श्रीरामचरितमानस — पृष्ठ 181–190
श्रीरामचरितमानस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 181–190
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* बालकाण्ड * १७९ फिर ब्रह्माजी विभीषणके पास गये और बोले–हे पुत्र! वर माँगो । उसने भगवान्के चरणकमलोंमें निर्मल ( निष्काम और अनन्य ) प्रेम माँगा ॥ १७७ ॥
तिन्हहि देइ बर ब्रह्म सिधाए । हरषित ते अपने गृह आए ॥
मय तनुजा मंदोदरि नामा । परम सुंदरी नारि ललामा ॥
उनको वर देकर ब्रह्माजी चले गये और वे ( तीनों भाई) हर्षित होकर अपने घर लौट आये ।
मय दानवकी मन्दोदरी नामकी कन्या परम सुन्दरी और स्त्रियोंमें शिरोमणि थी ॥१ ॥
सोइ मयँ दीन्हि रावनहि आनी । होइहि जातुधानपति जानी ॥
हरषित भयउ नारि भलि पाई । पुनि दोउ बंधु बिआहेसि जाई ॥
मयने उसे लाकर रावणको दिया । उसने जान लिया कि यह राक्षसोंका राजा होगा अच्छी स्त्री पाकर रावण प्रसन्न हुआ और फिर उसने जाकर दोनों भाइयोंका विवाह कर दिया ॥२ ॥
गिरि त्रिकूट एक सिंधु मझारी । बिधि निर्मित दुर्गम अति भारी ॥
सोइ मय दानवँ बहुरि सँवारा । कनक रचित मनिभवन अपारा ॥
समुद्रके बीचमें त्रिकूट नामक पर्वतपर ब्रह्माका बनाया हुआ एक बड़ा भारी किला था । [ महान् मायावी और निपुण कारीगर ] मय दानवने उसको फिरसे सजा दिया । उसमें मणियोंसे जड़े हुए सोनेके अनगिनत महल थे ॥३ ॥
भोगावति जसि अहिकुल बासा । अमरावति जसि सक्रनिवासा ॥
तिन्ह तें अधिक रम्य अति बंका । जग बिख्यात नाम तेहि लंका ॥
जैसी नागकुलके रहनेकी [ पाताललोकमें ] भोगावती पुरी है और इन्द्रके रहनेकी [ स्वर्गलोकमें ] अमरावती पुरी है, उनसे भी अधिक सुन्दर और बाँका वह दुर्ग था । जगत्में उसका नाम लङ्का प्रसिद्ध हुआ ॥४ ॥
दो० -खाईं सिंधु गभीर अति चारिहुँ दिसि फिरि आव ।
कनक कोट मनिखचित दृढ़ बरनि न जाइ बनाव ॥ १७८ ( क ) ॥
उसे चारों ओरसे समुद्रकी अत्यन्त गहरी खाई घेरे हुए है । उस [ दुर्ग ] के मणियोंसे जड़ा हुआ सोनेका मजबूत परकोटा है, जिसकी कारीगरीका वर्णन नहीं किया जा सकता ॥ १७८ ( क ) ॥
हरि प्रेरित जेहिं कलप जोड़ जातुधानपति होइ ।
सूर प्रतापी अतुलबल दल समेत बस सोइ ॥ १७८ ( ख) ॥
भगवान्की प्रेरणासे जिस कल्पमें जो राक्षसोंका राजा ( रावण ) होता है, वही शूर, प्रतापी, अतुलित बलवान् अपनी सेनासहित उस पुरीमें बसता है । १७८ (ख) ॥
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* *१८० रामचरितमानस
रहे तहाँ निसिचर भट भारे । ते सब सुरन्ह समर संघारे ॥
अब तहँ रहहिं सक्र के प्रेरे । रच्छक कोटि जच्छपति केरे ॥
[ पहले ] वहाँ बड़े - बड़े योद्धा राक्षस रहते थे । देवताओंने उन सबको युद्धमें मार डाला । अब इन्द्रकी प्रेरणासे वहाँ कुबेरके एक करोड़ रक्षक ( यक्ष लोग ) रहते हैं - ॥१ ॥
दसमुख कतहुँ खबरि असि पाई । सेन साजि गढ़ घेरेसि जाई ॥
देखि बिकट भट बड़ि कटकाई । जच्छ जीव लै गए पराई ॥
रावणको कहीं ऐसी खबर मिली तब उसने सेना सजाकर किलेको जा घेरा । उस बड़े विकट योद्धा और उसकी बड़ी सेनाको देखकर यक्ष अपने प्राण लेकर भाग गये ॥२ ॥
फिरि सब नगर दसानन देखा । गयउ सोच सुख भयउ बिसेषा ॥
सुंदर सहज अगम अनुमानी । कीन्हि तहाँ रावन रजधानी ॥
तब रावणने घूम - फिरकर सारा नगर देखा, उसकी [स्थानसम्बन्धी ] चिन्ता मिट गयी और उसे बहुत ही सुख हुआ । उस पुरीको स्वाभाविक ही सुन्दर और [ बाहरवालोंके लिये ] दुर्गम अनुमान करके रावणने वहाँ अपनी राजधानी कायम की ॥ ३ ॥
जेहि जस जोग बाँटि गृह दीन्हे । सुखी सकल रजनीचर कीन्हे ॥
। पुष्पक जान जीति लै आवा ॥एक बार कुबेर पर धावा योग्यताके अनुसार घरोंको बाँटकर रावणने सब राक्षसोंको सुखी किया । एक बार वह कुबेरपर चढ़ दौड़ा और उससे पुष्पकविमानको जीतकर ले आया ॥ ४ ॥
दो० - कौतुकहीं कैलास पुनि लीन्हेसि जाइ उठाइ ।
मनहुँ तौलि निज बाहुबल चला बहुत सुख पाइ ॥ १७ ९ ॥
फिर उसने जाकर [ एक बार] खिलवाड़हीमें कैलास पर्वतको उठा लिया और मानो अपनी भुजाओंका बल तौलकर, बहुत सुख पाकर वह वहाँसे चला आया ॥ १७ ९ ॥
सुख संपति सुत सेन सहाई । जय प्रताप बल बुद्धि बड़ाई ॥
नित नूतन सब बाढ़त जाई । जिमि प्रतिलाभ लोभ अधिकाई ॥
सुख, सम्पत्ति, पुत्र, सेना, सहायक, जय, प्रताप, बल, बुद्धि और बड़ाई– ये सब उसके नित्य नये [ वैसे ही ] बढ़ते जाते थे, जैसे प्रत्येक लाभपर लोभ बढ़ता है ॥ १ ॥
अतिबल कुंभकरन अस भ्राता । जेहि कहुँ नहिं प्रतिभट जग जाता ॥
करइ पान सोवइ षट मासा । जागत होइ तिहूँ पुर त्रासा ॥
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* बालकाण्ड * १८१ अत्यन्त बलवान् कुम्भकर्ण-सा उसका भाई था, जिसके जोड़का योद्धा जगत्में पैदा ही नहीं हुआ । वह मदिरा पीकर छः महीने सोया करता था । उसके जागते ही तीनों लोकोंमें तहलका मच जाता था ॥ २ ॥
जौं दिन प्रति अहार कर सोई । बिस्व बेगि सब चौपट होई ॥
समर धीर नहिं जाइ बखाना । तेहि सम अमित बीर बलवाना ॥
यदि वह प्रतिदिन भोजन करता, तब तो सम्पूर्ण विश्व शीघ्र ही चौपट ( खाली ) हो जाता । रणधीर ऐसा था कि जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता । [ लङ्कामें ] उसके ऐसे असंख्य बलवान् वीर थे ॥ ३ ॥
बारिदनाद जेठ सुत तासू । भट महुँ प्रथम लीक जग जासू॥
जेहि न होइ रन सनमुख कोई । सुरपुर नितहिं परावन होई ॥
मेघनाद रावणका बड़ा लड़का था, जिसका जगत्के योद्धाओंमें पहला नंबर था । रणमें कोई भी उसका सामना नहीं कर सकता था । स्वर्गमें तो [ उसके भयसे ] नित्य भगदड़ मची रहती थी ॥ ४ ॥
दो० – कुमुख अकंपन कुलिसरद धूमकेतु अतिकाय ।
एक एक जग जीति सक ऐसे सुभट निकाय ॥ १८० ॥
[ इनके अतिरिक्त] दुर्मुख, अकम्पन, वज्रदन्त, धूमकेतु और अतिकाय आदि ऐसे अनेक योद्धा थे, जो अकेले ही सारे जगत्को जीत सकते थे ॥१८० ॥
कामरूप जानहिं सब माया । सपनेहुँ जिन्ह कें धरम न दाया ॥
दसमुख बैठ सभाँ एक बारा । देखि अमित आपन परिवारा ॥
सभी राक्षस मनमाना रूप बना सकते थे और [ आसुरी ] माया जानते थे । उनके दया- धर्म स्वप्नमें भी नहीं था । एक बार सभामें बैठे हुए रावणने अपने अगणित परिवारको देखा- ॥१ ॥
सुत समूह जन परिजन नाती । गनै को पार निसाचर जाती ॥
सेन बिलोकि सहज अभिमानी । बोला बचन क्रोध मद सानी ॥
पुत्र - पौत्र, कुटुम्बी और सेवक ढेर- के - ढेर थे । [ सारी ] राक्षसोंकी जातियोंको तो गिन ही कौन सकता था? अपनी सेनाको देखकर स्वभावसे ही अभिमानी रावण क्रोध और गर्वमें सनी हुई वाणी बोला—॥२ ॥
सुनहु सकल रजनीचर जूथा । हमरे बैरी बिबुध बरूथा ॥
ते सनमुख नहिं करहिं लराई । देखि सबल रिपु जाहिं पराई ॥
हे समस्त राक्षसोंके दलो! सुनो, देवतागण हमारे शत्रु हैं । वे सामने आकर युद्ध नहीं करते । बलवान् शत्रुको देखकर भाग जाते हैं ॥ ३ ॥
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* *१८२ रामचरितमानस
तेन्ह कर मरन एक बिधि होई । कहउँ बुझाइ सुनहु अब सोई ॥
द्विजभोजन मख होम सराधा । सब कै जाइ करहु तुम्ह बाधा ॥
उनका मरण एक ही उपायसे हो सकता है, मैं समझाकर कहता हूँ । अब उसे सुनो । [ उनके बलको बढ़ानेवाले ] ब्राह्मणभोजन, यज्ञ, हवन और श्राद्ध- इन सबमें जाकर तुम बाधा डालो ॥ ४ ॥
दो० –छुधा छीन बलहीन सुर सहजेहिं मिलिहहिं आइ ।
तब मारिहउँ कि छाड़िहउँ भली भाँति अपनाइ ॥ १८१ ॥
भूखसे दुर्बल और बलहीन होकर देवता सहजहीमें आ मिलेंगे । तब उनको मैं मार डालूँगा अथवा भलीभाँति अपने अधीन करके [ सर्वथा पराधीन करके ] छोड़ दूँगा ॥ १८१ ॥
मेघनाद कहुँ पुनि हँकरावा । दीन्ही सिख बलु बयरु बढ़ावा ॥
जे सुर समर धीर बलवाना । जिन्ह कें लरिबे कर अभिमाना ॥
फिर उसने मेघनादको बुलवाया और सिखा- पढ़ाकर उसके बल और [देवताओंके प्रति ] वैरभावको उत्तेजना दी । [ फिर कहा- ] हे पुत्र! जो देवता रणमें धीर और बलवान् हैं और जिन्हें लड़नेका अभिमान है ॥१ ॥
तिन्हहि जीति रन आनेसु बाँधी । उठि सुत पितु अनुसासन काँधी ॥
एहि बिधि सबही अग्या दीन्ही । आपुनु चलेउ गदा कर लीन्ही ॥
उन्हें युद्धमें जीतकर बाँध लाना । बेटेने उठकर पिताकी आज्ञाको शिरोधार्य किया । इसी तरह उसने सबको आज्ञा दी और आप भी हाथमें गदा लेकर चल दिया ॥२ ॥
चलत दसानन डोलति अवनी । गर्जत गर्भ स्त्रवहिं सुर रवनी ॥
रावन आवत सुनेउ सकोहा । देवन्ह तके मेरु गिरि खोहा ॥
रावणके चलनेसे पृथ्वी डगमगाने लगी और उसकी गर्जनासे देवरमणियोंके गर्भ गिरने लगे । रावणको क्रोधसहित आते हुए सुनकर देवताओंने सुमेरु पर्वतकी गुफाएँ तकीं ( भागकर सुमेरुकी गुफाओंका आश्रय लिया ) ॥ ३ ॥
दिगपालन्ह के लोक सुहाए । सूने सकल दसानन पाए ॥
पुनि पुनि सिंघनाद करि भारी । देइ देवतन्ह गारि पचारी ॥
दिक्पालोंके सारे सुन्दर लोकोंको रावणने सूना पाया । वह बार- बार भारी सिंहगर्जना करके देवताओंको ललकार- ललकारकर गालियाँ देता था ॥४ ॥
रन मदमत्त फिरइ जग धावा । प्रतिभट खोजत कतहुँ न पावा ॥
रबि ससि पवन बरुन धनधारी । अगिनि काल जम सब अधिकारी ॥
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* बालकाण्ड * १८३ रणके मदमें मतवाला होकर वह अपनी जोड़ीका योद्धा खोजता हुआ जगत्भरमें दौड़ता फिरा, परन्तु उसे ऐसा योद्धा कहीं नहीं मिला । सूर्य, चन्द्रमा, वायु, वरुण, कुबेर, अग्नि, काल और यम आदि सब अधिकारी, ॥ ५ ॥
किंनर सिद्ध मनुज सुर नागा । हठि सबही के पंथहिं लागा ॥
ब्रह्मसृष्टि जहँ लगि तनुधारी । दसमुख बसबर्ती नर नारी ॥
किन्नर, सिद्ध, मनुष्य, देवता और नाग– सभीके पीछे वह हठपूर्वक पड़ गया ( किसीको भी उसने शान्तिपूर्वक नहीं बैठने दिया) । ब्रह्माजीकी सृष्टिमें जहाँतक शरीरधारी स्त्री - पुरुष थे, सभी रावणके अधीन हो गये ॥६ ॥
आयसु करहिं सकल भयभीता । नवहिं आइ नित चरन बिनीता ॥
डरके मारे सभी उसकी आज्ञाका पालन करते थे और नित्य आकर नम्रतापूर्वक उसके चरणोंमें सिर नवाते थे ॥७ ॥
दो० - भुजबल बिस्व बस्य करि राखेसि कोउ न सुतंत्र ।
मंडलीक मनि रावन राज करइ निज मंत्र ॥ १८२ ( क ) ॥
उसने भुजाओंके बलसे सारे विश्वको वशमें कर लिया, किसीको स्वतन्त्र नहीं रहने दिया । [ इस प्रकार ] मण्डलीक राजाओंका शिरोमणि ( सार्वभौम सम्राट्) रावण अपने इच्छानुसार राज्य करने लगा ॥ १८२ ( क ) ॥ देव जच्छ गंधर्ब नर किंनर नाग कुमारि ॥ जीति बरीं निज बाहुबल बहु सुंदर बर नारि ॥ १८२ ( ख ) ॥ देवता, यक्ष, गन्धर्व, मनुष्य, किन्नर और नागोंकी कन्याओं तथा बहुत-सी अन्य सुन्दरी और उत्तम स्त्रियोंको उसने अपनी भुजाओंके बलसे जीतकर ब्याह लिया ॥ १८२ ( ख ) ॥
इंद्रजीत सन जो कछु कहेऊ । सो सब जनु पहिलहिं करि रहेऊ ॥
प्रथमहिं जिन्ह कहुँ आयसु दीन्हा । तिन्ह कर चरित सुनहु जो कीन्हा ॥
मेघनादसे उसने जो कुछ कहा, उसे उसने ( मेघनादने ) मानो पहलेसे ही कर रखा था ( अर्थात् रावणके कहनेभरकी देर थी, उसने आज्ञापालनमें तनिक भी देर नहीं की ) । जिनको [ रावणने मेघनादसे ] पहले ही आज्ञा दे रखी थी, उन्होंने जो करतूतें की उन्हें सुनो—॥१ ॥
देखत भीमरूप सब पापी । निसिचर निकर देव परितापी ॥
करहिं उपद्रव असुर निकाया । नाना रूप धरहिं करि माया ॥
सब राक्षसोंके समूह देखनेमें बड़े भयानक, पापी और देवताओंको दुःख देनेवाले थे ।
वे असुरोंके समूह उपद्रव करते थे और मायासे अनेकों प्रकारके रूप धरते थे ॥२ ॥
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* *१८४ रामचरितमानस
जेहि बिधि होइ धर्म निर्मूला । सो सब करहिं बेद प्रतिकूला ॥
जेहिं जेहिं देस धेनु द्विज पावहिं । नगर गाउँ पुर आगि लगावहिं ॥
जिस प्रकार धर्मकी जड़ कटे, वे वही सब वेदविरुद्ध काम करते थे । जिस -जिस स्थानमें वे गौ और ब्राह्मणोंको पाते थे, उसी नगर, गाँव और पुरवेमें आग लगा देते थे ॥३ ॥
सुभ आचरन कतहुँ नहिं होई । देव बिप्र गुरु मान न कोई ॥
नहिं हरिभगति जग्य तप ग्याना । सपनेहुँ सुनिअ न बेद पुराना ॥
[ उनके डरसे ] कहीं भी शुभ आचरण ( ब्राह्मणभोजन, यज्ञ, श्राद्ध आदि ) नहीं होते थे । देवता, ब्राह्मण और गुरुको कोई नहीं मानता था । न हरिभक्ति थी, न यज्ञ, तप और ज्ञान था । वेद और पुराण तो स्वप्नमें भी सुननेको नहीं मिलते थे ॥४ ॥
छं० — जप जोग बिरागा तप मख भागा श्रवन सुनइ दससीसा ।
आपुनु उठि धावइ रहै न पावइ धरि सब घालइ खीसा ॥
अस भ्रष्ट अचारा भा संसारा धर्म सुनिअ नहिं काना ।
तेहि बहुबिधि त्रास देस निकासइ जो कह बेद पुराना ॥
जप, योग, वैराग्य, तप तथा यज्ञमें [ देवताओंके ] भाग पानेकी बात रावण कहीं कानोंसे सुन पाता, तो [ उसी समय ] स्वयं उठ दौड़ता । कुछ भी रहने नहीं पाता, वह सबको पकड़कर विध्वंस कर डालता था । संसारमें ऐसा भ्रष्ट आचरण फैल गया कि धर्म तो कानोंमें भी सुननेमें नहीं आता था; जो कोई वेद और पुराण कहता, उसको बहुत तरहसे त्रास देता और देशसे निकाल देता था ।
सो० - बरनि न जाइ अनीति घोर निसाचर जो करहिं ।
हिंसा पर अति प्रीति तिन्ह के पापहि कवनि मिति ॥ १८३ ॥
राक्षसलोग जो घोर अत्याचार करते थे, उसका वर्णन नहीं किया जा सकता । हिंसापर ही जिनकी प्रीति है, उनके पापोंका क्या ठिकाना! ॥ १८३ ॥
मासपारायण, छठा विश्राम
बाढ़े खल बहु चोर जुआरा । जे लंपट परधन परदारा ॥
मानहिं मातु पिता नहिं देवा । साधुन्ह सन करवावहिं सेवा ॥
पराये धन और परायी स्त्रीपर मन चलानेवाले, दुष्ट, चोर और जुआरी बहुत बढ़ गये । लोग माता- पिता और देवताओंको नहीं मानते थे और साधुओं [ की सेवा करना तो दूर रहा, उलटे उन ] से सेवा करवाते थे ॥१ ॥
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* बालकाण्ड * १८५
जिन्ह के यह आचरन भवानी । ते जानेहु निसिचर सब प्रानी ॥
अतिसय देखि धर्म कै ग्लानी । परम सभीत धरा अकुलानी ॥
[ श्रीशिवजी कहते हैं कि- ] हे भवानी! जिनके ऐसे आचरण हैं, उन सब प्राणियोंको राक्षस ही समझना । इस प्रकार धर्मके प्रति [ लोगोंकी ] अतिशय ग्लानि ( अरुचि, अनास्था) देखकर पृथ्वी अत्यन्त भयभीत एवं व्याकुल हो गयी ॥ २ ॥
गिरि सरि सिंधु भार नहिं मोही । जस मोहि गरुअ एक परद्रोही ॥
सकल धर्म देखइ बिपरीता । कहि न सकइ रावन भय भीता ॥
[वह सोचने लगी कि ] पर्वतों, नदियों और समुद्रोंका बोझ मुझे इतना भारी नहीं जान पड़ता, जितना भारी मुझे एक परद्रोही ( दूसरोंका अनिष्ट करनेवाला) लगता है । पृथ्वी सारे धर्मोंको विपरीत देख रही है, पर रावणसे भयभीत हुई वह कुछ बोल नहीं सकती ॥३ ॥
धेनु रूप धरि हृदयँ बिचारी । गई तहाँ जहँ सुर मुनि झारी ॥
निज संताप सुनाएसि रोई । काहू तें कछु काज न होई ॥
[ अन्तमें ] हृदयमें सोच-विचारकर, गौका रूप धारण कर धरती वहाँ गयी, जहाँ सब देवता और मुनि [ छिपे ] थे । पृथ्वीने रोकर उनको अपना दुःख सुनाया, पर किसीसे कुछ काम न बना ॥४ ॥
छं० - सुर मुनि गंध मिलि करि सर्बा गे बिरंचि के लोका ।
सँग गोतनुधारी भूमि बिचारी परम बिकल भय सोका ॥
ब्रह्माँ सब जाना मन अनुमाना मोर कछून बसाई ।
जा करि तैं दासी सो अबिनासी हमरेउ तोर सहाई ॥
तब देवता, मुनि और गन्धर्व सब मिलकर ब्रह्माजीके लोक ( सत्यलोक ) को गये । भय और शोकसे अत्यन्त व्याकुल बेचारी पृथ्वी भी गौका शरीर धारण किये हुए उनके साथ थी । ब्रह्माजी सब जान गये । उन्होंने मनमें अनुमान किया कि इसमें मेरा कुछ भी वश नहीं चलनेका । [ तब उन्होंने पृथ्वीसे कहा कि- ] जिसकी तू दासी है, वही अविनाशी हमारा और तुम्हारा दोनोंका सहायक है ।
सो० – धरनि धरहि मन धीर कह बिरंचि हरि पद सुमिरु ।
जानत जन की पीर प्रभु भंजिहि दारुन बिपति ॥ १८४ ॥
ब्रह्माजीने कहा —हे धरती! मनमें धीरज धारण करके श्रीहरिके चरणोंका स्मरण करो । प्रभु अपने दासोंकी पीड़ाको जानते हैं, ये तुम्हारी कठिन विपत्तिका नाश करेंगे ॥१८४ ॥
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* *१८६ रामचरितमानस
बैठे सुर सब करहिं बिचारा । कहँ पाइअ प्रभु करिअ पुकारा ॥
पुर बैकुंठ जान कह कोई । कोउ कह पयनिधि बस प्रभु सोई ॥
सब देवता बैठकर विचार करने लगे कि प्रभुको कहाँ पावें ताकि उनके सामने पुकार ( फर्याद ) करें । कोई वैकुण्ठपुरी जानेको कहता था और कोई कहता था कि वही प्रभु क्षीरसमुद्रमें निवास करते हैं ॥१ ॥
जाके हृदयँ भगति जसि प्रीती । प्रभु तहँ प्रगट सदा तेहिं रीती ॥
तेहिं समाज गिरिजा मैं रहेऊँ । अवसर पाइ बचन एक कहेऊँ ॥
जिसके हृदयमें जैसी भक्ति और प्रीति होती है, प्रभु वहाँ ( उसके लिये ) सदा उसी रीतिसे प्रकट होते हैं । हे पार्वती! उस समाजमें मैं भी था । अवसर पाकर मैंने एक बात कही- ॥ २ ॥
हरि ब्यापक सर्बत्र समाना । प्रेम तें प्रगट होहिं मैं जाना ॥
देस काल दिसि बिदिसिहु माहीं । कहहु सो कहाँ जहाँ प्रभु नाहीं ॥
मैं तो यह जानता हूँ कि भगवान् सब जगह समान रूपसे व्यापक हैं, प्रेमसे वे प्रकट हो जाते हैं । देश, काल, दिशा, विदिशामें बताओ, ऐसी जगह कहाँ है, जहाँ प्रभु न हों ॥३ ॥
अग जगमय सब रहित बिरागी । प्रेम तें प्रभु प्रगटइ जिमि आगी ॥
मोर बचन सब के मन माना । साधु साधु करि ब्रह्म बखाना ॥
वे चराचरमय ( चराचरमें व्याप्त ) होते हुए ही सबसे रहित हैं और विरक्त हैं ( उनकी कहीं आसक्ति नहीं है ); वे प्रेमसे प्रकट होते हैं, जैसे अग्नि । ( अग्नि अव्यक्तरूपसे सर्वत्र व्याप्त है, परन्तु जहाँ उसके लिये अरणिमन्थनादि साधन किये जाते हैं, वहाँ वह प्रकट होती है । इसी प्रकार सर्वत्र व्याप्त भगवान् भी प्रेमसे प्रकट होते हैं । ) मेरी बात सबको प्रिय लगी । ब्रह्माजीने ' साधु, साधु ' कहकर बड़ाई की ॥ ४ ॥
दो० - सुनि बिरंचि मन हरष तन पुलकि नयन बह नीर ।
अस्तुति करत जोर कर सावधान मतिधीर ॥ १८५ ॥
मेरी बात सुनकर ब्रह्माजीके मनमें बड़ा हर्ष हुआ; उनका तन पुलकित हो गया और नेत्रोंसे [ प्रेमके ] आँसू बहने लगे । तब वे धीरबुद्धि ब्रह्माजी सावधान होकर हाथ जोड़कर स्तुति करने लगे— ॥ १८५ ॥
छं० –जय जय सुरनायक जन सुखदायक प्रनतपाल भगवंता ।
गो द्विज हितकारी जय असुरारी सिंधुसुता प्रिय कंता ॥
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* बालकाण्ड * १८७
पालन सुर धरनी अद्भुत करनी मरम न जानइ कोई ।
जो सहज कृपाला दीनदयाला करउ अनुग्रह सोई ॥
हे देवताओंके स्वामी, सेवकोंको सुख देनेवाले, शरणागतकी रक्षा करनेवाले भगवान्! आपकी जय हो! जय हो!! हे गो-ब्राह्मणोंका हित करनेवाले, असुरोंका विनाश करनेवाले, समुद्रकी कन्या ( श्रीलक्ष्मीजी ) के प्रिय स्वामी! आपकी जय हो । हे देवता और पृथ्वीका पालन करनेवाले! आपकी लीला अद्भुत है,उसका भेद कोई नहीं जानता । ऐसे जो स्वभावसे ही कृपालु और दीनदयालु हैं, वे ही हमपर कृपा करें ॥ १ ॥
जय जय अबिनासी सब घट बासी ब्यापक परमानंदा ।
अबिगत गोतीतं चरित पुनीतं मायारहित मुकुंदा ॥
जेहि लागि बिरागी अति अनुरागी बिगत मोह मुनिबृंदा ।
निसि बासर ध्यावहिं गुनगन गावहिं जयति सच्चिदानंदा ॥
हे अविनाशी, सबके हृदयमें निवास करनेवाले ( अन्तर्यामी ), सर्वव्यापक परम आनन्दस्वरूप, अज्ञेय, इन्द्रियोंसे परे, पवित्रचरित्र, मायासे रहित मुकुन्द (मोक्षदाता )! आपकी जय हो! जय हो!! [ इस लोक और परलोकके सब भोगोंसे ] विरक्त तथा मोहसे सर्वथा छूटे हुए ( ज्ञानी ) मुनिवृन्द भी अत्यन्त अनुरागी ( प्रेमी ) बनकर जिनका रात - दिन ध्यान करते हैं और जिनके गुणोंके समूहका गान करते हैं, उन सच्चिदानन्दकी जय हो ॥२ ॥
जेहिं सृष्टि उपाई त्रिबिध बनाई संग सहाय न दूजा ।
सो करउ अघारी चिंत हमारी जानिअ भगति न पूजा ॥
जो भव भय भंजन मुनि मन रंजन गंजन बिपति बरूथा ।
मन बच क्रम बानी छाड़ि सयानी सरन सकल सुरजूथा ॥
जिन्होंने बिना किसी दूसरे संगी अथवा सहायकके अकेले ही [ या स्वयं अपनेको त्रिगुणरूप— ब्रह्मा, विष्णु, शिवरूप– बनाकर अथवा बिना किसी उपादान-कारणके अर्थात् स्वयं ही सृष्टिका अभिन्ननिमित्तोपादान कारण बनकर] तीन प्रकारकी सृष्टि उत्पन्न की, वे पापोंका नाश करनेवाले भगवान् हमारी सुधि लें । हम न भक्ति जानते हैं, न पूजा । जो संसारके ( जन्म- मृत्युके ) भयका नाश करनेवाले, मुनियोंके मनको आनन्द देनेवाले और विपत्तियोंके समूहको नष्ट करनेवाले हैं । हम सब देवताओंके समूह मन, वचन और कर्मसे चतुराई करनेकी बान छोड़कर उन ( भगवान्) की शरण [ आये ] हैं ॥ ३ ॥
सारद श्रुति सेषा रिषय असेषा जा कहुँ कोउ नहिं जाना ।
जेहि दीन पिआरे बेद पुकारे द्रवउ सो श्रीभगवाना ॥
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* *१८८ रामचरितमानस
भव बारिधि मंदर सब बिधि सुंदर गुनमंदिर सुखपुंजा ।
मुनि सिद्ध सकल सुर परम भयातुर नमत नाथ पद कंजा ॥
सरस्वती, वेद, शेषजी और सम्पूर्ण ऋषि कोई भी जिनको नहीं जानते, जिन्हें दीन प्रिय हैं, ऐसा वेद पुकारकर कहते हैं, वे ही श्रीभगवान् हमपर दया करें । हे संसाररूपी समुद्रके [ मथनेके ] लिये मन्दराचलरूप, सब प्रकारसे सुन्दर, गुणोंके धाम और सुखोंकी राशि नाथ! आपके चरणकमलोंमें मुनि, सिद्ध और सारे देवता भयसे अत्यन्त व्याकुल होकर नमस्कार करते हैं ॥ ४ ॥
दो० - जानि सभय सुर भूमि सुनि बचन समेत सनेह
गगनगिरा गंभीर भइ हरनि सोक संदेह ॥ ९ ८६ ॥
देवता और पृथ्वीको भयभीत जानकर और उनके स्नेहयुक्त वचन सुनकर शोक और सन्देहको हरनेवाली गम्भीर आकाशवाणी हुई- ॥ १८६ ॥
जनि डरपहु मुनि सिद्ध सुरेसा । तुम्हहि लागि धरिहउँ नर बेसा ॥
अंसन्ह सहित मनुज अवतारा ॥ लेहउँ दिनकर बंस उदारा ॥
हे मुनि, सिद्ध और देवताओंके स्वामियो! डरो मत । तुम्हारे लिये मैं मनुष्यका रूप धारण करूँगा और उदार ( पवित्र ) सूर्यवंशमें अंशोंसहित मनुष्यका अवतार लूँगा ॥१ ॥
कस्यप अदिति महातप कीन्हा । तिन्ह कहुँ मैं पूरब बर दीन्हा ॥
ते दसरथ कौसल्या रूपा । कोसलपुरीं प्रगट नरभूपा ॥
कश्यप और अदितिने बड़ा भारी तप किया था । मैं पहले ही उनको वर दे चुका हूँ । वे ही दशरथ और कौसल्याके रूपमें मनुष्योंके राजा होकर श्रीअयोध्यापुरीमें प्रकट हुए हैं ॥ २ ॥
तिन्ह कें गृह अवतरिहउँ जाई । रघुकुल तिलक सो चारिउ भाई ॥
नारद बचन सत्य सब करिहउँ । परम सक्ति समेत अवतरिहउँ ॥
उन्हींके घर जाकर मैं रघुकुलमें श्रेष्ठ चार भाइयोंके रूपमें अवतार लूँगा । नारदके सब वचन मैं सत्य करूँगा और अपनी पराशक्तिके सहित अवतार लूँगा ॥३ ॥
हरिहउँ सकल भूमि गरुआई । निर्भय होहु देव समुदाई ॥
गगन ब्रह्मबानी सुनि काना । तुरत फिरे सुर हृदय जुड़ाना ॥
मैं पृथ्वीका सब भार हर लूँगा । हे देववृन्द! तुम निर्भय हो जाओ । आकाशमें ब्रह्म ( भगवान्) की
वाणीको कानसे सुनकर देवता तुरंत लौट गये । उनका हृदय शीतल हो गया ॥४ ॥
तब ब्रह्माँ धरनिहि समुझावा । अभय भई भरोस जियँ आवा ॥
तब ब्रह्माजीने पृथ्वीको समझाया । वह भी निर्भय हुई और उसके जीमें भरोसा ( ढाढ़स ) आ गया ॥५ ॥