श्रीरामचरितमानस — पृष्ठ 111–120

श्रीरामचरितमानस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 111–120

पृष्ठ 111

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* बालकाण्ड * १० ९

नगर निकट बरात सुनि आई । पुर खरभरु सोभा अधिकाई ॥

करि बनाव सजि बाहन नाना । चले लेन सादर अगवाना ॥

बरातको नगरके निकट आयी सुनकर नगरमें चहल-पहल मच गयी, जिससे उसकी शोभा बढ़ गयी । अगवानी करनेवाले लोग बनाव- श्रृंगार करके तथा नाना प्रकारकी सवारियोंको सजाकर आदरसहित बरातको लेने चले ॥ १ ॥

हियँ हरषे सुर सेन निहारी । हरिहि देखि अति भए सुखारी ॥

सिव समाज जब देखन लागे । बिडरि चले बाहन सब भागे ॥

देवताओंके समाजको देखकर सब मनमें प्रसन्न हुए और विष्णुभगवान्‌को देखकर तो बहुत ही सुखी हुए । किन्तु जब शिवजीके दलको देखने लगे तब तो उनके सब वाहन ( सवारियोंके हाथी, घोड़े, रथके बैल आदि) डरकर भाग चले ॥ २ ॥

धरि धीरजु तहँ रहे सयाने । बालक सब लै जीव पराने ॥

गएँ भवन पूछहिं पितु माता । कहहिं बचन भय कंपित गाता ॥

कुछ बड़ी उम्रके समझदार लोग धीरज धरकर वहाँ डटे रहे । लड़के तो सब अपने प्राण लेकर भागे । घर पहुँचनेपर जब माता- पिता पूछते हैं, तब वे भयसे काँपते हुए शरीरसे ऐसा वचन कहते हैं —॥३ ॥

कहिअ काह कहि जाइ न बाता । जम कर धार किधौं बरिआता ॥

बरु बौराह बसहँ असवारा । ब्याल कपाल बिभूषन छारा ॥

क्या कहें, कोई बात कही नहीं जाती । यह बरात है या यमराजकी सेना? दूल्हा पागल है और बैलपर सवार है । साँप, कपाल और राख ही उसके गहने हैं ॥ ४ ॥

छं० — तन छार ब्याल कपाल भूषन नगन जटिल भयंकरा ।

सँग भूत प्रेत पिसाच जोगिनि बिकट मुख रजनीचरा ॥

जो जिअत रहिहि बरात देखत पुन्य बड़ तेहि कर सही ।

देखिहि सो उमा बिबाहु घर घर बात असि लरिकन्ह कही ॥

दूल्हेके शरीरपर राख लगी है, साँप और कपालके गहने हैं; वह नङ्गा, जटाधारी और भयङ्कर है । उसके साथ भयानक मुखवाले भूत, प्रेत, पिशाच, योगिनियाँ और राक्षस हैं । जो बरातको देखकर जीता बचेगा, सचमुच उसके बड़े ही पुण्य हैं और वही पार्वतीका विवाह देखेगा । लड़कोंने घर- घर यही बात कही ।

दो०– समुझि महेस समाज सब जननि जनक मुसुकाहिं ।

बाल बुझाए बिबिध बिधि निडर होहु डरु नाहिं ॥ ९ ५ ॥

पृष्ठ 112

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* *११० रामचरितमानस महेश्वर ( शिवजी ) का समाज समझकर सब लड़कोंके माता- पिता मुसकराते हैं । उन्होंने बहुत तरहसे लड़कोंको समझाया कि निडर हो जाओ, डरकी कोई बात नहीं है॥९ ५ ॥

लै अगवान बरातहि आए । दिए सबहि जनवास सुहाए ॥

मैनाँ सुभ आरती सँवारी । संग सुमंगल गावहिं नारी ॥

अगवान लोग बरातको लिवा लाये, उन्होंने सबको सुन्दर जनवासे ठहरनेको दिये । मैना ( पार्वतीजीकी माता ) ने शुभ आरती सजायी और उनके साथकी स्त्रियाँ उत्तम मङ्गलगीत गाने लगीं ॥१ ॥

कंचन थार सोह बर पानी । परिछन चली हरहि हरषानी ॥

बिकट बेष रुद्रहि जब देखा । अबलन्ह उर भय भयउ बिसेषा ॥

सुन्दर हाथोंमें सोनेका थाल शोभित है, इस प्रकार मैना हर्षके साथ शिवजीका परछन करने चलीं । जब महादेवजीको भयानक वेषमें देखा तब तो स्त्रियोंके मनमें बड़ा भारी भय उत्पन्न हो गया ॥२ ॥

भागि भवन पैठीं अति त्रासा । गए महेसु जहाँ जनवासा ॥

मैना हृदयँ भयउ दुखु भारी । लीन्ही बोलि गिरीसकुमारी ॥

बहुत ही डरके मारे भागकर वे घरमें घुस गयीं और शिवजी जहाँ जनवासा था, वहाँ चले गये ।

मैनाके हृदयमें बड़ा दुःख हुआ । उन्होंने पार्वतीजीको अपने पास बुला लिया ॥३ ॥

अधिक सनेहँ गोद बैठारी । स्याम सरोज नयन भरे बारी ॥

जेहिं बिधि तुम्हहि रूपु अस दीन्हा । तेहिं जड़ बरु बाउर कस कीन्हा ॥

और अत्यन्त स्नेहसे गोदमें बैठाकर अपने नील कमलके समान नेत्रोंमें आँसू भरकर कहा— जिस विधाताने तुमको ऐसा सुन्दर रूप दिया, उस मूर्खने तुम्हारे दूल्हेको बावला कैसे बनाया? ॥४ ॥

छं० — कस कीन्ह बरु बौराह बिधि जेहिं तुम्हहि सुंदरता दई ।

जो फलु चहिअ सुरतरुहिं सो बरबस बबूरहिं लागई ॥

तुम्ह सहित गिरि तें गिरौं पावक जरौं जलनिधि महुँ परौं । घरु जाउ अपजसु होउ जग जीवत बिबाहु न हौं करौं । जिस विधाताने तुमको सुन्दरता दी, उसने तुम्हारे लिये वर बावला कैसे बनाया? जो फल कल्पवृक्षमें लगना चाहिये, वह जबर्दस्ती बबूलमें लग रहा है । मैं तुम्हें लेकर पहाड़से गिर पड़ेंगी, आगमें जल जाऊँगी या समुद्रमें कूद पडूंगी । चाहे घर उजड़ जाय और संसारभरमें अपकीर्ति फैल जाय, पर जीते - जी मैं इस बावले वरसे तुम्हारा विवाह न करूँगी ।

पृष्ठ 113

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* बालकाण्ड * १११

दो० – भईं बिकल अबला सकल दुखित देखि गिरिनारि ।

करि बिलापु रोदति बदति सुता सनेहु सँभारि ॥ ९ ६ ॥

हिमाचलकी स्त्री ( मैना ) को दुःखी देखकर सारी स्त्रियाँ व्याकुल हो गयीं । मैना अपनी कन्याके स्नेहको याद करके विलाप करती, रोती और कहती थीं- ॥ ९ ६ ॥

नारद कर मैं काह बिगारा । भवनु मोर जिन्ह बसत उजारा ॥

अस उपदेसु उमहि जिन्ह दीन्हा । बौरे बरहि लागि तपु कीन्हा ॥

मैंने नारदका क्या बिगाड़ा था, जिन्होंने मेरा बसता हुआ घर उजाड़ दिया और जिन्होंने पार्वती- को ऐसा उपदेश दिया कि जिससे उसने बावले वरके लिये तप किया ॥१ ॥

साचेहुँ उन्ह कें मोह न माया । उदासीन धनु धामु न जाया ॥

पर घर घालक लाज न भीरा । बाँझ कि जान प्रसव कै पीरा ॥

सचमुच उनके न किसीका मोह है, न माया, न उनके धन है, न घर है और न स्त्री ही है; वे सबसे उदासीन हैं । इसीसे वे दूसरेका घर उजाड़नेवाले हैं । उन्हें न किसीकी लाज है, न डर है । भला, बाँझ स्त्री प्रसवकी पीड़ाको क्या जाने ॥२ ॥

जननिहि बिकल बिलोकि भवानी । बोली जुत बिबेक मृदु बानी ॥

अस बिचारि सोचहि मति माता । सो न टरइ जो रचइ बिधाता ॥

माताको विकल देखकर पार्वतीजी विवेकयुक्त कोमल वाणी बोलीं- हे माता! जो विधाता रच देते हैं, वह टलता नहीं; ऐसा विचारकर तुम सोच मत करो! ॥ ३ ॥

करम लिखा जौं बाउर नाहू । तौ कत दोसु लगाइअ काहू॥

तुम्ह सन मिटहिं कि बिधि के अंका ॥ मातु ब्यर्थ जनि लेहु कलंका ॥

जो मेरे भाग्यमें बावला ही पति लिखा है तो किसीको क्यों दोष लगाया जाय? हे माता! क्या विधाताके अङ्क तुमसे मिट सकते हैं? वृथा कलङ्कका टीका मत लो ॥४ ॥

छं० - जनि लेहु मातु कलंकु करुना परिहरहु अवसर नहीं ।

दुखु सुखु जो लिखा लिलार हमरें जाब जहँ पाउब तहीं ॥

सुनि उमा बचन बिनीत कोमल सकल अबला सोचहीं ।

बहु भाँति बिधिहि लगाइ दूषन नयन बारि बिमोचहीं ॥

हे माता! कलङ्क मत लो, रोना छोड़ो, यह अवसर विषाद करनेका नहीं है । मेरे भाग्यमें जो दुःख- सुख लिखा है, उसे मैं जहाँ जाऊँगी, वहीं पाऊँगी! पार्वतीजीके ऐसे विनयभरे कोमल वचन सुनकर सारी स्त्रियाँ सोच करने लगीं और भाँति - भाँतिसे विधाताको दोष देकर आँखोंसे आँसू बहाने लगीं ।

पृष्ठ 114

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* * ११२ रामचरितमानस

दो० –- तेहि अवसर नारद सहित अरु रिषि सप्त समेत ।

समाचार सुनि तुहिनगिरि गवने तुरत निकेत ॥ ९ ७ ॥

इस समाचारको सुनते ही हिमाचल उसी समय नारदजी और सप्तर्षियोंको साथ लेकर अपने

तबघर गये॥९नारद७ ॥ सबही समुझावा । पूरुब कथाप्रसंगुकथाप्रसंगु सुनावा ॥

मयना सत्य सुनहु मम बानी । जगदंबा तव सुता भवानी ॥

तब नारदजीने पूर्वजन्मकी कथा सुनाकर सबको समझाया [ और कहा ] कि हे मैना! तुम मेरी सच्ची बात सुनो, तुम्हारी यह लड़की साक्षात् जगज्जननी भवानी है ॥ १ ॥

अजा अनादि सक्ति अबिनासिनि । सदा संभु अरधंग निवासिनि ॥

जग संभव पालन लय कारिनि । निज इच्छा लीला बपु धारिनि ॥

ये अजन्मा, अनादि और अविनाशिनी शक्ति हैं । सदा शिवजीके अर्द्धाङ्गमें रहती हैं । ये जगत्की उत्पत्ति, पालन और संहार करनेवाली हैं; और अपनी इच्छासे ही लीला- शरीर धारण करती हैं ॥ २ ॥

जनमीं प्रथम दच्छ गृह जाई । नामु सती सुंदर तनु पाई ॥

तहँहँ सती संकरहि बिबाहीं । कथा प्रसिद्ध सकल जग माहीं ॥

पहले ये दक्षके घर जाकर जन्मी थीं, तब इनका सती नाम था, बहुत सुन्दर शरीर पाया था ।

वहाँ भी सती शङ्करजीसे ही ब्याही गयी थीं । यह कथा सारे जगत्में प्रसिद्ध है ॥३ ॥

एक बार आवत सिव संगा । देखेउ रघुकुल कमल पतंगा ॥

भयउ मोहु सिव कहा न कीन्हा । भ्रम बस बेषु सीय कर लीन्हा ॥

एक बार इन्होंने शिवजीके साथ आते हुए [ राहमें ] रघुकुलरूपी कमलके सूर्य श्रीरामचन्द्रजीको देखा, तब इन्हें मोह हो गया और इन्होंने शिवजीका कहना न मानकर भ्रमवश सीताजीका वेष धारण कर लिया ॥४ ॥

छं० -सिय बेषु सतीं जो कीन्ह तेहिं अपराध संकर परिहरीं ।

हर बिरहँ जाइ बहोरि पितु कें जग्य जोगानल जरीं ॥

अब जनमि तुम्हरे भवन निज पति लागि दारुन तपु किया ।

अस जानि संसय तजहु गिरिजा सर्बदा संकरप्रिया ॥

सतीजीने जो सीताका वेष धारण किया, उसी अपराधके कारण शङ्करजीने उनको त्याग दिया । फिर शिवजीके वियोगमें ये अपने पिताके यज्ञमें जाकर वहीं योगाग्निसे भस्म हो गयीं । अब इन्होंने तुम्हारे घर जन्म लेकर अपने पतिके लिये कठिन तप किया है ऐसा जानकर सन्देह छोड़ दो, पार्वतीजी तो सदा ही शिवजीकी प्रिया ( अर्द्धाङ्गिनी ) हैं ।

पृष्ठ 115

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* बालकाण्ड * ११३

दो०- सुनि नारद के बचन तब सब कर मिटा बिषाद ।

छन महुँ ब्यापेउ सकल पुर घर घर यह संबाद ॥ ९ ८ ॥

तब नारदके वचन सुनकर सबका विषाद मिट गया और क्षणभरमें यह समाचार सारे नगरमें घर- घर फैल गया॥९८ ॥

तब मयना हिमवंतु अनंदे । पुनि पुनि पारबती पद बंदे ॥

नारि पुरुष सिसु जुबा सयाने । नगर लोग सब अति हरषाने ॥

तब मैना और हिमवान् आनन्दमें मग्न हो गये और उन्होंने बार- बार पार्वतीके चरणोंकी वन्दना की । स्त्री, पुरुष, बालक, युवा और वृद्ध नगरके सभी लोग बहुत प्रसन्न हुए ॥१ ॥

लगे होन पुर मंगल गाना । सजे सबहिं हाटक घट नाना ॥

भाँति अनेक भई जेवनारा । सूपसास्त्र जस कछु ब्यवहारा ॥

नगरमें मङ्गलगीत गाये जाने लगे और सबने भाँति- भाँतिके सुवर्णके कलश सजाये । पाकशास्त्रमें जैसी रीति है, उसके अनुसार अनेक भाँतिकी ज्योनार हुई ( रसोई बनी ) ॥ २ ॥

सो जेवनार कि जाइ बखानी । बसहिं भवन जेहिं मातु भवानी ॥

सादर बोले सकल बराती । बिष्नु बिरंचि देव सब जाती ॥

जिस घरमें स्वयं माता भवानी रहती हों, वहाँकी ज्योनार ( भोजनसामग्री ) का वर्णन कैसे किया जा सकता है? हिमाचलने आदरपूर्वक सब बरातियोंको – विष्णु, ब्रह्मा और सब जातिके देवताओंको बुलवाया ॥३ ॥

बिबिधि पाँति बैठी जेवनारा । लागे परुसन निपुन सुआरा ॥

नारिबृंद सुर जेवँत जानी I। लगीं देन गारीं मृदु बानी ॥

भोजन [ करनेवालों ] की बहुत-सी पङ्गतें बैठीं । चतुर रसोइये परोसने लगे । स्त्रियोंकी मण्डलियाँ देवताओंको भोजन करते जानकर कोमल वाणीसे गालियाँ देने लगीं ॥ ४ ॥

छं० – गारीं मधुर स्वर देहिं सुंदरि बिंग्य बचन सुनावहीं ।

भोजनु करहिं सुर अति बिलंबु बिनोद सुनि सचु पावहीं ॥

जेवँत जो बढ्यो अनंदु सो मुख कोटिहूँ न परै कयो ।

अवाँइ दीन्हे पान गवने बास जहँ जाको रयो ॥

सब सुन्दरी स्त्रियाँ मीठे स्वरमें गालियाँ देने लगीं और व्यंग्यभरे वचन सुनाने लगीं । देवगण विनोद सुनकर बहुत सुख अनुभव करते हैं, इसलिये भोजन करनेमें बड़ी देर लगा रहे हैं । भोजनके समय जो आनन्द बढ़ा, वह करोड़ों मुँहसे भी नहीं कहा जा सकता । [ भोजन कर चुकनेपर] सबके हाथ- मुँह धुलवाकर पान दिये गये । फिर सब लोग, जो जहाँ ठहरे थे, वहाँ चले गये ।

पृष्ठ 116

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* *११४ रामचरितमानस

दो०-बहुरि मुनिन्ह हिमवंत कहुँ लगन सुनाई आइ ।

समय बिलोकि बिबाह कर पठए देव बोलाइ ॥ ९९ ॥

फिर मुनियोंने लौटकर हिमवान्‌को लगन ( लग्नपत्रिका) सुनायी और विवाहका समय देखकर देवताओंको बुला भेजा ॥ ९९ ॥

बोलि सकल सुर सादर लीन्हे । सबहि जथोचित आसन दीन्हे ॥

बेदी बेद बिधान सँवारी । सुभग सुमंगल गावहिं नारी ॥

सब देवताओंको आदरसहित बुलवा लिया और सबको यथायोग्य आसन दिये । वेदकी रीतिसे वेदी सजायी गयी और स्त्रियाँ सुन्दर श्रेष्ठ मङ्गलगीत गाने लगीं ॥ १ ॥

सिंघासनु अति दिब्य सुहावा । जाइ न बरनि बिरंचि बनावा ॥

बैठे सिव बिप्रन्ह सिरु नाई । हृदयँ सुमिरि निज प्रभु रघुराई ॥

वेदिकापर एक अत्यन्त सुन्दर दिव्य सिंहासन था, जिस [की सुन्दरता ] का वर्णन नहीं किया जा सकता; क्योंकि वह स्वयं ब्रह्माजीका बनाया हुआ था । ब्राह्मणोंको सिर नवाकर और हृदयमें अपने स्वामी श्रीरघुनाथजीका स्मरण करके शिवजी उस सिंहासनपर बैठ गये ॥२ ॥

बहुरि मुनीसन्ह उमा बोलाई । करि सिंगारु सखीं लै आईं ॥

देखत रूपु सकल सुर मोहे । बरनै छबि अस जग कबि को है ॥

फिर मुनीश्वरोंने पार्वतीजीको बुलाया । सखियाँ शृङ्गार करके उन्हें ले आयीं । पार्वतीजीके रूपको देखते ही सब देवता मोहित हो गये । संसारमें ऐसा कवि कौन है जो उस सुन्दरताका वर्णन कर सके! ॥३ ॥

जगदंबिका जानि भव भामा । सुरन्ह मनहिं मन कीन्ह प्रनामा ॥

सुंदरता मरजाद भवानी । जाइ न कोटिहुँ बदन बखानी ॥

पार्वतीजीको जगदम्बा और शिवजीकी पत्नी समझकर देवताओंने मन-ही-मन प्रणाम किया । भवानीजी सुन्दरताकी सीमा हैं । करोड़ों मुखोंसे भी उनकी शोभा नहीं कही जा सकती ॥४ ॥

छं० – कोटिहुँ बदन नहिं बनै बरनत जग जननि सोभा महा ।

सकुचहिंकहतश्रुति सेष सारद मंदमति तुलसी कहा ॥

छबिखानि मातु भवानि गवनीं मध्य मंडप सिव जहाँ ।

अवलोकि सकहिं न सकुच पति पद कमल मनु मधुकरु तहाँ ॥

पृष्ठ 117

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* बालकाण्ड * ११५ जगज्जननी पार्वतीजीकी महान् शोभाका वर्णन करोड़ों मुखोंसे भी करते नहीं बनता । वेद, शेषजी और सरस्वतीजीतक उसे कहते हुए सकुचा जाते हैं, तब मन्दबुद्धि तुलसी किस गिनतीमें है । सुन्दरता और शोभाकी खान माता भवानी मण्डपके बीचमें, जहाँ शिवजी थे, वहाँ गयीं । वे संकोचके मारे पति ( शिवजी ) के चरणकमलोंको देख नहीं सकतीं, परन्तु उनका मनरूपी भौंरा तो वहीं [ रस - पान कर रहा ] था ।

दो० –- मुनि अनुसासन गनपतिहि पूजेउ संभु भवानि ।

कोड सुनि संसय करै जनि सुर अनादि जियँ जानि ॥ १०० ॥

मुनियोंकी आज्ञासे शिवजी और पार्वतीजीने गणेशजीका पूजन किया । मनमें देवताओंको अनादि समझकर कोई इस बातको सुनकर शङ्का न करे [कि गणेशजी तो शिव -पार्वतीकी सन्तान हैं, अभी विवाहसे पूर्व ही वे कहाँसे आ गये ] ॥ १०० ॥

। महामुनिन्ह सो सब करवाई ॥ बिबाह बिधि श्रुति गाई

गहि गिरीस कुस कन्या पानी । भवहि समरपीं जानि भवानी ॥

वेदोंमें विवाहकी जैसी रीति कही गयी है, महामुनियोंने वह सभी रीति करवायी । पर्वतराज हिमाचलने हाथमें कुश लेकर तथा कन्याका हाथ पकड़कर उन्हें भवानी (शिवपत्नी ) जानकर शिवजीको समर्पण किया ॥ १ ॥

पानिग्रहन जब कीन्ह महेसा । हियँ हरषे तब सकल सुरेसा ॥

। जय जय जय संकर सुर करहीं ॥बेदमंत्र मुनिबर उच्चरहीं जब महेश्वर ( शिवजी ) ने पार्वतीका पाणिग्रहण किया, तब [इन्द्रादि ] सब देवता हृदयमें बड़े ही हर्षित हुए । श्रेष्ठ मुनिगण वेदमन्त्रोंका उच्चारण करने लगे और देवगण शिवजीका जय- जयकार करने लगे ॥२ ॥

बाजहिं बाजन बिबिध बिधाना । सुमनबृष्टि नभ भै बिधि नाना ॥

हर गिरिजा कर भयउ बिबाहू । सकल भुवन भरि रहा उछाहू ॥

अनेकों प्रकारके बाजे बजने लगे । आकाशसे नाना प्रकारके फूलोंकी वर्षा हुई । शिव-पार्वतीका विवाह हो गया । सारे ब्रह्माण्डमें आनन्द भर गया ॥ ३ ॥

दासीं दास तुरग रथ नागा । धेनु बसन मनि बस्तु बिभागा ॥

अन्न कनकभाजन भरि जाना । दाइज दीन्ह न जाइ बखाना ॥

दासी, दास, रथ, घोड़े, हाथी, गायें, वस्त्र और मणि आदि अनेक प्रकारकी चीजें, अन्न तथा सोनेके बर्तन गाड़ियोंमें लदवाकर दहेजमें दिये, जिनका वर्णन नहीं हो सकता ॥४ ॥

पृष्ठ 118

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* *११६ रामचरितमानस

छं० – दाइज दियो बहु भाँति पुनि कर जोरि हिमभूधर कह्यो ।

का देउँ पूरनकाम संकर चरन पंकज गहि रह्यो ।

सिवँ कृपासागर ससुर कर संतोषु सब भाँतिहिं कियो ।

पुनि गहे पद पाथोज मयनाँ प्रेम परिपूरन हियो ॥

बहुत प्रकारका दहेज देकर, फिर हाथ जोड़कर हिमाचलने कहा–हे शङ्कर! आप पूर्णकाम हैं, मैं आपको क्या दे सकता हूँ? [ इतना कहकर ] वे शिवजीके चरणकमल पकड़कर रह गये । तब कृपाके सागर शिवजीने अपने ससुरका सभी प्रकारसे समाधान किया । फिर प्रेमसे परिपूर्णहृदय

मैनाजीने शिवजीके चरणकमल पकड़े [ और कहा— ] ।

दो० –नाथ उमा मम प्रान सम गृहकिंकरी करेहु ॥

छमेहु सकल अपराध अब होइ प्रसन्न बरु देहु ॥ १०१ ॥

हे नाथ! यह उमा मुझे मेरे प्राणोंके समान [ प्यारी ] है । आप इसे अपने घरकी टहलनी बनाइयेगा और इसके सब अपराधोंको क्षमा करते रहियेगा । अब प्रसन्न होकर मुझे यही वर दीजिये ॥ १०१ ॥

बहु बिधि संभु सासु समुझाई । गवनी भवन चरन सिरु नाई ॥

जननीं उमा बोलि तब लीन्ही । लै उछंग सुंदर सिख दीन्ही ॥

शिवजीने बहुत तरहसे अपनी सासको समझाया । तब वे शिवजीके चरणोंमें सिर नवाकर घर गयीं । फिर माताने पार्वतीको बुला लिया और गोदमें बैठाकर यह सुन्दर सीख दी- ॥ १ ॥

करेहु सदा संकर पद पूजा । नारिधरमु पति देउ न दूजा ॥

बचन कहत भरे लोचन बारी । बहुरि लाइ उर लीन्हि कुमारी ॥

हे पार्वती! तू सदा शिवजीके चरणकी पूजा करना, नारियोंका यही धर्म है । उनके लिये पति ही देवता है और कोई देवता नहीं है । इस प्रकारकी बातें कहते- कहते उनकी आँखोंमें आँसू भर आये और उन्होंने कन्याको छातीसे चिपटा लिया ॥ २ ॥

कत बिधि सृजीं नारि जग माहीं । पराधीन सपनेहुँ सुखु नाहीं ॥

भै अति प्रेम बिकल महतारी । धीरजु कीन्ह कुसमय बिचारी ॥

[ फिर बोलीं कि ] विधाताने जगत्में स्त्रीजातिको क्यों पैदा किया? पराधीनको सपने में भी सुख नहीं मिलता । यों कहती हुई माता प्रेममें अत्यन्त विकल हो गयी, परन्तु कुसमय जानकर (दुःख करनेका अवसर न जानकर ) उन्होंने धीरज धरा ॥ ३ ॥

पुनि पुनि मिलति परति गहि चरना । परम प्रेमु कछु जाइ न बरना ॥

सब नारिन्ह मिलि भेटि भवानी । जाइ जननि उर पुनि लपटानी ॥

पृष्ठ 119

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* बालकाण्ड * ११७ मैना बार- बार मिलती हैं और [ पार्वतीके ] चरणोंको पकड़कर गिर पड़ती हैं । बड़ा ही प्रेम है, कुछ वर्णन नहीं किया जाता । भवानी सब स्त्रियोंसे मिल- भेंटकर फिर अपनी माताके हृदयसे जा लिपटीं ॥ ४ ॥

छं० – जननिहि बहुरि मिलि चली उचित असीस सब काहूँ दई ।

फिरि फिरि बिलोकति मातु तन तब सखीं लै सिव पहिं गईं ॥

जाचक सकल संतोष संकरु उमा सहित भवन चले ।

सब अमर हरषे सुमन बरषि निसान नभ बाजे भले ॥

पार्वतीजी मातासे फिर मिलकर चलीं, सब किसीने उन्हें योग्य आशीर्वाद दिये । पार्वतीजी फिर-फिरकर माताकी ओर देखती जाती थीं । तब सखियाँ उन्हें शिवजीके पास ले गयीं । महादेवजी सब याचकोंको सन्तुष्ट कर पार्वतीके साथ घर ( कैलास ) को चले । सब देवता प्रसन्न होकर फूलोंकी वर्षा करने लगे और आकाशमें सुन्दर नगाड़े बजने लगे ।

दो० – चले संग हिमवंतु तब पहुँचावन अति हेतु ।

बिबिध भाँति परितोषु करि बिदा कीन्ह बृषकेतु ॥ १०२ ॥

तब हिमवान् अत्यन्त प्रेमसे शिवजीको पहुँचानेके लिये साथ चले । वृषकेतु ( शिवजी ) ने बहुत तरहसे उन्हें सन्तोष कराकर विदा किया ॥१०२ ॥

तुरत भवन आए गिरिराई । सकल सैल सर लिए बोलाई ॥

आदर दान बिनय बहुमाना । सब कर बिदा कीन्ह हिमवाना ॥

पर्वतराज हिमाचल तुरंत घर आये और उन्होंने सब पर्वतों और सरोवरोंको बुलाया । हिमवान्ने आदर, दान, विनय और बहुत सम्मानपूर्वक सबकी विदाई की ॥१ ॥

जबहिं संभु कैलासहिं आए । सुर सब निज निज लोक सिधाए ॥

जगत मातु पितु संभु भवानी । तेहिं सिंगारु न कहउँ बखानी ॥

जब शिवजी कैलास पर्वतपर पहुँचे, तब सब देवता अपने -अपने लोकोंको चले गये । [ तुलसीदासजी कहते हैं कि] पार्वतीजी और शिवजी जगत्के माता-पिता हैं, इसलिये मैं उनके शृङ्गारका वर्णन नहीं करता ॥२ ॥

करहिं बिबिध बिधि भोग बिलासा । गनन्ह समेत बसहिं कैलासा ॥

हर गिरिजा बिहार नित नयऊ । एहि बिधि बिपुल काल चलि गयऊ ॥

शिव- पार्वती विविध प्रकारके भोग- विलास करते हुए अपने गणोंसहित कैलासपर रहने लगे ।

वे नित्य नये विहार करते थे । इस प्रकार बहुत समय बीत गया ॥३ ॥

पृष्ठ 120

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* *११८ रामचरितमानस

तब जनमेउ षटबदन कुमारा । तारकु असुरु समर जेहिं मारा ॥

आगम निगम प्रसिद्ध पुराना । षन्मुख जन्मु सकल जग जाना ॥

तब छः मुखवाले पुत्र ( स्वामिकार्तिक ) का जन्म हुआ, जिन्होंने [ बड़े होनेपर ] युद्धमें तारकासुरको मारा । वेद, शास्त्र और पुराणोंमें स्वामिकार्तिकके जन्मकी कथा प्रसिद्ध है और सारा जगत् उसे जानता है ॥४ ॥

छं० — जगु जान षन्मुख जन्मु कर्मु प्रतापु पुरुषारथु महा ।

तेहि हेतु मैं बृषकेतु सुत कर चरित संछेपहिं कहा ॥

यह उमा संभु बिबाहु जे नर नारि कहहिं जे गावहीं ।

कल्यान काज बिबाह मंगल सर्बदा सुखु पावहीं ॥

षडानन ( स्वामिकार्तिक ) के जन्म, कर्म, प्रताप और महान् पुरुषार्थको सारा जगत् जानता है । इसलिये मैंने वृषकेतु ( शिवजी ) के पुत्रका चरित्र संक्षेपसे ही कहा है I। शिव- पार्वतीके विवाहकी इस कथाको जो स्त्री- पुरुष कहेंगे और गायेंगे, वे कल्याणके कार्यों और विवाहादि मङ्गलोंमें सदा सुख पावेंगे ।

दो० - चरित सिंधु गिरिजा रमन बेद न पावहिं पारु ।

बरनै तुलसीदासु किमि अति मतिमंद गवाँरु ॥ १०३ ॥

गिरिजापति महादेवजीका चरित्र समुद्रके समान ( अपार ) है, उसका पार वेद भी नहीं पाते । तब अत्यन्त मन्दबुद्धि और गँवार तुलसीदास उसका वर्णन कैसे कर सकता है! ॥१०३ ॥

संभु चरित सुनि सरस सुहावा । भरद्वाज मुनि अति सुखु पावा ॥

बहु लालसा कथा पर बाढ़ी । नयनन्हि नीरु रोमावलि ठाढ़ी ॥

शिवजीके रसीले और सुहावने चरित्रको सुनकर मुनि भरद्वाजजीने बहुत ही सुख पाया । कथा सुननेकी उनकी लालसा बहुत बढ़ गयी । नेत्रोंमें जल भर आया तथा रोमावली खड़ी हो गयी ॥ १ ॥

प्रेम बिबस मुख आव न बानी । दसा देखि हरषे मुनि ग्यानी ॥

अहो धन्य तव जन्मु मुनीसा । तुम्हहि प्रान सम प्रिय गौरीसा ॥

वे प्रेममें मुग्ध हो गये, मुखसे वाणी नहीं निकलती । उनकी यह दशा देखकर ज्ञानी मुनि याज्ञवल्क्य बहुत प्रसन्न हुए [ और बोले- ] हे मुनीश! अहा हा! तुम्हारा जन्म धन्य है; तुमको गौरीपति शिवजी प्राणोंके समान प्रिय हैं ॥२ ॥

सिव पद कमल जिन्हहि रति नाहीं । रामहि ते सपनेहुँ न सोहाहीं ॥

बिनु छल बिस्वनाथ पद नेहू । राम भगत कर लच्छन एहू॥