श्रीरामचरितमानस — पृष्ठ 401–410
श्रीरामचरितमानस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 401–410
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* ** अयोध्याकाण्ड ३ ९९
मोहि मग चलत न होइहि हारी । छिनु छिनु चरन सरोज निहारी ॥
सहि भाँति पय सेवा करिहौं । मारग जनित सकल श्रम हरिहौं । क्षण- क्षणमें आपके चरणकमलोंको देखते रहने से मुझे मार्ग चलनेमें थकावट न होगी । हे प्रियतम! मैं सभी प्रकारसे आपकी सेवा करूँगी और मार्ग चलनेसे होनेवाली सारी थकावटको दूर कर दूँगी ॥ १ ॥
पाय पखारि बैठि तरु छाहीं । करिहउँ बाउ मुदित मन माहीं ॥
श्रम कन सहित स्याम तनु देखें । कहँ दुख समउ प्रानपति पेखें ॥
आपके पैर धोकर, पेड़ोंकी छायामें बैठकर, मनमें प्रसन्न होकर हवा करूँगी ( पंखा झलूँगी) । पसीनेकी बूँदोंसहित श्याम शरीरको देखकर- प्राणपतिके दर्शन करते हुए दुःखके लिये मुझे अवकाश ही कहाँ रहेगा ॥ २ ॥
सम महि तृन तरुपल्लव डासी । पाय पलोटिहि सब निसि दासी ॥
बार बार मृदु मूरति जोही । लागिहि तात बयारि न मोही ॥
समतल भूमिपर घास और पेड़ोंके पत्ते बिछाकर यह दासी रातभर आपके चरण दबावेगी । बार- बार आपकी कोमल मूर्तिको देखकर मुझको गरम हवा भी न लगेगी ॥ ३ ॥
को प्रभु सँग मोहि चितवनिहारा । सिंघबधुहि जिमि ससक सिआरा ॥
मैं सुकुमारि नाथ बन जोगू । तुम्हहि उचित तप मो कहुँ भोगू ॥
प्रभुके साथ [ रहते ] मेरी ओर [ आँख उठाकर ] देखनेवाला कौन है ( अर्थात् कोई नहीं देख सकता )! जैसे सिंहकी स्त्री ( सिंहनी ) को खरगोश और सियार नहीं देख सकते । मैं सुकुमारी हूँ और नाथ वनके योग्य हैं? आपको तो तपस्या उचित है और मुझको विषय - भोग? ॥ ४ ॥
दो० – ऐसेउ बचन कठोर सुनि जौं न हृदउ बिलगान ।
तौ प्रभु बिषम बियोग दुख सहिहहिं पावँर प्रान ॥ ६७ ॥
ऐसे कठोर वचन सुनकर भी जब मेरा हृदय न फटा तो, हे प्रभु! [ मालूम होता है ] ये पामर प्राण आपके वियोगका भीषण दुःख सहेंगे ॥ ६७ ॥
अस कहि सीय बिकल भइ भारी । बचन बियोग न सकी सँभारी ॥
देखि दसा रघुपति जियँ जाना । हठि राखें नहिं राखिहि प्राना ॥
ऐसा कहकर सीताजी बहुत ही व्याकुल हो गयीं । वे वचनके वियोगको भी न सँभाल सकीं । ( अर्थात् शरीरसे वियोगकी बात तो अलग रही, वचनसे भी वियोगकी बात सुनकर वे अत्यन्त विकल हो गयीं ) उनकी यह दशा देखकर श्रीरघुनाथजीने अपने जीमें जान लिया कि हठपूर्वक इन्हें यहाँ रखनेसे ये प्राणोंको न रखेंगी ॥ १ ॥
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* *४०० रामचरितमानस
कहेउ कृपाल भानुकुलनाथा । परिहरि सोचु चलहु बन साथा ॥
नहिं बिषाद कर अवसरु आजू । बेगि करहु बन गवन समाजू ॥
तब कृपालु, सूर्यकुलके स्वामी श्रीरामचन्द्रजीने कहा कि सोच छोड़कर मेरे साथ वनको चलो ।
आज विषाद करनेका अवसर नहीं है । तुरंत वनगमनकी तैयारी करो ॥ २ ॥
कहि प्रिय बचन प्रिया समुझाई । लगे मातु पद आसिष पाई ॥
बेगि प्रजा दुख मेटब आई । जननी निठुर बिसरि जनि जाई ॥
श्रीरामचन्द्रजीने प्रिय वचन कहकर प्रियतमा सीताजीको समझाया । फिर माताके पैरों लगकर आशीर्वाद प्राप्त किया । [ माताने कहा- ] बेटा! जल्दी लौटकर प्रजाके दुःखको मिटाना और यह निठुर माता तुम्हें भूल न जाय! ॥३ ॥
फिरिहि दसा बिधि बहुरि कि मोरी । देखिहउँ नयन मनोहर जोरी ॥
सुदिन सुघरी तात कब होइहि । जननीजिअत बदन बिधु जोइहि ॥
हे विधाता! क्या मेरी दशा भी फिर पलटेगी? क्या अपने नेत्रोंसे इस मनोहर जोड़ीको फिर देख पाऊँगी? हे पुत्र! वह सुन्दर दिन और शुभ घड़ी कब होगी जब तुम्हारी जननी जीते -जी तुम्हारा चाँद - सा मुखड़ा फिर देखेगी! ॥४ ॥
दो० - बहुरि बच्छ कहि लालु कहि रघुपति रघुबर तात ।
कबहिं बोलाइ लगाइ हियँ हरषि निरखिहउँ गात ॥ ६८ ॥
हे तात! ‘ वत्स ' कहकर, ' लाल ' कहकर, ' रघुपति ' कहकर, ' रघुवर ' कहकर, मैं फिर कब तुम्हें बुलाकर हृदयसे लगाऊँगी और हर्षित होकर तुम्हारे अङ्गोंको देखूँगी! ॥ ६८ ॥
लखि सनेह कातरि महतारी । बचनु न आव बिकल भइ भारी ॥
राम प्रबोधु कीन्ह बिधि नाना । समउ सनेहु न जाइ बखाना ॥
यह देखकर कि माता स्नेहके मारे अधीर हो गयी हैं और इतनी अधिक व्याकुल हैं कि मुँहसे वचन नहीं निकलता, श्रीरामचन्द्रजीने अनेक प्रकारसे उन्हें समझाया । वह समय और स्नेह वर्णन नहीं किया जा सकता ॥१ ॥
तब जानकी सासु पग लागी । सुनिअ माय मैं परम अभागी ॥
सेवा समय दैअँ बनु दीन्हा । मोर मनोरथु सफल न कीन्हा ॥
तब जानकीजी सासके पाँव लगीं और बोलीं- हे माता! सुनिये, मैं बड़ी ही अभागिनी हूँ । आपकी सेवा करनेके समय दैवने मुझे वनवास दे दिया । मेरा मनोरथ सफल न किया ॥२ ॥
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* ** अयोध्याकाण्ड ४०१
तजब छोभु जनि छाड़िअ छोहू । करमु कठिन कछु दोसु न मोहू ॥
सुनि सिय बचन सासु अकुलानी । दसा कवनि बिधि कहौं बखानी ॥
आप क्षोभका त्याग कर दें, परंतु कृपा न छोड़ियेगा । कर्मकी गति कठिन है, मुझे भी कुछ दोष नहीं है । सीताजीके वचन सुनकर सास व्याकुल हो गयीं । उनकी दशाको मैं किस प्रकार बखानकर कहूँ! ॥३ ॥
बारहिं बार लाइ उर लीन्ही । धरि धीरजु सिख आसिष दीन्ही ॥
अचल होउ अहिवातु तुम्हारा । जब लगि गंग जमुन जल धारा ॥
उन्होंने सीताजीको बार-बार हृदयसे लगाया और धीरज धरकर शिक्षा दी और आशीर्वाद दिया कि जबतक गङ्गाजी और यमुनाजीमें जलकी धारा बहे, तबतक तुम्हारा सुहाग अचल रहे ॥४ ॥
दो० – सीतहि सासु असीस सिख दीन्हि अनेक प्रकार ।
चली नाइ पद पदुम सिरु अति हित बारहिं बार ॥ ६ ९ ॥
सीताजीको सासने अनेकों प्रकारसे आशीर्वाद और शिक्षाएँ दीं और वे ( सीताजी ) बड़े ही प्रेमसे बार- बार चरणकमलोंमें सिर नवाकर चलीं ॥६ ९ ॥
समाचार जब लछिमन पाए । ब्याकुल बिलख बदन उठि धाए ॥
कंप पुलक तन नयन सनीरा । गहे चरन अति प्रेम अधीरा ॥
जब लक्ष्मणजीने ये समाचार पाये, तब वे व्याकुल होकर उदास-मुँह उठ दौड़े । शरीर काँप रहा है, रोमाञ्च हो रहा है, नेत्र आँसुओंसे भरे हैं । प्रेमसे अत्यन्त अधीर होकर उन्होंने श्रीरामजीके चरण पकड़ लिये ॥१ ॥
कहि न सकत कछु चितवत ठाढ़े । मीनु दीन जनु जल तें काढ़े ॥
सोचु हृदयँ बिधि का होनिहारा । सबु सुखु सुकृतु सिरान हमारा ॥
वे कुछ कह नहीं सकते, खड़े- खड़े देख रहे हैं । [ ऐसे दीन हो रहे हैं ] मानो जलसे निकाले जानेपर मछली दीन हो रही हो । हृदयमें यह सोच है कि हे विधाता! क्या होनेवाला है? क्या हमारा सब सुख और पुण्य पूरा हो गया? ॥२ ॥
मो कहुँ काह कहब रघुनाथा । रखिहहिं भवन कि लेहहिं साथा ॥
राम बिलोकि बंधु कर जोरें । देह गेह सब सन तृनु तोरें ॥
मुझको श्रीरघुनाथजी क्या कहेंगे? घरपर रखेंगे या साथ ले चलेंगे? श्रीरामचन्द्रजीने भाई लक्ष्मणको हाथ जोड़े और शरीर तथा घर सभीसे नाता तोड़े हुए खड़े देखा ॥३ ॥
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* *४०२ रामचरितमानस
बोले बचनु राम नय नागर । सील सनेह सरल सुख सागर ॥
तात प्रेम बस जनि कदराहू । समुझि हृदयँ परिनाम उछाहू ॥
तब नीतिमें निपुण और शील, स्नेह, सरलता और सुखके समुद्र श्रीरामचन्द्रजी वचन बोले— हे तात! परिणाममें होनेवाले आनन्दको हृदयमें समझकर तुम प्रेमवश अधीर मत होओ ॥ ४ ॥
दो० - मातु पिता गुरु स्वामि सिख सिर धरि करहिं सुभायँ ।
लहेउ लाभु तिन्ह जनम कर नतरु जनमु जग जायँ ॥ ७० ॥
जो लोग माता, पिता, गुरु और स्वामीकी शिक्षाको स्वाभाविक ही सिर चढ़ाकर उसका पालन करते हैं, उन्होंने ही जन्म लेनेका लाभ पाया है; नहीं तो जगत्में जन्म व्यर्थ ही है ॥ ७० ॥
अस जियँ जानि सुनहु सिख भाई । करहु मातु पितु पद सेवकाई ॥
भवन भरतु रिपुसूदनु नाहीं । राउ बृद्ध मम दुखु मन माहीं ॥
हे भाई! हृदयमें ऐसा जानकर मेरी सीख सुनो और माता-पिताके चरणोंकी सेवा करो । भरत और शत्रुघ्न घरपर नहीं हैं, महाराज वृद्ध हैं और उनके मनमें मेरा दुःख है ॥१ ॥
मैं बन जाउँ तुम्हहि लेइ साथा । होइ सबहि बिधि अवध अनाथा ॥
गुरु पितु मातु प्रजा परिवारू । सब कहुँ परइ दुसह दुख भारू ॥
इस अवस्थामें मैं तुमको साथ लेकर वन जाऊँ तो अयोध्या सभी प्रकारसे अनाथ हो जायगी ।
गुरु, पिता, माता, प्रजा और परिवार सभीपर दुःखका दुःसह भार आ पड़ेगा ॥२ ॥
रहहु करहु सब कर परितोषू । नतरु तात होइहि बड़ दोषू॥
जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी । सो नृपु अवसि नरक अधिकारी ॥
अतः तुम यहीं रहो और सबका सन्तोष करते रहो । नहीं तो हे तात! बड़ा दोष होगा । जिसके राज्यमें प्यारी प्रजा दुःखी रहती है, वह राजा अवश्य ही नरकका अधिकारी होता है ॥ ३ ॥
रहहु तात असि नीति बिचारी । सुनत लखनु भए ब्याकुल भारी ॥
सिअरें बचन सूखि गए कैसें । परसत तुहिन तामरसु जैसें ॥
हे तात! ऐसी नीति विचारकर तुम घर रह जाओ । यह सुनते ही लक्ष्मणजी बहुत ही व्याकुल हो गये । इन शीतल वचनोंसे वे कैसे सूख गये, जैसे पालेके स्पर्शसे कमल सूख जाता है! ॥ ४ ॥
दो० – उतरु न आवत प्रेम बस गहे चरन अकुलाइ ।
नाथ दासु मैं स्वामि तुम्ह तजहु त काह बसाइ ॥७१ ॥
प्रेमवश लक्ष्मणजीसे कुछ उत्तर देते नहीं बनता । उन्होंने व्याकुल होकर श्रीरामजीके चरण पकड़ लिये और कहा— हे नाथ! मैं दास हूँ और आप स्वामी हैं; अतः आप मुझे छोड़ ही दें तो मेरा क्या वश है? ॥ ७१ ॥
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* ** अयोध्याकाण्ड ४०३
दीन्हि मोहि सिख नीकि गोसाईं । लागि अगम अपनी कदराईं ॥
नरबर धीर धरम धुर धारी ॥ निगम नीति कहुँ ते अधिकारी ॥
हे स्वामी! आपने मुझे सीख तो बड़ी अच्छी दी है, पर मुझे अपनी कायरतासे वह मेरे लिये अगम ( पहुँचके बाहर ) लगी । शास्त्र और नीतिके तो वे ही श्रेष्ठ पुरुष अधिकारी हैं जो धीर हैं और धर्मकी धुरीको धारण करनेवाले हैं ॥१ ॥
मैं सिसु प्रभु सनेहँ प्रतिपाला । मंदरु मेरु कि लेहिं मराला ॥
गुर पितु मातु न जानउँ काहू । कहउँ सुभाउ नाथ पतिआहू॥
मैं तो प्रभु ( आप ) के स्नेहमें पला हुआ छोटा बच्चा हूँ! कहीं हंस भी मन्दराचल या सुमेरु पर्वतको उठा सकते हैं! हे नाथ! स्वभावसे ही कहता हूँ, आप विश्वास करें, मैं आपको छोड़कर गुरु, पिता, माता किसीको भी नहीं जानता ॥ २ ॥
जहँ लगि जगत सनेह सगाई । प्रीति प्रतीति निगम निजु गाई ॥
मोरें सबइ एक तुम्ह स्वामी । दीनबंधु उर अंतरजामी ॥
जगत्में जहाँतक स्नेहका सम्बन्ध, प्रेम और विश्वास है, जिनको स्वयं वेदने गाया है — हे स्वामी! हे दीनबन्धु! हे सबके हृदयके अंदरकी जाननेवाले! मेरे तो वे सब कुछ केवल आप ही हैं ॥३ ॥
धरम नीति उपदेसिअ ताही । कीरति भूति सुगति प्रिय जाही ॥
मन क्रम बचन चरन रत होई । कृपासिंधु परिहरिअ कि सोई ॥
धर्म और नीतिका उपदेश तो उसको करना चाहिये जिसे कीर्ति, विभूति ( ऐश्वर्य ) या सद्गति प्यारी हो । किन्तु जो मन, वचन और कर्मसे चरणोंमें ही प्रेम रखता हो, हे कृपासिन्धु! क्या वह भी त्यागनेके योग्य है? ॥४ ॥
दो० - करुनासिंधु सुबंधु के सुनि मृदु बचन बिनीत ।
समुझाए उर लाइ प्रभु जानि सनेहँ सभीत ॥ ७२ ॥
दयाके समुद्र श्रीरामचन्द्रजीने भले भाईके कोमल और नम्रतायुक्त वचन सुनकर और उन्हें स्नेहके कारण डरे हुए जानकर, हृदयसे लगाकर समझाया ॥७२ ॥
मागहु बिदा मातु सन जाई । आवहु बेगि चलहु बन भाई ॥
मुदित भए सुनि रघुबर बानी । भयउ लाभ बड़ड़ गइ बड़ि हानी ॥
[और कहा- -] हे भाई! जाकर मातासे विदा माँग आओ और जल्दी वनको चलो! रघुकुलमें श्रेष्ठ श्रीरामजीकी वाणी सुनकर लक्ष्मणजी आनन्दित हो गये । बड़ी हानि दूर हो गयी और बड़ा लाभ हुआ! ॥१ ॥
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* *४०४ रामचरितमानस
हरषित हृदयँ मातु पहिं आए । मनहुँ अंध फिरि लोचन पाए ॥
जाइ जननि पग नायउ माथा । मनु रघुनंदन जानकि साथा ॥
वे हर्षित हृदयसे माता सुमित्राजीके पास आये, मानो अंधा फिरसे नेत्र पा गया हो । उन्होंने जाकर माताके चरणोंमें मस्तक नवाया । किन्तु उनका मन रघुकुलको आनन्द देनेवाले श्रीरामजी और जानकीजीके साथ था ॥ २ ॥
पूँछे मातु मलिन मन देखी । लखन कही सब कथा बिसेषी ॥
गई सहमि सुनि बचन कठोरा । मृगी देखि दव जनु चहु ओरा ॥
माताने उदास मन देखकर उनसे [ कारण ] पूछा । लक्ष्मणजीने सब कथा विस्तारसे कह सुनायी । सुमित्राजी कठोर वचनोंको सुनकर ऐसी सहम गयीं जैसे हिरनी चारों ओर वनमें आग लगी देखकर सहम जाती है ॥ ३ ॥
लखन लखेउ भा अनरथ आजू । एहिं सनेह बस करब अकाजू॥
मागत बिदा सभय सकुचाहीं । जाइ संग बिधि कहिहि कि नाहीं ॥
लक्ष्मणने देखा कि आज ( अब ) अनर्थ हुआ । ये स्नेहवश काम बिगाड़ देंगी! इसलिये वे विदा माँगते हुए डरके मारे सकुचाते हैं [ और मन -ही- मन सोचते हैं ] कि हे विधाता! माता साथ जानेको कहेंगी या नहीं ॥ ४ ॥
दो० --समुझि सुमित्रा राम सिय रूपु सुसीलु सुभाउ ।
नृप सनेहु लखि धुनेउ सिरु पापिनि दीन्ह कुदाउ ॥ ७३ ॥
सुमित्राजीने श्रीरामजी और श्रीसीताजीके रूप, सुन्दर शील और स्वभावको समझकर और उनपर राजाका प्रेम देखकर अपना सिर धुना ( पीटा ) और कहा कि पापिनी कैकेयीने बुरी तरह घात लगाया ॥ ७३ ॥
धीरजु धरेउ कुअवसर जानी । सहज सुहृद बोली मृदु बानी ॥
तात तुम्हारि मातु बैदेही ॥ पिता रामु सब भाँति सनेही ॥
परन्तु कुसमय जानकर धैर्य धारण किया और स्वभावसे ही हित चाहनेवाली सुमित्राजी कोमल वाणीसे बोलीं– हे तात! जानकीजी तुम्हारी माता हैं और सब प्रकारसे स्नेह करनेवाले श्रीरामचन्द्रजी तुम्हारे पिता हैं!॥ १ ॥
अवध तहाँ जहँ राम निवासू । तहँइँ दिवसु जहँ भानु प्रकासू॥
जौं पै सीय रामु बन जाहीं । अवध तुम्हार काजु कछु नाहीं ॥
जहाँ श्रीरामजीका निवास हो वहीं अयोध्या है । जहाँ सूर्यका प्रकाश हो वहीं दिन है । यदि निश्चय ही सीता - राम वनको जाते हैं तो अयोध्यामें तुम्हारा कुछ भी काम नहीं है ॥२ ॥
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* ** अयोध्याकाण्ड ४०५
गुरपितु मातु बंधु सुर साईं । सेइअहिं सकल प्रान की नाईं ॥
रामु प्रानप्रिय जीवन जी के । स्वारथ रहित सखा सबही के ॥
गुरु, पिता, माता, भाई, देवता और स्वामी, इन सबकी सेवा प्राणके समान करनी चाहिये । फिर श्रीरामचन्द्रजी तो प्राणोंके भी प्रिय हैं, हृदयके भी जीवन हैं और सभीके स्वार्थरहित सखा हैं ॥३ ॥
पूजनीय प्रिय परम जहाँ तें । सब मानिअहिं राम के नातें ॥
अस जियँ जानि संग बन जाहू । लेहु तात जग जीवन लाहू ॥
जगत्में जहाँतक पूजनीय और परम प्रिय लोग हैं, वे सब रामजीके नातेसे ही [ पूजनीय और परम प्रिय ] मानने योग्य हैं । हृदयमें ऐसा जानकर, हे तात! उनके साथ वन जाओ और जगत्में जीनेका लाभ उठाओ! ॥ ४ ॥
दो० - भूरि भाग भाजनु भयहु मोहि समेत बलि जाउँ
जौं तुम्हरें मन छाड़ि छलु कीन्ह राम पद ठाउँ ॥७४ ॥
मैं बलिहारी जाती हूँ, [ हे पुत्र! ] मेरे समेत तुम बड़े ही सौभाग्यके पात्र हुए, जो तुम्हारे चित्तने छल छोड़कर श्रीरामजीके चरणोंमें स्थान प्राप्त किया है ॥७४ ॥
पुत्रवती जुबती जग सोई । रघुपति भगतु जासु सुतु होई ॥
नतरु बाँझ भलि बादि बिआनी । राम बिमुख सुत तें हित जानी ॥
संसारमें वही युवती स्त्री पुत्रवती है जिसका पुत्र श्रीरघुनाथजीका भक्त हो । नहीं तो जो रामसे विमुख पुत्रसे अपना हित जानती है, वह तो बाँझ ही अच्छी । पशुकी भाँति उसका ब्याना ( पुत्र प्रसव करना) व्यर्थ ही है ॥१ ॥
तुम्हरेहिं भाग रामु बन जाहीं । दूसर हेतु तात कछु नाहीं ॥
सकल सुकृत कर बड़ फलु एहू । राम सीय पद सहज सनेहू॥
तुम्हारे ही भाग्यसे श्रीरामजी वनको जा रहे हैं । हे तात! दूसरा कोई कारण नहीं है । सम्पूर्ण पुण्योंका सबसे बड़ा फल यही है कि श्रीसीतारामजीके चरणोंमें स्वाभाविक प्रेम हो ॥२ ॥
रागु रोषु इरिषा मदु मोहू । जनि सपनेहुँ इन्ह के बस होहू॥
सकल प्रकार बिकार बिहाई । मन क्रम बचन करेहु सेवकाई ॥
राग, रोष, ईर्ष्या, मद और मोह-इनके वश स्वप्नमें भी मत होना । सब प्रकारके विकारोंका त्याग कर मन, वचन और कर्मसे श्रीसीतारामजीकी सेवा करना ॥३ ॥
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* *४०६ रामचरितमानस
तुम्ह कहुँ बन सब भाँति सुपासू । सँग पितु मातु रामु सिय जासू ॥
जेहिं न रामु बन लहहिं कलेसू । सुत सोइ करेहु इहइ उपदेसू॥
तुमको वनमें सब प्रकारसे आराम है, जिसके साथ श्रीरामजी और सीताजीरूप पिता - माता हैं । हे पुत्र! तुम वही करना जिससे श्रीरामचन्द्रजी वनमें क्लेश न पावें, मेरा यही उपदेश है ॥ ४ ॥
छं० — उपदेसु यहु जेहिं तात तुम्हरे राम सिय सुख पावहीं ।
पितु मातु प्रिय परिवार पुर सुख सुरति बन बिसरावहीं ॥
तुलसी प्रभुहि सिख देइ आयसु दीन्ह पुनि आसिष दई ।
रति होउ अबिरल अमल सिय रघुबीर पद नित नित नई ॥
हे तात! मेरा यही उपदेश है ( अर्थात् तुम वही करना) जिससे वनमें तुम्हारे कारण श्रीरामजी और सीताजी सुख पावें और पिता, माता, प्रिय परिवार तथा नगरके सुखोंकी याद भूल जायँ। तुलसीदासजी कहते हैं कि सुमित्राजीने इस प्रकार हमारे प्रभु ( श्रीलक्ष्मणजी ) को शिक्षा देकर [ वन जानेकी ] आज्ञा दी और फिर यह आशीर्वाद दिया कि श्रीसीताजी और श्रीरघुवीरजीके चरणोंमें तुम्हारा निर्मल ( निष्काम और अनन्य ) एवं प्रगाढ़ प्रेम नित-नित नया हो!
सो०- मातु चरन सिरु नाइ चले तुरत संकित हृदयँ ।
बागुर बिषम तोराइ मनहुँ भाग मृगु भाग बस ॥ ७५ ॥
माताके चरणोंमें सिर नवाकर हृदयमें डरते हुए [कि अब भी कोई विघ्न न आ जाय ] लक्ष्मणजी तुरंत इस तरह चल दिये जैसे सौभाग्यवश कोई हिरन कठिन फंदेको तुड़ाकर भाग निकला हो ॥ ७५ ॥
गए लखनु जहँ जानकिनाथू । भे मन मुदित पाइ प्रिय साथू॥
बंदि राम सिय चरन सुहाए । चले संग नृपमंदिर आए ॥
लक्ष्मणजी वहाँ गये जहाँ श्रीजानकीनाथजी थे, और प्रियका साथ पाकर मनमें बड़े ही प्रसन्न हुए । श्रीरामजी और सीताजीके सुन्दर चरणोंकी वन्दना करके वे उनके साथ चले और राजभवनमें आये ॥१ ॥
कहहिं परसपर पुर नर नारी । भलि बनाइ बिधि बात बिगारी ॥
तन कृस मन दुखु बदन मलीने । बिकल मनहुँ माखी मधु छीने ॥
नगरके स्त्री- पुरुष आपसमें कह रहे हैं कि विधाताने खूब बनाकर बात बिगाड़ी! उनके शरीर दुबले, मन दुःखी और मुख उदास हो रहे हैं । वे ऐसे व्याकुल हैं जैसे शहद छीन लिये जानेपर शहदकी मक्खियाँ व्याकुल हों ॥ २ ॥
कर मीजहिं सिरु धुनि पछिताहीं । जनु बिनु पंख बिहग अकुलाहीं ॥
भइ बड़ि भीर भूप दरबारा । बरनि न जाइ बिषादु अपारा ॥
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* ** अयोध्याकाण्ड ४०७ सब हाथ मल रहे हैं और सिर धुनकर ( पीटकर ) पछता रहे हैं । मानो बिना पंखके पक्षी व्याकुल हो रहे हैं । राजद्वारपर बड़ी भीड़ हो रही है । अपार विषादका वर्णन नहीं किया जा सकता ॥ ३ ॥
सचिवँ उठाइ राउ बैठारे । कहि प्रिय बचन रामु पगु धारे ॥
सिय समेत दोउ तनय निहारी । ब्याकुल भयउ भूमिपति भारी ॥
' श्रीरामचन्द्रजी पधारे हैं ', ये प्रिय वचन कहकर मन्त्रीने राजाको उठाकर बैठाया । सीतासहित दोनों पुत्रोंको [ वनके लिये तैयार ] देखकर राजा बहुत व्याकुल हुए ॥४ ॥
दो० – सीय सहित सुत सुभग दोउ देखि देखि अकुलाइ ।
बारहिं बार सनेह बस राउ लेइ उर लाइ ॥ ७६ ॥
सीतासहित दोनों सुन्दर पुत्रोंको देख-देखकर राजा अकुलाते हैं और स्नेहवश बारंबार उन्हें हृदयसे लगा लेते हैं ॥ ७६ ॥
सकइ न बोलि बिकल नरनाहू । सोक जनित उर दारुन दाहू ॥
नाइ सीसु पद अति अनुरागा । उठि रघुबीर बिदा तब मागा ॥
राजा व्याकुल हैं, बोल नहीं सकते । हृदयमें शोकसे उत्पन्न हुआ भयानक सन्ताप है । तब रघुकुलके वीर श्रीरामचन्द्रजीने अत्यन्त प्रेमसे चरणोंमें सिर नवाकर उठकर विदा माँगी- ॥१ ॥
पितु असीस आयसु मोहि दीजै । हरष समय बिसमउ कत कीजै ॥
तात किएँ प्रिय प्रेम प्रमादू । जसु जग जाइ होइ अपबादू ॥
हे पिताजी! मुझे आशीर्वाद और आज्ञा दीजिये । हर्षके समय आप शोक क्यों कर रहे हैं? हे तात! प्रियके प्रेमवश प्रमाद ( कर्तव्यकर्ममें त्रुटि) करनेसे जगत्में यश जाता रहेगा और निन्दा होगी ॥ २ ॥
सुनि सनेह बस उठि नरनाहाँ । बैठारे रघुपति गहि बाहाँ ॥
सुनहु तात तुम्ह कहुँ मुनि कहहीं । रामु चराचर नायक अहहीं ॥
यह सुनकर स्नेहवश राजाने उठकर श्रीरघुनाथजीकी बाँह पकड़कर उन्हें बैठा लिया और कहा— हे तात! सुनो, तुम्हारे लिये मुनिलोग कहते हैं कि श्रीराम चराचरके स्वामी हैं ॥ ३ ॥
सुभ अरु असुभ करम अनुहारी । ईसु देइ फलु हृदयँ बिचारी ॥
करइ जो करम पाव फल सोई । निगम नीति असि कह सबु कोई ॥
शुभ और अशुभ कर्मोंके अनुसार ईश्वर हृदयमें विचारकर फल देता है । जो कर्म करता है वही फल पाता है । ऐसी वेदकी नीति है, यह सब कोई कहते हैं ॥ ४ ॥
दो० - औरु करै अपराधु कोउ और पाव फल भोगु ।
अति बिचित्र भगवंत गति को जग जानै जोगु ॥ ७७ ॥
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* *४०८ रामचरितमानस [ किन्तु इस अवसरपर तो इसके विपरीत हो रहा है, ] अपराध तो कोई और ही करे और उसके फलका भोग कोई और ही पावे । भगवान्की लीला बड़ी ही विचित्र है, उसे जाननेयोग्य जगत्में कौन है? ॥ ७७ ॥
रायँ राम राखन हित लागी । बहुत उपाय किए छलु त्यागी ॥
लखी राम रुख रहत न जाने । धरम धुरंधर धीर सयाने ॥
राजाने इस प्रकार श्रीरामचन्द्रजीको रखनेके लिये छल छोड़कर बहुत-से उपाय किये । पर जब उन्होंने धर्मधुरन्धर, धीर और बुद्धिमान् श्रीरामजीका रुख देख लिया और वे रहते हुए न जान पड़े,॥ १ ॥
तब नृप सीय लाइ उर लीन्ही । अति हित बहुत भाँति सिख दीन्ही ॥
कहि बन के दुख दुसह सुनाए । सासु ससुर पितु सुख समुझाए ॥
तब राजाने सीताजीको हृदयसे लगा लिया और बड़े प्रेमसे बहुत प्रकारकी शिक्षा दी । वनके दुःसह दुःख कहकर सुनाये । फिर सास, ससुर तथा पिताके [ पास रहनेके ] सुखोंको समझाया ॥ २ ॥
सिय मनु राम चरन अनुरागा । घरु न सुगमु बनु बिषमु न लागा ॥
औरउ सबहिं सीय समुझाई । कहि कहि बिपिन बिपति अधिकाई ॥
परन्तु सीताजीका मन श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंमें अनुरक्त था । इसलिये उन्हें घर अच्छा नहीं लगा और न वन भयानक लगा । फिर और सब लोगोंने भी वनमें विपत्तियोंकी अधिकता बता - बताकर सीताजीको समझाया ॥ ३ ॥
सचिव नारि गुर नारि सयानी । सहित सनेह कहहिं मृदु बानी ॥
तुम्ह कहुँ तौ न दीन्ह बनबासू । करहु जो कहहिं ससुर गुर सासू॥
मन्त्री सुमन्त्रजीकी पत्नी और गुरु वसिष्ठजीकी स्त्री अरुन्धतीजी तथा और भी चतुर स्त्रियाँ स्नेहके साथ कोमल वाणीसे कहती हैं कि तुमको तो [ राजाने ] वनवास दिया नहीं है । इसलिये जो ससुर, गुरु और सास कहें, तुम तो वही करो ॥४ ॥
दो० – सिख सीतलि हित मधुर मृदु सुनि सीतहिन सोहानि ।
सरद चंद चंदिनि लगत जनु चकई अकुलानि ॥ ७८ ॥
यह शीतल, हितकारी, मधुर और कोमल सीख सुननेपर सीताजीको अच्छी नहीं लगी । [ वे इस प्रकार व्याकुल हो गयीं ] मानो शरद् ऋतुके चन्द्रमाकी चाँदनी लगते ही चकई व्याकुल हो उठी हो ॥७८ ॥
सीय सकुच बस उतरु न देई । सो सुनि तमकि उठी कैकेई ॥
मुनि पट भूषन भाजन आनी । आगें धरि बोली मृदु बानी ॥