श्रीरामचरितमानस — पृष्ठ 191–200

श्रीरामचरितमानस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 191–200

पृष्ठ 191

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* बालकाण्ड * १८ ९

दो० – निज लोकहि बिरंचि गे देवन्ह इहइ सिखाइ ।

बानर तनु धरि धरि महि हरि पद सेवहु जाइ ॥ १८७ ॥

देवताओंको यही सिखाकर कि वानरोंका शरीर धर- धरकर तुमलोग पृथ्वीपर जाकर भगवान्‌के चरणोंकी सेवा करो, ब्रह्माजी अपने लोकको चले गये ॥ १८७ ॥

गए देव सब निज निज धामा । भूमि सहित मन कहुँ बिश्रामा ॥

जो कछु आयसु ब्रह्माँ दीन्हा । हरषे देव बिलंब न कीन्हा ॥

सब देवता अपने - अपने लोकको गये । पृथ्वीसहित सबके मनको शान्ति मिली । ब्रह्माजीने जो कुछ आज्ञा दी, उससे देवता बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने [ वैसा करनेमें] देर नहीं की ॥१ ॥

बनचर देह धरी छिति माहीं । अतुलित बल प्रताप तिन्ह पाहीं ॥

गिरि तरु नख आयुध सब बीरा । हरि मारग चितवहिं मतिधीरा ॥

पृथ्वीपर उन्होंने वानरदेह धारण की । उनमें अपार बल और प्रताप था । सभी शूरवीर थे; पर्वत, वृक्ष और नख ही उनके शस्त्र थे । वे धीर बुद्धिवाले [ वानररूप देवता ] भगवान्‌के आनेकी राह देखने लगे ॥२ ॥

गिरि कानन जहँ तहँ भरि पूरी । रहे निज निज अनीक रचि रूरी ॥

यह सब रुचिर चरित मैं भाषा । अब सो सुनहु जो बीचहिं राखा ॥

वे [ वानर ] पर्वतों और जंगलोंमें जहाँ - तहाँ अपनी- अपनी सुन्दर सेना बनाकर भरपूर छा गये । यह सब सुन्दर चरित्र मैंने कहा । अब वह चरित्र सुनो जिसे बीचहीमें छोड़ दिया था ॥ ३ ॥

अवधपुरीं रघुकुलमनि राऊ । बेद बिदित तेहि दसरथ नाऊँ ॥

धरम धुरंधर गुननिधि ग्यानी । हृदयँ भगति मति सारँगपानी ॥

अवधपुरीमें रघुकुलशिरोमणि दशरथ नामके राजा हुए, जिनका नाम वेदोंमें विख्यात है । वे धर्म- धुरन्धर, गुणोंके भण्डार और ज्ञानी थे । उनके हृदयमें शार्ङ्गधनुष धारण करनेवाले भगवान्की भक्ति थी, और उनकी बुद्धि भी उन्हींमें लगी रहती थी ॥४ ॥

दो० - कौसल्यादि नारि प्रिय सब आचरन पुनीत ।

पति अनुकूल प्रेम दृढ़ हरि पद कमल बिनीत ॥ १८८ ॥

उनकी कौसल्या आदि प्रिय रानियाँ सभी पवित्र आचरणवाली थीं । वे [ बड़ी ] विनीत और पतिके अनुकूल [ चलनेवाली ] थीं और श्रीहरिके चरणकमलोंमें उनका दृढ़ प्रेम था ॥१८८ ॥

एक बार भूपति मन माहीं । भै गलानि मोरें सुत नाहीं ॥

गुर गृह गयउ तुरत महिपाला । चरन लागि करि बिनय बिसाला ॥

पृष्ठ 192

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* *१९० रामचरितमानस एक बार राजाके मनमें बड़ी ग्लानि हुई कि मेरे पुत्र नहीं है । राजा तुरंत ही गुरुके घर गये और चरणोंमें प्रणाम कर बहुत विनय की ॥ १ ॥

निज दुख सुख सब गुरहि सुनायउ । कहि बसिष्ठ बहु बिधि समुझाय ॥

त्रिभुवन बिदित भगत भय हारी ॥धर धीर होइहहिं सुत चारी । राजाने अपना सारा दुःख-सुख गुरुको सुनाया । गुरु वसिष्ठजीने उन्हें बहुत प्रकारसे समझाया [ और कहा— ] धीरज धरो, तुम्हारे चार पुत्र होंगे, जो तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध और भक्तोंके भयको हरनेवाले होंगे ॥२ ॥

संगी रिषिहि बसिष्ठ बोलावा । पुत्रकाम सुभ जग्य करावा ॥

भगति सहित मुनि आहुति दीन्हें । प्रगटे अगिनि चरू कर लीन्हें ॥

वसिष्ठजीने शृङ्गी ऋषिको बुलवाया और उनसे शुभ पुत्रकामेष्टि यज्ञ कराया । मुनिके भक्तिसहित आहुतियाँ देनेपर अग्निदेव हाथमें चरु ( हविष्यान्न खीर ) लिये प्रकट हुए ॥३ ॥

जो बसिष्ठ कछु हृदयँ बिचारा । सकल काजु भा सिद्ध तुम्हारा ॥

यह हबि बाँट देहु नृप जाई । जथा जोग जेहि भाग बनाई ॥

[और दशरथसे बोले- ] वसिष्ठने हृदयमें जो कुछ विचारा था, तुम्हारा वह सब काम सिद्ध हो गया । हे राजन्! [ अब ] तुम जाकर इस हविष्यान्न ( पायस ) को, जिसको जैसा उचित हो, वैसा भाग बनाकर बाँट दो ॥ ४ ॥

दो० – तब अदृस्य भए पावक सकल सभहि समुझाइ ।

परमानंद मगन नृप हरष न हृदयँ समाइ ॥ १८ ९ ॥

तदनन्तर अग्निदेव सारी सभाको समझाकर अन्तर्धान हो गये । राजा परमानन्दमें मग्न हो गये, उनके हृदयमें हर्ष समाता न था ॥ १८ ९ ॥

तबहिं रायँ प्रिय नारि बोलाईं । कौसल्यादि तहाँ चलि आईं ॥

अर्ध भाग कौसल्यहि दीन्हा । उभय भाग आधे कर कीन्हा ॥

उसी समय राजाने अपनी प्यारी पत्नियोंको बुलाया । कौसल्या आदि सब [ रानियाँ ] वहाँ चली आयीं । राजाने [ पायसका ] आधा भाग कौसल्याको दिया, [और शेष ] आधेके दो भाग किये ॥१ ॥

कैकेई कहँ नृप सो दयऊ । रह्यो सो उभय भाग पुनि भयऊ ॥

कौसल्या कैकेई हाथ धरि ॥ दीन्ह सुमित्रहि मन प्रसन्न करि ॥

वह ( उनमेंसे एक भाग) राजाने कैकेयीको दिया । शेष जो बच रहा उसके फिर दो भाग हुए और राजाने उनको कौसल्या और कैकेयीके हाथपर रखकर ( अर्थात् उनकी अनुमति लेकर ) और इस प्रकार उनका मन प्रसन्न करके सुमित्राको दिया ॥ २ ॥

पृष्ठ 193

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* बालकाण्ड * १ ९ १

एहि बिधि गर्भसहित सब नारी । भईं हृदयँ हरषित सुख भारी ॥

जा दिन तें हरि गर्भहिं आए । सकल लोक सुख संपति छाए ॥

इस प्रकार सब स्त्रियाँ गर्भवती हुईं । वे हृदयमें बहुत हर्षित हुईं । उन्हें बड़ा सुख मिला । जिस दिनसे श्रीहरि [ लीलासे ही ] गर्भमें आये, सब लोकोंमें सुख और सम्पत्ति छा गयी ॥३ ॥

मंदिर महँ सब राजहिं रानीं । सोभा सील तेज की खानीं ॥

सुखजुत कछुक काल चलिगयऊ । जेहिं प्रभु प्रगट सो अवसर भयऊ ॥

शोभा, शील और तेजकी खान [ बनी हुई ] सब रानियाँ महलमें सुशोभित हुईं । इस प्रकार कुछ समय सुखपूर्वक बीता और वह अवसर आ गया जिसमें प्रभुको प्रकट होना था ॥४ ॥

दो० –जोग लगन ग्रह बार तिथि सकल भए अनुकूल ।

चर अरु अचर हर्षजुत राम जनम सुखमूल ॥ १ ९० ॥

योग, लग्न, ग्रह, वार और तिथि सभी अनुकूल हो गये । जड और चेतन सब हर्षसे भर गये । [ क्योंकि ] श्रीरामका जन्म सुखका मूल है ॥ १ ९ ० ॥

नौमी तिथि मधु मास पुनीता । सुकल पच्छ अभिजित हरिप्रीता ॥

मध्य दिवस अति सीत न घामा । पावन काल लोक बिश्रामा ॥

पवित्र चैत्रका महीना था, नवमी तिथि थी । शुक्लपक्ष और भगवान्का प्रिय अभिजित् मुहूर्त्त था । दोपहरका समय था । न बहुत सरदी थी, न धूप ( गरमी ) थी । वह पवित्र समय सब लोकोंको शान्ति देनेवाला था ॥१ ॥

सीतल मंद सुरभि बह बाऊ । हरषित सुर संतन मन चाऊ ॥

बन कुसुमित गिरिगन मनिआरा । स्रवहिं सकल सरिताऽमृतधारा ॥

शीतल, मन्द और सुगन्धित पवन बह रहा था । देवता हर्षित थे और संतोंके मनमें [ बड़ा ] चाव था । वन फूले हुए थे, पर्वतोंके समूह मणियोंसे जगमगा रहे थे और सारी नदियाँ अमृतकी धारा बहा रही थीं ॥ २ ॥

सो अवसर बिरंचि जब जाना । चले सकल सुर साजि बिमाना ॥

गगन बिमल संकुल सुर जूथा । गावहिं गुन गंधर्ब बरूथा ॥

जब ब्रह्माजीने वह ( भगवान्‌के प्रकट होनेका) अवसर जाना तब [ उनके समेत ] सारे देवता विमान सजा- सजाकर चले । निर्मल आकाश देवताओंके समूहोंसे भर गया । गन्धर्वोंके दल गुणोंका गान करने लगे ॥ ३ ॥

पृष्ठ 194

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* * १ ९ २ रामचरितमानस

बरषहिं सुमन सुअंजुलि साजी । गहगहि गगन दुंदुभी बाजी ॥

अस्तुति करहिं नाग मुनि देवा । बहुबिधि लावहिं निज निज सेवा ॥

और सुन्दर अञ्जलियोंमें सजा-सजाकर पुष्प बरसाने लगे । आकाशमें घमाघम नगाड़े बजने लगे । नाग, मुनि और देवता स्तुति करने लगे और बहुत प्रकारसे अपनी-अपनी सेवा ( उपहार ) भेंट करने लगे ॥४ ॥

दो० - सुर समूह बिनती करि पहुँचे निज निज धाम ।

जगनिवास प्रभु प्रगटे अखिल लोक बिश्राम ॥ १ ९ १ ॥

देवताओंके समूह विनती करके अपने- अपने लोकमें जा पहुँचे । समस्त लोकोंको शान्ति देनेवाले, जगदाधार प्रभु प्रकट हुए । १ ९ १ ॥

छं० – भए प्रगट कृपाला दीनदयाला कौसल्या हितकारी ।

हरषित महतारी मुनि मन हारी अद्भुत रूप बिचारी ॥

लोचन अभिरामा तनु घनस्यामा निज आयुध भुज चारी ।

भूषन बनमाला नयन बिसाला सोभासिंधु खरारी ॥

दीनोंपर दया करनेवाले, कौसल्याजीके हितकारी कृपालु प्रभु प्रकट हुए । मुनियोंके मनको हरनेवाले उनके अद्भुत रूपका विचार करके माता हर्षसे भर गयी । नेत्रोंको आनन्द देनेवाला मेघके समान श्यामशरीर था; चारों भुजाओंमें अपने ( खास ) आयुध [ धारण किये हुए ] थे; [ दिव्य ] आभूषण और वनमाला पहने थे; बड़े - बड़े नेत्र थे । इस प्रकार शोभाके समुद्र तथा खर राक्षसको मारनेवाले भगवान् प्रकट हुए ॥१ ॥

कह दुइ कर जोरी अस्तुति तोरी केहि बिधि करौं अनंता ।

माया गुन ग्यानातीत अमाना बेद पुरान भनंता ॥

करुना सुख सागर सब गुन आगर जेहि गावहिं श्रुति संता ।

सो मम हित लागी जन अनुरागी भयउ प्रगट श्रीकंता ॥

दोनों हाथ जोड़कर माता कहने लगी-हे अनन्त! मैं किस प्रकार तुम्हारी स्तुति करूँ । वेद और पुराण तुमको माया, गुण और ज्ञानसे परे और परिमाणरहित बतलाते हैं । श्रुतियाँ और संतजन दया और सुखका समुद्र, सब गुणोंका धाम कहकर जिनका गान करते हैं, वही भक्तोंपर प्रेम करनेवाले लक्ष्मीपति भगवान् मेरे कल्याणके लिये प्रकट हुए हैं ॥ २ ॥

ब्रह्मांड निकाया निर्मित माया रोम रोम प्रति बेद कहै ।

मम उर सो बासी यह उपहासी सुनत धीर मति थिर न रहै ॥

पृष्ठ 195

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* बालकाण्ड * १ ९ ३

उपजा जब ग्याना प्रभु मुसुकाना चरित बहुत बिधि कीन्ह चहै ।

कहि कथा सुहाई मातु बुझाई जेहि प्रकार सुत प्रेम लहै ॥

वेद कहते हैं कि तुम्हारे प्रत्येक रोममें मायाके रचे हुए अनेकों ब्रह्माण्डोंके समूह [ भरे ] हैं । वे तुम मेरे गर्भमें रहे — इस हँसीकी बातके सुननेपर धीर ( विवेकी ) पुरुषोंकी बुद्धि भी स्थिर नहीं रहती ( विचलित हो जाती है ) । जब माताको ज्ञान उत्पन्न हुआ, तब प्रभु मुसकराये । वे बहुत प्रकारके चरित्र करना चाहते हैं । अतः उन्होंने [ पूर्वजन्मकी ] सुन्दर कथा कहकर माताको समझाया, जिससे उन्हें पुत्रका ( वात्सल्य ) प्रेम प्राप्त हो ( भगवान्के प्रति पुत्रभाव हो जाय) ॥ ३ ॥

माता पुनि बोली सो मति डोली तजहु तात यह रूपा ।

कीजै सिसुलीला अति प्रियसीला यह सुख परम अनूपा ॥

सुनि बचन सुजाना रोदन ठाना होइ बालक सुरभूपा ।

यह चरित जे गावहिं हरिपद पावहिं ते न परहिं भवकूपा ॥

माताकी वह बुद्धि बदल गयी, तब वह फिर बोली- हे तात! यह रूप छोड़कर अत्यन्त प्रिय बाललीला करो, [मेरे लिये ] यह सुख परम अनुपम होगा । [माताका ] यह वचन सुनकर देवताओंके स्वामी सुजान भगवान्ने बालक [ रूप ] होकर रोना शुरू कर दिया । [ तुलसीदासजी कहते हैं— ] जो इस चरित्रका गान करते हैं, वे श्रीहरिका पद पाते हैं और [फिर ] संसाररूपी कूपमें नहीं गिरते ॥ ४ ॥

दो० - बिप्र धेनु सुर संत हित लीन्ह मनुज अवतार ।

निज इच्छा निर्मित तनु माया गुन गो पार ॥१ ९ २ ॥

ब्राह्मण, गौ, देवता और संतोंके लिये भगवान्ने मनुष्यका अवतार लिया । वे [ अज्ञानमयी, मलिना ] माया और उसके गुण ( सत्, रज, तम ) और [ बाहरी तथा भीतरी ] इन्द्रियोंसे परे हैं । उनका [ दिव्य ] शरीर अपनी इच्छासे ही बना है [ किसी कर्मबन्धनसे परवश होकर त्रिगुणात्मक भौतिक पदार्थोंके द्वारा नहीं ] ॥ १ ९ २ ॥

सुनि सिसु रुदन परम प्रिय बानी । संभ्रम चलि आईं सब रानी ॥

हरषित जहँ तहँ धाईं दासी । आनँद मगन सकल पुरबासी ॥

बच्चेके रोनेकी बहुत ही प्यारी ध्वनि सुनकर सब रानियाँ उतावली होकर दौड़ी चली आयीं । दसरथदासियाँ हर्षितपुत्रजन्महोकर जहाँ-सुनितहाँ दौड़ींकाना। सारे पुरवासी। मानहुँआनन्दमें मग्नब्रह्मानंदहो गये ॥१ ॥ समाना ॥

परम प्रेम मन पुलक सरीरा । चाहत उठन करत मति धीरा ॥

पृष्ठ 196

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* *१ ९४ रामचरितमानस राजा दशरथजी पुत्रका जन्म कानोंसे सुनकर मानो ब्रह्मानन्दमें समा गये । मनमें अतिशय प्रेम है, शरीर पुलकित हो गया । [ आनन्दमें अधीर हुई ] बुद्धिको धीरज देकर [ और प्रेममें शिथिल हुए शरीरको सँभालकर ] वे उठना चाहते हैं ॥२ ॥

जाकर नाम सुनत सुभ होई । मोरें गृह आवा प्रभु सोई ॥

परमानंद पूरि मन राजा । कहा बोलाइ बजावहु बाजा ॥

जिनका नाम सुननेसे ही कल्याण होता है, वही प्रभु मेरे घर आये हैं । [ यह सोचकर ] राजाका

मन परम आनन्दसे पूर्ण हो गया । उन्होंने बाजेवालोंको बुलाकर कहा कि बाजा बजाओ ॥ ३ ॥

गुर बसिष्ठ कहँ गयउ हँकारा । आए द्विजन सहित नृपद्वारा ॥

अनुपम बालक देखेन्हि जाई । रूप रासि गुन कहि न सिराई ॥

गुरु वसिष्ठजीके पास बुलावा गया । वे ब्राह्मणोंको साथ लिये राजद्वारपर आये । उन्होंने जाकर अनुपम बालकको देखा, जो रूपकी राशि है और जिसके गुण कहनेसे समाप्त नहीं होते ॥ ४ ॥

दो० - नंदीमुख सराध करि जातकरम सब कीन्ह ।

हाटक धेनु बसन मनि नृप बिप्रन्ह कहँ दीन्ह ॥ १ ९ ३ ॥

फिर राजाने नान्दीमुख श्राद्ध करके सब जातकर्म -संस्कार आदि किये और ब्राह्मणोंको सोना, गौ, वस्त्र और मणियोंका दान दिया ॥ १ ९ ३ ॥

ध्वज पताक तोरन पुर छावा । कहि न जाइ जेहि भाँति बनावा ॥

सुमनबृष्टि अकास तें होई ॥ ब्रह्मानंद मगन सब लोई ॥

ध्वजा, पताका और तोरणोंसे नगर छा गया । जिस प्रकारसे वह सजाया गया, उसका तो वर्णन ही नहीं हो सकता । आकाशसे फूलोंकी वर्षा हो रही है, सब लोग ब्रह्मानन्दमें मग्न हैं ॥ १ ॥

बूंद बूंद मिलि चलीं लोगाईं । सहज सिंगार किएँ उठि धाईं ॥

कनक कलस मंगल भरि थारा । गावत पैठहिं भूप दुआरा ॥

स्त्रियाँ झुंड- की - झुंड मिलकर चलीं । स्वाभाविक शृंगार किये ही वे उठ दौड़ीं । सोनेका कलश लेकर और थालोंमें मङ्गल द्रव्य भरकर गाती हुई राजद्वारमें प्रवेश करती हैं ॥२ ॥

करि आरति नेवछावरि करहीं । बार बार सिसु चरनन्हि परहीं ॥

मागध सूत बंदिगन गायक । पावन गुन गावहिं रघुनायक ॥

वे आरती करके निछावर करती हैं और बार- बार बच्चेके चरणोंपर गिरती हैं । मागध, सूत, वन्दीजन और गवैये रघुकुलके स्वामीके पवित्र गुणोंका गान करते हैं ॥३ ॥

पृष्ठ 197

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* बालकाण्ड * १ ९५

सर्बस दान दीन्ह सब काहू । जेहिं पावा राखा नहिं ताहू ॥

मृगमद चंदन कुंकुम कीचा । मची सकल बीथिन्ह बिच बीचा ॥

राजाने सब किसीको भरपूर दान दिया । जिसने पाया उसने भी नहीं रखा ( लुटा दिया ) ।

[ नगरकी ] सभी गलियोंके बीच- बीचमें कस्तूरी, चन्दन और केसरकी कीच मच गयी ॥ ४ ॥

दो० – गृह गृह बाज बधाव सुभ प्रगटे सुषमा कंद ।

हरषवंत सब जहँ तहँ नगर नारि नर बूंद ॥ १ ९४ ॥

घर- घर मङ्गलमय बधावा बजने लगा, क्योंकि शोभाके मूल भगवान् प्रकट हुए हैं । नगरके स्त्री- पुरुषोंके झुंड - के - झुंड जहाँ- तहाँ आनन्दमग्न हो रहे हैं ॥१ ९४ ॥

कैकयसुता सुमित्रा दोऊ । सुंदर सुत जनमत भैं ओऊ ॥

वह सुख संपति समय समाजा । कहि न सकइ सारद अहिराजा ॥

कैकेयी और सुमित्रा –इन दोनोंने भी सुन्दर पुत्रोंको जन्म दिया । उस सुख, सम्पत्ति, समय और समाजका वर्णन सरस्वती और सर्पोंके राजा शेषजी भी नहीं कर सकते ॥ १ ॥

अवधपुरी सोहइ एहि भाँती । प्रभुहि मिलन आई जनु राती ॥

देखि भानु जनु मन सकुचानी । तदपि बनी संध्या अनुमानी ॥

अवधपुरी इस प्रकार सुशोभित हो रही है, मानो रात्रि प्रभुसे मिलने आयी हो और सूर्यको देखकर मानो मनमें सकुचा गयी हो, परन्तु फिर भी मनमें विचारकर वह मानो सन्ध्या बन [ कर रह ] गयी हो ॥२ ॥

अगर धूप बहु जनु अँधिआरी । उड़इ अबीर मनहुँ अरुनारी ॥

मंदिर मनि समूह जनु तारा । नृप गृह कलस सो इंदु उदारा ॥

अगरकी धूपका बहुत-सा धुआँ मानो [सन्ध्याका ] अन्धकार है और जो अबीर उड़ रहा है, वह उसकी ललाई है । महलोंमें जो मणियोंके समूह हैं, वे मानो तारागण हैं । राजमहलका जो कलश है, वही मानो श्रेष्ठ चन्द्रमा है ॥३ ॥

भवन बेदधुनि अति मृदु बानी । जनु खग मुखर समयँ जनु सानी ॥

कौतुक देखि पतंग भुलाना । एक मास तेइँ जात न जाना ॥

राजभवनमें जो अति कोमल वाणीसे वेदध्वनि हो रही है, वही मानो समयसे( समयानुकूल ) सनी हुई पक्षियोंकी चहचहाहट है । यह कौतुक देखकर सूर्य भी [ अपनी चाल ] भूल गये । एक महीना उन्होंने जाता हुआ न जाना ( अर्थात् उन्हें एक महीना वहीं बीत गया ) ॥४ ॥

दो० - मास दिवस कर दिवस भा मरम न जानइ कोइ ।

रथ समेत रबि थाकेउ निसा कवन बिधि होइ ॥ ९९५ ॥

पृष्ठ 198

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* *१ ९ ६ रामचरितमानस महीनेभरका दिन हो गया । इस रहस्यको कोई नहीं जानता । सूर्य अपने रथसहित वहीं रुक गये, फिर रात किस तरह होती ॥ १ ९५ ॥

यह रहस्य काहूँ नहिं जाना । दिनमनि चले करत गुनगाना ॥

देखि महोत्सव सुर मुनि नागा । चले भवन बरनत निज भागा ॥

यह रहस्य किसीने नहीं जाना । सूर्यदेव [ भगवान् श्रीरामजीका ] गुणगान करते हुए चले । यह महोत्सव देखकर देवता, मुनि और नाग अपने भाग्यकी सराहना करते हुए अपने - अपने घर चले ॥१ ॥

औरउ एक कहउँ निज चोरी । सुनु गिरिजा अति दृढ़ मति तोरी ॥

काकभुसुंडि संग हम दोऊ ॥ मनुजरूप जानइ नहिं कोऊ ॥

हे पार्वती! तुम्हारी बुद्धि [ श्रीरामजीके चरणोंमें ] बहुत दृढ़ है, इसलिये मैं और भी अपनी एक चोरी ( छिपाव ) की बात कहता हूँ, सुनो । काकभुशुण्डि और मैं दोनों वहाँ साथ-साथ थे, परन्तु मनुष्यरूपमें होनेके कारण हमें कोई जान न सका ॥२ ॥

बीथिन्ह फिरहिं मगन मन भूले ॥परमानंद प्रेम सुख फूले ।

यह सुभ चरित जान पै सोई । कृपा राम कै जापर होई ॥

परम आनन्द और प्रेमके सुखमें फूले हुए हम दोनों मगन मनसे ( मस्त हुए ) गलियोंमें [तन- मनकी सुधि ] भूले हुए फिरते थे । परन्तु यह शुभ चरित्र वही जान सकता है, जिसपर श्रीरामजीकी कृपा हो ॥३ ॥

तेहि अवसर जो जेहि बिधि आवा । दीन्ह भूप जो जेहि मन भावा ॥

गज रथ तुरग हेम गो हीरा । दीन्हे नृप नानाबिधि चीरा ॥

उस अवसरपर जो जिस प्रकार आया और जिसके मनको जो अच्छा लगा, राजाने उसे वही दिया । हाथी, रथ, घोड़े, सोना, गौएँ, हीरे और भाँति - भाँतिके वस्त्र राजाने दिये ॥४ ॥

दो० –- मन संतोषे सबन्हि के जहँ तहँ देहिं असीस ।

सकल तनय चिर जीवहुँ तुलसिदास के ईस ॥ १ ९ ६ ॥

राजाने सबके मनको सन्तुष्ट किया । [इसीसे ] सब लोग जहाँ - तहाँ आशीर्वाद दे रहे थे कि तुलसीदासके स्वामी सब पुत्र ( चारों राजकुमार ) चिरजीवी ( दीर्घायु ) हों ॥१ ९ ६ ॥

कछुक दिवस बीते एहि भाँती । जात न जानिअ दिन अरु राती ॥

नामकरन कर अवसरु जानी । भूप बोलि पठए मुनि ग्यानी ॥

इस प्रकार कुछ दिन बीत गये । दिन और रात जाते हुए जान नहीं पड़ते । तब नामकरण-संस्कारका समय जानकर राजाने ज्ञानी मुनि श्रीवसिष्ठजीको बुला भेजा ॥१ ॥

पृष्ठ 199

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* बालकाण्ड * १ ९७

करि पूजा भूपति अस भाषा । धरिअ नाम जो मुनि गुनि राखा ॥

इन्ह के नाम अनेक अनूपा । मैं नृप कहब स्वमति अनुरूपा ॥

मुनिकी पूजा करके राजाने कहा –हे मुनि! आपने मनमें जो विचार रखे हों, वे नाम रखिये । [ मुनिने कहा- ] हे राजन्! इनके अनेक अनुपम नाम हैं, फिर भी मैं अपनी बुद्धिके अनुसार कहूँगा ॥२ ॥

जो आनंद सिंधु सुखरासी । सीकर तें त्रैलोक सुपासी ॥

सो सुखधाम राम अस नामा । अखिल लोक दायक बिश्रामा ॥

ये जो आनन्दके समुद्र और सुखकी राशि हैं, जिस ( आनन्दसिन्धु ) के एक कणसे तीनों लोक सुखी होते हैं, उन ( आपके सबसे बड़े पुत्र) का नाम ' राम ' है, जो सुखका भवन और सम्पूर्ण लोकोंको शान्ति देनेवाला है ॥३ ॥

बिस्व भरन पोषन कर जोई । ताकर नाम भरत अस होई ॥

जाके सुमिरन तें रिपु नासा । नाम सत्रुहन बेद प्रकासा ॥

जो संसारका भरण- पोषण करते हैं, उन ( आपके दूसरे पुत्र ) का नाम ' भरत' होगा । जिनके स्मरणमात्रसे शत्रुका नाश होता है, उनका वेदोंमें प्रसिद्ध ' शत्रुघ्न' नाम है ॥४ ॥

दो० — लच्छन धाम राम प्रिय सकल जगत आधार ।

गुरु बसिष्ट तेहि राखा लछिमन नाम उदार ॥१ ९७ ॥

जो शुभ लक्षणोंके धाम, श्रीरामजीके प्यारे और सारे जगत्के आधार हैं, गुरु वसिष्ठजीने उनका 'लक्ष्मण' ऐसा श्रेष्ठ नाम रखा ॥ १ ९७ ॥

धरे नाम गुर हृदयँ बिचारी । बेद तत्व नृप तव सुत चारी ॥

मुनि धन जन सरबस सिव प्राना । बाल केलि रस तेहिं सुख माना ॥

गुरुजीने हृदयमें विचारकर ये नाम रखे [और कहा- ] हे राजन्! तुम्हारे चारों पुत्र वेदके तत्त्व ( साक्षात् परात्पर भगवान्) हैं । जो मुनियोंके धन, भक्तोंके सर्वस्व और शिवजीके प्राण हैं, उन्होंने [इस समय तुम लोगोंके प्रेमवश] बाललीलाके रसमें सुख माना है ॥१ ॥

बारेहि ते निज हित पति जानी । लछिमन राम चरन रति मानी ॥

भरत सत्रुहन दूनउ भाई । प्रभु सेवक जसि प्रीति बड़ाई ॥

बचपनसे ही श्रीरामचन्द्रजीको अपना परम हितैषी स्वामी जानकर लक्ष्मणजीने उनके चरणोंमें प्रीति जोड़ ली । भरत और शत्रुघ्न दोनों भाइयोंमें स्वामी और सेवककी जिस प्रीतिकी प्रशंसा है वैसी प्रीति हो गयी ॥२ ॥

पृष्ठ 200

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* * १ ९८ रामचरितमानस

स्याम गौर सुंदर दोउ जोरी । निरखहिं छबि जननीं तृन तोरी ॥

चारिउ सील रूप गुन धामा । तदपि अधिक सुखसागर रामा ॥

श्याम और गौर शरीरवाली दोनों सुन्दर जोड़ियोंकी शोभाको देखकर माताएँ तृण तोड़ती हैं [जिसमें दीठ न लग जाय ] । यों तो चारों ही पुत्र शील, रूप और गुणके धाम हैं, तो भी सुखके समुद्र श्रीरामचन्द्रजी सबसे अधिक हैं ॥ ३ ॥

हृदयँ अनुग्रह इंदु प्रकासा । सूचत किरन मनोहर हासा ॥

कबहुँ उछंग कबहुँ बर पलना । मातु दुलारइ कहि प्रिय ललना ॥

उनके हृदयमें कृपारूपी चन्द्रमा प्रकाशित है । उनकी मनको हरनेवाली हँसी उस ( कृपारूपी चन्द्रमा ) की किरणोंको सूचित करती है । कभी गोदमें [ लेकर ] और कभी उत्तम पालनेमें [ लिटाकर ] माता ' प्यारे ललना! ' कहकर दुलार करती है ॥४ ॥

दो० – ब्यापक ब्रह्म निरंजन निर्गुन बिगत बिनोद ।

सो अज प्रेम भगति बस कौसल्या कें गोद ॥ १ ९८ ॥

जो सर्वव्यापक, निरञ्जन ( मायारहित), निर्गुण, विनोदरहित और अजन्मा ब्रह्म हैं, वही प्रेम और भक्तिके वश कौसल्याजीकी गोदमें [खेल रहे ] हैं ॥ १ ९८ ॥

काम कोटि छबि स्याम सरीरा । नील कंज बारिद गंभीरा ॥

अरुन चरन पंकज नख जोती । कमल दलन्हि बैठे जनु मोती ॥

उनके नील कमल और गम्भीर ( जलसे भरे हुए ) मेघके समान श्याम शरीरमें करोड़ों कामदेवोंकी शोभा है । लाल-लाल चरणकमलोंके नखोंकी [ शुभ्र ] ज्योति ऐसी मालूम होती है जैसे [लाल] कमलके पत्तोंपर मोती स्थिर हो गये हों ॥१ ॥

रेख कुलिस ध्वज अंकुस सोहे । नूपुर धुनि सुनि मुनि मन मोहे ॥

कटि किंकिनी उदर त्रय रेखा । नाभि गभीर जान जेहिं देखा ॥

[ चरणतलोंमें ] वज्र, ध्वजा और अङ्कुशके चिह्न शोभित हैं । नूपुर ( पैंजनी ) की ध्वनि सुनकर मुनियोंका भी मन मोहित हो जाता है । कमरमें करधनी और पेटपर तीन रेखाएँ ( त्रिवली ) हैं । नाभिकी गम्भीरताको तो वही जानते हैं जिन्होंने उसे देखा है ॥ २ ॥

भुज बिसाल भूषन जुत भूरी । हियँ हरि नख अति सोभा रूरी ॥

उर मनिहार पदिक की सोभा । बिप्र चरन देखत मन लोभा ॥

बहुत - से आभूषणोंसे सुशोभित विशाल भुजाएँ हैं । हृदयपर बाघके नखकी बहुत ही निराली छटा है । छातीपर रत्नोंसे युक्त मणियोंके हारकी शोभा और ब्राह्मण ( भृगु) के चरणचिह्नको देखते ही मन लुभा जाता है ॥३ ॥