श्रीरामचरितमानस — पृष्ठ 381–390
श्रीरामचरितमानस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 381–390
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* ** अयोध्याकाण्ड ३७९ हे माता! मुझे एक ही दुःख विशेषरूपसे हो रहा है, वह महाराजको अत्यन्त व्याकुल देखकर । इस थोड़ी - सी बातके लिये ही पिताजीको इतना भारी दुःख हो, हे माता! मुझे इस बातपर विश्वास नहीं होता ॥ ३ ॥
राउ धीर गुन उदधि अगाधू । भा मोहि तें कछु बड़ अपराधू॥
जातें मोहि न कहत कछु राऊ । मोरि सपथ तोहि कहु सति भाऊ ॥
क्योंकि महाराज तो बड़े ही धीर और गुणोंके अथाह समुद्र हैं । अवश्य ही मुझसे कोई बड़ा अपराध हो गया है, जिसके कारण महाराज मुझसे कुछ नहीं कहते । तुम्हें मेरी सौगन्ध है, माता! तुम सच-सच कहो ॥ ४ ॥
दो० – सहज सरल रघुबर बचन कुमति कुटिल करि जान ।
चलइ जोंक जल बक्रगति जद्यपि सलिलु समान ॥ ४२ ॥
रघुकुलमें श्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजीके स्वभावसे ही सीधे वचनोंको दुर्बुद्धि कैकेयी टेढ़ा ही करके जान रही है; जैसे यद्यपि जल समान ही होता है, परन्तु जोंक उसमें टेढ़ी चालसे ही चलती है ॥ ४२ ॥
रहसी रानि राम रुख पाई । बोली कपट सनेहु जनाई ॥
सपथ तुम्हार भरत कै आना । हेतु न दूसर मैं कछु जाना ॥
रानी कैकेयी श्रीरामचन्द्रजीका रुख पाकर हर्षित हो गयी और कपटपूर्ण स्नेह दिखाकर बोली- तुम्हारी शपथ और भरतकी सौगन्ध है, मुझे राजाके दुःखका दूसरा कुछ भी कारण विदित नहीं है ॥१ ॥
तुम्ह अपराध जोगु नहिं ताता । जननी जनक बंधु सुखदाता ॥
राम सत्य सबु जो कछु कहहू । तुम्ह पितु मातु बचन रत अहहू ॥
हे तात! तुम अपराधके योग्य नहीं हो ( तुमसे माता-पिताका अपराध बन पड़े, यह सम्भव नहीं ) । तुम तो माता - पिता और भाइयोंको सुख देनेवाले हो । हे राम! तुम जो कुछ कह रहे हो, सब सत्य है । तुम पिता-माताके वचनों [ के पालन ] में तत्पर हो ॥२ ॥
पितहि बुझाइ कहहु बलि सोई । चौथेंपन जेहिं अजसु न होई ॥
तुम्ह सम सुअन सुकृत जेहिं दीन्हे । उचित न तासु निरादरु कीन्हे ॥
मैं तुम्हारी बलिहारी जाती हूँ, तुम पिताको समझाकर वही बात कहो जिससे चौथेपन ( बुढ़ापे ) में इनका अपयश न हो । जिस पुण्यने इनको तुम-जैसे पुत्र दिये हैं उसका निरादर करना उचित नहीं ॥ ३ ॥
लागहिं कुमुख बचन सुभ कैसे । मगहँ गयादिक तीरथ जैसे ॥
रामहि मातु बचन सब भाए । जिमि सुरसरि गत सलिल सुहाए ॥
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* *३८० रामचरितमानस कैकेयीके बुरे मुखमें ये शुभ वचन कैसे लगते हैं जैसे मगध देशमें गया आदिक तीर्थ! श्रीरामचन्द्रजीको माता कैकेयीके सब वचन ऐसे अच्छे लगे जैसे गङ्गाजीमें जाकर [ अच्छे - बुरे सभी प्रकारके ] जल शुभ, सुन्दर हो जाते हैं ॥४ ॥
दो० –- गइ मुरुछा रामहि सुमिरि नृप फिरि करवट लीन्ह ।
सचिव राम आगमन कहि बिनय समय सम कीन्ह ॥ ४३ ॥
इतनेमें राजाकी मूर्च्छा दूर हुई, उन्होंने रामका स्मरण करके (' राम-राम! ' कहकर ) फिरकर करवट ली । मन्त्रीने श्रीरामचन्द्रजीका आना कहकर समयानुकूल विनती की ॥४३ ॥
अवनिप अकनि रामु पगु धारे । धरि धीरजु तब नयन उघारे ॥
सचिवँ सँभारि राउ बैठारे । चरन परत नृप रामु निहारे ॥
जब राजाने सुना कि श्रीरामचन्द्र पधारे हैं तो उन्होंने धीरज धरके नेत्र खोले । मन्त्रीने सँभालकर राजाको बैठाया । राजाने श्रीरामचन्द्रजीको अपने चरणोंमें पड़ते ( प्रणाम करते ) देखा ॥१ ॥
लिए सनेह बिकल उर लाई । गै मनि मनहुँ फनिक फिरि पाई ॥
चला बिलोचन बारि प्रबाहू ॥रामहि चितइ रहेउ नरनाहू । स्नेहसे विकल राजाने रामजीको हृदयसे लगा लिया । मानो साँपने अपनी खोयी हुई मणि फिर पा ली हो । राजा दशरथजी श्रीरामजीको देखते ही रह गये । उनके नेत्रोंसे आँसुओंकी धारा बह चली ॥ २ ॥
सोक बिबस कछु कहै न पारा । हृदयँ लगावत बारहि बारा ॥
बिधिहि मनाव राउ मन माहीं । जेहिं रघुनाथ न कानन जाहीं ॥
शोकके विशेष वश होनेके कारण राजा कुछ कह नहीं सकते । वे बार - बार श्रीरामचन्द्रजीको हृदयसे लगाते हैं और मनमें ब्रह्माजीको मनाते हैं कि जिससे श्रीरघुनाथजी वनको न जायँ॥३ ॥
सुमिरि महेसहि कहइ निहोरी । बिनती सुनहु सदासिव मोरी ॥
आसुतोष तुम्ह अवढर दानी । आरति हरहु दीन जनु जानी ॥
फिर महादेवजीका स्मरण करके उनसे निहोरा करते हुए कहते हैं - हे सदाशिव! आप मेरी विनती सुनिये । आप आशुतोष ( शीघ्र प्रसन्न होनेवाले ) और अवढरदानी ( मुँहमाँगा दे डालनेवाले ) हैं । अतः मुझे अपना दीन सेवक जानकर मेरे दुःखको दूर कीजिये ॥४ ॥
दो० – तुम्ह प्रेरक सब के हृदयँ सो मति रामहि देहु ।
बचनु मोर तजि रहहिं घर परिहरि सीलु सनेहु ॥ ४४ ॥
आप प्रेरकरूपसे सबके हृदयमें हैं । आप श्रीरामचन्द्रको ऐसी बुद्धि दीजिये जिससे वे मेरे वचनको त्यागकर और शील- स्नेहको छोड़कर घरहीमें रह जायँ ॥ ४४ ॥
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* ** अयोध्याकाण्ड ३८१
अजसु होउ जग सुजसु नसाऊ । नरक परौं बरु सुरपुरु जाऊ ॥
सब दुख दुसह सहावहु मोही । लोचन ओट रामु जनि होंही ॥
जगत्में चाहे अपयश हो और सुयश नष्ट हो जाय । चाहे [नया पाप होनेसे ] मैं नरकमें गिरूँ, अथवा स्वर्ग चला जाय ( पूर्व पुण्योंके फलस्वरूप मिलनेवाला स्वर्ग चाहे मुझे न मिले ) । और भी सब प्रकारके दुःसह दुःख आप मुझसे सहन करा लें । पर श्रीरामचन्द्र मेरी आँखोंकी ओट न हों ॥१ ॥
अस मन गुनइ राउ नहिं बोला । पीपर पात सरिस मनु डोला ॥
रघुपति पितहि प्रेमबस जानी । पुनि कछु कहिहि मातु अनुमानी ॥
राजा मन-ही- मन इस प्रकार विचार कर रहे हैं, बोलते नहीं । उनका मन पीपलके पत्तेकी तरह डोल रहा है । श्रीरघुनाथजीने पिताको प्रेमके वश जानकर और यह अनुमान करके कि माता फिर कुछ कहेगी [तो पिताजीको दुःख होगा ] - ॥२ ॥
देस काल अवसर अनुसारी । बोले बचन बिनीत बिचारी ॥
तात कहउँ कछु करउँ ढिठाई । अनुचितु छमब जानि लरिकाई ॥
देश, काल और अवसरके अनुकूल विचारकर विनीत वचन कहे - हे तात! मैं कुछ कहता हूँ, यह ढिठाई करता हूँ । इस अनौचित्यको मेरी बाल्यावस्था समझकर क्षमा कीजियेगा ॥३ ॥
अति लघु बात लागि दुखु पावा । काहुँ न मोहि कहि प्रथम जनावा ॥
देखि गोसाइँहि पूँछिउँ माता । सुनि प्रसंगु भए सीतल गाता ॥
इस अत्यन्त तुच्छ बातके लिये आपने इतना दुःख पाया । मुझे किसीने पहले कहकर यह बात नहीं जनायी । स्वामी ( आप ) को इस दशामें देखकर मैंने मातासे पूछा । उनसे सारा प्रसंग सुनकर मेरे सब अंग शीतल हो गये ( मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई) ॥४ ॥
दो० – मंगल समय सनेह बस सोच परिहरिअ तात ।
आयसु देइअ हरषि हियँ कहि पुलके प्रभु गात ॥ ४५ ॥
हे पिताजी! इस मङ्गलके समय स्नेहवश होकर सोच करना छोड़ दीजिये और हृदयमें प्रसन्न होकर मुझे आज्ञा दीजिये । यह कहते हुए प्रभु श्रीरामचन्द्रजी सर्वाङ्ग पुलकित हो गये ॥ ४५ ॥
धन्य जनमु जगतीतल तासू । पितहि प्रमोदु चरित सुनि जासू॥
चारि पदारथ करतल ताकें । प्रिय पितु मातु प्रान सम जाकें ॥
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* *३८२ रामचरितमानस [ उन्होंने फिर कहा— ] इस पृथ्वीतलपर उसका जन्म धन्य है जिसके चरित्र सुनकर पिताको परम आनन्द हो । जिसको माता- पिता प्राणोंके समान प्रिय हैं, चारों पदार्थ ( अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष) उसके करतलगत ( मुट्ठीमें ) रहते हैं ॥१ ॥
आयसु पालि जनम फलु पाई । ऐहउँ बेगिहिं होउ रजाई ॥
बिदा मातु सन आवउँ मागी । चलिहउँ बनहि बहुरि पग लागी ॥
आपकी आज्ञा पालन करके और जन्मका फल पाकर मैं जल्दी ही लौट आऊँगा, अतः कृपया आज्ञा दीजिये । मातासे विदा माँग आता हूँ । फिर आपके पैर लगकर ( प्रणाम करके ) वनको चलूँगा ॥२ ॥
अस कहि राम गवनु तब कीन्हा । भूप सोक बस उतरु न दीन्हा ॥
नगर ब्यापि गइ बात सुतीछी । छुअत चढ़ी जनु सब तन बीछी ॥
ऐसा कहकर तब श्रीरामचन्द्रजी वहाँसे चल दिये । राजाने शोकवश कोई उत्तर नहीं दिया । वह बहुत ही तीखी ( अप्रिय) बात नगरभरमें इतनी जल्दी फैल गयी मानो डंक मारते ही बिच्छूका विष सारे शरीरमें चढ़ गया हो ॥३ ॥
सुनि भए बिकल सकल नर नारी । बेलि बिटप जिमि देखि दवारी ॥
जो जहँ सुनइ धुनइ सिरु सोई । बड़ बिषादु नहिं धीरजु होई ॥
इस बातको सुनकर सब स्त्री- पुरुष ऐसे व्याकुल हो गये जैसे दावानल ( वनमें आग लगी ) देखकर बेल और वृक्ष मुरझा जाते हैं । जो जहाँ सुनता है वह वहीं सिर धुनने ( पीटने ) लगता है! बड़ा विषाद है, किसीको धीरज नहीं बँधता ॥४ ॥
दो० - मुख सुखाहिं लोचन स्त्रवहिं सोकु न हृदयँ समाइ ।
मनहुँ करुन रस कटकई उतरी अवध बजाइ ॥ ४६ ॥
सबके मुख सूखे जाते हैं, आँखोंसे आँसू बहते हैं, शोक हृदयमें नहीं समाता । मानो करुणारसकी सेना अवधपर डंका बजाकर उतर आयी हो ॥४६ ॥
मिलेहि माझ बिधि बात बेगारी । जहँ तहँ देहिं कैकइहि गारी ॥
एहि पापिनिहि बूझि का परेऊ । छाइ भवन पर पावकु धरेऊ ॥
सब मेल मिल गये थे ( सब संयोग ठीक हो गये थे ), इतनेमें ही विधाताने बात बिगाड़ दी! जहाँ- तहाँ लोग कैकेयीको गाली दे रहे हैं! इस पापिनको क्या सूझ पड़ा जो इसने छाये घरपर आग रख दी ॥ १ ॥
निज कर नयन काढ़ि चह दीखा । डारि सुधा बिषु चाहत चीखा ॥
कुटिल कठोर कुबुद्धि अभागी । भइ रघुबंस बेनु बन आगी ॥
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* ** अयोध्याकाण्ड ३८३ यह अपने हाथसे अपनी आँखोंको निकालकर ( आँखोंके बिना ही ) देखना चाहती है, और अमृत फेंककर विष चखना चाहती है! यह कुटिल, कठोर, दुर्बुद्धि और अभागिनी कैकेयी रघुवंशरूपी बाँसके वनके लिये अग्नि हो गयी! ॥२ ॥
पालव बैठि पेड़ एहिं काटा । सुख महुँ सोक ठाटु धरि ठाटा ॥
सदा रामु एहि प्रान समाना । कारन कवन कुटिलपनु ठाना ॥
पत्तेपर बैठकर इसने पेड़को काट डाला । सुखमें शोकका ठाट ठटकर रख दिया! श्रीरामचन्द्रजी इसे सदा प्राणोंके समान प्रिय थे । फिर भी न जाने किस कारण इसने यह कुटिलता ठानी ॥ ३ ॥
सत्य कहहिं कबि नारि सुभाऊ । सब बिधि अगहु अगाध दुराऊ ॥
निज प्रतिबिंबु बरुकु गहि जाई । जानि न जाइ नारि गति भाई ॥
कवि सत्य ही कहते हैं कि स्त्रीका स्वभाव सब प्रकारसे पकड़में न आने योग्य अथाह और भेदभरा होता है । अपनी परछाहीं भले ही पकड़ जाय, पर भाई! स्त्रियों की गति ( चाल ) नहीं जानी जाती ॥४ ॥
दो० – काह न पावकु जारि सक का न समुद्र समाइ ।
का न करै अबला प्रबल केहि जग कालु न खाइ ॥ ४७ ॥
आग क्या नहीं जला सकती! समुद्रमें क्या नहीं समा सकता! अबला कहानेवाली प्रबल स्त्री [ जाति] क्या नहीं कर सकती! और जगत्में काल किसको नहीं खाता! ॥४७ ॥
का सुनाइ बिधि काह सुनावा । का देखाइ चह काह देखावा ॥
एक कहहिं भल भूप न कीन्हा । बरु बिचारि नहिं कुमतिहि दीन्हा ॥
विधाताने क्या सुनाकर क्या सुना दिया और क्या दिखाकर अब वह क्या दिखाना चाहता है! एक कहते हैं कि राजाने अच्छा नहीं किया, दुर्बुद्धि कैकेयीको विचारकर वर नहीं दिया, ॥ १ ॥
जो हठि भयउ सकल दुख भाजनु । अबला बिबस ग्यानु गुनु गा जनु ॥
एक धरम परमिति पहिचाने । नृपहि दोसु नहिं देहिं सयाने ॥
जो हठ करके ( कैकेयीकी बातको पूरा करनेमें अड़े रहकर ) स्वयं सब दुःखोंके पात्र हो गये । स्त्रीके विशेष वश होनेके कारण मानो उसका ज्ञान और गुण जाता रहा । एक ( दूसरे ) जो धर्मकी मर्यादाको जानते हैं और सयाने हैं, वे राजाको दोष नहीं देते ॥ २ ॥
सिबि दधीचि हरिचंद कहानी । एक एक सन कहहिं बखानी ॥
एक भरत कर संमत कहहीं । एक उदास भायँ सुनि रहहीं ॥
वे शिबि, दधीचि और हरिश्चन्द्रकी कथा एक दूसरेसे बखानकर कहते हैं । कोई एक इसमें भरतजीकी सम्मति बताते हैं । कोई एक सुनकर उदासीनभावसे रह जाते हैं ( कुछ बोलते नहीं ) ॥ ३ ॥
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* *३८४ रामचरितमानस
कान मूदि कर रद गहि जीहा । एक कहहिं यह बात अलीहा ॥
सुकृत जाहिं अस कहत तुम्हारे । रामु भरत कहुँ प्रानपिआरे ॥
कोई हाथोंसे कान मूँदकर और जीभको दाँतोंतले दबाकर कहते हैं कि यह बात झूठ है, ऐसी बात कहनेसे तुम्हारे पुण्य नष्ट हो जायँगे । भरतजीको तो श्रीरामचन्द्रजी प्राणोंके समान प्यारे हैं ॥ ४ ॥
दो० - चंदु चवै बरु अनल कन सुधा होइ बिषतूल ।
सपनेहुँ कबहुँ न करहिं किछु भरतु राम प्रतिकूल ॥ ४८ ॥
चन्द्रमा चाहे [ शीतल किरणोंकी जगह ] आगकी चिनगारियाँ बरसाने लगे और अमृत चाहे विषके समान हो जाय, परन्तु भरतजी स्वप्नमें भी कभी श्रीरामचन्द्रजीके विरुद्ध कुछ नहीं करेंगे ॥ ४८ ॥
एक बिधातहि दूषनु देहीं । सुधा देखाइ दीन्ह बिषु जेहीं ॥
खरभरु नगर सोचु सब काहू । दुसह दाहु उर मिटा उछाहू ॥
कोई एक विधाताको दोष देते हैं, जिसने अमृत दिखाकर विष दे दिया । नगरभरमें खलबली मच गयी, सब किसीको सोच हो गया । हृदयमें दुःसह जलन हो गयी, आनन्द- उत्साह मिट गया ॥ १ ॥
बिप्रबधू कुलमान्य जठेरी । जे प्रिय परम कैकई केरी ॥
लगीं देन सिख सीलु सराही । बचन बानसम लागहिं ताही ॥
ब्राह्मणोंकी स्त्रियाँ, कुलकी माननीय बड़ी -बूढ़ी और जो कैकेयीकी परम प्रिय थीं, वे उसके शीलकी सराहना करके उसे सीख देने लगीं । पर उसको उनके वचन बाणके समान लगते हैं ॥२ ॥
भरतु न मोहि प्रिय राम समाना । सदा कहहु यहु सबु जग जाना ॥
करहु राम पर सहज सनेहू । केहिं अपराध आजु बनु देहू॥
[ वे कहती हैं— ] तुम तो सदा कहा करती थीं कि श्रीरामचन्द्रके समान मुझको भरत भी प्यारे नहीं हैं; इस बातको सारा जगत् जानता है । श्रीरामचन्द्रजीपर तो तुम स्वाभाविक ही स्नेह करती रही हो । आज किस अपराधसे उन्हें वन देती हो? ॥३ ॥
कबहुँ न कियहु सवति आरेसू । प्रीति प्रतीति जान सबु देसू॥
कौसल्याँ अब काह बिगारा । तुम्ह जेहि लागि बज्र पुर पारा ॥
तुमने कभी सौतियाडाह नहीं किया । सारा देश तुम्हारे प्रेम और विश्वासको जानता है । अब कौसल्याने तुम्हारा कौन-सा बिगाड़ कर दिया, जिसके कारण तुमने सारे नगरपर वज्र गिरा दिया ॥४ ॥
दो०-सीय कि पिय सँगु परिहरिहि लखनु कि रहिहहिं धाम ।
राजु कि भूँजब भरत पुर नृपु किजिइहि बिनु राम ॥ ४ ९ ॥
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* * अयोध्याकाण्ड ३८५ क्या सीताजी अपने पति ( श्रीरामचन्द्रजी ) -का साथ छोड़ देंगी? क्या लक्ष्मणजी श्रीरामचन्द्रजीके बिना घर रह सकेंगे? क्या भरतजी श्रीरामचन्द्रजीके बिना अयोध्यापुरीका राज्य भोग सकेंगे? और क्या राजा श्रीरामचन्द्रजीके बिना जीवित रह सकेंगे? ( अर्थात् न सीताजी यहाँ रहेंगी, न लक्ष्मणजी रहेंगे, न भरतजी राज्य करेंगे और न राजा ही जीवित रहेंगे; सब उजाड़ हो जायगा) ॥ ४ ९ ॥
अस बिचारि उर छाड़हु कोहू । सोक कलंक कोठि जनि होहू ॥
भरतहि अवसि देहु जुबराजू । कानन काह राम कर काजू ॥
हृदयमें ऐसा विचारकर क्रोध छोड़ दो, शोक और कलङ्ककी कोठी मत बनो । भरतको अवश्य युवराजपद दो, पर श्रीरामचन्द्रजीका वनमें क्या काम है! ॥१ ॥
नाहिन रामु राज के भूखे । धरम धुरीन बिषय रस रूखे ॥
गुर गृह बसहुँ रामु तजि गेहू । नृप सन अस बरु दूसर लेहू॥
श्रीरामचन्द्रजी राज्यके भूखे नहीं हैं । वे धर्मकी धुरीको धारण करनेवाले और विषय- रससे रूखे हैं ( अर्थात् उनमें विषयासक्ति है ही नहीं ) । [ इसलिये तुम यह शंका न करो कि श्रीरामजी वन न गये तो भरतके राज्यमें विघ्न करेंगे; इतनेपर भी मन न माने तो ] तुम राजासे दूसरा ऐसा ( यह ) वर ले लो कि श्रीराम घर छोड़कर गुरुके घर रहें ॥२ ॥
जौं नहिं लगिहहु कहें हमारे । नहिं लागिहि कछु हाथ तुम्हारे ॥
जौं परिहास कीन्हि कछु होई । तौ कहि प्रगट जनावहु सोई ॥
जो तुम हमारे कहनेपर न चलोगी तो तुम्हारे हाथ कुछ भी न लगेगा । यदि तुमने कुछ हँसी की हो तो उसे प्रकटमें कहकर जना दो [कि मैंने दिल्लगी की है ] ॥३ ॥
राम सरिस सुत कानन जोगू । काह कहिहि सुनि तुम्ह कहुँ लोगू॥
उठहु बेगि सोइ करहु उपाई । जेहि बिधि सोकु कलंकु नसाई ॥
राम- सरीखा पुत्र क्या वनके योग्य है? यह सुनकर लोग तुम्हें क्या कहेंगे! जल्दी उठो और वही उपाय करो जिस उपायसे इस शोक और कलङ्कका नाश हो ॥ ४ ॥
छं० – जेहि भाँति सोकु कलंकु जाइ उपाय करि कुल पालही ।
हठि फेरु रामहि जात बन जनि बात दूसरि चालही ॥
जिमि भानु बिनु दिनु प्रान बिनु तनु चंद बिनु जिमि जामिनी ।
तिमिअवध तुलसीदास प्रभुबिनु समुझि धौं जियँ भामिनी ॥
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* *३८६ रामचरितमानस जिस तरह [ नगरभरका ] शोक और [ तुम्हारा ] कलङ्क मिटे, वही उपाय करके कुलकी रक्षा कर । वन जाते हुए श्रीरामजीको हठ करके लौटा ले, दूसरी कोई बात न चला । तुलसीदासजी कहते हैं- जैसे सूर्यके बिना दिन, प्राणके बिना शरीर और चन्द्रमाके बिना रात [निर्जीव तथा शोभाहीन हो जाती है ], वैसे ही श्रीरामचन्द्रजीके बिना अयोध्या हो जायगी; हे भामिनी! तू अपने हृदयमें इस बातको समझ ( विचारकर देख ) तो सही ।
सो० - सखिन्ह सिखावनु दीन्ह सुनत मधुर परिनाम हित ।
तेइँ कछु कान न कीन्ह कुटिल प्रबोधी कूबरी ॥ ५० ॥
इस प्रकार सखियोंने ऐसी सीख दी जो सुननेमें मीठी और परिणाममें हितकारी थी । पर कुटिला कुबरीकी सिखायी - पढ़ायी हुई कैकेयीने इसपर जरा भी कान नहीं दिया ॥५० ॥
उतरु न देइ दुसह रिस रूखी । मृगिन्ह चितव जनु बाघिनि भूखी ॥
ब्याधि असाधि जानि तिन्ह त्यागी । चलीं कहत मतिमंद अभागी ॥
कैकेयी कोई उत्तर नहीं देती, वह दुःसह क्रोधके मारे रूखी ( बेमुरव्वत ) हो रही है । ऐसे देखती है मानो भूखी बाघिन हरिनियोंको देख रही हो । तब सखियोंने रोगको असाध्य समझकर उसे छोड़ दिया । सब उसको मन्दबुद्धि, अभागिनी कहती हुई चल दीं ॥१ ॥
राजु करत यह दैअँ बिगोई । कीन्हेसि अस जस करइ न कोई ॥
एहि बिधि बिलपहिं पुर नर नारीं । देहिं कुचालिहि कोटिक गारीं ॥
राज्य करते हुए इस कैकेयीको दैवने नष्ट कर दिया । इसने जैसा कुछ किया, वैसा कोई भी न करेगा! नगरके सब स्त्री- पुरुष इस प्रकार विलाप कर रहे हैं और उस कुचाली कैकेयीको करोड़ों गालियाँ दे रहे हैं ॥ २ ॥
जरहिं बिषम जर लेहिं उसासा । कवनि राम बिनु जीवन आसा ॥
बिपुल बियोग प्रजा अकुलानी । जनु जलचर गन सूखत पानी ॥
लोग विषमज्वर ( भयानक दुःखकी आग ) से जल रहे हैं । लंबी साँसें लेते हुए वे कहते हैं कि श्रीरामचन्द्रजीके बिना जीनेकी कौन आशा है । महान् वियोग [ की आशंका ] से प्रजा ऐसी व्याकुल हो गयी है मानो पानी सूखनेके समय जलचर जीवोंका समुदाय व्याकुल हो! ॥ ३ ॥
अति बिषाद बस लोग लोगाईं । गए मातु पहिं रामु गोसाईं ॥
मुख प्रसन्न चित चौगुन चाऊ । मिटा सोचु जनि राखै राऊ ॥
सभी पुरुष और स्त्रियाँ अत्यन्त विषादके वश हो रहे हैं । स्वामी श्रीरामचन्द्रजी माता कौसल्याके पास गये । उनका मुख प्रसन्न है और चित्तमें चौगुना चाव ( उत्साह ) है । यह सोच मिट गया है कि राजा कहीं रख न लें । [ श्रीरामजीको राजतिलककी बात सुनकर विषाद हुआ था कि सब भाइयोंको छोड़कर बड़े भाई मुझको ही राजतिलक क्यों होता है । अब माता कैकेयीकी आज्ञा और पिताकी मौन सम्मति पाकर वह सोच मिट गया । ] ॥ ४ ॥
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* ** अयोध्याकाण्ड ३८७
दो० – नव गयंदु रघुबीर मनु राजु अलान समान ।
छूट जानि बन गवनु सुनि उर अनंदु अधिकान ॥ ५१ ॥
श्रीरामचन्द्रजीका मन नये पकड़े हुए हाथीके समान और राजतिलक उस हाथीके बाँधनेकी काँटेदार लोहेकी बेड़ीके समान है । ' वन जाना है ' यह सुनकर, अपनेको बन्धनसे छूटा जानकर, उनके हृदयमें आनन्द बढ़ गया है ॥५१ ॥
रघुकुल तिलक जोरि दोउ हाथा । मुदित मातु पद नायउ माथा ॥
दीन्हि असीस लाइ उर लीन्हे । भूषन बसन निछावरि कीन्हे ॥
रघुकुलतिलक श्रीरामचन्द्रजीने दोनों हाथ जोड़कर आनन्दके साथ माताके चरणोंमें सिर नवाया । माताने आशीर्वाद दिया, अपने हृदयसे लगा लिया और उनपर गहने तथा कपड़े न्यौछावर किये ॥ १ ॥
बार बार मुख चुंबति माता । नयन नेह जलु पुलकित गाता ॥
गोद राखि पुनि हृदयँ लगाए । स्त्रवत प्रेमरस पयद सुहाए ॥
माता बार- बार श्रीरामचन्द्रजीका मुख चूम रही हैं । नेत्रोंमें प्रेमका जल भर आया है और सब अङ्ग पुलकित हो गये हैं । श्रीरामको अपनी गोदमें बैठाकर फिर हृदयसे लगा लिया । सुन्दर स्तन प्रेमरस ( दूध ) बहाने लगे ॥२ ॥
प्रेमु प्रमोदु न कछु कहि जाई । रंक धनद पदबी जनु पाई ॥
सादर सुंदर बदनु निहारी । बोली मधुर बचन महतारी ॥
उनका प्रेम और महान् आनन्द कुछ कहा नहीं जाता । मानो कंगालने कुबेरका पद पा लिया हो । बड़े आदरके साथ सुन्दर मुख देखकर माता मधुर वचन बोलीं– ॥३ ॥
कहहु तात जननी बलिहारी । कबहिं लगन मुद मंगलकारी ॥
सुकृत सील सुख सीवँ सुहाई । जनम लाभ कइ अवधि अघाई ॥
हे तात! माता बलिहारी जाती है, कहो, वह आनन्द- मङ्गलकारी लग्न कब है, जो मेरे पुण्य, शील और सुखकी सुन्दर सीमा है और जन्म लेनेके लाभकी पूर्णतम अवधि है; ॥४ ॥
दो० – जेहि चाहत नर नारि सब अति आरत एहि भाँति ।
जिमिचातक चातकि तृषित बृष्टि सरद रितु स्वाति ॥ ५२ ॥
तथा जिस ( लग्न ) को सभी स्त्री - पुरुष अत्यन्त व्याकुलतासे इस प्रकार चाहते हैं जिस प्रकार प्याससे चातक और चातकी शरद् ऋतुके स्वातिनक्षत्रकी वर्षाको चाहते हैं ॥५२ ॥
तात जाउँ बलि बेगि नहाहू । जो मन भाव मधुर कछु खाहू॥
पितु समीप तब जाएहु भैआ । भइ बड़ि बार जाइ बलि मै ॥
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* *३८८ रामचरितमानस
हे तात! मैं बलैया लेती हूँ, तुम जल्दी नहा लो और जो मन भावे, कुछ मिठाई खा लो ।
भैया! तब पिताके पास जाना । बहुत देर हो गयी है, माता बलिहारी जाती है ॥१ ॥
मातु बचन सुनि अति अनुकूला । जनु सनेह सुरतरु के फूला ॥
सुख मकरंद भरे श्रियमूला । निरखि राम मनु भवरु न भूला ॥
माताके अत्यन्त अनुकूल वचन सुनकर-जो मानो स्नेहरूपी कल्पवृक्षके फूल थे, जो सुखरूपी मकरन्द ( पुष्परस ) से भरे थे और श्री ( राजलक्ष्मी ) के मूल थे - ऐसे वचनरूपी फूलोंको देखकर श्रीरामचन्द्रजीका मनरूपी भौंरा उनपर नहीं भूला ॥ २ ॥
धरम धुरीन धरम गति जानी । कहेउ मातु सन अति मृदु बानी ॥
पिताँ दीन्ह मोहि कानन राजू । जहँ सब भाँति मोर बड़ काजू॥
धर्मधुरीण श्रीरामचन्द्रजीने धर्मकी गतिको जानकर मातासे अत्यन्त कोमल वाणीसे कहा-हे माता! पिताजीने मुझको वनका राज्य दिया है, जहाँ सब प्रकारसे मेरा बड़ा काम बननेवाला है ॥३ ॥
आयसु देहि मुदित मन माता । जेहिं मुद मंगल कानन जाता ॥
जनि सनेह बस डरपसि भोरें । आनँदु अंब अनुग्रह तोरें ॥
हे माता! तू प्रसन्न मनसे मुझे आज्ञा दे, जिससे मेरी वनयात्रामें आनन्द- मङ्गल हो । मेरे स्नेहवश
भूलकर भी डरना नहीं । हे माता! तेरी कृपासे आनन्द ही होगा ॥ ४ ॥
दो० – बरष चारिदस बिपिन बसि करि पितु बचन प्रमान ।
आइ पाय पुनि देखिहउँ मनु जनि करसि मलान ॥ ५३ ॥
चौदह वर्ष वनमें रहकर, पिताजीके वचनको प्रमाणित ( सत्य ) कर, फिर लौटकर तेरे चरणोंका दर्शन करूँगा; तू मनको म्लान (दुःखी ) न कर ॥५३ ॥
बचन बिनीत मधुर रघुबर के । सर सम लगे मातु उर करके ॥
सहमि सूख सुनि सीतलि बानी । जिमि जवास परें पावस पानी ॥
रघुकुलमें श्रेष्ठ श्रीरामजीके ये बहुत ही नम्र और मीठे वचन माताके हृदयमें बाणके समान लगे और कसकने लगे । उस शीतल वाणीको सुनकर कौसल्या वैसे ही सहमकर सूख गयीं जैसे बरसातका पानी पड़नेसे जवासा सूख जाता है ॥१ ॥
कहि न जाइ कछु हृदय बिषादू । मनहुँ मृगी सुनि केहरि नादू॥
नयन सजल तन थर थर काँपी । माजहि खाइ मीन जनु मापी ॥
हृदयका विषाद कुछ कहा नहीं जाता । मानो सिंहकी गर्जना सुनकर हिरनी विकल हो गयी हो । नेत्रोंमें जल भर आया, शरीर थर- थर काँपने लगा । मानो मछली माँजा ( पहली वर्षाका फेन ) खाकर बदहवास हो गयी हो! ॥ २ ॥