श्रीरामचरितमानस — पृष्ठ 131–140
श्रीरामचरितमानस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 131–140
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* बालकाण्ड * १२ ९ हरषराम ब्रह्मबिषादब्यापकग्यानजगअग्यानाजाना ॥ परमानंदजीव धर्म अहमितिपरेस अभिमानापुराना ॥॥ हर्ष, शोक, ज्ञान, अज्ञान, अहंता और अभिमान-ये सब जीवके धर्म हैं । श्रीरामचन्द्रजी तो व्यापक ब्रह्म, परमानन्दस्वरूप, परात्पर प्रभु और पुराणपुरुष हैं । इस बातको सारा जगत् जानता है ॥ ४ ॥
दो० - पुरुष प्रसिद्ध प्रकास निधि प्रगट परावर नाथ ।
रघुकुलमनि मम स्वामि सोइ कहि सिवँ नायड माथ ॥ ११६ ॥
जो [ पुराण ] पुरुष प्रसिद्ध हैं, प्रकाशके भण्डार हैं, सब रूपोंमें प्रकट हैं, जीव, माया और जगत् सबके स्वामी हैं, वे ही रघुकुलमणि श्रीरामचन्द्रजी मेरे स्वामी हैं - ऐसा कहकर शिवजीने उनको मस्तक नवाया ॥ ११६ ॥
निज भ्रम नहिं समुझहिं अग्यानी । प्रभु पर मोह धरहिं जड़ प्रानी ॥
जथा गगन घन पटल निहारी । झाँपेउ भानु कहहिं कुबिचारी ॥
अज्ञानी मनुष्य अपने भ्रमको तो समझते नहीं और वे मूर्ख प्रभु श्रीरामचन्द्रजीपर उसका आरोप करते हैं, जैसे आकाशमें बादलोंका पर्दा देखकर कुविचारी ( अज्ञानी ) लोग कहते हैं कि बादलोंने सूर्यको ढक लिया ॥ १ ॥
चितव जो लोचन अंगुलि लाएँ । प्रगट जुगल ससि तेहि के भाएँ ॥
उमा राम बिषइक अस मोहा । नभ तम धूम धूरि जिमि सोहा ॥
जो मनुष्य आँखमें उँगली लगाकर देखता है, उसके लिये तो दो चन्द्रमा प्रकट ( प्रत्यक्ष ) हैं । हे पार्वती! श्रीरामचन्द्रजीके विषयमें इस प्रकार मोहकी कल्पना करना वैसा ही है जैसा आकाशमें अन्धकार, धूएँ और धूलका सोहना ( दीखना ) । [ आकाश जैसे निर्मल और निर्लेप है, उसको कोई मलिन या स्पर्श नहीं कर सकता, इसी प्रकार भगवान् श्रीरामचन्द्रजी नित्य निर्मल और निर्लेप हैं ] ॥ २ ॥
बिषय करन सुर जीव समेता । सकल एक तें एक सचेता ॥
सब कर परम प्रकासक जोई । राम अनादि अवधपति सोई ॥
विषय, इन्द्रियाँ, इन्द्रियोंके देवता और जीवात्मा- ये सब एककी सहायतासे एक चेतन होते हैं । ( अर्थात् विषयोंका प्रकाश इन्द्रियोंसे, इन्द्रियोंका इन्द्रियोंके देवताओंसे और इन्द्रियदेवताओंका चेतन जीवात्मासे प्रकाश होता है । ) इन सबका जो परम प्रकाशक है ( अर्थात् जिससे इन सबका प्रकाश होता है ), वही अनादि ब्रह्म अयोध्यानरेश श्रीरामचन्द्रजी हैं ॥३ ॥
जगत प्रकास्य प्रकासक रामू । मायाधीस ग्यान गुन धामू॥
जासु सत्यता तें जड़ माया । भास सत्य इव मोह सहाया ॥
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* *१३० रामचरितमानस यह जगत् प्रकाश्य है और श्रीरामचन्द्रजी इसके प्रकाशक हैं । वे मायाके स्वामी और ज्ञान तथा गुणोंके धाम हैं । जिनकी सत्तासे, मोहकी सहायता पाकर जड़ माया भी सत्य-सी भासित होती है ॥४ ॥
दो० –- रजत सीप महुँ भास जिमि जथा भानु कर बारि ।
दपि मृषा तिहुँ काल सोइ भ्रम न सकइ कोउ टारि ॥ ११७ ॥
जैसे सीपमें चाँदीकी और सूर्यकी किरणोंमें पानीकी [ बिना हुए भी ] प्रतीति होती है । यद्यपि यह प्रतीति तीनों कालोंमें झूठ है, तथापि इस भ्रमको कोई हटा नहीं सकता ॥ ११७ ॥
एहि बिधि जग हरि आश्रित रहई । जदपि असत्य देत दुख अहई ॥
जौं सपनें सिर काटै कोई । बिनु जागें न दूरि दुख होई ॥
इसी तरह यह संसार भगवान्के आश्रित रहता है । यद्यपि यह असत्य है, तो भी दुःख तो देता ही है; जिस तरह स्वप्नमें कोई सिर काट ले तो बिना जागे वह दु:ख दूर नहीं होता ॥१ ॥
जासु कृपाँ अस भ्रम मिटि जाई । गिरिजा सोइ कृपाल रघुराई ॥
आदि अंत कोउ जासु न पावा । मति अनुमानि निगम अस गावा ॥
हे पार्वती! जिनकी कृपासे इस प्रकारका भ्रम मिट जाता है, वही कृपालु श्रीरघुनाथजी हैं । जिनका आदि और अन्त किसीने नहीं [ जान ] पाया । वेदोंने अपनी बुद्धिसे अनुमान करके इस प्रकार ( नीचे लिखे अनुसार) गाया है - ॥ २ ॥
बिनु पद चलइ सुनइ बिनु काना । कर बिनु करम करइ बिधि नाना ॥
आनन रहित सकल रस भोगी । बिनु बानी बकता बड़ जोगी ॥
वह ( ब्रह्म ) बिना ही पैरके चलता है, बिना ही कानके सुनता है, बिना ही हाथके नाना प्रकारके काम करता है, बिना मुँह (जिह्वा ) के ही सारे (छहों ) रसोंका आनन्द लेता है और बिना ही वाणीके बहुत योग्य वक्ता है ॥३ ॥
तन बिनु परस नयन बिनु देखा । ग्रहइ घ्रान बिनु बास असेषा ॥
असि सब भाँति अलौकिक करनी । महिमा जासु जाइ नहिं बरनी ॥
वह बिना ही शरीर ( त्वचा ) के स्पर्श करता है, बिना ही आँखोंके देखता है और बिना ही नाकके सब गन्धोंको ग्रहण करता है ( सूँघता है ) । उस ब्रह्मकी करनी सभी प्रकारसे ऐसी अलौकिक है कि जिसकी महिमा कही नहीं जा सकती ॥४ ॥
दो० – जेहि इमि गावहिं बेद बुध जाहि धरहिं मुनि ध्यान ।
सोइ दसरथ सुत भगत हित कोसलपति भगवान ॥ ११८ ॥
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* बालकाण्ड * १३१ जिसका वेद और पण्डित इस प्रकार वर्णन करते हैं और मुनि जिसका ध्यान धरते हैं, वही दशरथनन्दन, भक्तोंके हितकारी, अयोध्याके स्वामी भगवान् श्रीरामचन्द्रजी हैं ॥११८ ॥
कासीं मरत जंतु अवलोकी । जासु नाम बल करउँ बिसोकी ॥
सोइ प्रभु मोर चराचर स्वामी । रघुबर सब उरउर अंतरजामी ॥
[ हे पार्वती! ] जिनके नामके बलसे काशीमें मरते हुए प्राणीको देखकर मैं उसे [ राममन्त्र देकर ] शोकरहित कर देता हूँ ( मुक्त कर देता हूँ), वही मेरे प्रभु रघुश्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजी जड़ - चेतनके स्वामी और सबके हृदयके भीतरकी जाननेवाले हैं ॥१ ॥
बिबसहुँ जासु नाम नर कहहीं । जनम अनेक रचित अघ दहहीं ॥
सादर सुमिरन जे नर करहीं । भव बारिधि गोपद इव तरहीं ॥
विवश होकर ( बिना इच्छाके ) भी जिनका नाम लेनेसे मनुष्योंके अनेक जन्मोंमें किये हुए पाप जल जाते हैं । फिर जो मनुष्य आदरपूर्वक उनका स्मरण करते हैं, वे तो संसाररूपी [ दुस्तर ] समुद्रको गायके खुरसे बने हुए गड्ढे के समान ( अर्थात् बिना किसी परिश्रमके ) पार कर जाते हैं ॥२ ॥
राम सो परमातमा भवानी । तहँ भ्रम अति अबिहित तव बानी ॥
अस संसय आनत उर माहीं । ग्यान बिराग सकल गुन जाहीं ॥
हे पार्वती! वही परमात्मा श्रीरामचन्द्रजी हैं । उनमें भ्रम [देखनेमें आता ] है, तुम्हारा ऐसा कहना अत्यन्त ही अनुचित है । इस प्रकारका सन्देह मनमें लाते ही मनुष्यके ज्ञान, वैराग्य आदि सारे सद्गुण नष्ट हो जाते हैं ॥ ३ ॥
सुनि सिव के भ्रम भंजन बचना । मिटि गै सब कुतरक कै रचना ॥
भइ रघुपति पद प्रीति प्रतीती । दारुन असंभावना बीती ॥
शिवजीके भ्रमनाशक वचनोंको सुनकर पार्वतीजीके सब कुतर्कोंकी रचना मिट गयी । श्रीरघुनाथजीके चरणोंमें उनका प्रेम और विश्वास हो गया और कठिन असम्भावना (जिसका होना सम्भव नहीं, ऐसी मिथ्या कल्पना ) जाती रही ॥ ४ ॥
दो० - पुनि पुनि प्रभु पद कमल गहि जोरि पंकरुह पानि ।
बोलीं गिरिजा बचन बर मनहुँ प्रेम रस सानि ॥ ११ ९ ॥
बार- बार स्वामी ( शिवजी ) के चरणकमलोंको पकड़कर और अपने कमलके समान हाथोंको जोड़कर पार्वतीजी मानो प्रेमरसमें सानकर सुन्दर वचन बोलीं ॥ ११ ९ ॥
ससि कर सम सुनि गिरा तुम्हारी । मिटा मोह सरदातप भारी ॥
तुम्ह कृपाल सबु संसउ हरेऊ । राम स्वरूप जानि मोहि परेऊ ॥
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* *१३२ रामचरितमानस आपकी चन्द्रमाकी किरणोंके समान शीतल वाणी सुनकर मेरा अज्ञानरूपी शरद् ऋतु ( क्वार ) की धूपका भारी ताप मिट गया । हे कृपालु! आपने मेरा सब सन्देह हर लिया, अब श्रीरामचन्द्रजीका यथार्थ स्वरूप मेरी समझमें आ गया ॥ १ ॥
नाथ कृपाँ अब गयउ बिषादा । सुखी भयउँ प्रभु चरन प्रसादा ॥
अब मोहि आपनि किंकरि जानी । जदपि सहज जड़ नारि अयानी ॥
हे नाथ! आपकी कृपासे अब मेरा विषाद जाता रहा और आपके चरणोंके अनुग्रहसे मैं सुखी हो गयी । यद्यपि मैं स्त्री होनेके कारण स्वभावसे ही मूर्ख और ज्ञानहीन हूँ, तो भी अब आप मुझे अपनी दासी जानकर— ॥ २ ॥
प्रथम जो मैं पूछा सोइ कहहू । जौं मो पर प्रसन्न प्रभु अहहू ॥
राम ब्रह्म चिनमय अबिनासी । सर्ब रहित सब उर पुर बासी ॥
हे प्रभो! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो जो बात मैंने पहले आपसे पूछी थी, वही कहिये । [ यह सत्य है कि ] श्रीरामचन्द्रजी ब्रह्म हैं, चिन्मय ( ज्ञानस्वरूप ) हैं, अविनाशी हैं, सबसे रहित और सबके हृदयरूपी नगरीमें निवास करनेवाले हैं ॥ ३ ॥
नाथ धरेउ नरतनु केहि हेतू । मोहि समुझाइ कहहु बृषकेतू॥
उमा बचन सुनि परम बिनीता । रामकथा पर प्रीति पुनीता ॥
फिर हे नाथ! उन्होंने मनुष्यका शरीर किस कारणसे धारण किया? हे धर्मकी ध्वजा धारण करनेवाले प्रभो! यह मुझे समझाकर कहिये । पार्वतीके अत्यन्त नम्र वचन सुनकर और श्रीरामचन्द्रजीकी कथामें उनका विशुद्ध प्रेम देखकर—॥४ ॥
दो० – हियँ हरषे कामारि तब संकर सहज सुजान ।
बहु बिधि उमहि प्रसंसि पुनि बोले कृपानिधान ॥ १२० ( क ) ॥
तब कामदेवके शत्रु, स्वाभाविक ही सुजान, कृपानिधान शिवजी मनमें बहुत ही हर्षित हुए और बहुत प्रकारसे पार्वतीकी बड़ाई करके फिर बोले- ॥ १२० ( क ) ॥ नवाह्नपारायण, पहला विश्राम मासपारायण, चौथा विश्राम
सो० – सुनु सुभ कथा भवानि रामचरितमानस बिमल ।
कहा भुसुंड बखानि सुना बिहग नायक गरुड़ ॥ १२० ( ख ) ॥
हे पार्वती! निर्मल रामचरितमानसकी वह मङ्गलमयी कथा सुनो जिसे काकभुशुण्डिने विस्तारसे कहा और पक्षियोंके राजा गरुड़जीने सुना था ॥ १२० ( ख ) ॥
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* बालकाण्ड * १३३
सो संबाद उदार जेहि बिधि भी आगें कहब ।
सुनहु राम अवतार चरित परम सुंदर अनघ ॥ १२० ( ग ) ॥
वह श्रेष्ठ संवाद जिस प्रकार हुआ, वह मैं आगे कहूँगा । अभी तुम श्रीरामचन्द्रजीके अवतारका परम सुन्दर और पवित्र ( पापनाशक ) चरित्र सुनो ॥ १२० ( ग ) ॥
हरि गुन नाम अपार कथा रूप अगनित अमित ।
मैं निज मति अनुसार कहउँ उमा सादर सुनहु ॥ १२० ( घ ) ॥
श्रीहरिके गुण, नाम, कथा और रूप सभी अपार, अगणित और असीम हैं । फिर भी हे पार्वती! मैं अपनी बुद्धिके अनुसार कहता हूँ, तुम आदरपूर्वक सुनो ॥ १२० ( घ ) ॥
सुनु गिरिजा हरिचरित सुहाए । बिपुल बिसद निगमागम गाए ॥
हरि अवतार हेतु जेहि होई । इदमित्थं कहि जाइ न सोई ॥
हे पार्वती! सुनो, वेद-शास्त्रोंने श्रीहरिके सुन्दर, विस्तृत और निर्मल चरित्रोंका गान किया है । हरिका अवतार जिस कारणसे होता है, वह कारण ' बस यही है ' ऐसा नहीं कहा जा सकता ( अनेकों कारण हो सकते हैं और ऐसे भी हो सकते हैं जिन्हें कोई जान ही नहीं सकता) ॥ १ ॥
राम अतर्क्य बुद्धि मन बानी । मत हमार अस सुनहि सयानी ॥
तदपि संत मुनि बेद पुराना । जस कछु कहहिं स्वमति अनुमाना ॥
हे सयानी! सुनो, हमारा मत तो यह है कि बुद्धि, मन और वाणीसे श्रीरामचन्द्रजीकी तर्कना नहीं की जा सकती । तथापि संत, मुनि, वेद और पुराण– अपनी- अपनी बुद्धिके अनुसार जैसा कुछ कहते हैं, ॥ २ ॥
तस मैं सुमुखि सुनावउँ तोही । समुझि परइ जस कारन मोही ॥
जब जब होइ धरम कै हानी । बाढ़हिं असुर अधम अभिमानी ॥
और जैसा कुछ मेरी समझमें आता है, हे सुमुखि! वही कारण मैं तुमको सुनाता हूँ । जब-जब धर्मका ह्रास होता है और नीच अभिमानी राक्षस बढ़ जाते हैं ॥ ३ ॥
करहिं अनीति जाइ नहिं बरनी । सीदहिं बिप्र धेनु सुर धरनी ॥
तब तब प्रभु धरि बिबिध सरीरा । हरहिं कृपानिधि सज्जन पीरा ॥
और वे ऐसा अन्याय करते हैं कि जिसका वर्णन नहीं हो सकता तथा ब्राह्मण, गौ, देवता और पृथ्वी कष्ट पाते हैं, तब-तब वे कृपानिधान प्रभु भाँति- भाँति [ दिव्य ] शरीर धारण कर सज्जनोंकी पीड़ा हरते हैं ॥४ ॥
दो० - असुर मारि थापहिं सुरन्ह राखहिं निज श्रुति सेतु ।
जग बिस्तारहिं बिसद जस राम जन्म कर हेतु ॥ १२१ ॥
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* * १३४ रामचरितमानस वे असुरोंको मारकर देवताओंको स्थापित करते हैं, अपने [ श्वासरूप ] वेदोंकी मर्यादाकी रक्षा करते हैं और जगत्में अपना निर्मल यश फैलाते हैं । श्रीरामचन्द्रजीके अवतारका यह कारण है ॥१२१ ॥
सोइ जस गाइ भगत भव तरहीं । कृपासिंधु जन हित तनु धरहीं ॥
राम जनम के हेतु अनेका । परम बिचित्र एक तें एका ॥
उसी यशको गा- गाकर भक्तजन भवसागरसे तर जाते हैं । कृपासागर भगवान् भक्तोंके हितके लिये शरीर धारण करते हैं । श्रीरामचन्द्रजीके जन्म लेनेके अनेक कारण हैं, जो एक-से-एक बढ़कर विचित्र हैं ॥ १ ॥
जनम एक दुइ कहउँ बखानी । सावधान सुनु सुमति भवानी ॥
द्वारपाल हरि के प्रिय दोऊ । जय अरु बिजय जान सब कोऊ ॥
हे सुन्दर बुद्धिवाली भवानी! मैं उनके दो-एक जन्मोंका विस्तारसे वर्णन करता हूँ, तुम सावधान होकर सुनो । श्रीहरिके जय और विजय दो प्यारे द्वारपाल हैं, जिनको सब कोई जानते हैं ॥ २ ॥
बिप्र श्राप तें दूनउ भाई । तामस असुर देह तिन्ह पाई ॥
कनककसिपु अरु हाटकलोचन । जगत बिदित सुरपति मद मोचन ॥
उन दोनों भाइयोंने ब्राह्मण ( सनकादि) के शापसे असुरोंका तामसी शरीर पाया । एकका नाम था हिरण्यकशिपु और दूसरेका हिरण्याक्ष । ये देवराज इन्द्रके गर्वको छुड़ानेवाले सारे जगत् में प्रसिद्ध हुए ॥३ ॥
बिजई समर बीर बिख्याता । धरि बराह बपु एक निपाता ॥
होइ नरहरि दूसर पुनि मारा । जन प्रहलाद सुजस बिस्तारा ॥
वे युद्धमें विजय पानेवाले विख्यात वीर थे । इनमेंसे एक ( हिरण्याक्ष ) को भगवान्ने वराह ( सूअर ) का शरीर धारण करके मारा; फिर दूसरे ( हिरण्यकशिपु ) का नरसिंहरूप धारण करके वध किया और अपने भक्त प्रह्लादका सुन्दर यश फैलाया ॥४ ॥
दो० – भए निसाचर जाइ तेइ महाबीर बलवान ।
कुंभकरन रावन सुभट सुर बिजई जग जान ॥१२२ ॥
वे ही [ दोनों ] जाकर देवताओंको जीतनेवाले तथा बड़े योद्धा, रावण और कुम्भकर्ण नामक बड़े बलवान् और महावीर राक्षस हुए, जिन्हें सारा जगत् जानता है ॥ १२२ ॥
मुकुत न भए हते भगवाना । तीनि जनम द्विज बचन प्रवाना ॥
एक बार तिन्ह के हित लागी । धरेउ सरीर भगत अनुरागी ॥
भगवान्के द्वारा मारे जानेपर भी वे ( हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु ) इसीलिये मुक्त नहीं हुए कि ब्राह्मणके वचन ( शाप) का प्रमाण तीन जन्मके लिये था । अतः एक बार उनके कल्याणके लिये भक्तप्रेमी भगवान्ने फिर अवतार लिया ॥ १ ॥
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* बालकाण्ड * १३५
कस्यप अदिति तहाँ पितु माता । दसरथ कौसल्या बिख्याता ॥
एक कलप एहि बिधि अवतारा । चरित पवित्र किए संसारा ॥
वहाँ ( उस अवतारमें ) कश्यप और अदिति उनके माता-पिता हुए, जो दशरथ और कौसल्याके नामसे प्रसिद्ध थे । एक कल्पमें इस प्रकार अवतार लेकर उन्होंने संसारमें पवित्र लीलाएँ कीं ॥२ ॥
एक कलप सुर देखि दुखारे । समर जलंधर सन सब हारे ॥
संभु कीन्ह संग्राम अपारा । दनुज महाबल मरइ न मारा ॥
एक कल्पमें सब देवताओंको जलन्धर दैत्यसे युद्धमें हार जानेके कारण दुःखी देखकर शिवजीने उसके साथ बड़ा घोर युद्ध किया; पर वह महाबली दैत्य मारे नहीं मरता था ॥३ ॥
परम सती असुराधिप नारी । तेहिं बल ताहि न जितहिं पुरारी ॥
उस दैत्यराजकी स्त्री परम सती ( बड़ी ही पतिव्रता ) थी । उसीके प्रतापसे त्रिपुरासुर [ जैसे अजेय शत्रु ] का विनाश करनेवाले शिवजी भी उस दैत्यको नहीं जीत सके ॥ ४ ॥
दो० –छल करि टारेउ तासु ब्रत प्रभु सुर कारज कीन्ह ।
जब तेहिं जानेउ मरम तब श्राप कोप करि दीन्ह ॥ १२३ ॥
प्रभुने छलसे उस स्त्रीका व्रत भङ्ग कर देवताओंका काम किया । जब उस स्त्रीने यह भेद जाना, तब उसने क्रोध करके भगवान्को शाप दिया ॥ १२३ ॥
तासु श्राप हरि दीन्ह प्रमाना । कौतुकनिधि कृपाल भगवाना ॥
तहाँ जलंधर रावन भयऊ । रन हति राम परम पद दयऊ ॥
लीलाओंके भण्डार कृपालु हरिने उस स्त्रीके शापको प्रामाण्य दिया ( स्वीकार किया ) । वही जलन्धर उस कल्पमें रावण हुआ, जिसे श्रीरामचन्द्रजीने युद्धमें मारकर परमपद दिया ॥ १ ॥
एक जनम कर कारन एहा । जेहि लगि राम धरी नरदेहा ॥
प्रति अवतार कथा प्रभु केरी । सुनु मुनि बरनी कबिन्ह घनेरी ॥
एक जन्मका कारण यह था, जिससे श्रीरामचन्द्रजीने मनुष्यदेह धारण किया । हे भरद्वाज मुनि! सुनो, प्रभुके प्रत्येक अवतारकी कथाका कवियोंने नाना प्रकारसे वर्णन किया है ॥ २ ॥
नारद श्राप दीन्ह एक बारा । कलप एक तेहि लगि अवतारा ॥
गिरिजा चकित भईं सुनि बानी । नारद बिष्नुभगत पुनि ग्यानी ॥
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* *१३६ रामचरितमानस एक बार नारदजीने शाप दिया, अतः एक कल्पमें उसके लिये अवतार हुआ । यह बात सुनकर पार्वतीजी बड़ी चकित हुईं [ और बोलीं कि ] नारदजी तो विष्णुभक्त और ज्ञानी हैं ॥ ३ ॥
कारन कवन श्राप मुनि दीन्हा । का अपराध रमापति कीन्हा ॥
यह प्रसंग मोहि कहहु पुरारी । मुनि मन मोह आचरज भारी ॥
मुनिने भगवान्को शाप किस कारणसे दिया? लक्ष्मीपति भगवान्ने उनका क्या अपराध किया था? हे पुरारि ( शङ्करजी )! यह कथा मुझसे कहिये । मुनि नारदके मनमें मोह होना बड़े आश्चर्यकी बात है ॥४ ॥
दो० –- बोले बिहसि महेस तब ग्यानी मूढ़ न कोइ ।
जेहि जस रघुपति करहिं जब सो तस तेहि छन होइ ॥ १२४ ( क ) ॥
तब महादेवजीने हँसकर कहा- न कोई ज्ञानी है न मूर्ख । श्रीरघुनाथजी जब जिसको जैसा करते हैं, वह उसी क्षण वैसा ही हो जाता है ॥ १२४ ( क ) ॥
सो० – कहउँ राम गुन गाथ भरद्वाज सादर सुनहु ।
भव भंजन रघुनाथ भजु तुलसी तजि मान मद ॥। १२४ ( ख ) ॥
[ याज्ञवल्क्यजी कहते हैं— ] हे भरद्वाज! मैं श्रीरामचन्द्रजीके गुणोंकी कथा कहता हूँ, तुम आदरसे सुनो । तुलसीदासजी कहते हैं - मान और मदको छोड़कर आवागमनका नाश करनेवाले रघुनाथजीको भजो ॥१२४ ( ख ) ॥
हिमगिरि गुहा एक अति पावनि । बह समीप सुरसरी सुहावनि ॥
आश्रम परम पुनीत सुहावा । देखि देवरिषि मन अति भावा ॥
हिमालय पर्वतमें एक बड़ी पवित्र गुफा थी । उसके समीप ही सुन्दर गङ्गाजी बहती थीं । वह परम पवित्र सुन्दर आश्रम देखनेपर नारदजीके मनको बहुत ही सुहावना लगा ॥१ ॥
निरखि सैल सरि बिपिन बिभागा । भयउ रमापति पद अनुरागा ॥
सुमिरत हरिहि श्राप गति बाधी । सहज बिमल मन लागि समाधी ॥
पर्वत, नदी और वनके [ सुन्दर ] विभागोंको देखकर नारदजीका लक्ष्मीकान्त भगवान्के चरणोंमें प्रेम हो गया । भगवान्का स्मरण करते ही उन ( नारद मुनि ) के शापकी ( जो शाप उन्हें दक्ष प्रजापतिने दिया था और जिसके कारण वे एक स्थानपर नहीं ठहर सकते थे ) गति रुक गयी और मनके स्वाभाविक ही निर्मल होनेसे उनकी समाधि लग गयी ॥ २ ॥
मुनि गति देखि सुरेस डेराना । कामहि बोलि कीन्ह सनमाना ॥
सहित सहाय जाहु मम हेतू । चलेउ हरषि हियँ जलचरकेतू ॥
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* बालकाण्ड * १३७ नारद मुनिकी [ यह तपोमयी ] स्थिति देखकर देवराज इन्द्र डर गया । उसने कामदेवको बुलाकर उसका आदर- सत्कार किया [ और कहा कि] मेरे [हितके ] लिये तुम अपने सहायकोंसहित [ नारदकी समाधि भङ्ग करनेको ] जाओ । [ यह सुनकर ] मीनध्वज कामदेव मनमें प्रसन्न होकर चला ॥३ ॥
सुनासीर मन महुँ असि त्रासा । चहत देवरिषि मम पुर बासा ॥
जे कामी लोलुप जग माहीं । कुटिल काक इव सबहि डेराहीं ॥
इन्द्रके मनमें यह डर हुआ कि देवर्षि नारद मेरी पुरी ( अमरावती ) का निवास( राज्य ) चाहते हैं । जगत्में जो कामी और लोभी होते हैं, वे कुटिल कौएकी तरह सबसे डरते हैं ॥४ ॥
दो० – सूख हाड़ लै भाग सठ स्वान निरखि मृगराज ।
छीनि लेइ जनि जान जड़ तिमि सुरपतिहि न लाज ॥ १२५ ॥
जैसे मूर्ख कुत्ता सिंहको देखकर सूखी हड्डी लेकर भागे और वह मूर्ख यह समझे कि कहीं उस हड्डीको सिंह छीन न ले, वैसे ही इन्द्रको [नारदजी मेरा राज्य छीन लेंगे, ऐसा सोचते ] लाज नहीं आयी ॥१२५ ॥
तेहि आश्रमहिं मदन जब गयऊ । निज मायाँ बसंत निरमयऊ ॥
कुसुमित बिबिध बिटप बहुरंगा । कूजहिं कोकिल गुंजहिं भृंगा ॥
जब कामदेव उस आश्रममें गया, तब उसने अपनी मायासे वहाँ वसन्त ऋतुको उत्पन्न किया । तरह - तरहके वृक्षोंपर रंग- बिरंगे फूल खिल गये, उनपर कोयलें कूकने लगीं और भौरे गुंजार करने लगे ॥ १ ॥
। चली सुहावनि त्रिबिध बयारी काम कृसानु बढ़ावनिहारी ॥
रंभादिक सुरनारि नबीना । सकल असमसर कला प्रबीना ॥
कामाग्निको भड़कानेवाली तीन प्रकारकी ( शीतल, मन्द और सुगन्ध ) सुहावनी हवा चलने लगी । रम्भा आदि नवयुवती देवाङ्गनाएँ, जो सब-की--सब कामकलामें निपुण थीं, ॥ २ ॥
करहिं गान बहु तान तरंगा । बहुबिधि क्रीड़हिं पानि पतंगा ॥
देखि सहाय मदन हरषाना । कीन्हेसि पुनि प्रपंच बिधि नाना ॥
वे बहुत प्रकारकी तानोंकी तरङ्गके साथ गाने लगीं और हाथमें गेंद लेकर नाना प्रकारके खेल खेलने लगीं । कामदेव अपने इन सहायकोंको देखकर बहुत प्रसन्न हुआ और फिर उसने नाना प्रकारके मायाजाल किये ॥ ३ ॥
काम कला कछु मुनिहि न ब्यापी । निज भयँ डरेउ मनोभव पापी ॥
सीम कि चाँपि सकइ कोउ तासू । बड़ रखवार रमापति जासू॥
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* *१३८ रामचरितमानस परन्तु कामदेवकी कोई भी कला मुनिपर असर न कर सकी । तब तो पापी कामदेव अपने ही [ नाशके ] भयसे डर गया । लक्ष्मीपति भगवान् जिसके बड़े रक्षक हों, भला, उसकी सीमा (मर्यादा ) को कोई दबा सकता है? ॥ ४ ॥
दो० – सहित सहाय सभीत अति मानि हारि मन मैन ।
हेसि जाइ मुनि चरन तब कहि सुठि आरत बैन ॥ १२६ ॥
तब अपने सहायकोंसमेत कामदेवने बहुत डरकर और अपने मनमें हार मानकर बहुत ही आर्त ( दीन ) वचन कहते हुए मुनिके चरणोंको जा पकड़ा ॥ १२६ ॥
भयउ न नारद मन कछु रोषा । कहि प्रिय बचन काम परितोषा ॥
नाइ चरन सिरु आयसु पाई । गयउ मदन तब सहित सहाई ॥
नारदजीके मनमें कुछ भी क्रोध न आया । उन्होंने प्रिय वचन कहकर कामदेवका समाधान किया । तब मुनिके चरणोंमें सिर नवाकर और उनकी आज्ञा पाकर कामदेव अपने सहायकोंसहित लौट गया ॥१ ॥
मुनि सुसीलता आपनि करनी । सुरपति सभाँ जाइ सब बरनी ॥
सुनि सब के मन अचरजु आवा । मुनिहि प्रसंसि हरिहि सिरु नावा ॥
देवराज इन्द्रकी सभामें जाकर उसने मुनिकी सुशीलता और अपनी करतूत सब कही, जिसे सुनकर सबके मनमें आश्चर्य हुआ और उन्होंने मुनिकी बड़ाई करके श्रीहरिको सिर नवाया ॥२ ॥
तब नारद गवने सिव पाहीं । जिता काम अहमिति मन माहीं ॥
मार चरित संकरहि सुनाए । अतिप्रिय जानि महेस सिखाए ॥
तब नारदजी शिवजीके पास गये । उनके मनमें इस बातका अहंकार हो गया कि हमने कामदेवको जीत लिया । उन्होंने कामदेवके चरित्र शिवजीको सुनाये और महादेवजीने उन ( नारदजी ) को अत्यन्त प्रिय जानकर [इस प्रकार] शिक्षा दी- ॥३ ॥
बार बार बिनवउँ मुनि तोही । जिमि यह कथा सुनायहु मोही ॥
तिमि जनि हरिहि सुनावहु कबहूँ । चलेहुँ प्रसंग दुराएहु तबहूँ॥
हे मुनि! मैं तुमसे बार- बार विनती करता हूँ कि जिस तरह यह कथा तुमने मुझे सुनायी है,
उस तरह भगवान् श्रीहरिको कभी मत सुनाना । चर्चा भी चले तब भी इसको छिपा जाना ॥४ ॥
दोदो०० -—संभुसंभु दीन्ह उपदेस हित नहिं नारदहि सोहान ।
भरद्वाज कौतुक सुनहु हरि इच्छा बलवान ॥ १२७ ॥