श्रीरामचरितमानस — पृष्ठ 201–210
श्रीरामचरितमानस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 201–210
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* बालकाण्ड * १ ९९
कंबु कंठ अति चिबुक सुहाई । आनन अमित मदन छबि छाई ॥
दुइ दुइ दसन अधर अरुनारे । नासा तिलक को बरनै पारे ॥
कण्ठ शङ्खके समान ( उतार-चढ़ाववाला, तीन रेखाओंसे सुशोभित ) है और ठोड़ी बहुत ही सुन्दर है । मुखपर असंख्य कामदेवोंकी छटा छा रही है । दो - दो सुन्दर दँतुलियाँ हैं, लाल- लाल ओठ हैं । नासिका और तिलक [के सौन्दर्य] का तो वर्णन ही कौन कर सकता है ॥४ ॥
सुंदर श्रवन सुचारु कपोला । अति प्रिय मधुर तोतरे बोला ॥
चिक्कन कच कुंचित गभुआरे । बहु प्रकार रचि मातु सँवारे ॥
सुन्दर कान और बहुत ही सुन्दर गाल हैं, मधुर तोतले शब्द बहुत ही प्यारे लगते हैं । जन्मके समयसे रखे हुए चिकने और घुँघराले बाल हैं, जिनको माताने बहुत प्रकारसे बनाकर सँवार दिया है ॥५ ॥
पीत झगुलिआ तनु पहिराई । जानु पानि बिचरनि मोहि भाई ॥
रूप सकहिं नहिं कहि श्रुति सेषा । सो जानइ सपनेहुँ जेहिं देखा ॥
शरीरपर पीली झँगुली पहनायी हुई है । उनका घुटनों और हाथोंके बल चलना मुझे बहुत ही प्यारा लगता है । उनके रूपका वर्णन वेद और शेषजी भी नहीं कर सकते । उसे वही जानता है जिसने कभी स्वप्नमें भी देखा हो ॥ ६ ॥
दो० – सुख संदोह मोहपर ग्यान गिरा गोतीत ।
दंपति परम प्रेम बस कर सिसुचरित पुनीत ॥ १ ९९ ॥
जो सुखके पुञ्ज, मोहसे परे तथा ज्ञान, वाणी और इन्द्रियोंसे अतीत हैं, वे भगवान् दशरथ- कौसल्याके अत्यन्त प्रेमके वश होकर पवित्र बाललीला करते हैं ॥ १ ९९ ॥
एहि बिधि राम जगत पितु माता । कोसलपुर बासिन्ह सुखदाता ॥
जिन्ह रघुनाथ चरन रति मानी । तिन्ह की यह गति प्रगट भवानी ॥
इस प्रकार [ सम्पूर्ण ] जगत्के माता- पिता श्रीरामजी अवधपुरके निवासियोंको सुख देते हैं । जिन्होंने श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंमें प्रीति जोड़ी है, हे भवानी! उनकी यह प्रत्यक्ष गति है [ कि भगवान् उनके प्रेमवश बाललीला करके उन्हें आनन्द दे रहे हैं ] ॥ १ ॥
रघुपति बिमुख जतन कर कोरी । कवन सकइ भव बंधन छोरी ॥
जीव चराचर बस कै राखे । सो माया प्रभु सों भय भाखे ॥
श्रीरघुनाथजीसे विमुख रहकर मनुष्य चाहे करोड़ों उपाय करे, परन्तु उसका संसारबन्धन कौन छुड़ा सकता है । जिसने सब चराचर जीवोंको अपने वशमें कर रखा है, वह माया भी प्रभुसे भय खाती है ॥२ ॥
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* *२०० रामचरितमानस
भृकुटि बिलास नचावइ ताही । अस प्रभु छाड़ि भजिअ कहु काही ।
मन क्रम बचन छाड़ि चतुराई । भजत कृपा करिहहिं रघुराई ॥
भगवान् उस मायाको भौंहके इशारेपर नचाते हैं । ऐसे प्रभुको छोड़कर कहो, [ और ] किसका भजन किया जाय । मन, वचन और कर्मसे चतुराई छोड़कर भजते ही श्रीरघुनाथजी कृपा करेंगे ॥३ ॥
एहि बिधि सिसुबिनोद प्रभु कीन्हा । सकल नगरबासिन्ह सुख दीन्हा ॥
लै उछंग कबहुँक हलरावै । कबहुँ पालने घालि झुलावै ॥
इस प्रकारसे प्रभु श्रीरामचन्द्रजीने बालक्रीड़ा की और समस्त नगरनिवासियोंको सुख दिया । कौसल्याजी कभी उन्हें गोदमें लेकर हिलाती-डुलाती और कभी पालनेमें लिटाकर झुलाती थीं ॥ ४ ॥
दो० –प्रेम मगन कौसल्या निसि दिन जात न जान ।
सुत सनेह बस माता बालचरित कर गान ॥२०० ॥
प्रेममें मग्न कौसल्याजी रात और दिनका बीतना नहीं जानती थीं । पुत्रके स्नेहवश माता उनके बालचरित्रोंका गान किया करतीं ॥ २०० ॥
एक बार जननीं अन्हवाए । करि सिंगार पलनाँ पौढ़ाए ॥
निज कुल इष्टदेव भगवाना । पूजा हेतु कीन्ह अस्नाना ॥
एक बार माताने श्रीरामचन्द्रजीको स्नान कराया और शृंगार करके पालनेपर पौढ़ा दिया । फिर अपने कुलके इष्टदेव भगवान्की पूजाके लिये स्नान किया ॥१ ॥
करि पूजा नैबेद्य चढ़ावा । आपु गई जहँ पाक बनावा ॥
बहुरि मातु तहवाँ चलि आई । भोजन करत देख सुत जाई ॥
पूजा करके नैवेद्य चढ़ाया और स्वयं वहाँ गयी, जहाँ रसोई बनायी गयी थी । फिर माता वहीं ( पूजाके स्थानमें ) लौट आयी, और वहाँ आनेपर पुत्रको [ इष्टदेव भगवान्के लिये चढ़ाये हुए नैवेद्यका ] भोजन करते देखा ॥ २ ॥
गै जननी सिसु पहिं भयभीता । देखा बाल तहाँ पुनि सूता ॥
बहुरि आइ देखा सुत सोई । हृदयँ कंप मन धीर न होई ॥
माता भयभीत होकर ( पालनेमें सोया था, यहाँ किसने लाकर बैठा दिया, इस बातसे डरकर ) पुत्रके पास गयी, तो वहाँ बालकको सोया हुआ देखा । फिर [ पूजास्थानमें लौटकर ] देखा कि वही पुत्र वहाँ [ भोजन कर रहा ] है । उनके हृदयमें कम्प होने लगा और मनको धीरज नहीं होता ॥ ३ ॥
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* बालकाण्ड * २०१
इहाँ उहाँ दुइ बालक देखा । मतिभ्रम मोर कि आन बिसेषा ॥
देखि राम जननी अकुलानी । प्रभु हँसि दीन्ह मधुर मुसुकानी ॥
[ वह सोचने लगी कि ] यहाँ और वहाँ मैंने दो बालक देखे । यह मेरी बुद्धिका भ्रम है या और कोई विशेष कारण है? प्रभु श्रीरामचन्द्रजीने माताको घबड़ायी हुई देखकर मधुर मुसकानसे हँस दिया ॥४ ॥
दो० –- देखरावा मातहि निज अद्भुत रूप अखंड ।
रोम रोम प्रति लागे कोटि कोटि ब्रह्मंड ॥ २०१ ॥
फिर उन्होंने माताको अपना अखण्ड अद्भुत रूप दिखलाया, जिसके एक-एक रोममें करोड़ों ब्रह्माण्ड लगे हुए हैं ॥ २०१ ॥
अगनित रबि ससि सिव चतुरानन । बहु गिरि सरित सिंधु महि कानन ॥
काल कर्म गुन ग्यान सुभाऊ । सोउ देखा जो सुना न काऊ ॥
अगणित सूर्य, चन्द्रमा, शिव, ब्रह्मा, बहुत-से पर्वत, नदियाँ, समुद्र, पृथ्वी, वन, काल, कर्म,
गुण, ज्ञान और स्वभाव देखे । और वे पदार्थ भी देखे जो कभी सुने भी न थे ॥१ ॥
देखी माया सब बिधि गाढ़ी । अति सभीत जोरें कर ठाढ़ी ॥
देखा जीव नचावइनचावइ जाहीजाही ।। देखीदेखी भगति जो छोरइ ताही ॥
सब प्रकारसे बलवती मायाको देखा कि वह [ भगवान्के सामने ] अत्यन्त भयभीत हाथ जोड़े खड़ी है । जीवको देखा, जिसे वह माया नचाती है और [फिर ] भक्तिको देखा, जो उस जीवको [ मायासे ] छुड़ा देती है ॥२ ॥
तन पुलकित मुख बचन न आवा । नयन मूदि चरननि सिरु नावा ॥
भए बहुरि सिसुरूप खरारी ॥बिसमयवंत देखि महतारी । [ माताका ] शरीर पुलकित हो गया, मुखसे वचन नहीं निकलता । तब आँखें मूँदकर उसने श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंमें सिर नवाया । माताको आश्चर्यचकित देखकर खरके शत्रु श्रीरामजी फिर बालरूप हो गये ॥ ३ ॥
अस्तुति करि न जाइ भय माना । जगत पिता मैं सुत करि जाना ॥
हरि जननी बहुबिधि समुझाई । यह जनि कतहुँ कहसि सुनु माई ॥
[ मातासे ] स्तुति भी नहीं की जाती । वह डर गयी कि मैंने जगत्पिता परमात्माको पुत्र करके जाना । श्रीहरिने माताको बहुत प्रकारसे समझाया [और कहा- ] हे माता! सुनो, यह बात कहींपर कहना नहीं ॥४ ॥
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* *२०२ रामचरितमानस
दो० –- बार बार कौसल्या बिनय करइ कर जोरि ।
अब जनि कबहूँ ब्यापै प्रभु मोहि माया तोरि ॥ २०२ ॥
कौसल्याजी बार- बार हाथ जोड़कर विनय करती हैं कि हे प्रभो! मुझे आपकी माया अब कभी न व्यापे ॥ २०२ ॥
बालचरित हरि बहुबिधि कीन्हा । अति अनंद दासन्ह कहँ दीन्हा ॥
कछुक काल बीतें सब भाई । बड़े भए परिजन सुखदाई ॥
भगवान्ने बहुत प्रकारसे बाललीलाएँ कीं और अपने सेवकोंको अत्यन्त आनन्द दिया । कुछ समय बीतनेपर चारों भाई बड़े होकर कुटुम्बियोंको सुख देनेवाले हुए॥१ ॥
चूड़ाकरन कीन्ह गुरु जाई । बिप्रन्ह पुनि दछिना बहु पाई ॥
परम मनोहर चरित अपारा । करत फिरत चारिउ सुकुमारा ॥
तब गुरुजीने जाकर चूड़ाकर्म-संस्कार किया । ब्राह्मणोंने फिर बहुत-सी दक्षिणा पायी । चारों सुन्दर राजकुमार बड़े ही मनोहर अपार चरित्र करते फिरते हैं ॥२ ॥
मन क्रम बचन अगोचर जोई । दसरथ अजिर बिचर प्रभु सोई ॥
भोजन करत बोल जब राजा । नहिं आवत तजि बाल समाजा ॥
जो मन, वचन और कर्मसे अगोचर हैं, वही प्रभु दशरथजीके आँगनमें विचर रहे हैं । भोजन करनेके समय जब राजा बुलाते हैं, तब वे अपने बालसखाओंके समाजको छोड़कर नहीं आते ॥३ ॥
कौसल्या जब बोलन जाई । ठुमुकु ठुमुकु प्रभु चलहिं पराई ॥
निगम नेति सिव अंत न पावा । ताहि धेरै जननी हठि धावा ॥
कौसल्याजी जब बुलाने जाती हैं, तब प्रभु ठुमुक-ठुमुक भाग चलते हैं । जिनका वेद ' नेति ' ( इतना ही नहीं ) कहकर निरूपण करते हैं और शिवजीने जिनका अन्त नहीं पाया, माता उन्हें हठपूर्वक पकड़नेके लिये दौड़ती हैं ॥४ ॥
धूसर धूरि भरें तनु आए । भूपति बिहसि गोद बैठाए ॥
वे शरीरमें धूल लपेटे हुए आये और राजाने हँसकर उन्हें गोदमें बैठा लिया ॥५ ॥
दो० – भोजन करत चपल चित इत उत अवसरु पाइ ।
भाजि चले किलकत मुख दधि ओदन लपटाइ ॥ २०३ ॥
भोजन करते हैं पर चित्त चञ्चल है । अवसर पाकर मुँहमें दही- भात लपटाये किलकारी मारते हुए इधर-उधर भाग चले ॥ २०३ ॥
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* बालकाण्ड * २०३
बालचरित अति सरल सुहाए । सारद सेष संभु श्रुति गाए ॥
जिन्ह कर मन इन्ह सन नहिं राता । ते जन बंचित किए बिधाता ॥
श्रीरामचन्द्रजीकी बहुत ही सरल ( भोली ) और सुन्दर ( मनभावनी ) बाललीलाओंका सरस्वती, शेषजी, शिवजी और वेदोंने गान किया है । जिनका मन इन लीलाओंमें अनुरक्त नहीं हुआ, विधाताने उन मनुष्योंको वञ्चित कर दिया ( नितान्त भाग्यहीन बनाया ) ॥१ ॥
भए कुमार जबहिं सब भ्राता । दीन्ह जनेऊ गुरु पितु माता ॥
। अलप काल बिद्या सब आई ॥ गुरगृहँ गए पढ़न रघुराई ज्यों ही सब भाई कुमारावस्थाके हुए, त्यों ही गुरु, पिता और माताने उनका यज्ञोपवीत संस्कार कर दिया । श्रीरघुनाथजी [ भाइयोंसहित ] गुरुके घरमें विद्या पढ़ने गये और थोड़े ही समयमें उनको सब विद्याएँ आ गयीं ॥२ ॥
जाकी सहज स्वास श्रुति चारी । सो हरि पढ़ यह कौतुक भारी ॥
बिद्या बिनय निपुन गुन सीला । खेलहिं खेल सकल नृप लीला ॥
चारों वेद जिनके स्वाभाविक श्वास हैं, वे भगवान् पढ़ें, यह बड़ा कौतुक ( अचरज ) है । चारों भाई विद्या, विनय, गुण और शीलमें [ बड़े ] निपुण हैं और सब राजाओंकी लीलाओंके ही खेल खेलते हैं ॥ ३ ॥
करतल बान धनुष अति सोहा । देखत रूप चराचर मोहा ॥
जिन्ह बीथिन्ह बिहरहिं सब भाई । थकित होहिं सब लोग लुगाई ॥
हाथोंमें बाण और धनुष बहुत ही शोभा देते हैं । रूप देखते ही चराचर ( जड- चेतन) मोहित हो जाते हैं । वे सब भाई जिन गलियोंमें खेलते [ हुए निकलते ] हैं, उन गलियोंके सभी स्त्री-श्री- पुरुष उनको देखकर स्नेहसे शिथिल हो जाते हैं अथवा ठिठककर रह जाते हैं ॥४ ॥
दो०– कोसलपुर बासी नर नारि बृद्ध अरु बाल ।
प्रानहु ते प्रिय लागत सब कहुँ राम कृपाल ॥२०४ ॥
कोसलपुरके रहनेवाले स्त्री, पुरुष, बूढ़े और बालक सभीको कृपालु श्रीरामचन्द्रजी प्राणोंसे भी बढ़कर प्रिय लगते हैं ॥२०४ ॥
बंधु सखा सँग लेहिं बोलाई । बन मृगया नित खेलहिं जाई ॥
पावन मृग मारहिं जियँ जानी । दिन प्रति नृपहि देखावहिं आनी ॥
श्रीरामचन्द्रजी भाइयों और इष्ट मित्रोंको बुलाकर साथ ले लेते हैं और नित्य वनमें जाकर शिकार खेलते हैं । मनमें पवित्र समझकर मृगोंको मारते हैं और प्रतिदिन लाकर राजा ( दशरथजी ) को दिखलाते हैं ॥१ ॥
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* *२०४ रामचरितमानस
जे मृग राम बान के मारे । ते तनु तजि सुरलोक सिधारे ॥
अनुज सखा सँग भोजन करहीं । मातु पिता अग्या अनुसरहीं ॥
जो मृग श्रीरामजीके बाणसे मारे जाते थे, वे शरीर छोड़कर देवलोकको चले जाते थे । श्रीरामचन्द्रजी अपने छोटे भाइयों और सखाओंके साथ भोजन करते हैं और माता- पिताकी आज्ञाका पालन करते हैं ॥ २ ॥
जेहि बिधि सुखी होहिं पुर लोगा । करहिं कृपानिधि सोइ संजोगा ॥
बेद पुरान सुनहिं मन लाई । आपु कहहिं अनुजन्ह समुझाई ॥
जिस प्रकार नगरके लोग सुखी हों, कृपानिधान श्रीरामचन्द्रजी वही संयोग ( लीला ) करते हैं । वे मन लगाकर वेद - पुराण सुनते हैं और फिर स्वयं छोटे भाइयोंको समझाकर कहते हैं ॥ ३ ॥
प्रातकाल उठि कै रघुनाथा । मातु पिता गुरु नावहिं माथा ॥
आयसु मागि करहिं पुर काजा । देखि चरित हरषइ मन राजा ॥
श्रीरघुनाथजी प्रात: काल उठकर माता-पिता और गुरुको मस्तक नवाते हैं और आज्ञा लेकर नगरका काम करते हैं । उनके चरित्र देख-देखकर राजा मनमें बड़े हर्षित होते हैं ॥४ ॥
दो० – ब्यापक अकल अनीह अज निर्गुन नाम न रूप ।
भगत हेतु नाना बिधि करत चरित्र अनूप ॥ २०५ ॥
जो व्यापक, अकल ( निरवयव ), इच्छारहित, अजन्मा और निर्गुण हैं; तथा जिनका न नाम है न रूप, वही भगवान् भक्तोंके लिये नाना प्रकारके अनुपम ( अलौकिक) चरित्र करते हैं ॥ २०५ ॥
यह सब चरित कहा मैं गाई । आगिलि कथा सुनहु मन लाई ॥
बिस्वामित्र महामुनि ग्यानी । बसहिं बिपिन सुभ आश्रम जानी ॥
यह सब चरित्र मैंने गाकर ( बखानकर) कहा । अब आगेकी कथा मन लगाकर सुनो । ज्ञानी महामुनि विश्वामित्रजी वनमें शुभ आश्रम ( पवित्र स्थान ) जानकर बसते थे, ॥१ ॥
जहँ जप जग्य जोग मुनि करहीं । अति मारीच सुबाहुहि डरहीं ॥
देखत जग्य निसाचर धावहिं । करहिं उपद्रव मुनि दुख पावहिं ॥
जहाँ वे मुनि जप, यज्ञ और योग करते थे, परन्तु मारीच और सुबाहुसे बहुत डरते थे । यज्ञ देखते ही राक्षस दौड़ पड़ते थे और उपद्रव मचाते थे, जिससे मुनि [ बहुत ] दुःख पाते थे ॥ २ ॥
गाधितनय मन चिंता ब्यापी । हरि बिनु मरहिं न निसिचर पापी ॥
तब मुनिबर मन कीन्ह बिचारा । प्रभु अवतरेउ हरन महि भारा ॥
गाधिके पुत्र विश्वामित्रजीके मनमें चिन्ता छा गयी कि ये पापी राक्षस भगवान्के [ मारे ] बिना न मरेंगे । तब श्रेष्ठ मुनिने मनमें विचार किया कि प्रभुने पृथ्वीका भार हरनेके लिये अवतार लिया है ॥३ ॥
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* बालकाण्ड * २०५
एहूँ मिस देखौं पद जाई । करि बिनती आनौं दोउ भाई ॥
ग्यान बिराग सकल गुन अयना । सो प्रभु मैं देखब भरि नयना ॥
इसी बहाने जाकर मैं उनके चरणोंका दर्शन करूँ और विनती करके दोनों भाइयोंको ले आऊँ । [ अहा जो ज्ञान, वैराग्य और सब गुणोंके धाम हैं, उन प्रभुको मैं नेत्र भरकर देखूँगा ॥४ ॥
दो० –- बहुबिधि करत मनोरथ जात लागि नहिं बार ।
करि मज्जन सरऊ जल गए भूप दरबार ॥ २०६ ॥
बहुत प्रकारसे मनोरथ करते हुए जानेमें देर नहीं लगी । सरयूजीके जलमें स्नान करके वे राजाके दरवाजेपर पहुँचे ॥ २०६ ॥
मुनि आगमन सुना जब राजा । मिलन गयउ लै बिप्र समाजा ॥
करि दंडवत मुनिहि सनमानी । निज आसन बैठारेन्हि आनी ॥
राजाने जब मुनिका आना सुना, तब वे ब्राह्मणोंके समाजको साथ लेकर मिलने गये और दण्डवत् करके मुनिका सम्मान करते हुए उन्हें लाकर अपने आसनपर बैठाया ॥१ ॥
चरन पखारि कीन्हि अति पूजा । मो सम आजु धन्य नहिं दूजा ॥
बिबिध भाँति भोजन करवावा । मुनिबर हृदयँ हरष अति पावा ॥
चरणोंको धोकर बहुत पूजा की और कहा– मेरे समान धन्य आज दूसरा कोई नहीं है । फिर अनेक प्रकारके भोजन करवाये, जिससे श्रेष्ठ मुनिने अपने हृदयमें बहुत ही हर्ष प्राप्त किया ॥ २ ॥
पुनि चरननि मेले सुत चारी । राम देखि मुनि देह बिसारी ॥
भए मगन देखत मुख सोभा । जनु चकोर पूरन ससि लोभा ॥
फिर राजाने चारों पुत्रोंको मुनिके चरणोंपर डाल दिया ( उनसे प्रणाम कराया ) । श्रीरामचन्द्रजीको देखकर मुनि अपनी देहकी सुधि भूल गये । वे श्रीरामजीके मुखकी शोभा देखते ही ऐसे मग्न हो गये, मानो चकोर पूर्ण चन्द्रमाको देखकर लुभा गया हो ॥ ३ ॥
तब मन हरषि बचन कह राऊ । मुनि अस कृपा न कीन्हिहु काऊ ॥
केहि कारन आगमन तुम्हारा । कहहु सो करत न लावउँ बारा ॥
तब राजाने मनमें हर्षित होकर ये वचन कहे - हे मुनि! इस प्रकार कृपा तो आपने कभी नहीं की । आज किस कारणसे आपका शुभागमन हुआ? कहिये, मैं उसे पूरा करनेमें देर नहीं लगाऊँगा ॥ ४ ॥
असुर समूह सतावहिं मोही । मैं जाचन आयउँ नृप तोही ॥
अनुज समेत देहु रघुनाथा । निसिचर बध मैं होब सनाथा ॥
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* *२०६ रामचरितमानस [ मुनिने कहा— ] हे राजन्! राक्षसोंके समूह मुझे बहुत सताते हैं । इसीलिये मैं तुमसे कुछ माँगने आया हूँ । छोटे भाईसहित श्रीरघुनाथजीको मुझे दो । राक्षसोंके मारे जानेपर मैं सनाथ ( सुरक्षित ) हो जाऊँगा ॥५ ॥
दो० – देहु भूप मन हरषित तजहु मोह अग्यान ।
धर्म सुजस प्रभु तुम्ह कौं इन्ह कहँ अति कल्यान ॥ २०७ ॥
हे राजन्! प्रसन्न मनसे इनको दो, मोह और अज्ञानको छोड़ दो । हे स्वामी! इससे तुमको धर्म और सुयशकी प्राप्ति होगी और इनका परम कल्याण होगा ॥ २०७ ॥
सुनि राजा अति अप्रिय बानी । हृदय कंप मुख दुति कुमुलानी ॥
चौथेंपन पायउँ सुत चारी । बिप्र बचन नहिं कहेहु बिचारी ॥
इस अत्यन्त अप्रिय वाणीको सुनकर राजाका हृदय काँप उठा और उनके मुखकी कान्ति फीकी पड़ गयी । [ उन्होंने कहा- ] हे ब्राह्मण! मैंने चौथेपनमें चार पुत्र पाये हैं, आपने विचारकर बात नहीं कही ॥ १ ॥
मागहु भूमि धेनु धन कोसा । सर्बस देउँ आजु सहरोसा ॥
देह प्रान तें प्रिय कछु नाहीं । सोउ मुनि देउँ निमिष एक माहीं ॥
हे मुनि! आप पृथ्वी, गौ, धन और खजाना माँग लीजिये, मैं आज बड़े हर्षके साथ अपना सर्वस्व दे दूँगा । देह और प्राणसे अधिक प्यारा कुछ भी नहीं होता, मैं उसे भी एक पलमें दे दूँगा ॥२ ॥
सब सुत प्रिय मोहि प्रान कि नाईं । राम देत नहिं बनइ गोसाईं ॥
कहँ निसिचर अति घोर कठोरा । कहँ सुंदर सुत परम किसोरा ॥
सभी पुत्र मुझे प्राणोंके समान प्यारे हैं; उनमें भी हे प्रभो! रामको तो [ किसी प्रकार भी ] देते नहीं बनता । कहाँ अत्यन्त डरावने और क्रूर राक्षस और कहाँ परम किशोर अवस्थाके ( बिलकुल सुकुमार) मेरे सुन्दर पुत्र! ॥३ ॥
सुनि नृप गिरा प्रेम रस सानी । हृदयँ हरष माना मुनि ग्यानी ॥
तब बसिष्ठ बहुबिधि समुझावा । नृप संदेह नास कहँ पावा ॥
प्रेम- रसमें सनी हुई राजाकी वाणी सुनकर ज्ञानी मुनि विश्वामित्रजीने हृदयमें बड़ा हर्ष माना । तब वसिष्ठजीने राजाको बहुत प्रकारसे समझाया, जिससे राजाका सन्देह नाशको प्राप्त हुआ ॥ ४ ॥
अति आदर दोउ तनय बोलाए । हृदयँ लाइ बहु भाँति सिखाए ॥
मेरे प्रान नाथ सुत दोऊ । तुम्ह मुनि पिता आन नहिं कोऊ ॥
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* बालकाण्ड * २०७ राजाने बड़े ही आदरसे दोनों पुत्रोंको बुलाया और हृदयसे लगाकर बहुत प्रकारसे उन्हें शिक्षा दी । [ फिर कहा— ] हे नाथ! ये दोनों पुत्र मेरे प्राण हैं । हे मुनि! [ अब ] आप ही इनके पिता हैं, दूसरा कोई नहीं ॥५ ॥
दो० – सौंपे भूप रिषिहि सुत बहुबिधि देइ असीस ।
जननी भवन गए प्रभु चले नाइ पद सीस ॥ २०८ ( क ) ॥
राजाने बहुत प्रकारसे आशीर्वाद देकर पुत्रोंको ऋषिके हवाले कर दिया । फिर प्रभु माताके महलमें गये और उनके चरणोंमें सिर नवाकर चले ॥ २०८ ( क ) ॥
सो० - पुरुषसिंह दोउ बीर हरषि चले मुनि भय हरन ।
कृपासिंधु मतिधीर अखिल बिस्व कारन करन ॥ २०८ ( ख ) ॥
पुरुषोंमें सिंहरूप दोनों भाई ( राम- लक्ष्मण ) मुनिका भय हरनेके लिये प्रसन्न होकर चले । वे कृपाके समुद्र, धीरबुद्धि और सम्पूर्ण विश्वके कारणके भी कारण हैं ॥ २०८ ( ख ) ॥
अरुन नयन उर बाहु बिसाला । नील जलज तनु स्याम तमाला ॥
कटि पट पीत कसें बर भाथा । रुचिर चाप सायक दुहुँ हाथा ॥
भगवान्के लाल नेत्र हैं, चौड़ी छाती और विशाल भुजाएँ हैं, नील कमल और तमालके वृक्षकी तरह श्याम शरीर है, कमरमें पीताम्बर [ पहने ] और सुन्दर तरकस कसे हुए हैं । दोनों हाथोंमें [क्रमश: ] सुन्दर धनुष और बाण हैं ॥ १ ॥
।स्याम गौर सुंदर दोउ भाई बिस्वामित्र महानिधि पाई ॥
प्रभु ब्रह्मन्यदेव मैं जाना । मोहि निति पिता तजेउ भगवाना ॥
श्याम और गौर वर्णके दोनों भाई परम सुन्दर हैं । विश्वामित्रजीको महान् निधि प्राप्त हो गयी । [ वे सोचने लगे— ] मैं जान गया कि प्रभु ब्रह्मण्यदेव ( ब्राह्मणोंके भक्त) हैं । मेरे लिये भगवान्ने अपने पिताको भी छोड़ दिया ॥२ ॥
चले जात मुनि दीन्हि देखाई । सुनि ताड़का क्रोध करि धाई ॥
एकहिं बान प्रान हरि लीन्हा । दीन जानि तेहि निज पद दीन्हा ॥
मार्गमें चले जाते हुए मुनिने ताड़काको दिखलाया । शब्द सुनते ही वह क्रोध करके दौड़ी । श्रीरामजीने एक ही बाणसे उसके प्राण हर लिये और दीन जानकर उसको निजपद ( अपना दिव्य स्वरूप) दिया ॥ ३ ॥
तब रिषि निज नाथहि जियँ चीन्ही । बिद्यानिधि कहुँ बिद्या दीन्ही ॥
जाते लाग न छुधा पिपासा । अतुलित बल तनु तेज प्रकासा ॥
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* *२०८ रामचरितमानस तब ऋषि विश्वामित्रने प्रभुको मनमें विद्याका भण्डार समझते हुए भी [ लीलाको पूर्ण करनेके लिये ] ऐसी विद्या दी, जिससे भूख- प्यास न लगे और शरीरमें अतुलित बल और तेजका प्रकाश हो ॥ ४ ॥
दो० - आयुध सर्ब समर्पि कै प्रभु निज आश्रम आनि ।
कंद मूल फल भोजन दीन्ह भगति हित जानि ॥ २० ९ ॥
सब अस्त्र- शस्त्र समर्पण करके मुनि प्रभु श्रीरामजीको अपने आश्रममें ले आये; और उन्हें परम हितू जानकर भक्तिपूर्वक कन्द, मूल और फलका भोजन कराया ॥ २० ९ ॥
प्रात कहा मुनि सन रघुराई । निर्भय जग्य करहु तुम्ह जाई ॥
होम करन लागे मुनि झारी । आपु रहे मख कीं रखवारी ॥
सबेरे श्रीरघुनाथजीने मुनिसे कहा- आप जाकर निडर होकर यज्ञ कीजिये । यह सुनकर सब मुनि हवन करने लगे । आप ( श्रीरामजी ) यज्ञकी रखवालीपर रहे ॥१ ॥
सुनि मारीच निसाचर क्रोही । लै सहाय धावा मुनिद्रोही ॥
बिनु फर बान राम तेहि मारा । सत जोजन गा सागर पारा ॥
यह समाचार सुनकर मुनियोंका शत्रु क्रोधी राक्षस मारीच अपने सहायकोंको लेकर दौड़ा । श्रीरामजीने बिना फलवाला बाण उसको मारा, जिससे वह सौ योजनके विस्तारवाले समुद्रके पार जा गिरा ॥ २ ॥
पावक सर सुबाहु पुनि मारा । अनुज निसाचर कटकु सँघारा ॥
मारि असुर द्विज निर्भयकारी । अस्तुति करहिं देव मुनि झारी ॥
फिर सुबाहुको अग्निबाण मारा । इधर छोटे भाई लक्ष्मणजीने राक्षसोंकी सेनाका संहार कर डाला । इस प्रकार श्रीरामजीने राक्षसोंको मारकर ब्राह्मणोंको निर्भय कर दिया । तब सारे देवता और मुनि स्तुति करने लगे ॥३ ॥
तहँ पुनि कछुक दिवस रघुराया । रहे कीन्हि बिप्रन्ह पर दाया ॥
भगति हेतु बहु कथा पुराना । कहे बिप्र जद्यपि प्रभु जाना ॥
श्रीरघुनाथजीने वहाँ कुछ दिन और रहकर ब्राह्मणोंपर दया की । भक्तिके कारण ब्राह्मणोंने उन्हें पुराणोंकी बहुत- सी कथाएँ कहीं, यद्यपि प्रभु सब जानते थे ॥४ ॥
तब मुनि सादर कहा बुझाई । चरित एक प्रभु देखिअ जाई ॥
धनुषजग्य सुनि रघुकुल नाथा । हरषि चले मुनिबर के साथा ॥
तदनन्तर मुनिने आदरपूर्वक समझाकर कहा - हे प्रभो! चलकर एक चरित्र देखिये । रघुकुलके स्वामी श्रीरामचन्द्रजी धनुषयज्ञ [ की बात ] सुनकर मुनिश्रेष्ठ विश्वामित्रजीके साथ प्रसन्न होकर चले ॥ ५ ॥