श्रीरामचरितमानस — पृष्ठ 221–230
श्रीरामचरितमानस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 221–230
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* बालकाण्ड * २१ ९
देखि राम छबि कोउ एक कहई । जोगु जानकिहि यह बरु अहई ॥
जौं सखि इन्हहि देख नरनाहू । पन परिहरि हठि करइ बिबाहू । श्रीरामचन्द्रजीकी छबि देखकर कोई एक ( दूसरी सखी) कहने लगी- यह वर जानकीके योग्य है । हे सखी! यदि कहीं राजा इन्हें देख ले, तो प्रतिज्ञा छोड़कर हठपूर्वक इन्हींसे विवाह कर देगा ॥ १ ॥
कोउ कह ए भूपति पहिचाने । मुनि समेत सादर सनमाने ॥
सखि परंतु पनु राउ न तजई । बिधि बस हठि अबिबेकहि भजई ॥
किसीने कहा— राजाने इन्हें पहचान लिया है और मुनिके सहित इनका आदरपूर्वक सम्मान किया है । परन्तु हे सखी! राजा अपना प्रण नहीं छोड़ता । वह होनहारके वशीभूत होकर हठपूर्वक अविवेकका ही आश्रय लिये हुए है ( प्रणपर अड़े रहनेकी मूर्खता नहीं छोड़ता) ॥२ ॥
कोउ कह जौं भल अहइ बिधाता । सब कहँ सुनिअ उचित फलदाता ॥
तौ जानकिहि मिलिहि बरु एहू । नाहिन आलि इहाँ संदेहू ॥
कोई कहती है - यदि विधाता भले हैं और सुना जाता है कि वे सबको उचित फल देते हैं,
तो जानकीजीको यही वर मिलेगा । हे सखी! इसमें सन्देह नहीं है ॥ ३ ॥
जौं बिधि बस अस बनै सँजोगू । तौ कृतकृत्य होइ सब लोगू॥
सखि हमरें आरति अति तातें । कबहुँक ए आवहिं एहि नातें ॥
जो दैवयोगसे ऐसा संयोग बन जाय, तो हम सब लोग कृतार्थ हो जायँ । हे सखी! मेरे तो इसीसे इतनी अधिक आतुरता हो रही है कि इसी नाते कभी ये यहाँ आवेंगे ॥४ ॥
दो० – नाहिं त हम कहुँ सुनहु सखि इन्ह कर दरसनु दूरि ।
यह संघटु तब होइ जब पुन्य पुराकृत भूरि॥ २२२ ॥
नहीं तो ( विवाह न हुआ तो) हे सखी! सुनो, हमको इनके दर्शन दुर्लभ हैं । यह संयोग तभी हो सकता है जब हमारे पूर्वजन्मोंके बहुत पुण्य हों ॥ २२२ ॥
बोली अपर कहेहु सखि नीका । एहिं बिआह अति हित सबही का ॥
कोउ कह संकर चाप कठोरा । ए स्यामल मृदु गात किसोरा ॥
दूसरीने कहा–हे सखी! तुमने बहुत अच्छा कहा । इस विवाहसे सभीका परम हित है । किसीने कहा--शङ्करजीका धनुष कठोर है और ये साँवले राजकुमार कोमल शरीरके बालक हैं ॥१ ॥
सबु असमंजस अहइ सयानी । यह सुनि अपर कहइ मृदु बानी ॥
सखि इन्ह कहँ कोउ कोड अस कहहीं । बड़ प्रभाउ देखत लघु अहहीं ॥
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* *२२० रामचरितमानस हे सयानी! सब असमंजस ही है । यह सुनकर दूसरी सखी कोमल वाणीसे कहने लगी— हे सखी! इनके सम्बन्धमें कोई -कोई ऐसा कहते हैं कि ये देखनेमें तो छोटे हैं, पर इनका प्रभाव बहुत बड़ा है ॥२ ॥
परसि जासु पद पंकज धूरी । तरी अहल्या कृत अघ भूरी ॥
सो कि रहिहि बिनु सिव धनु तोरें । यह प्रतीति परिहरिअ न भोरें ॥
जिनके चरणकमलोंकी धूलिका स्पर्श पाकर अहल्या तर गयी, जिसने बड़ा भारी पाप किया था, वे क्या शिवजीका धनुष बिना तोड़े रहेंगे । इस विश्वासको भूलकर भी नहीं छोड़ना चाहिये ॥३ ॥
जेहिं बिरंचि रचि सीय सँवारी । तेहिं स्यामल बरु रचेउ बिचारी ॥
तासु बचन सुनि सब हरषानीं । ऐसेइ होउ कहहिं मृदु बानीं ॥
जिस ब्रह्माने सीताको सँवारकर ( बड़ी चतुराईसे) रचा है, उसीने विचारकर साँवला वर भी रच रखा है । उसके ये वचन सुनकर सब हर्षित हुईं और कोमल वाणीसे कहने लगीं- ऐसा ही हो ॥ ४ ॥
दो० – हियँ हरषहिं बरषहिं सुमन सुमुखि सुलोचनि बूंद ।
जाहिं जहाँ जहँ बंधु दोउ तहँ तहँ परमानंद ॥ २२३ ॥
सुन्दर मुख और सुन्दर नेत्रोंवाली स्त्रियाँ समूह- की- समूह हृदयमें हर्षित होकर फूल बरसा रही हैं । जहाँ- जहाँ दोनों भाई जाते हैं, वहाँ वहाँ परम आनन्द छा जाता है ॥२२३ ॥
पुर पूरब दिसि गे दोउ भाई । जहँ धनुमख हित भूमि बनाई ॥
अति बिस्तार चारु गच ढारी । बिमल बेदिका रुचिर सँवारी ॥
दोनों भाई नगरके पूरब ओर गये; जहाँ धनुषयज्ञके लिये [ रंग ] भूमि बनायी गयी थी । बहुत लंबा-चौड़ा सुन्दर ढाला हुआ पक्का आँगन था, जिसपर सुन्दर और निर्मल वेदी सजायी गयी थी ॥१ ॥
चहुँ दिसि कंचन मंच बिसाला । रचे जहाँ बैठहिं महिपाला ॥
तेहि पाछें समीप चहुँ पासा । अपर मंच मंडली बिलासा ॥
चारों ओर सोनेके बड़े - बड़े मंच बने थे, जिनपर राजा लोग बैठेंगे । उनके पीछे समीप ही चारों ओर दूसरे मचानोंका मण्डलाकार घेरा सुशोभित था ॥२ ॥
कछुक ऊँचि सब भाँति सुहाई । बैठहिं नगर लोग जहँ जाई ॥
तिन्ह के निकट बिसाल सुहाए । धवल धाम बहुबरन बनाए ॥
वह कुछ ऊँचा था और सब प्रकारसे सुन्दर था, जहाँ जाकर नगरके लोग बैठेंगे । उन्हींके पास विशाल एवं सुन्दर सफेद मकान अनेक रंगोंके बनाये गये हैं, ॥ ३ ॥
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* बालकाण्ड * २२१
जहँ बैठें देखहिं सब नारी । जथाजोगु निज कुल अनुहारी ॥
पुर बालक कहि कहि मृदु बचना । सादर प्रभुहि देखावहिं रचना ॥
जहाँ अपने - अपने कुलके अनुसार सब स्त्रियाँ यथायोग्य ( जिसको जहाँ बैठना उचित है ) बैठकर देखेंगी । नगरके बालक कोमल वचन कह-कहकर आदरपूर्वक प्रभु श्रीरामचन्द्रजीको [ यज्ञशालाकी ] रचना दिखला रहे हैं ॥ ४ ॥
दो० – सब सिसु एहि मिस प्रेमबस परसि मनोहर गात ।
तन पुलकहिं अति हरषु हियँ देखि देखि दोउ भ्रात ॥ २२४ ॥
सब बालक इसी बहाने प्रेमके वश होकर श्रीरामजीके मनोहर अङ्गोंको छूकर शरीरसे पुलकित हो रहे हैं और दोनों भाइयोंको देख-देखकर उनके हृदयमें अत्यन्त हर्ष हो रहा है ॥२२४ ॥
सिसु सब राम प्रेमबस जाने । प्रीति समेत निकेत बखाने ॥
निज निज रुचि सब लेहिं बोलाई । सहित सनेह जाहिं दोउ भाई ॥
श्रीरामचन्द्रजीने सब बालकोंको प्रेमके वश जानकर [ यज्ञभूमिके ] स्थानोंकी प्रेमपूर्वक प्रशंसा की । [ इससे बालकोंका उत्साह, आनन्द और प्रेम और भी बढ़ गया, जिससे ] वे सब अपनी- अपनी रुचिके अनुसार उन्हें बुला लेते हैं और [ प्रत्येकके बुलानेपर ] दोनों भाई प्रेमसहित उनके पास चले जाते हैं ॥ १ ॥
राम देखावहिं अनुजहि रचना । कहि मृदु मधुर मनोहर बचना ॥
लव निमेष महँ भुवन निकाया । रचइ जासु अनुसासन माया ॥
कोमल, मधुर और मनोहर वचन कहकर श्रीरामजी अपने छोटे भाई लक्ष्मणको [ यज्ञभूमिकी ] रचना दिखलाते हैं । जिनकी आज्ञा पाकर माया लव निमेष ( पलक गिरनेके चौथाई समय ) में ब्रह्माण्डोंके समूह रच डालती है, ॥२ ॥
भगति हेतु सोइ दीनदयाला । चितवत चकित धनुष मखसाला ॥
कौतुक देखि चले गुरु पाहीं । जानि बिलंबु त्रास मन माहीं ॥
वही दीनोंपर दया करनेवाले श्रीरामजी भक्तिके कारण धनुषयज्ञशालाको चकित होकर ( आश्चर्यके साथ ) देख रहे हैं । इस प्रकार सब कौतुक ( विचित्र रचना ) देखकर वे गुरुके पास चले देर हुई जानकर उनके मनमें डर है ॥३ ॥
जासु त्रास डर कहुँ डर होई । भजन प्रभाउ देखावत सोई ॥
कहि बातें मृदु मधुर सुहाई । किए बिदा बालक बरिआईं ॥
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* *२२२ रामचरितमानस जिनके भयसे डरको भी डर लगता है, वही प्रभु भजनका प्रभाव [जिसके कारण ऐसे महान् प्रभु भी भयका नाट्य करते हैं ] दिखला रहे हैं । उन्होंने कोमल, मधुर और सुन्दर बातें कहकर बालकोंको जबर्दस्ती विदा किया ॥ ४ ॥
दो० – सभय सप्रेम बिनीत अति सकुच सहित दोउ भाइ ।
गुर पद पंकज नाइ सिर बैठे आयसु पाइ ॥ २२५ ॥
फिर भय, प्रेम, विनय और बड़े संकोचके साथ दोनों भाई गुरुके चरणकमलोंमें सिर नवाकर आज्ञा पाकर बैठे ॥ २२५ ॥
निसि प्रबेस मुनि आयसु दीन्हा । सबहीं संध्याबंदनुसंध्याबंदनु कीन्हा ॥
कहत कथा इतिहास पुरानी । रुचिर रजनि जुग जाम सिरानी ॥
रात्रिका प्रवेश होते ही ( सन्ध्याके समय ) मुनिने आज्ञा दी, तब सबने सन्ध्यावन्दन किया । फिर प्राचीन कथाएँ तथा इतिहास कहते-कहते सुन्दर रात्रि दो पहर बीत गयी ॥१ ॥
मुनिबर सयन कीन्हि तब जाई । लगे चरन चापन दोउ भाई ॥
जिन्ह के चरन सरोरुह लागी । करत बिबिध जप जोग बिरागी ॥
तब श्रेष्ठ मुनिने जाकर शयन किया । दोनों भाई उनके चरण दबाने लगे जिनके चरणकमलोंके [ दर्शन एवं स्पर्शके ] लिये वैराग्यवान् पुरुष भी भाँति- भाँतिके जप और योग करते हैं, ॥२ ॥
तेइ दोउ बंधु प्रेम जनु जीते । गुर पद कमल पलोटत प्रीते ॥
बार बार मुनि अग्या दीन्ही । रघुबर जाइ सयन तब कीन्ही ॥
वे ही दोनों भाई मानो प्रेमसे जीते हुए प्रेमपूर्वक गुरुजीके चरणकमलोंको दबा रहे हैं । मुनिने बार - बार आज्ञा दी, तब श्रीरघुनाथजीने जाकर शयन किया ॥३ ॥
चापत चरन लखनु उर लाएँ । सभय सप्रेम परम सत्रु पाएँ ॥
पुनि पुनि प्रभु कह सोवहु ताता । पौढ़े धरि उर पद जलजाता ॥
श्रीरामजीके चरणोंको हृदयसे लगाकर भय और प्रेमसहित परम सुखका अनुभव करते हुए लक्ष्मणजी उनको दबा रहे हैं । प्रभु श्रीरामचन्द्रजीने बार- बार कहा - हे तात! [ अब ] सो जाओ । तब वे उन चरणकमलोंको हृदयमें धरकर लेट रहे ॥४ ॥
दो० – उठे लखनु निसि बिगत सुनि अरुनसिखा धुनि कान ।
गुर तें पहिलेहिं जगतपति जागे रामु सुजान ॥ २२६ ॥
रात बीतनेपर, मुर्गेका शब्द कानोंसे सुनकर लक्ष्मणजी उठे । जगत्के स्वामी सुजान श्रीरामचन्द्रजी भी गुरुसे पहले ही जाग गये ॥२२६ ॥
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* बालकाण्ड * २२३
सकल सौच करि जाइ नहाए । नित्य निबाहि मुनिहि सिर ना ॥
समय जानि गुर आयसु पाई । लेन प्रसून चले दोउ भाई ॥
सब शौचक्रिया करके वे जाकर नहाये । फिर [सन्ध्या-अग्निहोत्रादि ] नित्यकर्म समाप्त करके उन्होंने मुनिको मस्तक नवाया । [ पूजाका ] समय जानकर, गुरुकी आज्ञा पाकर दोनों भाई फूल लेने चले ॥१ ॥
भूप बागु बर देखेउ जाई । जहँ बसंत रितु रही लोभाई ॥
लागे बिटप मनोहर नाना । बरन बरन बर बेलि बिताना । उन्होंने जाकर राजाका सुन्दर बाग देखा, जहाँ वसन्त ऋतु लुभाकर रह गयी है । मनको लुभानेवाले अनेक वृक्ष लगे हैं । रंग- बिरंगी उत्तम लताओंके मण्डप छाये हुए हैं ॥ २ ॥
नव पल्लव फल सुमन सुहाए । निज संपति सुर रूख लजाए ॥
चातक कोकिल कीर चकोरा । कूजत बिहग नटत कल मोरा ॥
नये पत्तों, फलों और फूलोंसे युक्त सुन्दर वृक्ष अपनी सम्पत्तिसे कल्पवृक्षको भी लजा रहे हैं । पपीहे, कोयल, तोते, चकोर आदि पक्षी मीठी बोली बोल रहे हैं और मोर सुन्दर नृत्य कर रहे हैं ॥३ ॥
मध्य बाग सरु सोह सुहावा । मनि सोपान बिचित्र बनावा ॥
बिमल सलिलु सरसिज बहुरंगा । जलखग कूजत गुंजत भृंगा ॥
बागके बीचोबीच सुहावना सरोवर सुशोभित है, जिसमें मणियोंकी सीढ़ियाँ विचित्र ढंगसे बनी हैं । उसका जल निर्मल है, जिसमें अनेक रंगोंके कमल खिले हुए हैं, जलके पक्षी कलरव कर रहे हैं और भ्रमर गुंजार कर रहे हैं ॥ ४ ॥
दो० – बागु तड़ागु बिलोकि प्रभु हरषे बंधु समेत ।
परम रम्य आरामु यहु जो रामहि सुख देत ॥ २२७ ॥
बाग और सरोवरको देखकर प्रभु श्रीरामचन्द्रजी भाई लक्ष्मणसहित हर्षित हुए । यह बाग [ वास्तवमें ] परम रमणीय है, जो [ जगत्को सुख देनेवाले ] श्रीरामचन्द्रजीको सुख दे रहा है ॥ २२७ ॥
चहुँ दिसि चितइ पूँछि मालीगन । लगे लेन दल फूल मुदित मन ॥
तेहि अवसर सीता तहँ आई । गिरिजा पूजन जननि पठाई ॥
चारों ओर दृष्टि डालकर और मालियोंसे पूछकर वे प्रसन्न मनसे पत्र- पुष्प लेने लगे । उसी समय सीताजी वहाँ आयीं । माताने उन्हें गिरिजा ( पार्वती ) जीकी पूजा करनेके लिये भेजा था ॥ १ ॥
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* * २२४ रामचरितमानस
संग सखीं सब सुभग सयानीं । गावहिं गीत मनोहर बानीं ॥
सर समीप गिरिजा गृह सोहा । बरनि न जाइ देखि मनु मोहा ॥
साथमें सब सुन्दरी और सयानी सखियाँ हैं, जो मनोहर वाणीसे गीत गा रही हैं । सरोवरके पास गिरिजाजीका मन्दिर सुशोभित है, जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता; देखकर मन मोहित हो जाता है ॥ २ ॥
मज्जनु करि सर सखिन्ह समेता । गई मुदित मन गौरि निकेता ॥
पूजा कीन्हि अधिक अनुरागा । निज अनुरूप सुभग बरु मागा ॥
सखियोंसहित सरोवरमें स्नान करके सीताजी प्रसन्न मनसे गिरिजाजीके मन्दिरमें गयीं । उन्होंने बड़े प्रेमसे पूजा की और अपने योग्य सुन्दर वर माँगा ॥ ३ ॥
एक सखी सिय संगु बिहाई । गई रही देखन फुलवाई ॥
तेहिं दोउ बंधु बिलोके जाई । प्रेम बिबस सीता पहिं आई ॥
एक सखी सीताजीका साथ छोड़कर फुलवाड़ी देखने चली गयी थी । उसने जाकर दोनों भाइयोंको देखा और प्रेममें विह्वल होकर वह सीताजीके पास आयी ॥ ४ ॥
दो० –- तासु दसा देखी सखिन्ह पुलक गात जलु नैन ।
कहु कारनु निज हरष कर पूछहिं सब मृदु बैन ॥ २२८ ॥
सखियोंने उसकी दशा देखी कि उसका शरीर पुलकित है और नेत्रोंमें जल भरा है । सब कोमल वाणीसे पूछने लगीं कि अपनी प्रसन्नताका कारण बता ॥२२८ ॥
देखन बागु कुअँर दुइ आए । बय किसोर सब भाँति सुहाए ॥
स्याम गौर किमि कहौं बखानी । गिरा अनयन नयन बिनु बानी ॥
[उसने कहा- ] दो राजकुमार बाग देखने आये हैं । किशोर अवस्थाके हैं और सब प्रकारसे सुन्दर हैं । वे साँवले और गोरे [रंगके ] हैं; उनके सौन्दर्यको मैं कैसे बखानकर कहूँ । वाणी बिना नेत्रकी है और नेत्रोंके वाणी नहीं है ॥ १ ॥
सुनि हरषीं सब सखीं सयानी । सिय हियँ अति उतकंठा जानी ॥
एक कहइ नृपसुत तेइ आली । सुने जे मुनि सँग आए काली ॥
यह सुनकर और सीताजीके हृदयमें बड़ी उत्कण्ठा जानकर सब सयानी सखियाँ प्रसन्न हुईं । तब एक सखी कहने लगी- हे सखी! ये वही राजकुमार हैं जो सुना है कि कल विश्वामित्र मुनिके साथ आये हैं ॥२ ॥
जिन्ह निज रूप मोहनी डारी । कीन्हे स्वबस नगर नर नारी ॥
बरनत छबि जहँ तहँ सब लोगू । अवसि देखिअहिं देखन जोगू॥
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* बालकाण्ड * २२५ और जिन्होंने अपने रूपकी मोहिनी डालकर नगरके स्त्री-पुरुषोंको अपने वशमें कर लिया है । जहाँ-तहाँ सब लोग उन्हींकी छबिका वर्णन कर रहे हैं । अवश्य [ चलकर ] उन्हें देखना चाहिये, वे देखने ही योग्य हैं ॥३ ॥
तासु बचन अति सियहि सोहाने । दरस लागि लोचन अकुलाने ॥
चली अग्र करि प्रिय सखि सोई । प्रीति पुरातन लखइ न कोई ॥
उसके वचन सीताजीको अत्यन्त ही प्रिय लगे और दर्शनके लिये उनके नेत्र अकुला उठे । उसी
प्यारी सखीको आगे करके सीताजी चलीं । पुरानी प्रीतिको कोई लख नहीं पाता ॥ ४ ॥
दो० – सुमिरि सीय नारद बचन उपजी प्रीति पुनीत ।
चकित बिलोकति सकल दिसि जनु सिसु मृगी सभीत ॥ २२ ९ ॥
नारदजीके वचनोंका स्मरण करके सीताजीके मनमें पवित्र प्रीति उत्पन्न हुई । वे चकित होकर सब ओर इस तरह देख रही हैं मानो डरी हुई मृगछौनी इधर-उधर देख रही हो ॥२२९ ॥
कंकन किंकिनि नूपुर धुनि सुनि । कहत लखन सन रामु हृदयँ गुनि ॥
मानहुँ मदन दुंदुभी दीन्ही । मनसा बिस्व बिजय कहँ कीन्ही ॥
कंकण ( हाथोंके कड़े ), करधनी और पायजेबके शब्द सुनकर श्रीरामचन्द्रजी हृदयमें विचारकर लक्ष्मणसे कहते हैं— [ यह ध्वनि ऐसी आ रही है ] मानो कामदेवने विश्वको जीतनेका संकल्प करके डंकेपर चोट मारी है ॥१ ॥
अस कहि फिरि चितए तेहि ओरा । सिय मुख ससि भए नयन चकोरा ॥
भए बिलोचन चारु अचंचल । मनहुँ सकुचि निमि तजे दिगंचल ॥
ऐसा कहकर श्रीरामजीने फिरकर उस ओर देखा । श्रीसीताजीके मुखरूपी चन्द्रमा [को निहारने ] के लिये उनके नेत्र चकोर बन गये । सुन्दर नेत्र स्थिर हो गये ( टकटकी लग गयी ) । मानो निमि ( जनकजीके पूर्वज ) ने [जिनका सबकी पलकोंमें निवास माना गया है, लड़की -दामादके मिलन-प्रसङ्गको देखना उचित नहीं, इस भावसे ] सकुचाकर पलकें छोड़ दीं, ( पलकोंमें रहना छोड़ दिया, जिससे पलकोंका गिरना रुक गया) ॥ २ ॥
देखि सीय सोभा सुखु पावा । हृदयँ सराहत बचनु न आवा ॥
जनु बिरंचि सब निज निपुनाई । बिरचि बिस्व कहँ प्रगटि देखाई ॥
सीताजीकी शोभा देखकर श्रीरामजीने बड़ा सुख पाया । हृदयमें वे उसकी सराहना करते हैं, किन्तु मुखसे वचन नहीं निकलते । [ वह शोभा ऐसी अनुपम है ] मानो ब्रह्माने अपनी सारी निपुणताको मूर्तिमान् कर संसारको प्रकट करके दिखा दिया हो ॥ ३ ॥
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* * २२६ रामचरितमानस
सुंदरता कहुँ सुंदर करई । छबिगृहँ दीपसिखा जनु बरई ॥
सब उपमा कबि रहे जुठारी ॥ केहिं पटतरौं बिदेहकुमारी ॥
वह ( सीताजीकी शोभा ) सुन्दरताको भी सुन्दर करनेवाली है [ वह ऐसी मालूम होती है ] मानो सुन्दरतारूपी घरमें दीपककी लौ जल रही हो । ( अबतक सुन्दरतारूपी भवनमें अँधेरा था, वह भवन मानो सीताजीकी सुन्दरतारूपी दीपशिखाको पाकर जगमगा उठा है, पहलेसे भी अधिक सुन्दर हो गया है ) । सारी उपमाओंको तो कवियोंने जूँठा कर रखा है । मैं जनकनन्दिनी श्रीसीताजीकी किससे उपमा दूँ॥४ ॥
दो० - सिय सोभा हियँ बरनि प्रभु आपनि दसा बिचारि ।
बोले सुचि मन अनुज सन बचन समय अनुहारि ॥ २३० ॥
[इस प्रकार ] हृदयमें सीताजीकी शोभाका वर्णन करके और अपनी दशाको विचारकर प्रभु श्रीरामचन्द्रजी पवित्र मनसे अपने छोटे भाई लक्ष्मणसे समयानुकूल वचन बोले- ॥ २३० ॥
तात जनकतनया यह सोई । धनुषजग्य जेहि कारन होई ॥
पूजन गौरि सखीं लै आईं । करत प्रकासु फिरइ फुलवाईं ॥
हे तात! यह वही जनकजीकी कन्या है जिसके लिये धनुषयज्ञ हो रहा है । सखियाँ इसे
गौरीपूजनके लिये ले आयी हैं । यह फुलवाड़ीमें प्रकाश करती हुई फिर रही है ॥१ ॥
जासु बिलोकि अलौकिक सोभा । सहज पुनीत मोर मनु छोभा ॥
सो सबु कारन जान बिधाता । फरकहिं सुभद अंग सुनु भ्राता ॥
जिसकी अलौकिक सुन्दरता देखकर स्वभावसे ही पवित्र मेरा मन क्षुब्ध हो गया है । वह सब कारण ( अथवा उसका सब कारण) तो विधाता जानें । किन्तु हे भाई! सुनो, मेरे मङ्गलदायक (दाहिने ) अंग फड़क रहे हैं ॥२ ॥
रघुबंसिन्ह कर सहज सुभाऊ । मनु कुपंथ पगु धरइ न काऊ ॥
मोहि अतिसय प्रतीति मन केरी । जेहिं सपनेहुँ परनारि न हेरी ॥
रघुवंशियोंका यह सहज (जन्मगत ) स्वभाव है कि उनका मन कभी कुमार्गपर पैर नहीं रखता । मुझे तो अपने मनका अत्यन्त ही विश्वास है कि जिसने [ जाग्रत्की कौन कहे ] स्वप्नमें भी परायी स्त्रीपर दृष्टि नहीं डाली है ॥३ ॥
जिन्ह कै लहहिं न रिपु रन पीठी । नहिं पावहिं परतिय मनु डीठी ॥
मंगन लहहिं न जिन्ह कै नाहीं । ते नरबर थोरे जग माहीं ॥
रणमें शत्रु जिनकी पीठ नहीं देख पाते ( अर्थात् जो लड़ाईके मैदानसे भागते नहीं ), परायी स्त्रियाँ जिनके मन और दृष्टिको नहीं खींच पातीं और भिखारी जिनके यहाँसे ' नाहीं ' नहीं पाते ( खाली हाथ नहीं लौटते ), ऐसे श्रेष्ठ पुरुष संसारमें थोड़े हैं ॥४ ॥
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* बालकाण्ड * २२७
दो० – करत बतकही अनुज सन मन सिय रूप लोभान ।
मुख सरोज मकरंद छबि करइ मधुप इव पान ॥२३१ ॥
यों श्रीरामजी छोटे भाईसे बातें कर रहे हैं, पर मन सीताजीके रूपमें लुभाया हुआ उनके मुखरूपी कमलके छबिरूप मकरन्द-रसको भौरेकी तरह पी रहा है ॥२३१ ॥
चितवति चकित चहूँ दिसि सीता । कहँ गए नृपकिसोर मनु चिंता ॥
जहँ बिलोक मृग सावक नैनी । जनु तहँ बरिस कमल सित श्रेणी ॥
सीताजी चकित होकर चारों ओर देख रही हैं । मन इस बातकी चिन्ता कर रहा है कि राजकुमार कहाँ चले गये । बालमृग-नयनी ( मृगके छौनेकी-सी आँखवाली ) सीताजी जहाँ दृष्टि डालती हैं, वहाँ मानो श्वेत कमलोंकी कतार बरस जाती है ॥ १ ॥
लता ओट तब सखिन्ह लखाए । स्यामल गौर किसोर सुहाए ॥
देखि रूप लोचन ललचाने । हरषे जनु निज निधि पहिचाने ॥
तब सखियोंने लताकी ओटमें सुन्दर श्याम और गौर कुमारोंको दिखलाया । उनके रूपको देखकर नेत्र ललचा उठे; वे ऐसे प्रसन्न हुए मानो उन्होंने अपना खजाना पहचान लिया ॥ २ ॥
थके नयन रघुपति छबि देखें । पलकन्हिहूँ परिहरीं निमेषें ॥
अधिक सनेहँ देह भै भोरी । सरद ससिहि जनु चितव चकोरी ॥
श्रीरघुनाथजीकी छबि देखकर नेत्र थकित (निश्चल) हो गये । पलकोंने भी गिरना छोड़ दिया । अधिक स्नेहके कारण शरीर विह्वल ( बेकाबू) हो गया । मानो शरद् ऋतुके चन्द्रमाको चकोरी [ बेसुध हुई ] देख रही हो ॥३ ॥
लोचन मग रामहि उर आनी । दीन्हे पलक कपाट सयानी ॥
जब सिय सखिन्ह प्रेमबस जानी । कहि न सकहिं कछु मन सकुचानी ॥
नेत्रोंके रास्ते श्रीरामजीको हृदयमें लाकर चतुरशिरोमणि जानकीजीने पलकोंके किवाड़ लगा दिये ( अर्थात् नेत्र मूँदकर उनका ध्यान करने लगीं ) । जब सखियोंने सीताजीको प्रेमके वश जाना, तब वे मनमें सकुचा गयीं; कुछ कह नहीं सकती थीं ॥४ ॥
दो० — लताभवन तें प्रगट भे तेहि अवसर दोउ भाइ ।
निकसे जनु जुग बिमल बिधु जलद पटल बिलगाइ ॥ २३२ ॥
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* *२२८ रामचरितमानस उसी समय दोनों भाई लतामण्डप ( कुञ्ज ) मेंसे प्रकट हुए । मानो दो निर्मल चन्द्रमा बादलोंके पर्देको हटाकर निकले हों ॥ २३२ ॥
सोभा सीवँ सुभग दोउ बीरा । नील पीत जलजाभ सरीरा ॥
मोरपंख सिर सोहत नीके । गुच्छ बीच बिच कुसुम कली के ॥
दोनों सुन्दर भाई शोभाकी सीमा हैं । उनके शरीरकी आभा नीले और पीले कमलकी - सी है । सिरपर सुन्दर मोरपंख सुशोभित हैं । उनके बीच- बीचमें फूलोंकी कलियोंके गुच्छे लगे हैं ॥ १ ॥
भाल तिलक श्रमबिंदु सुहाए । श्रवन सुभग भूषन छबि छाए ॥
बिकट भृकुटि कच घूघरवारे । नव सरोज लोचन रतनारे ॥
माथेपर तिलक और पसीनेकी बूँदें शोभायमान हैं । कानोंमें सुन्दर भूषणोंकी छबि छायी है । टेढ़ी भौंहें और घुँघराले बाल हैं । नये लाल कमलके समान रतनारे ( लाल ) नेत्र हैं ॥२ ॥
चारु चिबुक नासिका कपोला । हास बिलास लेत मनु मोला ॥
मुखछबि कहि न जाइ मोहि पाहीं । जो बिलोकि बहु काम लजाहीं ॥
ठोड़ी, नाक और गाल बड़े सुन्दर हैं, और हँसीकी शोभा मनको मोल लिये लेती है । मुखकी छबि तो मुझसे कही ही नहीं जाती, जिसे देखकर बहुत से कामदेव लजा जाते हैं ॥३ ॥
उर मनि माल कंबु कल गीवा । काम कलभ कर भुज बलसींवा ॥
सुमन समेत बाम कर दोना । सावँर कुअँर सखी सुठि लोना ॥
वक्षःस्थलपर मणियोंकी माला है । शङ्खके सदृश सुन्दर गला है । कामदेवके हाथीके बच्चेकी सूँड़के समान ( उतार- चढ़ाववाली एवं कोमल ) भुजाएँ हैं, जो बलकी सीमा हैं । जिसके बायें हाथमें फूलोंसहित दोना है, हे सखि! वह साँवला कुँअर तो बहुत ही सलोना है ॥४ ॥
दो० – केहरि कटि पट पीत धर सुषमा सील निधान ।
देखि भानुकुलभूषनहि बिसरा सखिन्ह अपान ॥ २३३ ॥
सिंहकी-सी ( पतली, लचीली ) कमरवाले, पीताम्बर धारण किये हुए, शोभा और शीलके भण्डार, सूर्यकुलके भूषण श्रीरामचन्द्रजीको देखकर सखियाँ अपने- आपको भूल गयीं ॥२३३ ॥
धरि धीरजु एक आलि सयानी । सीता सन बोली गहि पानी ॥
बहुरि गौरि कर ध्यान करेहू । भूपकिसोर देखि किन लेहू ॥
एक चतुर सखी धीरज धरकर, हाथ पकड़कर सीताजीसे बोली - गिरिजाजीका ध्यान फिर कर लेना, इस समय राजकुमारको क्यों नहीं देख लेतीं ॥१ ॥