श्रीरामचरितमानस — पृष्ठ 121–130
श्रीरामचरितमानस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 121–130
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* बालकाण्ड * ११ ९ शिवजीके चरणकमलोंमें जिनकी प्रीति नहीं है, वे श्रीरामचन्द्रजीको स्वप्नमें भी अच्छे नहीं लगते । विश्वनाथ श्रीशिवजीके चरणोंमें निष्कपट ( विशुद्ध ) प्रेम होना यही रामभक्तका लक्षण है ॥ ३ ॥
सिव सम को रघुपति व्रतधारी । बिनु अघ तजी सती असि नारी ॥
पनु करि रघुपति भगति देखाई । को सिव सम रामहि प्रिय भाई ॥
शिवजीके समान रघुनाथजी [की भक्ति] का व्रत धारण करनेवाला कौन है? जिन्होंने बिना ही पापके सती - जैसी स्त्रीको त्याग दिया और प्रतिज्ञा करके श्रीरघुनाथजीकी भक्तिको दिखा दिया । हे भाई! श्रीरामचन्द्रजीको शिवजीके समान और कौन प्यारा है? ॥४ ॥
दो० – प्रथमहिं मैं कहि सिव चरित बूझा मरमु तुम्हार ।
सुचि सेवक तुम्ह राम के रहित समस्त बिकार ॥ १०४ ॥
मैंने पहले ही शिवजीका चरित्र कहकर तुम्हारा भेद समझ लिया । तुम श्रीरामचन्द्रजीके पवित्र सेवक हो और समस्त दोषोंसे रहित हो ॥१०४ ॥
मैं जाना तुम्हार गुन सीला । कहउँ सुनहु अब रघुपति लीला ॥
सुनु मुनि आजु समागम तोरें । कहि न जाइ जस सुखु मन मोरें ॥
मैंने तुम्हारा गुण और शील जान लिया । अब मैं श्रीरघुनाथजीकी लीला कहता हूँ, सुनो । हे मुनि! सुनो, आज तुम्हारे मिलनेसे मेरे मनमें जो आनन्द हुआ है, वह कहा नहीं जा सकता ॥ १ ॥
राम चरित अति अमित मुनीसा । कहि न सकहिं सत कोटि अहीसा ॥
तदपि जथाश्रुत कहउँ बखानी । सुमिरि गिरापति प्रभु धनुपानी ॥
हे मुनीश्वर! रामचरित्र अत्यन्त अपार है । सौ करोड़ शेषजी भी उसे नहीं कह सकते । तथापि जैसा मैंने सुना और हाथमें धनुष लिये हुए प्रभु श्रीरामचन्द्रजीका स्मरण करके कहता हूँ॥ २ ॥
सारद है, वैसा वाणीकेदारुनारि स्वामी ( प्रेरकसम) स्वामी । रामु सूत्रधर अंतरजामी ॥
जेहि पर कृपा करहिं जनु जानी । कबि उर अजिर नचावहिं बानी ॥
सरस्वतीजी कठपुतलीके समान हैं और अन्तर्यामी स्वामी श्रीरामचन्द्रजी [ सूत पकड़कर कठपुतलीको नचानेवाले ] सूत्रधार हैं । अपना भक्त जानकर जिस कविपर वे कृपा करते हैं, उसके हृदयरूपी आँगनमें सरस्वतीको वे नचाया करते हैं ॥ ३ ॥
प्रनवउँ सोइ कृपाल रघुनाथा । बरनउँ बिसद तासु गुन गाथा ॥
परम रम्य गिरिबरु कैलासू । सदा जहाँ सिव उमा निवासू॥
उन्हीं कृपालु श्रीरघुनाथजीको मैं प्रणाम करता हूँ और उन्हींके निर्मल गुणोंकी कथा कहता हूँ । कैलास पर्वतोंमें श्रेष्ठ और बहुत ही रमणीय है, जहाँ शिव-पार्वतीजी सदा निवास करते हैं ॥ ४ ॥
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* *१२० रामचरितमानस
दो० – सिद्ध तपोधन जोगिजन सुर किंनर मुनिबूंद ।
बसहिं तहाँ सुकृती सकल सेवहिं सिव सुखकंद ॥ १०५ ॥
सिद्ध, तपस्वी, योगीगण, देवता, किन्नर और मुनियोंके समूह उस पर्वतपर रहते हैं । वे सब बड़े पुण्यात्मा हैं और आनन्दकन्द श्रीमहादेवजीकी सेवा करते हैं ॥ १०५ ॥
हरि हर बिमुख धर्म रति नाहीं । ते नर तहँ सपनेहुँ नहिं जाहीं ॥
तेहि गिरि पर बट बिटप बिसाला । नित नूतन सुंदर सब काला ॥
जो भगवान् विष्णु और महादेवजीसे विमुख हैं और जिनकी धर्ममें प्रीति नहीं है, वे लोग स्वप्नमें भी वहाँ नहीं जा सकते | उस पर्वतपर एक विशाल बरगदका पेड़ है, जो नित्य नवीन और सब काल ( छहों ऋतुओं ) में सुन्दर रहता है ॥ १ ॥
त्रिबिध समीर सुसीतलि छाया । सिव बिश्राम बिटप श्रुति गाया ॥
एक बार तेहि तर प्रभु गयऊ । तरु बिलोकि उर अति सुखु भयऊ ॥
वहाँ तीनों प्रकारकी ( शीतल, मन्द और सुगन्ध ) वायु बहती रहती है और उसकी छाया बड़ी ठंडी रहती है । वह शिवजीके विश्राम करनेका वृक्ष है, जिसे वेदोंने गाया है । एक बार प्रभु श्रीशिवजी उस वृक्षके नीचे गये और उसे देखकर उनके हृदयमें बहुत आनन्द हुआ ॥ २ ॥
निज कर डासि नागरिपु छाला । बैठे सहजहिं संभु कृपाला ॥
कुंद इंदु दर गौर सरीरा । भुज प्रलंब परिधन मुनिचीरा ॥
अपने हाथसे बाघम्बर बिछाकर कृपालु शिवजी स्वभावसे ही ( बिना किसी खास प्रयोजनके ) वहाँ बैठ गये । कुन्दके पुष्प, चन्द्रमा और शंखके समान उनका गौर शरीर था । बड़ी लंबी भुजाएँ थीं और वे मुनियोंके -से ( वल्कल) वस्त्र धारण किये हुए थे ॥३ ॥
तरुन अरुन अंबुज सम चरना । नख दुति भगत हृदय तम हरना ॥
भुजग भूति भूषन त्रिपुरारी । आननु सरद चंद छबि हारी ॥
उनके चरण नये ( पूर्णरूपसे खिले हुए) लाल कमलके समान थे, नखोंकी ज्योति भक्तोंके हृदयका अन्धकार हरनेवाली थी । साँप और भस्म ही उनके भूषण थे और उन त्रिपुरासुरके शत्रु शिवजीका मुख शरद् ( पूर्णिमा ) के चन्द्रमाकी शोभाको भी हरनेवाला ( फीकी करनेवाला ) था ॥ ४ ॥
दो० –- जटा मुकुट सुरसरित सिर लोचन नलिन बिसाल ।
नीलकंठ लावन्यनिधि सोह बालबिधु भाल ॥ १०६ ॥
उनके सिरपर जटाओंका मुकुट और गङ्गाजी [ शोभायमान ] थीं । कमलके समान बड़े - बड़े नेत्र थे । उनका नील कण्ठ था और वे सुन्दरताके भण्डार थे । उनके मस्तकपर द्वितीयाका चन्द्रमा शोभित था ॥ १०६ ॥
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* बालकाण्ड * १२१
बैठे सोह कामरिपु कैसें । धरें सरीरु सांतरसु जैसें ॥
पारबती भल अवसरु जानी । गईं संभु पहिं मातु भवानी ॥
कामदेवके शत्रु शिवजी वहाँ बैठे हुए ऐसे शोभित हो रहे थे, मानो शान्तरस ही शरीर धारण किये बैठा हो । अच्छा मौका जानकर शिवपत्नी माता पार्वतीजी उनके पास गयीं ॥१ ॥
जानि प्रिया आदरु अति कीन्हा । बाम भाग आसनु हर दीन्हा ॥
बैठीं सिव समीप हरषाई । पूरुब जन्म कथा चित आई ॥
अपनी प्यारी पत्नी जानकर शिवजीने उनका बहुत आदर- सत्कार किया और अपनी बायीं ओर बैठनेके लिये आसन दिया । पार्वतीजी प्रसन्न होकर शिवजीके पास बैठ गयीं । उन्हें पिछले जन्मकी कथा स्मरण हो आयी ॥ २ ॥
पति हियँ हेतु अधिक अनुमानी । बिहसि उमा बोलीं प्रिय बानी ॥
कथा जो सकल लोक हितकारी । सोइ पूछन चह सैलकुमारी ॥
स्वामीके हृदयमें [ अपने ऊपर पहलेकी अपेक्षा ] अधिक प्रेम समझकर पार्वतीजी हँसकर प्रिय वचन बोलीं । [ याज्ञवल्क्यजी कहते हैं कि ] जो कथा सब लोगोंका हित करनेवाली है, उसे ही पार्वतीजी पूछना चाहती हैं ॥ ३ ॥
बिस्वनाथ मम नाथ पुरारी । त्रिभुवन महिमा बिदित तुम्हारी ॥
चर अरु अचर नाग नर देवा । सकल करहिं पद पंकज सेवा ॥
[ पार्वतीजीने कहा— ] हे संसारके स्वामी! हे मेरे नाथ! हे त्रिपुरासुरका वध करनेवाले! आपकी महिमा तीनों लोकोंमें विख्यात है । चर, अचर, नाग, मनुष्य और देवता सभी आपके चरणकमलोंकी सेवा करते हैं ॥४ ॥
दो० –- प्रभु समरथ सर्बग्य सिव सकल कला गुन धाम ।
जोग ग्यान बैराग्य निधि प्रनत कलपतरु नाम ॥ १०७ ॥
हे प्रभो! आप समर्थ, सर्वज्ञ और कल्याणस्वरूप हैं । सब कलाओं और गुणोंके निधान हैं और योग, ज्ञान तथा वैराग्यके भण्डार हैं । आपका नाम शरणागतोंके लिये कल्पवृक्ष है ॥ १०७ ॥
जौं मो पर प्रसन्न सुखरासी । जानिअ सत्य मोहि निज दासी ॥
तौ प्रभु हरहु मोर अग्याना । कहि रघुनाथ कथा बिधि नाना ॥
हे सुखकी राशि! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं और सचमुच मुझे अपनी दासी [या अपनी सच्ची दासी ] जानते हैं, तो हे प्रभो! आप श्रीरघुनाथजीकी नाना प्रकारकी कथा कहकर मेरा अज्ञान दूर कीजिये ॥ १ ॥
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* *१२२ रामचरितमानस
जासु भवनु सुरतरु तर होई । सहि कि दरिद्र जनित दुखु सोई ॥
ससिभूषन अस हृदयँ बिचारी । हरहु नाथ मम मति भ्रम भारी ॥
जिसका घर कल्पवृक्षके नीचे हो, वह भला दरिद्रतासे उत्पन्न दुःखको क्यों सहेगा? हे शशिभूषण! हे नाथ! हृदयमें ऐसा विचारकर मेरी बुद्धिके भारी भ्रमको दूर कीजिये ॥ २ ॥
प्रभु जे मुनि परमारथबादी । कहहिं राम कहुँ ब्रह्म अनादी ॥
सकल करहिं रघुपति गुन गाना ॥सेस सारदा बेद पुराना । हे प्रभो! जो परमार्थतत्त्व ( ब्रह्म ) के ज्ञाता और वक्ता मुनि हैं, वे श्रीरामचन्द्रजीको अनादि ब्रह्म कहते हैं; और शेष, सरस्वती, वेद और पुराण सभी श्रीरघुनाथजीका गुण गाते हैं ॥ ३ ॥
तुम्ह पुनि राम राम दिन राती । सादर जपहु अनँग आराती ॥
रामु सो अवध नृपति सुत सोई । की अज अगुन अलखगति कोई ॥
और हे कामदेवके शत्रु! आप भी दिन-रात आदरपूर्वक राम- राम जपा करते हैं । ये राम वही अयोध्याके राजाके पुत्र हैं? या अजन्मा, निर्गुण और अगोचर कोई और राम हैं? ॥४ ॥
दो० — जौं नृप तनय त ब्रह्म किमि नारि बिरहँ मति भरि ।
देखि चरित महिमा सुनत भ्रमति बुद्धि अति मोरि ॥ १०८ ॥
यदि वे राजपुत्र हैं तो ब्रह्म कैसे? [और यदि ब्रह्म हैं तो ] स्त्रीके विरहमें उनकी मति बावली कैसे हो गयी? इधर उनके ऐसे चरित्र देखकर और उधर उनकी महिमा सुनकर मेरी बुद्धि अत्यन्त चकरा रही है ॥ १०८ ॥
जौं अनीह ब्यापक बिभु कोऊ । कहहु बुझाइ नाथ मोहि सोऊ ॥
अग्य जानि रिस उर जनि धरहू । जेहि बिधि मोह मिटै सोइ करहू ॥
यदि इच्छारहित, व्यापक, समर्थ ब्रह्म कोई और है, तो हे नाथ! मुझे उसे समझाकर कहिये । मुझे नादान समझकर मनमें क्रोध न लाइये । जिस तरह मेरा मोह दूर हो, वही कीजिये ॥ १ ॥
मैं बन दीखि राम प्रभुताई । अति भय बिकल न तुम्हहि सुनाई ॥
तदपि मलिन मन बोधु न आवा । सो फलु भली भाँति हम पावा ॥
मैंने [ पिछले जन्ममें ] वनमें श्रीरामचन्द्रजीकी प्रभुता देखी थी, परन्तु अत्यन्त भयभीत होनेके कारण मैंने वह बात आपको सुनायी नहीं । तो भी मेरे मलिन मनको बोध न हुआ । उसका फल भी मैंने अच्छी तरह पा लिया ॥ २ ॥
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* बालकाण्ड * १२३
अजहूँ कछु संसउ मन मोरें । करहु कृपा बिनवउँ कर जोरें ॥
प्रभु तब मोहि बहु भाँति प्रबोधा । नाथ सो समुझि करहु जनि क्रोधा ॥
अब भी मेरे मनमें कुछ सन्देह है । आप कृपा कीजिये, मैं हाथ जोड़कर विनती करती हूँ । हे प्रभो! आपने उस समय मुझे बहुत तरहसे समझाया था [फिर भी मेरा सन्देह नहीं गया ], हे नाथ! यह सोचकर मुझपर क्रोध न कीजिये ॥३ ॥
तब कर अस बिमोह अब नाहीं । रामकथा पर रुचि मन माहीं ॥
कहहु पुनीत राम गुन गाथा । भुजगराज भूषन सुरनाथा ॥
मुझे अब पहले - जैसा मोह नहीं है, अब तो मेरे मनमें रामकथा सुननेकी रुचि है । हे शेषनागको अलंकाररूपमें धारण करनेवाले देवताओंके नाथ! आप श्रीरामचन्द्रजीके गुणोंकी पवित्र कथा कहिये ॥४ ॥
दो० - बंदउँ पद धरि धरनि सिरु बिनय करउँ कर जोरि ।
बरनहु रघुबर बिसद जसु श्रुति सिद्धांत निचोरि ॥ १० ९ ॥
मैं पृथ्वीपर सिर टेककर आपके चरणोंकी वन्दना करती हूँ और हाथ जोड़कर विनती करती हूँ । आप वेदोंके सिद्धान्तको निचोड़कर श्रीरघुनाथजीका निर्मल यश वर्णन कीजिये ॥ १० ९ ॥
जदपि जोषिता नहिं अधिकारी । दासी मन क्रम बचन तुम्हारी ॥
गूढ़उ तत्त्व न साधु दुरावहिं । आरत अधिकारी जहँ पावहिं ॥
यद्यपि स्त्री होनेके कारण मैं उसे सुननेकी अधिकारिणी नहीं हूँ, तथापि मैं मन, वचन और कर्मसे आपकी दासी हूँ । संत लोग जहाँ आर्त अधिकारी पाते हैं, वहाँ गूढ़ तत्त्व भी उससे नहीं छिपाते ॥१ ॥
अति आरति पूछउँ सुरराया । रघुपति कथा कहहु करि दाया ॥
प्रथम सो कारन कहहु बिचारी । निर्गुन ब्रह्म सगुन बपु धारी ॥
हे देवताओंके स्वामी! मैं बहुत ही आर्तभाव ( दीनता ) से पूछती हूँ, आप मुझपर दया करके श्रीरघुनाथजीकी कथा कहिये । पहले तो वह कारण विचारकर बतलाइये जिससे निर्गुण ब्रह्म सगुण रूप धारण करता है ॥२ ॥
पुनि प्रभु कहहु राम अवतारा । बालचरित पुनि कहहु उदारा ॥
कहहु जथा जानकी बिबाहीं । राज तजा सो दूषन काहीं ॥
फिर हे प्रभु! श्रीरामचन्द्रजीके अवतार ( जन्म) की कथा कहिये तथा उनका उदार बालचरित्र कहिये । फिर जिस प्रकार उन्होंने श्रीजानकीजीसे विवाह किया, वह कथा कहिये और फिर यह बतलाइये कि उन्होंने जो राज्य छोड़ा सो किस दोषसे ॥३ ॥
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* *१२४ रामचरितमानस
बन बसि कीन्हे चरित अपारा । कहहु नाथ जिमि रावन मारा ॥
राज बैठि कीन्हीं बहु लीला । सकल कहहु संकर सुखसीला ॥
हे नाथ! फिर उन्होंने वनमें रहकर जो अपार चरित्र किये तथा जिस तरह रावणको मारा, वह कहिये । हे सुखस्वरूप शङ्कर! फिर आप उन सारी लीलाओंको कहिये जो उन्होंने राज्य [ सिंहासन ] पर बैठकर की थीं ॥४ ॥
दो० – बहुरि कहहु करुनायतन कीन्ह जो अचरज राम ।
प्रजा सहित रघुबंसमनि किमि गवने निज धाम ॥११० ॥
हे कृपाधाम! फिर वह अद्भुत चरित्र कहिये जो श्रीरामचन्द्रजीने किया— वे रघुकुलशिरोमणि प्रजासहित किस प्रकार अपने धामको गये? ॥ ११० ॥
पुनि प्रभु कहहु सो तत्त्व बखानी । जेहिं बिग्यान मगन मुनि ग्यानी ॥
भगति ग्यान बिग्यान बिरागा । पुनि सब बरनहु सहित बिभागा ॥
हे प्रभु! फिर आप उस तत्त्वको समझाकर कहिये, जिसकी अनुभूतिमें ज्ञानी मुनिगण सदा मग्न रहते हैं; और फिर भक्ति, ज्ञान, विज्ञान और वैराग्यका विभागसहित वर्णन कीजिये ॥ १ ॥
औरउ राम रहस्य अनेका । कहहु नाथ अति बिमल बिबेका ॥
जो प्रभु मैं पूछा नहिं होई ॥ सोउ दयाल राखहु जनि गोई ॥
[ इसके सिवा ] श्रीरामचन्द्रजीके और भी जो अनेक रहस्य ( छिपे हुए भाव अथवा चरित्र ) हैं, उनको कहिये । हे नाथ! आपका ज्ञान अत्यन्त निर्मल है । हे प्रभो! जो बात मैंने न भी पूछी हो, हे दयालु! उसे भी आप छिपा न रखियेगा ॥२ ॥
तुम्ह त्रिभुवन गुर बेद बखाना । आन जीव पाँवर का जाना ॥
प्रस्न उमा कै सहज सुहाई । छल बिहीन सुनि सिव मन भाई ॥
वेदोंने आपको तीनों लोकोंका गुरु कहा है । दूसरे पामर जीव इस रहस्यको क्या जानें! पार्वतीजीके सहज सुन्दर और छलरहित ( सरल ) प्रश्न सुनकर शिवजीके मनको बहुत अच्छे लगे ॥३ ॥
हर हियँ रामचरित सब आए । प्रेम पुलक लोचन जल छाए ॥
श्रीरघुनाथ रूपरूप उर आवा । परमानंद अमित सुख पावा ॥
श्रीमहादेवजीके हृदयमें सारे रामचरित्र आ गये । प्रेमके मारे उनका शरीर पुलकित हो गया और नेत्रोंमें जल भर आया । श्रीरघुनाथजीका रूप उनके हृदयमें आ गया, जिससे स्वयं परमानन्दस्वरूप शिवजीने भी अपार सुख पाया ॥४ ॥
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* बालकाण्ड * १२५
दो० – मगन ध्यान रस दंड जुग पुनि मन बाहेर कीन्ह ।
रघुपति चरित महेस तब हरषित बरनै लीन्ह ॥ १११ ॥
शिवजी दो घड़ीतक ध्यानके रस ( आनन्द ) में डूबे रहे; फिर उन्होंने मनको बाहर खींचा और तब वे प्रसन्न होकर श्रीरघुनाथजीका चरित्र वर्णन करने लगे ॥१११ ॥
झूठेउ सत्य जाहि बिनु जानें । जिमि भुजंग बिनु रजु पहिचानें ॥
जेहि जानें जग जाइ हेराई । जागें जथा सपन भ्रम जाई ॥
जिसके बिना जाने झूठ भी सत्य मालूम होता है, जैसे बिना पहचाने रस्सीमें साँपका भ्रम हो जाता है; और जिसके जान लेनेपर जगत्का उसी तरह लोप हो जाता है, जैसे जागनेपर स्वप्नका भ्रम जाता रहता है ॥१ ॥
बंदउँ बालरूप सोइ रामू । सब सिधि सुलभ जपतजिसु नामू॥
मंगल भवन अमंगल हारी । द्रवउ सो दसरथ अजिर बिहारी ॥
मैं उन्हीं श्रीरामचन्द्रजीके बालरूपकी वन्दना करता हूँ, जिनका नाम जपनेसे सब सिद्धियाँ सहज ही प्राप्त हो जाती हैं । मङ्गलके धाम, अमङ्गलके हरनेवाले और श्रीदशरथजीके आँगनमें खेलनेवाले वे ( बालरूप ) श्रीरामचन्द्रजी मुझपर कृपा करें ॥२ ॥
करि प्रनाम रामहि त्रिपुरारी । हरषि सुधा सम गिरा उचारी ॥
धन्य धन्य गिरिराजकुमारी । तुम्ह समान नहिं कोउ उपकारी ॥
त्रिपुरासुरका वध करनेवाले शिवजी श्रीरामचन्द्रजीको प्रणाम करके आनन्दमें भरकर अमृत समान वाणी बोले — हे गिरिराजकुमारी पार्वती! तुम धन्य हो! धन्य हो!! तुम्हारे समान कोई उपकारी नहीं है ॥ ३ ॥
पूँछेहु रघुपति कथा प्रसंगा । सकल लोक जग पावनि गंगा ॥
तुम्ह रघुबीर चरन अनुरागी । कीन्हिहु प्रस्न जगत हित लागी ॥
जो तुमने श्रीरघुनाथजीकी कथाका प्रसङ्ग पूछा है, जो कथा समस्त लोकोंके लिये जगत्को पवित्र करनेवाली गङ्गाजीके समान है । तुमने जगत्के कल्याणके लिये ही प्रश्न पूछे हैं । तुम श्रीरघुनाथजीके चरणोंमें प्रेम रखनेवाली हो ॥४ ॥
दो० —राम कृपा तें पारबति सपनेहुँ तव मन माहिं ।
सोक मोह संदेह भ्रम मम बिचार कछु नाहिं ॥ ११२ ॥
हे पार्वती! मेरे विचारमें तो श्रीरामजीकी कृपासे तुम्हारे मनमें स्वप्नमें भी शोक, मोह, सन्देह और भ्रम कुछ भी नहीं है ॥११२ ॥
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* * १२६ रामचरितमानस
तदपि असंका कीन्हिहु सोई । कहत सुनत सब कर हित होई ॥
जिन्ह हरिकथा सुनी नहिं काना । श्रवन रंध्र अहिभवन समाना ॥
फिर भी तुमने इसीलिये वही ( पुरानी ) शङ्का की है कि इस प्रसङ्गके कहने - सुननेसे सबका कल्याण होगा । जिन्होंने अपने कानोंसे भगवान्की कथा नहीं सुनी, उनके कानोंके छिद्र साँपके बिलके समान हैं ॥१ ॥
नयनन्हि संत दरस नहिं देखा । लोचन मोरपंख कर लेखा ॥
ते सिर कटु तुंबरि समतूला । जे न नमत हरि गुर पद मूला ॥
जिन्होंने अपने नेत्रोंसे संतोंके दर्शन नहीं किये, उनके वे नेत्र मोरके पंखोंपर दीखनेवाली नकली आँखोंकी गिनतीमें हैं । वे सिर कड़वी तँबीके समान हैं, जो श्रीहरि और गुरुके चरणतलपर नहीं झुकते ॥२ ॥
जिन्ह हरिभगति हृदयँ नहिं आनी I। जीवत सव समान तेइ प्रानी ॥
जो नहिं करइ राम गुन गाना । जीह सो दादुर जीह समाना ॥
जिन्होंने भगवान्की भक्तिको अपने हृदयमें स्थान नहीं दिया, वे प्राणी जीते हुए ही मुर्देके समान हैं । जो जीभ श्रीरामचन्द्रजीके गुणोंका गान नहीं करती, वह मेढककी जीभके समान है ॥ ३ ॥
कुलिस कठोर निठुर सोइ छाती । सुनि हरिचरित न जो हरषाती ॥
गिरिजा सुनहु राम कै लीला । सुर हित दनुज बिमोहनसीला ॥
वह हृदय वज्रके समान कड़ा और निष्ठुर है, जो भगवान्के चरित्र सुनकर हर्षित नहीं होता । हे पार्वती! श्रीरामचन्द्रजीकी लीला सुनो, यह देवताओंका कल्याण करनेवाली और दैत्योंको विशेषरूपसे मोहित करनेवाली है ॥ ४ ॥
दो० - रामकथा सुरधेनु सम सेवत सब सुख दानि ।
सतसमाज सुरलोक सब को न सुनै अस जानि ॥ ११३ ॥
श्रीरामचन्द्रजीकी कथा कामधेनुके समान सेवा करनेसे सब सुखोंको देनेवाली है, और सत्पुरुषोंके समाज ही सब देवताओंके लोक हैं, ऐसा जानकर इसे कौन न सुनेगा! ॥ ११३ ॥
रामकथा सुंदर कर तारी । संसय बिहग उड़ावनिहारी ॥
रामकथा कलि बिटप कुठारी । सादर सुनु गिरिराजकुमारी ॥
श्रीरामचन्द्रजीकी कथा हाथकी सुन्दर ताली है, जो सन्देहरूपी पक्षियोंको उड़ा देती है । फिर रामकथा कलियुगरूपी वृक्षको काटनेके लिये कुल्हाड़ी है । हे गिरिराजकुमारी! तुम इसे आदरपूर्वक सुनो ॥१ ॥
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* बालकाण्ड * १२७
राम नाम गुन चरित सुहाए । जनम करम अगनित श्रुति गाए ॥
जथा अनंत राम भगवाना । तथा कथा कीरति गुन नाना ॥
वेदोंने श्रीरामचन्द्रजीके सुन्दर नाम, गुण, चरित्र, जन्म और कर्म सभी अनगिनत कहे हैं । जिस प्रकार भगवान् श्रीरामचन्द्रजी अनन्त हैं, उसी तरह उनकी कथा, कीर्ति और गुण भी अनन्त हैं ॥ २ ॥
तदपि जथा श्रुत जसि मति मोरी । कहिहउँ देखि प्रीति अति तोरी ॥
उमा प्रस्न तव सहज सुहाई । सुखद संतसंमत मोहि भाई ॥
तो भी तुम्हारी अत्यन्त प्रीति देखकर, जैसा कुछ मैंने सुना है और जैसी मेरी बुद्धि है, उसीके अनुसार मैं कहूँगा । हे पार्वती! तुम्हारा प्रश्न स्वाभाविक ही सुन्दर, सुखदायक और संतसम्मत है और मुझे तो बहुत ही अच्छा लगा है ॥ ३ ॥
एक बात नहिं मोहि सोहानी । जदपि मोह बस कहेहु भवानी ॥
तुम्ह जो कहा राम कोउ आना । जेहि श्रुति गाव धरहिं मुनि ध्याना ॥
परन्तु हे पार्वती! एक बात मुझे अच्छी नहीं लगी, यद्यपि वह तुमने मोहके वश होकर ही कही है । तुमने जो यह कहा कि वे राम कोई और हैं, जिन्हें वेद गाते और मुनिजन जिनका ध्यान धरते - ॥ ४ ॥
दो० – कहहिं सुनहिं अस अधम नर ग्रसे जे मोह पिसाच ।
पाषंडी हरि पद बिमुख जानहिं झूठ न साच ॥११४ ॥
जो मोहरूपी पिशाचके द्वारा ग्रस्त हैं, पाखण्डी हैं, भगवान्के चरणोंसे विमुख हैं और जो झूठ-सच कुछ भी नहीं जानते, ऐसे अधम मनुष्य ही इस तरह कहते-सुनते हैं ॥ ११४ ॥
अग्य अकोबिद अंध अभागी । काई बिषय मुकुर मन लागी ॥
लंपट कपटी कुटिल बिसेषी । सपनेहुँ संतसभा नहिं देखी ॥
जो अज्ञानी, मूर्ख, अंधे और भाग्यहीन हैं और जिनके मनरूपी दर्पणपर विषयरूपी काई जमी हुई है; जो व्यभिचारी, छली और बड़े कुटिल हैं और जिन्होंने कभी स्वप्नमें भी संत-समाजके दर्शन नहीं किये; ॥ १ ॥
कहहिं ते बेद असंमत बानी । जिन्ह कें सूझ लाभु नहिं हानी ॥
मुकुर मलिन अरु नयन बिहीना । राम रूप देखहिं किमि दीना ॥
और जिन्हें अपनी लाभ-हानि नहीं सूझती, वे ही ऐसी वेदविरुद्ध बातें कहा करते हैं । जिनका हृदयरूपी दर्पण मैला है और जो नेत्रोंसे हीन हैं, वे बेचारे श्रीरामचन्द्रजीका रूप कैसे देखें! ॥२ ॥
जिन्ह के अगुन न सगुन बिबेका । जल्पहिं कल्पित बचन अनेका ॥
हरिमाया बस जगत भ्रमाहीं । तिन्हहि कहत कछु अघटित नाहीं ॥
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* * १२८ रामचरितमानस जिनको निर्गुण- सगुणका कुछ भी विवेक नहीं है, जो अनेक मनगढ़ंत बातें बका करते हैं, जो श्रीहरिकी मायाके वशमें होकर जगत्में (जन्म--मृत्यु चक्रमें ) भ्रमते फिरते हैं, उनके लिये कुछ भी कह डालना असम्भव नहीं है ॥ ३ ॥
बातुल भूत बिबस मतवारे । ते नहिं बोलहिं बचन बिचारे ॥
जिन्ह कृत महामोह मद पाना । तिन्ह कर कहा करिअ नहिं काना ॥
जिन्हें वायुका रोग ( सन्निपात, उन्माद आदि ) हो गया हो, जो भूतके वश हो गये हैं और जो नशेमें चूर हैं, ऐसे लोग विचारकर वचन नहीं बोलते । जिन्होंने महामोहरूपी मदिरा पी रखी है, उनके कहनेपर कान न देना चाहिये ॥४ ॥
सो० – अस निज हृदयँ बिचारि तजु संसय भजु राम पद ।
सुनु गिरिराज कुमारि भ्रम तम रबि कर बचन मम ॥ ११५ ॥
अपने हृदयमें ऐसा विचारकर सन्देह छोड़ दो और श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंको भजो । हे पार्वती! भ्रमरूपी अन्धकारके नाश करनेके लिये सूर्यकी किरणोंके समान मेरे वचनोंको सुनो! ॥ ११५ ॥
सगुनहि अगुनहि नहिं कछु भेदा । गावहिं मुनि पुरान बुध बेदा ॥
अगुन अरूप अलख अज जोई । भगत प्रेम बस सगुन सो होई ॥
सगुण और निर्गुणमें कुछ भी भेद नहीं है - मुनि, पुराण, पण्डित और वेद सभी ऐसा कहते हैं । जो निर्गुण, अरूप ( निराकार ), अलख ( अव्यक्त) और अजन्मा है, वही भक्तोंके प्रेमवश सगुण हो जाता है ॥१ ॥
जो गुन रहित सगुन सोइ कैसें । जलु हिम उपल बिलग नहिं जैसें ॥
जासु नाम भ्रम तिमिर पतंगा । तेहि किमि कहिअ बिमोह प्रसंगा ॥
जो निर्गुण है, वही सगुण कैसे है? जैसे जल और ओलेमें भेद नहीं । ( दोनों जल ही हैं, ऐसे ही निर्गुण और सगुण एक ही हैं । ) जिसका नाम भ्रमरूपी अन्धकारके मिटानेके लिये सूर्य है, उसके लिये मोहका प्रसंग भी कैसे कहा जा सकता है? ॥२ ॥
नहिँ तहँ मोह निसा लवलेसा ॥ राम सच्चिदानंद दिनेसा । नहिं तहँ पुनि बिग्यान बिहाना ॥सहज प्रकासरूप भगवाना । श्रीरामचन्द्रजी सच्चिदानन्दस्वरूप सूर्य हैं । वहाँ मोहरूपी रात्रिका लवलेश भी नहीं है । वे , वहाँ तो विज्ञानरूपी प्रातःकाल भी स्वभावसे ही प्रकाशरूप और [ षडैश्वर्ययुक्त ] भगवान् हैं नहीं होता । ( अज्ञानरूपी रात्रि हो तब तो विज्ञानरूपी प्रातःकाल हो; भगवान् तो नित्य
ज्ञानस्वरूप हैं । ) ॥ ३ ॥