श्रीरामचरितमानस — पृष्ठ 171–180
श्रीरामचरितमानस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 171–180
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* बालकाण्ड * १६ ९ मेरा शरीर वृद्धावस्था, मृत्यु और दुःखसे रहित हो जाय; मुझे युद्धमें कोई जीत न सके और पृथ्वीपर मेरा सौ कल्पतक एकच्छत्र अकण्टक राज्य हो ॥१६४ ॥
कह तापस नृप ऐसेइ होऊ । कारन एक कठिन सुनु सोऊ ॥
कालउ तुअ पद नाइहि सीसा । एक बिप्रकुल छाड़ि महीसा ॥
तपस्वीने कहा — हे राजन्! ऐसा ही हो, पर एक बात कठिन है, उसे भी सुन लो । हे पृथ्वीके स्वामी! केवल ब्राह्मणकुलको छोड़ काल भी तुम्हारे चरणोंपर सिर नवायेगा ॥१ ॥
तपबल बिप्र सदा बरिआरा । तिन्ह के कोप न कोउ रखवारा ॥
जौं बिप्रन्ह बस करहु नरेसा । तौ तुअ बस बिधि बिष्नु महेसा ॥
तपके बलसे ब्राह्मण सदा बलवान् रहते हैं । उनके क्रोधसे रक्षा करनेवाला कोई नहीं है । हे नरपति! यदि तुम ब्राह्मणोंको वशमें कर लो, तो ब्रह्मा, विष्णु और महेश भी तुम्हारे अधीन हो जायँगे ॥ २ ॥
चल न ब्रह्मकुल सन बरिआई । सत्य कहउँ दोउ भुजा उठाई ॥
बिप्र श्राप बिनु सुनु महिपाला । तोर नास नहिं कवनेहुँ काला ॥
ब्राह्मणकुलसे जोर - जबर्दस्ती नहीं चल सकती, मैं दोनों भुजा उठाकर सत्य कहता हूँ । हे राजन्! सुनो, ब्राह्मणोंके शाप बिना तुम्हारा नाश किसी कालमें नहीं होगा ॥३ ॥
हरषेउ राउ बचन सुनि तासू । नाथ न होइ मोर अब नासू॥
तव प्रसाद प्रभु कृपानिधाना । मो कहुँ सर्ब काल कल्याना ॥
राजा उसके वचन सुनकर बड़ा प्रसन्न हुआ और कहने लगा-हे स्वामी! मेरा नाश अब नहीं होगा । हे कृपानिधान प्रभु! आपकी कृपासे मेरा सब समय कल्याण होगा ॥४ ॥
दो० – एवमस्तु कहि कपटमुनि बोला कुटिल बहोरि ।
मिलब हमार भुलाब निज कहहु त हमहि न खोरि॥ १६५ ॥
' एवमस्तु ' ( ऐसा ही हो) कहकर वह कुटिल कपटी मुनि फिर बोला– [ किन्तु ] तुम मेरे मिलने तथा अपने राह भूल जानेकी बात किसीसे [ कहना नहीं, यदि ] कह दोगे, तो हमारा दोष नहीं ॥ १६५ ॥
तातें मैं तोहि बरजउँ राजा । कहें कथा तव परम अकाजा ॥
छठें श्रवन यह परत कहानी । नास तुम्हार सत्य मम बानी ॥
हे राजन्! मैं तुमको इसलिये मना करता हूँ कि इस प्रसङ्गको कहनेसे तुम्हारी बड़ी हानि होगी । छठे कानमें यह बात पड़ते ही तुम्हारा नाश हो जायगा, मेरा यह वचन सत्य जानना ॥ १ ॥
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* *१७० रामचरितमानस
यह प्रगटें अथवा द्विजश्रापा । नास तोर सुनु भानुप्रतापा ॥
आन उपायँ निधन तव नाहीं । जौं हरि हर कोपहिं मन माहीं ॥
हे प्रतापभानु! सुनो, इस बातके प्रकट करनेसे अथवा ब्राह्मणोंके शापसे तुम्हारा नाश होगा और किसी उपायसे, चाहे ब्रह्मा और शंकर भी मनमें क्रोध करें, तुम्हारी मृत्यु नहीं होगी ॥२ ॥
सत्य नाथ पद गहि नृप भाषा । द्विज गुर कोप कहहु को राखा ॥
राखड़ गुर जौं कोप बिधाता । गुर बिरोध नहिं कोउ जग त्राता ॥
राजाने मुनिके चरण पकड़कर कहा–हे स्वामी! सत्य ही है । ब्राह्मण और गुरुके क्रोधसे, कहिये, कौन रक्षा कर सकता है? यदि ब्रह्मा भी क्रोध करें, तो गुरु बचा लेते हैं; पर गुरुसे विरोध करनेपर जगत्में कोई भी बचानेवाला नहीं है ॥३ ॥
जौं न चलब हम कहे तुम्हारें । होउ नास नहिं सोच हमारें ॥
एकहिं डर डरपत मन मोरा । प्रभु महिदेव श्राप अति घोरा ॥
यदि मैं आपके कथनके अनुसार नहीं चलूँगा, तो [ भले ही ] मेरा नाश हो जाय । मुझे इसकी चिन्ता नहीं है । मेरा मन तो हे प्रभो! [ केवल ] एक ही डरसे डर रहा है कि ब्राह्मणोंका शाप बड़ा भयानक होता है ॥४ ॥
दो० - होहिं बिप्र बस कवन बिधि कहहु कृपा करि सोउ ।
तुम्ह तजि दीनदयाल निज हितू न देखउँ कोउ ॥ १६६ ॥
वे ब्राह्मण किस प्रकारसे वशमें हो सकते हैं, कृपा करके वह भी बताइये । हे दीनदयालु! आपको छोड़कर और किसीको मैं अपना हितू नहीं देखता ॥१६६ ॥
सुनु नृप बिबिध जतन जग माहीं । कष्टसाध्य पुनि होहिं कि नाहीं ॥
अहइ एक अति सुगम उपाई । तहाँ परंतु एक कठिनाई ॥
[ तपस्वीने कहा— ] हे राजन्! सुनो, संसारमें उपाय तो बहुत हैं; पर वे कष्टसाध्य हैं ( बड़ी कठिनतासे बननेमें आते हैं ) और इसपर भी सिद्ध हों या न हों ( उनकी सफलता निश्चित नहीं है ) हाँ, एक उपाय बहुत सहज है; परन्तु उसमें भी एक कठिनता है ॥१ ॥
मम आधीन जुगुति नृप सोई । मोर जाब तव नगर न होई ॥
आजु लगें अरु जब तें भयऊँ। काहू के गृह ग्राम न गयऊँ ॥
हे राजन्! वह युक्ति तो मेरे हाथ है, पर मेरा जाना तुम्हारे नगरमें हो नहीं सकता । जबसे पैदा हुआ हूँ, तबसे आजतक मैं किसीके घर अथवा गाँव नहीं गया ॥ २ ॥
जौं न जाउँ तव होइ अकाजू । बना आइ असमंजस आजू ॥
सुनि महीस बोलेउ मृदु बानी । नाथ निगम असि नीति बखानी ॥
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* बालकाण्ड * १७१ परंतु यदि नहीं जाता हूँ, तो तुम्हारा काम बिगड़ता है । आज यह बड़ा असमंजस आ पड़ा है । यह सुनकर राजा कोमल वाणीसे बोला, हे नाथ! वेदोंमें ऐसी नीति कही है कि- ॥ ३ ॥
बड़े सनेह लघुन्ह पर करहीं । गिरि निज सिरनि सदा तृन धरहीं ॥
जलधि अगाध मौलि बह फेनू । संतत धरनि धरत सिर रेनू॥
बड़े लोग छोटोंपर स्नेह करते ही हैं । पर्वत अपने सिरोंपर सदा तृण ( घास ) को धारण किये रहते हैं । अगाध समुद्र अपने मस्तकपर फेनको धारण करता है, और धरती अपने सिरपर सदा धूलिको धारण किये रहती है ॥४ ॥
दो० –- अस कहि गहे नरेस पद स्वामी होहु कृपाल ।
मोहि लागि दुख सहिअ प्रभु सज्जन दीनदयाल ॥ १६७ ॥
ऐसा कहकर राजाने मुनिके चरण पकड़ लिये । [ और कहा - ] हे स्वामी! कृपा कीजिये । आप संत हैं । दीनदयालु हैं । [ अतः ] हे प्रभो! मेरे लिये इतना कष्ट [ अवश्य ] सहिये ॥१६७ ॥
जानि नृपहि आपन आधीना । बोला तापस कपट प्रबीना ॥
सत्य कहउँ भूपति सुनु तोही । जग नाहिन दुर्लभ कछु मोही ॥
राजाको अपने अधीन जानकर कपटमें प्रवीण तपस्वी बोला-हे राजन्! सुनो, मैं तुमसे सत्य कहता हूँ, जगत्में मुझे कुछ भी दुर्लभ नहीं है ॥१ ॥
अवसि काज मैं करिहउँ तोरा । मन तन बचन भगत तैं मोरा ॥
जोग जुगुति तप मंत्र प्रभाऊ । फलइ तबहिं जब करिअ दुराऊ ॥
मैं तुम्हारा काम अवश्य करूँगा; [ क्योंकि ] तुम मन, वाणी और शरीर [ तीनों ] से मेरे भक्त हो । पर योग, युक्ति, तप और मन्त्रका प्रभाव तभी फलीभूत होता है जब वे छिपाकर किये जाते हैं ॥२ ॥
जौं नरेस मैं करौं रसोई । तुम्ह परुसहु मोहि जान न कोई ॥
अन्न सो जोड़ जोइ भोजन करई । सोइ सोइ तव आयसु अनुसरई ॥
हे नरपति! मैं यदि रसोई बनाऊँ और तुम उसे परोसो और मुझे कोई जानने न पावे, तो उस अन्नको जो -जो खायगा, सो -सो तुम्हारा आज्ञाकारी बन जायगा ॥३ ॥
पुनि तिन्ह के गृह जेवँइ जोऊ । तव बस होइ भूप सुनु सोऊ ॥
जाइ उपाय रचहु नृप एहू । संबत भरि संकलप करेहू ॥
यही नहीं, उन ( भोजन करनेवालों ) के घर भी जो कोई भोजन करेगा, हे राजन्! सुनो, वह भी तुम्हारे अधीन हो जायगा । हे राजन्! जाकर यही उपाय करो और वर्षभर [ भोजन कराने ] का सङ्कल्प कर लेना ॥४ ॥
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* *१७२ रामचरितमानस
दो० - नित नूतन द्विज सहस सत बरेहु सहित परिवार ।
मैं तुम्हरे संकलप लगि दिनहिं करबि जेवनार ॥ १६८ ॥
नित्य नये एक लाख ब्राह्मणोंको कुटुम्बसहित निमन्त्रित करना । मैं तुम्हारे सङ्कल्प [ के काल अर्थात् एक वर्ष ] तक प्रतिदिन भोजन बना दिया करूँगा ॥ १६८ ॥
एहि बिधि भूप कष्ट अति थोरें । होइहहिं सकल बिप्र बस तोरें ॥
करिहहिं बिप्र होम मख सेवा । तेहिं प्रसंग सहजेहिं बस देवा ॥
हे राजन्! इस प्रकार बहुत ही थोड़े परिश्रमसे सब ब्राह्मण तुम्हारे वशमें हो जायँगे । ब्राह्मण हवन, यज्ञ और सेवा- पूजा करेंगे, तो उस प्रसंग ( सम्बन्ध ) से देवता भी सहज ही वशमें हो जायँगे ॥ १ ॥
और एक तोहि कहउँ लखाऊ । मैं एहि बेष न आउब काऊ ॥
तुम्हरे उपरोहित कहुँ राया । हरि आनब मैं करि निज माया ॥
मैं एक और पहचान तुमको बताये देता हूँ कि मैं इस रूपमें कभी न आऊँगा । हे राजन्! मैं अपनी मायासे तुम्हारे पुरोहितको हर लाऊँगा ॥२ ॥
तपबल तेहि करि आप समाना । रखिहउँ इहाँ बरष परवाना ॥
मैं धरि तासु बेषु सुनु राजा । सब बिधि तोर सँवारब काजा ॥
तपके बलसे उसे अपने समान बनाकर एक वर्षतक यहाँ रखूँगा और हे राजन्! सुनो, मैं उसका रूप बनाकर सब प्रकारसे तुम्हारा काम सिद्ध करूँगा ॥३ ॥
गै निसि बहुत सयन अब कीजे । मोहि तोहि भूप भेंट दिन तीजे ॥
मैं तपबल तोहि तुरग समेता । पहुँचैहउँ सोवतहि निकेता ॥
हे राजन्! रात बहुत बीत गयी, अब सो जाओ । आजसे तीसरे दिन मुझसे तुम्हारी भेंट होगी । तपके बलसे मैं घोड़ेसहित तुमको सोतेहीमें घर पहुँचा दूँगा ॥४ ॥
दो० – मैं आउब सोइ बेषु धरि पहिचानेहु तब मोहि ।
जब एकांत बोलाइ सब कथा सुनावौं तोहि ॥ १६ ९ ॥
मैं वही ( पुरोहितका) वेष धरकर आऊँगा । जब एकान्तमें तुमको बुलाकर सब कथा सुनाऊँगा, तब तुम मुझे पहचान लेना ॥१६ ९ ॥
सयन कीन्ह नृप आयसु मानी । आसन जाइ बैठ छलग्यानी ॥
श्रमित भूप निद्रा अति आई । सो किमि सोव सोच अधिकाई ॥
राजाने आज्ञा मानकर शयन किया और वह कपट-ज्ञानी आसनपर जा बैठा । राजा थका था, [ उसे ] खूब ( गहरी ) नींद आ गयी । पर वह कपटी कैसे सोता । उसे तो बहुत चिन्ता हो रही थी ॥ १ ॥
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* बालकाण्ड * १७३
कालकेतु निसिचर तहँ आवा । जेहिं सूकर होइ नृपहि भुलावा ॥
परम मित्र तापस नृप केरा । जानइ सो अति कपट घनेरा ॥
[ उसी समय ] वहाँ कालकेतु राक्षस आया, जिसने सूअर बनकर राजाको भटकाया था । वह तपस्वी राजाका बड़ा मित्र था और खूब छल-प्रपञ्च जानता था ॥२ ॥
तेहि के सत सुत अरु दस भाई । खल अति अजय देव दुखदाई ॥
प्रथमहिं भूप समर सब मारे । बिप्र संत सुर देखि दुखारे ॥
उसके सौ पुत्र और दस भाई थे, जो बड़े ही दुष्ट, किसीसे न जीते जानेवाले और देवताओंको दुःख देनेवाले थे । ब्राह्मणों, संतों और देवताओंको दुखी देखकर राजाने उन सबको पहले ही युद्धमें मार डाला था ॥ ३ ॥
तेहिं खल पाछिल बयरु सँभारा । तापस नृप मिलि मंत्र बिचारा ॥
जेहिं रिपु छय सोइ रचेन्हि उपाऊ । भावी बस न जान कछु राऊ ॥
उस दुष्टने पिछला वैर याद करके तपस्वी राजासे मिलकर सलाह विचारी ( षड्यन्त्र किया ) और जिस प्रकार शत्रुका नाश हो, वही उपाय रचा । भावीवश राजा ( प्रतापभानु ) कुछ भी न समझ सका ॥ ४ ॥
दो० – रिपु तेजसी अकेल अपि लघु करि गनिअ न ताहु ।
अजहुँ देत दुख रबि ससिहि सिर अवसेषित राहु ॥ १७० ॥
तेजस्वी शत्रु अकेला भी हो तो भी उसे छोटा नहीं समझना चाहिये । जिसका सिरमात्र बचा था, वह राहु आजतक सूर्य- चन्द्रमाको दुःख देता है ॥ १७० ॥
तापस नृप निज सखहि निहारी । हरषि मिलेउ उठि भयउ सुखारी ॥
मित्रहि कहि सब कथा सुनाई । जातुधान बोला सुख पाई ॥
तपस्वी राजा अपने मित्रको देख प्रसन्न हो उठकर मिला और सुखी हुआ । उसने मित्रको सब कथा कह सुनायी, तब राक्षस आनन्दित होकर बोला ॥ १ ॥
अब साधेउँ रिपु सुनहु नरेसा । जौं तुम्ह कीन्ह मोर उपदेसा ॥
परिहरि सोच रहहु तुम्ह सोई । बिनु औषध बिधि बिधि खोई ॥
हे राजन्! सुनो, जब तुमने मेरे कहनेके अनुसार [ इतना ] काम कर लिया, तो अब मैंने शत्रुको काबू कर ही लिया [समझो ] | तुम अब चिन्ता त्याग सो रहो । विधाताने बिना ही दवाके रोग दूर कर दिया ॥ २ ॥
कुल समेत रिपु मूल बहाई । चौथें दिवस मिलब मैं आई ॥
तापस नृपहि बहुत परितोषी । चला महाकपटी अतिरोषी ॥
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* * १७४ रामचरितमानस कुलसहित शत्रुको जड़ - मूलसे उखाड़ -बहाकर, [ आजसे ] चौथे दिन मैं तुमसे आ मिलूँगा । [इस प्रकार तपस्वी राजाको खूब दिलासा देकर वह महामायावी और अत्यन्त क्रोधी राक्षस चला ॥३ ॥
भानुप्रतापहि बाजिबाजि समेता । पहुँचाएसि छन माझ निकेता ॥
नृपहि नारि पहिं सयन कराई । हयगृहँ बाँधेसि बाजि बनाई ॥
उसने प्रतापभानु राजाको घोड़ेसहित क्षणभरमें घर पहुँचा दिया । राजाको रानीके पास सुलाकर घोड़ेको अच्छी तरहसे घुड़सालमें बाँध दिया ॥ ४ ॥
दो० –राजा के उपरोहितहि हरि लै गयउ बहोरि ।
लै राखेस गिरि खोह महुँ मायाँ करि मति भोरि ॥ १७१ ॥
फिर वह राजाके पुरोहितको उठा ले गया और मायासे उसकी बुद्धिको भ्रममें डालकर उसे उसने पहाड़की खोहमें ला रखा ॥ १७१ ॥
आपु बिरचि उपरोहित रूपा । परेउ जाइ तेहि सेज अनूपा ॥
जागेउ नृप अनभएँ बिहाना । देखि भवन अति अचरजु माना ॥
वह आप पुरोहितका रूप बनाकर उसकी सुन्दर सेजपर जा लेटा । राजा सबेरा होनेसे पहले ही जागा और अपना घर देखकर उसने बड़ा ही आश्चर्य माना ॥१ ॥
मुनि महिमा मन महुँ अनुमानी । उठेउ गवँहिं जेहिं जान न रानी ॥
कानन गयउ बाजि चढ़ि तेहीं । पुर नर नारि न जानेउ केहीं ॥
मनमें मुनिकी महिमाका अनुमान करके वह धीरेसे उठा, जिसमें रानी न जान पावे । फिर उसी
घोड़ेपर चढ़कर वनको चला गया । नगरके किसी भी स्त्री- पुरुषने नहीं जाना ॥२ ॥
गएँ जाम जुग भूपति आवा । घर घर उत्सव बाज बधावा ॥
उपरोहितहि देख जब राजा । चकित बिलोक सुमिरि सोइ काजा ॥
दो पहर बीत जानेपर राजा आया । घर-घर उत्सव होने लगे और बधावा बजने लगा । जब राजाने पुरोहितको देखा, तब वह [ अपने ] उसी कार्यका स्मरणकर उसे आश्चर्यसे देखने लगा ॥३ ॥
जुगसम नृपहि गए दिन तीनी । कपटी मुनि पद रह मति लीनी ॥
समय जानि उपरोहित आवा । नृपहि मते सब कहि समुझावा ॥
राजाको तीन दिन युगके समान बीते । उसकी बुद्धि कपटी मुनिके चरणोंमें लगी रही । निश्चित समय जानकर पुरोहित [बना हुआ राक्षस] आया और राजाके साथ की हुई गुप्त सलाहके अनुसार [उसने अपने ] सब विचार उसे समझाकर कह दिये ॥ ४ ॥
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* बालकाण्ड * १७५
दो० – नृप हरषेउ पहिचानि गुरु भ्रम बस रहा न चेत ।
बरे तुरत सत सहस बर बिप्र कुटुंब समेत ॥ १७२ ॥
[ संकेतके अनुसार ] गुरुको [उस रूपमें ] पहचानकर राजा प्रसन्न हुआ । भ्रमवश उसे चेत न रहा [ कि यह तापस मुनि है या कालकेतु राक्षस ] । उसने तुरंत एक लाख उत्तम ब्राह्मणोंको कुटुम्बसहित निमन्त्रण दे दिया ॥ १७२ ॥
उपरोहित जेवनार बनाई । छरस चारि बिधि जसि श्रुति गाई ॥
मायामय तेहिं कीन्हि रसोई । बिंजन बहु गनि सकइ न कोई ॥
पुरोहितने छः रस और चार प्रकारके भोजन, जैसा कि वेदोंमें वर्णन है, बनाये । उसने मायामयी रसोई तैयार की और इतने व्यञ्जन बनाये जिन्हें कोई गिन नहीं सकता ॥१ ॥
बिबिध मृगन्ह कर आमिष राँधा । तेहि महुँ बिप्र माँसु खल साँधा ॥
भोजन कहूँ सब बिप्र बोलाए । पद पखारिपखारि सादर बैठाए ॥
अनेक प्रकारके पशुओंका मांस पकाया और उसमें उस दुष्टने ब्राह्मणोंका मांस मिला दिया । सब ब्राह्मणोंको भोजनके लिये बुलाया और चरण धोकर आदरसहित बैठाया ॥२ ॥
परुसन जबहिं लाग महिपाला । भै अकासबानी तेहि काला ॥
बिप्रबृंद उठि उठि गृह जाहू I। है बड़ि हानि अन्न जनि खाहू ॥
ज्यों ही राजा परोसने लगा, उसी काल [ कालकेतुकृत] आकाशवाणी हुई— हे ब्राह्मणो! उठ-उठकर अपने घर जाओ; यह अन्न मत खाओ । इस [के खाने ] में बड़ी हानि है ॥३ ॥
भयउ रसोईं भूसुर माँसू । सब द्विज उठे मानि बिस्वासू ॥
भूप बिकल मति मोहँ भुलानी । भावी बस न आव मुख बानी ॥
रसोईमें ब्राह्मणोंका मांस बना है । [ आकाशवाणीका ] विश्वास मानकर सब ब्राह्मण उठ खड़े हुए । राजा व्याकुल हो गया । [ परन्तु ] उसकी बुद्धि मोहमें भूली हुई थी । होनहारवश उसके मुँहसे [एक ] बात [ भी ] न निकली ॥४ ॥
दो० - बोले बिप्र सकोप तब नहिं कछु कीन्ह बिचार ।
जाइ निसाचर होहु नृप मूढ़ सहित परिवार ॥ १७३ ॥
तब ब्राह्मण क्रोधसहित बोल उठे- उन्होंने कुछ भी विचार नहीं किया - अरे मूर्ख राजा! तू जाकर परिवारसहित राक्षस हो ॥ १७३ ॥
छत्रबंधु तैं बिप्र बोलाई ॥ घालै लिए सहित समुदाई ॥
ईस्वर राखा धरम हमारा । जैहसि तैं समेत परिवारा ॥
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* *१७६ रामचरितमानस रे नीच क्षत्रिय! तूने तो परिवारसहित ब्राह्मणोंको बुलाकर उन्हें नष्ट करना चाहा था, ईश्वरने
हमारे धर्मकी रक्षा की । अब तू परिवारसहित नष्ट होगा ॥१ ॥
संबत मध्य नास तव होऊ । जलदाता न रहिहि कुल कोऊ ॥
नृप सुनि श्राप बिकल अति त्रासा । भै बहोरि बर गिरा अकासा ॥
एक वर्षके भीतर तेरा नाश हो जाय, तेरे कुलमें कोई पानी देनेवालातक न रहेगा । शाप सुनकर
राजा भयके मारे अत्यन्त व्याकुल हो गया । फिर सुन्दर आकाशवाणी हुई— ॥२ ॥
बिप्रहु श्राप बिचारि न दीन्हा । नहिं अपराध भूप कछु कीन्हा ॥
चकित बिप्र सब सुनि नभबानी । भूप गयउ जहँ भोजन खानी ॥
हे ब्राह्मणो! तुमने विचारकर शाप नहीं दिया । राजाने कुछ भी अपराध नहीं किया । आकाशवाणी सुनकर सब ब्राह्मण चकित हो गये । तब राजा वहाँ गया, जहाँ भोजन बना था ॥ ३ ॥
तहँ न असन नहिं बिप्र सुआरा । फिरेउ राउ मन सोच अपारा ॥
सब प्रसंग महिसुरन्ह सुनाई । त्रसित परेउ अवनीं अकुलाई ॥
[ देखा तो ] वहाँ न भोजन था, न रसोइया ब्राह्मण ही था । तब राजा मनमें अपार चिन्ता करता हुआ लौटा । उसने ब्राह्मणोंको सब वृत्तान्त सुनाया और [ बड़ा ही ] भयभीत और व्याकुल होकर वह पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥४ ॥
दो० - भूपति भावी मिटइ नहिं जदपि न दूषन तोर ।
किएँ अन्यथा होइ नहिं बिप्रश्राप अति घोर ॥१७४ ॥
हे राजन्! यद्यपि तुम्हारा दोष नहीं है, तो भी होनहार नहीं मिटता । ब्राह्मणोंका शाप बहुत ही भयानक होता है, यह किसी तरह भी टाले टल नहीं सकता ॥ १७४ ॥
अस कहि सब महिदेव सिधाए । समाचार पुरलोगन्ह पाए ॥
सोचहिं दूषन दैवहि देहीं । बिरचत हंस काग किय जेहीं ॥
ऐसा कहकर सब ब्राह्मण चले गये । नगरवासियोंने [जब ] यह समाचार पाया, तो वे चिन्ता करने और विधाताको दोष देने लगे, जिसने हंस बनाते- बनाते कौआ कर दिया ( ऐसे पुण्यात्मा राजाको देवता बनाना चाहिये था, सो राक्षस बना दिया ) ॥ १ ॥
उपरोहितहि भवन पहुँचाई । असुर तापसहि खबरि जनाई ॥
तेहिं खल जहँ तहँ पत्र पठाए । सजि सजि सेन भूप सब धाए ॥
पुरोहितको उसके घर पहुँचाकर असुर ( कालकेतु ) ने [ कपटी ] तपस्वीको खबर दी । उस दुष्टने जहाँ - तहाँ पत्र भेजे, जिससे सब [ वैरी ] राजा सेना सजा-सजाकर [ चढ़ ] दौड़े ॥२ ॥
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* बालकाण्ड * १७७
घेरेन्हि नगर निसान बजाई । बिबिध भाँति नित होइ लराई ॥
जूझे सकल सुभट कर करनी । बंधु समेत परेउ नृप धरनी ॥
और उन्होंने डंका बजाकर नगरको घेर लिया । नित्यप्रति अनेक प्रकारसे लड़ाई होने लगी । [ प्रतापभानुके ] सब योद्धा [ शूरवीरोंकी ] करनी करके रणमें जूझ मरे । राजा भी भाईसहित खेत रहा ॥ ३ ॥
सत्यकेतु कुल कोउ नहिं बाँचा । बिप्रश्राप किमि होइ असाँचा ॥
रिपु जिति सब नृप नगर बसाई । निज पुर गवने जय जसु पाई ॥
सत्यकेतुके कुलमें कोई नहीं बचा । ब्राह्मणोंका शाप झूठा कैसे हो सकता था । शत्रुको जीतकर, नगरको [फिरसे ] बसाकर सब राजा विजय और यश पाकर अपने - अपने नगरको चले गये ॥४ ॥
दो० - भरद्वाज सुनु जाहि जब होइ बिधाता बाम ।
धूरि मेरुसम जनक जम ताहि ब्यालसम दाम॥ १७५ ॥
[ याज्ञवल्क्यजी कहते हैं - ] हे भरद्वाज! सुनो, विधाता जब जिसके विपरीत होते हैं, तब उसके लिये धूल सुमेरुपर्वतके समान ( भारी और कुचल डालनेवाली ), पिता यमके समान ( कालरूप ) और रस्सी साँपके समान ( काट खानेवाली ) हो जाती है ॥ १७५ ॥
काल पाइ मुनि सुनु सोइ राजा । भयउ निसाचर सहित समाजा ॥
दस सिर ताहि बीस भुजदंडा । रावन नाम बीर बरिबंडा ॥
हे मुनि! सुनो, समय पाकर वही राजा परिवारसहित रावण नामक राक्षस हुआ । उसके दस सिर और बीस भुजाएँ थीं और वह बड़ा ही प्रचण्ड शूरवीर था ॥ १ ॥
भूप अनुज अरिमर्दन नामा । भयउ सो कुंभकरन बलधामा ॥
सचिव जो रहा धरमरुचि जासू । भयउ बिमात्र बंधु लघु तासू॥
अरिमर्दन नामक जो राजाका छोटा भाई था, वह बलका धाम कुम्भकर्ण हुआ । उसका जो मन्त्री था, जिसका नाम धर्मरुचि था, वह रावणका सौतेला छोटा भाई हुआ ॥ २ ॥
नाम बिभीषन जेहि जग जाना । बिष्नुभगत बिग्यान निधाना ॥
रहे जे सुत सेवक नृप केरे । भए निसाचर घोर घनेरे ॥
उसका विभीषण नाम था, जिसे सारा जगत् जानता है । वह विष्णुभक्त और ज्ञान-विज्ञानका भण्डार था और जो राजाके पुत्र और सेवक थे, वे सभी बड़े भयानक राक्षस हुए ॥ ३ ॥
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* *१७८ रामचरितमानस
कामरूप खल जिनस अनेका । कुटिल भयंकर बिगत बिबेका ॥
कृपा रहित हिंसक सब पापी । बरनि न जाहिं बिस्व परितापी ॥
वे सब अनेकों जातिके, मनमाना रूप धारण करनेवाले, दुष्ट, कुटिल, भयंकर, विवेकरहित, निर्दयी, हिंसक, पापी और संसारभरको दुःख देनेवाले हुए; उनका वर्णन नहीं हो सकता ॥४ ॥
दो० –- उपजे जदपि पुलस्त्यकुल पावन अमल अनूप ।
तदपि महीसुर श्राप बस भए सकल अघरूप ॥ १७६ ॥
यद्यपि वे पुलस्त्य ऋषिके पवित्र, निर्मल और अनुपम कुलमें उत्पन्न हुए, तथापि ब्राह्मणोंके शापके कारण वे सब पापरूप हुए ॥ १७६ ॥
कीन्ह बिबिध तप तीनिहुँ भाई । परम उग्र नहिं बरनि सो जाई ॥
गयउ निकट तप देखि बिधाता । मागहु बर प्रसन्न मैं ताता ॥
तीनों भाइयोंने अनेकों प्रकारकी बड़ी ही कठिन तपस्या की, जिसका वर्णन नहीं हो सकता । [ उनका उग्र ] तप देखकर ब्रह्माजी उनके पास गये और बोले- हे तात! मैं प्रसन्न हूँ, वर माँगो ॥ १ ॥
करि बिनती पद गहि दससीसा । बोलेउ बचन सुनहु जगदीसा ॥
हम काहू के मरहिं न मारें । बानर मनुज जाति दुइ बारें ॥
रावणने विनय करके और चरण पकड़कर कहा - हे जगदीश्वर! सुनिये, वानर और मनुष्य-इन दो जातियोंको छोड़कर हम और किसीके मारे न मरें [ यह वर दीजिये ] ॥२ ॥
एवमस्तु तुम्ह बड़ तप कीन्हा । मैं ब्रह्माँ मिलि तेहि बर दीन्हा ॥
पुनि प्रभु कुंभकरन पहिं गयऊ । तेहि बिलोकि मन बिसमय भयऊ ॥
[ शिवजी कहते हैं कि- ] मैंने और ब्रह्माने मिलकर उसे वर दिया कि ऐसा ही हो, तुमने बड़ा तप किया है । फिर ब्रह्माजी कुम्भकर्णके पास गये । उसे देखकर उनके मनमें बड़ा आश्चर्य हुआ ॥३ ॥
जौं एहिं खल नित करब अहारू । होइहि सब उजारि संसारू ॥
सारद प्रेरि तासु मति फेरी । मागेसि नीद मास षट केरी ॥
जो यह दुष्ट नित्य आहार करेगा, तो सारा संसार ही उजाड़ हो जायगा । [ ऐसा विचारकर ] ब्रह्माजीने सरस्वतीको प्रेरणा करके उसकी बुद्धि फेर दी । [जिससे ] उसने छः महीनेकी नींद माँगी ॥ ४ ॥
दो० –- गए बिभीषन पास पुनि कहेउ पुत्र बर मागु ।
तेहिं मागेउ भगवंत पद कमल अमल अनुरागु ॥ १७७ ॥