श्रीरामचरितमानस — पृष्ठ 361–370
श्रीरामचरितमानस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 361–370
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* ** अयोध्याकाण्ड ३५ ९
दो० – रचि पचि कोटिक कुटिलपन कीन्हेसि कपट प्रबोधु ।
कहिसि कथा सत सवति कै जेहि बिधि बाढ़ बिरोधु ॥ १८ ॥
इस तरह करोड़ों कुटिलपनकी बातें गढ़ -छोलकर मन्थराने कैकेयीको उलटा- सीधा समझा दिया और सैकड़ों सौतोंकी कहानियाँ इस प्रकार [ बना-बनाकर] कहीं जिस प्रकार विरोध बढ़े ॥ १८ ॥
भावी बस प्रतीति उर आई । पूँछ रानि पुनि सपथ देवाई ॥
का पूँछहु तुम्ह अबहुँ न जाना । निज हित अनहित पसु पहिचाना ॥
होनहारवश कैकेयीके मनमें विश्वास हो गया । रानी फिर सौगन्ध दिलाकर पूछने लगी । [ मन्थरा बोली- ] क्या पूछती हो? अरे, तुमने अब भी नहीं समझा? अपने भले- बुरेको ( अथवा मित्र- शत्रुको ) तो पशु भी पहचान लेते हैं ॥१ ॥
भयउ पाखु दिन सजत समाजू । तुम्ह पाई सुधि मोहि सन आजू॥
खाइअ पहिरिअ राज तुम्हारें । सत्य कहें नहिं दोषु हमारें ॥
पूरा पखवाड़ा बीत गया सामान सजते और तुमने खबर पायी है आज मुझसे! मैं तुम्हारे राजमें खाती- पहनती हूँ, इसलिये सच कहनेमें मुझे कोई दोष नहीं है ॥२ ॥
जौं असत्य कछु कहब बनाई । तौ बिधि देहि हमहि सजाई ॥
रामहि तिलक कालि जौं भयऊ । तुम्ह कहुँ बिपति बीजु बिधि बयऊ ॥
यदि मैं कुछ बनाकर झूठ कहती होऊँगी तो विधाता मुझे दण्ड देगा । यदि कल रामको राजतिलक हो गया तो [ समझ रखना कि ] तुम्हारे लिये विधाताने विपत्तिका बीज बो दिया ॥ ३ ॥
रेख खँचाइ कहउँ बलु भाषी । भामिनि भइहु दूध कइ माखी ॥
जौं सुत सहित करहु सेवकाई । तौ घर रहहु न आन उपाई ॥
मैं यह बात लकीर खींचकर बलपूर्वक कहती हूँ, हे भामिनी! तुम तो अब दूधकी मक्खी हो गयी! ( जैसे दूधमें पड़ी हुई मक्खीको लोग निकालकर फेंक देते हैं, वैसे ही तुम्हें भी लोग घरसे निकाल बाहर करेंगे ) जो पुत्रसहित [ कौसल्याकी ] चाकरी बजाओगी तो घरमें रह सकोगी; [ अन्यथा घरमें रहनेका] दूसरा उपाय नहीं ॥ ४ ॥
दो० – कहूँ बिनतहि दीन्ह दुखु तुम्हहि कौसिलाँ देब ।
भरतु बंदिगृह सेइहहिं लखनु राम के नेब ॥१ ९ ॥
कद्रूने विनताको दुःख दिया था, तुम्हें कौसल्या देगी । भरत कारागारका सेवन करेंगे ( जेलकी हवा खायेंगे ) और लक्ष्मण रामके नायब ( सहकारी ) होंगे ॥ १ ९ ॥
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* *३६० रामचरितमानस
कैकयसुता सुनत कटु बानी । कहि न सकइ कछु सहमि सुखानी ॥
तन पसेउ कदली जिमि काँपी । कुबरीं दसन जीभ तब चाँपी ॥
कैकेयी मन्थराकी कड़वी वाणी सुनते ही डरकर सूख गयी, कुछ बोल नहीं सकती । शरीरमें पसीना हो आया और वह केलेकी तरह काँपने लगी । तब कुबरी ( मन्थरा ) -ने अपनी जीभ दाँतों- तले दबायी ( उसे भय हुआ कि कहीं भविष्यका अत्यन्त डरावना चित्र सुनकर कैकेयीके हृदयकी गति न रुक जाय; जिससे उलटा सारा काम ही बिगड़ जाय ) ॥ १ ॥
कहि कहि कोटिक कपट कहानी । धीरजु धरहु प्रबोधिसि रानी ॥
फिरा करमु प्रिय लागि कुचाली । बकिहि सराहइ मानि मराली ॥
फिर कपटकी करोड़ों कहानियाँ कह कहकर उसने रानीको खूब समझाया कि धीरज रखो! कैकेयीका भाग्य पलट गया, उसे कुचाल प्यारी लगी । वह बगुलीको हंसिनी मानकर ( वैरिनको हित मानकर ) उसकी सराहना करने लगी ॥२ ॥
सुनु मंथरा बात फुरि तोरी । दहिनि आँखि नित फरकड़ मोरी ॥
दिन प्रति देखउँ राति कुसपने । कहउँ न तोहि मोह बस अपने ॥
कैकेयीने कहा– मन्थरा! सुन, तेरी बात सत्य है । मेरी दाहिनी आँख नित्य फड़का करती है । मैं प्रतिदिन रातको बुरे स्वप्न देखती हूँ; किन्तु अपने अज्ञानवश तुझसे कहती नहीं ॥३ ॥
काह करौं सखि सूध सुभाऊ । दाहिन बाम न जानउँ काऊ ॥
सखी! क्या करूँ, मेरा तो सीधा स्वभाव है । मैं दायाँ - बायाँ कुछ भी नहीं जानती ॥४ ॥
दो० अपनें चलत न आजु लगि अनभल काहुक कीन्ह । -0केहिं अघ एकहि बार मोहि दैअँ दुसह दुखु दीन्ह ॥ २० ॥
अपनी चलते ( जहाँतक मेरा वश चला ) मैंने आजतक कभी किसीका बुरा नहीं किया । फिर
न जाने किस पापसे दैवने मुझे एक ही साथ यह दुःसह दुःख दिया ॥२० ॥
नैहर जनम भरब बरु जाई । जिअत न करबि सवति सेवकाई ॥
अरि बस दैउ जिआवत जाही । मरनु नीक तेहि जीवन चाही ॥
मैं भले ही नैहर जाकर वहीं जीवन बिता दूँगी; पर जीते-जी सौतकी चाकरी नहीं करूँगी । दैव जिसको शत्रुके वशमें रखकर जिलाता है, उसके लिये तो जीनेकी अपेक्षा मरना ही अच्छा है ॥१ ॥
दीन बचन कह बहुबिधि रानी । सुनि कुबरीं तियमाया ठानी ॥
अस कस कहहु मानि मन ऊना । सुखु सोहागु तुम्ह कहुँ दिन दूना ॥
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* * अयोध्याकाण्ड ३६१ रानीने बहुत प्रकारके दीन वचन कहे । उन्हें सुनकर कुबरीने त्रियाचरित्र फैलाया । [ वह बोली– ] तुम मनमें ग्लानि मानकर ऐसा क्यों कह रही हो, तुम्हारा सुख-सुहाग दिन- दिन दूना होगा ॥२ ॥
जेहिं राउर अति अनभल ताका । सोइ पाइहि यहु फलु परिपाका ॥
जब तें कुमत सुना मैं स्वामिनि । भूख न बासर नीद न जामिनि ॥
जिसने तुम्हारी बुराई चाही है, वही परिणाममें यह ( बुराईरूप ) फल पायेगी । हे स्वामिनि! मैंने जबसे यह कुमत सुना है, तबसे मुझे न तो दिनमें कुछ भूख लगती है और न रातमें नींद ही आती है ॥३ ॥
पूँछेउँ गुनिन्ह रेख तिन्ह खाँची । भरत भुआल होहिं यह साँची ॥
भामिनि करहु त कहौं उपाऊ । है तुम्हरी सेवा बस राऊ ॥
मैंने ज्योतिषियोंसे पूछा, तो उन्होंने रेखा खींचकर ( गणित करके अथवा निश्चयपूर्वक ) कहा कि भरत राजा होंगे, यह सत्य बात है । हे भामिनि! तुम करो, तो उपाय मैं बताऊँ । राजा तुम्हारी सेवाके वशमें हैं ही ॥४ ॥
दो० – परउँ कूप तुअ बचन पर सकउँ पूत पति त्यागि ।
कहसि मोर दुखु देखि बड़ कस न करब हित लागि ॥ २१ ॥
[ कैकेयीने कहा— ] मैं तेरे कहनेसे कुएँमें गिर सकती हूँ, पुत्र और पतिको भी छोड़ सकती हूँ | जब तू मेरा बड़ा भारी दुःख देखकर कुछ कहती है, तो भला मैं अपने हितके लिये उसे क्यों न करूँगी? ॥२१ ॥
कुबरीं करि कबुली कैकेई । कपट छुरी उर पाहन टेई ॥
लखइ न रानि निकट दुखु कैसें । चरड़ हरित तिन बलिपसु जैसें ॥
कुबरीने कैकेयीको [ सब तरहसे ] कबूल करवाकर ( अर्थात् बलिपशु बनाकर ) कपटरूप छुरीको अपने [ कठोर ] हृदयरूपी पत्थरपर टेया ( उसकी धारको तेज किया ) । रानी कैकेयी अपने निकटके ( शीघ्र आनेवाले ) दुःखको कैसे नहीं देखती, जैसे बलिका पशु हरी - हरी घास चरता है [ पर यह नहीं जानता कि मौत सिरपर नाच रही है ] ॥१ ॥
सुनत बात मृदु अंत कठोरी । देति मनहुँ मधु माहुर घोरी ॥
कहइ चेरि सुधि अहइ कि नाहीं । स्वामिनि कहिहु कथा मोहि पाहीं ॥
मन्थराकी बातें सुननेमें तो कोमल हैं, पर परिणाममें कठोर ( भयानक ) हैं । मानो वह शहदमें घोलकर जहर पिला रही हो । दासी कहती है- हे स्वामिनि! तुमने मुझको एक कथा कही थी, उसकी याद है कि नहीं? ॥ २ ॥
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* *३६२ रामचरितमानस
दुइ बरदान भूप सन थाती । मागहु आजु जुड़ावहु छाती ॥
सुतहि राजु रामहि बनबासू । देहु लेहु सब सवति हुलासू॥
तुम्हारे दो वरदान राजाके पास धरोहर हैं । आज उन्हें राजासे माँगकर अपनी छाती ठंढी करो । पुत्रको राज्य और रामको वनवास दो और सौतका सारा आनन्द तुम ले लो ॥३ ॥
भूपति राम सपथ जब करई । तब मागेहु जेहिं बचनु न टरई ॥
होइ अकाजु आजु निसि बीतें । बचनु मोर प्रिय मानेहु जी तें ॥
जब राजा रामकी सौगंध खा लें, तब वर माँगना, जिससे वचन न टलने पावे । आजकी रात बीत गयी, तो काम बिगड़ जायगा । मेरी बातको हृदयसे प्रिय [या प्राणोंसे भी प्यारी ] समझना ॥४ ॥
दो०-—-बड़ कुघातु करि पातकिनि कहेसि कोपगृहँ जाहु ।
काजु सँवारेहु सजग सबु सहसा जनि पतिआहु ॥ २२ ॥
पापिनी मन्थराने बड़ी बुरी घात लगाकर कहा- कोपभवनमें जाओ । सब काम बड़ी सावधानीसे बनाना, राजापर सहसा विश्वास न कर लेना ( उनकी बातोंमें न आ जाना) ॥ २२ ॥
कुबरिहि रानि प्रानप्रिय जानी । बार बार बड़ि बुद्धि बखानी ॥
तोहि सम हित न मोर संसारा । बहे जात कइ भइसि अधारा ॥
कुबरीको रानीने प्राणोंके समान प्रिय समझकर बार- बार उसकी बड़ी बुद्धिका बखान किया और बोली- संसारमें मेरा तेरे समान हितकारी और कोई नहीं है । तू मुझ बही जाती हुईके लिये सहारा हुई है ॥१ ॥
जौं बिधि पुरब मनोरथु काली । करौं तोहि चख पूतरि आली ॥
बहुबिधि चेरिहि आदरु देई । कोपभवन गवनी कैकेई ॥
यदि विधाता कल मेरा मनोरथ पूरा कर दें तो हे सखी! मैं तुझे आँखोंकी पुतली बना लूँ ।
इस प्रकार दासीको बहुत तरहसे आदर देकर कैकेयी कोपभवनमें चली गयी ॥२ ॥
बिपति बीजु बरषा रितु चेरी । भुइँ भइ कुमति कैकई केरी ॥
पाइ कपट जलु अंकुर जामा । बर दोउ दल दुख फल परिनामा ॥
विपत्ति ( कलह ) बीज है, दासी वर्षा -ऋतु है, कैकेयीकी कुबुद्धि [ उस बीजके बोनेके लिये ] जमीन हो गयी । उसमें कपटरूपी जल पाकर अङ्कुर फूट निकला । दोनों वरदान उस अङ्कुरके दो पत्ते हैं और अन्तमें इसके दुःखरूपी फल होगा ॥३ ॥
कोप समाजु साजि सबु सोई । राजु करत निज कुमति बिगोई ॥
राउर नगर कोलाहलु होई । यह कुचालि कछु जान न कोई ॥
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* ** अयोध्याकाण्ड ३६३ कैकेयी कोपका सब साज सजकर [ कोपभवनमें ] जा सोयी । राज्य करती हुई वह अपनी दुष्ट बुद्धिसे नष्ट हो गयी । राजमहल और नगरमें धूम- धाम मच रही है । इस कुचालको कोई कुछ नहीं जानता ॥ ४ ॥
दो० - प्रमुदित पुर नर नारि सब सजहिं सुमंगलचार ।
एक प्रबिसहिं एक निर्गमहिं भीर भूप दरबार ॥ २३ ॥
बड़े ही आनन्दित होकर नगरके सब स्त्री - पुरुष शुभ मङ्गलाचारके साज सज रहे हैं । कोई भीतर जाता है, कोई बाहर निकलता है; राजद्वारमें बड़ी भीड़ हो रही है ॥ २३ ॥
बाल सखा सुनि हियँ हरषाहीं । मिलि दस पाँच राम पहिं जाहीं ॥
प्रभु आदरहिं प्रेमु पहिचानी । पूँछहिं कुसल खेम मृदु बानी ॥
श्रीरामचन्द्रजीके बालसखा राजतिलकका समाचार सुनकर हृदयमें हर्षित होते हैं । वे दस- पाँच मिलकर श्रीरामचन्द्रजीके पास जाते हैं । प्रेम पहचानकर प्रभु श्रीरामचन्द्रजी उनका आदर करते हैं और कोमल वाणीसे कुशल क्षेम पूछते हैं ॥ १ ॥
फिरहिं भवन प्रिय आयसु पाई । करत परसपर रामराम बड़ाई ॥
को रघुबीर सरिस संसारा । सीलु सनेहु निबाहनिहारा ॥
अपने प्रिय सखा श्रीरामचन्द्रजीकी आज्ञा पाकर वे आपसमें एक- दूसरेसे श्रीरामचन्द्रजीकी बड़ाई करते हुए घर लौटते हैं और कहते हैं - संसारमें श्रीरघुनाथजीके समान शील और स्नेहको निबाहनेवाला कौन है? ॥ २ ॥
जेहिं जेहिं जोनि करम बस भ्रमहीं । तहँ तहँ ईसु देउ यह हमहीं ॥
सेवक हम स्वामी सियनाहू । होउ नात यह ओर निबाहू॥
भगवान् हमें यही दें कि हम अपने कर्मवश भ्रमते हुए जिस-जिस योनिमें जन्में, वहाँ- वहाँ ( उस- उस योनिमें ) हम तो सेवक हों और सीतापति श्रीरामचन्द्रजी हमारे स्वामी हों और यह नाता अन्ततक निभ जाय ॥३ ॥
अस अभिलाष नगर सब काहू । कैकयसुता हृदयँ अति दाहू ॥
को न कुसंगति पाइ नसाई । रहइ न नीच मतें चतुराई ॥
नगरमें सबकी ऐसी ही अभिलाषा है । परन्तु कैकेयीके हृदयमें बड़ी जलन हो रही है । कुसंगति
पाकर कौन नष्ट नहीं होता । नीचके मतके अनुसार चलनेसे चतुराई नहीं रह जाती ॥४ ॥
दो० – साँझ समय सानंद नृपु गयउ कैकई गेहूँ ।
गवनु निठुरता निकट किय जनु धरि देह सनेहँ ॥ २४ ॥
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* *३६४ रामचरितमानस सन्ध्याके समय राजा दशरथ आनन्दके साथ कैकेयीके महलमें गये । मानो साक्षात् स्नेह ही शरीर धारण कर निष्ठुरताके पास गया हो! ॥ २४ ॥
कोपभवन सुनि सकुचेउ राऊ । भय बस अगहुड़ परइ न पाऊ ॥
सुरपति बसइ बाहँबल जाकें । नरपति सकल रहहिं रुख ताकें ॥
कोपभवनका नाम सुनकर राजा सहम गये । डरके मारे उनका पाँव आगेको नहीं पड़ता । स्वयं देवराज इन्द्र जिनकी भुजाओंके बलपर [ राक्षसोंसे निर्भय होकर] बसता है और सम्पूर्ण राजालोग जिनका रुख देखते रहते हैं, ॥ १ ॥
सो सुनि तिय रिस गयउ सुखाई । देखहु काम प्रताप बड़ाई ॥
सूल कुलिस असि अँगवनिहारे । ते रतिनाथ सुमन सर मारे ॥
वही राजा दशरथ स्त्रीका क्रोध सुनकर सूख गये । कामदेवका प्रताप और महिमा तो देखिये । जो त्रिशूल, वज्र और तलवार आदिकी चोट अपने अङ्गोंपर सहनेवाले हैं, वे रतिनाथ कामदेवके पुष्पबाणसे मारे गये ॥२ ॥
सभय नरेसु प्रिया पहिं गयऊ । देखि दसा दुखु दारुन भयऊ ॥
भूमि सयन पटु मोट पुराना । दिए डारि तन भूषन नाना ॥
राजा डरते -डरते अपनी प्यारी कैकेयीके पास गये । उसकी दशा देखकर उन्हें बड़ा ही दुःख हुआ । कैकेयी जमीनपर पड़ी है । पुराना मोटा कपड़ा पहने हुए है । शरीरके नाना आभूषणोंको उतारकर फेंक दिया है ॥ ३ ॥
कुमतिहि कसि कुबेषता फाबी । अनअहिवातु सूच जनु भाबी ॥
जाइ निकट नृपु कह मृदु बानी । प्रानप्रिया केहि हेतु रिसानी ॥
उस दुर्बुद्धि कैकेयीको यह कुवेषता ( बुरा वेष ) कैसी फब रही है, मानो भावी विधवापनकी सूचना दे रही हो । राजा उसके पास जाकर कोमल वाणीसे बोले- हे प्राणप्रिये! किसलिये रिसाई ( रूठी) हो? ॥४ ॥
छं० – केहि हेतु रानि रिसानि परसत पानि पतिहि नेवारई ।
मानहुँ सरोष भुअंग भामिनि बिषम भाँति निहारई ॥
दोउ बासना रसना दसन बर मरम ठाहरु देखई ।
तुलसी नृपति भवतब्यता बस काम कौतुक लेखई ॥
' हे रानी! किसलिये रूठी हो?' यह कहकर राजा उसे हाथसे स्पर्श करते हैं तो वह उनके हाथको [ झटककर ] हटा देती है और ऐसे देखती है मानो क्रोधमें भरी हुई नागिन क्रूर दृष्टिसे देख रही हो । दोनों [ वरदानोंकी ] वासनाएँ उस नागिनकी दो जीभें हैं और दोनों वरदान दाँत हैं; वह काटनेके लिये मर्मस्थान देख रही है । तुलसीदासजी कहते हैं कि राजा दशरथ होनहारके वशमें होकर इसे ( इस प्रकार हाथ झटकने और नागिनकी भाँति देखनेको ) कामदेवकी क्रीड़ा ही समझ रहे हैं ।
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* * अयोध्याकाण्ड ३६५
सो० – बार बार कह राउ सुमुखि सुलोचनि पिकबचनि ।
कारन मोहि सुनाउ गजगामिनि निज कोप कर ॥ २५ ॥
राजा बार- बार कह रहे हैं - हे सुमुखी! हे सुलोचनी! हे कोकिलबयनी! हे गजगामिनी! मुझे अपने क्रोधका कारण तो सुना ॥ २५ ॥
अनहित तोर प्रिया के कीन्हा । केहि दुइ सिर केहि जमु चह लीन्हा ॥
कहु केहि रंकहि करौं नरेसू । कहु केहि नृपहि निकासौं देसू॥
हे प्रिये! किसने तेरा अनिष्ट किया? किसके दो सिर हैं? यमराज किसको लेना ( अपने लोकको ले जाना ) चाहते हैं? कह, किस कंगालको राजा कर दूँ या किस राजाको देशसे निकाल दूँ॥१ ॥
सकउँ तोर अरि अमरउ मारी । काह कीट बपुरे नर नारी ॥
जानसि मोर सुभाउ बरोरू । मनु तव आनन चंद चकोरू॥।
तेरा शत्रु अमर ( देवता ) भी हो, तो मैं उसे भी मार सकता हूँ । बेचारे कीड़े - मकोड़े - सरीखे नर-नारी तो चीज ही क्या हैं । हे सुन्दरि! तू तो मेरा स्वभाव जानती ही है कि मेरा मन सदा तेरे मुखरूपी चन्द्रमाका चकोर है ॥२ ॥
प्रिया प्रान सुत सरबसु मोरें । परिजन प्रजा सकल बस तोरें ॥
जौं कछु कहौं कपटु करि तोही । भामिनि राम सपथ सत मोही ॥
हे प्रिये! मेरी प्रजा, कुटुम्बी, सर्वस्व ( सम्पत्ति), पुत्र, यहाँतक कि मेरे प्राण भी, ये सब तेरे वशमें ( अधीन ) हैं । यदि मैं तुझसे कुछ कपट करके कहता होऊँ तो हे भामिनी! मुझे सौ बार रामकी सौगंध है ॥ ३ ॥
बिहसि मागु मनभावति बाता ॥ भूषन सजहि मनोहर गाता ॥
घरी कुघरी समुझि जियँ देखू । बेगि प्रिया परिहरहि कुबेषू॥
तू हँसकर ( प्रसन्नतापूर्वक ) अपनी मनचाही बात माँग ले और अपने मनोहर अंगोंको आभूषणोंसे सजा । मौका-बेमौका तो मनमें विचारकर देख । हे प्रिये! जल्दी इस बुरे वेषको त्याग दे ॥४ ॥
दो० - यह सुनि मन गुनि सपथ बड़ि बिहसि उठी मतिमंद ।
भूषन सजति बिलोकि मृगु मनहुँ किरातिनि फंद ॥ २६ ॥
यह सुनकर और मनमें रामजीकी बड़ी सौगन्धको विचारकर मन्दबुद्धि कैकेयी हँसती हुई उठी और गहने पहनने लगी; मानो कोई भीलनी मृगको देखकर फंदा तैयार कर रही हो! ॥२६ ॥
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* *३६६ रामचरितमानस
पुनि कह राउ सुहृद जियँ जानी । प्रेम पुलकि मृदु मंजुल बानी ॥
भामिनि भयउ तोर मनभावा । घर घर नगर अनंद बधावा ॥
अपने जीमें कैकेयीको सुहृद् जानकर राजा दशरथजी प्रेमसे पुलकित होकर कोमल और सुन्दर वाणीसे फिर बोले- हे भामिनि! तेरा मनचीता हो गया । नगरमें घर-घर आनन्दके बधावे बज रहे हैं ॥१ ॥
रामहि देउँ कालि जुबराजू । सजहि सुलोचन मंगल साजू॥
दलकि उठेउ सुनि हृदउ कठोरू । जनु छुइ गयउ पाक बरतोरू ॥
मैं कल ही रामको युवराज- पद दे रहा हूँ । इसलिये हे सुनयनी! तू मङ्गल -साज सज । यह सुनते ही उसका कठोर हृदय दलक उठा ( फटने लगा) । मानो पका हुआ बालतोड़ ( फोड़ा ) छू गया हो ॥२ ॥
ऐसिउ पीर बिहसि तेहिं गोई । चोर नारि जिमि प्रगटि न रोई ॥
लखहिं न भूप कपट चतुराई । कोटि कुटिल मनि गुरू पढ़ाई ॥
ऐसी भारी पीड़ाको भी उसने हँसकर छिपा लिया, जैसे चोरकी स्त्री प्रकट होकर नहीं रोती ( जिसमें उसका भेद न खुल जाय) । राजा उसकी कपट- चतुराईको नहीं लख रहे हैं । क्योंकि वह करोड़ों कुटिलोंकी शिरोमणि गुरु मन्थराकी पढ़ायी हुई है ॥ ३ ॥
जद्यपि नीति निपुन नरनाहू । नारिचरित जलनिधि अवगाहू ॥
कपट सनेहु बढ़ाइ बहोरी । बोली बिहसि नयन मुहु मोरी ॥
यद्यपि राजा नीतिमें निपुण हैं; परन्तु त्रियाचरित्र अथाह समुद्र है । फिर वह कपटयुक्त प्रेम बढ़ाकर ( ऊपरसे प्रेम दिखाकर ) नेत्र और मुँह मोड़कर हँसती हुई बोली —॥४ ॥
दो० - मागु मा पै कहहु पिय कबहुँ न देहु न लेहु ।।
देन कहेहु बरदान दुइ तेउ पावत संदेहु ॥ २७ ॥
हे प्रियतम! आप माँग- माँग तो कहा करते हैं, पर देते- लेते कभी कुछ भी नहीं । आपने दो वरदान देनेको कहा था, उनके भी मिलनेमें सन्देह है ॥ २७ ॥
जानेउँ मरमु राउ हँसि कहई । तुम्हहि कोहाब परम प्रिय अहई ॥
थाती राखि न मागिहु काऊ । बिसरि गयउ मोहि भोर सुभाऊ ॥
राजाने हँसकर कहा कि अब मैं तुम्हारा मर्म ( मतलब ) समझा । मान करना तुम्हें परम प्रिय है । तुमने उन वरोंको थाती ( धरोहर) रखकर फिर कभी माँगा ही नहीं और मेरा भूलनेका स्वभाव होनेसे मुझे भी वह प्रसङ्ग याद नहीं रहा ॥ १ ॥
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* ** अयोध्याकाण्ड ३६७
झूठेहुँ हमहि दोषु जनि देहू । दुइ कै चारि मागि मकु लेहू ॥
रघुकुल रीति सदा चलि आई । प्रान जाहुँ बरु बचनु न जाई ॥
मुझे झूठ-मूठ दोष मत दो | चाहे दोके बदले चार माँग लो । रघुकुलमें सदासे यही रीति चली आयी है कि प्राण भले ही चले जायँ, पर वचन नहीं जाता ॥२ ॥
नहिं असत्य सम पातक पुंजा । गिरि सम होहिं कि कोटिक गुंजा ॥
सत्यमूल सब सुकृत सुहाए । बेद पुरान बिदित मनु गाए ॥
असत्यके समान पापोंका समूह भी नहीं है । क्या करोड़ों घुँघचियाँ मिलकर भी कहीं पहाड़के समान हो सकती हैं । ‘ सत्य ' ही समस्त उत्तम सुकृतों ( पुण्यों ) -की जड़ है । यह बात वेद -पुराणोंमें प्रसिद्ध है और मनुजीने भी यही कहा है ॥ ३ ॥
तेहि पर राम सपथ करि आई । सुकृत सनेह अवधि रघुराई ॥
बात दृढ़ाइ कुमति हँसि बोली । कुमत कुबिहग कुलह जनु खोली ॥
उसपर मेरे द्वारा श्रीरामजीकी शपथ करनेमें आ गयी ( मुँहसे निकल पड़ी ) । श्रीरघुनाथजी मेरे सुकृत ( पुण्य ) और स्नेहकी सीमा हैं । इस प्रकार बात पक्की कराके दुर्बुद्धि कैकेयी हँसकर बोली, मानो उसने कुमत ( बुरे विचार ) रूपी दुष्ट पक्षी ( बाज ) - [ को छोड़नेके लिये उस ] -की कुलही (आँखोंपरकी टोपी ) खोल दी ॥४ ॥
दो० - भूप मनोरथ सुभग बनु सुख सुबिहंग समाजु ।
भिल्लिनिजिमि छाड़न चहति बचनु भयंकरु बाजु ॥ २८ ॥
राजाका मनोरथ सुन्दर वन है, सुख सुन्दर पक्षियोंका समुदाय है । उसपर भीलनीकी तरह कैकेयी अपना वचनरूपी भयंकर बाज छोड़ना चाहती है ॥२८ ॥
मासपारायण, तेरहवाँ विश्राम
सुनहु प्रानप्रिय भावत जी का । देहु एक बर भरतहि टीका ॥
मागउँ दूसर बर कर जोरी । पुरवहु नाथ मनोरथ मोरी ॥
[ वह बोली– ] हे प्राणप्यारे! सुनिये, मेरे मनको भानेवाला एक वर तो दीजिये, भरतको राजतिलक; और हे नाथ! दूसरा वर भी मैं हाथ जोड़कर माँगती हूँ, मेरा मनोरथ पूरा कीजिये- ॥ १ ॥
तापस बेष बिसेषि उदासी । चौदह बरिस रामु बनबासी ॥
सुनि मृदु बचन भूप हियँ सोकू । ससि कर छुअत बिकल जिमि कोकू ॥
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* *३६८ रामचरितमानस तपस्वियोंके वेषमें विशेष उदासीन भावसे ( राज्य और कुटुम्ब आदिकी ओरसे भलीभाँति उदासीन होकर विरक्त मुनियोंकी भाँति ) राम चौदह वर्षतक वनमें निवास करें । कैकेयीके कोमल ( विनययुक्त ) वचन सुनकर राजाके हृदयमें ऐसा शोक हुआ जैसे चन्द्रमाकी किरणोंके स्पर्शसे चकवा विकल हो जाता है ॥ २ ॥
गयउ सहमि नहिं कछु कहि आवा । जनु सचान बन झपटेउ लावा ॥
बिबरन भयउ निपट नरपालू । दामिनि हनेउ मनहुँ तरु तालू ॥
राजा सहम गये, उनसे कुछ कहते न बना, मानो बाज वनमें बटेरपर झपटा हो । राजाका रंग बिलकुल उड़ गया, मानो ताड़के पेड़को बिजलीने मारा हो ( जैसे ताड़के पेड़पर बिजली गिरनेसे वह झुलसकर बदरंगा हो जाता है, वही हाल राजाका हुआ) ॥ ३ ॥
माथें हाथ मूदि दोउ लोचन । तनु धरि सोचु लाग जनु सोचन ॥
फरत करिनि जिमि हतेउ समूला ॥मोर मनोरथु सुरतरु फूला । माथेपर हाथ रखकर, दोनों नेत्र बंद करके राजा ऐसे सोच करने लगे, मानो साक्षात् सोच ही शरीर धारणकर सोच कर रहा हो । [ वे सोचते हैं - हाय! ] मेरा मनोरथरूपी कल्पवृक्ष फूल चुका था, परन्तु फलते समय कैकेयीने हथिनीकी तरह उसे जड़समेत उखाड़कर नष्ट कर डाला ॥ ४ ॥
अवध उजारि कीन्हि कैकेईं । दीन्हिसि अचल बिपति कै नेई ॥
कैकेयीने अयोध्याको उजाड़ कर दिया और विपत्तिकी अचल ( सुदृढ़ ) नींव डाल दी ॥ ५ ॥
दो० – कवनें अवसर का भयउ गयउँ नारि बिस्वास ।
जोग सिद्धि फल समय जिमि जतिहि अबिद्या नास ॥ २ ९ ॥
किस अवसरपर क्या हो गया! स्त्रीका विश्वास करके मैं वैसे ही मारा गया, जैसे योगकी सिद्धिरूपी फल मिलनेके समय योगीको अविद्या नष्ट कर देती है ॥ २ ९ ॥
एहि बिधि राउ मनहिं मन झाँखा । देखि कुभाँति कुमति मन माखा ॥
भरतु कि राउर पूत न होंही । आनेहु मोल बेसाहि कि मोही ॥
इस प्रकार राजा मन -ही- मन झींख रहे हैं । राजाका ऐसा बुरा हाल देखकर दुर्बुद्धि कैकेयी मनमें बुरी तरहसे क्रोधित हुई । [ और बोली– ] क्या भरत आपके पुत्र नहीं हैं? क्या मुझे आप दाम देकर खरीद लाये हैं? ( क्या मैं आपकी विवाहिता पत्नी नहीं हूँ? ) ॥ १ ॥
जो सुनि सरु अस लाग तुम्हारें । काहे न बोलहु बचनु सँभारें ॥
देहु उतरु अनु करहु कि नाहीं । सत्यसंध तुम्ह रघुकुल माहीं ॥