श्रीरामचरितमानस — पृष्ठ 351–360

श्रीरामचरितमानस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 351–360

पृष्ठ 351

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* ** अयोध्याकाण्ड ३४९ ध्वजा, पताका, तोरण, कलश, घोड़े, रथ और हाथी सबको सजाओ । मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठजीके वचनोंको शिरोधार्य करके सब लोग अपने -अपने काममें लग गये ॥६ ॥

जो मुनीस जेहि आयसु दीन्हा । सो तेहिं काजु प्रथम जनु कीन्हा ॥

बिप्र साधु सुर पूजत राजा । करत राम हित मंगल काजा ॥

मुनीश्वरने जिसको जिस कामके लिये आज्ञा दी, उसने वह काम [ इतनी शीघ्रतासे कर डाला कि] मानो पहलेसे ही कर रखा था । राजा ब्राह्मण, साधु और देवताओंको पूज रहे हैं और श्रीरामचन्द्रजीके लिये सब मङ्गलकार्य कर रहे हैं ॥१ ॥

सुनत राम अभिषेक सुहावा । बाज गहागह अवध बधावा ॥

राम सीय तन सगुन जनाए । फरकहिं मंगल अंग सुहाए ॥

श्रीरामचन्द्रजीके राज्याभिषेककी सुहावनी खबर सुनते ही अवधभरमें बड़ी धूमसे बधावे बजने लगे । श्रीरामचन्द्रजी और सीताजीके शरीरमें भी शुभ शकुन सूचित हुए । उनके सुन्दर मङ्गल अङ्ग फड़कने लगे ॥२ ॥

पुलकि सप्रेम परसपर कहहीं । भरत आगमनु सूचक अहहीं ॥

भए बहुत दिन अति अवसेरी । सगुन प्रतीति भेंट प्रिय केरी ॥

पुलकित होकर वे दोनों प्रेमसहित एक- दूसरेसे कहते हैं कि ये सब शकुन भरतके आनेकी सूचना देनेवाले हैं । [ उनको मामाके घर गये ] बहुत दिन हो गये; बहुत ही अवसेर आ रही है ( बार- बार उनसे मिलनेकी मनमें आती है ) शकुनोंसे प्रिय ( भरत ) -के मिलनेका विश्वास होता है ॥ ३ ॥

भरत सरिस प्रिय को जग माहीं । इहइ सगुन फलु दूसर नाहीं ॥

रामहि बंधु सोच दिन राती । अंडन्हि कमठ हृदउ जेहि भाँती ॥

और भरतके समान जगत्में [ हमें ] कौन प्यारा है! शकुनका बस, यही फल है, दूसरा नहीं । श्रीरामचन्द्रजीको [ अपने ] भाई भरतका दिन-रात ऐसा सोच रहता है जैसा कछुएका हृदय अंडोंमें रहता है ॥४ ॥

दो० - एहि अवसर मंगलु परम सुनि रहँसेउ रनिवासु ।

सोभत लखि बिधु बढ़त जनु बारिधि बीचि बिलासु ॥ ७ ॥

इसी समय यह परम मङ्गल समाचार सुनकर सारा रनिवास हर्षित हो उठा । जैसे चन्द्रमाको बढ़ते देखकर समुद्रमें लहरोंका विलास ( आनन्द) सुशोभित होता है ॥ ७ ॥

प्रथम जाइ जिन्ह बचन सुनाए । भूषन बसन भूरि तिन्ह पाए ॥

प्रेम पुलकि तन मन अनुरागीं । मंगल कलस सजन सब लागीं ॥

पृष्ठ 352

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* *३५० रामचरितमानस सबसे पहले [ रनिवासमें] जाकर जिन्होंने ये वचन ( समाचार ) सुनाये, उन्होंने बहुत - से आभूषण और वस्त्र पाये । रानियोंका शरीर प्रेमसे पुलकित हो उठा और मन प्रेममें मग्न हो गया । वे सब मङ्गलकलश सजाने लगीं ॥१ ॥

चौकें चारु सुमित्राँ पूरी । मनिमय बिबिध भाँति अति रूरी ॥

आनँद मगन राम महतारी । दिए दान बहु बिप्र हँकारी ॥

सुमित्राजीने मणियों ( रत्नों ) -के बहुत प्रकारके अत्यन्त सुन्दर और मनोहर चौक पूरे । आनन्दमें मग्न हुई श्रीरामचन्द्रजीकी माता कौसल्याजीने ब्राह्मणोंको बुलाकर बहुत दान दिये ॥२ ॥

पूजीं ग्रामदेबि सुर नागा ॥ कहेउ बहोरि देन बलिभागा ॥

जेहि बिधि होइ राम कल्यानू । देहु दया करि सो बरदानू॥

उन्होंने ग्रामदेवियों, देवताओं और नागोंकी पूजा की और फिर बलि भेंट देनेको कहा ( अर्थात् कार्य सिद्ध होनेपर फिर पूजा करनेकी मनौती मानी ); और प्रार्थना की कि जिस प्रकारसे गावहिंश्रीरामचन्द्रजीकामंगलकल्याणकोकिलबयनींहो, दया करके वही। वरदानबिधुबदनींदीजिये ॥ ३ ॥ मृगसावकनयनीं ॥

कोयलकी - सी मीठी वाणीवाली, चन्द्रमाके समान मुखवाली और हिरनके बच्चेके -से नेत्रोंवाली स्त्रियाँ मङ्गलगान करने लगीं ॥ ४ ॥

दो० - राम राज अभिषेकु सुनि हियँ हरषे नर नारि ।

लगे सुमंगल सजन सब बिधि अनुकूल बिचारि ॥ ८ ॥

श्रीरामचन्द्रजीका राज्याभिषेक सुनकर सभी स्त्री- पुरुष हृदयमें हर्षित हो उठे और विधाताको अपने अनुकूल समझकर सब सुन्दर मङ्गल-साज सजाने लगे ॥ ८ ॥

तब नरनाहँ बसिष्ठु बोलाए । रामधाम सिख देन पठाए ॥

गुर आगमनु सुनत रघुनाथा । द्वार आइ पद नायउ माथा ॥

तब राजाने वसिष्ठजीको बुलाया और शिक्षा ( समयोचित उपदेश ) देनेके लिये श्रीरामचन्द्रजीके महलमें भेजा । गुरुका आगमन सुनते ही श्रीरघुनाथजीने दरवाजेपर आकर उनके चरणोंमें मस्तक नवाया ॥ १ ॥

सादर अरघ देइ घर आने । सोरह भाँति पूजि सनमाने ॥

गहे चरन सिय सहित बहोरी । बोले रामु कमल कर जोरी ॥

आदरपूर्वक अर्घ्य देकर उन्हें घरमें लाये और षोडशोपचारसे पूजा करके उनका सम्मान किया । फिर सीताजीसहित उनके चरण स्पर्श किये और कमलके समान दोनों हाथोंको जोड़कर श्रीरामजी बोले-

पृष्ठ 353

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* ** अयोध्याकाण्ड ३५१

सेवक सदन स्वामि आगमनू । मंगल मूल अमंगल दमनू ॥

तदपि उचित जनु बोलि सप्रीती । पठइअ काज नाथ असि नीती ॥

यद्यपि सेवकके घर स्वामीका पधारना मङ्गलोंका मूल और अमङ्गलोंका नाश करनेवाला होता है, तथापि हे नाथ! उचित तो यही था कि प्रेमपूर्वक दासको ही कार्यके लिये बुला भेजते; ऐसी ही नीति है ॥ ३ ॥

प्रभुता तजि प्रभु कीन्ह सनेहू । भयउ पुनीत आजु यहु गेहू॥

आयसु होइ सो करौं गोसाईं । सेवकु लहइ स्वामि सेवकाईं ॥

परन्तु प्रभु ( आप ) -ने प्रभुता छोड़कर ( स्वयं यहाँ पधारकर ) जो स्नेह किया, इससे आज यह घर पवित्र हो गया । हे गोसाईं! [ अब ] जो आज्ञा हो, मैं वही करूँ | स्वामीकी सेवामें ही सेवकका लाभ है ॥ ४ ॥

दो० - सुनि सनेह साने बचन मुनि रघुबरहि प्रसंस ।

राम कस न तुम्ह कहहु अस हंस बंस अवतंस ॥ ९ ॥

[ श्रीरामचन्द्रजीके ] प्रेममें सने हुए वचनोंको सुनकर मुनि वसिष्ठजीने श्रीरघुनाथजीकी प्रशंसा करते हुए कहा कि हे राम! भला, आप ऐसा क्यों न कहें । आप सूर्यवंशके भूषण जो हैं ॥ ९ ॥

बरनि राम गुन सीलु सुभाऊ ॥ बोले प्रेम पुलकि मुनिराऊ ॥

भूप सजेउ अभिषेक समाजू । चाहत देन तुम्हहि जुबराजू ॥

श्रीरामचन्द्रजीके गुण, शील और स्वभावका बखान कर, मुनिराज प्रेमसे पुलकित होकर बोले— [ हे रामचन्द्रजी! ] राजा ( दशरथजी ) -ने राज्याभिषेककी तैयारी की है । वे आपको युवराज - पद देना चाहते हैं ॥१ ॥

राम करहु सब संजम आजू । जौं बिधि कुसल निबाहै काजू॥

गुरु सिख देइ राय पहिं गयऊ । राम हृदयँ अस बिसमउ भयऊ ॥

[ इसलिये ] हे रामजी! आज आप [ उपवास, हवन आदि विधिपूर्वक ] सब संयम कीजिये, जिससे विधाता कुशलपूर्वक इस कामको निबाह दें ( सफल कर दें ) । गुरुजी शिक्षा देकर राजा दशरथजीके पास चले गये । श्रीरामचन्द्रजीके हृदयमें [ यह सुनकर ] इस बातका खेद हुआ कि- ॥ २ ॥

जनमे एक संग सब भाई । भोजन सयन केलि लरिकाई ॥

करनबेध उपबीत बिआहा । संग संग सब भए उछाहा ॥

हम सब भाई एक ही साथ जन्मे; खाना, सोना, लड़कपनके खेल-कूद, कनछेदन, यज्ञोपवीत और विवाह आदि उत्सव सब साथ-साथ ही हुए ॥ ३ ॥

पृष्ठ 354

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* *३५२ रामचरितमानस

बिमल बंस यहु अनुचित एकू । बंधु बिहाइ बड़ेहि अभिषेकू ॥

प्रभु सप्रेम पछितानि सुहाई । हरउ भगत मन कै कुटिलाई ॥

पर इस निर्मल वंशमें यही एक अनुचित बात हो रही है कि और सब भाइयोंको छोड़कर राज्याभिषेक एक बड़ेका ही ( मेरा ही ) होता है । [तुलसीदासजी कहते हैं कि] प्रभु श्रीरामचन्द्रजीका यह सुन्दर प्रेमपूर्ण पछतावा भक्तोंके मनकी कुटिलताको हरण करे ॥४ ॥

दो० - तेहि अवसर आए लखन मगन प्रेम आनंद ।

सनमाने प्रिय बचन कहि रघुकुल कैरव चंद ॥१० ॥

उसी समय प्रेम और आनन्दमें मग्न लक्ष्मणजी आये । रघुकुलरूपी कुमुदके खिलानेवाले चन्द्रमा श्रीरामचन्द्रजीने प्रिय वचन कहकर उनका सम्मान किया ॥ १० ॥

बाजहिं बाजने बिबिध बिधाना । पुर प्रमोदु नहिं जाइ बखाना ॥

भरत आगमनु सकल मनावहिं । आवहुँ बेगि नयन फलु पावहिं ॥

बहुत प्रकारके बाजे बज रहे हैं । नगरके अतिशय आनन्दका वर्णन नहीं हो सकता । सब लोग भरतजीका आगमन मना रहे हैं और कह रहे हैं कि वे भी शीघ्र आवें और [ राज्याभिषेकका उत्सव देखकर ] नेत्रोंका फल प्राप्त करें ॥ १ ॥

हाट बाट घर गलीं अथाईं । कहहिं परसपर लोग लोगाईं ॥

कालि लगन भलि केतिक बारा । पूजिहि बिधि अभिलाषु हमारा ॥

बाजार, रास्ते, घर, गली और चबूतरोंपर (जहाँ - तहाँ ) पुरुष और स्त्री आपसमें यही कहते हैं कि कल वह शुभ लग्न ( मुहूर्त्त ) कितने समय है जब विधाता हमारी अभिलाषा पूरी करेंगे ॥२ ॥

कनक सिंघासन सीय समेता । बैठहिं रामु होइ चित चेता ॥

सकल कहहिं कब होइहि काली । बिघन मनावहिं देव कुचाली ॥

जब सीताजीसहित श्रीरामचन्द्रजी सुवर्णके सिंहासनपर विराजेंगे और हमारा मनचीता होगा ( मन: कामना पूरी होगी ) । इधर तो सब यह कह रहे हैं कि कल कब होगा, उधर कुचक्री देवता विघ्न मना रहे हैं ॥३ ॥

तिन्हहि सोहाइ न अवध बधावा । चोरहि चंदिनि राति न भावा ॥

सारद बोलि बिनय सुर करहीं । बारहिं बार पाय लै परहीं ॥

उन्हें ( देवताओंको) अवधके बधावे नहीं सुहाते, जैसे चोरको चाँदनी रात नहीं भाती । सरस्वतीजीको बुलाकर देवता विनय कर रहे हैं और बार- बार उनके पैरोंको पकड़कर उनपर गिरते हैं ॥४ ॥

पृष्ठ 355

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* * अयोध्याकाण्ड ३५३

दो० – बिपति हमारि बिलोकि बड़ि मातु करिअ सोइ आजु ।

रामु जाहिं बन राजु तजि होइ सकल सुरकाजु ॥११ ॥

[ वे कहते हैं— ] हे माता! हमारी बड़ी विपत्तिको देखकर आज वही कीजिये जिससे श्रीरामचन्द्रजी राज्य त्यागकर वनको चले जायँ और देवताओंका सब कार्य सिद्ध हो ॥११ ॥

सुनि सुर बिनय ठाढ़ि पछिताती । भइउँ सरोज बिपिन हिमराती ॥

देखि देव पुनि कहहिं निहोरी । मातु तोहि नहिं थोरिङ खोरी ॥

देवताओंकी विनती सुनकर सरस्वतीजी खड़ी खड़ी पछता रही हैं कि [ हाय! ] मैं कमलवनके लिये हेमन्त ऋतुकी रात हुई । उन्हें इस प्रकार पछताते देखकर देवता फिर विनय करके कहने लगे- हे माता! इसमें आपको जरा भी दोष न लगेगा ॥ १ ॥

बिसमय हरष रहित रघुराऊ । तुम्ह जानहु सब राम प्रभाऊ ॥

जीव करम बस सुख दुख भागी । जाइअ अवध देवहित लागी ॥

श्रीरघुनाथजी विषाद और हर्षसे रहित हैं । आप तो श्रीरामजीके सब प्रभावको जानती ही हैं । जीव अपने कर्मवश ही सुख- दुःखका भागी होता है । अतएव देवताओंके हितके लिये आप अयोध्या जाइये ॥ २ ॥

बार बार गहि चरन सँकोची । चली बिचारि बिबुध मति पोची ॥

ऊँच निवासु नीचि करतूती । देखि न सकहिं पराइ बिभूती ॥

बार- बार चरण पकड़कर देवताओंने सरस्वतीको संकोचमें डाल दिया । तब वह यह विचारकर चली कि देवताओंकी बुद्धि ओछी है । इनका निवास तो ऊँचा है, पर इनकी करनी नीची है । ये दूसरेका ऐश्वर्य नहीं देख सकते ॥३ ॥

आगिल काजु बिचारि बहोरी । करिहहिं चाह कुसल कबि मोरी ॥

हरषि हृदयँ दसरथ पुर आई । जनु ग्रह दसा दुसह दुखदाई ॥

परंतु आगे कामका विचार करके ( श्रीरामजीके वन जानेसे राक्षसोंका वध होगा, जिससे सारा जगत् सुखी हो जायगा ) चतुर कवि [ श्रीरामजीके वनवासके चरित्रोंका वर्णन करनेके लिये ] मेरी चाह ( कामना ) करेंगे । ऐसा विचारकर सरस्वती हृदयमें हर्षित होकर दशरथजीकी पुरी अयोध्यामें आयीं, मानो दुःसह दुःख देनेवाली कोई ग्रहदशा आयी हो ॥४ ॥

दो० –नामु मंथरा मंदमति चेरी कैकइ केरि ।

अजस पेटारी ताहि करि गई गिरा मति फेरि॥ १२ ॥

मन्थरा नामकी कैकेयीकी एक मन्दबुद्धि दासी थी, उसे अपयशकी पिटारी बनाकर सरस्वती उसकी बुद्धिको फेरकर चली गयीं ॥ १२ ॥

पृष्ठ 356

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* *३५४ रामचरितमानस

दीख मंथरा नगरु बनावा । मंजुल मंगल बाज बधावा ॥

पूछेसि लोगन्ह काह उछाहू । राम तिलकु सुनि भा उर दाहू ॥

मन्थराने देखा कि नगर सजाया हुआ है । सुन्दर मङ्गलमय बधावे बज रहे हैं । उसने लोगोंसे पूछा कि कैसा उत्सव है? [ उनसे ] श्रीरामचन्द्रजीके राजतिलककी बात सुनते ही उसका हृदय जल उठा ॥१ ॥

करइ बिचारु कुबुद्धि कुजाती । होइ अकाजु कवनि बिधि राती ॥

देखि लागि मधु कुटिल किराती । जिमि गवँ तकड़ लेउँ केहि भाँती ॥

वह दुर्बुद्धि नीच जातिवाली दासी विचार करने लगी कि किस प्रकारसे यह काम रात-ही -रातमें बिगड़ जाय, जैसे कोई कुटिल भीलनी शहदका छत्ता लगा देखकर घात लगाती है कि इसको किस तरहसे उखाड़ लूँ ॥ २ ॥

भरत मातु पहिं गइ बिलखानी । का अनमनि हसि कह हँसि रानी ॥

ऊतरु देइ न लेइ उसासू । नारि चरित करि ढारइ आँसू॥

वह उदास होकर भरतजीकी माता कैकेयीके पास गयी । रानी कैकेयीने हँसकर कहा— तू उदास क्यों है? मन्थरा कुछ उत्तर नहीं देती, केवल लंबी साँस ले रही है और त्रियाचरित्र करके आँसू ढरका रही है ॥ ३ ॥

हँसि कह रानि गालु बड़ तोरें । दीन्ह लखन सिख अस मन मोरें ॥

तबहुँ न बोल चेरि बड़ि पापिनि । छाड़ड़ स्वास कारि जनु साँपिनि ॥

रानी हँसकर कहने लगी कि तेरे बड़े गाल हैं ( तू बहुत बढ़ - बढ़कर बोलनेवाली है ) । मेरा मन कहता है कि लक्ष्मणने तुझे कुछ सीख दी है ( दण्ड दिया है ) । तब भी वह महापापिनी दासी कुछ भी नहीं बोलती । ऐसी लंबी साँस छोड़ रही है, मानो काली नागिन [फुफकार छोड़ रही] हो ॥४ ॥

दो० – सभय रानि कह कहसि किन कुसल रामु महिपालु ।

लखनु भरतु रिपुदमनु सुनि भा कुबरी उर सालु ॥ १३ ॥

तब रानीने डरकर कहा- अरी! कहती क्यों नहीं? श्रीरामचन्द्र, राजा, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न कुशलसे तो हैं? यह सुनकर कुबरी मन्थराके हृदयमें बड़ी ही पीड़ा हुई ॥ १३ ॥

कत सिख देइ हमहि कोउ माई । गालु करब केहि कर बलु पाई ॥

रामहि छाड़ि कुसल केहि आजू ॥ जेहि जनेसु देइ जुबराजू॥

पृष्ठ 357

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* ** अयोध्याकाण्ड ३५५ [वह कहने लगी- ] हे माई! हमें कोई क्यों सीख देगा और मैं किसका बल पाकर गाल करूँगी ( बढ़ - बढ़कर बोलूँगी) । रामचन्द्रको छोड़कर आज और किसकी कुशल है, जिन्हें राजा युवराज- पद दे रहे हैं ॥ १ ॥

भयउ कौसिलहि बिधि अति दाहिन । देखत गरब रहत उर नाहिन ।

देखहु कस न जाइ सब सोभा । जो अवलोकि मोर मनु छोभा ॥

आज कौसल्याको विधाता बहुत ही दाहिने ( अनुकूल ) हुए हैं; यह देखकर उनके हृदयमें गर्व समाता नहीं । तुम स्वयं जाकर सब शोभा क्यों नहीं देख लेतीं, जिसे देखकर मेरे मनमें क्षोभ हुआ है ॥ २ ॥

पूतु बिदेस न सोचु तुम्हारें । जानति हहु बस नाहु हमारें ॥

नीद बहुत प्रिय सेज तुराई । लखहु न भूप कपट चतुराई ॥

तुम्हारा पुत्र परदेशमें है, तुम्हें कुछ सोच नहीं । जानती हो कि स्वामी हमारे वशमें है । तुम्हें तो तोशक- पलँगपर पड़े -पड़े नींद लेना ही बहुत प्यारा लगता है, राजाकी कपटभरी चतुराई तुम नहीं देखतीं ॥ ३ ॥

सुनि प्रिय बचन मलिन मनु जानी । झुकी रानि अब रहु अरगानी ॥

पुनि अस कबहुँ कहसि घरफोरी । तब धरि जीभ कढ़ावउँ तोरी ॥

मन्थराके प्रिय वचन सुनकर किन्तु उसको मनकी मैली जानकर रानी झुककर ( डाँटकर ) बोली– बस, अब चुप रह घरफोड़ी कहींकी! जो फिर कभी ऐसा कहा तो तेरी जीभ पकड़कर निकलवा लूँगी ॥ ४ ॥

दो० - काने खोरे कूबरे कुटिल कुचाली जानि ।

तिय बिसेषि पुनि चेरि कहि भरतमातु मुसुकानि ॥ १४ ॥

कानों, लँगड़ों और कुबड़ोंको कुटिल और कुचाली जानना चाहिये । उनमें भी स्त्री और खासकर दासी! इतना कहकर भरतजीकी माता कैकेयी मुसकरा दीं ॥ १४ ॥

प्रियबादिनि सिख दीन्हिउँ तोही । सपनेहुँ तो पर कोपु न मोही ॥

सुदिनु सुमंगल दायकु सोई । तोर कहा फुर जेहि दिन होई ॥

[ और फिर बोलीं– ] हे प्रिय वचन कहनेवाली मन्थरा! मैंने तुझको यह सीख दी है ( शिक्षाके लिये इतनी बात कही है ) । मुझे तुझपर स्वप्नमें भी क्रोध नहीं है । सुन्दर मङ्गलदायक शुभ दिन वही होगा जिस दिन तेरा कहना सत्य होगा ( अर्थात् श्रीरामका राज्यतिलक होगा) ॥ १ ॥

जेठ स्वामि सेवक लघु भाई । यह दिनकर कुल रीति सुहाई ॥

राम तिलकु जौं साँचेहुँ काली । देउँ मागु मन भावत आली ॥

पृष्ठ 358

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* * ३५६ रामचरितमानस बड़ा भाई स्वामी और छोटा भाई सेवक होता है । यह सूर्यवंशकी सुहावनी रीति ही है । यदि सचमुच कल ही श्रीरामका तिलक है, तो हे सखी! तेरे मनको अच्छी लगे वही वस्तु माँग ले, मैं दूँगी ॥२ ॥

कौसल्या सम सब महतारी । रामहि सहज सुभायँ पिआरी ॥

मो पर करहिं सनेहु बिसेषी । मैं करि प्रीति परीछा देखी ॥

रामको सहज स्वभावसे सब माताएँ कौसल्याके समान ही प्यारी हैं । मुझपर तो वे विशेष प्रेम करते हैं । मैंने उनकी प्रीतिकी परीक्षा करके देख ली है ॥ ३ ॥

जौं बिधि जनमु देइ करि छोहू । होहुँ राम सिय पूत पुतोहू ॥

प्रान तें अधिक रामु प्रिय मोरें । तिन्ह कें तिलक छोभु कस तोरें ॥

जो विधाता कृपा करके जन्म दें तो [ यह भी दें कि ] श्रीरामचन्द्र पुत्र और सीता बहू हों । श्रीराम मुझे प्राणोंसे भी अधिक प्रिय हैं । उनके तिलकसे ( उनके तिलककी बात सुनकर ) तुझे क्षोभ कैसा? ॥४ ॥

दो० - भरत सपथ तोहि सत्य कहु परिहरि कपट दुराउ ।

हरष समय बिसमउ करसि कारन मोहि सुनाउ ॥ १५ ॥

तुझे भरतकी सौगन्ध है, छल-कपट छोड़कर सच-सच कह । तू हर्षके समय विषाद कर रही है, मुझे इसका कारण सुना ॥ १५ ॥

एकहिं बार आस सब पूजी । अब कछु कहब जीभ करि दूजी ॥

फोरै जोगु कपारु अभागा । भलेउ कहत दुख रउरेहि लागा ॥

[ मन्थराने कहा— ] सारी आशाएँ तो एक ही बार कहनेमें पूरी हो गयीं । अब तो दूसरी जीभ लगाकर कुछ कहूँगी । मेरा अभागा कपाल तो फोड़ने ही योग्य है, जो अच्छी बात कहनेपर भी आपको दुःख होता है ॥१ ॥

कहहिं झूठ फुरि बात बनाई । ते प्रिय तुम्हहि करुइ मैं माई ॥

हमहुँ कहब अब ठकुरसोहाती । नाहिं त मौन रहब दिनु राती ॥

जो झूठी-सच्ची बातें बनाकर कहते हैं, हे माई! वे ही तुम्हें प्रिय हैं और मैं कड़वी लगती हूँ! अब मैं भी ठकुरसुहाती ( मुँहदेखी ) कहा करूँगी । नहीं तो दिन- रात चुप रहूँगी ॥२ ॥

करि कुरूप बिधि परबस कीन्हा । बवा सो लुनिअ लहिअ जो दीन्हा ॥

कोउ नृप होउ हमहि का हानी । चेरि छाड़ि अब होब कि रानी ॥

पृष्ठ 359

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* * अयोध्याकाण्ड ३५७ विधाताने कुरूप बनाकर मुझे परवश कर दिया! [ दूसरेको क्या दोष ] जो बोया सो काटती हूँ, दिया सो पाती हूँ । कोई भी राजा हो, हमारी क्या हानि है? दासी छोड़कर क्या अब मैं रानी होऊँगी! ( अर्थात् रानी तो होनेसे रही ) ॥ ३ ॥

जारै जोगु सुभाउ हमारा । अनभल देखि न जाइ तुम्हारा ॥

तातें कछुक बात अनुसारी । छमि देबि बड़ि चूक हमारी ॥

हमारा स्वभाव तो जलाने ही योग्य है । क्योंकि तुम्हारा अहित मुझसे देखा नहीं जाता । इसीलिये कुछ बात चलायी थी । किन्तु हे देवि! हमारी बड़ी भूल हुई, क्षमा करो ॥४ ॥

दो० – गूढ़ कपट प्रिय बचन सुनि तीय अधरबुधि रानि ।

सुरमाया बस बैरिनिहि सुहृद जानि पतिआनि ॥ १६ ॥

आधाररहित ( अस्थिर ) बुद्धिकी स्त्री और देवताओंकी मायाके वशमें होनेके कारण रहस्ययुक्त कपटभरे प्रिय वचनोंको सुनकर रानी कैकेयीने बैरिन मन्थराको अपनी सुहृद् ( अहैतुक हित करनेवाली ) जानकर उसका विश्वास कर लिया ॥१६ ॥

सादर पुनि पुनि पूँछति ओही । सबरी गान मृगी जनु मोही ॥

तसि मति फिरी अहइ जसि भाबी । रहसी चेरि घात जनु फाबी ॥

बार -बार रानी उससे आदरके साथ पूछ रही हैं, मानो भीलनीके गानसे हिरनी मोहित हो गयी हो । जैसी भावी ( होनहार ) है, वैसी ही बुद्धि भी फिर गयी । दासी अपना दाँव लगा जानकर हर्षित हुई ॥१ ॥

तुम्ह पूँछहु मैं कहत डेराऊँ । धरेहु मोर घरफोरी नाऊँ ॥

सजि प्रतीति बहुबिधि गढ़ि छोली । अवध साढ़साती तब बोली ॥

तुम पूछती हो, किन्तु मैं कहते डरती हूँ । क्योंकि तुमने पहले ही मेरा नाम घरफोड़ी रख दिया है । बहुत तरहसे गढ़ - छोलकर, खूब विश्वास जमाकर, तब वह अयोध्याकी साढ़साती ( शनिकी साढ़े सात वर्षकी दशारूपी मन्थरा ) बोली-॥२ ॥

प्रिय सिय रामु कहा तुम्ह रानी । रामहि तुम्ह प्रिय सो फुरि बानी ॥

रहा प्रथम अब ते दिन बीते । समउ फिरें रिपु होहिं पिरीते ॥

हे रानी! तुमने जो कहा कि मुझे सीता- राम प्रिय हैं और रामको तुम प्रिय हो, सो यह बात सच्ची है । परन्तु यह बात पहले थी, वे दिन अब बीत गये । समय फिर जानेपर मित्र भी शत्रु हो जाते हैं ॥ ३ ॥

भानु कमल कुल पोषनिहारा । बिनु जल जारि करइ सोइ छारा ॥

जर तुम्हारि चह सवति उखारी । रूँधहु करि उपाउ बर बारी ॥

पृष्ठ 360

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* *३५८ रामचरितमानस सूर्य कमलके कुलका पालन करनेवाला है, पर बिना जलके वही सूर्य उनको ( कमलोंको) जलाकर भस्म कर देता है । सौत कौसल्या तुम्हारी जड़ उखाड़ना चाहती है । अतः उपायरूपी श्रेष्ठ बाड़ (घेरा) लगाकर उसे रूँध दो (सुरक्षित कर दो) ॥४ ॥

दो० – तुम्हहि न सोचु सोहाग बल निज बस जानहु राउ ।

मन मलीन मुह मीठ नृपु राउर सरल सुभाउ ॥१७ ॥

तुमको अपने सुहागके [ झूठे ] बलपर कुछ भी सोच नहीं है; राजाको अपने वशमें जानती हो । किन्तु राजा मनके मैले और मुँहके मीठे हैं! और आपका सीधा स्वभाव है (आप कपट---:चतुराई जानती ही नहीं) ॥ १७ ॥

चतुर गँभीर राम महतारी । बीचु पाइ निज बात सँवारी ॥

पठए भरतु भूप ननिअउरें । राम मातु मत जानब रउरें ॥

रामकी माता (कौसल्या) बड़ी चतुर और गम्भीर है (उसकी थाह कोई नहीं पाता) । उसने मौका पाकर अपनी बात बना ली । राजाने जो भरतको ननिहाल भेज दिया, उसमें आप बस रामकी माताकी ही सलाह समझिये! ॥ १ ॥

सेवहिं सकल सवति मोहि नीकें । गरबित भरत मातु बल पी कें ॥

सालु तुम्हार कौसिलहि माई । कपट चतुर नहिं होइ जनाई ॥

[कौसल्या समझती है कि] और सब सौतें तो मेरी अच्छी तरह सेवा करती हैं, एक भरतकी माँ पतिके बलपर गर्वित रहती है! इसीसे हे माई! कौसल्याको तुम बहुत ही साल (खटक) रही हो । किन्तु वह कपट करनेमें चतुर है; अतः उसके हृदयका भाव जाननेमें नहीं आता (वह उसे चतुरतासे छिपाये रखती है ) ॥२ ॥

राजहि तुम्ह पर प्रेमु बिसेषी । सवति सुभाउ सकइ नहिं देखी ॥

रचि प्रपंच भूपहि अपनाई । राम तिलक हित लगन धराई ॥

राजाका तुमपर विशेष प्रेम है । कौसल्या सौतके स्वभावसे उसे देख नहीं सकती । इसीलिये उसने जाल रचकर राजाको अपने वशमें करके [ भरतकी अनुपस्थितिमें ] रामके राजतिलकके लिये लग्न निश्चय करा लिया ॥ ३ ॥

यह कुल उचित राम कहुँ टीका । सबहि सोहाइ मोहि सुठि नीका ॥

आगिलि बात समुझि डरु मोही । देउ दैउ फिरि सो फलु ओही ॥

रामको तिलक हो, यह रघुकुलके उचित ही है और यह बात सभीको सुहाती है; और मुझे तो बहुत ही अच्छी लगती है । परन्तु मुझे तो आगेकी बात विचारकर डर लगता है । दैव उलटकर इसका फल उसी (कौसल्या) को दे ॥ ४ ॥