श्रीरामचरितमानस — पृष्ठ 151–160
श्रीरामचरितमानस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 151–160
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* बालकाण्ड * १४९ श्रीहरि अनन्त हैं ( उनका कोई पार नहीं पा सकता) और उनकी कथा भी अनन्त है; सब संतलोग उसे बहुत प्रकारसे कहते - सुनते हैं । श्रीरामचन्द्रजीके सुन्दर चरित्र करोड़ कल्पोंमें भी गाये नहीं जा सकते ॥३ ॥
यह प्रसंग मैं कहा भवानी । हरिमायाँ मोहहिं मुनि ग्यानी ॥
प्रभु कौतुकी प्रनत हितकारी । सेवत सुलभ सकल दुखहारी ॥
[शिवजी कहते हैं कि ] हे पार्वती! मैंने यह बतलानेके लिये इस प्रसंगको कहा कि ज्ञानी मुनि भी भगवान्की मायासे मोहित हो जाते हैं । प्रभु कौतुकी ( लीलामय ) हैं और शरणागतका हित करनेवाले हैं । वे सेवा करनेमें बहुत सुलभ और सब दुःखोंके हरनेवाले हैं ॥ ४ ॥
सो० - सुर नर मुनि कोउ नाहिं जेहि न मोह माया प्रबल ।
अस बिचारि मन माहिं भजिअ महामाया पतिहि ॥ १४० ॥
देवता, मनुष्य और मुनियोंमें ऐसा कोई नहीं है जिसे भगवान्की महान् बलवती माया मोहित न कर दे । मनमें ऐसा विचारकर उस महामायाके स्वामी ( प्रेरक ) श्रीभगवान्का भजन करना चाहिये ॥ १४० ॥
अपर हेतु सुनु सैलकुमारी । कहउँ बिचित्र कथा बिस्तारी ॥
जेहि कारन अज अगुन अरूपा । ब्रह्म भयउ कोसलपुर भूपा ॥
हे गिरिराजकुमारी! अब भगवान्के अवतारका वह दूसरा कारण सुनो - मैं उसकी विचित्र कथा विस्तार करके कहता हूँ-जिस कारणसे जन्मरहित, निर्गुण और रूपरहित ( अव्यक्त सच्चिदानन्दघन ) ब्रह्म अयोध्यापुरीके राजा हुए ॥१ ॥
जो प्रभु बिपिन फिरत तुम्ह देखा । बंधु समेत धरेंधरें मुनिबेषा ॥
जासु चरित अवलोकि भवानी । सती सरीर रहिहु बौरानी ॥
जिन प्रभु श्रीरामचन्द्रजीको तुमने भाई लक्ष्मणजीके साथ मुनियोंका-सा वेष धारण किये वनमें फिरते देखा था और हे भवानी! जिनके चरित्र देखकर सतीके शरीरमें तुम ऐसी बावली हो गयी थीं कि— ॥२ ॥
अजहुँ न छाया मिटति तुम्हारी । तासु चरित सुनु भ्रम रुज हारी ॥
लीला कीन्हि जो तेहिं अवतारा । सो सब कहिहउँ मति अनुसारा ॥
अब भी तुम्हारे उस बावलेपनकी छाया नहीं मिटती, उन्हींके भ्रमरूपी रोगके हरण करनेवाले चरित्र सुनो । उस अवतारमें भगवान्ने जो-जो लीला की, वह सब मैं अपनी बुद्धिके अनुसार तुम्हें कहूँगा ॥३ ॥
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१५० * रामचरितमानस *
भरद्वाज सुनि संकर बानी । सकुचि सप्रेम उमा मुसुकानी ॥
बृषकेतू। सो अवतार भयउ जेहि हेतू॥लगे बहुरि बरनै [ याज्ञवल्क्यजीने कहा— ] हे भरद्वाज! शङ्करजीके वचन सुनकर पार्वतीजी सकुचाकर प्रेमसहित मुसकरायीं । फिर वृषकेतु शिवजी जिस कारणसे भगवान्का वह अवतार हुआ था, उसका वर्णन करने लगे ॥४ ॥
दो० – सो मैं तुम्ह सन कहउँ सबु सुनु मुनीस मन लाइ ।
राम कथा कलि मल हरनि मंगल करनि सुहाइ ॥ १४१ ॥
हे मुनीश्वर भरद्वाज! मैं वह सब तुमसे कहता हूँ, मन लगाकर सुनो । श्रीरामचन्द्रजीकी कथा कलियुगके पापोंको हरनेवाली, कल्याण करनेवाली और बड़ी सुन्दर है ॥ १४१ ॥
स्वायंभू मनु अरु सतरूपा । जिन्ह तें भै नरसृष्टि अनूपा ॥
दंपति धरम आचरन नीका । अजहुँ गाव श्रुति जिन्ह कै लीका ॥
स्वायम्भुव मनु और [ उनकी पत्नी ] शतरूपा, जिनसे मनुष्योंकी यह अनुपम सृष्टि हुई, इन दोनों पति - पत्नीके धर्म और आचरण बहुत अच्छे थे । आज भी वेद जिनकी मर्यादाका गान करते हैं ॥ १ ॥
नृप उत्तानपाद सुत तासू । ध्रुव हरिभगत भयउ सुत जासू ॥
लघु सुत नाम प्रियबत ताही । बेद पुरान प्रसंसहिं जाही ॥
राजा उत्तानपाद उनके पुत्र थे, जिनके पुत्र [ प्रसिद्ध ] हरिभक्त ध्रुवजी हुए । उन ( मनुजी ) के छोटे लड़केका नाम प्रियव्रत था, जिसकी प्रशंसा वेद और पुराण करते हैं ॥२ ॥
देवहूति पुनि तासु कुमारी । जो मुनि कर्दम कै प्रिय नारी ॥
आदिदेव प्रभु दीनदयाला । जठर धरेउ जेहिं कपिल कृपाला ॥
पुनः देवहूति उनकी कन्या थी, जो कर्दम मुनिकी प्यारी पत्नी हुई और जिन्होंने आदिदेव, दीनोंपर दया करनेवाले समर्थ एवं कृपालु भगवान् कपिलको गर्भमें धारण किया ॥३ ॥
सांख्य सास्त्र जिन्ह प्रगट बखाना । तत्त्व बिचार निपुन भगवाना ॥
तेहिं मनु राज कीन्ह बहु काला । प्रभु आयसु सब बिधि प्रतिपाला ॥
तत्त्वोंका विचार करनेमें अत्यन्त निपुण जिन ( कपिल ) भगवान्ने सांख्यशास्त्रका प्रकटरूपमें वर्णन किया, उन ( स्वायम्भुव) मनुजीने बहुत समयतक राज्य किया और सब प्रकारसे भगवान्की आज्ञा [रूप शास्त्रोंकी मर्यादा] का पालन किया ॥४ ॥
सो० - होइ न बिषय बिराग भवन बसत भा चौथपन ।
हृदयँ बहुत दुख लाग जनम गयउ हरिभगति बिनु ॥ १४२ ॥
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* बालकाण्ड * १५१ घरमें रहते बुढ़ापा आ गया, परन्तु विषयोंसे वैराग्य नहीं होता; [ इस बातको सोचकर] उनके मनमें बड़ा दुःख हुआ कि श्रीहरिकी भक्ति बिना जन्म यों ही चला गया ॥१४२ ॥
बरबस राज सुतहि तब दीन्हा । नारि समेत गवन बन कीन्हा ॥
तीरथ बर नैमिष बिख्याता । अति पुनीत साधक सिधि दाता ॥
तब मनुजीने अपने पुत्रको जबर्दस्ती राज्य देकर स्वयं स्त्रीसहित वनको गमन किया । अत्यन्त पवित्र और साधकोंको सिद्धि देनेवाला तीर्थोंमें श्रेष्ठ नैमिषारण्य प्रसिद्ध है ॥१ ॥
बसहिं तहाँ मुनि सिद्ध समाजा । तहँ हियँ हरषि चलेउ मनु राजा ॥
पंथ जात सोहहिं मतिधीरा । ग्यान भगति जनु धरें सरीरा ॥
वहाँ मुनियों और सिद्धोंके समूह बसते हैं । राजा मनु हृदयमें हर्षित होकर वहीं चले । वे धीर बुद्धिवाले राजा- रानी मार्गमें जाते हुए ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानो ज्ञान और भक्ति ही शरीर धारण किये जा रहे हों ॥ २ ॥
पहुँचे जाइ धेनुमति तीरा ॥ हरषि नहाने निरमल नीरा ॥
आए मिलन सिद्ध मुनि ग्यानी । धरम धुरंधर नृपरिषि जानी ॥
[ चलते - चलते ] वे गोमतीके किनारे जा पहुँचे । हर्षित होकर उन्होंने निर्मल जलमें स्नान किया । उनको धर्मधुरन्धर राजर्षि जानकर सिद्ध और ज्ञानी मुनि उनसे मिलने आये ॥३ ॥
जहँ जहँ तीरथ रहे सुहाए । मुनिन्ह सकल सादर करवाए ॥
कृस सरीर मुनिपट परिधाना । सत समाज नित सुनहिं पुराना ॥
जहाँ - जहाँ सुन्दर तीर्थ थे, मुनियोंने आदरपूर्वक सभी तीर्थ उनको करा दिये । उनका शरीर दुर्बल हो गया था, वे मुनियोंके से ( वल्कल) वस्त्र धारण करते थे और संतोंके समाजमें नित्य पुराण सुनते थे ॥४ ॥
दो० -द्वादस अच्छर मंत्र पुनि जपहिं सहित अनुराग ।
बासुदेव पद पंकरुह दंपति मन अति लाग ॥ १४३ ॥
और द्वादशाक्षर मन्त्र ( ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ) का प्रेमसहित जप करते थे । भगवान् वासुदेवके चरणकमलोंमें उन राजा-रानीका मन बहुत ही लग गया ॥ १४३ ॥
करहिं अहार साक फल कंदा । सुमिरहिं ब्रह्म सच्चिदानंदा ॥
पुनि हरि हेतु करन तप लागे । बारि अधार मूल फल त्यागे ॥
वे साग, फल और कन्दका आहार करते थे और सच्चिदानन्द ब्रह्मका स्मरण करते थे । फिर वे श्रीहरिके लिये तप करने लगे और मूल- फलको त्यागकर केवल जलके आधारपर रहने लगे ॥१ ॥
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* *१५२ रामचरितमानस
उर अभिलाष निरंतर होई । देखिअ नयन परम प्रभु सोई ॥
अगुन अखंड अनंत अनादी । जेहि चिंतहिं परमारथबादी ॥
हृदयमें निरन्तर यही अभिलाषा हुआ करती कि हम [कैसे ] उन परम प्रभुको आँखोंसे देखें, जो निर्गुण, अखण्ड, अनन्त और अनादि हैं और परमार्थवादी ( ब्रह्मज्ञानी, तत्त्ववेत्ता) लोग जिनका चिन्तन किया करते हैं ॥२ ॥
नेति नेति जेहि बेद निरूपा । निजानंद निरुपाधिनिरुपाधि अनूपा ॥
संभु बिरंचि बिष्नु भगवाना । उपजहिं जासु अंस तें नाना ॥
जिन्हें वेद ‘ नेति- नेति' ( यह भी नहीं, यह भी नहीं ) कहकर निरूपण करते हैं । जो आनन्दस्वरूप, उपाधिरहित और अनुपम हैं, एवं जिनके अंशसे अनेकों शिव, ब्रह्मा और विष्णुभगवान् प्रकट होते हैं ॥ ३ ॥
ऐसेउ प्रभु सेवक बस अहई । भगत हेतु लीलातनु गहई ॥
जौं यह बचन सत्य श्रुति भाषा । तौ हमार पूजिहि अभिलाषा ॥
ऐसे [ महान्] प्रभु भी सेवकके वशमें हैं और भक्तोंके लिये [दिव्य ] लीलाविग्रह धारण करते हैं । यदि वेदोंमें यह वचन सत्य कहा है तो हमारी अभिलाषा भी अवश्य पूरी होगी ॥ ४ ॥
दो० -एहि बिधि बीते बरष षट सहस बारि आहार ।
संबत सप्त सहस्त्र पुनि रहे समीर अधार ॥ १४४ ॥
इस प्रकार जलका आहार [ करके तप ] करते छः हजार वर्ष बीत गये । फिर सात हजार वर्ष वे वायुके आधारपर रहे ॥ १४४ ॥
बरष सहस दस त्यागेउ सोऊ । ठाढ़े रहे एक पद दोऊ ॥
बिधि हरि हर तप देखि अपारा । मनु समीप आए बहु बारा ॥
दस हजार वर्षतक उन्होंने वायुका आधार भी छोड़ दिया । दोनों एक पैरसे खड़े रहे । उनका अपार तप देखकर ब्रह्मा, विष्णु और शिवजी कई बार मनुजीके पास आये ॥१ ॥
मागहु बर बहु भाँति लोभाए । परम धीर नहिं चलहिं चलाए ॥
अस्थिमात्र होइ रहे सरीरा । तदपि मनाग मनहिं नहिं पीरा ॥
उन्होंने इन्हें अनेक प्रकारसे ललचाया और कहा कि कुछ वर माँगो । पर ये परम धैर्यवान् [ राजा-ना-रानी अपने तपसे किसीके ] डिगाये नहीं डिगे । यद्यपि उनका शरीर हड्डियोंका ढाँचामात्र रह गया था, फिर भी उनके मनमें जरा भी पीड़ा नहीं थी ॥ २ ॥
प्रभु सर्बग्य दास निज जानी । गति अनन्य तापस नृप रानी ॥
मागु मागु बरु भै नभ बानी । परम गभीर कृपामृत सानी ॥
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* बालकाण्ड * १५३ सर्वज्ञ प्रभुने अनन्य गति ( आश्रय ) वाले तपस्वी राजा-रानीको ' निज दास ' जाना । तब परम गम्भीर और कृपारूपी अमृतसे सनी हुई यह आकाशवाणी हुई कि ' वर माँगो’॥३ ॥
मृतक जिआवनि गिरा सुहाई । श्रवन रंध्र होइ उर जब आई ॥
हृष्ट पुष्ट तन भए सुहाए । मानहुँ अबहिं भवन ते आए ॥
मुर्देको भी जिला देनेवाली यह सुन्दर वाणी कानोंके छेदोंसे होकर जब हृदयमें आयी, तब राजा- रानीके शरीर ऐसे सुन्दर और हृष्ट- पुष्ट हो गये, मानो अभी घरसे आये हैं ॥४ ॥
दो०- श्रवन सुधा सम बचन सुनि पुलक प्रफुल्लित गात ।
बोले मनु करि दंडवत प्रेम न हृदयँ समात ॥ १४५ ॥
कानोंमें अमृतके समान लगनेवाले वचन सुनते ही उनका शरीर पुलकित और प्रफुल्लित हो गया । तब मनुजी दण्डवत् करके बोले, प्रेम हृदयमें समाता न था— ॥ १४५ ॥
सुनु सेवक सुरतरु सुरधेनू । बिधि हरि हर बंदित पद रेनू॥
सेवत सुलभ सकल सुखदायक । प्रनतपाल सचराचर नायक ॥
हे प्रभो! सुनिये, आप सेवकोंके लिये कल्पवृक्ष और कामधेनु हैं । आपकी चरण - रजकी ब्रह्मा, विष्णु और शिवजी भी वन्दना करते हैं । आप सेवा करनेमें सुलभ हैं तथा सब सुखोंके देनेवाले हैं । आप शरणागतके रक्षक और जड-चेतनके स्वामी हैं ॥ १ ॥
जौं अनाथ हित हम पर नेहू । तौ प्रसन्न होइ यह बर देहू ॥
जो सरूप बस सिव मन माहीं । जेहिं कारन मुनि जतन कराहीं ॥
हे अनाथोंका कल्याण करनेवाले! यदि हमलोगोंपर आपका स्नेह है, तो प्रसन्न होकर यह वर दीजिये कि आपका जो स्वरूप शिवजीके मनमें बसता है और जिस [की प्राप्ति ] के लिये मुनिलोग यत्न करते हैं ॥२ ॥
जो भुसुंडि मन मानस हंसा । सगुन अगुन जेहि निगम प्रसंसा ॥
देखहिं हम सो रूप भरि लोचन । कृपा करहु प्रनतारति मोचन ॥
जो काकभुशुण्डिके मनरूपी मानसरोवरमें विहार करनेवाला हंस है, सगुण और निर्गुण कहकर वेद जिसकी प्रशंसा करते हैं, हे शरणागतके दु:ख मिटानेवाले प्रभो! ऐसी कृपा कीजिये कि हम उसी रूपको नेत्र भरकर देखें ॥३ ॥
दंपति बचन परम प्रिय लागे । मृदुल बिनीत प्रेम रस पागे ॥
भगत बछल प्रभु कृपानिधाना । बिस्वबास प्रगटे भगवाना ॥
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* *१५४ रामचरितमानस राजा- रानीके कोमल, विनययुक्त और प्रेमरसमें पगे हुए वचन भगवान्को बहुत ही प्रिय लगे । भक्तवत्सल, कृपानिधान, सम्पूर्ण विश्वके निवासस्थान ( या समस्त विश्वमें व्यापक ), सर्वसमर्थ भगवान् प्रकट हो गये ॥४ ॥
दो० – नील सरोरुह नील मनि नील नीरधर स्याम ।
लाजहिं तन सोभा निरखि कोटि कोटि सत काम ॥ १४६ ॥
भगवान्के नीले कमल, नीलमणि और नीले ( जलयुक्त ) मेघके समान [ कोमल, प्रकाशमय और सरस ] श्यामवर्ण [चिन्मय ] शरीरकी शोभा देखकर करोड़ों कामदेव भी लजा जाते हैं ॥ १४६ ॥
सरद मयंक बदन छबि सींवा । चारु कपोल चिबुक दर ग्रीवा ॥
अधर अरुन रद सुंदर नासा । बिधु कर निकर बिनिंदक हासा ॥
उनका मुख शरद् [ पूर्णिमा ] के चन्द्रमाके समान छविकी सीमास्वरूप था । गाल और ठोड़ी बहुत सुन्दर थे, गला शङ्खके समान ( त्रिरेखायुक्त, चढ़ाव उतारवाला ) था । लाल ओठ, दाँत और नाक अत्यन्त सुन्दर थे । हँसी चन्द्रमाकी किरणावलीको नीचा दिखानेवाली थी ॥१ ॥
नव अंबुज अंबक छबि नीकी । चितवनि ललित भावती जी की ॥
भृकुटि मनोज चाप छबि हारी । तिलक ललाट पटल दुतिकारी ॥
नेत्रोंकी छबि नये [ खिले हुए ] कमलके समान बड़ी सुन्दर थी । मनोहर चितवन जीको बहुत प्यारी लगती थी । टेढ़ी भौंहें कामदेवके धनुषकी शोभाको हरनेवाली थीं । ललाटपटलपर प्रकाशमय तिलक था ॥ २ ॥
कुंडल मकर मुकुट सिर भ्राजा । कुटिल केस जनु मधुप समाजा ॥
उर श्रीबल्स रुचिर बनमाला । पदिक हार भूषन मनिजाला ॥
कानोंमें मकराकृत ( मछलीके आकारके ) कुण्डल और सिरपर मुकुट सुशोभित था । टेढ़े ( घुँघराले ) काले बाल ऐसे सघन थे, मानो भौंरोंके झुंड हों । हृदयपर श्रीवत्स, सुन्दर वनमाला, रत्नजटित हार और मणियोंके आभूषण सुशोभित थे ॥ ३ ॥
केहरि कंधर चारु जनेऊ । बाहु बिभूषन सुंदर तेऊ ॥
करि कर सरिस सुभग भुजदंडा । कटि निषंग कर सर कोदंडा ॥
सिंहकी - सी गर्दन थी, सुन्दर जनेऊ था । भुजाओंमें जो गहने थे, वे भी सुन्दर थे । हाथीकी सूँड़के समान ( उतार- चढ़ाववाले) सुन्दर भुजदण्ड थे I। कमरमें तरकस और हाथमें बाण और धनुष [ शोभा पा रहे ] थे ॥४ ॥
दो० –तड़ित बिनिंदक पीत पट उदर रेख बर तीनि ।
नाभि मनोहर लेति जनु जमुन भवँर छबि छीनि ॥ १४७ ॥
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* बालकाण्ड * १५५ [ स्वर्ण- वर्णका प्रकाशमय ] पीताम्बर बिजलीको लजानेवाला था । पेटपर सुन्दर तीन रेखाएँ ( त्रिवली ) थीं । नाभि ऐसी मनोहर थी, मानो यमुनाजीके भँवरोंकी छबिको छीने लेती हो ॥ १४७ ॥
पद राजीव बरनि नहिं जाहीं । मुनि मन मधुप बसहिं जेन्ह माहीं ॥
बाम भाग सोभति अनुकूला । आदिसक्ति छबिनिधि जगमूला ॥
जिनमें मुनियोंके मनरूपी भौरे बसते हैं, भगवान्के उन चरणकमलोंका तो वर्णन ही नहीं किया जा सकता । भगवान्के बायें भागमें सदा अनुकूल रहनेवाली, शोभाकी राशि, जगत्की मूलकारणरूपा आदिशक्ति श्रीजानकीजी सुशोभित हैं ॥ १ ॥
जासु अंस उपजहिं गुनखानी । अगनित लच्छि उमा ब्रह्मानी ॥
भृकुटि बिलास जासु जग होई । राम बाम दिसि सीता सोई ॥
जिनके अंशसे गुणोंकी खान अगणित लक्ष्मी, पार्वती और ब्रह्माणी ( त्रिदेवोंकी शक्तियाँ ) उत्पन्न होती हैं तथा जिनकी भौंहके इशारेसे ही जगत्की रचना हो जाती है, वही [ भगवान्की स्वरूपा– शक्ति] श्रीसीताजी श्रीरामचन्द्रजीकी बायीं ओर स्थित हैं ॥२ ॥
छबिसमुद्र हरि रूप बिलोकी । एकटक रहे नयन पट रोकी ॥
चितवहिं सादर रूप अनूपा । तृप्ति न मानहिं मनु सतरूपा ॥
शोभाके समुद्र श्रीहरिके रूपको देखकर मनु-शतरूपा नेत्रोंके पट ( पलकें ) रोके हुए एकटक ( स्तब्ध ) रह गये । उस अनुपम रूपको वे आदरसहित देख रहे थे और देखते -देखते अघाते ही न थे ॥३ ॥
हरष बिबस तन दसा भुलानी । परे दंड इव गहि पद पानी ॥
सिर परसे प्रभु निज कर कंजा । तुरत उठाए करुनापुंजा ॥
आनन्दके अधिक वशमें हो जानेके कारण उन्हें अपने देहकी सुधि भूल गयी । वे हाथोंसे भगवान्के चरण पकड़कर दण्डकी तरह ( सीधे ) भूमिपर गिर पड़े । कृपाकी राशि प्रभुने अपने करकमलोंसे उनके मस्तकोंका स्पर्श किया और उन्हें तुरंत ही उठा लिया ॥४ ॥
दो० – बोले कृपानिधान पुनि अति प्रसन्न मोहि जानि ।
मागहु बर जोइ भाव मन महादानि अनुमानि ॥ १४८ ॥
फिर कृपानिधान भगवान् बोले- मुझे अत्यन्त प्रसन्न जानकर और बड़ा भारी दानी मानकर, जो मनको भाये वही वर माँग लो ॥ १४८ ॥
सुनि प्रभु बचन जोरि जुग पानी । धरि धीरजु बोली मृदु बानी ॥
नाथ देखि पद कमल तुम्हारे । अब पूरे सब काम हमारे ॥
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* * १५६ रामचरितमानस प्रभुके वचन सुनकर, दोनों हाथ जोड़कर और धीरज धरकर राजाने कोमल वाणी कही- हे नाथ! आपके चरणकमलोंको देखकर अब हमारी सारी मन: कामनाएँ पूरी हो गयीं ॥१ ॥
एक लालसा बड़ि उर माहीं । सुगम अगम कहि जाति सो नाहीं ॥
तुम्हहि देत अति सुगम गोसाईं । अगम लाग मोहि निज कृपनाईं ॥
फिर भी मनमें एक बड़ी लालसा है । उसका पूरा होना सहज भी है और अत्यन्त कठिन भी, इसीसे उसे कहते नहीं बनता । हे स्वामी! आपके लिये तो उसका पूरा करना बहुत सहज है, पर मुझे अपनी कृपणता ( दीनता ) के कारण वह अत्यन्त कठिन मालूम होता है ॥२ ॥
जथा दरिद्र बिबुधतरु पाई । बहु संपति मागत सकुचाई ॥
तासु प्रभाउ जान नहिं सोई । तथा हृदयँ मम संसय होई ॥
जैसे कोई दरिद्र कल्पवृक्षको पाकर भी अधिक द्रव्य माँगनेमें संकोच करता है, क्योंकि वह उसके प्रभावको नहीं जानता, वैसे ही मेरे हृदयमें संशय हो रहा है ॥३ ॥
सो तुम्ह जानहु अंतरजामी । पुरवहु मोर मनोरथ स्वामी ॥
सकुच बिहाइ मागु नृप मोही I। मोरें नहिं अदेय कछु तोही ॥
हे स्वामी! आप अन्तर्यामी हैं, इसलिये उसे जानते ही हैं । मेरा वह मनोरथ पूरा कीजिये । [ भगवान्ने कहा— ] हे राजन्! संकोच छोड़कर मुझसे माँगो । तुम्हें न दे सकूँ ऐसा मेरे पास कुछ भी नहीं है ॥४ ॥
दो० -दानि सिरोमनि कृपानिधि नाथ कहउँ सतिभाउ ।
चाहउँ तुम्हहि समान सुत प्रभु सन कवन दुराउ ॥ १४ ९ ॥
[ राजाने कहा— ] हे दानियोंके शिरोमणि! हे कृपानिधान! हे नाथ! मैं अपने मनका सच्चा
भाव कहता हूँ कि मैं आपके समान पुत्र चाहता हूँ । प्रभुसे भला क्या छिपाना! ॥१४९ ॥
देखि प्रीति सुनि बचन अमोले । एवमस्तु करुनानिधि बोले ॥
आपु सरिस खोजौं कहँ जाई । नृप तव तनय होब मैं आई ॥
राजाकी प्रीति देखकर और उनके अमूल्य वचन सुनकर करुणानिधान भगवान् बोले — ऐसा ही हो । हे राजन्! मैं अपने समान [ दूसरा ] कहाँ जाकर खोजूँ । अतः स्वयं ही आकर तुम्हारा पुत्र बनूँगा ॥ १ ॥
सतरूपहि बिलोकि कर जोरें । देबि मागु बरु जो रुचि तोरें ॥
जो बरु नाथ चतुर नृप मागा । सोइ कृपाल मोहि अति प्रिय लागा ॥
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* बालकाण्ड * १५७ शतरूपाजीको हाथ जोड़े देखकर भगवान्ने कहा-हे देवि! तुम्हारी जो इच्छा हो, सो वर माँग लो । [ शतरूपाने कहा- ] हे नाथ! चतुर राजाने जो वर माँगा, हे कृपालु! वह मुझे बहुत ही प्रिय लगा ॥२ ॥
प्रभु परंतु सुठि होति ढिठाई । जदपि भगत हित तुम्हहि सोहाई ॥
तुम्ह ब्रह्मादि जनक जग स्वामी । ब्रह्म सकल उर अंतरजामी ॥
परन्तु हे प्रभु! बहुत ढिठाई हो रही है, यद्यपि हे भक्तोंका हित करनेवाले! वह ढिठाई भी आपको अच्छी ही लगती है । आप ब्रह्मा आदिके भी पिता ( उत्पन्न करनेवाले ), जगत्के स्वामी और सबके हृदयके भीतरकी जाननेवाले ब्रह्म हैं ॥३ ॥
अस समुझत मन संसय होई । कहा जो प्रभु प्रवान पुनि सोई ॥
जे निज भगत नाथ तव अहहीं । जो सुख पावहिं जो गति लहहीं ॥
ऐसा समझनेपर मनमें सन्देह होता है, फिर भी प्रभुने जो कहा वही प्रमाण ( सत्य ) है । [ मैं तो यह माँगती हूँ कि] हे नाथ! आपके जो निज जन हैं वे जो ( अलौकिक, अखण्ड ) सुख पाते हैं और जिस परम गतिको प्राप्त होते हैं ॥४ ॥
दो० – सोइ सुख सोइ गति सोइ भगति सोइ निज चरन सनेहु ।
सोइ बिबेक सोइ रहनि प्रभु हमहि कृपा करि देहु ॥ १५० ॥
हे प्रभो! वही सुख, वही गति, वही भक्ति, वही अपने चरणोंमें प्रेम, वही ज्ञान और वही रहन -सहन कृपा करके हमें दीजिये ॥ १५० ॥
सुनि मृदु गूढ़ रुचिर बर रचना । कृपासिंधु बोले मृदु बचना ॥
जो कछु रुचि तुम्हरे मन माहीं । मैं सो दीन्ह सब संसय नाहीं ॥
[ रानीकी ] कोमल, गूढ़ और मनोहर श्रेष्ठ वाक्यरचना सुनकर कृपाके समुद्र भगवान् कोमल वचन बोले — तुम्हारे मनमें जो कुछ इच्छा है, वह सब मैंने तुमको दिया, इसमें कोई सन्देह न समझना ॥१ ॥
मातु बिबेक अलौकिक तोरें । कबहुँ न मिटिहि अनुग्रह मोरें ॥
बंदि चरन मनु कहेउ बहोरी । अवर एक बिनती प्रभु मोरी ॥
हे माता! मेरी कृपासे तुम्हारा अलौकिक ज्ञान कभी नष्ट न होगा । तब मनुने भगवान्के चरणोंकी वन्दना करके फिर कहा-हे प्रभु! मेरी एक विनती और है- ॥ २ ॥
सुत बिषइक तव पद रति होऊ । मोहि बड़ मूढ़ कहै किन कोऊ ॥
मनि बिनु फनि जिमि जल बिनु मीना । मम जीवन तिमि तुम्हहि अधीना ॥
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* *१५८ रामचरितमानस आपके चरणोंमें मेरी वैसी ही प्रीति हो जैसी पुत्रके लिये पिताकी होती है, चाहे मुझे कोई बड़ा भारी मूर्ख ही क्यों न कहे । जैसे मणिके बिना साँप और जलके बिना मछली [ नहीं रह सकती ], वैसे ही मेरा जीवन आपके अधीन रहे ( आपके बिना न रह सके ) ॥ ३ ॥
अस बरु मागि चरन गहि रहेऊ । एवमस्तु करुनानिधि कहेऊ ॥
अब तुम्ह मम अनुसासन मानी । बसहु जाइ सुरपति रजधानी ॥
ऐसा वर माँगकर राजा भगवान्के चरण पकड़े रह गये । तब दया निधान भगवान्ने कहा- ऐसा ही हो । अब तुम मेरी आज्ञा मानकर देवराज इन्द्रकी राजधानी ( अमरावती ) में जाकर वास करो ॥४ ॥
सो० – तहँ करि भोग बिसाल तात गएँ कछु काल पुनि ।
होइहहु अवध भुआल तब मैं होब तुम्हार सुत ॥ १५१ ॥
हे तात! वहाँ [ स्वर्गके ] बहुत- से भोग भोगकर, कुछ काल बीत जानेपर, तुम अवधके राजा इच्छामयहोगे । तब मैं तुम्हारानरबेषपुत्र होऊँगा ॥ सँवारें१५१ ॥ । होइहउँ प्रगट निकेत तुम्हारें ॥
अंसन्ह सहित देह धरि ताता । करिहउँ चरित भगत सुखदाता ॥
इच्छानिर्मित मनुष्यरूप सजकर मैं तुम्हारे घर प्रकट होऊँगा । हे तात! मैं अपने अंशोंसहित देह धारण करके भक्तोंको सुख देनेवाले चरित्र करूँगा ॥ १ ॥
जे सुनि सादर नर बड़भागी । भव तरिहहिं ममता मद त्यागी ॥
आदिसक्ति जेहिं जग उपजाया । सोउ अवतरिहि मोरि यह माया ॥
जिन ( चरित्रों ) को बड़े भाग्यशाली मनुष्य आदरसहित सुनकर, ममता और मद त्यागकर, भवसागरसे तर जायँगे । आदिशक्ति यह मेरी [ स्वरूपभूता ] माया भी, जिसने जगत्को उत्पन्न किया है, अवतार लेगी ॥ २ ॥
पुनिपुरउबपुनिमैंअसअभिलाषकहि कृपानिधानातुम्हारा ॥ सत्यअंतरधानसत्य पनभए सत्यभगवानाहमारा ॥॥ इस प्रकार मैं तुम्हारी अभिलाषा पूरी करूँगा । मेरा प्रण सत्य है, सत्य है, सत्य है । कृपानिधान भगवान् बार- बार ऐसा कहकर अन्तर्धान हो गये ॥३ ॥
दंपति उर धरि भगत कृपाला । तेहिं आश्रम निवसे कछु काला ॥
समय पाइ तनु तजि अनयासा । जाइ कीन्ह अमरावति बासा ॥
वे स्त्री- पुरुष ( राजा- रानी) भक्तोंपर कृपा करनेवाले भगवान्को हृदयमें धारण करके कुछ कालतक उस आश्रममें रहे । फिर उन्होंने समय पाकर, सहज ही ( बिना किसी कष्टके ) शरीर छोड़कर, अमरावती ( इन्द्रकी पुरी ) में जाकर वास किया ॥ ४ ॥