श्रीरामचरितमानस — पृष्ठ 161–170

श्रीरामचरितमानस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 161–170

पृष्ठ 161

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* बालकाण्ड * १५ ९

दो० – यह इतिहास पुनीत अति उमहि कही बृषकेतु ।

भरद्वाज सुनु अपर पुनि राम जनम कर हेतु ॥ १५२ ॥

[ याज्ञवल्क्यजी कहते हैं— ] हे भरद्वाज! इस अत्यन्त पवित्र इतिहासको शिवजीने पार्वतीसे कहा था । अब श्रीरामके अवतार लेनेका दूसरा कारण सुनो ॥ १५२ ॥

मासपारायण, पाँचवाँ विश्राम

सुनु मुनि कथा पुनीत पुरानी । जो गिरिजा प्रति संभु बखानी ॥

बिस्व बिदित एक कैकय देसू । सत्यकेतु तहँ बसइ नरेसू॥

हे मुनि! वह पवित्र और प्राचीन कथा सुनो, जो शिवजीने पार्वतीसे कही थी । संसारमें प्रसिद्ध एक कैकय देश है । वहाँ सत्यकेतु नामका राजा रहता ( राज्य करता ) था ॥१ ॥

धरम धुरंधर नीति निधाना । तेज प्रताप सील बलवाना ॥

तेहि के भए जुगल सुत बीरा । सब गुन धाम महा रनधीरा ॥

वह धर्मकी धुरीको धारण करनेवाला, नीतिकी खान, तेजस्वी, प्रतापी, सुशील और बलवान् था, उसके दो वीर पुत्र हुए, जो सब गुणोंके भण्डार और बड़े ही रणधीर थे ॥२ ॥

राज धनी जो जेठ सुत आही । नाम प्रतापभानु अस ताही ॥

अपर सुतहि अरिमर्दन नामा । भुजबल अतुल अचल संग्रामा ॥

राज्यका उत्तराधिकारी जो बड़ा लड़का था, उसका नाम प्रतापभानु था । दूसरे पुत्रका नाम अरिमर्दन था, जिसकी भुजाओंमें अपार बल था और जो युद्धमें [ पर्वतके समान ] अटल रहता था ॥३ ॥

भाइहि भाइहि परम समीती । सकल दोष छल बरजित प्रीती ॥

जेठे सुतहि राज नृप दीन्हा । हरि हित आपु गवन बन कीन्हा ॥

भाई- भाईमें बड़ा मेल और सब प्रकारके दोषों और छलोंसे रहित [सच्ची ] प्रीति थी । राजाने जेठे पुत्रको राज्य दे दिया और आप भगवान् [ के भजन] के लिये वनको चल दिया ॥४ ॥

दो० – जब प्रतापरबि भयउ नृप फिरी दोहाई देस ।

प्रजा पाल अति बेदबिधि कतहुँ नहीं अघ लेस ॥ १५३ ॥

जब प्रतापभानु राजा हुआ, देशमें उसकी दुहाई फिर गयी । वह वेदमें बतायी हुई विधिके अनुसार उत्तम रीतिसे प्रजाका पालन करने लगा । उसके राज्यमें पापका कहीं लेश भी नहीं रह गया ॥ १५३ ॥

पृष्ठ 162

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* *१६० रामचरितमानस

नृप हितकारक सचिव सयाना । नाम धरमरुचि सुक्र समाना ॥

सचिव सयान बंधु बलबीरा । आपु प्रतापपुंज रनधीरा ॥

राजाका हित करनेवाला और शुक्राचार्यके समान बुद्धिमान् धर्मरुचि नामक उसका मन्त्री था । इस प्रकार बुद्धिमान् मन्त्री और बलवान् तथा वीर भाईके साथ ही स्वयं राजा भी बड़ा प्रतापी और रणधीर था ॥१ ॥

सेन संग चतुरंग अपारा । अमित सुभट सब समर जुझारा ॥

सेन बिलोकि राउ हरषाना । अरु बाजे गहगहे निसाना ॥

साथमें अपार चतुरङ्गिणी सेना थी, जिसमें असंख्य योद्धा थे, जो सब - के - सब रणमें जूझ मरनेवाले थे । अपनी सेनाको देखकर राजा बहुत प्रसन्न हुआ और घमाघम नगाड़े बजने लगे ॥२ ॥

बिजय हेतु कटकई बनाई । सुदिन साधि नृप चलेउ बजाई ॥

जहँ तहँ परीं अनेक लराईं । जीते सकल भूप बरिआईं ॥

दिग्विजयके लिये सेना सजाकर वह राजा शुभ दिन ( मुहूर्त ) साधकर और डंका बजाकर चला ।

जहाँ- तहाँ बहुत - सी लड़ाइयाँ हुईं । उसने सब राजाओंको बलपूर्वक जीत लिया ॥३ ॥

सप्त दीप भुजबल बस कीन्हे । लै लै दंड छाड़ि नृप दीन्हे ॥

सकल अवनि मंडल तेहि काला । एक प्रतापभानु महिपाला ॥

अपनी भुजाओंके बलसे उसने सातों द्वीपों ( भूमिखण्डों ) को वशमें कर लिया और राजाओंसे दण्ड ( कर ) ले - लेकर उन्हें छोड़ दिया । सम्पूर्ण पृथ्वीमण्डलका उस समय प्रतापभानु ही एकमात्र ( चक्रवर्ती ) राजा था ॥४ ॥

दो ० -– स्वबस बिस्व करि बाहुबल निज पुर कीन्ह प्रबेसु ।

अरथ धरम कामादि सुख सेवइ समयँ नरेसु ॥ १५४ ॥

संसारभरको अपनी भुजाओंके बलसे वशमें करके राजाने अपने नगरमें प्रवेश किया । राजा अर्थ, धर्म और काम आदिके सुखोंका समयानुसार सेवन करता था ॥ १५४ ॥

भूप प्रतापभानु बल पाई । कामधेनु भैभै भूमिभूमि सुहाई ॥

सब दुख बरजित प्रजा सुखारी । धरमसील सुंदर नर नारी ॥

राजा प्रतापभानुका बल पाकर भूमि सुन्दर कामधेनु ( मनचाही वस्तु देनेवाली ) हो गयी । [ उनके राज्यमें ] प्रजा सब [ प्रकारके ] दु:खोंसे रहित और सुखी थी, और सभी स्त्री-पुरुष सुन्दर और धर्मात्मा थे ॥१ ॥

पृष्ठ 163

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* बालकाण्ड * १६१

सचिव धरमरुचि हरि पद प्रीती । नृप हित हेतु सिखव नित नीती ॥

गुर सुर संत पितर महिदेवा । करइ सदा नृप सब के सेवा ॥

धर्मरुचि मन्त्रीका श्रीहरिके चरणोंमें प्रेम था । वह राजाके हितके लिये सदा उसको नीति सिखाया करता था । राजा गुरु, देवता, संत, पितर और ब्राह्मण- इन सबकी सदा सेवा करता रहता था ॥ २ ॥

भूप धरम जे बेद बखाने । सकल करइ सादर सुख माने ॥

दिन प्रति देइ बिबिध बिधि दाना । सुनइ सास्त्र बर बेद पुराना ॥

वेदोंमें राजाओंके जो धर्म बताये गये हैं, राजा सदा आदरपूर्वक और सुख मानकर उन सबका पालन करता था । प्रतिदिन अनेक प्रकारके दान देता और उत्तम शास्त्र, वेद और पुराण सुनता था ॥ ३ ॥

नाना बापीं कूपकूप तड़ागातड़ागा ॥ सुमनसुमन बाटिका सुंदर बागा ॥ ।बिप्रभवन सुरभवन सुहाए सब तीरथन्ह बिचित्र बनाए ॥ उसने बहुत - सी बावलियाँ, कुएँ, तालाब, फुलवाड़ियाँ, सुन्दर बगीचे, ब्राह्मणोंके लिये घर और देवताओंके सुन्दर विचित्र मन्दिर सब तीर्थोंमें बनवाये ॥४ ॥

दो० - जहँ लगि कहे पुरान श्रुति एक एक सब जाग ।

बार सहस्र सहस्र नृप किए सहित अनुराग ॥ १५५ ॥

वेद और पुराणोंमें जितने प्रकारके यज्ञ कहे गये हैं, राजाने एक-एक करके उन सब यज्ञोंको प्रेमसहित हजार - हजार बार किया ॥ १५५ ॥

हृदयँ न कछु फल अनुसंधाना । भूप बिबेकी परम सुजाना ॥

करइ जे धरम करम मन बानी । बासुदेव अर्पित नृप ग्यानी ॥

[ राजाके ] हृदयमें किसी फलकी टोह ( कामना ) न थी । राजा बड़ा ही बुद्धिमान् और ज्ञानी था । वह ज्ञानी राजा कर्म, मन और वाणीसे जो कुछ भी धर्म करता था, सब भगवान् वासुदेवके अर्पित करके करता था ॥१ ॥

चढ़ि बर बाजि बार एक राजा । मृगया कर सब साजि समाजा ॥

बिंध्याचल गभीर बन गयऊ । मृग पुनीत बहु मारत भयऊ ॥

एक बार वह राजा एक अच्छे घोड़ेपर सवार होकर, शिकारका सब सामान सजाकर विन्ध्याचलके घने जंगलमें गया और वहाँ उसने बहुत से उत्तम-उत्तम हिरन मारे ॥ २ ॥

फिरत बिपिन नृप दीख बराहू । जनु बन दुरेउ ससिहि ग्रसि राहू ॥

बड़ बिधु नहिं समात मुख माहीं । मनहुँ क्रोध बस उगिलत नाहीं ॥

पृष्ठ 164

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* *१६२ रामचरितमानस राजाने वनमें फिरते हुए एक सूअरको देखा । [ दाँतोंके कारण वह ऐसा दीख पड़ता था ] मानो चन्द्रमाको ग्रसकर ( मुँहमें पकड़कर ) राहु वनमें आ छिपा हो । चन्द्रमा बड़ा होनेसे उसके मुँहमें समाता नहीं है और मानो क्रोधवश वह भी उसे उगलता नहीं है ॥३ ॥

कोल कराल दसन छबि गाई । तनु बिसाल पीवर अधिकाई ॥

घुरुघुरात हय आरौ पाएँ । चकित बिलोकत कान उठाएँ ॥

यह तो सूअरके भयानक दाँतोंकी शोभा कही गयी । [ इधर] उसका शरीर भी बहुत विशाल और मोटा था । घोड़ेकी आहट पाकर वह घुरघुराता हुआ कान उठाये चौकन्ना होकर देख रहा था ॥ ४ ॥

दो० - नील महीधर सिखर सम देखि बिसाल बराहु ।

चपरि चलेउ हय सुटुकि नृप हाँकि न होइ निबाहु ॥ १५६ ॥

नील पर्वतके शिखरके समान विशाल [ शरीरवाले ] उस सूअरको देखकर राजा घोड़ेको चाबुक लगाकर तेजीसे चला और उसने सूअरको ललकारा कि अब तेरा बचाव नहीं हो सकता ॥१५६ ॥

आवत देखि अधिक रव बाजी । चलेउ बराह मरुत गति भाजी ॥

तुरत कीन्ह नृप सर संधाना । महि मिलि गयउ बिलोकत बाना ॥

अधिक शब्द करते हुए घोड़ेको [ अपनी तरफ ] आता देखकर सूअर पवनवेगसे भाग चला ।

राजाने तुरंत ही बाणको धनुषपर चढ़ाया । सूअर बाणको देखते ही धरतीमें दुबक गया ॥१ ॥

तकि तकि तीर महीस चलावा । करि छल सुअर सरीर बचावा ॥

प्रगटत दुरत जाइ मृग भागा । रिस बस भूप चलेउ सँग लागा ॥

राजा तक- तककर तीर चलाता है, परन्तु सूअर छल करके शरीरको बचाता जाता है । वह पशु कभी प्रकट होता और कभी छिपता हुआ भागा जाता था; और राजा भी क्रोधके वश उसके साथ ( पीछे ) लगा चला जाता था ॥२ ॥

गयउ दूरि घन गहन बराहू । जहँ नाहिन गज बाजि निबाहू ॥

अति अकेल बन बिपुल कलेसू । तदपि न मृग मग तजइ नरेसू॥

सूअर बहुत दूर ऐसे घने जंगलमें चला गया, जहाँ हाथी - घोड़ेका निबाह ( गम ) नहीं था । राजा बिलकुल अकेला था और वनमें क्लेश भी बहुत था, फिर भी राजाने उस पशुका पीछा नहीं छोड़ा ॥३ ॥

कोल बिलोकि भूप बड़ धीरा । भागि पैठ गिरिगुहाँ गभीरा ॥

अगम देखि नृप अति पछिताई । फिरेउ महाबन परेउ भुलाई ॥

पृष्ठ 165

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* बालकाण्ड * १६३ राजाको बड़ा धैर्यवान् देखकर, सूअर भागकर पहाड़की एक गहरी गुफामें जा घुसा । उसमें जाना कठिन देखकर राजाको बहुत पछताकर लौटना पड़ा; पर उस घोर वनमें वह रास्ता भूल गया ॥ ४ ॥

दो० – खेद खिन्न छुद्धित तृषित राजा बाजि समेत ॥

खोजत ब्याकुल सरित सर जल बिनु भयउ अचेत ॥ १५७ ॥

बहुत परिश्रम करनेसे थका हुआ और घोड़ेसमेत भूख- प्याससे व्याकुल राजा नदी - तालाब खोजता- खोजता पानी बिना बेहाल हो गया ॥१५७ ॥

फिरत बिपिन आश्रम एक देखा । तहँ बस नृपति कपट मुनिबेषा ॥

जासु देस नृप लीन्ह छड़ाई । समर सेन तजि गयउ पराई ॥

वनमें फिरते- फिरते उसने एक आश्रम देखा; वहाँ कपटसे मुनिका वेष बनाये एक राजा रहता था, जिसका देश राजा प्रतापभानुने छीन लिया था और जो सेनाको छोड़कर युद्धसे भाग गया था ॥१ ॥

समय प्रतापभानु कर जानी । आपन अति असमय अनुमानी ॥

गयउ न गृह मन बहुत गलानी । मिला न राजहि नृप अभिमानी ॥

प्रतापभानुका समय ( अच्छे दिन ) जानकर और अपना कुसमय ( बुरे दिन ) अनुमानकर उसके मनमें बड़ी ग्लानि हुई । इससे वह न तो घर गया और न अभिमानी होनेके कारण राजा प्रतापभानुसे ही मिला ( मेल किया ) ॥२ ॥

रिस उर मारि रंक जिमि राजा । बिपिन बसइ तापस कें साजा ॥

तासु समीप गवन नृप कीन्हा । यह प्रतापरबि तेहिं तब चीन्हा ॥

दरिद्रकी भाँति मनहीमें क्रोधको मारकर वह राजा तपस्वीके वेषमें वनमें रहता था । राजा

( प्रतापभानु ) उसीके पास गया । उसने तुरंत पहचान लिया कि यह प्रतापभानु है ॥ ३ ॥

राउ तृषित नहिं सो पहिचाना । देखि सुबेष महामुनि जाना ॥

उतरि तुरग तें कीन्ह प्रनामा । परम चतुर न कहेउ निज नामा ॥

राजा प्यासा होनेके कारण [ व्याकुलतामें ] उसे पहचान न सका । सुन्दर वेष देखकर राजाने उसे महामुनि समझा और घोड़ेसे उतरकर उसे प्रणाम किया । परन्तु बड़ा चतुर होनेके कारण राजाने उसे अपना नाम नहीं बतलाया ॥४ ॥

दो० - भूपति तृषित बिलोकि तेहिं सरबरु दीन्ह देखाइ ।

मज्जन पान समेत हय कीन्ह नृपति हरषाइ ॥ १५८ ॥

राजाको प्यासा देखकर उसने सरोवर दिखला दिया । हर्षित होकर राजाने घोड़ेसहित उसमें स्नान और जलपान किया ॥ १५८ ॥

पृष्ठ 166

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* *१६४ रामचरितमानस

गैश्रम सकल सुखी नृप भयऊ । निज आश्रम तापस लै गयऊ ॥

आसन दीन्ह अस्त रबि जानी । पुनि तापस बोलेउ मृदु बानी ॥

सारी थकावट मिट गयी, राजा सुखी हो गया । तब तपस्वी उसे अपने आश्रममें ले गया और सूर्यास्तका समय जानकर उसने [ राजाको बैठनेके लिये ] आसन दिया । फिर वह तपस्वी कोमल वाणीसे बोला- ॥१ ॥

को तुम्ह कस बन फिरहु अकेलें । सुंदर जुबा जीव परहेलें ॥

चक्रबर्ति के लच्छन तोरें । देखत दया लागि अति मोरें ॥

तुम कौन हो? सुन्दर युवक होकर, जीवनकी परवा न करके, वनमें अकेले क्यों फिर रहे हो? तुम्हारे चक्रवर्ती राजाके से लक्षण देखकर मुझे बड़ी दया आती है ॥२ ॥

नाम प्रतापभानु अवनीसा । तासु सचिव मैं सुनहु मुनीसा ॥

फिरत अहेरें परेउँ भुलाई । बड़ें भाग देखेउँ पद आई ॥

[राजाने कहा- ] हे मुनीश्वर! सुनिये, प्रतापभानु नामका एक राजा है, मैं उसका मन्त्री हूँ । शिकारके लिये फिरते हुए राह भूल गया हूँ । बड़े भाग्यसे यहाँ आकर मैंने आपके चरणोंके दर्शन पाये हैं ॥३ ॥

हम कहँ दुर्लभ दरस तुम्हारा । जानत हौं कछु भल होनिहारा ॥

कह मुनि तात भयउ अँधिआरा । जोजन सत्तरि नगरु तुम्हारा ॥

हमें आपका दर्शन दुर्लभ था, इससे जान पड़ता है कुछ भला होनेवाला है । मुनिने कहा- हे

तात! अँधेरा हो गया । तुम्हारा नगर यहाँसे सत्तर योजनपर है ॥४ ॥

दो० – निसा घोर गंभीर बन पंथ न सुनहु सुजान ।

बसहु आजु अस जानि तुम्ह जाएहु होत बिहान ॥ १५ ९ ( क ) ॥

हे सुजान! सुनो, घोर अँधेरी रात है, घना जंगल है, रास्ता नहीं है, ऐसा समझकर तुम आज यहीं ठहर जाओ, सबेरा होते ही चले जाना ॥ १५ ९ ( क) ॥

तुलसी जसि भवतब्यता तैसी मिलइ सहाइ ।

आपुनु आवइ ताहि पहिं ताहि तहाँ लै जाइ ॥ १५ ९ ( ख ) ॥

तुलसीदासजी कहते हैं- जैसी भवितव्यता ( होनहार ) होती है, वैसी ही सहायता मिल जाती है । या तो वह आप ही उसके पास आती है, या उसको वहाँ ले जाती है ॥ १५ ९ (ख ) ॥

भलेहिं नाथ आयसु धरि सीसा । बाँधि तुरग तरु बैठ महीसा ॥

नृप बहु भाँति प्रसंसेउ ताही । चरन बंदि निज भाग्य सराही ॥

पृष्ठ 167

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* बालकाण्ड * १६५ हे नाथ! बहुत अच्छा, ऐसा कहकर और उसकी आज्ञा सिर चढ़ाकर, घोड़ेको वृक्षसे बाँधकर राजा बैठ गया । राजाने उसकी बहुत प्रकारसे प्रशंसा की और उसके चरणोंकी वन्दना करके अपने भाग्यकी सराहना की ॥१ ॥

पुनि बोलेउ मृदु गिरा सुहाई । जानि पिता प्रभु करउँ ढिठाई ॥

मोहि मुनीस सुत सेवक जानी । नाथ नाम निज कहहु बखानी ॥

फिर सुन्दर कोमल वाणीसे कहा- हे प्रभो! आपको पिता जानकर मैं ढिठाई करता हूँ । हे मुनीश्वर! मुझे अपना पुत्र और सेवक जानकर अपना नाम [ धाम ] विस्तारसे बतलाइये ॥२ ॥

तेहि न जान नृप नृपहि सो जाना । भूप सुहृद सो कपट सयाना ॥

बैरी पुनि छत्री पुनि राजा । छल बल कीन्ह चहइ निज काजा ॥

राजाने उसको नहीं पहचाना, पर वह राजाको पहचान गया था । राजा तो शुद्धहृदय था और वह कपट करनेमें चतुर था । एक तो वैरी, फिर जातिका क्षत्रिय, फिर राजा । वह छल- बलसे अपना काम बनाना चाहता था ॥ ३ ॥

समुझि राजसुख दुखित अराती । अवाँ अनल इव सुलगइ छाती ॥

सरल बचन नृप के सुनि काना । बयर सँभारि हृदयँ हरषाना ॥

वह शत्रु अपने राज्य- सुखको समझ करके ( स्मरण करके ) दुखी था । उसकी छाती [ कुम्हारके ] आँवेकी आगकी तरह [ भीतर - ही - भीतर ] सुलग रही थी । राजाके सरल वचन कानसे सुनकर, अपने वैरको यादकर वह हृदयमें हर्षित हुआ ॥४ ॥

दो० – कपट बोरि बानी मृदुल बोलेउ जुगुति समेत ।

नाम हमार भिखारि अब निर्धन रहित निकेत ॥ १६० ॥

वह कपटमें डुबोकर बड़ी युक्तिके साथ कोमल वाणी बोला- अब हमारा नाम भिखारी है, क्योंकि हम निर्धन और अनिकेत ( घर- द्वारहीन) हैं ॥ १६० ॥

कह नृप जे बिग्यान निधाना । तुम्ह सारिखे गलित अभिमाना ॥

सदा रहहिं अपनपौ दुराएँ । सब बिधि कुसल कुबेष बनाएँ ॥

राजाने कहा— जो आपके सदृश विज्ञानके निधान और सर्वथा अभिमानरहित होते हैं, वे अपने स्वरूपको सदा छिपाये रहते हैं । क्योंकि कुवेष बनाकर रहनेमें ही सब तरहका कल्याण है ( प्रकट संतवेषमें मान होनेकी सम्भावना है और मानसे पतनकी) ॥१ ॥

तेहि तें कहहिं संत श्रुति टेरें । परम अकिंचन प्रिय हरि केरें ॥

तुम्ह सम अधन भिखारि अगेहा । होत बिरंचि सिवहि संदेहा ॥

पृष्ठ 168

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* *१६६ रामचरितमानस इसीसे तो संत और वेद पुकारकर कहते हैं कि परम अकिञ्चन ( सर्वथा अहंकार, ममता और मानरहित ) ही भगवान्‌को प्रिय होते हैं । आप- सरीखे निर्धन, भिखारी और गृहहीनोंको देखकर ब्रह्मा और शिवजीको भी सन्देह हो जाता है [कि वे वास्तविक संत हैं या भिखारी ] ॥ २ ॥

जोसि सोसि तव चरन नमामी । मो पर कृपा करिअ अब स्वामी ॥

सहज प्रीति भूपति कै देखी । आपु बिषय बिस्वास बिसेषी ॥

आप जो हों सो हों ( अर्थात् जो कोई भी हों ), मैं आपके चरणोंमें नमस्कार करता हूँ । हे स्वामी! अब मुझपर कृपा कीजिये । अपने ऊपर राजाकी स्वाभाविक प्रीति और अपने विषयमें उसका अधिक विश्वास देखकर– ॥३ ॥

सब प्रकार राजहि अपनाई । बोलेउ अधिक सनेह जनाई ॥

सुनु सतिभाउ कहउँ महिपाला । इहाँ बसत बीते बहु काला ॥

सब प्रकारसे राजाको अपने वशमें करके, अधिक स्नेह दिखाता हुआ वह ( कपट-तपस्वी ) बोला— हे राजन्! सुनो, मैं तुमसे सत्य कहता हूँ, मुझे यहाँ रहते बहुत समय बीत गया ॥ ४ ॥

दो० – अब लगि मोहिन मिलेउ कोउ मैं न जनावउँ काहु ।

लोकमान्यता अनल सम कर तप कानन दाह ॥ १६१ ( क) ॥

अबतक न तो कोई मुझसे मिला और न मैं अपनेको किसीपर प्रकट करता हूँ; क्योंकि लोकमें प्रतिष्ठा अग्निके समान है जो तपरूपी वनको भस्म कर डालती है ॥ १६१ ( क ) ॥

सो० – तुलसी देखि सुबेषु भूलहिं मूढ़ न चतुर नर ।

सुंदर केकिहि पेखु बचन सुधा सम असन अहि ॥ १६१ ( ख ) ॥

तुलसीदासजी कहते हैं - सुन्दर वेष देखकर मूढ़ नहीं, [ मूढ़ तो मूढ़ ही हैं, ] चतुर मनुष्य भी धोखा खा जाते हैं । सुन्दर मोरको देखो, उसका वचन तो अमृतके समान है और आहार साँपका है ॥ १६१ ( ख ) ॥

तातें गुपुत रहउँ जग माहीं । हरि तजि किमपि प्रयोजन नाहीं ॥

प्रभु जात सब बिनहिं जनाएँ । कहहु कवनि सिधि लोक रिझाएँ ॥

[ कपट- तपस्वीने कहा— ] इसीसे मैं जगत्‌में छिपकर रहता हूँ। श्रीहरिको छोड़कर किसीसे कुछ भी प्रयोजन नहीं रखता । प्रभु तो बिना जनाये ही सब जानते हैं । फिर कहो संसारको रिझानेसे क्या सिद्धि मिलेगी ॥ १ ॥

तुम्ह सुचि सुमति परम प्रिय मोरें । प्रीति प्रतीति मोहि पर तोरें ॥

अब जौं तात दुरावउँ तोही । दारुन दोष घटइ अति मोही ॥

पृष्ठ 169

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* बालकाण्ड * १६७ तुम पवित्र और सुन्दर बुद्धिवाले हो, इससे मुझे बहुत ही प्यारे हो और तुम्हारी भी मुझपर प्रीति और विश्वास है । हे तात! अब यदि मैं तुमसे कुछ छिपाता हूँ तो मुझे बहुत ही भयानक दोष लगेगा ॥२ ॥

जिमि जिमि तापसु कथइ उदासा । तिमि तिमि नृपहि उपज बिस्वासा ॥

देखा स्वबस कर्म मन बानी । तब बोला तापस बगध्यानी ॥

ज्यों- ज्यों वह तपस्वी उदासीनताकी बातें कहता था, त्यों- ही - त्यों राजाको विश्वास उत्पन्न होता जाता था । जब उस बगुलेकी तरह ध्यान लगानेवाले ( कपटी ) मुनिने राजाको कर्म, मन और वचनसे अपने वशमें जाना, तब वह बोला- ॥ ३ ॥

नाम हमार एकतनु भाई । सुनि नृप बोलेउ पुनि सिरु नाई ॥

कहहु नाम कर अरथ बखानी । मोहि सेवक अति आपन जानी ॥

हे भाई! हमारा नाम एकतनु है । यह सुनकर राजाने फिर सिर नवाकर कहा- मुझे अपना अत्यन्त [ अनुरागी ] सेवक जानकर अपने नामका अर्थ समझाकर कहिये ॥४ ॥

दो० – आदिसृष्टि उपजी जबहिं तब उतपति भै मोरि ।

नाम एकतनु हेतु तेहि देह न धरी बहोरि ॥ १६२ ॥

[ कपटी मुनिने कहा— ] जब सबसे पहले सृष्टि उत्पन्न हुई थी, तभी मेरी उत्पत्ति हुई थी । तबसे मैंने फिर दूसरी देह नहीं धारण की, इसीसे मेरा नाम एकतनु है ॥ १६२ ॥

जनि आचरजु करहु मन माहीं । सुत तप तें दुर्लभ कछु नाहीं ॥

तपबल तें जग सृजइ बिधाता । तपबल बिष्नु भए परित्राता ॥

हे पुत्र! मनमें आश्चर्य मत करो, तपसे कुछ भी दुर्लभ नहीं है, तपके बलसे ब्रह्मा जगत्को रचते हैं । तपहीके बलसे विष्णु संसारका पालन करनेवाले बने हैं ॥ १ ॥

तपबल संभु करहिं संघारा । तप तें अगम न कछु संसारा ॥

भयउ नृपहि सुनि अति अनुरागा । कथा पुरातन कहै सो लागा ॥

तपहीके बलसे रुद्र संहार करते हैं । संसारमें कोई ऐसी वस्तु नहीं जो तपसे न मिल सके ।

यह सुनकर राजाको बड़ा अनुराग हुआ । तब वह ( तपस्वी) पुरानी कथाएँ कहने लगा ॥२ ॥

करम धरम इतिहास अनेका । करइ निरूपन बिरति बिबेका ॥

उदभव पालन प्रलय कहानी । कहेसि अमित आचरज बखानी ॥

कर्म, धर्म और अनेकों प्रकारके इतिहास कहकर वह वैराग्य और ज्ञानका निरूपण करने लगा । सृष्टिकी उत्पत्ति, पालन ( स्थिति) और संहार ( प्रलय ) की अपार आश्चर्यभरी कथाएँ उसने विस्तारसे कहीं ॥ ३ ॥

पृष्ठ 170

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* *१६८ रामचरितमानस

सुनि महीप तापस बस भयऊ । आपन नाम कहन तब लयऊ ॥

कह तापस नृप जानउँ तोही । कीन्हेहु कपट लाग भल मोही ॥

राजा सुनकर उस तपस्वीके वशमें हो गया और तब वह उसे अपना नाम बताने लगा । तपस्वीने

कहा— राजन्! मैं तुमको जानता हूँ । तुमने कपट किया, वह मुझे अच्छा लगा ॥४ ॥

सो० – सुनु महीस असि नीति जहँ तहँ नाम न कहहिं नृप ।

मोहि तोहि पर अति प्रीति सोइ चतुरता बिचारि तव ॥ १६३ ॥

हे राजन्! सुनो, ऐसी नीति है कि राजालोग जहाँ-तहाँ अपना नाम नहीं कहते । तुम्हारी वही चतुराई समझकर तुमपर मेरा बड़ा प्रेम हो गया है ॥१६३ ॥

नाम तुम्हार प्रताप दिनेसा । सत्यकेतु तव पिता नरेसा ॥

गुर प्रसाद सब जानिअ राजा । कहिअ न आपन जानि अकाजा ॥

तुम्हारा नाम प्रतापभानु है, महाराज सत्यकेतु तुम्हारे पिता थे । हे राजन्! गुरुकी कृपासे मैं सब जानता हूँ, पर अपनी हानि समझकर कहता नहीं ॥१ ॥

देखि तात तव सहज सुधाई ॥ प्रीति प्रतीति नीति निपुनाई ॥

उपजि परी ममता मन मोरें । कहउँ कथा निज पूछे तोरें ॥

हे तात! तुम्हारा स्वाभाविक सीधापन ( सरलता), प्रेम, विश्वास और नीतिमें निपुणता देखकर मेरे मनमें तुम्हारे ऊपर बड़ी ममता उत्पन्न हो गयी है; इसीलिये मैं तुम्हारे पूछनेपर अपनी कथा कहता हूँ॥२ ॥

अब प्रसन्न मैं संसय नाहीं । मागु जो भूप भाव मन माहीं ॥

सुनि सुबचन भूपति हरषाना । गहि पद बिनय कीन्हि बिधि नाना ॥

अब मैं प्रसन्न हूँ, इसमें सन्देह न करना । हे राजन्! जो मनको भावे वही माँग लो । सुन्दर ( प्रिय ) वचन सुनकर राजा हर्षित हो गया और [ मुनिके ] पैर पकड़कर उसने बहुत प्रकारसे विनती की ॥३ ॥

कृपासिंधु मुनि दरसन तोरें । चारि पदारथ करतल मोरें ॥

प्रभुहि तथापि प्रसन्न बिलोकी । मागि अगम बर होउँ असोकी ॥

हे दयासागर मुनि! आपके दर्शनसे ही चारों पदार्थ ( अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष ) मेरी मुट्ठीमें आ गये । तो भी स्वामीको प्रसन्न देखकर मैं यह दुर्लभ वर माँगकर [ क्यों न ] शोकरहित हो जाऊँ॥४ ॥

दो० – जरा मरन दुख रहित तनु समर जितै जनि कोउ ।

एकछत्र रिपुहीन महि राज कलप सत होउ ॥ १६४ ॥