श्रीरामचरितमानस — पृष्ठ 211–220

श्रीरामचरितमानस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 211–220

पृष्ठ 211

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* बालकाण्ड * २० ९

आश्रम एक दीख मग माहीं । खग मृग जीव जंतु तहँ नाहीं ॥

पूछा मुनिहि सिला प्रभु देखी । सकल कथा मुनि कहा बिसेषी ॥

मार्गमें एक आश्रम दिखायी पड़ा । वहाँ पशु-पक्षी, कोई भी जीव-जन्तु नहीं था । पत्थरकी एक शिलाको देखकर प्रभुने पूछा, तब मुनिने विस्तारपूर्वक सब कथा कही ॥६ ॥

दो० - गौतम नारि श्राप बस उपल देह धरि धीर ।

चरन कमल रज चाहति कृपा करहु रघुबीर ॥ २१० ॥

गौतम मुनिकी स्त्री अहल्या शापवश पत्थरकी देह धारण किये बड़े धीरजसे आपके

चरणकमलोंकी धूलि चाहती है । हे रघुवीर! इसपर कृपा कीजिये ॥ २१० ॥

छं० — परसत पद पावन सोक नसावन प्रगट भई तपपुंज सही ।

देखत रघुनायक जन सुखदायक सनमुख होड़ कर जोरि रही ॥

अति प्रेम अधीरा पुलक सरीरा मुख नहिं आवइ बचन कही ।

अतिसय बड़भागी चरनन्हि लागी जुगल नयन जलधार बही ॥

श्रीरामजीके पवित्र और शोकको नाश करनेवाले चरणोंका स्पर्श पाते ही सचमुच वह तपोमूर्ति अहल्या प्रकट हो गयी । भक्तोंको सुख देनेवाले श्रीरघुनाथजीको देखकर वह हाथ जोड़कर सामने खड़ी रह गयी । अत्यन्त प्रेमके कारण वह अधीर हो गयी । उसका शरीर पुलकित हो उठा; मुखसे वचन कहनेमें नहीं आते थे । वह अत्यन्त बड़भागिनी अहल्या प्रभुके चरणोंसे लिपट गयी और उसके दोनों नेत्रोंसे जल (प्रेम और आनन्दके आँसुओं) की धारा बहने लगी ॥१ ॥

धीरजु मन कीन्हा प्रभु कहुँ चीन्हा रघुपति कृपाँ भगति पाई ।

अति निर्मल बानी अस्तुति ठानी ग्यानगम्य जय रघुराई ॥

मैं नारि अपावन प्रभु जग पावन रावन रिपु जन सुखदाई ।

राजीव बिलोचन भव भय मोचन पाहि पाहि सरनहिं आई ॥

फिर उसने मनमें धीरज धरकर प्रभुको पहचाना और श्रीरघुनाथजीकी कृपासे भक्ति प्राप्त की । तब अत्यन्त निर्मल वाणीसे उसने [इस प्रकार] स्तुति प्रारम्भ की—हे ज्ञानसे जानने योग्य श्रीरघुनाथजी! आपकी जय हो! मैं [ सहज ही ] अपवित्र स्त्री हूँ; और हे प्रभो! आप जगत्को पवित्र करनेवाले, भक्तोंको सुख देनेवाले और रावणके शत्रु हैं । हे कमलनयन! हे संसार (जन्म- मृत्यु ) के भयसे छुड़ानेवाले! मैं आपकी शरण आयी हूँ, [ मेरी ] रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये ॥२ ॥

मुनि श्राप जो दीन्हा अति भल कीन्हा परम अनुग्रह मैं माना ।

देखेउँ भरि लोचन हरि भवमोचन इहइ लाभ संकरजाना ॥

पृष्ठ 212

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* *२१० रामचरितमानस

बिनती प्रभु मोरी मैं मति भोरी नाथ न मागउँ बर आना ।

पद कमल परागा रस अनुरागा मम मन मधुप करै पाना ॥

मुनिने जो मुझे शाप दिया, सो बहुत ही अच्छा किया । मैं उसे अत्यन्त अनुग्रह मानती हूँ कि जिसके कारण मैंने संसारसे छुड़ानेवाले श्रीहरि ( आप) को नेत्र भरकर देखा । इसी ( आपके दर्शन ) को शंकरजी सबसे बड़ा लाभ समझते हैं । हे प्रभो! मैं बुद्धिकी बड़ी भोली हूँ, मेरी एक विनती है । हे नाथ! मैं और कोई वर नहीं माँगती, केवल यही चाहती हूँ कि मेरा मनरूपी भौंरा आपके चरणकमलकी रजके प्रेमरूपी रसका सदा पान करता रहे ॥ ३ ॥

जेहिं पद सुरसरिता परम पुनीता प्रगट भई सिव सीस धरी ।

सोई पद पंकज जेहि पूजत अज मम सिर धरेउ कृपाल हरी ॥

एहि भाँति सिधारी गौतम नारी बार बार हरि चरन परी ।

जो अति मन भावा सो बरु पावा गै पति लोक अनंद भरी ॥

जिन चरणोंसे परमपवित्र देवनदी गङ्गाजी प्रकट हुईं, जिन्हें शिवजीने सिरपर धारण किया और जिन चरणकमलोंको ब्रह्माजी पूजते हैं, कृपालु हरि ( आप ) ने उन्हींको मेरे सिरपर रखा । इस प्रकार [ स्तुति करती हुई ] बार-बार भगवान्‌के चरणोंमें गिरकर, जो मनको बहुत ही अच्छा लगा, उस वरको पाकर गौतमकी स्त्री अहल्या आनन्दमें भरी हुई पतिलोकको चली गयी ॥४ ॥

दो० - अस प्रभु दीनबंधु हरि कारन रहित दयाल ।

तुलसिदास सठ तेहि भजु छाड़ि कपट जंजाल ॥ २११ ॥

प्रभु श्रीरामचन्द्रजी ऐसे दीनबन्धु और बिना ही कारण दया करनेवाले हैं । तुलसीदासजी कहते हैं, हे शठ [ मन ]! तू कपट- जंजाल छोड़कर उन्हींका भजन कर ॥ २११ ॥

मासपारायण, सातवाँ विश्राम

चले राम लछिमन मुनि संगा । गए जहाँ जग पावनि गंगा ॥

गाधिसूनु सब कथा सुनाई । जेहि प्रकार सुरसरि महि आई ॥

श्रीरामजी और लक्ष्मणजी मुनिके साथ चले । वे वहाँ गये, जहाँ जगत्‌को पवित्र करनेवाली गङ्गाजी थीं । महाराज गाधिके पुत्र विश्वामित्रजीने वह सब कथा कह सुनायी जिस प्रकार देवनदी गङ्गाजी पृथ्वीपर आयी थीं ॥१ ॥

तब प्रभु रिषिन्ह समेत नहाए । बिबिध दान महिदेवन्हि पाए ॥

हरषि चले मुनि बूंद सहाया । बेगि बिदेह नगर निअराया ॥

पृष्ठ 213

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* बालकाण्ड * २११ तब प्रभुने ऋषियोंसहित [गङ्गाजीमें ] स्नान किया । ब्राह्मणोंने भाँति - भाँतिके दान पाये । फिर मुनिवृन्दके साथ वे प्रसन्न होकर चले और शीघ्र ही जनकपुरके निकट पहुँच गये ॥२ ॥

पुर रम्यता राम जब देखी । हरषे अनुज समेत बिसेषी ॥

बापीं कूप सरित सर नाना । सलिल सुधासम मनि सोपाना ॥

श्रीरामजीने जब जनकपुरकी शोभा देखी, तब वे छोटे भाई लक्ष्मणसहित अत्यन्त हर्षित हुए । वहाँ अनेकों बावलियाँ, कुएँ, नदी और तालाब हैं, जिनमें अमृतके समान जल है और मणियोंकी सीढ़ियाँ [ बनी हुई ] हैं ॥३ ॥

गुंजत मंजु मत्त रस भृंगा । कूजत कल बहुबरन बिहंगा ॥

बरन बरन बिकसे बनजाता । त्रिबिध समीर सदा सुखदाता ॥

मकरन्द-रससे मतवाले होकर भौरे सुन्दर गुंजार कर रहे हैं । रंग- बिरंगे [ बहुत- से ] पक्षी मधुर शब्द कर रहे हैं । रंग- रंगके कमल खिले हैं । सदा ( सब ऋतुओंमें ) सुख देनेवाला शीतल, मन्द, सुगन्ध पवन बह रहा है ॥४ ॥

दो० - सुमन बाटिका बाग बन बिपुल बिहंग निवास ।

फूलत फलत सुपल्लवत सोहत पुर चहुँ पास ॥ २१२ ॥

पुष्पवाटिका ( फुलवारी ), बाग और वन, जिनमें बहुत-से पक्षियोंका निवास है, फूलते, फलते और सुन्दर पत्तोंसे लदे हुए नगरके चारों ओर सुशोभित हैं ॥२१२ ॥

बनइ न बरनत नगर निकाई । जहाँ जाइ मन तहँइँ लोभाई ॥

चारु बजारु बिचित्र अंबारी । मनिमय बिधि जनु स्वकर सँवारी ॥

नगरकी सुन्दरताका वर्णन करते नहीं बनता । मन जहाँ जाता है; वहीं लुभा जाता ( रम जाता ) है । सुन्दर बाजार है, मणियोंसे बने हुए विचित्र छज्जे हैं, मानो ब्रह्माने उन्हें अपने हाथोंसे बनाया है ॥१ ॥

धनिक बनिक बर धनद समाना । बैठे सकल बस्तु लै नाना ॥

चौहट सुंदर गलीं सुहाई । संतत रहहिं सुगंध सिंचाई ॥

कुबेरके समान श्रेष्ठ धनी व्यापारी सब प्रकारकी अनेक वस्तुएँ लेकर [ दूकानोंमें ] बैठे हैं । सुन्दर चौराहे और सुहावनी गलियाँ सदा सुगन्धसे सिंची रहती हैं ॥२ ॥

मंगलमय मंदिर सब केरें । चित्रित जनु रतिनाथ चितेरें ॥

पुर नर नारि सुभग सुचि संता । धरमसील ग्यानी गुनवंता ॥

सबके घर मङ्गलमय हैं और उनपर चित्र कढ़े हुए हैं, जिन्हें मानो कामदेवरूपी चित्रकारने अंकित किया है । नगरके [ सभी ] स्त्री - पुरुष सुन्दर, पवित्र, साधु -स्वभाववाले, धर्मात्मा, ज्ञानी और गुणवान् हैं ॥ ३ ॥

पृष्ठ 214

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* *२१२ रामचरितमानस

अति अनूप जहँ जनक निवासू । बिथकहिं बिबुध बिलोकि बिलासू॥

होत चकित चित कोट बिलोकी । सकल भुवन सोभा जनु रोकी ॥

जहाँ जनकजीका अत्यन्त अनुपम ( सुन्दर ) निवासस्थान ( महल ) है, वहाँके विलास ( ऐश्वर्य ) को देखकर देवता भी थकित ( स्तम्भित ) हो जाते हैं [ मनुष्योंकी तो बात ही क्या! ] । कोट ( राजमहलके परकोटे ) को देखकर चित्त चकित हो जाता है, [ ऐसा मालूम होता है ] मानो उसने समस्त लोकोंकी शोभाको रोक ( घेर ) रखा है ॥४ ॥

दो० – धवल धाम मनि पुरट पट सुघटित नाना भाँति ।

सिय निवास सुंदर सदन सोभा किमि कहि जाति ॥ २ ९ ३ ॥

उज्ज्वल महलोंमें अनेक प्रकारके सुन्दर रीतिसे बने हुए मणिजटित सोनेकी जरीके परदे लगे हैं । सीताजीके रहनेके सुन्दर महलकी शोभाका वर्णन किया ही कैसे जा सकता है ॥ २१३ ॥

सुभग द्वार सब कुलिस कपाटा । भूप भीर नट मागध भाटा ॥

बनी बिसाल बाजि गज साला । हय गय रथ संकुल सब काला ॥

राजमहलके सब दरवाजे ( फाटक ) सुन्दर हैं, जिनमें वज्रके ( मजबूत अथवा हीरोंके चमकते हुए) किवाड़ लगे हैं । वहाँ [ मातहत ] राजाओं, नटों, मागधों और भाटोंकी भीड़ लगी रहती है । घोड़ों और हाथियोंके लिये बहुत बड़ी- बड़ी घुड़शालें और गजशालाएँ ( फीलखाने ) बनी हुई हैं; जो सब समय घोड़े, हाथी और रथोंसे भरी रहती हैं ॥१ ॥

सूर सचिव सेनपसेनप बहुतेरे । नृपगृह सरिस सदन सब केरे ॥

पुर बाहेर सर सरित समीपा । उतरे जहँ तहँ बिपुल महीपा ॥

बहुत -से शूरवीर, मन्त्री और सेनापति हैं । उन सबके घर भी राजमहल- सरीखे ही हैं । नगरके बाहर तालाब और नदीके निकट जहाँ- तहाँ बहुत-से राजालोग उतरे हुए ( डेरा डाले हुए ) हैं ॥ २ ॥

देखि अनूप एक अँवराई । सब सुपास सब भाँति सुहाई ॥

कौसिक कहेउ मोर मनु माना । इहाँ रहिअ रघुबीर सुजाना ॥

[ वहीं ] आमोंका एक अनुपम बाग देखकर, जहाँ सब प्रकारके सुभीते थे और जो सब तरहसे सुहावना था, विश्वामित्रजीने कहा-हे सुजान रघुवीर! मेरा मन कहता है कि यहीं रहा जाय ॥ ३ ॥

भलेहिं नाथ कहि कृपानिकेता । उतरे तहँ मुनिबूंद समेता ॥

बिस्वामित्र महामुनि आए । समाचार मिथिलापति पाए ॥

कृपाके धाम श्रीरामचन्द्रजी ' बहुत अच्छा स्वामिन्! ' कहकर वहीं मुनियोंके समूहके साथ ठहर गये । मिथिलापति जनकजीने जब यह समाचार पाया कि महामुनि विश्वामित्र आये हैं, ॥४ ॥

पृष्ठ 215

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* बालकाण्ड * २१३

दो० - संग सचिव सुचि भूरि भट भूसुर बर गुर ग्याति ।

चले मिलन मुनिनायकहि मुदित राउ एहि भाँति ॥ २१४ ॥

तब उन्होंने पवित्र हृदयके ( ईमानदार, स्वामिभक्त) मन्त्री, बहुत से योद्धा, श्रेष्ठ ब्राह्मण, गुरु ( शतानन्दजी ) और अपनी जातिके श्रेष्ठ लोगोंको साथ लिया और इस प्रकार प्रसन्नताके साथ राजा मुनियोंके स्वामी विश्वामित्रजीसे मिलने चले ॥ २१४ ॥

कीन्ह प्रनामु चरन धरि माथा । दीन्हि असीस मुदित मुनिनाथा ॥

बिप्रवृंद सब सादर बंदे । जानि भाग्य बड़ राउ अनंदे ॥

राजाने मुनिके चरणोंपर मस्तक रखकर प्रणाम किया । मुनियोंके स्वामी विश्वामित्रजीने प्रसन्न होकर आशीर्वाद दिया । फिर सारी ब्राह्मणमण्डलीको आदरसहित प्रणाम किया और अपना बड़ा

भाग्यकुसलजानकरप्रस्नराजाकहिआनन्दितबारहिंहुए ॥१बारा॥ । बिस्वामित्र नृपहि बैठारा ॥

तेहि अवसर आए दोउ भाई । गए रहे देखन फुलवाई ॥

बार- बार कुशलप्रश्न करके विश्वामित्रजीने राजाको बैठाया । उसी समय दोनों भाई आ पहुँचे, जो फुलवाड़ी देखने गये थे ॥२ ॥

स्याम गौर मृदु बयस किसोरा । लोचन सुखद बिस्व चित चोरा ॥

उठे सकल जब रघुपति आए । बिस्वामित्र निकट बैठाए ॥

सुकुमार किशोर अवस्थावाले, श्याम और गौर वर्णके दोनों कुमार नेत्रोंको सुख देनेवाले और सारे विश्वके चित्तको चुरानेवाले हैं । जब रघुनाथजी आये तब सभी [ उनके रूप एवं तेजसे प्रभावित

होकर ] उठकर खड़े हो गये । विश्वामित्रजीने उनको अपने पास बैठा लिया ॥३ ॥

भए सब सुखी देखि दोउ भ्राता । बारि बिलोचन पुलकित गाता ॥

मूरति मधुर मनोहर देखी । भयउ बिदेहु बिदेहु बिसेषी ॥

दोनों भाइयोंको देखकर सभी सुखी हुए । सबके नेत्रोंमें जल भर आया ( आनन्द और प्रेमके आँसू उमड़ पड़े ) और शरीर रोमाञ्चित हो उठे । रामजीकी मधुर मनोहर मूर्तिको देखकर विदेह (जनक ) विशेषरूपसे विदेह ( देहकी सुध-बुधसे रहित) हो गये ॥ ४ ॥

दो० - प्रेम मगन मनु जानि नृपु करि बिबेकु धरि धीर ॥

बोलेउ मुनि पद नाइ सिरु गदगद गिरा गंभीर ॥ २१५ ॥

मनको प्रेममें मग्न जान राजा जनकने विवेकका आश्रय लेकर धीरज धारण किया और मुनिके चरणोंमें सिर नवाकर गद्गद ( प्रेमभरी ) गम्भीर वाणीसे कहा- ॥ २१५ ॥

पृष्ठ 216

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** *२१४ रामचरितमानस

कहहु नाथ सुंदर दोउ बालक । मुनिकुल तिलक कि नृपकुलपालक ॥

ब्रह्म जो निगम नेति कहि गावा । उभय बेष धरि की सोइ आवा ॥

हे नाथ! कहिये, ये दोनों सुन्दर बालक मुनिकुलके आभूषण हैं या किसी राजवंशके पालक? अथवा जिसका वेदोंने ' नेति ' कहकर गान किया है कहीं वह ब्रह्म तो युगलरूप धरकर नहीं आया है? ॥१ ॥

सहज बिरागरूप मनु मोरा । थकित होत जिमि चंद चकोरा ॥

ताते प्रभु पूछउँ सतिभाऊ । कहहु नाथ जनि करहु दुराऊ ॥

मेरा मन जो स्वभावसे ही वैराग्यरूप [ बना हुआ ] है, [ इन्हें देखकर ] इस तरह मुग्ध हो रहा है जैसे चन्द्रमाको देखकर चकोर । हे प्रभो! इसलिये मैं आपसे सत्य ( निश्छल ) भावसे पूछता हूँ । हे नाथ! बताइये, छिपाव न कीजिये ॥ २ ॥

इन्हहि बिलोकत अति अनुरागा । बरबस ब्रह्मसुखहि मन त्यागा ॥

कह मुनि बिहसि कहु नृप नीका । बचन तुम्हार न होइ अलीका ॥

इनको देखते ही अत्यन्त प्रेमके वश होकर मेरे मनने जबर्दस्ती ब्रह्मसुखको त्याग दिया है । मुनिने हँसकर कहा— हे राजन्! आपने ठीक ( यथार्थ ही) कहा । आपका वचन मिथ्या नहीं हो सकता ॥ ३ ॥

ये प्रिय सबहि जहाँ लगि प्रानी । मन मुसुकाहिं रामु सुनि बानी ॥

रघुकुल मनि दसरथ के जाए । मम हित लागि नरेस पठाए ॥

जगत्में जहाँतक ( जितने भी ) प्राणी हैं, ये सभीको प्रिय हैं । मुनिकी [ रहस्यभरी ] वाणी सुनकर श्रीरामजी मन- ही - मन मुसकराते हैं ( हँसकर मानो संकेत करते हैं कि रहस्य खोलिये नहीं ) । [ तब मुनिने कहा- ] ये रघुकुलमणि महाराज दशरथके पुत्र हैं । मेरे हितके लिये राजाने इन्हें मेरे साथ भेजा है ॥४ ॥

दो० - रामु लखनु दोउ बंधुबर रूप सील बल धाम ।

मख राखेउ सबु साखि जगु जिते असुर संग्राम ॥ २१६ ॥

ये राम और लक्ष्मण दोनों श्रेष्ठ भाई रूप, शील और बलके धाम हैं । सारा जगत् [ इस बातका ] साक्षी है कि इन्होंने युद्धमें असुरोंको जीतकर मेरे यज्ञकी रक्षा की है ॥ २१६ ॥

मुनि तव चरन देखि कह राऊ । कहि न सकउँ निज पुन्य प्रभाऊ ॥

सुंदर स्याम गौर दोउ भ्राता । आनँदहू के आनँद दाता ॥

राजाने कहा — हे मुनि! आपके चरणोंके दर्शन कर मैं अपना पुण्य-प्रभाव कह नहीं सकता ।

ये सुन्दर श्याम और गौर वर्णके दोनों भाई आनन्दको भी आनन्द देनेवाले हैं ॥१ ॥

पृष्ठ 217

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* बालकाण्ड * २१५

इन्ह कै प्रीति परसपर पावनि । कहि न जाइ मन भाव सुहावनि ॥

सुनहु नाथ कह मुदित बिदेहू । ब्रह्म जीव इव सहज सनेहू॥

इनकी आपसकी प्रीति बड़ी पवित्र और सुहावनी है, वह मनको बहुत भाती है, पर [ वाणीसे ] कही नहीं जा सकती । विदेह (जनकजी ) आनन्दित होकर कहते हैं - हे नाथ! सुनिये, ब्रह्म और जीवकी तरह इनमें स्वाभाविक प्रेम है ॥२ ॥

पुनि पुनि प्रभुहि चितव नरनाहू । पुलक गात उर अधिक उछाहू ॥

मुनिहि प्रसंसि नाइ पद सीसू । चलेउ लवाइ नगर अवनीसू॥

राजा बार- बार प्रभुको देखते हैं ( दृष्टि वहाँसे हटना ही नहीं चाहती) । [ प्रेमसे ] शरीर पुलकित हो रहा है और हृदयमें बड़ा उत्साह है । [फिर] मुनिकी प्रशंसा करके और उनके चरणोंमें सिर नवाकर राजा उन्हें नगरमें लिवा चले ॥ ३ ॥

सुंदर सदनु सुखद सब काला । तहाँ बासु लै दीन्ह भुआला ॥

करि पूजा सब बिधि सेवकाई । गयउ राउ गृह बिदा कराई ॥

एक सुन्दर महल जो सब समय ( सभी ऋतुओंमें ) सुखदायक था, वहाँ राजाने उन्हें ले जाकर ठहराया । तदनन्तर सब प्रकारसे पूजा और सेवा करके राजा विदा माँगकर अपने घर गये ॥४ ॥

दो० -– रिषय संग रघुबंस मनि करि भोजनु बिश्रामु ।

बैठे प्रभु भ्राता सहित दिवसु रहा भरि जामु ॥२१७ ॥

रघुकुलके शिरोमणि प्रभु श्रीरामचन्द्रजी ऋषियोंके साथ भोजन और विश्राम करके भाई

लक्ष्मणसमेत बैठे । उस समय पहरभर दिन रह गया था ॥ २१७ ॥

लखन हृदयँ लालसा बिसेषी । जाइ जनकपुर आइअ देखी ॥

प्रभु भय बहुरि मुनिहि सकुचाहीं । प्रगट न कहहिं मनहिं मुसुकाहीं ॥

लक्ष्मणजीके हृदयमें विशेष लालसा है कि जाकर जनकपुर देख आवें । परन्तु प्रभु श्रीरामचन्द्रजीका डर है और फिर मुनिसे भी सकुचाते हैं । इसलिये प्रकटमें कुछ नहीं कहते; मन-ही- मन मुसकरा रहे हैं ॥१ ॥

राम अनुज मन की गति जानी । भगत बछलता हियँ हुलसानी ॥

परम बिनीत सकुचि मुसुकाई । बोले गुर अनुसासन पाई ॥

[ अन्तर्यामी ] श्रीरामचन्द्रजीने छोटे भाईके मनकी दशा जान ली, [ तब ] उनके हृदयमें भक्तवत्सलता उमड़ आयी । वे गुरुकी आज्ञा पाकर बहुत ही विनयके साथ सकुचाते हुए मुसकराकर बोले— ॥२ ॥

पृष्ठ 218

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* *२१६ रामचरितमानस

नाथ लखनु पुरु देखन चहहीं । प्रभु सकोच डर प्रगट न कहहीं ॥

जौं राउर आयसु मैं पावौं । नगर देखाइ तुरत लै आवौं ॥

हे नाथ! लक्ष्मण नगर देखना चाहते हैं, किन्तु प्रभु ( आप) के डर और संकोचके कारण स्पष्ट नहीं कहते । यदि आपकी आज्ञा पाऊँ, तो मैं इनको नगर दिखलाकर तुरंत ही [ वापस] ले आऊँ ॥ ३ ॥

सुनि मुनीसु कह बचन सप्रीती । कस न राम तुम्ह राखहु नीती ॥

धरम सेतु पालक तुम्ह ताता । प्रेम बिबस सेवक सुखदाता ॥

यह सुनकर मुनीश्वर विश्वामित्रजीने प्रेमसहित वचन कहे - हे राम! तुम नीतिकी रक्षा कैसे न करोगे; हे तात! तुम धर्मकी मर्यादाका पालन करनेवाले और प्रेमके वशीभूत होकर सेवकोंको सुख देनेवाले हो ॥ ४ ॥

दो० - जाइ देखि आवहु नगरु सुख निधान दोउ भाइ ।

करहु सुफल सब के नयन सुंदर बदन देखाइ ॥ २ ९ ८ ॥

सुखके निधान दोनों भाई जाकर नगर देख आओ | अपने सुन्दर मुख दिखलाकर सब [ नगर-निवासियों ] के नेत्रोंको सफल करो ॥ २१८ ॥

मुनि पद कमल बंदि दोउ भ्राता । चले लोक लोचन सुख दाता ॥

बालक बूंद देखि अति सोभा । लगे संग लोचन मनु लोभा ॥

सब लोकोंके नेत्रोंको सुख देनेवाले दोनों भाई मुनिके चरणकमलोंकी वन्दना करके चले । बालकोंके झुंड इन [ के सौन्दर्य ] की अत्यन्त शोभा देखकर साथ लग गये । उनके नेत्र और मन [ इनकी माधुरीपर ] लुभा गये ॥ १ ॥

पीत बसन परिकर कटि भाथा । चारु चाप सर सोहत हाथा ॥

तन अनुहरत सुचंदन खोरी । स्यामल गौर मनोहर जोरी ॥

[ दोनों भाइयोंके ] पीले रंगके वस्त्र हैं, कमरके [ पीले ] दुपट्टोंमें तरकस बँधे हैं । हाथोंमें सुन्दर धनुष-बाण सुशोभित हैं । [ श्याम और गौर वर्णके ] शरीरोंके अनुकूल ( अर्थात् जिसपर जिस रंगका चन्दन अधिक फबे उसपर उसी रंगके ) सुन्दर चन्दनकी खौर लगी है । साँवरे और गोरे [ रंग ] की मनोहर जोड़ी है ॥२ ॥

केहरि कंधर बाहु बिसाला । उर अति रुचिर नागमनि माला ॥

सुभग सोन सरसीरुह लोचन । बदन मयंक तापत्रय मोचन ॥

सिंहके समान ( पुष्ट ) गर्दन ( गलेका पिछला भाग ) है; विशाल भुजाएँ हैं । [ चौड़ी ] छातीपर अत्यन्त सुन्दर गजमुक्ताकी माला है । सुन्दर लाल कमलके समान नेत्र हैं । तीनों तापोंसे छुड़ानेवाला चन्द्रमाके समान मुख है ॥ ३ ॥

पृष्ठ 219

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* बालकाण्ड * २१७

कानन्हि कनक फूल छबि देहीं । चितवत चितहि चोरि जनु लेहीं ॥

चितवनि चारु भृकुटि बर बाँकी । तिलक रेख सोभा जनु चाँकी ॥

कानोंमें सोनेके कर्णफूल [ अत्यन्त ] शोभा दे रहे हैं और देखते ही [देखनेवालेके ] चित्तको मानो चुरा लेते हैं । उनकी चितवन ( दृष्टि ) बड़ी मनोहर है और भौंहें तिरछी एवं सुन्दर हैं । [ माथेपर ] तिलककी रेखाएँ ऐसी सुन्दर हैं मानो [ मूर्तिमती] शोभापर मुहर लगा दी गयी है ॥४ ॥

दो० – रुचिर चौतनीं सुभग सिर मेचक कुंचित केस ।

नख सिख सुंदर बंधु दोउ सोभा सकल सुदेस ॥ २१ ९ ॥

सिरपर सुन्दर चौकोनी टोपियाँ [ दिये ] हैं, काले और घुंघराले बाल हैं । दोनों भाई नखसे लेकर शिखातक ( एड़ीसे चोटीतक ) सुन्दर हैं और सारी शोभा जहाँ जैसी चाहिये वैसी ही है ॥ २१ ९ ॥

देखन नगर भूपसुत आए । समाचार पुरबासिन्ह पाए ॥

धाए धाम काम सब त्यागी । मनहुँ रंक निधि लूटन लागी ॥

जब पुरवासियोंने यह समाचार पाया कि दोनों राजकुमार नगर देखनेके लिये आये हैं, तब वे सब घर- बार और सब काम-काज छोड़कर ऐसे दौड़े मानो दरिद्री [ धनका ] खजाना लूटने दौड़े हों ॥१ ॥

निरखि सहज सुंदर दोउ भाई । होहिं सुखी लोचन फल पाई ॥

जुबतीं भवन झरोखन्हि लागीं । निरखहिं राम रूप अनुरागीं ॥

स्वभावहीसे सुन्दर दोनों भाइयोंको देखकर वे लोग नेत्रोंका फल पाकर सुखी हो रहे हैं । युवती स्त्रियाँ घरके झरोखोंसे लगी हुई प्रेमसहित श्रीरामचन्द्रजीके रूपको देख रही हैं ॥२ ॥

कहहिं परसपर बचन सप्रीती । सखि इन्ह कोटि काम छबि जीती ॥

सुर नर असुर नाग मुनि माहीं । सोभा असि कहुँ सुनिअति नाहीं ॥

वे आपसमें बड़े प्रेमसे बातें कर रही हैं - हे सखी! इन्होंने करोड़ों कामदेवोंकी छबिको जीत लिया है । देवता, मनुष्य, असुर, नाग और मुनियोंमें ऐसी शोभा तो कहीं सुननेमें भी नहीं आती ॥३ ॥

बिष्नु चारि भुज बिधि मुख चारी । बिकट बेष मुख पंच पुरारी ॥

अपर देउ अस कोउ न आही । यह छबि सखी पटतरिअ जाही ॥

भगवान् विष्णुके चार भुजाएँ हैं, ब्रह्माजीके चार मुख हैं, शिवजीका विकट ( भयानक ) वेष है और उनके पाँच मुँह हैं । हे सखी! दूसरा देवता भी कोई ऐसा नहीं है जिसके साथ इस छबिकी उपमा दी जाय ॥४ ॥

पृष्ठ 220

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* *२१८ रामचरितमानस

दो० –- बय किसोर सुषमा सदन स्याम गौर सुख धाम ।

अंग अंग पर वारिअहिं कोटि कोटि सत काम ॥ २२० ॥

इनकी किशोर अवस्था है, ये सुन्दरताके घर, साँवले और गोरे रंगके तथा सुखके धाम हैं ।

इनके अङ्ग-अङ्गपर करोड़ों - अरबों कामदेवोंको निछावर कर देना चाहिये ॥ २२० ॥

कहहु सखी अस को तनुधारी । जो न मोह यह रूप निहारी ॥

कोउ सप्रेम बोली मृदु बानी ॥ जो मैं सुना सो सुनहु सयानी ॥

हे सखी! [ भला ] कहो तो ऐसा कौन शरीरधारी होगा जो इस रूपको देखकर मोहित न हो जाय ( अर्थात् यह रूप जड़- चेतन सबको मोहित करनेवाला है ) । [ तब ] कोई दूसरी सखी प्रेमसहित कोमल वाणीसे बोली-हे सयानी! मैंने जो सुना है उसे सुनो- ॥१ ॥

ए दोऊ दसरथ के ढोटा । बाल मरालन्हि के कल जोटा ॥

मुनि कौसिक मख के रखवारे । जिन्ह रन अजिर निसाचर मारे ॥

ये दोनों [ राजकुमार ] महाराज दशरथजीके पुत्र हैं । बाल राजहंसोंका-सा सुन्दर जोड़ा है । ये मुनि विश्वामित्रके यज्ञकी रक्षा करनेवाले हैं, इन्होंने युद्धके मैदानमें राक्षसोंको मारा है ॥२ ॥

स्याम गात कल कंज बिलोचन । जो मारीच सुभुज मदु मोचन ॥

कौसल्या सुत सो सुख खानी । नामु रामु धनु सायक पानी ॥

जिनका श्याम शरीर और सुन्दर कमल-जैसे नेत्र हैं, जो मारीच और सुबाहुके मदको चूर करनेवाले और सुखकी खान हैं और जो हाथमें धनुष-बाण लिये हुए हैं, वे कौसल्याजीके पुत्र हैं; इनका नाम राम है ॥ ३ ॥

गौर किसोर बेषु बर काछें । कर सर चाप राम के पाछें ॥

लछिमनु नामु राम लघु भ्राता । सुनु सखि तासु सुमित्रा माता ॥

जिनका रंग गोरा और किशोर अवस्था है और जो सुन्दर वेष बनाये और हाथमें धनुष-बाण लिये श्रीरामजीके पीछे- पीछे चल रहे हैं, वे इनके छोटे भाई हैं; उनका नाम लक्ष्मण है । हे सखी! सुनो, उनकी माता सुमित्रा हैं ॥४ ॥

दो० - बिप्रकाजु करि बंधु दोउ मग मुनिबधू उधारि ।

आए देखन चापमख सुनि हरषीं सब नारि ॥ २२१ ॥

दोनों भाई ब्राह्मण विश्वामित्रका काम करके और रास्तेमें मुनि गौतमकी स्त्री अहल्याका उद्धार

करके यहाँ धनुषयज्ञ देखने आये हैं । यह सुनकर सब स्त्रियाँ प्रसन्न हुईं ॥ २२१ ॥