श्रीरामचरितमानस — पृष्ठ 281–290

श्रीरामचरितमानस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 281–290

पृष्ठ 281

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* बालकाण्ड * २७९

तिमि सुख संपति बिनहिं बोलाएँ । धरमसील पहिं जाहिं सुभाएँ ॥

तुम्ह गुर बिप्र धेनु सुर सेबी । तसि पुनीत कौसल्या देबी ॥

वैसे ही सुख और सम्पत्ति बिना ही बुलाये स्वाभाविक ही धर्मात्मा पुरुषके पास जाती हैं । तुम जैसे गुरु, ब्राह्मण, गाय और देवताकी सेवा करनेवाले हो, वैसी ही पवित्र कौसल्या देवी भी हैं ॥२ ॥

सुकृती तुम्ह समान जग माहीं । भयउ न है कोउ होनेउ नाहीं ॥

तुम्ह ते अधिक पुन्य बड़ काकें । राजन राम सरिस सुत जाकें ॥

तुम्हारे समान पुण्यात्मा जगत्में न कोई हुआ, न है और न होनेका ही है । हे राजन्! तुमसे अधिक पुण्य और किसका होगा, जिसके राम-सरीखे पुत्र हैं ॥३ ॥

बीर बिनीत धरम ब्रत धारी । गुन सागर बर बालक चारी ॥

तुम्ह कहुँ सर्ब काल कल्याना । सजहु बरात बजाइ निसाना ॥

और जिसके चारों बालक वीर, विनम्र, धर्मका व्रत धारण करनेवाले और गुणोंके सुन्दर समुद्र

हैं । तुम्हारे लिये सभी कालोंमें कल्याण है । अतएव डंका बजवाकर बारात सजाओ ॥४ ॥

दो० - चलहु बेगि सुनि गुर बचन भलेहिं नाथ सिरु नाइ ।

भूपति गवने भवन तब दूतन्ह बासु देवाइ ॥ २ ९ ४ ॥

और जल्दी चलो । गुरुजीके ऐसे वचन सुनकर, ' हे नाथ! बहुत अच्छा ' कहकर और सिर नवाकर तथा दूतोंको डेरा दिलवाकर राजा महलमें गये ॥२ ९४ ॥

राजा सबु रनिवास बोलाई । जनक पत्रिका बाचि सुनाई ॥

सुनि संदेसु सकल हरषानीं । अपर कथा सब भूप बखानीं ॥

राजाने सारे रनिवासको बुलाकर जनकजीकी पत्रिका बाँचकर सुनायी । समाचार सुनकर सब रानियाँ हर्षसे भर गयीं । राजाने फिर दूसरी सब बातोंका ( जो दूतोंके मुखसे सुनी थीं ) वर्णन किया ॥ १ ॥

प्रेम प्रफुल्लित राजहिं रानी । मनहुँ सिखिनि सुनि बारिद बानी ॥

मुदित असीस देहिं गुर नारीं । अति आनंद मगन महतारीं ॥

प्रेममें प्रफुल्लित हुई रानियाँ ऐसी सुशोभित हो रही हैं जैसे मोरनी बादलोंकी गरज सुनकर प्रफुल्लित होती हैं । बड़ी - बूढ़ी [ अथवा गुरुओंकी ] स्त्रियाँ प्रसन्न होकर आशीर्वाद दे रही हैं । माताएँ अत्यन्त आनन्दमें मग्न हैं ॥२ ॥

लेहिं परस्पर अति प्रिय पाती । हृदयँ लगाइ जुड़ावहिं छाती ॥

राम लखन कै कीरति करनी । बारहिं बार भूपबर बरनी ॥

पृष्ठ 282

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* *२८० रामचरितमानस उस अत्यन्त प्रिय पत्रिकाको आपसमें लेकर सब हृदयसे लगाकर छाती शीतल करती हैं । राजाओंमें श्रेष्ठ दशरथजीने श्रीराम-लक्ष्मणकी कीर्ति और करनीका बारंबार वर्णन किया ॥३ ॥

मुनि प्रसादु कहि द्वार सिधाए । रानिन्ह तब महिदेव बोलाए ॥

दिए दान आनंद समेता । चले बिप्रबर आसिष देता ॥

' यह सब मुनिकी कृपा है ' ऐसा कहकर वे बाहर चले आये । तब रानियोंने ब्राह्मणोंको बुलाया

और आनन्दसहित उन्हें दान दिये । श्रेष्ठ ब्राह्मण आशीर्वाद देते हुए चले ॥४ ॥

सो० - जाचक लिए हँकारि दीन्हि निछावरि कोटि बिधि ।

चिरु जीवहुँ सुत चारि चक्रबर्ति दसरत्थ के ॥ २ ९ ५ ॥

फिर भिक्षुकोंको बुलाकर करोड़ों प्रकारकी निछावरें उनको दीं । ' चक्रवर्ती महाराज दशरथके चारों पुत्र चिरंजीवी हों ' ॥ २ ९ ५ ॥

कहत चले पहिरें पट नाना । हरषि हने गहगहे निसाना ॥

समाचार सब लोगन्ह पाए । लागे घर घर होन बधाए ॥

यों कहते हुए वे अनेक प्रकारके सुन्दर वस्त्र पहन- पहनकर चले । आनन्दित होकर नगाड़ेवालोंने बड़े जोरसे नगाड़ोंपर चोट लगायी । सब लोगोंने जब यह समाचार पाया, तब घर- घर बधावे होने लगे ॥ १ ॥

भुवन चारि दस भरा उछाहू । जनकसुता रघुबीर बिआहू ॥

सुनि सुभ कथा लोग अनुरागे । मग गृह गलीं सँवारन लागे ॥

चौदहों लोकोंमें उत्साह भर गया कि जानकीजी और श्रीरघुनाथजीका विवाह होगा । यह शुभ समाचार पाकर लोग प्रेममग्न हो गये और रास्ते, घर तथा गलियाँ सजाने लगे ॥२ ॥

जद्यपि अवध सदैव सुहावनि । राम पुरी मंगलमय पावनि ॥

तदपि प्रीति कै प्रीति सुहाई । मंगल रचना रची बनाई ॥

यद्यपि अयोध्या सदा सुहावनी है, क्योंकि वह श्रीरामजीकी मङ्गलमयी पवित्र पुरी है, तथापि प्रीति-पर--1 प्रीति होनेसे वह सुन्दर मङ्गलरचनासे सजायी गयी ॥३ ॥

ध्वज पताक पट चामर चारू । छावा परम बिचित्र बजारू ॥

कनक कलस तोरन मनि जाला । हरद दूब दधि अच्छत माला ॥

ध्वजा, पताका, परदे और सुन्दर चँवरोंसे सारा बाजार बहुत ही अनूठा छाया हुआ है । सोनेके कलश, तोरण, मणियोंकी झालरें, हलदी, दूब, दही, अक्षत और मालाओंसे—॥४ ॥

दो० - मंगलमय निज निज भवन लोगन्ह रचे बनाइ ।

बीथीं सींचीं चतुरसम चौकें चारु पुराइ ॥ २ ९ ६ ॥

पृष्ठ 283

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* बालकाण्ड * २८१ लोगोंने अपने- अपने घरोंको सजाकर मङ्गलमय बना लिया । गलियोंको चतुरसमसे सींचा और [ द्वारोंपर ] सुन्दर चौक पुराये । [ चन्दन, केशर, कस्तूरी और कपूरसे बने हुए एक सुगन्धित द्रवको चतुरसम कहते हैं ] ॥ २ ९ ६ ॥

जहँ तहँ जूथ जूथ मिलि भामिनि । सजि नवसप्त सकल दुति दामिनि ॥

बिधुबदनीं मृग सावक लोचनि । निज सरूप रति मानु बिमोचनि ॥

बिजलीकी- सी कान्तिवाली चन्द्रमुखी, हरिनके बच्चेके -से नेत्रवाली और अपने सुन्दर रूपसे कामदेवकी स्त्री रतिके अभिमानको छुड़ानेवाली सुहागिनी स्त्रियाँ सभी सोलहों शृंगार सजकर, जहाँ- तहाँ झुंड -की -झुंड मिलकर, ॥ १ ॥

गावहिं मंगल मंजुल बानीं । सुनि कलरव कलकंठि लजानीं ॥

भूप भवन किमि जाइ बखाना । बिस्व बिमोहन रचेउ बिताना ॥

मनोहर वाणीसे मङ्गलगीत गा रही हैं, जिनके सुन्दर स्वरको सुनकर कोयलें भी लजा जाती हैं । राजमहलका वर्णन कैसे किया जाय, जहाँ विश्वको विमोहित करनेवाला मण्डप बनाया गया है ॥२ ॥

मंगल द्रब्य मनोहरमनोहर नाना ॥ राजत बाजत बिपुल निसाना ॥

कतहुँ बिरिद बंदी उच्चरहीं । कतहुँ बेद धुनि भूसुर करहीं ॥

अनेकों प्रकारके मनोहर माङ्गलिक पदार्थ शोभित हो रहे हैं और बहुत-से नगाड़े बज रहे हैं । कहीं भाट विरुदावली ( कुलकीर्ति ) का उच्चारण कर रहे हैं और कहीं ब्राह्मण वेदध्वनि कर रहे हैं ॥ ३ ॥

गावहिं सुंदरि मंगल गीता । लै लै नामु रामु अरु सीता ॥

बहुत उछाहु भवनु अति थोरा । मानहुँ उमगि चला चहु ओरा ॥

सुन्दरी स्त्रियाँ श्रीरामजी और श्रीसीताजीका नाम ले - लेकर मङ्गलगीत गा रही हैं । उत्साह बहुत है और महल अत्यन्त ही छोटा है । इससे [उसमें न समाकर] मानो वह उत्साह ( आनन्द ) चारों ओर उमड़ चला है ॥ ४ ॥

दो० – सोभा दसरथ भवन कइ को कबि बरनै पार ।

जहाँ सकल सुर सीस मनि राम लीन्ह अवतार ॥ २ ९ ७ ॥

दशरथके महलकी शोभाका वर्णन कौन कवि कर सकता है, जहाँ समस्त देवताओंके शिरोमणि रामचन्द्रजीने अवतार लिया है ॥ २ ९७ ॥

भूप भरत पुनि लिए बोलाई । हय गय स्यंदन साजहु जाई ॥

चलहु बेगि रघुबीर बराता । सुनत पुलक पूरे दोउ भ्राता ॥

पृष्ठ 284

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* *२८२ रामचरितमानस फिर राजाने भरतजीको बुला लिया और कहा कि जाकर घोड़े, हाथी और रथ सजाओ, जल्दी रामचन्द्रजीकी बारातमें चलो । यह सुनते ही दोनों भाई ( भरतजी और शत्रुघ्नजी ) आनन्दवश पुलकसे भर गये ॥१ ॥

भरत सकल साहनी बोलाए । आयसु दीन्ह मुदित उठि धाए ॥

रचि रुचि जीन तुरग तिन्ह साजे । बरन बरन बर बाजि बिराजे ॥

भरतजीने सब साहनी ( घुड़सालके अध्यक्ष ) बुलाये और उन्हें [ घोड़ोंको सजानेकी ] आज्ञा दी, वे प्रसन्न होकर उठ दौड़े । उन्होंने रुचिके साथ ( यथायोग्य ) जीनें कसकर घोड़े सजाये । रंग -रंगके उत्तम घोड़े शोभित हो गये ॥ २ ॥

सुभग सकल सुठि चंचल करनी । अय इव जरत धरत पग धरनी ॥

नाना जाति न जाहिं बखाने । निदरि पवनु जनु चहत उड़ाने ॥

सब घोड़े बड़े ही सुन्दर और चञ्चल करनी (चाल) के हैं । वे धरतीपर ऐसे पैर रखते हैं जैसे जलते हुए लोहेपर रखते हों । अनेकों जातिके घोड़े हैं, जिनका वर्णन नहीं हो सकता । [ ऐसी तेज चालके हैं ] मानो हवाका निरादर करके उड़ना चाहते हैं ॥ ३ ॥

तिन्ह सब छयल भए असवारा । भरत सरिस बय राजकुमारा ॥

सब सुंदर सब भूषनधारी । कर सर चाप तून कटि भारी ॥

उन सब घोड़ोंपर भरतजीके समान अवस्थावाले सब छैल- छबीले राजकुमार सवार हुए । वे सभी सुन्दर हैं और सब आभूषण धारण किये हुए हैं । उनके हाथोंमें बाण और धनुष हैं तथा कमरमें भारी तरकस बँधे हैं ॥ ४ ॥

दो० – छरे छबीले छयल सब सूर सुजान नबीन ।

जुग पदचर असवार प्रति जे असिकला प्रबीन ॥ २९ ८ ॥

सभी चुने हुए छबीले छैल, शूरवीर, चतुर और नवयुवक हैं । प्रत्येक सवारके साथ दो पैदल सिपाही हैं, जो तलवार चलानेकी कलामें बड़े निपुण हैं ॥ २ ९ ८ ॥

बाँधें बिरद बीर रन गाढ़े । निकसि भए पुर बाहेर ठाढ़े ॥

फेरहिं चतुर तुरग गति नाना । हरषहिं सुनि सुनि पनव निसाना ॥

शूरताका बाना धारण किये हुए रणधीर वीर सब निकलकर नगरके बाहर आ खड़े हुए । वे चतुर अपने घोड़ोंको तरह- तरहकी चालोंसे फेर रहे हैं और भेरी तथा नगाड़ेकी आवाज सुन- सुनकर प्रसन्न हो रहे हैं ॥१ ॥

रथ सारथिन्ह बिचित्र बनाए । ध्वज पताक मनि भूषन लाए ॥

चवँर चारु किंकिनि धुनि करहीं । भानु जान सोभा अपहरहीं ॥

पृष्ठ 285

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* बालकाण्ड * २८३ सारथियोंने ध्वजा, पताका, मणि और आभूषणोंको लगाकर रथोंको बहुत विलक्षण बना दिया है । उनमें सुन्दर चँवर लगे हैं और घंटियाँ सुन्दर शब्द कर रही हैं । वे रथ इतने सुन्दर हैं मानो सूर्यके रथकी शोभाको छीने लेते हैं ॥२ ॥

सावँकरन अगनित हय होते । ते तिन्ह रथन्ह सारथिन्ह जोते ॥

सुंदर सकल अलंकृत सोहे । जिन्हहि बिलोकत मुनि मन मोहे ॥

अगणित श्यामकर्ण घोड़े थे । उनको सारथियोंने उन रथोंमें जोत दिया है, जो सभी देखनेमें सुन्दर और गहनोंसे सजाये हुए सुशोभित हैं, और जिन्हें देखकर मुनियोंके मन भी मोहित हो जाते हैं ॥३ ॥

जे जल चलहिं थलहि की नाईं । टाप न बूड़ बेग अधिकाई ॥

अस्त्र सस्त्र सबु साजु बनाई । रथी सारथिन्ह लिए बोलाई ॥

जो जलपर भी जमीनकी तरह ही चलते हैं । वेगकी अधिकतासे उनकी टाप पानीमें नहीं डूबती ।

अस्त्र- शस्त्र और सब साज सजाकर सारथियोंने रथियोंको बुला लिया ॥४ ॥

दो० – चढ़ि चढ़ि रथ बाहेर नगर लागी जुरन बरात ।

होत सगुन सुंदर सबहि जो जेहि कारज जात ॥ २ ९९ ॥

रथोंपर चढ़ - चढ़कर बारात नगरके बाहर जुटने लगी । जो जिस कामके लिये जाता है, सभीको सुन्दर शकुन होते हैं ॥ २ ९९ ॥

कलित करिबरन्हि परीं अँबारीं । कहि न जाहिं जेहि भाँति सँवारीं ॥

चले मत्त गज घंट बिराजी । मनहुँ सुभग सावन घन राजी ॥

श्रेष्ठ हाथियोंपर सुन्दर अंबारियाँ पड़ी हैं । वे जिस प्रकार सजायी गयी थीं, सो कहा नहीं जा सकता । मतवाले हाथी घंटोंसे सुशोभित होकर ( घंटे बजाते हुए ) चले, मानो सावनके सुन्दर बादलोंके समूह [ गरजते हुए ] जा रहे हों ॥१ ॥

बाहन अपर अनेक बिधाना । सिबिका सुभग सुखासन जाना ॥

तिन्ह चढ़ि चले बिप्रबर बृंदा । जनु तनु धरें सकल श्रुति छंदा ॥

सुन्दर पालकियाँ, सुखसे बैठने योग्य तामजान (जो कुर्सीनुमा होते हैं ) और रथ आदि और भी अनेकों प्रकारकी सवारियाँ हैं । उनपर श्रेष्ठ ब्राह्मणोंके समूह चढ़कर चले, मानो सब वेदोंके छन्द ही शरीर धारण किये हुए हों ॥२ ॥

मागध सूत बंदि गुनगायक । चले जान चढ़ि जो जेहि लायक ॥

बेसर ऊँट बृषभ बहु जाती । चले बस्तु भरि अगनित भाँती ॥

पृष्ठ 286

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* *२८४ रामचरितमानस

मागध, सूत, भाट और गुण गानेवाले सब, जो जिस योग्य थे, वैसी सवारीपर चढ़कर चले ।

बहुत जातियोंके खच्चर, ऊँट और बैल असंख्यों प्रकारकी वस्तुएँ लाद -लादकर चले ॥३ ॥

कोटिन्ह काँवरि चले कहारा । बिबिध बस्तु को बरनै पारा ॥

चले सकल सेवक समुदाई । निज निज साजु समाजु बनाई ॥

कहार करोड़ों काँवरें लेकर चले । उनमें अनेकों प्रकारकी इतनी वस्तुएँ थीं कि जिनका वर्णन कौन कर सकता है । सब सेवकोंके समूह अपना- अपना साज- समाज बनाकर चले ॥४ ॥

दो० – सब कें उर निर्भर हरषु पूरित पुलक सरीर ।

कबहिं देखिबे नयन भरि रामु लखनु दोउ बीर ॥ ३०० ॥

सबके हृदयमें अपार हर्ष है और शरीर पुलकसे भरे हैं । [ सबको एक ही लालसा लगी है कि] हम श्रीराम - लक्ष्मण दोनों भाइयोंको नेत्र भरकर कब देखेंगे ॥ ३०० ॥

गरजहिं गज घंटा धुनि घोरा । रथ रव बाजि हिंस चहु ओरा ॥

निदरि घनहि घुमरहिं निसाना । निज पराइ कछु सुनिअ न काना ॥

हाथी गरज रहे हैं, उनके घंटोंकी भीषण ध्वनि हो रही है । चारों ओर रथोंकी घरघराहट और घोड़ोंकी हिनहिनाहट हो रही है । बादलोंका निरादर करते हुए नगाड़े घोर शब्द कर रहे हैं । किसीको अपनी- परायी कोई बात कानोंसे सुनायी नहीं देती ॥ १ ॥

महा भीर भूपति के द्वारें । रज होइ जाइ पषान पबारें ॥

चढ़ी अटारिन्ह देखहिं नारीं । लिएँ आरती मंगल थारीं ॥

राजा दशरथके दरवाजेपर इतनी भारी भीड़ हो रही है कि वहाँ पत्थर फेंका जाय तो वह भी पिसकर धूल हो जाय । अटारियोंपर चढ़ी स्त्रियाँ मङ्गल - थालोंमें आरती लिये देख रही हैं ॥ २ ॥

गावहिं गीत मनोहर नाना । अति आनंदु न जाइ बखाना ॥

तब सुमंत्र दुइ स्यंदन साजी । जोते रबि हय निंदक बाजी ॥

और नाना प्रकारके मनोहर गीत गा रही हैं । उनके अत्यन्त आनन्दका बखान नहीं हो सकता । तब सुमन्त्रजीने दो रथ सजाकर उनमें सूर्यके घोड़ोंको भी मात करनेवाले घोड़े जोते ॥३ ॥

दोउ रथ रुचिर भूप पहिं आने । नहिं सारद पहिं जाहिं बखाने ॥

राज समाजु एक रथ साजा । दूसर तेज पुंज अति भ्राजा ॥

दोनों सुन्दर रथ वे राजा दशरथके पास ले आये, जिनकी सुन्दरताका वर्णन सरस्वतीसे भी नहीं हो सकता । एक रथपर राजसी सामान सजाया गया । और दूसरा जो तेजका पुंज और अत्यन्त ही शोभायमान था, ॥ ४ ॥

पृष्ठ 287

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* बालकाण्ड * २८५

दो० — तेहिं रथ रुचिर बसिष्ठ कहुँ हरषि चढ़ाइ नरेसु ।

आपु चढ़ेउ स्यंदन सुमिरि हर गुर गौरि गनेसु ॥ ३०१ ॥

उस सुन्दर रथपर राजा वसिष्ठजीको हर्षपूर्वक चढ़ाकर फिर स्वयं शिव, गुरु, गौरी ( पार्वती ) और गणेशजीका स्मरण करके [ दूसरे ] रथपर चढ़े ॥ ३०१ ॥

सहित बसिष्ठ सोह नृप कैसें । सुर गुर संग पुरंदर जैसें ॥

करि कुल रीति बेद बिधि राऊ । देखि सबहि सब भाँति बनाऊ ॥

वसिष्ठजीके साथ [ जाते हुए ] राजा दशरथजी कैसे शोभित हो रहे हैं, जैसे देवगुरु बृहस्पतिजीके साथ इन्द्र हों । वेदकी विधिसे और कुलकी रीतिके अनुसार सब कार्य करके तथा सबको सब प्रकारसे सजे देखकर, ॥ १ ॥

सुमिरि रामु गुर आयसु पाई । चले महीपति संख बजाई ॥

हरषे बिबुध बिलोकि बराता । बरषहिं सुमन सुमंगल दाता ॥

श्रीरामचन्द्रजीका स्मरण करके, गुरुकी आज्ञा पाकर पृथ्वीपति दशरथजी शंख बजाकर चले ।

बारात देखकर देवता हर्षित हुए और सुन्दर मङ्गलदायक फूलोंकी वर्षा करने लगे ॥२ ॥

भयउ कोलाहल हय गय गाजे I॥ ब्योम बरात बाजने बाजे ॥

सुर नर नारि सुमंगल गाईं । सरस राग बाजहिं सहनाईं ॥

बड़ा शोर मच गया, घोड़े और हाथी गरजने लगे । आकाशमें और बारातमें [ दोनों जगह ] बाजे बजने लगे । देवाङ्गनाएँ और मनुष्योंकी स्त्रियाँ सुन्दर मङ्गलगान करने लगीं और रसीले रागसे शहनाइयाँ बजने लगीं ॥ ३ ॥

घंट घंटि धुनि बरनि न जाहीं । सरव करहिं पाइक फहराहीं ॥

करहिं बिदूषक कौतुक नाना । हास कुसल कल गान सुजाना ॥

घंटे - घंटियोंकी ध्वनिका वर्णन नहीं हो सकता । पैदल चलनेवाले सेवकगण अथवा पट्टेबाज कसरतके खेल कर रहे हैं और फहरा रहे हैं ( आकाशमें ऊँचे उछलते हुए जा रहे हैं ) । हँसी करनेमें निपुण और सुन्दर गानेमें चतुर विदूषक ( मसखरे ) तरह- तरहके तमाशे कर रहे हैं ॥ ४ ॥

दो० - तुरग नचावहिं कुअँर बर अकनि मृदंग निसान ।

नागर नट चितवहिं चकित डगहिं न ताल बँधान ॥ ३०२ ॥

सुन्दर राजकुमार मृदङ्ग और नगाड़ेके शब्द सुनकर घोड़ोंको उन्हींके अनुसार इस प्रकार नचा रहे हैं कि वे तालके बंधानसे जरा भी डिगते नहीं हैं । चतुर नट चकित होकर यह देख रहे हैं ॥ ३०२ ॥

पृष्ठ 288

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*:*२८६ रामचरितमानस

बनइ न बरनत बनी बराता । होहिं सगुन सुंदर सुभदाता ॥

चारा चाषु बाम दिसि लेई । मनहुँ सकल मंगल कहि देई ॥

बारात ऐसी बनी है कि उसका वर्णन करते नहीं बनता । सुन्दर शुभदायक शकुन हो रहे हैं । नीलकंठ पक्षी बायीं ओर चारा ले रहा है, मानो सम्पूर्ण मङ्गलोंकी सूचना दे रहा हो ॥ १ ॥

दाहिन काग सुखेत सुहावा । नकुल दरसु सब काहूँ पावा ॥

सानुकूल बह त्रिबिध बयारी । सघट सबाल आव बर नारी ॥

दाहिनी ओर कौआ सुन्दर खेतमें शोभा पा रहा है । नेवलेका दर्शन भी सब किसीने पाया । तीनों प्रकारकी ( शीतल, मन्द, सुगन्धित) हवा अनुकूल दिशामें चल रही है । श्रेष्ठ ( सुहागिनी ) स्त्रियाँ भरे हुए घड़े और गोदमें बालक लिये आ रही हैं ॥ २ ॥

लोवा फिरि फिरि दरसु देखावा । सुरभी सनमुख सिसुहि पिआवा ॥

मृगमाला फिरि दाहिनि आई । मंगल गन जनु दीन्हि देखाई ॥

लोमड़ी फिर- फिरकर ( बार-बार ) दिखायी दे जाती है । गायें सामने खड़ी बछड़ोंको दूध पिलाती हैं । हरिनोंकी टोली [ बायीं ओरसे ] घूमकर दाहिनी ओरको आयी, मानो सभी मङ्गलोंका समूह दिखायी दिया ॥३ ॥

छेमकरी कह छेम बिसेषी । स्यामा बाम सुतरु पर देखी ॥

सनमुख आयउ दधि अरु मीना । कर पुस्तक दुइ बिप्र प्रबीना ॥

क्षेमकरी ( सफेद सिरवाली चील ) विशेष रूपसे क्षेम ( कल्याण ) कह रही है । श्यामा बायीं ओर सुन्दर पेड़पर दिखायी पड़ी । दही, मछली और दो विद्वान् ब्राह्मण हाथमें पुस्तक लिये हुए सामने आये ॥४ ॥

दो० –- मंगलमय कल्यानमय अभिमत फल दातार ।

जनु सब साचे होन हित भए सगुन एक बार ॥ ३०३ ॥

सभी मङ्गलमय, कल्याणमय और मनोवाञ्छित फल देनेवाले शकुन मानो सच्चे होनेके लिये एक ही साथ हो गये ॥३०३ ॥

मंगल सगुन सुगम सब ताकें । सगुन ब्रह्म सुंदर सुत जाकें ॥

राम सरिस बरु दुलहिनि सीता । समधी दसरथु जनकु पुनीता ॥

स्वयं सगुण ब्रह्म जिसके सुन्दर पुत्र हैं, उसके लिये सब मङ्गल शकुन सुलभ हैं । जहाँ श्रीरामचन्द्रजी - सरीखे दूल्हा और सीताजी -जैसी दुलहिन हैं तथा दशरथजी और जनकजी -जैसे पवित्र समधी हैं, ॥१ ॥

पृष्ठ 289

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* बालकाण्ड * २८७

सुनि अस ब्याहु सगुन सब नाचे । अब कीन्हे बिरंचि हम साँचे ॥

एहि बिधि कीन्ह बरात पयाना । हय गय गाजहिं हने निसाना ॥

ऐसा ब्याह सुनकर मानो सभी शकुन नाच उठे [ और कहने लगे– ] अब ब्रह्माजीने हमको सच्चा कर दिया । इस तरह बारातने प्रस्थान किया । घोड़े, हाथी गरज रहे हैं और नगाड़ोंपर चोट लग रही है ॥२ ॥

आवत जानि भानुकुल केतू । सरितन्हि जनक बँधाए सेतू ॥

बीच बीच बर बास बनाए । सुरपुर सरिस संपदा छाए ॥

सूर्यवंशके पताकास्वरूप दशरथजीको आते हुए जानकर जनकजीने नदियोंपर पुल बँधवा दिये । बीच- बीचमें ठहरनेके लिये सुन्दर घर ( पड़ाव ) बनवा दिये, जिनमें देवलोकके समान सम्पदा छायी है, ॥ ३ ॥

असन सयन बर बसन सुहाए । पावहिं सब निज निज मन भाए ॥

नित नूतन सुख लखि अनुकूले । सकल बरातिन्ह मंदिर भूले ॥

और जहाँ बारातके सब लोग अपने -अपने मनकी पसंदके अनुसार सुहावने उत्तम भोजन, बिस्तर और वस्त्र पाते हैं । मनके अनुकूल नित्य नये सुखोंको देखकर सभी बरातियोंको अपने घर भूल गये ॥४ ॥

दो० – आवत जानि बरात बर सुनि गहगहे निसान ।

सजि गज रथ पदचर तुरग लेन चले अगवान ॥ ३०४ ॥

बड़े जोरसे बजते हुए नगाड़ोंकी आवाज सुनकर श्रेष्ठ बारातको आती हुई जानकर अगवानी करनेवाले हाथी, रथ, पैदल और घोड़े सजाकर बारात लेने चले ॥ ३०४ ॥

मासपारायण, दसवाँ विश्राम

कनक कलस भरि कोपर थारा । भाजन ललित अनेक प्रकारा ॥

भरे सुधासम सब पकवाने । नाना भाँति न जाहिं बखाने ॥

[ दूध, शर्बत, ठंढाई, जल आदिसे ] भरकर सोनेके कलश तथा जिनका वर्णन नहीं हो सकता ऐसे अमृतके समान भाँति- भाँतिके सब पकवानोंसे भरे हुए परात, थाल आदि अनेक प्रकारके सुन्दर बर्तन, ॥ १ ॥

फल अनेक बर बस्तु सुहाईं ॥ हरषि भेंट हित भूप पठाई ॥

भूषन बसन महामनि नाना । खग मृग हय गय बहु बिधि जाना ॥

उत्तम फल तथा और भी अनेकों सुन्दर वस्तुएँ राजाने हर्षित होकर भेंटके लिये भेजीं । गहने, कपड़े, नाना प्रकारकी मूल्यवान् मणियाँ ( रत्न), पक्षी, पशु, घोड़े, हाथी और बहुत तरहकी सवारियाँ, ॥ २ ॥

पृष्ठ 290

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* *२८८ रामचरितमानस

मंगल सगुन सुगंधसुगंध सुहाए । बहुत भाँति महिपाल पठाए ॥

दधि चिउरा उपहार अपारा । भरि भरि काँवरि चले कहारा ॥

तथा बहुत प्रकारके सुगन्धित एवं सुहावने मङ्गल- द्रव्य और सगुनके पदार्थ राजाने भेजे । दही, चिउड़ा और अगणित उपहारकी चीजें काँवरोंमें भर- भरकर कहार चले ॥३ ॥

अगवानन्ह जब दीखि बराता । उर आनंदु पुलक भर गाता ॥

देखि बनाव सहित अगवाना । मुदित बरातिन्ह हने निसाना ॥

अगवानी करनेवालोंको जब बारात दिखायी दी, तब उनके हृदयमें आनन्द छा गया और शरीर रोमाञ्चसे भर गया । अगवानोंको सज- धजके साथ देखकर बरातियोंने प्रसन्न होकर नगाड़े बजाये ॥४ ॥

दो० – हरषि परसपर मिलन हित कछुक चले बगमेल ।

जनु आनंद समुद्र दुइ मिलत बिहाइ सुबेल ॥ ३०५ ॥

[बराती तथा अगवानोंमेंसे ] कुछ लोग परस्पर मिलनेके लिये हर्षके मारे बाग छोड़कर ( सरपट ) दौड़ चले, और ऐसे मिले मानो आनन्दके दो समुद्र मर्यादा छोड़कर मिलते हों ॥ ३०५ ॥

बरषि सुमन सुर सुंदरि गावहिं । मुदित देव दुंदुभीं बजावहिं ॥

बस्तु सकल राखीं नृप आगें । बिनय कीन्हि तिन्ह अति अनुरागें ॥

देवसुन्दरियाँ फूल बरसाकर गीत गा रही हैं, और देवता आनन्दित होकर नगाड़े बजा रहे हैं । [ अगवानीमें आये हुए ] उन लोगोंने सब चीजें दशरथजीके आगे रख दीं और अत्यन्त प्रेमसे विनती की ॥१ ॥

प्रेम समेत रायँ सबु लीन्हा । भै बकसीस जाचकन्हि दीन्हा ॥

करि पूजा मान्यता बड़ाई । जनवासे कहूँ चले लवाई ॥

राजा दशरथजीने प्रेमसहित सब वस्तुएँ ले लीं, फिर उनकी बख्शीशें होने लगीं और वे याचकोंको दे दी गयीं । तदनन्तर पूजा, आदर-सत्कार और बड़ाई करके अगवान लोग उनको जनवासेकी ओर लिवा ले चले ॥ २ ॥

बसन बिचित्र पाँवड़े परहीं । देखि धनदु धन मदु परिहरहीं ॥

अति सुंदर दीन्हेउ जनवासा । जहँ सब कहूँ सब भाँति सुपासा ॥

विलक्षण वस्त्रोंके पाँवड़े पड़ रहे हैं, जिन्हें देखकर कुबेर भी अपने धनका अभिमान छोड़ देते हैं । बड़ा सुन्दर जनवासा दिया गया, जहाँ सबको सब प्रकारका सुभीता था ॥३ ॥