श्रीरामचरितमानस — पृष्ठ 391–400
श्रीरामचरितमानस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 391–400
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* * अयोध्याकाण्ड ३८ ९
धरि धीरजु सुत बदनु निहारी । गदगद बचन कहति महतारी ॥
तात पितहि तुम्ह प्रान पिआरे । देखि मुदित नित चरित तुम्हारे ॥
धीरज धरकर, पुत्रका मुख देखकर माता गद्गद वचन कहने लगीं-हे तात! तुम तो पिताको प्राणोंके समान प्रिय हो । तुम्हारे चरित्रोंको देखकर वे नित्य प्रसन्न होते थे ॥३ ॥
राजु देन कहूँ सुभ दिन साधा । कहेउ जान बन केहिं अपराधा ॥
तात सुनावहु मोहि निदानू । को दिनकर कुल भयउ कृसानू ॥
राज्य देनेके लिये उन्होंने ही शुभ दिन सोधवाया था । फिर अब किस अपराधसे वन जानेको कहा? हे तात! मुझे इसका कारण सुनाओ! सूर्यवंश [रूपी वन ] को जलानेके लिये अग्नि कौन हो गया? ॥४ ॥
दो० – निरखि राम रुख सचिवसुत कारनु कहेउ बुझाइ ।
सुनि प्रसंगु रहि मूक जिमि दसा बरनि नहिं जाइ ॥ ५४ ॥
तब श्रीरामचन्द्रजीका रुख देखकर मन्त्रीके पुत्रने सब कारण समझाकर कहा । उस प्रसंगको सुनकर वे गूँगी - जैसी ( चुप ) रह गयीं, उनकी दशाका वर्णन नहीं किया जा सकता ॥५४ ॥
राखि न सकइ न कहि सक जाहू । दुहूँ भाँति उर दारुन दाहू ॥
लिखत सुधाकर गा लिखि राहू । बिधि गति बाम सदा सब काहू ॥
न रख ही सकती हैं, न यह कह सकती हैं कि वन चले जाओ । दोनों ही प्रकारसे हृदयमें बड़ा भारी सन्ताप हो रहा है । [ मनमें सोचती हैं कि देखो- ] विधाताकी चाल सदा सबके लिये टेढ़ी होती है । लिखने लगे चन्द्रमा और लिख गया राहु! ॥१ ॥
धरम सनेह उभयँ मति घेरी । भइ गति साँप छुछुदरि केरी ॥
राखउँ सुतहि करउँ अनुरोधू । धरमु जाइ अरु बंधु बिरोधू॥
धर्म और स्नेह दोनोंने कौसल्याजीकी बुद्धिको घेर लिया । उनकी दशा साँप- छछूंदरकी - सी हो गयी । वे सोचने लगीं कि यदि मैं अनुरोध ( हठ ) करके पुत्रको रख लेती हूँ तो धर्म जाता है और भाइयोंमें विरोध होता है; ॥ २ ॥
कहउँ जान बन तौ बड़ि हानी । संकट सोच बिबस भइ रानी ॥
बहुरि समुझि तिय धरमु सयानी । रामु भरतु दोउ सुत सम जानी ॥
और यदि वन जानेको कहती हूँ तो बड़ी हानि होती है । इस प्रकारके धर्म- संकटमें पड़कर रानी विशेषरूपसे सोचके वश हो गयीं । फिर बुद्धिमती कौसल्याजी स्त्री- धर्म ( पातिव्रत - धर्म ) को समझकर और राम तथा भरत दोनों पुत्रोंको समान जानकर- ॥३ ॥
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* *३९ ० रामचरितमानस
सरल सुभाउ राम महतारी । बोली बचन धीर धरि भारी ॥
तात जाउँ बलि कीन्हेहु नीका । पितु आयसु सब धरमक टीका ॥
सरल स्वभाववाली श्रीरामचन्द्रजीकी माता बड़ा धीरज धरकर वचन बोलीं-हे तात! मैं बलिहारी जाती हूँ, तुमने अच्छा किया । पिताकी आज्ञाका पालन करना ही सब धर्मोंका शिरोमणि धर्म है ॥४ ॥
दो० –- राजु देन कहि दीन्ह बनु मोहि न सो दुख ले ।
तुम्ह बिनु भरतहि भूपतिहि प्रजहि प्रचंड कलेसु ॥ ५५ ॥
राज्य देनेको कहकर वन दे दिया, उसका मुझे लेशमात्र भी दुःख नहीं है । [ दुःख तो इस बातका है कि ] तुम्हारे बिना भरतको, महाराजको और प्रजाको बड़ा भारी क्लेश होगा ॥ ५५ ॥
जौं केवल पितु आयसु ताता । तौ जनि जाहु जानि बड़ि माता ॥
जौं पितु मातु कहेउ बन जाना । तौ कानन सत अवध समाना ॥
हे तात! यदि केवल पिताजीकी ही आज्ञा हो, तो माताको [ पितासे ] बड़ी जानकर वनको मत जाओ । किन्तु यदि पिता-माता दोनोंने वन जानेको कहा हो, तो वन तुम्हारे लिये सैकड़ों अयोध्याके समान है ॥१ ॥
पितु बनदेव मातु बनदेवी । खग मृग चरन सरोरुह सेवी ॥
अंतहुँ उचित नृपहि बनबासू । बय बिलोकि हियँ होइ हराँसू॥
वनके देवता तुम्हारे पिता होंगे और वनदेवियाँ माता होंगी । वहाँके पशु-पक्षी तुम्हारे चरण- कमलोंके सेवक होंगे । राजाके लिये अन्तमें तो वनवास करना उचित ही है । केवल तुम्हारी [ सुकुमार ] अवस्था देखकर हृदयमें दुःख होता है ॥२ ॥
बड़भागी बनु अवध अभागी । जो रघुबंसतिलक तुम्ह त्यागी ॥
जौं सुत कहौं संग मोहि लेहू ॥ तुम्हरे हृदयँ होइ संदेहू ॥
हे रघुवंशके तिलक! वन बड़ा भाग्यवान् है और यह अवध अभागी है, जिसे तुमने त्याग दिया । हे पुत्र! यदि मैं कहूँ कि मुझे भी साथ ले चलो तो तुम्हारे हृदयमें सन्देह होगा [कि माता इसी बहाने मुझे रोकना चाहती हैं ] ॥३ ॥
पूत परम प्रिय तुम्ह सबही के । प्रान प्रान के जीवन जी के ॥
ते तुम्ह कहहु मातु बन जाऊँ । मैं सुनि बचन बैठि पछिताऊँ ॥
हे पुत्र! तुम सभीके परम प्रिय हो । प्राणोंके प्राण और हृदयके जीवन हो । वही ( प्राणाधार ) तुम कहते हो कि माता! मैं वनको जाऊँ और मैं तुम्हारे वचनोंको सुनकर बैठी पछताती हूँ! ॥४ ॥
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* अयोध्याकाण्ड * ३ ९ १
दो० - यह बिचारि नहिं करउँ हठ झूठ सनेहु बढ़ाइ ।
मानि मातु कर नात बलि सुरति बिसरि जनि जाइ ॥ ५६ ॥
यह सोचकर झूठा स्नेह बढ़ाकर मैं हठ नहीं करती । बेटा! मैं बलैया लेती हूँ, माताका नाता मानकर मेरी सुध भूल न जाना ॥५६ ॥
देव पितर सब तुम्हहि गोसाईं । राखहुँ पलक नयन की नाईं ॥
अवधि अंबु प्रिय परिजन मीना । तुम्ह करुनाकर धरम धुरीना ॥
हे गोसाईं! सब देव और पितर तुम्हारी वैसे ही रक्षा करें, जैसे पलकें आँखोंकी रक्षा करती हैं । तुम्हारे वनवासकी अवधि ( चौदह वर्ष ) जल है, प्रियजन और कुटुम्बी मछली हैं । तुम दयाकी खान और धर्मकी धुरीको धारण करनेवाले हो ॥१ ॥
अस बिचारि सोइ करहु उपाई । सबहि जिअत जेहिं भेंटहु आई ॥
जाहु सुखेन बनहि बलि जाऊँ । करि अनाथ जन परिजन गाऊँ ॥
ऐसा विचारकर वही उपाय करना जिसमें सबके जीते-जी तुम आ मिलो । मैं बलिहारी जाती हूँ, तुम सेवकों, परिवारवालों और नगरभरको अनाथ करके सुखपूर्वक वनको जाओ ॥२ ॥
सब कर आजु सुकृत फल बीता । भयउ कराल कालु बिपरीता ॥
बहुबिधि बिलपि चरन लपटानी । परम अभागिनि आपुहि जानी ॥
आज सबके पुण्योंका फल पूरा हो गया! कठिन काल हमारे विपरीत हो गया । [ इस प्रकार ] बहुत विलाप करके और अपनेको परम अभागिनी जानकर माता श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंमें लिपट गयीं ॥३ ॥
दारुन दुसह दाहु उर ब्यापा । बरनि न जाहिं बिलाप कलापा ॥
राम उठाइ मातु उर लाई । कहि मृदु बचन बहुरि समुझाई ॥
हृदयमें भयानक दुःसह संताप छा गया । उस समयके बहुविध विलापका वर्णन नहीं किया जा सकता । श्रीरामचन्द्रजीने माताको उठाकर हृदयसे लगा लिया और फिर कोमल वचन कहकर उन्हें समझाया ॥४ ॥
दो० - समाचार तेहि समय सुनि सीय उठी अकुलाइ ।
जाइ सासु पद कमल जुग बंदि बैठि सिरु नाइ ॥ ५७ ॥
उसी समय यह समाचार सुनकर सीताजी अकुला उठीं और सासके पास जाकर उनके दोनों चरणकमलोंकी वन्दना कर सिर नीचा करके बैठ गयीं ॥ ५७ ॥
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* *३ ९ २ रामचरितमानस
दीन्हि असीस सासु मृदु बानी । अति सुकुमारि देखि अकुलानी ॥
बैठि नमितमुख सोचति सीता । रूप रासि पति प्रेम पुनीता ॥
सासने कोमल वाणीसे आशीर्वाद दिया । वे सीताजीको अत्यन्त सुकुमारी देखकर व्याकुल हो उठीं । रूपकी राशि और पतिके साथ पवित्र प्रेम करनेवाली सीताजी नीचा मुख किये बैठी सोच रही हैं ॥१ ॥
चलन चहत बन जीवननाथू । केहि सुकृती सन होइहि साथू॥
की तनु प्रान कि केवल प्राना । बिधि करतबु कछु जाइ न जाना ॥
जीवननाथ ( प्राणनाथ ) वनको चलना चाहते हैं । देखें किस पुण्यवान्से उनका साथ होगा—– शरीर और प्राण दोनों साथ जायँगे या केवल प्राणहीसे इनका साथ होगा? विधाताकी करनी कुछ जानी नहीं जाती ॥२ ॥
चारु चरन नख लेखति धरनी । नूपुर मुखर मधुर कबि बरनी ॥
मनहुँ प्रेम बस बिनती करहीं । हमहि सीय पद जनि परिहरहीं ॥
सीताजी अपने सुन्दर चरणोंके नखोंसे धरती कुरेद रही हैं । ऐसा करते समय नूपुरोंका जो मधुर शब्द हो रहा है, कवि उसका इस प्रकार वर्णन करते हैं कि मानो प्रेमके वश होकर नूपुर यह विनती कर रहे हैं कि सीताजीके चरण कभी हमारा त्याग न करें ॥ ३ ॥
मंजु बिलोचन मोचति बारी ॥ बोली देखि राम महतारी ॥
तात सुनहु सिय अति सुकुमारी । सास ससुर परिजनहि पिआरी ॥
सीताजी सुन्दर नेत्रोंसे जल बहा रही हैं । उनकी यह दशा देखकर श्रीरामजीकी माता कौसल्याजी बोलीं – हे तात! सुनो, सीता अत्यन्त ही सुकुमारी हैं तथा सास, ससुर और कुटुम्बी सभीको प्यारी हैं ॥ ४ ॥
दो० - पिता जनक भूपाल मनि ससुर भानुकुल भानु ।
पति रबिकुल कैरव बिपिन बिधु गुन रूप निधानु ॥ ५८ ॥
इनके पिता जनकजी राजाओंके शिरोमणि हैं; ससुर सूर्यकुलके सूर्य हैं और पति सूर्यकुलरूपी कुमुदवनको खिलानेवाले चन्द्रमा तथा गुण और रूपके भण्डार हैं ॥ ५८ ॥
मैं पुनि पुत्रबधू प्रिय पाई । रूप रासि गुन सील सुहाई ॥
नयन तरि करि प्रीति बढ़ाई । राखेउँ प्रान जानकिहिं लाई ॥
फिर मैंने रूपकी राशि, सुन्दर गुण और शीलवाली प्यारी पुत्रवधू पायी है । मैंने इन ( जानकी ) को आँखोंकी पुतली बनाकर इनसे प्रेम बढ़ाया है और अपने प्राण इनमें लगा रखे हैं ॥ १ ॥
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* ** अयोध्याकाण्ड ३ ९ ३
कलपबेलि जिमि बहुबिधि लाली । सींचि सनेह सलिल प्रतिपाली ॥
फूलत फलत भयउ बिधि बामा । जानि न जाइ काह परिनामा ॥
इन्हें कल्पलताके समान मैंने बहुत तरहसे बड़े लाड़- चावके साथ स्नेहरूपी जलसे सींचकर पाला है । अब इस लताके फूलने- फलनेके समय विधाता वाम हो गये । कुछ जाना नहीं जाता कि इसका क्या परिणाम होगा ॥ २ ॥
पलँग पीठ तजि गोद हिंडोरा । सियँ न दीन्ह पगु अवनि कठोरा ॥
जिनमूरि जिमि जोगवत रहऊँ । दीप बाति नहिं टारन कहऊँ ॥
सीताने पर्यङ्कपृष्ठ ( पलंगके ऊपर), गोद और हिंडोलेको छोड़कर कठोर पृथ्वीपर कभी पैर नहीं रखा । मैं सदा सञ्जीवनी जड़ीके समान [ सावधानीसे ] इनकी रखवाली करती रही हूँ! कभी दीपककी बत्ती हटानेको भी नहीं कहती ॥ ३ ॥
सोइ सिय चलन चहति बन साथा । आयसु काह होइ रघुनाथा ॥
चंद किरन रस रसिक चकोरी । रबि रुख नयन सकड़ किमि जोरी ॥
वही सीता अब तुम्हारे साथ वन चलना चाहती है । हे रघुनाथ! उसे क्या आज्ञा होती है? चन्द्रमाक किरणोंका रस ( अमृत ) चाहनेवाली चकोरी सूर्यकी ओर आँख किस तरह मिला सकती है ॥४ ॥
दो० – करि केहरि निसिचर चरहिं दुष्ट जंतु बन भूरि ।
बिष बाटिकाँ कि सोह सुत सुभग सजीवनि मूरि ॥ ५ ९ ॥
हाथी, सिंह, राक्षस आदि अनेक दुष्ट जीव-जन्तु वनमें विचरते रहते हैं । हे पुत्र! क्या विषकी वाटिकामें सुन्दर सञ्जीवनी बूटी शोभा पा सकती है? ॥५ ९ ॥
बन हित कोल किरात किसोरी । रचीं बिरंचि बिषय सुख भोरी ॥
पाहनकृमि जिमि कठिन सुभाऊ । तिन्हहि कलेसु न कानन काऊ ॥
वनके लिये तो ब्रह्माजीने विषयसुखको न जाननेवाली कोल और भीलोंकी लड़कियोंको रचा है, जिनका पत्थरके कीड़े जैसा कठोर स्वभाव है । उन्हें वनमें कभी क्लेश नहीं होता ॥ १ ॥
कै तापस तिय कानन जोगू । जिन्ह तप हेतु तजा सब भोगू॥
सिय बन बसिहि तात केहि भाँती । चित्रलिखित कपि देखि डेराती ॥
अथवा तपस्वियोंकी स्त्रियाँ वनमें रहने योग्य हैं, जिन्होंने तपस्याके लिये सब भोग तज दिये हैं । हे पुत्र! जो तसवीरके बन्दरको देखकर डर जाती हैं वे सीता वनमें किस तरह रह सकेंगी? ॥२ ॥
सुरसर सुभग बनज बन चारी । डाबर जोगु कि हंसकुमारी ॥
अस बिचारि जस आयसु होई । मैं सिख देउँ जानकिहि सोई ॥
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* *३ ९४ रामचरितमानस देवसरोवरके कमलवनमें विचरण करनेवाली हंसिनी क्या गड़ैयों ( तलैयों ) में रहनेके योग्य है? ऐसा विचारकर जैसी तुम्हारी आज्ञा हो, मैं जानकीको वैसी ही शिक्षा दूँ ॥ ३ ॥
जौं सिय भवन रहै कह अंबा । मोहि कहँ होड़ बहुत अवलंबा ॥
सुनि रघुबीर मातु प्रिय बानी । सील सनेह सुधाँ जनु सानी ॥
माता कहती हैं — यदि सीता घरमें रहें तो मुझको बहुत सहारा हो जाय । श्रीरामचन्द्रजीने माताकी प्रिय वाणी सुनकर, जो मानो शील और स्नेहरूपी अमृतसे सनी हुई थी, ॥४ ॥
दो० – कहि प्रिय बचन बिबेकमय कीन्हि मातु परितोष ।
लगे प्रबोधन जानकिहि प्रगटि बिपिन गुन दोष ॥ ६० ॥
विवेकमय प्रिय वचन कहकर माताको सन्तुष्ट किया । फिर वनके गुण-दोष प्रकट करके वे जानकीजीको समझाने लगे ॥६० ॥
मासपारायण, चौदहवाँ विश्राम
मातु समीप कहत सकुचाहीं । बोले समउ समुझि मन माहीं ॥
राजकुमारि सिखावनु सुनहू । आन भाँतिजियँ जनि कछु गुनहू ॥
माताके सामने सीताजीसे कुछ कहनेमें सकुचाते हैं । पर मनमें यह समझकर कि यह समय ऐसा ही है, वे बोले – हे राजकुमारी! मेरी सिखावन सुनो । मनमें कुछ दूसरी तरह न समझ लेना ॥ १ ॥
आपन मोर नीक जौं चहहू । बचनु हमार मानि गृह रहहू ॥
आयसु मोर सासु सेवकाई । सब बिधि भामिनि भवन भलाई ॥
जो अपना और मेरा भला चाहती हो, तो मेरा वचन मानकर घर रहो । हे भामिनी! मेरी
आज्ञाका पालन होगा, सासकी सेवा बन पड़ेगी । घर रहनेमें सभी प्रकारसे भलाई है ॥२ ॥
एहि ते अधिक धरमु नहिं दूजा । सादर सासु ससुर पद पूजा ॥
जब जब मातु करिहि सुधि मोरी । होइहि प्रेम बिकल मति भोरी ॥
आदरपूर्वक सास-ससुरके चरणोंकी पूजा ( सेवा) करनेसे बढ़कर दूसरा कोई धर्म नहीं है । जब - जब माता मुझे याद करेंगी और प्रेमसे व्याकुल होनेके कारण उनकी बुद्धि भोली हो जायगी ( वे अपने - आपको भूल जायँगी ), ॥ ३ ॥
तब तब तुम्ह कहि कथा पुरानी । सुंदरि समुझाएहु मृदु बानी ॥
कहउँ सुभायँ सपथ सत मोही । सुमुखि मातु हित राखउँ तोही ॥
हे सुन्दरी! तब- तब तुम कोमल वाणीसे पुरानी कथाएँ कह - कहकर इन्हें समझाना । हे सुमुखि! मुझे सैकड़ों सौगन्ध हैं, मैं यह स्वभावसे ही कहता हूँ कि मैं तुम्हें केवल माताके लिये ही घरपर रखता हूँ॥ ४ ॥
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* ** अयोध्याकाण्ड ३ ९ ५
दो० – गुर श्रुति संमत धरम फलु पाइअ बिनहिं कलेस ।
हठ बस सब संकट सहे गालव नहुष नरेस ॥ ६१ ॥
[ मेरी आज्ञा मानकर घरपर रहनेसे ] गुरु और वेदके द्वारा सम्मत धर्म [ के आचरण ] का फल तुम्हें बिना ही क्लेशके मिल जाता है । किन्तु हठके वश होकर गालव मुनि और राजा नहुष आदि सबने संकट ही सहे ॥६१ ॥
मैं पुनि करि प्रवान पितु बानी । बेगि फिरब सुनु सुमुखि सयानी ॥
दिवस जात नहिं लागिहि बारा । सुंदरि सिखवनु सुनहु हमारा ॥
हे सुमुखि! हे सयानी! सुनो, मैं भी पिताके वचनको सत्य करके शीघ्र ही लौहूँगा । दिन जाते देर नहीं लगेगी । हे सुन्दरी! हमारी यह सीख सुनो! ॥ १ ॥
जौं हठ करहु प्रेम बस बामा । तौ तुम्ह दुखु पाउब परिनामा ॥
काननु कठिन भयंकरु भारी । घोर घामु हिम बारि बयारी ॥
हे वामा! यदि प्रेमवश हठ करोगी, तो तुम परिणाममें दुःख पाओगी । वन बड़ा कठिन ( क्लेशदायक ) और भयानक है । वहाँकी धूप, जाड़ा, वर्षा और हवा सभी बड़े भयानक हैं ॥ २ ॥
कुस कंटक मग काँकर नाना । चलब पयादेहिं बिनु पदत्राना ॥
चरन कमल मृदु मंजु तुम्हारे । मारग अगम भूमिधर भारे ॥
रास्तेमें कुश, काँटे और बहुत- से कंकड़ हैं । उनपर बिना जूतेके पैदल ही चलना होगा । तुम्हारे चरण- कमल कोमल और सुन्दर हैं और रास्तेमें बड़े - बड़े दुर्गम पर्वत हैं ॥३ ॥
कंदर खोह नदीं नद नारे । अगम अगाध न जाहिं निहारे ॥
भालु बाघ बूक केहरि नागा । करहिं नाद सुनि धीरजु भागा ॥
पर्वतोंकी गुफाएँ, खोह ( दर्रे ), नदियाँ, नद और नाले ऐसे अगम्य और गहरे हैं कि उनकी ओर देखातक नहीं जाता । रीछ, बाघ, भेड़िये, सिंह और हाथी ऐसे [ भयानक ] शब्द करते हैं कि उन्हें सुनकर धीरज भाग जाता है ॥४ ॥
दो० - भूमि सयन बलकल बसन असनु कंद फल मूल ।
ते कि सदा सब दिन मिलहिं सबुइ समय अनुकूल ॥ ६२ ॥
जमीनपर सोना, पेड़ोंकी छालके वस्त्र पहनना और कन्द, मूल, फलका भोजन करना होगा । और वे भी क्या सदा सब दिन मिलेंगे? सब कुछ अपने- अपने समयके अनुकूल ही मिल सकेगा ॥ ६२ ॥
नर अहार रजनीचर चरहीं । कपट बेष बिधि कोटिक करहीं ॥
लागइ अति पहार कर पानी । बिपिन बिपति नहिं जाइ बखानी ॥
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* *३ ९ ६ रामचरितमानस मनुष्योंको खानेवाले निशाचर ( राक्षस) फिरते रहते हैं । वे करोड़ों प्रकारके कपट- रूप धारण कर लेते हैं । पहाड़का पानी बहुत ही लगता है । वनकी विपत्ति बखानी नहीं जा सकती ॥१ ॥
ब्याल कराल बिहग बन घोरा । निसिचर निकर नारि नर चोरा ॥
डरपहिं धीर गहन सुधि आएँ । मृगलोचनि तुम्ह भीरु सुभाएँ॥
वनमें भीषण सर्प, भयानक पक्षी और स्त्री - पुरुषोंको चुरानेवाले राक्षसोंके झुंड- के - झुंड रहते हैं । वनकी [ भयंकरता ] याद आनेमात्रसे धीर पुरुष भी डर जाते हैं । फिर हे मृगलोचनि! तुम तो स्वभावसे ही डरपोक हो! ॥ २ ॥
हंसगवनि तुम्ह नहिं बन जोगू । सुनि अपजसु मोहि देहि लोगू॥
मानस सलिल सुधाँ प्रतिपाली । जिअइ कि लवन पयोधि मराली ॥
हे हंसगमनी! तुम वनके योग्य नहीं हो । तुम्हारे वन जानेकी बात सुनकर लोग मुझे अपयश देंगे ( बुरा कहेंगे ) । मानसरोवरके अमृतके समान जलसे पाली हुई हंसिनी कहीं खारे समुद्रमें जी सकती है? ॥ ३ ॥
नव रसाल बन बिहरनसीला । सोह कि कोकिल बिपिन करीला ॥
रहहु भवन अस हृदयँ बिचारी । चंदबदन दुखु कानन भारी ॥
नवीन आमके वनमें विहार करनेवाली कोयल क्या करीलके जंगलमें शोभा पाती है? हे
चन्द्रमुखी! हृदयमें ऐसा विचारकर तुम घरहीपर रहो । वनमें बड़ा कष्ट है ॥ ४ ॥
दो० - सहज सुहृद गुर स्वामि सिख जो न करइ सिर मानि ।
सो पछिताइ अघाइ उर अवसि होइ हित हानि ॥ ६३ ॥
स्वाभाविक ही हित चाहनेवाले गुरु और स्वामीकी सीखको जो सिर चढ़ाकर नहीं मानता, वह हृदयमें भरपेट पछताता है और उसके हितकी हानि अवश्य होती है ॥ ६३ ॥
सुनि मृदु बचन मनोहर पिय के । लोचन ललित भरे जल सिय के ॥
सीतल सिख दाहक भइ कैसें । चकइहि सरद चंद निसि जैसें ॥
प्रियतमके कोमल तथा मनोहर वचन सुनकर सीताजीके सुन्दर नेत्र जलसे भर गये । श्रीरामजीकी यह शीतल सीख उनको कैसी जलानेवाली हुई, जैसे चकवीको शरद् ऋतुकी चाँदनी रात होती है ॥ १ ॥
उतरु न आव बिकल बैदेही । तजन चहत सुचि स्वामि सनेही ॥
बरबस रोकि बिलोचन बारी । धरि धीरजु उर अवनिकुमारी ॥
जानकीजीसे कुछ उत्तर देते नहीं बनता, वे यह सोचकर व्याकुल हो उठीं कि मेरे पवित्र और प्रेमी स्वामी मुझे छोड़ जाना चाहते हैं । नेत्रोंके जल ( आँसुओं ) को जबर्दस्ती रोककर वे पृथ्वीकी कन्या सीताजी हृदयमें धीरज धरकर, ॥ २ ॥
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* * अयोध्याकाण्ड ३ ९७
लागि सासु पग कह कर जोरी । छमबि देबि बड़ि अबिनय मोरी ॥
दीन्हि प्रानपति मोहिसिख सोई । जेहि बिधि मोर परम हित होई ॥
सासके पैर लगकर, हाथ जोड़कर कहने लगीं- हे देवि! मेरी इस बड़ी भारी ढिठाईको क्षमा कीजिये । मुझे प्राणपतिने वही शिक्षा दी है जिससे मेरा परम हित हो ॥ ३ ॥
मैं पुनि समुझि दीखि मन माहीं । पिय बियोग सम दुखु जग नाहीं ॥
परन्तु मैंने मनमें समझकर देख लिया कि पतिके वियोगके समान जगत्में कोई दुःख नहीं है ॥४ ॥
दो० –प्राननाथ करुनायतन सुंदर सुखद सुजान ।
तुम्ह बिनु रघुकुल कुमुद बिधु सुरपुर नरक समान ॥६४ ॥
हे प्राणनाथ! हे दयाके धाम! हे सुन्दर! हे सुखोंके देनेवाले! हे सुजान! हे रघुकुलरूपी कुमुदके खिलानेवाले चन्द्रमा! आपके बिना स्वर्ग भी मेरे लिये नरकके समान है ॥६४ ॥
मातु पिता भगिनी प्रिय भाई । प्रिय परिवारु सुहृद समुदाई ॥
सासु ससुर गुर सजन सहाई । सुत सुंदर सुसील सुखदाई ॥
माता, पिता, बहन, प्यारा भाई, प्यारा परिवार, मित्रोंका समुदाय, सास, ससुर, गुरु, स्वजन ( बन्धु - बान्धव ), सहायक और सुन्दर, सुशील और सुख देनेवाला पुत्र- ॥ १ ॥
जहँ लगि नाथ नेह अरु नाते । पिय बिनु तियहि तरनिहु ते ताते ॥
तनु धनु धामु धरनि पुर राजू । पति बिहीन सबु सोक समाजू॥
हे नाथ! जहाँतक स्नेह और नाते हैं, पतिके बिना स्त्रीको सभी सूर्यसे भी बढ़कर तपानेवाले हैं । शरीर, धन, घर, पृथ्वी, नगर और राज्य, पतिके बिना स्त्रीके लिये यह सब शोकका समाज है ॥२ ॥
भोग रोगसम भूषन भारू । जम जातना सरिस संसारू ॥
प्राननाथ तुम्ह बिनु जग माहीं । मो कहूँ सुखद कतहुँ कछु नाहीं ॥
भोग रोगके समान हैं, गहने भाररूप हैं और संसार यम यातना ( नरककी पीड़ा ) के समान है । हे प्राणनाथ! आपके बिना जगत्में मुझे कहीं कुछ भी सुखदायी नहीं है ॥३ ॥
जिय बिनु देह नदी बिनु बारी । तैसिअ नाथ पुरुष बिनु नारी ॥
नाथ सकल सुख साथ तुम्हारें । सरद बिमल बिधु बदनु निहारें ॥
जैसे बिना जीवके देह और बिना जलके नदी, वैसे ही हे नाथ! बिना पुरुषके स्त्री है । हे नाथ! आपके साथ रहकर आपका शरद्- [ पूर्णिमा ] के निर्मल चन्द्रमाके समान मुख देखनेसे मुझे समस्त सुख प्राप्त होंगे ॥४ ॥
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* *३ ९८ रामचरितमानस
दो० – खग मृग परिजन नगरु बनु बलकल बिमल दुकूल ।
नाथ साथ सुरसदन सम परनसाल सुख मूल ॥ ६५ ॥
हे नाथ! आपके साथ पक्षी और पशु ही मेरे कुटुम्बी होंगे, वन ही नगर और वृक्षोंकी छाल ही निर्मल वस्त्र होंगे और पर्णकुटी ( पत्तोंकी बनी झोंपड़ी ) ही स्वर्गके समान सुखोंकी मूल होगी ॥६५ ॥
करिहहिं सासु ससुर सम सारा ॥बनदेबीं बनदेव उदारा ।
कुस किसलय साथरी सुहाई । प्रभु सँग मंजु मनोज तुराई ॥
उदार हृदयके वनदेवी और वनदेवता ही सास-ससुरके समान मेरी सार -सँभार करेंगे, और कुशा और पत्तोंकी सुन्दर साथरी( बिछौना ) ही प्रभुके साथ कामदेवकी मनोहर तोशकके समान होगी ॥१ ॥
कंद मूल फल अमिअ अहारू । अवध सौध सत सरिस पहारू ॥
छिनु छिनु प्रभु पद कमल बिलोकी । रहिहउँ मुदित दिवस जिमि कोकी ॥
कन्द, मूल और फल ही अमृतके समान आहार होंगे और [वनके ] पहाड़ ही अयोध्याके सैकड़ों राजमहलोंके समान होंगे । क्षण- क्षणमें प्रभुके चरणकमलोंको देख- देखकर मैं ऐसी आनन्दित रहूँगी जैसी दिनमें चकवी रहती है ॥२ ॥
बन दुख नाथ कहे बहुतेरे । भय बिषाद परिताप घनेरे ॥
प्रभु बियोग लवलेस समाना । सब मिलि होहिं न कृपानिधाना ॥
हे नाथ! आपने वनके बहुत-से दुःख और बहुत-से भय, विषाद और सन्ताप कहे । परन्तु हे कृपानिधान! वे सब मिलकर भी प्रभु ( आप ) के वियोग [ से होनेवाले दुःख ] के लवलेशके समान भी नहीं हो सकते ॥ ३ ॥
अस जियँ जानि सुजान सिरोमनि । लेइअ संग मोहि छाड़िअ जनि ॥
बिनती बहुत करौं का स्वामी । करुनामय उर अंतरजामी ॥
ऐसा जीमें जानकर, हे सुजानशिरोमणि! आप मुझे साथ ले लीजिये, यहाँ न छोड़िये । हे स्वामी! मैं अधिक क्या विनती करूँ? आप करुणामय हैं और सबके हृदयके अंदरकी जाननेवाले हैं ॥४ ॥
दो० – राखिअ अवध जो अवधि लगि रहत न जनिअहिं प्रान ।
दीनबंधु सुंदर सुखद सील सनेह निधान ॥ ६६ ॥
हे दीनबन्धु! हे सुन्दर! हे सुख देनेवाले! हे शील और प्रेमके भण्डार! यदि अवधि ( चौदह वर्ष ) तक मुझे अयोध्यामें रखते हैं तो जान लीजिये कि मेरे प्राण नहीं रहेंगे ॥६६ ॥