श्रीरामचरितमानस — पृष्ठ 341–350

श्रीरामचरितमानस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 341–350

पृष्ठ 341

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* बालकाण्ड * ३३ ९

कहहिं बसिष्टु धरम इतिहासा । सुनहिं महीसु सहित रनिवासा ॥

मुनि मन अगम गाधिसुत करनी । मुदित बसिष्ट बिपुल बिधि बरनी ॥

वसिष्ठजी धर्मके इतिहास कह रहे हैं और राजा रनिवाससहित सुन रहे हैं । जो मुनियोंके मनको भी अगम्य है, ऐसी विश्वामित्रजीकी करनीको वसिष्ठजीने आनन्दित होकर बहुत प्रकारसे वर्णन किया ॥ ३ ॥

बोले बामदेउ सब साँची ॥ कीरति कलित लोक तिहुँ माची ॥

सुनि आनंदु भयउ सब काहू । राम लखन उर अधिक उछाहू ॥

वामदेवजी बोले — ये सब बातें सत्य हैं । विश्वामित्रजीकी सुन्दर कीर्ति तीनों लोकोंमें छायी हुई है । यह सुनकर सब किसीको आनन्द हुआ । श्रीराम-लक्ष्मणके हृदयमें अधिक उत्साह ( आनन्द) हुआ ॥ ४ ॥

दो० – मंगल मोद उछाह नित जाहिं दिवस एहि भाँति ।

उमगी अवध अनंद भरि अधिक अधिक अधिकाति ॥ ३५ ९ ॥

नित्य ही मङ्गल, आनन्द और उत्सव होते हैं; इस तरह आनन्दमें दिन बीतते जाते हैं । अयोध्या आनन्दसे भरकर उमड़ पड़ी, आनन्दकी अधिकता अधिक अधिक बढ़ती ही जा रही है ॥ ३५९ ॥

सुदिन सोधि कल कंकन छोरे । मंगल मोद बिनोद न थोरे ॥

नित नव सुखु सुर देखि सिहाहीं । अवध जन्म जाचहिं बिधि पाहीं ॥

अच्छा दिन ( शुभ मुहूर्त ) शोधकर सुन्दर कङ्कण खोले गये । मङ्गल, आनन्द और विनोद कुछ कम नहीं हुए ( अर्थात् बहुत हुए) । इस प्रकार नित्य नये सुखको देखकर देवता सिहाते हैं और अयोध्यामें जन्म पानेके लिये ब्रह्माजीसे याचना करते हैं ॥ १ ॥

बिस्वामित्रु चलन नित चहहीं । राम सप्रेम बिनय बस रहहीं ॥

दिन दिन सयगुन भूपति भाऊ । देखि सराह महामुनिराऊ ॥

विश्वामित्रजी नित्य ही चलना ( अपने आश्रम जाना ) चाहते हैं, पर रामचन्द्रजीके स्नेह और विनयवश रह जाते हैं । दिनों- दिन राजाका सौगुना भाव ( प्रेम) देखकर महामुनिराज विश्वामित्रजी उनकी सराहना करते हैं ॥२ ॥

मागत बिदा राउ अनुरागे । सुतन्ह समेत ठाढ़ भे आगे ॥

नाथ सकल संपदा तुम्हारी । मैं सेवकु समेत सुत नारी ॥

अन्तमें जब विश्वामित्रजीने विदा माँगी, तब राजा प्रेममग्न हो गये और पुत्रोंसहित आगे खड़े हो गये । [ वे बोले— ] हे नाथ! यह सारी सम्पदा आपकी है । मैं तो स्त्री- पुत्रोंसहित आपका सेवक हूँ ॥३ ॥

पृष्ठ 342

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* * ३४० रामचरितमानस

करब सदा लरिकन्ह पर छोहू । दरसनु देत रहब मुनि मोहू ॥

अस कहि राउ सहित सुत रानी । परेउ चरन मुख आव न बानी ॥

हे मुनि! लड़कोंपर सदा स्नेह करते रहियेगा और मुझे भी दर्शन देते रहियेगा । ऐसा कहकर पुत्रों और रानियोंसहित राजा दशरथजी विश्वामित्रजीके चरणोंपर गिर पड़े, [ प्रेमविह्वल हो जानेके कारण ] उनके मुँहसे बात नहीं निकलती ॥ ४ ॥

दीन्हि असीस बिप्र बहु भाँती । चले न प्रीति रीति कहि जाती ॥

रामु सप्रेम संग सब भाई । आयसु पाइ फिरे पहुँचाई ॥

ब्राह्मण विश्वामित्रजीने बहुत प्रकारसे आशीर्वाद दिये और वे चल पड़े, प्रीतिकी रीति कही नहीं जाती । सब भाइयोंको साथ लेकर श्रीरामजी प्रेमके साथ उन्हें पहुँचाकर और आज्ञा पाकर लौटे ॥५ ॥

दो० - राम रूप भूपति भगति ब्याहु उछाहु अनंदु ।

जात सराहत मनहिं मन मुदित गाधिकुलचंदु ॥ ३६० ॥

गाधिकुलके चन्द्रमा विश्वामित्रजी बड़े हर्षके साथ श्रीरामचन्द्रजीके रूप, राजा दशरथजीकी भक्ति, [चारों भाइयोंके ] विवाह और [ सबके ] उत्साह और आनन्दको मन-ही -मन सराहते जाते हैं ॥ ३६० ॥

बामदेव रघुकुल गुर ग्यानी । बहुरि गाधिसुत कथा बखानी ॥

सुनि मुनि सुजसु मनहिं मन राऊ । बरनत आपन पुन्य प्रभाऊ ॥

वामदेवजी और रघुकुलके गुरु ज्ञानी वसिष्ठजीने फिर विश्वामित्रजीकी कथा बखानकर कही ।

मुनिका सुन्दर यश सुनकर राजा मन-ही-मन अपने पुण्योंके प्रभावका बखान करने लगे ॥१ ॥

बहुरे लोग रजायसु भयऊ । सुतन्ह समेत नृपति गृहँ गयऊ ॥

जहँ तहँ राम ब्याहु सबु गावा । सुजसु पुनीत लोक तिहुँ छावा ॥

आज्ञा हुई तब सब लोग [ अपने - अपने घरोंको ] लौटे । राजा दशरथजी भी पुत्रोंसहित महलमें गये । जहाँ- तहाँ सब श्रीरामचन्द्रजीके विवाहकी गाथाएँ गा रहे हैं । श्रीरामचन्द्रजीका पवित्र सुयश तीनों लोकोंमें छा गया ॥२ ॥

आए ब्याहि रामु घर जब तें । बसइ अनंद अवध सब तब तें ॥

प्रभु बिबाहँ जस भयउ उछाहू । सकहिं न बरनि गिरा अहिनाहू ॥

जबसे श्रीरामचन्द्रजी विवाह करके घर आये, तबसे सब प्रकारका आनन्द अयोध्यामें आकर बसने लगा । प्रभुके विवाहमें जैसा आनन्द-उत्साह हुआ, उसे सरस्वती और सर्पोंके राजा शेषजी भी नहीं कह सकते ॥ ३ ॥

पृष्ठ 343

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* बालकाण्ड * ३४१

कबिकुल जीवन पावन जानी । राम सीय जसु मंगल खानी ॥

तेहि ते मैं कछु कहा बखानी । करन पुनीत हेतु निज बानी ॥

श्रीसीतारामजीके यशको कविकुलके जीवनको पवित्र करनेवाला और मङ्गलोंकी खान जानकर, इससे मैंने अपनी वाणीको पवित्र करनेके लिये कुछ ( थोड़ा -सा ) बखानकर कहा है ॥ ४ ॥

छं० – निज गिरा पावनि करन कारन राम जसु तुलसीं कह्यो ।

रघुबीर चरित अपार बारिधि पारु कबि कौनें लह्यो ॥

उपबीत ब्याह उछाह मंगल सुनि जे सादर गावहीं ।

बैदेहि राम प्रसाद ते जन सर्बदा सुखु पावहीं ॥

अपनी वाणीको पवित्र करनेके लिये तुलसीने रामका यश कहा है । [ नहीं तो ] श्रीरघुनाथजीका चरित्र अपार समुद्र है, किस कविने उसका पार पाया है? जो लोग यज्ञोपवीत और विवाहके मङ्गलमय उत्सवका वर्णन आदरके साथ सुनकर गावेंगे, वे लोग श्रीजानकीजी और श्रीरामजीकी

कृपासे सदा सुख पावेंगे ।

सो० - सिय रघुबीर बिबाहु जे सप्रेम गावहिं सुनहिं ॥

तिन्ह कहुँ सदा उछाहु मंगलायतन राम जसु ॥ ३६१ ॥

श्रीसीताजी और श्रीरघुनाथजीके विवाह -प्रसङ्गको जो लोग प्रेमपूर्वक गायें सुनेंगे, उनके लिये सदा उत्साह ( आनन्द ) -ही -उत्साह है; क्योंकि श्रीरामचन्द्रजीका यश मङ्गलका धाम है ॥ ३६१ ॥

मासपारायण, बारहवाँ विश्राम इति श्रीमद्रामचरितमानसे सकलकलिकलुषविध्वंसने प्रथमः सोपानः समाप्तः । कलियुगके सम्पूर्ण पापोंको विध्वंस करनेवाले श्रीरामचरितमानसका यह पहला सोपान समाप्त हुआ ॥ ( बालकाण्ड समाप्त )

पृष्ठ 344

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केवटके भाग्य

आनंद उमगि अनुरागा । चरन सरोज पखारन लागा ॥

पृष्ठ 345

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॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ श्रीजानकीवल्लभो विजयते श्रीरामचरितमानस द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड

श्लोक

यस्याङ्के च विभाति भूधरसुता देवापगा मस्तके भाले बालविधुर्गले च गरलं यस्योरसि व्यालराट्। :सोऽयं भूतिविभूषणः सुरवर सर्वाधिपः सर्वदा शर्वः सर्वगतः शिवः शशिनिभः श्रीशङ्करः पातु माम्॥१ ॥

जिनकी गोदमें हिमाचलसुता पार्वतीजी, मस्तकपर गङ्गाजी, ललाटपर द्वितीयाका चन्द्रमा, कण्ठमें हलाहल विष और वक्षःस्थलपर सर्पराज शेषजी सुशोभित हैं, वे भस्मसे विभूषित, देवताओंमें श्रेष्ठ, सर्वेश्वर, संहारकर्ता [या भक्तोंके पापनाशक ], सर्वव्यापक, कल्याणरूप, चन्द्रमाके समान शुभ्रवर्ण श्रीशङ्करजी सदा मेरी रक्षा करें ॥ १ ॥

प्रसन्नतां या न गताभिषेकतस्तथा न मम्ले वनवासदुःखतः ।

मुखाम्बुजश्री रघुनन्दनस्य मे सदास्तु सा मञ्जुलमङ्गलप्रदा ॥ २ ॥

रघुकुलको आनन्द देनेवाले श्रीरामचन्द्रजीके मुखारविन्दकी जो शोभा राज्याभिषेकसे ( राज्याभिषेककी बात सुनकर ) न तो प्रसन्नताको प्राप्त हुई और न वनवासके दुःखसे मलिन ही हुई, वह ( मुखकमलकी छबि ) मेरे लिये सदा सुन्दर मङ्गलोंकी देनेवाली हो ॥२ ॥

नीलाम्बुजश्यामलकोमलाङ्गं सीतासमारोपितवामभागम् ।

पाणौ महासायकचारुचापं नमामि रामं रघुवंशनाथम् ॥३ ॥

पृष्ठ 346

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* *३४४ रामचरितमानस नीले कमलके समान श्याम और कोमल जिनके अङ्ग हैं, श्रीसीताजी जिनके वाम भागमें विराजमान हैं और जिनके हाथोंमें [क्रमशः ] अमोघ बाण और सुन्दर धनुष है, उन रघुवंशके स्वामी श्रीरामचन्द्रजीको मैं नमस्कार करता हूँ॥३ ॥

दो०- श्रीगुरु चरन सरोज रज निज मनु मुकुरु सुधारि ।

बरनउँ रघुबर बिमल जसु जो दायकु फल चारि ॥

श्रीगुरुजीके चरणकमलोंकी रजसे अपने मनरूपी दर्पणको साफ करके मैं श्रीरघुनाथजीके उस निर्मल यशका वर्णन करता हूँ, जो चारों फलोंको ( धर्म, अर्थ, काम, मोक्षको ) देनेवाला है ।

जब तें रामु ब्याहि घर आए । नित नव मंगल मोद बधाए ॥

भुवन चारिदस भूधर भारी । सुकृत मेघ बरषहिं सुख बारी ॥

जबसे श्रीरामचन्द्रजी विवाह करके घर आये, तबसे [ अयोध्यामें ] नित्य नये मङ्गल हो रहे हैं और आनन्दके बधावे बज रहे हैं । चौदहों लोकरूपी बड़े भारी पर्वतोंपर पुण्यरूपी मेघ सुखरूपी जल बरसा रहे हैं ॥ १ ॥

रिधि सिधि संपति नदीं सुहाई । उमगि अवध अंबुधि कहुँ आई ॥

मनिगन पुर नर नारि सुजाती । सुचि अमोल सुंदर सब भाँती ॥

ऋद्धि - सिद्धि और सम्पत्तिरूपी सुहावनी नदियाँ उमड़- उमड़कर अयोध्यारूपी समुद्रमें आ मिलीं । नगरके स्त्री- पुरुष अच्छी जातिके मणियोंके समूह हैं, जो सब प्रकारसे पवित्र, अमूल्य सुन्दर हैं ॥२ ॥

कहि न जाइ कछु नगर बिभूती । जनु एतनिअ बिरंचि करतूती ॥

सब बिधि सब पुर लोग सुखारी । रामचंद मुख चंदु निहारी ॥

नगरका ऐश्वर्य कुछ कहा नहीं जाता । ऐसा जान पड़ता है, मानो ब्रह्माजीकी कारीगरी बस इतनी ही है । सब नगरनिवासी श्रीरामचन्द्रजीके मुखचन्द्रको देखकर सब प्रकारसे सुखी हैं ॥३ ॥

मुदित मातु सब सखी सहेली । फलित बिलोकि मनोरथ बेली ॥

राम रूपु गुन सीलु सुभाऊ । प्रमुदित होइ देखि सुनि राऊ ॥

सब माताएँ और सखी - सहेलियाँ अपनी मनोरथरूपी बेलको फली हुई देखकर आनन्दित हैं । श्रीरामचन्द्रजीके रूप, गुण, शील और स्वभावको देख- सुनकर राजा दशरथजी बहुत ही आनन्दित होते हैं ॥४ ॥

दो० — सब कें उर अभिलाषु अस कहहिं मनाइ महेसु ।

आप अछत जुबराज पद रामहि देउ नरेसु ॥ १ ॥

पृष्ठ 347

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* ** अयोध्याकाण्ड ३४५ सबके हृदयमें ऐसी अभिलाषा है और सब महादेवजीको मनाकर (प्रार्थना करके ) कहते हैं कि राजा अपने जीते-जी श्रीरामचन्द्रजीको युवराजपद दे दें ॥ १ ॥

एक समय सब सहित समाजा । राजसभाँ रघुराजु बिराजा ॥

सकल सुकृत मूरति नरनाहू । राम सुजसु सुनि अतिहि उछाहू ॥

एक समय रघुकुलके राजा दशरथजी अपने सारे समाजसहित राजसभामें विराजमान थे । महाराज समस्त पुण्योंकी मूर्ति हैं, उन्हें श्रीरामचन्द्रजीका सुन्दर यश सुनकर अत्यन्त आनन्द हो रहा है ॥१ ॥

नृप सब रहहिं कृपा अभिलाषें । लोकप करहिं प्रीति रुख राखें ॥

तिभुवन तीनि काल जग माहीं । भूरिभाग दसरथ सम नाहीं ॥

सब राजा उनकी कृपा चाहते हैं और लोकपालगण उनके रुखको रखते हुए ( अनुकूल होकर) प्रीति करते हैं । [ पृथ्वी, आकाश, पाताल ] तीनों भुवनोंमें और [ भूत, भविष्य, वर्तमान ] तीनों कालोंमें दशरथजीके समान बड़भागी [ और ] कोई नहीं है ॥२ ॥

मंगलमूल रामु सुत जासू । जो कछु कहिअ थोर सबु तासू॥

रायँ सुभायँ मुकुरु कर लीन्हा । बदनु बिलोकि मुकुटु सम कीन्हा ॥

मङ्गलोंके मूल श्रीरामचन्द्रजी जिनके पुत्र हैं, उनके लिये जो कुछ कहा जाय सब थोड़ा है । राजाने स्वाभाविक ही हाथमें दर्पण ले लिया और उसमें अपना मुँह देखकर मुकुटको सीधा किया ॥ ३ ॥

श्रवन समीप भए सित केसा । मनहुँ जरठपनु अस उपदेसा ॥

नृप जुबराजु राम कहुँ देहू । जीवन जनम लाहु किन लेहू ॥

[ देखा कि ] कानोंके पास बाल सफेद हो गये हैं, मानो बुढ़ापा ऐसा उपदेश कर रहा है कि हे राजन्! श्रीरामचन्द्रजीको युवराज-पद देकर अपने जीवन और जन्मका लाभ क्यों नहीं लेते ॥४ ॥

दो० – यह बिचारु उर आनि नृप सुदिनु सुअवसरु पाइ ।

प्रेम पुलकि तन मुदित मन गुरहि सुनायउ जाइ ॥ २ ॥

हृदयमें यह विचार लाकर ( युवराज- पद देनेका निश्चय कर) राजा दशरथजीने शुभ दिन और सुन्दर समय पाकर, प्रेमसे पुलकितशरीर हो आनन्दमग्न मनसे उसे गुरु वसिष्ठजीको जा सुनाया ॥२ ॥

कहइ भुआलु सुनिअ मुनिनायक । भए राम सब बिधि सब लायक ॥

सेवक सचिव सकल पुरबासी । जे हमारे अरि मित्र उदासी ॥

राजाने कहा–हे मुनिराज! [ कृपया यह निवेदन ] सुनिये | श्रीरामचन्द्र अब सब प्रकारसे सब योग्य हो गये हैं । सेवक, मन्त्री, सब नगरनिवासी और जो हमारे शत्रु, मित्र या उदासीन हैं - ॥१ ॥

पृष्ठ 348

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* *३४६ रामचरितमानस

सबहि रामु प्रिय जेहि बिधि मोही । प्रभु असीस जनु तनु धरि सोही ॥

बिप्र सहित परिवार गोसाईं । करहिं छोहु सब रौरिहि नाईं ॥

सभीको श्रीरामचन्द्र वैसे ही प्रिय हैं जैसे वे मुझको हैं । [ उनके रूपमें ] आपका आशीर्वाद ही मानो शरीर धारण करके शोभित हो रहा है । हे स्वामी! सारे ब्राह्मण, परिवारसहित आपके ही समान उनपर स्नेह करते हैं ॥ २ ॥

जे गुर चरन रेनु सिर धरहीं । ते जनु सकल बिभव बस करहीं ॥

मोहि सम यहु अनुभयउ न दूजें । सबु पायउँ रज पावनि पूजें ॥

जो लोग गुरुके चरणोंकी रजको मस्तकपर धारण करते हैं, वे मानो समस्त ऐश्वर्यको अपने वशमें कर लेते हैं । इसका अनुभव मेरे समान दूसरे किसीने नहीं किया । आपकी पवित्र चरण-रजकी पूजा करके मैंने सब कुछ पा लिया ॥३ ॥

अब अभिलाषु एकु मन मोरें । पूजिहि नाथ अनुग्रह तोरें ॥

मुनि प्रसन्न लखि सहज सनेहू । कहेउ नरेस रजायसु देहू ॥

अब मेरे मनमें एक ही अभिलाषा है । हे नाथ! वह भी आपहीके अनुग्रहसे पूरी होगी । राजाका सहज प्रेम देखकर मुनिने प्रसन्न होकर कहा- नरेश! आज्ञा दीजिये ( कहिये, क्या अभिलाषा है? ) ॥ ४ ॥

दो० – राजन राउर नामु जसु सब अभिमत दातार ।

फल अनुगामी महिप मनि मन अभिलाषु तुम्हार ॥ ३ ॥

हे राजन्! आपका नाम और यश ही सम्पूर्ण मनचाही वस्तुओंको देनेवाला है । हे राजाओंके मुकुटमणि! आपके मनकी अभिलाषा फलका अनुगमन करती है ( अर्थात् आपके इच्छा करनेके पहले ही फल उत्पन्न हो जाता है ) ॥ ३ ॥

सब बिधि गुरु प्रसन्न जियँ जानी । बोलेउ राउ रहँसि मृदु बानी ॥

नाथ रामु करिअहिं जुबराजू । कहिअ कृपा करि करिअ समाजू ॥

अपने जीमें गुरुजीको सब प्रकारसे प्रसन्न जानकर, हर्षित होकर राजा कोमल वाणीसे बोले — हे नाथ! श्रीरामचन्द्रको युवराज कीजिये । कृपा करके कहिये ( आज्ञा दीजिये ) तो तैयारी की जाय ॥१ ॥

मोहि अछत यहु होइ उछाहू । लहहिं लोग सब लोचन लाहू॥

प्रभु प्रसाद सिव सबड़ निबाहीं । यह लालसा एक मन माहीं ॥

मेरे जीते-जी यह आनन्द-उत्सव हो जाय, [जिससे ] सब लोग अपने नेत्रोंका लाभ प्राप्त करें । प्रभु ( आप ) -के प्रसादसे शिवजीने सब कुछ निबाह दिया ( सब इच्छाएँ पूर्ण कर दीं ), केवल यही एक लालसा मनमें रह गयी है ॥ २ ॥

पृष्ठ 349

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* ** अयोध्याकाण्ड ३४७

पुनि न सोच तनु रहउ कि जाऊ । जेहिं न होइ पाछें पछिताऊ ॥

सुनि मुनि दसरथ बचन सुहाए । मंगल मोद मूल मन भाए ॥

[ इस लालसाके पूर्ण हो जानेपर ] फिर सोच नहीं, शरीर रहे या चला जाय, जिससे मुझे पीछे पछतावा न हो । दशरथजीके मङ्गल और आनन्दके मूल सुन्दर वचन सुनकर मुनि मनमें बहुत प्रसन्न हुए ॥३ ॥

सुनु नृप जासु बिमुख पछिताहीं । जासु भजन बिनु जरनि न जाहीं ॥

भयउ तुम्हार तनय सोइ स्वामी । रामु पुनीत प्रेम अनुगामी ॥

[वसिष्ठजीने कहा- ] हे राजन्! सुनिये, जिनसे विमुख होकर लोग पछताते हैं और जिनके भजन बिना जीकी जलन नहीं जाती, वही स्वामी ( सर्वलोकमहेश्वर ) श्रीरामजी आपके पुत्र हुए हैं, जो पवित्र प्रेमके अनुगामी हैं । [ श्रीरामजी पवित्र प्रेमके पीछे -पीछे चलनेवाले हैं, इसीसे तो प्रेमवश आपके पुत्र हुए हैं ] ॥४ ॥

दो० –- बेगि बिलंबु न करिअ नृप साजिअ सबुइ समाजु ।

सुदिन सुमंगल तबहिं जब रामु होहिं जुबराजु ॥ ४ ॥

हे राजन्! अब देर न कीजिये; शीघ्र सब सामान सजाइये । शुभ दिन और सुन्दर मङ्गल तभी है जब श्रीरामचन्द्रजी युवराज हो जायँ ( अर्थात् उनके अभिषेकके लिये सभी दिन शुभ और मङ्गलमय हैं ) ॥४ ॥

मुदित महीपति मंदिर आए । सेवक सचिव सुमंत्र बोलाए ॥

कहि जयजीव सीस तिन्ह नाए । भूप सुमंगल बचन सुनाए ॥

राजा आनन्दित होकर महलमें आये और उन्होंने सेवकोंको तथा मन्त्री सुमन्त्रको बुलवाया उन लोगोंने ‘ जय-जीव ' कहकर सिर नवाये । तब राजाने सुन्दर मङ्गलमय वचन ( श्रीरामजीको युवराज-- पद देनेका प्रस्ताव ) सुनाये ॥१ ॥

जौं पाँचहि मत लागै नीका । करहु हरषि हियँ रामहि टीका ॥

[ और कहा- ] यदि पंचोंको ( आप सबको ) यह मत अच्छा लगे, तो हृदयमें हर्षित होकर आपलोग श्रीरामचन्द्रका राजतिलक कीजिये ॥ २ ॥

मंत्री मुदित सुनत प्रिय बानी । अभिमत बिरवँ परेउ जनु पानी ॥

बिनती सचिव करहिं कर जोरी । जिअहु जगतपति बरिस करोरी ॥

इस प्रिय वाणीको सुनते ही मन्त्री ऐसे आनन्दित हुए मानो उनके मनोरथरूपी पौधेपर पानी पड़ गया हो । मन्त्री हाथ जोड़कर विनती करते हैं कि हे जगत्पति! आप करोड़ों वर्ष जियें ॥ ३ ॥

पृष्ठ 350

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* *३४८ रामचरितमानस

जग मंगल भल काजु बिचारा । बेगिअ नाथ न लाइअ बारा ॥

नृपहि मोदु सुनि सचिव सुभाषा । बढ़त बौंड़ जनु लही सुसाखा ॥

आपने जगत्भरका मङ्गल करनेवाला भला काम सोचा है । हे नाथ! शीघ्रता कीजिये, देर न लगाइये । मन्त्रियोंकी सुन्दर वाणी सुनकर राजाको ऐसा आनन्द हुआ मानो बढ़ती हुई बेल सुन्दर डालीका सहारा पा गयी हो ॥४ ॥

दो० – कहेउ भूप मुनिराज कर जोइ जोइ आयसु होइ ।

राम राज अभिषेक हित बेगि करहु सोइ सोइ ॥ ५ ॥

राजाने कहा-- श्रीरामचन्द्रके राज्याभिषेकके लिये मुनिराज वसिष्ठजीकी जो-जो आज्ञा हो, आपलोग वही सब तुरंत करें ॥ ५ ॥

हरषि मुनीस कहेउ मृदु बानी । आनहु सकल सुतीरथ पानी ॥

औषध मूल फूल फल पाना । कहे नाम गनि मंगल नाना ॥

मुनिराजने हर्षित होकर कोमल वाणीसे कहा कि सम्पूर्ण श्रेष्ठ तीर्थोंका जल ले आओ । फिर उन्होंने ओषधि, मूल, फूल, फल और पत्र आदि अनेकों माङ्गलिक वस्तुओंके नाम गिनकर बताये ॥१ ॥

चामर चरम बसन बहु भाँती । रोम पाट पट अगनित जाती ॥

मनिगन मंगल बस्तु अनेका । जो जग जोगु भूप अभिषेका ॥

चँवर, मृगचर्म, बहुत प्रकारके वस्त्र, असंख्यों जातियोंके ऊनी और रेशमी कपड़े, [ नाना प्रकारकी ] मणियाँ ( रत्न ) तथा और भी बहुत -सी मङ्गल वस्तुएँ, जो जगत्में राज्याभिषेकके योग्य होती हैं [ सबको मँगानेकी उन्होंने आज्ञा दी ] ॥ २ ॥

बेद बिदित कहि सकल बिधाना । कहेउ रचहु पुर बिबिध बिताना ।

सफल रसाल पूगफल केरा । रोपहु बीथिन्ह पुर चहुँ फेरा ॥

मुनिने वेदोंमें कहा हुआ सब विधान बताकर कहा- नगरमें बहुत- से मण्डप ( चँदोवे ) सजाओ । फलोंसमेत आम, सुपारी और केलेके वृक्ष नगरकी गलियोंमें चारों ओर रोप दो ॥३ ॥

रचहु मंजु मनि चौकें चारू । कहहु बनावन बेगि बजारू ॥

पूजहु गनपति गुर कुलदेवा । सब बिधि करहु भूमिसुर सेवा ॥

सुन्दर मणियोंके मनोहर चौक पुरवाओ और बाजारको तुरंत सजानेके लिये कह दो । श्रीगणेशजी, गुरु और कुलदेवताकी पूजा करो और भूदेव ब्राह्मणोंकी सब प्रकारसे सेवा करो ॥ ४ ॥

दो० - ध्वज पताक तोरन कलस सजहु तुरग रथ नाग ।

सिर धरि मुनिबर बचन सबु निज निज काजहिं लाग ॥ ६ ॥