श्रीरामचरितमानस — पृष्ठ 371–380
श्रीरामचरितमानस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 371–380
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* * अयोध्याकाण्ड ३६ ९ जो मेरा वचन सुनते ही आपको बाण-सा लगा तो आप सोच-समझकर बात क्यों नहीं कहते? उत्तर दीजिये — हाँ कीजिये, नहीं तो नाहीं कर दीजिये । आप रघुवंशमें सत्य प्रतिज्ञावाले [ प्रसिद्ध] हैं! ॥२ ॥
देन कहे अब जनि बरु देहू । तजहु सत्य जग अपजसु लेहू॥
सत्य सराहि कहेहु बरु देना । जानेहु लेइहि मागि चबेना ॥
आपने ही वर देनेको कहा था, अब भले ही न दीजिये । सत्यको छोड़ दीजिये और जगत्में अपयश लीजिये । सत्यकी बड़ी सराहना करके वर देनेको कहा था । समझा था कि यह चबेना ही माँग लेगी! ॥३ ॥
सिबि दधीचि बलि जो कछु भाषा । तनु धनु तजेउ बचन पनु राखा ॥
अति कटु बचन कहति कैकेई । मानहुँ लोन जरे पर देई ॥
राजा शिबि, दधीचि और बलिने जो कुछ कहा, शरीर और धन त्यागकर भी उन्होंने अपने वचनकी प्रतिज्ञाको निबाहा । कैकेयी बहुत ही कडुवे वचन कह रही है, मानो जलेपर नमक छिड़क रही हो ॥४ ॥
दो०-१- धरम धुरंधर धीर धरि नयन उघारे रायँ ।
सिरु धुनि लीन्हि उसास असि मारेसि मोहि कुठायँ ॥ ३० ॥
धर्मकी धुरीको धारण करनेवाले राजा दशरथने धीरज धरकर नेत्र खोले और सिर धुनकर तथा लंबी साँस लेकर इस प्रकार कहा कि इसने मुझे बड़े कुठौर मारा ( ऐसी कठिन परिस्थिति उत्पन्न कर दी, जिससे बच निकलना कठिन हो गया ) ॥ ३० ॥
आगें दीखि जरत रिस भारी । मनहुँ रोष तरवारि उघारी ॥
मूठि कुबुद्धि धार निठुराई । धरी कूबरींकूबरीं सान बनाई ॥
प्रचण्ड क्रोधसे जलती हुई कैकेयी सामने इस प्रकार दिखायी पड़ी, मानो क्रोधरूपी तलवार नंगी ( म्यानसे बाहर ) खड़ी हो । कुबुद्धि उस तलवारकी मूठ है, निष्ठुरता धार है और वह कुबरी ( मन्थरा ) रूपी सानपर धरकर तेज की हुई है ॥१ ॥
लखी महीप कराल कठोरा । सत्य कि जीवनु लेइहि मोरा ॥
बोले राउ कठिन करि छाती । बानी सबिनय तासु सोहाती ॥
राजाने देखा कि यह ( तलवार) बड़ी ही भयानक और कठोर है [ और सोचा- ] क्या सत्य ही यह मेरा जीवन लेगी? राजा अपनी छाती कड़ी करके, बहुत ही नम्रताके साथ उसे ( कैकेयीको ) प्रिय लगनेवाली वाणी बोले—॥२ ॥
प्रिया बचन कस कहसि कुभाँती । भीर प्रतीति प्रीति करि हाँती ॥
मोरें भरतु रामु दुइ आँखी । सत्य कहउँ करि संकरु साखी ॥
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* *३७० रामचरितमानस हे प्रिये! हे भीरु! विश्वास और प्रेमको नष्ट करके ऐसे बुरी तरहके वचन कैसे कह रही हो । मेरे तो भरत और रामचन्द्र दो आँखें ( अर्थात् एक-से ) हैं; यह मैं शङ्करजीकी साक्षी देकर सत्य कहता हूँ॥३ ॥
अवसि दूतु मैं पठइब प्राता । ऐहहिं बेगि सुनत दोउ भ्राता ॥
सुदिन सोधि सबु साजु सजाई । देउँ भरत कहुँ राजु बजाई ॥
मैं अवश्य सबेरे ही दूत भेजूँगा । दोनों भाई ( भरत शत्रुघ्न ) सुनते ही तुरंत आ जायँगे । अच्छा दिन ( शुभ मुहूर्त्त) शोधवाकर, सब तैयारी करके डंका बजाकर मैं भरतको राज्य दे दूँगा ॥ ४ ॥
दो० - लोभु न रामहि राजु कर बहुत भरत पर प्रीति ।
मैं बड़ छोट बिचारि जियँ करत रहेउँ नृपनीति ॥ ३१ ॥
रामको राज्यका लोभ नहीं है और भरतपर उनका बड़ा ही प्रेम है । मैं ही अपने मनमें बड़े - छोटेका विचार करके राजनीतिका पालन कर रहा था ( बड़ेको राजतिलक देने जा रहा था ) ॥३१ ॥
राम सपथ सत कहउँ सुभाऊ । राममातु कछु कहेउ न काऊ ॥
मैं सबु कीन्ह तोहि बिनु पूँछें ॥ तेहि तें परेउ मनोरथु छूछें ॥
रामकी सौ बार सौगंध खाकर मैं स्वभावसे ही कहता हूँ कि रामकी माता ( कौसल्या ) -ने [ इस विषयमें ] मुझसे कभी कुछ नहीं कहा । अवश्य ही मैंने तुमसे बिना पूछे यह सब किया । इसीसे मेरा मनोरथ खाली गया ॥ १ ॥
रिस परिहरु अब मंगल साजू । कछु दिन गएँ भरत जुबराजू॥
एकहि बात मोहि दुखु लागा । बर दूसर असमंजस मागा ॥
अब क्रोध छोड़ दे और मङ्गल साज सज । कुछ ही दिनों बाद भरत युवराज हो जायँगे । एक ही बातका मुझे दुःख लगा कि तूने दूसरा वरदान बड़ी अड़चनका माँगा ॥२ ॥
अजहूँ हृदउ जरत तेहि आँचा । रिस परिहास कि साँचेहुँ साँचा ॥
कहु तजि रोषु राम अपराधू । सबु कोउ कहइ रामु सुठि साधू॥
उसकी आँचसे अब भी मेरा हृदय जल रहा है । यह दिल्लगीमें, क्रोधमें अथवा सचमुच ही ( वास्तवमें ) सच्चा है? क्रोधको त्यागकर रामका अपराध तो बता । सब कोई तो कहते हैं कि राम बड़े ही साधु हैं ॥३ ॥
तुहूँ सराहसि करसि सनेहू । अब सुनि मोहि भयउ संदेहू॥
जासु सुभाउ अरिहि अनुकूला । सो किमि करिहि मातु प्रतिकूला ॥
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* '* अयोध्याकाण्ड ३७१ तू स्वयं भी रामकी सराहना करती और उनपर स्नेह किया करती थी । अब यह सुनकर मुझे सन्देह हो गया है [ कि तुम्हारी प्रशंसा और स्नेह कहीं झूठे तो न थे? ] जिसका स्वभाव शत्रुको भी अनुकूल है, वह माताके प्रतिकूल आचरण क्यों कर करेगा? ॥ ४ ॥
दो० – प्रिया हास रिस परिहरहि मागु बिचारि बिबेकु ।
जेहिं देखौं अब नयन भरि भरत राज अभिषेकु ॥ ३२ ॥
हे प्रिये! हँसी और क्रोध छोड़ दे और विवेक ( उचित-अनुचित ) विचारकर वर माँग, जिससे अब मैं नेत्र भरकर भरतका राज्याभिषेक देख सकूँ ॥३२ ॥
जिऐ मीन बरु बारि बिहीना । मनि बिनु फनिकु जिऐ दुख दीना ॥
कहउँ सुभाउ न छलु मन माहीं । जीवनु मोर राम बिनु नाहीं ॥
मछली चाहे बिना पानीके जीती रहे और साँप भी चाहे बिना मणिके दीन-दुखी होकर जीता रहे । परन्तु मैं स्वभावसे ही कहता हूँ, मनमें [ जरा भी ] छल रखकर नहीं कि मेरा जीवन रामके बिना नहीं है ॥ १ ॥
समुझि देखु जियँ प्रिया प्रबीना । जीवनु राम दरस आधीना ॥
सुनि मृदु बचन कुमति अति जरई । मनहुँ अनल आहुति घृत परई ॥
हे चतुर प्रिये! जीमें समझ देख, मेरा जीवन श्रीरामके दर्शनके अधीन है । राजाके कोमल वचन सुनकर दुर्बुद्धि कैकेयी अत्यन्त जल रही है । मानो अग्निमें घीकी आहुतियाँ पड़ रही हैं ॥ २ ॥
कहइ करहु किन कोटि उपाया । इहाँ न लागिहि राउरि माया ॥
देहु कि लेहु अजसु करि नाहीं । मोहि न बहुत प्रपंच सोहाहीं ॥
[ कैकेयी कहती है— ] आप करोड़ों उपाय क्यों न करें, यहाँ आपकी माया ( चालबाजी ) नहीं लगेगी । या तो मैंने जो माँगा है सो दीजिये, नहीं तो ' नाहीं ' करके अपयश लीजिये । मुझे बहुत प्रपञ्च ( बखेड़े ) नहीं सुहाते ॥३ ॥
रामु साधु तुम्ह साधु सयाने । राममातु भलि सब पहिचाने ॥
जस कौसिलाँ मोर भल ताका । तस फलु उन्हहि देउँ करि साका ॥
राम साधु हैं, आप सयाने साधु हैं और रामकी माता भी भली हैं; मैंने सबको पहचान लिया है । कौसल्याने मेरा जैसा भला चाहा है, मैं भी साका करके ( याद रखनेयोग्य ) उन्हें वैसा ही फल दूँगी ॥ ४ ॥
दो० - होत प्रातु मुनिबेष धरि जौं न रामु बन जाहिं ।
मोर मरनु राउर अजस नृप समुझिअ मन माहिं ॥ ३३ ॥
सबेरा होते ही मुनिका वेष धारणकर यदि राम वनको नहीं जाते, तो हे राजन्! मनमें [ निश्चय ] समझ लीजिये कि मेरा मरना होगा और आपका अपयश! ॥ ३३ ॥
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* *३७२ रामचरितमानस अस कहि कुटिल भई उठि ठाढ़ी ॥ मानहुँ रोष तरंगिनि बाढ़ी ॥
पाप पहार प्रगट भइ सोई । भरी क्रोध जल जाइ न जोई ॥
ऐसा कहकर कुटिल कैकेयी उठ खड़ी हुई, मानो क्रोधकी नदी उमड़ी हो । वह नदी पापरूपी पहाड़से प्रकट हुई है और क्रोधरूपी जलसे भरी है; [ ऐसी भयानक है कि] देखी नहीं जाती! ॥ १ ॥
दोउ बर कूल कठिन हठ धारा । भवँर कूबरी बचन प्रचारा ॥
ढाहत भूपरूप तरु मूला । चली बिपति बारिधि अनुकूला ॥
दोनों वरदान उस नदीके दो किनारे हैं, कैकेयीका कठिन हठ ही उसकी [ तीव्र ] धारा है और कुबरी ( मन्थरा ) -के वचनोंकी प्रेरणा ही भँवर है । [ वह क्रोधरूपी नदी ] राजा दशरथरूपी वृक्षको जड़ मूलसे ढहाती हुई विपत्तिरूपी समुद्रकी ओर [ सीधी ] चली है ॥२ ॥
लखी नरेस बात फुरि साँची । तिय मिस मीचु सीस पर नाची ॥
गहि पद बिनय कीन्ह बैठारी । जनि दिनकर कुल होसि कुठारी ॥
राजाने समझ लिया कि बात सचमुच ( वास्तवमें ) सच्ची है, स्त्रीके बहाने मेरी मृत्यु ही सिरपर नाच रही है । [ तदनन्तर राजाने कैकेयीके ] चरण पकड़कर उसे बिठाकर विनती की कि तू सूर्यकुल- [रूपी वृक्ष ] के लिये कुल्हाड़ी मत बन ॥ ३ ॥
मागु माथ अबहीं देउँ तोही । राम बिरहँ जनि मारसि मोही ॥
राखु राम कहुँ जेहि तेहि भाँती । नाहिं त जरिहि जनम भरि छाती ॥
तू मेरा मस्तक माँग ले, मैं तुझे अभी दे दूँ । पर रामके विरहमें मुझे मत मार । जिस किसी
प्रकारसे हो तू रामको रख ले । नहीं तो जन्मभर तेरी छाती जलेगी ॥४ ॥
दो० – देखी ब्याधि असाध नृपु परेउ धरनि धुनि माथ ।
कहत परम आरत बचन राम राम रघुनाथ ॥ ३४ ॥
राजाने देखा कि रोग असाध्य है, तब वे अत्यन्त आर्तवाणीसे ' हा राम! हा राम! हा रघुनाथ! ' कहते हुए सिर पीटकर जमीनपर गिर पड़े ॥ ३४ ॥
ब्याकुल राउ सिथिल सब गाता । करिनि कलपतरु मनहुँ निपाता ॥
कंठु सूख मुख आव न बानी । जनु पाठीनु दीन बिनु पानी ॥
राजा व्याकुल हो गये, उनका सारा शरीर शिथिल पड़ गया, मानो हथिनीने कल्पवृक्षको उखाड़ फेंका हो । कण्ठ सूख गया, मुखसे बात नहीं निकलती, मानो पानीके बिना पहिना नामक मछली तड़प रही हो ॥१ ॥
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* * अयोध्याकाण्ड ३७३
पुनि कह कटु कठोर कैकेई । मनहुँ घाय महुँ माहुर देई ॥
जौं अंतहुँ अस करतबु रहेऊ । मागु मागु तुम्ह केहिं बल कहेऊ ॥
कैकेयी फिर कड़वे और कठोर वचन बोली, मानो घावमें जहर भर रही हो । [ कहती है— ] जो अन्तमें ऐसा ही करना था, तो आपने ' माँग, माँग ' किस बलपर कहा था ॥ २ ॥
दुइ कि होइ एक समय भुआला । हँसब ठठाइ फुलाउब गाला ॥
दानि कहाउब अरु कृपनाई । होइ कि खेम कुसल रौताई ॥
हे राजा! ठहाका मारकर हँसना और गाल फुलाना- क्या ये दोनों एक साथ हो सकते हैं? दानी भी कहाना और कंजूसी भी करना । क्या रजपूतीमें क्षेम- कुशल भी रह सकती है? ( लड़ाईमें बहादुरी भी दिखावें और कहीं चोट भी न लगे! ) ॥ ३ ॥
छाड़हु बचनु कि धीरजु धरहू । जनि अबला जिमि करुना करहू ॥
तनु तिय तनय धामु धनु धरनी । सत्यसंध कहुँ तृन सम बरनी ॥
या तो वचन ( प्रतिज्ञा ) ही छोड़ दीजिये या धैर्य धारण कीजिये । यों असहाय स्त्रीकी भाँति रोइये - पीटिये नहीं । सत्यव्रतीके लिये तो शरीर, स्त्री, पुत्र, घर, धन और पृथ्वी- सब तिनकेके बराबर कहे गये हैं ॥४ ॥
दो० – मरम बचन सुनि राउ कह कहु कछु दोषु न तोर ।
लागेउ तोहि पिसाच जिमि कालु कहावत मोर ॥ ३५ ॥
कैकेयीके मर्मभेदी वचन सुनकर राजाने कहा कि तू जो चाहे कह, तेरा कुछ भी दोष नहीं है । मेरा काल तुझे मानो पिशाच होकर लग गया है, वही तुझसे यह सब कहला रहा है ॥३५ ॥
चहत न भरत भूपतहि भोरें । बिधि बस कुमति बसीजिय तोरें ॥
सो सबु मोर पाप परिनामू । भयउ कुठाहर जेहिं बिधि बामू॥
भरत तो भूलकर भी राजपद नहीं चाहते । होनहारवश तेरे ही जीमें कुमति आ बसी । यह सब मेरे पापोंका परिणाम है, जिससे कुसमयमें ( बेमौके ) विधाता विपरीत हो गया ॥ १ ॥
सुबस बसिहि फिरि अवध सुहाई । सब गुन धाम राम प्रभुताई ॥
करिहहिं भाइ सकल सेवकाई । होइहि तिहुँ पुर राम बड़ाई ॥
[ तेरी उजाड़ी हुई ] यह सुन्दर अयोध्या फिर भलीभाँति बसेगी और समस्त गुणोंके धाम श्रीरामकी प्रभुता भी होगी । सब भाई उनकी सेवा करेंगे और तीनों लोकोंमें श्रीरामकी बड़ाई होगी ॥२ ॥
तोर कलंकु मोर पछिताऊ । मुएहुँ न मिटिहि न जाइहि काऊ ॥
अब तोहि नीक लाग करु सोई । लोचन ओट बैठु मुहु गोई ॥
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* *३७४ रामचरितमानस केवल तेरा कलंक और मेरा पछतावा मरनेपर भी नहीं मिटेगा, यह किसी तरह नहीं जायगा । अब तुझे जो अच्छा लगे वही कर । मुँह छिपाकर मेरी आँखोंकी ओट जा बैठ ( अर्थात् मेरे सामनेसे हट जा, मुझे मुँह न दिखा ) ॥ ३ ॥
जब लगि जिऔं कहउँ कर जोरी । तब लगि जनि कछु कहसि बहोरी ॥
फिरि पछितैहसि अंत अभागी । मारसि गाइ नहारू लागी ॥
मैं हाथ जोड़कर कहता हूँ कि जबतक मैं जीता रहूँ, तबतक फिर कुछ न कहना ( अर्थात् मुझसे न बोलना) । अरी अभागिनी! फिर तू अन्तमें पछतायेगी जो तू नहारू ( ताँत ) के लिये गायको मार रही है ॥४ ॥
-परेड राउ कहि कोटि बिधि काहे करसि निदानु ।
-0कपट सयानि न कहति कछु जागति मनहुँ मसानु ॥ ३६ ॥
राजा करोड़ों प्रकारसे ( बहुत तरहसे ) समझाकर [ और यह कहकर ] कि तू क्यों सर्वनाश कर रही है, पृथ्वीपर गिर पड़े । पर कपट करनेमें चतुर कैकेयी कुछ बोलती नहीं, मानो [ मौन होकर ] मसान जगा रही हो ( श्मशानमें बैठकर प्रेतमन्त्र सिद्ध कर रही हो) ॥ ३६ ॥
राम राम रट बिकल भुआलू I। जनु बिनु पंख बिहंग बेहालू ॥
हृदयँ मनाव भोरु जनि होई । रामहि जाइ कहै जनि कोई ॥
राजा ‘ राम - राम ' रट रहे हैं और ऐसे व्याकुल हैं, जैसे कोई पक्षी पंखके बिना बेहाल हो । वे अपने हृदयमें मनाते हैं कि सबेरा न हो, और कोई जाकर श्रीरामचन्द्रजीसे यह बात न कहे ॥ १ ॥
उदउ करहु जनि रबि रघुकुल गुर । अवध बिलोकि सूल होइहि उर ॥
भूप प्रीति कैकई कठिनाई । उभय अवधि बिधि रची बनाई ॥
हे रघुकुलके गुरु ( बड़ेरे मूलपुरुष ) सूर्यभगवान्! आप अपना उदय न करें । अयोध्याको [ बेहाल ] देखकर आपके हृदयमें बड़ी पीड़ा होगी । राजाकी प्रीति और कैकेयीकी निष्ठुरता दोनोंको ब्रह्माने सीमातक रचकर बनाया है ( अर्थात् राजा प्रेमकी सीमा हैं और कैकेयी निष्ठुरताकी ) ॥ २ ॥
बिलपत नृपहि भयउ भिनुसारा । बीना बेनु संख धुनि द्वारा ॥
पढ़हिं भाट गुन गावहिं गायक । सुनत नृपहि जनु लागहिं सायक ॥
विलाप करते - करते ही राजाको सबेरा हो गया । राजद्वारपर वीणा, बाँसुरी और शंखकी ध्वनि होने लगी । भाटलोग विरुदावली पढ़ रहे हैं और गवैये गुणोंका गान कर रहे हैं । सुननेपर राजाको वे बाण -जैसे लगते हैं ॥३ ॥
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* * अयोध्याकाण्ड ३७५
मंगल सकल सोहाहिं न कैसें । सहगामिनिहि बिभूषनबिभूषन जैसें ॥
तेहि निसि नीद परी नहिं काहू। राम दरसदरस लालसा उछाहू ॥
राजाको ये सब मङ्गल- साज कैसे नहीं सुहा रहे हैं, जैसे पतिके साथ सती होनेवाली स्त्रीको आभूषण! श्रीरामचन्द्रजीके दर्शनकी लालसा और उत्साहके कारण उस रात्रिमें किसीको भी नींद नहीं आयी ॥४ ॥
दो० - द्वार भीर सेवक सचिव कहहिं उदित रबि देखि ।
जागेउ अजहुँ न अवधपति कारनु कवनु बिसेषि ॥ ३७ ॥
राजद्वारपर मन्त्रियों और सेवकोंकी भीड़ लगी है । वे सब सूर्यको उदय हुआ देखकर कहते हैं कि ऐसा कौन -सा विशेष कारण है कि अवधपति दशरथजी अभीतक नहीं जागे? ॥ ३७ ॥
पछिले पहर भूपु नित जागा । आजु हमहि बड़ अचरजु लागा ॥
जाहु सुमंत्र जगावहु जाई । कीजिअ काजु रजायसु पाई ॥
राजा नित्य ही रातके पिछले पहर जाग जाया करते हैं, किन्तु आज हमें बड़ा आश्चर्य हो रहा
है ॥ हे सुमन्त्र! जाओ, जाकर राजाको जगाओ । उनकी आज्ञा पाकर हम सब काम करें ॥१ ॥
गए सुमंत्र तब राउर माहीं । देखि भयावन जात डेराहीं ॥
धाइ खाइ जनु जाइ न हेरा । मानहुँ बिपति बिषाद बसेरा ॥
तब सुमन्त्र रावले ( राजमहल) में गये, पर महलको भयानक देखकर वे जाते हुए डर रहे हैं । [ ऐसा लगता है ] मानो दौड़कर काट खायेगा, उसकी ओर देखा भी नहीं जाता । मानो विपत्ति और विषादने वहाँ डेरा डाल रखा हो ॥ २ ॥
पूछें कोउ न ऊतरु देई । गए जेहिं भवन भूप कैकेई ॥
कहि जयजीव बैठ सिरु नाई । देखि भूप गति गयउ सुखाई ॥
पूछनेपर कोई जवाब नहीं देता; वे उस महलमें गये, जहाँ राजा और कैकेयी थे । ' जय- जीव ' कहकर सिर नवाकर ( वन्दना करके ) बैठे और राजाकी दशा देखकर तो वे सूख ही गये ॥ ३ ॥
सोच बिकल बिबरन महि परेऊ । मानहुँ कमल मूलु परिहरेऊ ॥
सचिउ सभीत सकइ नहिं पूँछी । बोली असुभ भरी सुभ छूछी ॥
[ देखा कि— ] राजा सोचसे व्याकुल हैं, चेहरेका रंग उड़ गया है । जमीनपर ऐसे पड़े हैं, मानो कमल जड़ छोड़कर ( जड़से उखड़कर ) [ मुर्झाया ] पड़ा हो । मन्त्री मारे डरके कुछ पूछ नहीं सकते । तब अशुभसे भरी हुई और शुभसे विहीन कैकेयी बोली—॥४ ॥
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* *३७६ रामचरितमानस
दो००– परी न राजहि नीद निसि हेतु जान जगदीसु ।
रामु रामु रटि भोरु किय कहइ न मरमु महीसु ॥ ३८ ॥
राजाको रातभर नींद नहीं आयी, इसका कारण जगदीश्वर ही जानें । इन्होंने ' राम-राम ' रटकर सबेरा कर दिया, परन्तु इसका भेद राजा कुछ भी नहीं बतलाते ॥ ३८ ॥
आनहु रामहि बेगि बोलाई । समाचार तब पूँछेहु आई ॥
चलेउ सुमंत्रु राय रुख जानी । लखी कुचालि कीन्हि कछु रानी ॥
तुम जल्दी रामको बुला लाओ । तब आकर समाचार पूछना । राजाका रुख जानकर सुमन्त्रजी चले, समझ गये कि रानीने कुछ कुचाल की है ॥१ ॥
सोच बिकल मग परइ न पाऊ । रामहि बोलि कहिहि का राऊ ॥
उर धरि धीरजु गयउ दुआरें । पूँछहिं सकल देखि मनु मारें ॥
सुमन्त्र सोचसे व्याकुल हैं, रास्तेपर पैर नहीं पड़ता ( आगे बढ़ा नहीं जाता ), [ सोचते हैं— ] रामजीको बुलाकर राजा क्या कहेंगे? किसी तरह हृदयमें धीरज धरकर वे द्वारपर गये । सब लोग उनको मनमारे ( उदास ) देखकर पूछने लगे ॥२ ॥
समाधानु करि सो सबही का । गयउ जहाँ दिनकर कुल टीका ॥
राम सुमंत्रहि आवत देखा । आदरु कीन्ह पिता सम लेखा ॥
सब लोगोंका समाधान करके ( किसी तरह समझा-बुझाकर ) सुमन्त्र वहाँ गये, जहाँ सूर्यकुलके तिलक श्रीरामचन्द्रजी थे । श्रीरामचन्द्रजीने सुमन्त्रको आते देखा तो पिताके समान समझकर उनका आदर किया ॥ ३ ॥
निरखि बदनु कहि भूप रजाई । रघुकुलदीपहि चलेउ लेवाई ॥
रामु कुभाँति सचिव सँग जाहीं । देखि लोग जहँ तहँ बिलखाहीं ॥
श्रीरामचन्द्रजीके मुखको देखकर और राजाकी आज्ञा सुनाकर वे रघुकुलके दीपक श्रीरामचन्द्रजीको [ अपने साथ ] लिवा चले । श्रीरामचन्द्रजी मन्त्रीके साथ बुरी तरहसे ( बिना किसी लवाजमेके ) जा रहे हैं, यह देखकर लोग जहाँ -तहाँ विषाद कर रहे हैं ॥४ ॥
दो० - जाइ दीख रघुबंसमनि नरपति निपट कुसाजु ।
सहमि परेउ लखि सिंघिनिहि मनहुँ बृद्ध गजराजु ॥ ३ ९ ॥
रघुवंशमणि श्रीरामचन्द्रजीने जाकर देखा कि राजा अत्यन्त ही बुरी हालतमें पड़े हैं, मानो सिंहनीको देखकर कोई बूढ़ा गजराज सहमकर गिर पड़ा हो ॥ ३ ९ ॥
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* ** अयोध्याकाण्ड ३७७ सूखहिं अधर जरइ सबु अंगू ॥ मनहुँ दीन मनिहीन भुअंगू॥
सरुष समीप दीखि कैकेई । मानहुँ मीचु घरीं गनि लेई ॥
राजाके ओठ सूख रहे हैं और सारा शरीर जल रहा है, मानो मणिके बिना साँप दुःखी हो रहा हो । पास ही क्रोधसे भरी कैकेयीको देखा, मानो [साक्षात्] मृत्यु ही बैठी [ राजाके जीवनकी अन्तिम ] घड़ियाँ गिन रही हो ॥१ ॥
करुनामय मृदु राम सुभाऊ । प्रथम दीख दुखु सुना न काऊ ॥
तदपि धीर धरि समउ बिचारी । पूँछी मधुर बचन महतारी ॥
श्रीरामचन्द्रजीका स्वभाव कोमल और करुणामय है । उन्होंने [ अपने जीवनमें ] पहली बार यह दुःख देखा; इससे पहले कभी उन्होंने दुःख सुना भी न था । तो भी समयका विचार करके हृदयमें धीरज धरकर उन्होंने मीठे वचनोंसे माता कैकेयीसे पूछा- ॥२ ॥
मोहि कहु मातु तात दुख कारन । करिअ जतन जेहिं होइ निवारन ॥
सुनहु राम सबु कारनु एहू । राजहि तुम्ह पर बहुत सनेहू ॥
हे माता! मुझे पिताजीके दुःखका कारण कहो ताकि जिससे उसका निवारण हो ( दुःख दूर हो ) वह यत्न किया जाय । [ कैकेयीने कहा- ] हे राम! सुनो, सारा कारण यही है कि राजाका तुमपर बहुत स्नेह है ॥३ ॥
देन कहेन्हि मोहि दुइ बरदाना । मागेउँ जो कछु मोहि सोहाना ॥
सो सुनि भयउ भूप उर सोचू । छाड़ि न सकहिं तुम्हार सँकोचू॥
इन्होंने मुझे दो वरदान देनेको कहा था । मुझे जो कुछ अच्छा लगा, वही मैंने माँगा । उसे सुनकर राजाके हृदयमें सोच हो गया; क्योंकि ये तुम्हारा संकोच नहीं छोड़ सकते ॥४ ॥
दो०.- सुत सनेहु इत बचनु उत संकट परेउ नरेसु ।
सकहु त आयसु धरहु सिर मेटहु कठिन कलेसु ॥ ४० ॥
इधर तो पुत्रका स्नेह है और उधर वचन ( प्रतिज्ञा); राजा इसी धर्मसंकटमें पड़ गये हैं । यदि तुम कर सकते हो, तो राजाकी आज्ञा शिरोधार्य करो और इनके कठिन क्लेशको मिटाओ ॥ ४० ॥
निधरक बैठि कहइ कटु बानी । सुनत कठिनता अति अकुलानी ॥
जीभ कमान बचन सर नाना । मनहुँ महिप मृदु लच्छ समाना ॥
कैकेयी बेधड़क बैठी ऐसी कड़वी वाणी कह रही है जिसे सुनकर स्वयं कठोरता भी अत्यन्त व्याकुल हो उठी । जीभ धनुष है, वचन बहुत से तीर हैं और मानो राजा ही कोमल निशानेके समान हैं ॥१ ॥
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* *३७८ रामचरितमानस
सिखइ धनुषबिद्या बर बीरू ॥जनु कठोरपनु धरें सरीरू ।
सबु प्रसंगु रघुपतिहि सुनाई । बैठि मनहुँ तनु धरि निठुराई ॥
[ इस सारे साज-सामानके साथ ] मानो स्वयं कठोरपन श्रेष्ठ वीरका शरीर धारण करके धनुषविद्या सीख रहा है । श्रीरघुनाथजीको सब हाल सुनाकर वह ऐसे बैठी है, मानो निष्ठुरता ही शरीर धारण किये हुए हो ॥२ ॥
मन मुसुकाइ भानुकुल भानू । रामु सहज आनंद निधानू ॥
बोले बचन बिगत सब दूषन । मृदु मंजुल जनु बाग बिभूषन ॥
सूर्यकुलके सूर्य, स्वाभाविक ही आनन्दनिधान श्रीरामचन्द्रजी मनमें मुसकराकर सब दूषणोंसे रहित ऐसे कोमल और सुन्दर वचन बोले जो मानो वाणीके भूषण ही थे —॥३ ॥
सुनु जननी सोइ सुतु बड़भागी । जो पितु मातु बचन अनुरागी ॥
तनय मातु पितु तोषनिहारा । दुर्लभ जननि सकल संसारा ॥
हे माता! सुनो, वही पुत्र बड़भागी है, जो पिता- माताके वचनोंका अनुरागी ( पालन करनेवाला ) है । आज्ञा-पालनके द्वारा ] माता- पिताको सन्तुष्ट करनेवाला पुत्र, हे जननी! सारे संसारमें दुर्लभ है ॥४ ॥
दो० - मुनिगन मिलनु बिसेषि बन सबहि भाँति हित मोर ।
तेहि महँ पितु आयसु बहुरि संमत जननी तोर ॥४१ ॥
वनमें विशेषरूपसे मुनियोंका मिलाप होगा, जिसमें मेरा सभी प्रकारसे कल्याण है । उसमें भी, फिर पिताजीकी आज्ञा और हे जननी! तुम्हारी सम्मति है ॥ ४१ ॥
भरतु प्रानप्रिय पावहिं राजू । बिधि सब बिधि मोहि सनमुख आजू ॥
जौं न जाउँ बन ऐसेहु काजा । प्रथम गनिअ मोहि मूढ़ समाजा ॥
और प्राणप्रिय भरत राज्य पावेंगे । [ इन सभी बातोंको देखकर यह प्रतीत होता है कि ] आज विधाता सब प्रकारसे मुझे सम्मुख हैं ( मेरे अनुकूल हैं ) । यदि ऐसे कामके लिये भी मैं वनको न जाऊँ तो मूर्खोके समाजमें सबसे पहले मेरी गिनती करनी चाहिये ॥१ ॥
सेवहिं अरँडु कलपतरु त्यागी । परिहरि अमृत लेहिं बिषु मागी ॥
तेउ न पाइ अस समउ चुकाहीं । देखु बिचारि मातु मन माहीं ॥
जो कल्पवृक्षको छोड़कर रेंड़की सेवा करते हैं और अमृत त्यागकर विष माँग लेते हैं, हे माता! तुम मनमें विचारकर देखो, वे ( महामूर्ख ) भी ऐसा मौका पाकर कभी न चूकेंगे ॥२ ॥
अंब एक दुखु मोहि बिसेषी । निपट बिकल नरनायकु देखी ॥
थोरिहिं बात पितहि दुख भारी । होति प्रतीति न मोहि महतारी ॥