श्रीरामचरितमानस — पृष्ठ 371–380

श्रीरामचरितमानस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 371–380

पृष्ठ 371

श्रीरामचरितमानस, पृष्ठ 371 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

* * अयोध्याकाण्ड ३६ ९ जो मेरा वचन सुनते ही आपको बाण-सा लगा तो आप सोच-समझकर बात क्यों नहीं कहते? उत्तर दीजिये — हाँ कीजिये, नहीं तो नाहीं कर दीजिये । आप रघुवंशमें सत्य प्रतिज्ञावाले [ प्रसिद्ध] हैं! ॥२ ॥

देन कहे अब जनि बरु देहू । तजहु सत्य जग अपजसु लेहू॥

सत्य सराहि कहेहु बरु देना । जानेहु लेइहि मागि चबेना ॥

आपने ही वर देनेको कहा था, अब भले ही न दीजिये । सत्यको छोड़ दीजिये और जगत्में अपयश लीजिये । सत्यकी बड़ी सराहना करके वर देनेको कहा था । समझा था कि यह चबेना ही माँग लेगी! ॥३ ॥

सिबि दधीचि बलि जो कछु भाषा । तनु धनु तजेउ बचन पनु राखा ॥

अति कटु बचन कहति कैकेई । मानहुँ लोन जरे पर देई ॥

राजा शिबि, दधीचि और बलिने जो कुछ कहा, शरीर और धन त्यागकर भी उन्होंने अपने वचनकी प्रतिज्ञाको निबाहा । कैकेयी बहुत ही कडुवे वचन कह रही है, मानो जलेपर नमक छिड़क रही हो ॥४ ॥

दो०-१- धरम धुरंधर धीर धरि नयन उघारे रायँ ।

सिरु धुनि लीन्हि उसास असि मारेसि मोहि कुठायँ ॥ ३० ॥

धर्मकी धुरीको धारण करनेवाले राजा दशरथने धीरज धरकर नेत्र खोले और सिर धुनकर तथा लंबी साँस लेकर इस प्रकार कहा कि इसने मुझे बड़े कुठौर मारा ( ऐसी कठिन परिस्थिति उत्पन्न कर दी, जिससे बच निकलना कठिन हो गया ) ॥ ३० ॥

आगें दीखि जरत रिस भारी । मनहुँ रोष तरवारि उघारी ॥

मूठि कुबुद्धि धार निठुराई । धरी कूबरींकूबरीं सान बनाई ॥

प्रचण्ड क्रोधसे जलती हुई कैकेयी सामने इस प्रकार दिखायी पड़ी, मानो क्रोधरूपी तलवार नंगी ( म्यानसे बाहर ) खड़ी हो । कुबुद्धि उस तलवारकी मूठ है, निष्ठुरता धार है और वह कुबरी ( मन्थरा ) रूपी सानपर धरकर तेज की हुई है ॥१ ॥

लखी महीप कराल कठोरा । सत्य कि जीवनु लेइहि मोरा ॥

बोले राउ कठिन करि छाती । बानी सबिनय तासु सोहाती ॥

राजाने देखा कि यह ( तलवार) बड़ी ही भयानक और कठोर है [ और सोचा- ] क्या सत्य ही यह मेरा जीवन लेगी? राजा अपनी छाती कड़ी करके, बहुत ही नम्रताके साथ उसे ( कैकेयीको ) प्रिय लगनेवाली वाणी बोले—॥२ ॥

प्रिया बचन कस कहसि कुभाँती । भीर प्रतीति प्रीति करि हाँती ॥

मोरें भरतु रामु दुइ आँखी । सत्य कहउँ करि संकरु साखी ॥

पृष्ठ 372

श्रीरामचरितमानस, पृष्ठ 372 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

* *३७० रामचरितमानस हे प्रिये! हे भीरु! विश्वास और प्रेमको नष्ट करके ऐसे बुरी तरहके वचन कैसे कह रही हो । मेरे तो भरत और रामचन्द्र दो आँखें ( अर्थात् एक-से ) हैं; यह मैं शङ्करजीकी साक्षी देकर सत्य कहता हूँ॥३ ॥

अवसि दूतु मैं पठइब प्राता । ऐहहिं बेगि सुनत दोउ भ्राता ॥

सुदिन सोधि सबु साजु सजाई । देउँ भरत कहुँ राजु बजाई ॥

मैं अवश्य सबेरे ही दूत भेजूँगा । दोनों भाई ( भरत शत्रुघ्न ) सुनते ही तुरंत आ जायँगे । अच्छा दिन ( शुभ मुहूर्त्त) शोधवाकर, सब तैयारी करके डंका बजाकर मैं भरतको राज्य दे दूँगा ॥ ४ ॥

दो० - लोभु न रामहि राजु कर बहुत भरत पर प्रीति ।

मैं बड़ छोट बिचारि जियँ करत रहेउँ नृपनीति ॥ ३१ ॥

रामको राज्यका लोभ नहीं है और भरतपर उनका बड़ा ही प्रेम है । मैं ही अपने मनमें बड़े - छोटेका विचार करके राजनीतिका पालन कर रहा था ( बड़ेको राजतिलक देने जा रहा था ) ॥३१ ॥

राम सपथ सत कहउँ सुभाऊ । राममातु कछु कहेउ न काऊ ॥

मैं सबु कीन्ह तोहि बिनु पूँछें ॥ तेहि तें परेउ मनोरथु छूछें ॥

रामकी सौ बार सौगंध खाकर मैं स्वभावसे ही कहता हूँ कि रामकी माता ( कौसल्या ) -ने [ इस विषयमें ] मुझसे कभी कुछ नहीं कहा । अवश्य ही मैंने तुमसे बिना पूछे यह सब किया । इसीसे मेरा मनोरथ खाली गया ॥ १ ॥

रिस परिहरु अब मंगल साजू । कछु दिन गएँ भरत जुबराजू॥

एकहि बात मोहि दुखु लागा । बर दूसर असमंजस मागा ॥

अब क्रोध छोड़ दे और मङ्गल साज सज । कुछ ही दिनों बाद भरत युवराज हो जायँगे । एक ही बातका मुझे दुःख लगा कि तूने दूसरा वरदान बड़ी अड़चनका माँगा ॥२ ॥

अजहूँ हृदउ जरत तेहि आँचा । रिस परिहास कि साँचेहुँ साँचा ॥

कहु तजि रोषु राम अपराधू । सबु कोउ कहइ रामु सुठि साधू॥

उसकी आँचसे अब भी मेरा हृदय जल रहा है । यह दिल्लगीमें, क्रोधमें अथवा सचमुच ही ( वास्तवमें ) सच्चा है? क्रोधको त्यागकर रामका अपराध तो बता । सब कोई तो कहते हैं कि राम बड़े ही साधु हैं ॥३ ॥

तुहूँ सराहसि करसि सनेहू । अब सुनि मोहि भयउ संदेहू॥

जासु सुभाउ अरिहि अनुकूला । सो किमि करिहि मातु प्रतिकूला ॥

पृष्ठ 373

श्रीरामचरितमानस, पृष्ठ 373 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

* '* अयोध्याकाण्ड ३७१ तू स्वयं भी रामकी सराहना करती और उनपर स्नेह किया करती थी । अब यह सुनकर मुझे सन्देह हो गया है [ कि तुम्हारी प्रशंसा और स्नेह कहीं झूठे तो न थे? ] जिसका स्वभाव शत्रुको भी अनुकूल है, वह माताके प्रतिकूल आचरण क्यों कर करेगा? ॥ ४ ॥

दो० – प्रिया हास रिस परिहरहि मागु बिचारि बिबेकु ।

जेहिं देखौं अब नयन भरि भरत राज अभिषेकु ॥ ३२ ॥

हे प्रिये! हँसी और क्रोध छोड़ दे और विवेक ( उचित-अनुचित ) विचारकर वर माँग, जिससे अब मैं नेत्र भरकर भरतका राज्याभिषेक देख सकूँ ॥३२ ॥

जिऐ मीन बरु बारि बिहीना । मनि बिनु फनिकु जिऐ दुख दीना ॥

कहउँ सुभाउ न छलु मन माहीं । जीवनु मोर राम बिनु नाहीं ॥

मछली चाहे बिना पानीके जीती रहे और साँप भी चाहे बिना मणिके दीन-दुखी होकर जीता रहे । परन्तु मैं स्वभावसे ही कहता हूँ, मनमें [ जरा भी ] छल रखकर नहीं कि मेरा जीवन रामके बिना नहीं है ॥ १ ॥

समुझि देखु जियँ प्रिया प्रबीना । जीवनु राम दरस आधीना ॥

सुनि मृदु बचन कुमति अति जरई । मनहुँ अनल आहुति घृत परई ॥

हे चतुर प्रिये! जीमें समझ देख, मेरा जीवन श्रीरामके दर्शनके अधीन है । राजाके कोमल वचन सुनकर दुर्बुद्धि कैकेयी अत्यन्त जल रही है । मानो अग्निमें घीकी आहुतियाँ पड़ रही हैं ॥ २ ॥

कहइ करहु किन कोटि उपाया । इहाँ न लागिहि राउरि माया ॥

देहु कि लेहु अजसु करि नाहीं । मोहि न बहुत प्रपंच सोहाहीं ॥

[ कैकेयी कहती है— ] आप करोड़ों उपाय क्यों न करें, यहाँ आपकी माया ( चालबाजी ) नहीं लगेगी । या तो मैंने जो माँगा है सो दीजिये, नहीं तो ' नाहीं ' करके अपयश लीजिये । मुझे बहुत प्रपञ्च ( बखेड़े ) नहीं सुहाते ॥३ ॥

रामु साधु तुम्ह साधु सयाने । राममातु भलि सब पहिचाने ॥

जस कौसिलाँ मोर भल ताका । तस फलु उन्हहि देउँ करि साका ॥

राम साधु हैं, आप सयाने साधु हैं और रामकी माता भी भली हैं; मैंने सबको पहचान लिया है । कौसल्याने मेरा जैसा भला चाहा है, मैं भी साका करके ( याद रखनेयोग्य ) उन्हें वैसा ही फल दूँगी ॥ ४ ॥

दो० - होत प्रातु मुनिबेष धरि जौं न रामु बन जाहिं ।

मोर मरनु राउर अजस नृप समुझिअ मन माहिं ॥ ३३ ॥

सबेरा होते ही मुनिका वेष धारणकर यदि राम वनको नहीं जाते, तो हे राजन्! मनमें [ निश्चय ] समझ लीजिये कि मेरा मरना होगा और आपका अपयश! ॥ ३३ ॥

पृष्ठ 374

श्रीरामचरितमानस, पृष्ठ 374 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

* *३७२ रामचरितमानस अस कहि कुटिल भई उठि ठाढ़ी ॥ मानहुँ रोष तरंगिनि बाढ़ी ॥

पाप पहार प्रगट भइ सोई । भरी क्रोध जल जाइ न जोई ॥

ऐसा कहकर कुटिल कैकेयी उठ खड़ी हुई, मानो क्रोधकी नदी उमड़ी हो । वह नदी पापरूपी पहाड़से प्रकट हुई है और क्रोधरूपी जलसे भरी है; [ ऐसी भयानक है कि] देखी नहीं जाती! ॥ १ ॥

दोउ बर कूल कठिन हठ धारा । भवँर कूबरी बचन प्रचारा ॥

ढाहत भूपरूप तरु मूला । चली बिपति बारिधि अनुकूला ॥

दोनों वरदान उस नदीके दो किनारे हैं, कैकेयीका कठिन हठ ही उसकी [ तीव्र ] धारा है और कुबरी ( मन्थरा ) -के वचनोंकी प्रेरणा ही भँवर है । [ वह क्रोधरूपी नदी ] राजा दशरथरूपी वृक्षको जड़ मूलसे ढहाती हुई विपत्तिरूपी समुद्रकी ओर [ सीधी ] चली है ॥२ ॥

लखी नरेस बात फुरि साँची । तिय मिस मीचु सीस पर नाची ॥

गहि पद बिनय कीन्ह बैठारी । जनि दिनकर कुल होसि कुठारी ॥

राजाने समझ लिया कि बात सचमुच ( वास्तवमें ) सच्ची है, स्त्रीके बहाने मेरी मृत्यु ही सिरपर नाच रही है । [ तदनन्तर राजाने कैकेयीके ] चरण पकड़कर उसे बिठाकर विनती की कि तू सूर्यकुल- [रूपी वृक्ष ] के लिये कुल्हाड़ी मत बन ॥ ३ ॥

मागु माथ अबहीं देउँ तोही । राम बिरहँ जनि मारसि मोही ॥

राखु राम कहुँ जेहि तेहि भाँती । नाहिं त जरिहि जनम भरि छाती ॥

तू मेरा मस्तक माँग ले, मैं तुझे अभी दे दूँ । पर रामके विरहमें मुझे मत मार । जिस किसी

प्रकारसे हो तू रामको रख ले । नहीं तो जन्मभर तेरी छाती जलेगी ॥४ ॥

दो० – देखी ब्याधि असाध नृपु परेउ धरनि धुनि माथ ।

कहत परम आरत बचन राम राम रघुनाथ ॥ ३४ ॥

राजाने देखा कि रोग असाध्य है, तब वे अत्यन्त आर्तवाणीसे ' हा राम! हा राम! हा रघुनाथ! ' कहते हुए सिर पीटकर जमीनपर गिर पड़े ॥ ३४ ॥

ब्याकुल राउ सिथिल सब गाता । करिनि कलपतरु मनहुँ निपाता ॥

कंठु सूख मुख आव न बानी । जनु पाठीनु दीन बिनु पानी ॥

राजा व्याकुल हो गये, उनका सारा शरीर शिथिल पड़ गया, मानो हथिनीने कल्पवृक्षको उखाड़ फेंका हो । कण्ठ सूख गया, मुखसे बात नहीं निकलती, मानो पानीके बिना पहिना नामक मछली तड़प रही हो ॥१ ॥

पृष्ठ 375

श्रीरामचरितमानस, पृष्ठ 375 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

* * अयोध्याकाण्ड ३७३

पुनि कह कटु कठोर कैकेई । मनहुँ घाय महुँ माहुर देई ॥

जौं अंतहुँ अस करतबु रहेऊ । मागु मागु तुम्ह केहिं बल कहेऊ ॥

कैकेयी फिर कड़वे और कठोर वचन बोली, मानो घावमें जहर भर रही हो । [ कहती है— ] जो अन्तमें ऐसा ही करना था, तो आपने ' माँग, माँग ' किस बलपर कहा था ॥ २ ॥

दुइ कि होइ एक समय भुआला । हँसब ठठाइ फुलाउब गाला ॥

दानि कहाउब अरु कृपनाई । होइ कि खेम कुसल रौताई ॥

हे राजा! ठहाका मारकर हँसना और गाल फुलाना- क्या ये दोनों एक साथ हो सकते हैं? दानी भी कहाना और कंजूसी भी करना । क्या रजपूतीमें क्षेम- कुशल भी रह सकती है? ( लड़ाईमें बहादुरी भी दिखावें और कहीं चोट भी न लगे! ) ॥ ३ ॥

छाड़हु बचनु कि धीरजु धरहू । जनि अबला जिमि करुना करहू ॥

तनु तिय तनय धामु धनु धरनी । सत्यसंध कहुँ तृन सम बरनी ॥

या तो वचन ( प्रतिज्ञा ) ही छोड़ दीजिये या धैर्य धारण कीजिये । यों असहाय स्त्रीकी भाँति रोइये - पीटिये नहीं । सत्यव्रतीके लिये तो शरीर, स्त्री, पुत्र, घर, धन और पृथ्वी- सब तिनकेके बराबर कहे गये हैं ॥४ ॥

दो० – मरम बचन सुनि राउ कह कहु कछु दोषु न तोर ।

लागेउ तोहि पिसाच जिमि कालु कहावत मोर ॥ ३५ ॥

कैकेयीके मर्मभेदी वचन सुनकर राजाने कहा कि तू जो चाहे कह, तेरा कुछ भी दोष नहीं है । मेरा काल तुझे मानो पिशाच होकर लग गया है, वही तुझसे यह सब कहला रहा है ॥३५ ॥

चहत न भरत भूपतहि भोरें । बिधि बस कुमति बसीजिय तोरें ॥

सो सबु मोर पाप परिनामू । भयउ कुठाहर जेहिं बिधि बामू॥

भरत तो भूलकर भी राजपद नहीं चाहते । होनहारवश तेरे ही जीमें कुमति आ बसी । यह सब मेरे पापोंका परिणाम है, जिससे कुसमयमें ( बेमौके ) विधाता विपरीत हो गया ॥ १ ॥

सुबस बसिहि फिरि अवध सुहाई । सब गुन धाम राम प्रभुताई ॥

करिहहिं भाइ सकल सेवकाई । होइहि तिहुँ पुर राम बड़ाई ॥

[ तेरी उजाड़ी हुई ] यह सुन्दर अयोध्या फिर भलीभाँति बसेगी और समस्त गुणोंके धाम श्रीरामकी प्रभुता भी होगी । सब भाई उनकी सेवा करेंगे और तीनों लोकोंमें श्रीरामकी बड़ाई होगी ॥२ ॥

तोर कलंकु मोर पछिताऊ । मुएहुँ न मिटिहि न जाइहि काऊ ॥

अब तोहि नीक लाग करु सोई । लोचन ओट बैठु मुहु गोई ॥

पृष्ठ 376

श्रीरामचरितमानस, पृष्ठ 376 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

* *३७४ रामचरितमानस केवल तेरा कलंक और मेरा पछतावा मरनेपर भी नहीं मिटेगा, यह किसी तरह नहीं जायगा । अब तुझे जो अच्छा लगे वही कर । मुँह छिपाकर मेरी आँखोंकी ओट जा बैठ ( अर्थात् मेरे सामनेसे हट जा, मुझे मुँह न दिखा ) ॥ ३ ॥

जब लगि जिऔं कहउँ कर जोरी । तब लगि जनि कछु कहसि बहोरी ॥

फिरि पछितैहसि अंत अभागी । मारसि गाइ नहारू लागी ॥

मैं हाथ जोड़कर कहता हूँ कि जबतक मैं जीता रहूँ, तबतक फिर कुछ न कहना ( अर्थात् मुझसे न बोलना) । अरी अभागिनी! फिर तू अन्तमें पछतायेगी जो तू नहारू ( ताँत ) के लिये गायको मार रही है ॥४ ॥

-परेड राउ कहि कोटि बिधि काहे करसि निदानु ।

-0कपट सयानि न कहति कछु जागति मनहुँ मसानु ॥ ३६ ॥

राजा करोड़ों प्रकारसे ( बहुत तरहसे ) समझाकर [ और यह कहकर ] कि तू क्यों सर्वनाश कर रही है, पृथ्वीपर गिर पड़े । पर कपट करनेमें चतुर कैकेयी कुछ बोलती नहीं, मानो [ मौन होकर ] मसान जगा रही हो ( श्मशानमें बैठकर प्रेतमन्त्र सिद्ध कर रही हो) ॥ ३६ ॥

राम राम रट बिकल भुआलू I। जनु बिनु पंख बिहंग बेहालू ॥

हृदयँ मनाव भोरु जनि होई । रामहि जाइ कहै जनि कोई ॥

राजा ‘ राम - राम ' रट रहे हैं और ऐसे व्याकुल हैं, जैसे कोई पक्षी पंखके बिना बेहाल हो । वे अपने हृदयमें मनाते हैं कि सबेरा न हो, और कोई जाकर श्रीरामचन्द्रजीसे यह बात न कहे ॥ १ ॥

उदउ करहु जनि रबि रघुकुल गुर । अवध बिलोकि सूल होइहि उर ॥

भूप प्रीति कैकई कठिनाई । उभय अवधि बिधि रची बनाई ॥

हे रघुकुलके गुरु ( बड़ेरे मूलपुरुष ) सूर्यभगवान्! आप अपना उदय न करें । अयोध्याको [ बेहाल ] देखकर आपके हृदयमें बड़ी पीड़ा होगी । राजाकी प्रीति और कैकेयीकी निष्ठुरता दोनोंको ब्रह्माने सीमातक रचकर बनाया है ( अर्थात् राजा प्रेमकी सीमा हैं और कैकेयी निष्ठुरताकी ) ॥ २ ॥

बिलपत नृपहि भयउ भिनुसारा । बीना बेनु संख धुनि द्वारा ॥

पढ़हिं भाट गुन गावहिं गायक । सुनत नृपहि जनु लागहिं सायक ॥

विलाप करते - करते ही राजाको सबेरा हो गया । राजद्वारपर वीणा, बाँसुरी और शंखकी ध्वनि होने लगी । भाटलोग विरुदावली पढ़ रहे हैं और गवैये गुणोंका गान कर रहे हैं । सुननेपर राजाको वे बाण -जैसे लगते हैं ॥३ ॥

पृष्ठ 377

श्रीरामचरितमानस, पृष्ठ 377 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

* * अयोध्याकाण्ड ३७५

मंगल सकल सोहाहिं न कैसें । सहगामिनिहि बिभूषनबिभूषन जैसें ॥

तेहि निसि नीद परी नहिं काहू। राम दरसदरस लालसा उछाहू ॥

राजाको ये सब मङ्गल- साज कैसे नहीं सुहा रहे हैं, जैसे पतिके साथ सती होनेवाली स्त्रीको आभूषण! श्रीरामचन्द्रजीके दर्शनकी लालसा और उत्साहके कारण उस रात्रिमें किसीको भी नींद नहीं आयी ॥४ ॥

दो० - द्वार भीर सेवक सचिव कहहिं उदित रबि देखि ।

जागेउ अजहुँ न अवधपति कारनु कवनु बिसेषि ॥ ३७ ॥

राजद्वारपर मन्त्रियों और सेवकोंकी भीड़ लगी है । वे सब सूर्यको उदय हुआ देखकर कहते हैं कि ऐसा कौन -सा विशेष कारण है कि अवधपति दशरथजी अभीतक नहीं जागे? ॥ ३७ ॥

पछिले पहर भूपु नित जागा । आजु हमहि बड़ अचरजु लागा ॥

जाहु सुमंत्र जगावहु जाई । कीजिअ काजु रजायसु पाई ॥

राजा नित्य ही रातके पिछले पहर जाग जाया करते हैं, किन्तु आज हमें बड़ा आश्चर्य हो रहा

है ॥ हे सुमन्त्र! जाओ, जाकर राजाको जगाओ । उनकी आज्ञा पाकर हम सब काम करें ॥१ ॥

गए सुमंत्र तब राउर माहीं । देखि भयावन जात डेराहीं ॥

धाइ खाइ जनु जाइ न हेरा । मानहुँ बिपति बिषाद बसेरा ॥

तब सुमन्त्र रावले ( राजमहल) में गये, पर महलको भयानक देखकर वे जाते हुए डर रहे हैं । [ ऐसा लगता है ] मानो दौड़कर काट खायेगा, उसकी ओर देखा भी नहीं जाता । मानो विपत्ति और विषादने वहाँ डेरा डाल रखा हो ॥ २ ॥

पूछें कोउ न ऊतरु देई । गए जेहिं भवन भूप कैकेई ॥

कहि जयजीव बैठ सिरु नाई । देखि भूप गति गयउ सुखाई ॥

पूछनेपर कोई जवाब नहीं देता; वे उस महलमें गये, जहाँ राजा और कैकेयी थे । ' जय- जीव ' कहकर सिर नवाकर ( वन्दना करके ) बैठे और राजाकी दशा देखकर तो वे सूख ही गये ॥ ३ ॥

सोच बिकल बिबरन महि परेऊ । मानहुँ कमल मूलु परिहरेऊ ॥

सचिउ सभीत सकइ नहिं पूँछी । बोली असुभ भरी सुभ छूछी ॥

[ देखा कि— ] राजा सोचसे व्याकुल हैं, चेहरेका रंग उड़ गया है । जमीनपर ऐसे पड़े हैं, मानो कमल जड़ छोड़कर ( जड़से उखड़कर ) [ मुर्झाया ] पड़ा हो । मन्त्री मारे डरके कुछ पूछ नहीं सकते । तब अशुभसे भरी हुई और शुभसे विहीन कैकेयी बोली—॥४ ॥

पृष्ठ 378

श्रीरामचरितमानस, पृष्ठ 378 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

* *३७६ रामचरितमानस

दो००– परी न राजहि नीद निसि हेतु जान जगदीसु ।

रामु रामु रटि भोरु किय कहइ न मरमु महीसु ॥ ३८ ॥

राजाको रातभर नींद नहीं आयी, इसका कारण जगदीश्वर ही जानें । इन्होंने ' राम-राम ' रटकर सबेरा कर दिया, परन्तु इसका भेद राजा कुछ भी नहीं बतलाते ॥ ३८ ॥

आनहु रामहि बेगि बोलाई । समाचार तब पूँछेहु आई ॥

चलेउ सुमंत्रु राय रुख जानी । लखी कुचालि कीन्हि कछु रानी ॥

तुम जल्दी रामको बुला लाओ । तब आकर समाचार पूछना । राजाका रुख जानकर सुमन्त्रजी चले, समझ गये कि रानीने कुछ कुचाल की है ॥१ ॥

सोच बिकल मग परइ न पाऊ । रामहि बोलि कहिहि का राऊ ॥

उर धरि धीरजु गयउ दुआरें । पूँछहिं सकल देखि मनु मारें ॥

सुमन्त्र सोचसे व्याकुल हैं, रास्तेपर पैर नहीं पड़ता ( आगे बढ़ा नहीं जाता ), [ सोचते हैं— ] रामजीको बुलाकर राजा क्या कहेंगे? किसी तरह हृदयमें धीरज धरकर वे द्वारपर गये । सब लोग उनको मनमारे ( उदास ) देखकर पूछने लगे ॥२ ॥

समाधानु करि सो सबही का । गयउ जहाँ दिनकर कुल टीका ॥

राम सुमंत्रहि आवत देखा । आदरु कीन्ह पिता सम लेखा ॥

सब लोगोंका समाधान करके ( किसी तरह समझा-बुझाकर ) सुमन्त्र वहाँ गये, जहाँ सूर्यकुलके तिलक श्रीरामचन्द्रजी थे । श्रीरामचन्द्रजीने सुमन्त्रको आते देखा तो पिताके समान समझकर उनका आदर किया ॥ ३ ॥

निरखि बदनु कहि भूप रजाई । रघुकुलदीपहि चलेउ लेवाई ॥

रामु कुभाँति सचिव सँग जाहीं । देखि लोग जहँ तहँ बिलखाहीं ॥

श्रीरामचन्द्रजीके मुखको देखकर और राजाकी आज्ञा सुनाकर वे रघुकुलके दीपक श्रीरामचन्द्रजीको [ अपने साथ ] लिवा चले । श्रीरामचन्द्रजी मन्त्रीके साथ बुरी तरहसे ( बिना किसी लवाजमेके ) जा रहे हैं, यह देखकर लोग जहाँ -तहाँ विषाद कर रहे हैं ॥४ ॥

दो० - जाइ दीख रघुबंसमनि नरपति निपट कुसाजु ।

सहमि परेउ लखि सिंघिनिहि मनहुँ बृद्ध गजराजु ॥ ३ ९ ॥

रघुवंशमणि श्रीरामचन्द्रजीने जाकर देखा कि राजा अत्यन्त ही बुरी हालतमें पड़े हैं, मानो सिंहनीको देखकर कोई बूढ़ा गजराज सहमकर गिर पड़ा हो ॥ ३ ९ ॥

पृष्ठ 379

श्रीरामचरितमानस, पृष्ठ 379 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

* ** अयोध्याकाण्ड ३७७ सूखहिं अधर जरइ सबु अंगू ॥ मनहुँ दीन मनिहीन भुअंगू॥

सरुष समीप दीखि कैकेई । मानहुँ मीचु घरीं गनि लेई ॥

राजाके ओठ सूख रहे हैं और सारा शरीर जल रहा है, मानो मणिके बिना साँप दुःखी हो रहा हो । पास ही क्रोधसे भरी कैकेयीको देखा, मानो [साक्षात्] मृत्यु ही बैठी [ राजाके जीवनकी अन्तिम ] घड़ियाँ गिन रही हो ॥१ ॥

करुनामय मृदु राम सुभाऊ । प्रथम दीख दुखु सुना न काऊ ॥

तदपि धीर धरि समउ बिचारी । पूँछी मधुर बचन महतारी ॥

श्रीरामचन्द्रजीका स्वभाव कोमल और करुणामय है । उन्होंने [ अपने जीवनमें ] पहली बार यह दुःख देखा; इससे पहले कभी उन्होंने दुःख सुना भी न था । तो भी समयका विचार करके हृदयमें धीरज धरकर उन्होंने मीठे वचनोंसे माता कैकेयीसे पूछा- ॥२ ॥

मोहि कहु मातु तात दुख कारन । करिअ जतन जेहिं होइ निवारन ॥

सुनहु राम सबु कारनु एहू । राजहि तुम्ह पर बहुत सनेहू ॥

हे माता! मुझे पिताजीके दुःखका कारण कहो ताकि जिससे उसका निवारण हो ( दुःख दूर हो ) वह यत्न किया जाय । [ कैकेयीने कहा- ] हे राम! सुनो, सारा कारण यही है कि राजाका तुमपर बहुत स्नेह है ॥३ ॥

देन कहेन्हि मोहि दुइ बरदाना । मागेउँ जो कछु मोहि सोहाना ॥

सो सुनि भयउ भूप उर सोचू । छाड़ि न सकहिं तुम्हार सँकोचू॥

इन्होंने मुझे दो वरदान देनेको कहा था । मुझे जो कुछ अच्छा लगा, वही मैंने माँगा । उसे सुनकर राजाके हृदयमें सोच हो गया; क्योंकि ये तुम्हारा संकोच नहीं छोड़ सकते ॥४ ॥

दो०.- सुत सनेहु इत बचनु उत संकट परेउ नरेसु ।

सकहु त आयसु धरहु सिर मेटहु कठिन कलेसु ॥ ४० ॥

इधर तो पुत्रका स्नेह है और उधर वचन ( प्रतिज्ञा); राजा इसी धर्मसंकटमें पड़ गये हैं । यदि तुम कर सकते हो, तो राजाकी आज्ञा शिरोधार्य करो और इनके कठिन क्लेशको मिटाओ ॥ ४० ॥

निधरक बैठि कहइ कटु बानी । सुनत कठिनता अति अकुलानी ॥

जीभ कमान बचन सर नाना । मनहुँ महिप मृदु लच्छ समाना ॥

कैकेयी बेधड़क बैठी ऐसी कड़वी वाणी कह रही है जिसे सुनकर स्वयं कठोरता भी अत्यन्त व्याकुल हो उठी । जीभ धनुष है, वचन बहुत से तीर हैं और मानो राजा ही कोमल निशानेके समान हैं ॥१ ॥

पृष्ठ 380

श्रीरामचरितमानस, पृष्ठ 380 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

* *३७८ रामचरितमानस

सिखइ धनुषबिद्या बर बीरू ॥जनु कठोरपनु धरें सरीरू ।

सबु प्रसंगु रघुपतिहि सुनाई । बैठि मनहुँ तनु धरि निठुराई ॥

[ इस सारे साज-सामानके साथ ] मानो स्वयं कठोरपन श्रेष्ठ वीरका शरीर धारण करके धनुषविद्या सीख रहा है । श्रीरघुनाथजीको सब हाल सुनाकर वह ऐसे बैठी है, मानो निष्ठुरता ही शरीर धारण किये हुए हो ॥२ ॥

मन मुसुकाइ भानुकुल भानू । रामु सहज आनंद निधानू ॥

बोले बचन बिगत सब दूषन । मृदु मंजुल जनु बाग बिभूषन ॥

सूर्यकुलके सूर्य, स्वाभाविक ही आनन्दनिधान श्रीरामचन्द्रजी मनमें मुसकराकर सब दूषणोंसे रहित ऐसे कोमल और सुन्दर वचन बोले जो मानो वाणीके भूषण ही थे —॥३ ॥

सुनु जननी सोइ सुतु बड़भागी । जो पितु मातु बचन अनुरागी ॥

तनय मातु पितु तोषनिहारा । दुर्लभ जननि सकल संसारा ॥

हे माता! सुनो, वही पुत्र बड़भागी है, जो पिता- माताके वचनोंका अनुरागी ( पालन करनेवाला ) है । आज्ञा-पालनके द्वारा ] माता- पिताको सन्तुष्ट करनेवाला पुत्र, हे जननी! सारे संसारमें दुर्लभ है ॥४ ॥

दो० - मुनिगन मिलनु बिसेषि बन सबहि भाँति हित मोर ।

तेहि महँ पितु आयसु बहुरि संमत जननी तोर ॥४१ ॥

वनमें विशेषरूपसे मुनियोंका मिलाप होगा, जिसमें मेरा सभी प्रकारसे कल्याण है । उसमें भी, फिर पिताजीकी आज्ञा और हे जननी! तुम्हारी सम्मति है ॥ ४१ ॥

भरतु प्रानप्रिय पावहिं राजू । बिधि सब बिधि मोहि सनमुख आजू ॥

जौं न जाउँ बन ऐसेहु काजा । प्रथम गनिअ मोहि मूढ़ समाजा ॥

और प्राणप्रिय भरत राज्य पावेंगे । [ इन सभी बातोंको देखकर यह प्रतीत होता है कि ] आज विधाता सब प्रकारसे मुझे सम्मुख हैं ( मेरे अनुकूल हैं ) । यदि ऐसे कामके लिये भी मैं वनको न जाऊँ तो मूर्खोके समाजमें सबसे पहले मेरी गिनती करनी चाहिये ॥१ ॥

सेवहिं अरँडु कलपतरु त्यागी । परिहरि अमृत लेहिं बिषु मागी ॥

तेउ न पाइ अस समउ चुकाहीं । देखु बिचारि मातु मन माहीं ॥

जो कल्पवृक्षको छोड़कर रेंड़की सेवा करते हैं और अमृत त्यागकर विष माँग लेते हैं, हे माता! तुम मनमें विचारकर देखो, वे ( महामूर्ख ) भी ऐसा मौका पाकर कभी न चूकेंगे ॥२ ॥

अंब एक दुखु मोहि बिसेषी । निपट बिकल नरनायकु देखी ॥

थोरिहिं बात पितहि दुख भारी । होति प्रतीति न मोहि महतारी ॥