श्रीरामचरितमानस — पृष्ठ 141–150
श्रीरामचरितमानस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 141–150
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* बालकाण्ड * १३ ९ यद्यपि शिवजीने यह हितकी शिक्षा दी, पर नारदजीको वह अच्छी न लगी । हे भरद्वाज!
अब कौतुक ( तमाशा ) सुनो । हरिकी इच्छा बड़ी बलवान् है ॥१२७ ॥
राम कीन्ह चहहिं सोइ होई । करै अन्यथा अस नहिं कोई ॥
संभु बचन मुनि मन नहिं भाए । तब बिरंचि के लोक सिधाए ॥
श्रीरामचन्द्रजी जो करना चाहते हैं, वही होता है, ऐसा कोई नहीं जो उसके विरुद्ध कर सके । श्रीशिवजीके वचन नारदजीके मनको अच्छे नहीं लगे, तब वे वहाँसे ब्रह्मलोकको चल दिये ॥१ ॥
एक बार करतल बर बीना । गावत हरि गुन गान प्रबीना ॥
छीरसिंधु गवने मुनिनाथा । जहँ बस श्रीनिवास श्रुतिमाथा ॥
एक बार गानविद्यामें निपुण मुनिनाथ नारदजी हाथमें सुन्दर वीणा लिये, हरिगुण गाते हुए क्षीरसागरको गये, जहाँ वेदोंके मस्तकस्वरूप ( मूर्तिमान् वेदान्ततत्त्व ) लक्ष्मीनिवास भगवान् नारायण रहते हैं ॥२ ॥
हरषि मिले उठि रमानिकेता । बैठे आसन रिषिहि समेता ॥
बोले बिहसि चराचर राया । बहुते दिनन कीन्हि मुनि दाया ॥
रमानिवास भगवान् उठकर बड़े आनन्दसे उनसे मिले और ऋषि ( नारदजी ) के साथ आसनपर बैठ गये । चराचरके स्वामी भगवान् हँसकर बोले - हे मुनि! आज आपने बहुत दिनोंपर दया की ॥३ ॥
काम चरित नारद सब भाषे । जद्यपि प्रथम बरजि सिवँ राखे ॥
अति प्रचंड रघुपति कै माया । जेहि न मोह अस को जग जाया ॥
यद्यपि श्रीशिवजीने उन्हें पहलेसे ही बरज रखा था, तो भी नारदजीने कामदेवका सारा चरित्र भगवान्को कह सुनाया । श्रीरघुनाथजीकी माया बड़ी ही प्रबल है । जगत्में ऐसा कौन जन्मा है जिसे वह मोहित न कर दे ॥४ ॥
दो० – रूख बदन करि बचन मृदु बोले श्रीभगवान ।
तुम्हरे सुमिरन तें मिटहिं मोह मार मद मान ॥ १२८ ॥
भगवान् रूखा मुँह करके कोमल वचन बोले - हे मुनिराज! आपका स्मरण करनेसे दूसरोंके मोह, काम, मद और अभिमान मिट जाते हैं [ फिर आपके लिये तो कहना ही क्या है? ] ॥ १२८ ॥
सुनु मुनि मोह होइ मन ताकें । ग्यान बिराग हृदय नहिं जाकें ॥
ब्रह्मचरज ब्रत रत मतिधीरा । तुम्हहि कि करइ मनोभव पीरा ॥
हे मुनि! सुनिये, मोह तो उसके मनमें होता है जिसके हृदयमें ज्ञान-न-वैराग्य नहीं है । आप तो ब्रह्मचर्यव्रतमें तत्पर और बड़े धीरबुद्धि हैं । भला, कहीं आपको भी कामदेव सता सकता है? ॥१ ॥
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* *१४० रामचरितमानस
नारद कहेउ सहित अभिमाना । कृपा तुम्हारि सकल भगवाना ॥
करुनानिधि मन दीख बिचारी । उर अंकुरेउ गरब तरु भारी ॥
नारदजीने अभिमानके साथ कहा- भगवन्! यह सब आपकी कृपा है । करुणानिधान भगवान्ने मनमें विचारकर देखा कि इनके मनमें गर्वके भारी वृक्षका अंकुर पैदा हो गया है ॥२ ॥
बेगि सो मैं डारिहउँ उखारी । पन हमार सेवक हितकारी ॥
मुनि कर हित मम कौतुक होई । अवसि उपाय करबि मैं सोई ॥
मैं उसे तुरंत ही उखाड़ फेंकूँगा, क्योंकि सेवकोंका हित करना हमारा प्रण है । मैं अवश्य ही वह उपाय करूँगा जिससे मुनिका कल्याण और मेरा खेल हो ॥ ३ ॥
तब नारद हरि पद सिर नाई । चले हृदयँ अहमिति अधिकाई ॥
श्रीपति निज माया तब प्रेरी । सुनहु कठिन करनी तेहि केरी ॥
तब नारदजी भगवान्के चरणोंमें सिर नवाकर चले । उनके हृदयमें अभिमान और भी बढ़ गया ।
तब लक्ष्मीपति भगवान्ने अपनी मायाको प्रेरित किया । अब उसकी कठिन करनी सुनो ॥४ ॥
दो० – बिरचेउ मग महुँ नगर तेहिं सत जोजन बिस्तार ।
श्रीनिवासपुर तें अधिक रचना बिबिध प्रकार ॥ १२ ९ ॥
उस ( हरिमाया ) ने रास्तेमें सौ योजन ( चार सौ कोस ) का एक नगर रचा । उस नगरकी भाँति- भाँतिकी रचनाएँ लक्ष्मीनिवास भगवान् विष्णुके नगर ( वैकुण्ठ ) से भी अधिक सुन्दर थीं ॥ १२ ९ ॥
बसहिं नगर सुंदर नर नारी । जनु बहु मनसिज रति तनुधारी ॥
तेहिं पुर बसइ सीलनिधि राजा । अगनित हय गय सेन समाजा ॥
उस नगरमें ऐसे सुन्दर नर-नारी बसते थे मानो बहुत-से कामदेव और [ उसकी स्त्री] रति ही मनुष्य- शरीर धारण किये हुए हों । उस नगरमें शीलनिधि नामका राजा रहता था, जिसके यहाँ असंख्य घोड़े, हाथी और सेनाके समूह ( टुकड़ियाँ ) थे ॥१ ॥
सत सुरेस सम बिभव बिलासा । रूप तेज बल नीति निवासा ॥
बिस्वमोहनी तासु कुमारी । श्री बिमोह जिस रूप निहारी ॥
उसका वैभव और विलास सौ इन्द्रोंके समान था । वह रूप, तेज, बल और नीतिका घर था । उसके विश्वमोहिनी नामकी एक [ऐसी रूपवती ] कन्या थी, जिसके रूपको देखकर लक्ष्मीजी भी मोहित हो जायँ ॥२ ॥
सोइ हरिमाया सब गुन खानी । सोभा तासु कि जाइ बखानी ॥
करइ स्वयंबर सो नृपबाला । आए तहँ अगनित महिपाला ॥
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* बालकाण्ड * १४१ वह सब गुणोंकी खान भगवान्की माया ही थी । उसकी शोभाका वर्णन कैसे किया जा सकता है । वह राजकुमारी स्वयंवर करना चाहती थी, इससे वहाँ अगणित राजा आये हुए थे ॥३ ॥
मुनि कौतुकी नगर तेहिं गयऊ । पुरबासिन्ह सब पूछत भयऊ ॥
सुनि सब चरित भूपगृहँ आए । करि पूजा नृप मुनि बैठाए ॥
खिलवाड़ी मुनि नारदजी उस नगरमें गये और नगरवासियोंसे उन्होंने सब हाल पूछा । सब समाचार सुनकर वे राजाके महलमें आये । राजाने पूजा करके मुनिको [ आसनपर ] बैठाया ॥४ ॥
दो० –आनि देखाई नारदहि भूपति राजकुमारि ॥
कहहु नाथ गुन दोष सब एहि के हृदयँ बिचारि ॥ १३० ॥
[ फिर ] राजाने राजकुमारीको लाकर नारदजीको दिखलाया [ और पूछा कि— ] हे नाथ! आप अपने हृदयमें विचारकर इसके सब गुण-दोष कहिये ॥ १३० ॥
देखि रूप मुनि बिरति बिसारी । बड़ी बार लगि रहे निहारी ॥
लच्छन तासु बिलोकि भुलाने । हृदयँ हरष नहिं प्रगट बखाने ॥
उसके रूपको देखकर मुनि वैराग्य भूल गये और बड़ी देरतक उसकी ओर देखते ही रह गये I उसके लक्षण देखकर मुनि अपने -आपको भी भूल गये और हृदयमें हर्षित हुए, पर प्रकटरूपमें उन लक्षणोंको नहीं कहा ॥१ ॥
जो एहि बरइ अमर सोइ होई । समरभूमि तेहि जीत न कोई ॥
सेवहिं सकल चराचर ताही । बरइ सीलनिधि कन्या जाही ॥
[ लक्षणोंको सोचकर वे मनमें कहने लगे कि ] जो इसे ब्याहेगा, वह अमर हो जायगा और रणभूमिमें कोई उसे जीत न सकेगा । यह शीलनिधिकी कन्या जिसको वरेगी, सब चर- अचर जीव उसकी सेवा करेंगे ॥ २ ॥
लच्छन सब बिचारि उर राखे । कछुक बनाइ भूप सन भाषे ॥
सुता सुलच्छन कहि नृप पाहीं । नारद चले सोच मन माहीं ॥
सब लक्षणोंको विचारकर मुनिने अपने हृदयमें रख लिया और राजासे कुछ अपनी ओरसे बनाकर कह दिया । राजासे लड़कीके सुलक्षण कहकर नारदजी चल दिये । पर उनके मनमें यह चिन्ता थी कि- ॥३ ॥
करौं जाइ सोइ जतन बिचारी । जेहि प्रकार मोहि बरै कुमारी ॥
जप तप कछु न होइ तेहि काला । हे बिधि मिलइ कवन बिधि बाला ॥
मैं जाकर सोच- विचारकर अब वही उपाय करूँ, जिससे यह कन्या मुझे ही वरे । इस समय
जप-तपसे तो कुछ हो नहीं सकता । हे विधाता! मुझे यह कन्या किस तरह मिलेगी? ॥ ४ ॥
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* *१४२ रामचरितमानस
दो०- एहि अवसर चाहिअ परम सोभा रूप बिसाल ।
जो बिलोकि रीझै कुअँरि तब मेलै जयमाल ॥ १३१ ॥
इस समय तो बड़ी भारी शोभा और विशाल( सुन्दर ) रूप चाहिये, जिसे देखकर राजकुमारी मुझपर रीझ जाय और तब जयमाल [ मेरे गलेमें ] डाल दे ॥१३१ ॥
होइहि जात गहरु अति भाई ॥हरि सन मागौं सुंदरताई ।
मोरें हित हरि सम नहिं कोऊ । एहि अवसर सहाय सोइ होऊ ॥
[ एक काम करूँ कि ] भगवान्से सुन्दरता माँगूँ; पर भाई! उनके पास जानेमें तो बहुत देर हो जायगी । किन्तु श्रीहरिके समान मेरा हितू भी कोई नहीं है, इसलिये इस समय वे ही मेरे सहायक हों ॥१ ॥
बहुबिधि बिनय कीन्हि तेहि काला । प्रगटेउ प्रभु कौतुकी कृपाला ॥
प्रभु बिलोकि मुनि नयन जुड़ाने । होइहि काजु हिएँ हरषाने ॥
उस समय नारदजीने भगवान्की बहुत प्रकारसे विनती की । तब लीलामय कृपालु प्रभु [ वहीं ] प्रकट हो गये । स्वामीको देखकर नारदजीके नेत्र शीतल हो गये और वे मनमें बड़े ही हर्षित हुए कि अब तो काम बन ही जायगा ॥२ ॥
अति आरति कहि कथा सुनाई । करहु कृपा करि होहु सहाई ॥
आपन रूप देहु प्रभु मोही । आन भाँति नहिं पावौं ओही ॥
नारदजीने बहुत आर्त ( दीन ) होकर सब कथा कह सुनायी [और प्रार्थना की कि ] कृपा कीजिये और कृपा करके मेरे सहायक बनिये । हे प्रभो! आप अपना रूप मुझको दीजिये और किसी प्रकार मैं उस ( राजकन्या ) को नहीं पा सकता ॥ ३ ॥
जेहि बिधि नाथ होड़ हित मोरा । करहु सो बेगि दास मैं तोरा ॥
निज माया बल देखि बिसाला । हियँ हँसि बोले दीनदयाला ॥
हे नाथ! जिस तरह मेरा हित हो, आप वही शीघ्र कीजिये । मैं आपका दास हूँ । अपनी मायाका विशाल बल देख दीनदयालु भगवान् मन-ही- मन हँसकर बोले- ॥४ ॥
दो० – जेहि बिधि होइहि परम हित नारद सुनहु तुम्हार ।
सोइ हम करब न आन कछु बचन न मृषा हमार ॥ १३२ ॥
हे नारदजी! सुनो, जिस प्रकार आपका परम हित होगा, हम वही करेंगे, दूसरा कुछ नहीं ।
हमारा वचन असत्य नहीं होता ॥ १३२ ॥
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* बालकाण्ड * १४३
कुपथ माग रुज ब्याकुल रोगी । बैद न देइ सुनहु मुनि जोगी ॥
एहि बिधि हित तुम्हार मैं ठयऊ । कहि अस अंतरहित प्रभु भयऊ ॥
हे योगी मुनि! सुनिये, रोगसे व्याकुल रोगी कुपथ्य माँगे तो वैद्य उसे नहीं देता । इसी प्रकार
मैंने भी तुम्हारा हित करनेकी ठान ली है । ऐसा कहकर भगवान् अन्तर्धान हो गये ॥१ ॥
माया बिबस भए मुनि मूढ़ा । समुझी नहिं हरि गिरा निगूढ़ा ।
गवने तुरत तहाँ रिषिराई । जहाँ स्वयंबर भूमि बनाई ॥
[ भगवान्की] मायाके वशीभूत हुए मुनि ऐसे मूढ़ हो गये कि वे भगवान्की अगूढ़ ( स्पष्ट ) वाणीको भी न समझ सके । ऋषिराज नारदजी तुरंत वहाँ गये जहाँ स्वयंवरकी भूमि बनायी गयी थी ॥ २ ॥
निज निज आसन बैठे राजा । बहु बनाव करि सहित समाजा ॥
मुनि मन हरष रूप अति मोरें । मोहि तजि आनहि बरिहि न भोरें ॥
राजालोग खूब सज - धजकर समाजसहित अपने - अपने आसनपर बैठे थे । मुनि ( नारद ) मन- ही-मन प्रसन्न हो रहे थे कि मेरा रूप बड़ा सुन्दर है, मुझे छोड़ कन्या भूलकर भी दूसरेको न वरेगी ॥३ ॥
मुनि हित कारन कृपानिधाना । दीन्ह कुरूप न जाइ बखाना ॥
सो चरित्र लखि काहुँ न पावा । नारद जानि सबहिं सिर नावा ॥
कृपानिधान भगवान्ने मुनिके कल्याणके लिये उन्हें ऐसा कुरूप बना दिया कि जिसका वर्णन नहीं हो सकता; पर यह चरित कोई भी न जान सका । सबने उन्हें नारद ही जानकर प्रणाम किया ॥४ ॥
दो० – रहे तहाँ दुइ रुद्र गन ते जानहिं सब भेउ ।
बिप्रबेष देखत फिरहिं परम कौतुकी तेउ ॥१३३ ॥
वहाँ दो शिवजीके गण भी थे । वे सब भेद जानते थे और ब्राह्मणका वेष बनाकर सारी लीला
देखते -फिरते थे । वे भी बड़े मौजी थे ॥ १३३ ॥
जेहिं समाज बैठे मुनि जाई । हृदयँ रूप अहमिति अधिकाई ॥
तहँ बैठे महेस गन दोऊ । बिप्रबेष गति लखइ न कोऊ ॥
नारदजी अपने हृदयमें रूपका बड़ा अभिमान लेकर जिस समाज ( पंक्ति ) में जाकर बैठे थे, ये शिवजीके दोनों गण भी वहीं बैठ गये । ब्राह्मणके वेषमें होनेके कारण उनकी इस चालको कोई न जान सका ॥ १ ॥
करहिं कूटि नारदहि सुनाई । नीकि दीन्हि हरि सुंदरताई ॥
रीझिहि राजकुरि छबि देखी । इन्हहि बरिहि हरि जानि बिसेषी ॥
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* *१४४ रामचरितमानस वे नारदजीको सुना- सुनाकर व्यंग्य वचन कहते थे- भगवान्ने इनको अच्छी ' सुन्दरता ' दी है । इनकी शोभा देखकर राजकुमारी रीझ ही जायगी और ' हरि' ( वानर ) जानकर इन्हींको खास तौरसे वरेगी ॥२ ॥
मुनिहि मोह मन हाथ पराएँ । हँसहिं संभु गन अति सचु पाएँ ॥
जदपि सुनहिं मुनि अटपटि बानी । समुझि न परइ बुद्धि भ्रम सानी ॥
नारद मुनिको मोह हो रहा था, क्योंकि उनका मन दूसरेके हाथ ( मायाके वश ) में था । शिवजीके गण बहुत प्रसन्न होकर हँस रहे थे । यद्यपि मुनि उनकी अटपटी बातें सुन रहे थे, पर बुद्धि भ्रममें सनी हुई होनेके कारण वे बातें उनकी समझमें नहीं आती थीं ( उनकी बातोंको वे अपनी प्रशंसा समझ रहे थे ) ॥ ३ ॥
काहुँ न लखा सो चरित बिसेषा । सो सरूप नृपकन्याँ देखा ॥
मर्कट बदन भयंकर देही । देखत हृदयँ क्रोध भा तेही ॥
इस विशेष चरितको और किसीने नहीं जाना, केवल राजकन्याने [ नारदजीका ] वह रूप देखा । उनका बन्दरका- सा मुँह और भयंकर शरीर देखते ही कन्याके हृदयमें क्रोध उत्पन्न हो गया ॥ ४ ॥
दो० - सखीं संग लै कुअँरि तब चलि जनु राजमराल ।
देखत फिरइ महीप सब कर सरोज जयमाल ॥ १३४ ॥
तब राजकुमारी सखियोंको साथ लेकर इस तरह चली मानो राजहंसिनी चल रही है । वह अपने कमल- जैसे हाथोंमें जयमाला लिये सब राजाओंको देखती हुई घूमने लगी ॥ १३४ ॥
जेहि दिसि बैठे नारद फूली । सो दिसि तेहिं न बिलोकी भूली ॥
पुनि पुनि मुनि उकसहिं अकुलाहीं । देखि दसा हर गन मुसुकाहीं ॥
जिस ओर नारदजी [ रूपके गर्वमें ] फूले बैठे थे, उस ओर उसने भूलकर भी नहीं ताका । नारद मुनि बार - बार उचकते और छटपटाते हैं । उनकी दशा देखकर शिवजीके गण मुसकराते हैं ॥ १ ॥
धरि नृपतनु तहँ गयउ कृपाला । कुअरि हरषि मेलेउ जयमाला ॥
दुलहिनि लै गे लच्छिनिवासा । नृपसमाज सब भयउ निरासा ॥
कृपालु भगवान् भी राजाका शरीर धारण कर वहाँ जा पहुँचे । राजकुमारीने हर्षित होकर उनके गलेमें जयमाला डाल दी । लक्ष्मीनिवास भगवान् दुलहिनको ले गये । सारी राजमण्डली निराश हो गयी ॥२ ॥
मुनि अति बिकल मोहँ मति नाठी । मनि गिरि गई छूटि जनु गाँठी ॥
तब हर गन बोले मुसुकाई । निज मुख मुकुर बिलोकहु जाई ॥
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* बालकाण्ड * १४५ मोहके कारण मुनिकी बुद्धि नष्ट हो गयी थी, इससे वे [ राजकुमारीको गयी देख ] बहुत ही विकल हो गये । मानो गाँठसे छूटकर मणि गिर गयी हो । तब शिवजीके गणोंने मुसकराकर कहा— जाकर दर्पणमें अपना मुँह तो देखिये! ॥३ ॥
अस कहि दोउ भागे भयँ भारी । बदन दीख मुनि बारि निहारी ॥
बेषु बिलोकि क्रोध अति बाढ़ा । तिन्हहि सराप दीन्ह अति गाढ़ा ॥
ऐसा कहकर वे दोनों बहुत भयभीत होकर भागे । मुनिने जलमें झाँककर अपना मुँह देखा । अपना रूप देखकर उनका क्रोध बहुत बढ़ गया । उन्होंने शिवजीके उन गणोंको अत्यन्त कठोर शाप दिया ॥ ४ ॥
दो० – होहु निसाचर जाइ तुम्ह कपटी पापी दोउ ।
हँसेहु हमहि सो लेहु फल बहुरि हँसेहु मुनि कोउ ॥ १३५ ॥
तुम दोनों कपटी और पापी जाकर राक्षस हो जाओ । तुमने हमारी हँसी की, उसका फल चखो ।
अब फिर किसी मुनिकी हँसी करना ॥ १३५ ॥
पुनि जल दीख रूप निज पावा । तदपि हृदयँ संतोष न आवा ॥
फरकत अधर कोप मन माहीं । सपदि चले कमलापति पाहीं ॥
मुनिने फिर जलमें देखा, तो उन्हें अपना ( असली ) रूप प्राप्त हो गया; तब भी उन्हें सन्तोष नहीं हुआ । उनके ओंठ फड़क रहे थे और मनमें क्रोध [ भरा ] था । तुरंत ही वे भगवान् कमलापतिके पास चले ॥१ ॥
देहउँ श्राप कि मरिहउँ जाई । जगत मोरि उपहास कराई ॥
बीचहिं पंथ मिले दनुजारी । संग रमा सोइ राजकुमारी ॥
[ मनमें सोचते जाते थे— ] जाकर या तो शाप दूँगा या प्राण दे दूँगा । उन्होंने जगत्में मेरी हँसी करायी । दैत्योंके शत्रु भगवान् हरि उन्हें बीच रास्तेमें ही मिल गये । साथमें लक्ष्मीजी और वही राजकुमारी थीं ॥२ ॥
बोले मधुर बचन सुरसाईं । मुनि कहँ चले बिकल की नाईं ॥
सुनत बचन उपजा अति क्रोधा । माया बस न रहा मन बोधा ॥
देवताओंके स्वामी भगवान्ने मीठी वाणीमें कहा-हे मुनि! व्याकुलकी तरह कहाँ चले? ये शब्द सुनते ही नारदको बड़ा क्रोध आया; मायाके वशीभूत होनेके कारण मनमें चेत नहीं रहा ॥३ ॥
पर संपदा सकहु नहिं देखी । तुम्हरें इरिषा कपट बिसेषी ॥
मथत सिंधु रुद्रहि बौरायहु । सुरन्ह प्रेरि बिष पान करायहु ॥
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* *१४६ रामचरितमानस [ मुनिने कहा- ] तुम दूसरोंकी सम्पदा नहीं देख सकते, तुम्हारे ईर्ष्या और कपट बहुत है । समुद्र मथते समय तुमने शिवजीको बावला बना दिया और देवताओंको प्रेरित करके उन्हें विषपान कराया ॥४ ॥
दो० - असुर सुरा बिष संकरहि आपु रमा मनि चारु ।
स्वारथ साधक कुटिल तुम्ह सदा कपट ब्यवहारु ॥ १३६ ॥
असुरोंको मदिरा और शिवजीको विष देकर तुमने स्वयं लक्ष्मी और सुन्दर [ कौस्तुभ ] मणि
ले ली । तुम बड़े धोखेबाज और मतलबी हो । सदा कपटका व्यवहार करते हो ॥१३६ ॥
परम स्वतंत्र न सिर पर कोई । भावइ मनहि करहु तुम्ह सोई ॥
भलेहि मंद मंदेहि भल करहू । बिसमय हरष न हियँ कछु धरहू ॥
तुम परम स्वतन्त्र हो, सिरपर तो कोई है नहीं, इससे जब जो मनको भाता है, [ स्वच्छन्दतासे ] वही करते हो । भलेको बुरा और बुरेको भला कर देते हो । हृदयमें हर्ष- विषाद कुछ भी नहीं लाते ॥१ ॥
डहकि डहकि परिचेहु सब काहू । अति असंक मन सदा उछाहू ॥
करम सुभासुभ तुम्हहि न बाधा । अब लगि तुम्हहि न काहूँ साधा ॥
सबको ठग -ठगकर परक गये हो और अत्यन्त निडर हो गये हो; इसीसे [ ठगने काममें ] मनमें सदा उत्साह रहता है । शुभ- अशुभ कर्म तुम्हें बाधा नहीं देते । अबतक तुमको किसीने ठीक नहीं किया था ॥ २ ॥
भले भवन अब बायन दीन्हा । पावहुगे फल आपन कीन्हा ॥
बंचेहु मोहि जवनि धरि देहा । सोइ तनु धरहु श्राप मम एहा ॥
अबकी तुमने अच्छे घर बैना दिया है ( मेरे - जैसे जबर्दस्त आदमीसे छेड़खानी की है ) । अतः अपने कियेका फल अवश्य पाओगे । जिस शरीरको धारण करके तुमने मुझे ठगा है, तुम भी वही शरीर धारण करो, यह मेरा शाप है ॥ ३ ॥
कपि आकृति तुम्ह कीन्हि हमारी । करिहहिं कीस सहाय तुम्हारी ॥
मम अपकार कीन्ह तुम्ह भारी । नारि बिरहँ तुम्ह होब दुखारी ॥
तुमने हमारा रूप बन्दरका-सा बना दिया था, इससे बन्दर ही तुम्हारी सहायता करेंगे । [ मैं जिस स्त्रीको चाहता था, उससे मेरा वियोग कराकर ] तुमने मेरा बड़ा अहित किया है, इससे तुम भी स्त्रीके वियोगमें दुःखी होगे ॥ ४ ॥
दो० –श्राप सीस धरि हरषि हियँ प्रभु बहु बिनती कीन्हि ।
निज माया कै प्रबलता करषि कृपानिधि लीन्हि ॥ १३७ ॥
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* बालकाण्ड * १४७ शापको सिरपर चढ़ाकर, हृदयमें हर्षित होते हुए प्रभुने नारदजीसे बहुत विनती की और कृपानिधान भगवान्ने अपनी मायाकी प्रबलता खींच ली ॥१३७ ॥
जब हरि माया दूरि निवारी । नहिं तहँ रमा न राजकुमारी ॥
तब मुनि अति सभीत हरि चरना । गहे पाहि प्रनतारति हरना ॥
जब भगवान्ने अपनी मायाको हटा लिया, तब वहाँ न लक्ष्मी ही रह गयीं, न राजकुमारी ही । तब मुनिने अत्यन्त भयभीत होकर श्रीहरिके चरण पकड़ लिये और कहा- हे शरणागतके दुःखोंको हरनेवाले! मेरी रक्षा कीजिये ॥ १ ॥
मृषा होउ मम श्राप कृपाला । मम इच्छा कह दीनदयाला ॥
मैं दुर्बचन कहेकहे बहुतेरे । कह मुनि पाप मिटिहिं किमि मेरे ॥
हे कृपालु! मेरा शाप मिथ्या हो जाय । तब दीनोंपर दया करनेवाले भगवान्ने कहा कि यह सब मेरी ही इच्छा [ से हुआ] है । मुनिने कहा– मैंने आपको अनेक खोटे वचन कहे हैं । मेरे पाप कैसे मिटेंगे? ॥२ ॥
जपहु जाइ संकर सत नामा । होइहि हृदयँ तुरत बिश्रामा ॥
कोउ नहिं सिव समान प्रिय मोरें । असि परतीति तजहु जनि भोरें ॥
[ भगवान्ने कहा— ] जाकर शङ्करजीके शतनामका जप करो, इससे हृदयमें तुरंत शान्ति होगी । शिवजीके समान मुझे कोई प्रिय नहीं है, इस विश्वासको भूलकर भी न छोड़ना ॥३ ॥
जेहि पर कृपा न करहिं पुरारी । सो न पाव मुनि भगति हमारी ॥
अस उर धरि महि बिचरहु जाई । अब न तुम्हहि माया निअराई ॥
हे मुनि! पुरारि ( शिवजी ) जिसपर कृपा नहीं करते, वह मेरी भक्ति नहीं पाता । हृदयमें ऐसा
निश्चय करके जाकर पृथ्वीपर विचरो । अब मेरी माया तुम्हारे निकट नहीं आवेगी ॥४ ॥
दो० – बहुबिधि मुनिहि प्रबोधि प्रभु तब भए अंतरधान ।
सत्यलोक नारद चले करत राम गुन गान ॥ १३८ ॥
बहुत प्रकारसे मुनिको समझा-बुझाकर ( ढाढ़स देकर) तब प्रभु अन्तर्धान हो गये और नारदजी श्रीरामचन्द्रजीके गुणोंका गान करते हुए सत्यलोक ( ब्रह्मलोक ) को चले ॥ १३८ ॥
हर गन मुनिहि जात पथ देखी । बिगत मोह मन हरष बिसेषी ॥
अति सभीत नारद पहिं आए । गहि पद आरत बचन सुनाए ॥
शिवजीके गणोंने जब मुनिको मोहरहित और मनमें बहुत प्रसन्न होकर मार्गमें जाते हुए देखा तब वे अत्यन्त भयभीत होकर नारदजीके पास आये और उनके चरण पकड़कर दीन वचन बोले-॥१ ॥
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* *१४८ रामचरितमानस
हर गन हम न बिप्र मुनिराया । बड़ अपराध कीन्ह फल पाया ॥
श्राप अनुग्रह करहु कृपाला । बोले नारद दीनदयाला ॥
हे मुनिराज! हम ब्राह्मण नहीं हैं, शिवजीके गण हैं । हमने बड़ा अपराध किया, जिसका फल हमने पा लिया । हे कृपालु! अब शाप दूर करनेकी कृपा कीजिये । दीनोंपर दया करनेवाले नारदजीने कहा —॥२ ॥
निसिचर जाइ होहु तुम्ह दोऊ । बैभव बिपुल तेज बल होऊ ॥
भुज बल बिस्व जितब तुम्ह जहिआ । धरिहहिं बिष्नु मनुज तनु तहिआ ॥
तुम दोनों जाकर राक्षस होओ; तुम्हें महान् ऐश्वर्य, तेज और बलकी प्राप्ति हो । तुम अपनी भुजाओंके बलसे जब सारे विश्वको जीत लोगे, तब भगवान् विष्णु मनुष्यका शरीर धारण करेंगे ॥३ ॥
समर मरन हरि हाथ तुम्हारा । होइहहु मुकुत न पुनि संसारा ॥
चले जुगल मुनि पद सिर नाई । भए निसाचर कालहि पाई ॥
युद्धमें श्रीहरिके हाथसे तुम्हारी मृत्यु होगी, जिससे तुम मुक्त हो जाओगे और फिर संसारमें जन्म नहीं लोगे । वे दोनों मुनिके चरणोंमें सिर नवाकर चले और समय पाकर राक्षस हुए ॥ ४ ॥
दो० – एक कलप एहि हेतु प्रभु लीन्ह मनुज अवतार ।
सुर रंजन सज्जन सुखद हरि भंजन भुबि भार ॥१३ ९ ॥
देवताओंको प्रसन्न करनेवाले, सज्जनोंको सुख देनेवाले और पृथ्वीका भार हरण करनेवाले भगवान्ने एक कल्पमें इसी कारण मनुष्यका अवतार लिया था ॥ १३ ९ ॥
एहि बिधि जनम करम हरि केरे । सुंदर सुखद बिचित्र घनेरे ॥
कलप कलप प्रति प्रभु अवतरहीं । चारु चरित नानाबिधि करहीं ॥
इस प्रकार भगवान्के अनेकों सुन्दर, सुखदायक और अलौकिक जन्म और कर्म हैं । प्रत्येक कल्पमें जब-जब भगवान् अवतार लेते हैं और नाना प्रकारकी सुन्दर लीलाएँ करते हैं, ॥ १ ॥
तब तब कथा मुनीसन्ह गाई ॥ परम पुनीत प्रबंध बनाई ।
बिबिध प्रसंग अनूप बखाने । करहिं न सुनि आचरजु सयाने ॥
तब - तब मुनीश्वरोंने परम पवित्र काव्यरचना करके उनकी कथाओंका गान किया है और भाँति- भाँतिके अनुपम प्रसंगोंका वर्णन किया है, जिनको सुनकर समझदार ( विवेकी ) लोग आश्चर्य नहीं करते ॥२ ॥
हरि अनंत हरिकथा अनंता । कहहिं सुनहिं बहुबिधि सब संता ॥
रामचंद्र के चरित सुहाए । कलप कोटि लगि जाहिं न गाए ॥