत अनुरागा । देखि मुएहुँ मन मनसिज जागा ॥
वन-उपवन, बावली - तालाब और सब दिशाओंके विभाग परम सुन्दर हो गये । जहाँ- तहाँ मानो प्रेम उमड़ रहा है, जिसे देखकर मरे मनोंमें भी कामदेव जाग उठा ॥ ४ ॥
छं० –जागइ मनोभव मुएहुँ मन बन सुभगता न परै कही ।
सीतल सुगंध सुमंद मारुत मदन अनल सखा सही ॥
बिकसे सरन्हि बहु कंज गुंजत पुंज मंजुल मधुकरा ।
कलहंस पिक सुक सरस रख कर गान नाचहिं अपछरा ॥
मरे हुए मनमें भी कामदेव जागने लगा, वनकी सुन्दरता कही नहीं जा सकती । कामरूपी अग्निका सच्चा मित्र शीतल- मन्द-सुगन्धित पवन चलने लगा । सरोवरोंमें अनेकों कमल खिल गये, जिनपर सुन्दर भौंरोंके समूह गुंजार करने लगे । राजहंस, कोयल और तोते रसीली बोली बोलने लगे और अप्सराएँ गा- गाकर नाचने लगीं ।
दो० - सकल कला करि कोटि बिधि हारेउ सेन समेत ।
चली न अचल समाधि सिव कोपेउ हृदयनिकेत ॥ ८६ ॥
कामदेव अपनी सेनासमेत करोड़ों प्रकारकी सब कलाएँ ( उपाय ) करके हार गया, पर
शिवजीकी अचल समाधि न डिगी । तब कामदेव क्रोधित हो उठा ॥८६ ॥
देखि रसाल बिटप बर साखा । तेहि पर चढ़ेउ मदनु मन माखा ॥
सुमन चाप निज सर संधाने । अति रिस ताकि श्रवन लगि ताने ॥
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* *१०२ रामचरितमानस आमके वृक्षकी एक सुन्दर डाली देखकर मनमें क्रोधसे भरा हुआ कामदेव उसपर चढ़ गया । उसने पुष्प- धनुषपर अपने [ पाँचों ] बाण चढ़ाये और अत्यन्त क्रोधसे [ लक्ष्यकी ओर] ताककर उन्हें कानतक तान लिया ॥ १ ॥
छाड़े बिषम बिसिख उर लागे । छूटि समाधि संभु तब जागे ॥
भयउ ईस मन छोभु बिसेषी । नयन उघारि सकल दिसि देखी ॥
कामदेवने तीक्ष्ण पाँच बाण छोड़े, जो शिवजीके हृदयमें लगे । तब उनकी समाधि टूट गयी और वे जाग गये । ईश्वर ( शिवजी ) के मनमें बहुत क्षोभ हुआ । उन्होंने आँखें खोलकर सब ओर देखा ॥२ ॥
सौरभ पल्लव मदनु बिलोका । भयउ कोपु कंपेउ त्रैलोका ॥
तब सिवँ तीसर नयन उघारा । चितवत कामु भयउ जरि छारा ॥
जब आमके पत्तोंमें [ छिपे हुए ] कामदेवको देखा तो उन्हें बड़ा क्रोध हुआ, जिससे तीनों लोक काँप उठे । तब शिवजीने तीसरा नेत्र खोला, उनके देखते ही कामदेव जलकर भस्म हो गया ॥ ३ ॥
हाहाकार भयउ जग भारी । डरपे सुर भए असुर सुखारी ॥
समुझि कामसुखु सोचहिं भोगी । भए अकंटक साधक जोगी ॥
जगत्में बड़ा हाहाकार मच गया । देवता डर गये, दैत्य सुखी हुए । भोगी लोग कामसुखको याद करके चिन्ता करने लगे और साधक योगी निष्कंटक हो गये ॥ ४ ॥
छं० – जोगी अकंटक भए पति गति सुनत रति मुरुछित भई ।
रोदति बदति बहु भाँति करुना करति संकर पहिं गई ॥
अति प्रेम करि बिनती बिबिध बिधि जोरि कर सन्मुख रही ।
प्रभु आसुतोष कृपाल सिव अबला निरखि बोले सही ॥
योगी निष्कंटक हो गये, कामदेवकी स्त्री रति अपने पतिकी यह दशा सुनते ही मूच्छित हो गयी । रोती- चिल्लाती और भाँति- भाँति करुणा करती हुई वह शिवजीके पास गयी । अत्यन्त प्रेमके साथ अनेकों प्रकारसे विनती करके हाथ जोड़कर सामने खड़ी हो गयी । शीघ्र प्रसन्न होनेवाले कृपालु शिवजी अबला ( असहाया स्त्री ) को देखकर सुन्दर ( उसको सान्त्वना देनेवाले ) वचन बोले—
दो०– अब तें रति तव नाथ कर होइहि नामु अनंगु ।
बिनु बपु ब्यापिहि सबहि पुनि सुनु निज मिलन प्रसंगु ॥ ८७ ॥
हे रति! अबसे तेरे स्वामीका नाम अनङ्ग होगा । वह बिना ही शरीरके सबको व्यापेगा । अब तू अपने पतिसे मिलनेकी बात सुन ॥८७ ॥
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* बालकाण्ड * १०३ जब जदुबंस कृष्न अवतारा ॥ होइहि हरन महा महिभारा ॥
कृष्ण तनय होइहि पति तोरा । बचनु अन्यथा होइ न मोरा ॥
जब पृथ्वीके बड़े भारी भारको उतारनेके लिये यदुवंशमें श्रीकृष्णका अवतार होगा, तब तेरा पति उनके पुत्र ( प्रद्युम्न ) के रूपमें उत्पन्न होगा । मेरा यह वचन अन्यथा नहीं होगा ॥ १ ॥
रति गवनी सुनि संकर बानी । कथा अपर अब कहउँ बखानी ॥
देवन्ह समाचार सब पाए । ब्रह्मादिक बैकुंठ सिधाए ॥
शिवजीके वचन सुनकर रति चली गयी । अब दूसरी कथा बखानकर ( विस्तारसे ) कहता हूँ ।
ब्रह्मादि देवताओंने ये सब समाचार सुने तो वे वैकुण्ठको चले ॥२ ॥
सब सुर बिष्नु बिरंचि समेता । गए जहाँ सिव कृपानिकेता ॥
पृथक पृथक तिन्ह कीन्हि प्रसंसा । भए प्रसन्न चंद्र अवतंसा ॥
फिर वहाँसे विष्णु और ब्रह्मासहित सब देवता वहाँ गये जहाँ कृपाके धाम शिवजी थे । उन सबने शिवजीकी अलग- अलग स्तुति की, तब शशिभूषण शिवजी प्रसन्न हो गये ॥३ ॥
बोले कृपासिंधु बृषकेतू । कहहु अमर आए केहि हेतू॥
कह बिधि तुम्ह प्रभु अंतरजामी । तदपि भगति बस बिनवउँ स्वामी ॥
कृपाके समुद्र शिवजी बोले– हे देवताओ! कहिये, आप किसलिये आये हैं? ब्रह्माजीने कहा— हे प्रभो! आप अन्तर्यामी हैं, तथापि हे स्वामी! भक्तिवश मैं आपसे विनती करता हूँ ॥४ ॥
दो० - सकल सुरन्ह के हृदयँ अस संकर परम उछाहु ।
निज नयनन्हि देखा चहहिं नाथ तुम्हार बिबाहु ॥ ८८ ॥
हे शङ्कर! सब देवताओंके मनमें ऐसा परम उत्साह है कि हे नाथ! वे अपनी आँखोंसे आपका विवाह देखना चाहते हैं ॥ ८८ ॥
यह उत्सव देखिअ भरि लोचन । सोइ कछु करहु मदन मद मोचन ॥
कामु जारि रति कहूँ बरु दीन्हा । कृपासिंधु यह अति भल कीन्हा ॥
हे कामदेव मदको चूर करनेवाले! आप ऐसा कुछ कीजिये जिससे सब लोग इस उत्सवको नेत्र भरकर देखें । हे कृपाके सागर! कामदेवको भस्म करके आपने रतिको जो वरदान दिया सो बहुत ही अच्छा किया ॥१ ॥
सासति करि पुनि करहिं पसाऊ । नाथ प्रभुन्ह कर सहज सुभाऊ ॥
पारबतीं तपु कीन्ह अपारा । करहु तासु अब अंगीकारा ॥
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* *१०४ रामचरितमानस हे नाथ! श्रेष्ठ स्वामियोंका यह सहज स्वभाव ही है कि वे पहले दण्ड देकर फिर कृपा किया करते हैं । पार्वतीने अपार तप किया है, अब उन्हें अङ्गीकार कीजिये ॥२ ॥
सुनि बिधि बिनय समुझि प्रभुबानी । ऐसेइ होउ कहा सुखु मानी ॥
तब देवन्ह दुंदुभीं बजाईं । बरषि सुमन जय जय सुर साईं ॥
ब्रह्माजीकी प्रार्थना सुनकर और प्रभु श्रीरामचन्द्रजीके वचनोंको याद करके शिवजीने प्रसन्नतापूर्वक कहा — ‘ ऐसा ही हो । ' तब देवताओंने नगाड़े बजाये और फूलोंकी वर्षा करके ‘ जय हो! देवताओंके स्वामीकी जय हो!' ऐसा कहने लगे ॥ ३ ॥
अवसरु जानि सप्तरिषि आए । तुरतहिं बिधि गिरिभवन पठाए ॥
प्रथम गए जहँ रहीं भवानी । बोले मधुर बचन छल सानी ॥
उचित अवसर जानकर सप्तर्षि आये और ब्रह्माजीने तुरंत ही उन्हें हिमाचलके घर भेज दिया । वे पहले वहाँ गये जहाँ पार्वतीजी थीं और उनसे छलसे भरे मीठे ( विनोदयुक्त, आनन्द पहुँचानेवाले ) वचन बोले—॥४ ॥
दो० – कहा हमार न सुनेहु तब नारद कें उपदेस ।
अब भा झूठ तुम्हार पन जारेउ कामु महेस ॥८ ९ ॥
नारदजीके उपदेशसे तुमने उस समय हमारी बात नहीं सुनी । अब तो तुम्हारा प्रण झूठा हो गया, क्योंकि महादेवजीने कामको ही भस्म कर डाला ॥ ८ ९ ॥ मासपारायण, तीसरा विश्राम
सुनि बोलीं मुसुकाइ भवानी । उचित कहेहु मुनिबर बिरयानी ॥
तुम्हरें जान कामु अब जारा । अब लगि संभु रहे सबिकारा ॥
यह सुनकर पार्वतीजी मुसकराकर बोलीं- हे विज्ञानी मुनिवरो! आपने उचित ही कहा । आपकी समझमें शिवजीने कामदेवको अब जलाया है, अबतक तो वे विकारयुक्त ( कामी ) ही रहे! ॥१ ॥
हमरें जान सदा सिव जोगी । अज अनवद्य अकाम अभोगी ॥
जौं मैं सिव सेये अस जानी । प्रीति समेत कर्म मन बानी ॥
किन्तु हमारी समझसे तो शिवजी सदासे ही योगी, अजन्मा, अनिन्द्य, कामरहित और भोगहीन हैं और यदि मैंने शिवजीको ऐसा समझकर ही मन, वचन और कर्मसे प्रेमसहित उनकी सेवा की है - ॥२ ॥
तौ हमार पन सुनहु मुनीसा । करिहहिं सत्य कृपानिधि ईसा ॥
तुम्ह जो कहा हर जारेउ मारा । सोइ अति बड़ अबिबेकु तुम्हारा ॥
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* बालकाण्ड * १०५ तो हे मुनीश्वरो! सुनिये, वे कृपानिधान भगवान् मेरी प्रतिज्ञाको सत्य करेंगे । आपने जो यह कहा कि शिवजीने कामदेवको भस्म कर दिया, यही आपका बड़ा भारी अविवेक है ॥ ३ ॥
तात अनल कर सहज सुभाऊ । हिम तेहि निकट जाइ नहिं काऊ ॥
गएँ समीप सो अवसि नसाई । असि मन्मथ महेस की नाई ॥
हे तात! अग्निका तो यह सहज स्वभाव ही है कि पाला उसके समीप कभी जा ही नहीं सकता और जानेपर वह अवश्य नष्ट हो जायगा । महादेवजी और कामदेवके सम्बन्धमें भी यही न्याय (बात) समझना चाहिये ॥४ ॥
दो० – हियँ हरषे मुनि बचन सुनि देखि प्रीति बिस्वास ।
चले भवानिहि नाइ सिर गए हिमाचल पास॥९ ० ॥
पार्वतीके वचन सुनकर और उनका प्रेम तथा विश्वास देखकर मुनि हृदयमें बड़े प्रसन्न हुए । वे भवानीको सिर नवाकर चल दिये और हिमाचलके पास पहुँचे ॥९० ॥
सबु प्रसंगु गिरिपतिहि सुनावा । मदन दहन सुनि अति दुखु पावा ॥
बहुरि कहेउ रति कर बरदाना । सुनि हिमवंत बहुत सुखु माना ॥
उन्होंने पर्वतराज हिमाचलको सब हाल सुनाया । कामदेवका भस्म होना सुनकर हिमाचल बहुत दुखी हुए । फिर मुनियोंने रतिके वरदानकी बात कही, उसे सुनकर हिमवान्ने बहुत सुख माना ॥१ ॥
हृदयँ बिचारि संभु प्रभुताई । सादर मुनिबर लिए बोलाई ॥
सुदिनु सुनखतु सुघरी सोचाई । बेगि बेदबिधि लगन धराई ॥
शिवजीके प्रभावको मनमें विचारकर हिमाचलने श्रेष्ठ मुनियोंको आदरपूर्वक बुला लिया और उनसे शुभ दिन, शुभ नक्षत्र और शुभ घड़ी शोधवाकर वेदकी विधिके अनुसार शीघ्र ही लग्न निश्चय कराकर लिखवा लिया ॥ २ ॥
पत्री सप्तरिषिन्ह सोइ दीन्ही । गहि पद बिनय हिमाचल कीन्ही ॥
जाइ बिधिहि तिन्ह दीन्हिसो पाती । बाचत प्रीति न हृदयँ समाती ॥
फिर हिमाचलने वह लग्नपत्रिका सप्तर्षियोंको दे दी और चरण पकड़कर उनकी विनती की । उन्होंने जाकर वह लग्नपत्रिका ब्रह्माजीको दी । उसको पढ़ते समय उनके हृदयमें प्रेम समाता न था ॥ ३ ॥
लगन बाचि अज सबहि सुनाई । हरषे मुनि सब सुर समुदाई ॥
सुमन बृष्टि नभ बाजन बाजे । मंगल कलस दसहुँ दिसि साजे ॥
ब्रह्माजीने लग्न पढ़कर सबको सुनाया, उसे सुनकर सब मुनि और देवताओंका सारा समाज हर्षित हो गया । आकाशसे फूलोंकी वर्षा होने लगी, बाजे बजने लगे और दसों दिशाओंमें मङ्गल-कलश सजा दिये गये ॥ ४ ॥
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* *१०६ रामचरितमानस
दो० - लगे सँवारन सकल सुर बाहन बिबिध बिमान ।
होहिं सगुन मंगल सुभद करहिं अपछरा गान ॥ ९ १ ॥
सब देवता अपने भाँति- भाँतिके वाहन और विमान सजाने लगे, कल्याणप्रद मङ्गल शकुन होने लगे और अप्सराएँ गाने लगीं॥९ १ ॥
सिवहि संभु गन करहिं सिंगारा । जटा मुकुट अहि मौरु सँवारा ॥
कुंडल कंकन पहिरे ब्याला । तन बिभूति पट केहरि छाला ॥
शिवजीके गण शिवजीका शृङ्गार करने लगे । जटाओंका मुकुट बनाकर उसपर साँपोंका मौर सजाया गया । शिवजीने साँपोंके ही कुण्डल और कङ्कण पहने, शरीरपर विभूति रमायी और वस्त्रकी जगह बाघम्बर लपेट लिया ॥ १ ॥
ससि ललाट सुंदर सिर गंगा । नयन तीनि उपबीत भुजंगा ॥
गरल कंठ उर नर सिर माला । असिव बेष सिवधाम कृपाला ॥
शिवजीके सुन्दर मस्तकपर चन्द्रमा, सिरपर गङ्गाजी, तीन नेत्र, साँपोंका जनेऊ, गलेमें विष और छातीपर नरमुण्डोंकी माला थी । इस प्रकार उनका वेष अशुभ होनेपर भी वे कल्याणके धाम और कृपालु हैं ॥२ ॥
कर त्रिसूल अरु डमरु बिराजा । चले बसहँ चढ़ि बाजहिं बाजा ॥
देखि सिवहि सुरत्रिय मुसुकाहीं । बर लायक दुलहिनि जग नाहीं ॥
एक हाथमें त्रिशूल और दूसरेमें डमरू सुशोभित है । शिवजी बैलपर चढ़कर चले । बाजे बज रहे हैं । शिवजीको देखकर देवाङ्गनाएँ मुसकरा रही हैं [ और कहती हैं कि ] इस वरके योग्य दुलहिन संसारमें नहीं मिलेगी ॥ ३ ॥
बिष्नु बिरंचि आदि सुरब्राता । चढ़ि चढ़ि बाहन चले बराता ॥
सुर समाज सब भाँति अनूपा । नहिं बरात दूलह अनुरूपा ॥
विष्णु और ब्रह्मा आदि देवताओंके समूह अपने-अपने वाहनों ( सवारियों ) पर चढ़कर बरातमें चले । देवताओंका समाज सब प्रकारसे अनुपम ( परम सुन्दर) था, पर दूल्हेके योग्य बरात न थी ॥४ ॥
दो० - बिष्नु कहा अस बिहसि तब बोलि सकल दिसिराज ।
बिलग बिलग होइ चलहु सब निज निज सहित समाज ॥ ९ २ ॥
तब विष्णुभगवान्ने सब दिक्पालोंको बुलाकर हँसकर ऐसा कहा– सब लोग अपने - अपने दलसमेत अलग- अलग होकर चलो ॥ ९ २ ॥
बर अनुहारि बरात न भाई । हँसी करैहहु पर पुर जाई ॥
बिष्नु बचन सुनि सुर मुसुकाने । निज निज सेन सहित बिलगाने ॥
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* बालकाण्ड * १०७ हे भाई! हमलोगोंकी यह बरात वरके योग्य नहीं है । क्या पराये नगरमें जाकर हँसी कराओगे? विष्णुभगवान्की बात सुनकर देवता मुसकराये और वे अपनी - अपनी सेनासहित अलग हो गये ॥१ ॥
मनहीं मन महेसु मुसुकाहीं । हरि के बिंग्य बचन नहिं जाहीं ॥
अति प्रिय बचन सुनत प्रिय केरे । भृंगिहि प्रेरि सकल गन टेरे ॥
महादेवजी [ यह देखकर ] मन-ही-मन मुसकराते हैं कि विष्णुभगवान्के व्यङ्गय- वचन ( दिल्लगी ) नहीं छूटते । अपने प्यारे ( विष्णुभगवान् ) के इन अति प्रिय वचनोंको सुनकर शिवजीने भी भृङ्गीको भेजकर अपने सब गणोंको बुलवा लिया ॥ २ ॥
सिव अनुसासन सुनि सब आए । प्रभु पद जलज सीस तिन्ह नाए ॥
नाना बाहन नाना बेषा । बहसे सिव समाज निज देखा ॥
शिवजीकी आज्ञा सुनते ही सब चले आये और उन्होंने स्वामीके चरणकमलोंमें सिर नवाया ।
तरह -तरहकी सवारियों और तरह -तरहके वेषवाले अपने समाजको देखकर शिवजी हँसे ॥३ ॥
कोउ मुखहीन बिपुल मुख काहू । बिनु पद कर कोउ बहु पद बाहू ॥
बिपुल नयन कोउ नयन बिहीना । रिष्टपुष्ट कोउ अति तनखीना ॥
कोई बिना मुखका है, किसीके बहुत-से मुख हैं, कोई बिना हाथ-पैरका है तो किसीके कई हाथ- पैर हैं । किसीके बहुत आँखें हैं तो किसीके एक भी आँख नहीं है । कोई बहुत मोटा -ताजा है तो कोई बहुत ही दुबला- पतला है ॥ ४ ॥
छं० – तन खीन कोउ अति पीन पावन कोउ अपावन गति धरें ।
भूषन कराल कपाल कर सब सद्य सोनित तन भरें ॥
खर स्वान सुअर सृकाल मुख गन बेष अगनित को गनै ।
बहु जिनस प्रेत पिसाच जोगि जमात बरनत नहिं बनै ॥
कोई बहुत दुबला, कोई बहुत मोटा, कोई पवित्र और कोई अपवित्र वेष धारण किये हुए है । भयङ्कर गहने पहने हाथमें कपाल लिये हैं और सब - के - सब शरीरमें ताजा खून लपेटे हुए हैं । गधे, कुत्ते, सूअर और सियारके -से उनके मुख हैं । गणोंके अनगिनत वेषोंको कौन गिने? बहुत प्रकारके प्रेत, पिशाच और योगिनियोंकी जमातें हैं । उनका वर्णन करते नहीं बनता ।
सो० –नाचहिं गावहिं गीत परम तरंगी भूत सब ।
देखत अति बिपरीत बोलहिं बचन बिचित्र बिधि ॥ ९ ३ ॥
भूत-प्रेत नाचते और गाते हैं, वे सब बड़े मौजी हैं । देखनेमें बहुत ही बेढंगे जान पड़ते हैं और बड़े ही विचित्र ढंगसे बोलते हैं॥९ ३ ॥
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* *१०८ रामचरितमानस
जस दूलहु तसि बनी बराता । कौतुक बिबिध होहिं मग जाता ॥
इहाँ हिमाचल रचेउ बिताना । अति बिचित्र नहिं जाइ बखाना ॥
जैसा दूल्हा है, अब वैसी ही बरात बन गयी है । मार्गमें चलते हुए भाँति- भाँतिके कौतुक ( तमाशे ) होते जाते हैं । इधर हिमाचलने ऐसा विचित्र मण्डप बनाया कि जिसका वर्णन नहीं हो सकता ॥ १ ॥
सैल सकल जहँ लगि जग माहीं । लघु बिसाल नहिं बरनि सिराहीं ॥
बन सागर सब नदीं तलावा । हिमगिरि सब कहुँ नेवत पठावा ॥
जगत्में जितने छोटे - बड़े पर्वत थे, जिनका वर्णन करके पार नहीं मिलता तथा जितने वन, समुद्र, नदियाँ और तालाब थे, हिमाचलने सबको नेवता भेजा ॥ २ ॥
कामरूप सुंदर तन धारी । सहित समाज सहित बर नारी ॥
गए सकल तुहिनाचल गेहा । गावहिं मंगल सहित सनेहा ॥
वे सब अपने इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले सुन्दर शरीर धारणकर सुन्दरी स्त्रियों और
समाजोंके साथ हिमाचलके घर गये । सभी स्नेहसहित मङ्गलगीत गाते हैं ॥३ ॥
प्रथमहिं गिरि बहु गृह सँवराए । जथाजोगु तहँ तहँ सब छाए ॥
पुर सोभा अवलोकि सुहाई । लागइ लघु बिरंचि निपुनाई ॥
हिमाचलने पहलेहीसे बहुत-से घर सजवा रखे थे । यथायोग्य उन- उन स्थानोंमें सब लोग उतर गये । नगरकी सुन्दर शोभा देखकर ब्रह्माकी रचना-चातुरी भी तुच्छ लगती थी ॥४ ॥
छं० - लघु लाग बिधि की निपुनता अवलोकि पुर सोभा सही ।
बन बाग कूप तड़ाग सरिता सुभग सब सक को कही ॥
मंगल बिपुल तोरन पताका केतु गृह गृह सोहहीं ।
बनिता पुरुष सुंदर चतुर छबि देखि मुनि मन मोहहीं ॥
नगरकी शोभा देखकर ब्रह्माकी निपुणता सचमुच तुच्छ लगती है । वन, बाग, कुएँ, तालाब, नदियाँ सभी सुन्दर हैं; उनका वर्णन कौन कर सकता है? घर-घर बहुत से मङ्गलसूचक तोरण और ध्वजा- पताकाएँ सुशोभित हो रही हैं । वहाँके सुन्दर और चतुर स्त्री- पुरुषोंकी छबि देखकर मुनियोंके भी मन मोहित हो जाते हैं ।
दो० – जगदंबा जहँ अवतरी सो पुरु बरनि कि जाइ ।
रिद्धि सिद्धि संपत्ति सुख नित नूतन अधिकाइ ॥ ९४ ॥
जिस नगरमें स्वयं जगदम्बाने अवतार लिया, क्या उसका वर्णन हो सकता है? वहाँ ऋद्धि, सिद्धि, सम्पत्ति और सुख नित- नये बढ़ते जाते हैं॥९ ४ ॥