श्रीरामचरितमानस — पृष्ठ 411–420
श्रीरामचरितमानस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 411–420
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* ** अयोध्याकाण्ड ४० ९ सीताजी संकोचवश उत्तर नहीं देतीं । इन बातोंको सुनकर कैकेयी तमककर उठी । उसने मुनियोंके वस्त्र, आभूषण ( माला, मेखला आदि) और बर्तन ( कमण्डलु आदि ) लाकर श्रीरामचन्द्रजीके आगे रख दिये और कोमल वाणीसे कहा—॥१ ॥
नृपहि प्रानप्रिय तुम्ह रघुबीरा । सील सनेह न छाड़िहि भीरा ॥
सुकृतु सुजसु परलोकु नसाऊ । तुम्हहि जान बन कहिहि न काऊ ॥
हे रघुवीर! राजाको तुम प्राणोंके समान प्रिय हो । भीरु ( प्रेमवश दुर्बल हृदयके ) राजा शील और स्नेह नहीं छोड़ेंगे! पुण्य, सुन्दर यश और परलोक चाहे नष्ट हो जाय, पर तुम्हें वन जानेको वे कभी न कहेंगे ॥२ ॥
अस बिचारि सोइ करहु जो भावा । राम जननि सिख सुनि सुखु पावा ॥
भूपहि बचन बानसम लागे । करहिं न प्रान पयान अभागे ॥
ऐसा विचारकर जो तुम्हें अच्छा लगे वही करो । माताकी सीख सुनकर श्रीरामचन्द्रजीने [ बड़ा ] सुख पाया । परन्तु राजाको ये वचन बाणके समान लगे । [ वे सोचने लगे ] अब भी अभागे प्राण [ क्यों ] नहीं निकलते! ॥ ३ ॥
लोग बिकल मुरुछित नरनाहू । काह करिअ कछु सूझ न काहू ॥
रामु तुरत मुनि बेषु बनाई । चले जनक जननिहि सिरु नाई ॥
राजा मूर्च्छित हो गये, लोग व्याकुल हैं । किसीको कुछ सूझ नहीं पड़ता कि क्या करें । श्रीरामचन्द्रजी तुरंत मुनिका वेष बनाकर और माता-पिताको सिर नवाकर चल दिये ॥४ ॥
दो० - सजि बन साजु समाजु सबु बनिता बंधु समेत ।
बंदिबिप्र गुरचरन प्रभु चले करि सबहि अचेत ॥ ७९ ॥
वनका सब साज -सामान सजकर ( वनके लिये आवश्यक वस्तुओंको साथ लेकर) श्रीरामचन्द्रजी स्त्री ( श्रीसीताजी ) और भाई ( लक्ष्मणजी ) - सहित, ब्राह्मण और गुरुके चरणोंकी वन्दना करके सबको अचेत करके चले ॥ ७९ ॥
निकसि बसिष्ठ द्वार भए ठाढ़े । देखे लोग बिरह दव दाढ़े ॥
कहि प्रिय बचन सकल समुझाए । बिप्र बृंद रघुबीर बोलाए । राजमहलसे निकलकर श्रीरामचन्द्रजी वसिष्ठजीके दरवाजेपर जा खड़े हुए और देखा कि सब लोग विरहकी अग्निमें जल रहे हैं । उन्होंने प्रिय वचन कहकर सबको समझाया । फिर श्रीरामचन्द्रजीने ब्राह्मणोंकी मण्डलीको बुलाया ॥ १ ॥
गुर सन कहि बरषासन दीन्हे । आदर दान बिनय बस कीन्हे ॥
जाचक दान मान संतोषे ॥ मीत पुनीत प्रेम परितोषे ॥
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* *४१० रामचरितमानस गुरुजीसे कहकर उन सबको वर्षाशन ( वर्षभरका भोजन ) दिये और आदर, दान तथा विनयसे उन्हें वशमें कर लिया । फिर याचकोंको दान और मान देकर सन्तुष्ट किया तथा मित्रोंको पवित्र प्रेमसे प्रसन्न किया ॥२ ॥
दासीं दास बोलाइ बहोरी । गुरहि सौंपि बोले कर जोरी ॥
सब कै सार सँभार गोसाईं । करबि जनक जननी की नाईं ॥
फिर दास -दासियोंको बुलाकर उन्हें गुरुजीको सौंपकर हाथ जोड़कर बोले - हे गुसाईं! इन सबकी माता-पिताके समान सारर--सँभार ( देख -रेख) करते रहियेगा ॥ ३ ॥
बारहिं बार जोरि जुग पानी । कहत रामु सब सन मृदु बानी ॥
सोइ सब भाँति मोर हितकारी । जेहि तें रहै भुआल सुखारी ॥
श्रीरामचन्द्रजी बार - बार दोनों हाथ जोड़कर सबसे कोमल वाणी कहते हैं कि मेरा सब प्रकारसे हितकारी मित्र वही होगा जिसकी चेष्टासे महाराज सुखी रहें ॥ ४ ॥
दो० – मातु सकल मोरे बिरहँ जेहिं न होहिं दुख दीन ।
सोइ उपाउ तुम्ह करेहु सब पुर जन परम प्रबीन ॥ ८० ॥
हे परम चतुर पुरवासी सज्जनो! आपलोग सब वही उपाय करियेगा जिससे मेरी सब माताएँ मेरे विरहके दुःखसे दुःखी न हों ॥ ८० ॥
एहि बिधि राम सबहि समुझावा । गुर पद पदुम हरषि सिरु नावा ॥
गनपति गौरि गिरीसु मनाई ॥ चले असीस पाइ रघुराई ॥
इस प्रकार श्रीरामजीने सबको समझाया और हर्षित होकर गुरुजीके चरणकमलोंमें सिर नवाया । फिर गणेशजी, पार्वतीजी और कैलासपति महादेवजीको मनाकर तथा आशीर्वाद पाकर श्रीरघुनाथजी चले ॥१ ॥
राम चलत अति भयउ बिषादू । सुनि न जाइ पुर आरत नादू॥
कुसगुन लंक अवध अति सोकू । हरष बिषाद बिबस सुरलोकू ॥
श्रीरामजीके चलते ही बड़ा भारी विषाद हो गया । नगरका आर्तनाद ( हाहाकार) सुना नहीं जाता । लङ्कामें बुरे शकुन होने लगे, अयोध्यामें अत्यन्त शोक छा गया और देवलोकमें सब हर्ष और विषाद दोनोंके वशमें हो गये । [ हर्ष इस बातका था कि अब राक्षसोंका नाश होगा और विषाद अयोध्यावासियोंके शोकके कारण था । ] ॥ २ ॥
गइ मुरुछा तब भूपति जागे । बोलि सुमंत्र कहन अस लागे ॥
रामु चले बन प्रान न जाहीं । केहि सुख लागि रहत तन माहीं ॥
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* * अयोध्याकाण्ड ४११ मूर्छा दूर हुई, तब राजा जागे और सुमन्त्रको बुलाकर ऐसा कहने लगे– श्रीराम वनको चले गये, पर मेरे प्राण नहीं जा रहे हैं । न जाने ये किस सुखके लिये शरीरमें टिक रहे हैं ॥३ ॥
एहि तें कवन ब्यथा बलवाना । जो दुखु पाइ तजहिं तनु प्राना ॥
पुनि धरि धीर कहइ नरनाहू । लै रथु संग सखा तुम्ह जाहू ॥
इससे अधिक बलवती और कौन-सी व्यथा होगी जिस दुःखको पाकर प्राण शरीरको छोड़ेंगे ।
फिर धीरज धरकर राजाने कहा-हे सखा! तुम रथ लेकर श्रीरामके साथ जाओ ॥ ४ ॥
दो० - सुठि सुकुमार कुमार दोउ जनकसुता सुकुमारि ।
रथ चढ़ाइ देखराइ बनु फिरेहु गएँ दिन चारि॥८१ ॥
अत्यन्त सुकुमार दोनों कुमारोंको और सुकुमारी जानकीको रथमें चढ़ाकर, वन दिखलाकर चार दिनके बाद लौट आना ॥ ८१ ॥
जौं नहिं फिरहिं धीर दोउ भाई । सत्यसंध दृढ़ब्रत रघुराई ॥
तौ तुम्ह बिनय करेहु कर जोरी । फेरिअ प्रभु मिथिलेसकिसोरी ॥
यदि धैर्यवान् दोनों भाई न लौटें– क्योंकि श्रीरघुनाथजी प्रणके सच्चे और दृढ़तासे नियमका पालन करनेवाले हैं — तो तुम हाथ जोड़कर विनती करना कि हे प्रभो! जनककुमारी सीताजीको तो लौटा दीजिये ॥१ ॥
जब सिय कानन देखि डेराई । कहेहु मोरि सिख अवसरु पाई ॥
सासु ससुर अस कहेउ सँदेसू । पुत्रि फिरिअ बन बहुत कलेसू॥
जब सीता वनको देखकर डरें, तब मौका पाकर मेरी यह सीख उनसे कहना कि तुम्हारे सास और ससुरने ऐसा सन्देश कहा है कि हे पुत्री! तुम लौट चलो, वनमें बहुत क्लेश हैं ॥२ ॥
पितुगृह कबहुँ कबहुँ ससुरारी । रहेहु जहाँ रुचि होइ तुम्हारी ॥
एहि बिधि करेहु उपाय कदंबा । फिरइ त होइ प्रान अवलंबा ॥
कभी पिताके घर, कभी ससुराल, जहाँ तुम्हारी इच्छा हो, वहीं रहना । इस प्रकार तुम बहुत-से उपाय करना । यदि सीताजी लौट आयीं तो मेरे प्राणोंको सहारा हो जायगा ॥३ ॥
नाहिं त मोर मरनु परिनामा । कछु न बसाइ भएँ बिधि बामा ॥
अस कहि मुरुछि परा महि राऊ । रामु लखनु सिय आनि देखाऊ ॥
नहीं तो अन्तमें मेरा मरण ही होगा । विधाताके विपरीत होनेपर कुछ वश नहीं चलता । हा! राम, लक्ष्मण और सीताको लाकर दिखाओ । ऐसा कहकर राजा मूर्छित होकर पृथ्वीपर गिर पड़े ॥४ ॥
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* *४१२ रामचरितमानस
दो० – पाइ रजायसु नाइ सिरु रथु अति बेग बनाइ ।
गयउ जहाँ बाहेर नगर सीय सहित दोउ भाइ ॥ ८२ ॥
सुमन्त्रजी राजाकी आज्ञा पाकर, सिर नवाकर और बहुत जल्दी रथ जुड़वाकर वहाँ गये जहाँ नगरके बाहर सीताजीसहित दोनों भाई थे ॥ ८२ ॥
तब सुमंत्र नृप बचन सुनाए । करि बिनती रथ रामु चढ़ाए ॥
चढ़ि रथ सीय सहित दोउ भाई । चले हृदयँ अवधहि सिरु नाई ॥
तब ( वहाँ पहुँचकर ) सुमन्त्रने राजाके वचन श्रीरामचन्द्रजीको सुनाये और विनती करके उनको रथपर चढ़ाया । सीताजीसहित दोनों भाई रथपर चढ़कर हृदयमें अयोध्याको सिर नवाकर चले ॥१ ॥
चलत रामु लखि अवध अनाथा । बिकल लोग सब लागे साथा ॥
कृपासिंधु बहुबिधि समुझावहिं । फिरहिं प्रेम बस पुनि फिरि आवहिं ॥
श्रीरामचन्द्रजीको जाते हुए और अयोध्याको अनाथ [ होते हुए ] देखकर सब लोग व्याकुल होकर उनके साथ हो लिये । कृपाके समुद्र श्रीरामजी उन्हें बहुत तरहसे समझाते हैं, तो वे [ अयोध्याकी ओर ] लौट जाते हैं; परन्तु प्रेमवश फिर लौट आते हैं ॥२ ॥
लागति अवध भयावनि भारी । मानहुँ कालराति अँधिआरी ॥
घोर जंतु सम पुर नर नारी । डरपहिं एकहि एक निहारी ॥
अयोध्यापुरी बड़ी डरावनी लग रही है । मानो अन्धकारमयी कालरात्रि ही हो । नगरके नर-नारी भयानक जन्तुओंके समान एक-दूसरेको देखकर डर रहे हैं ॥ ३ ॥
घर मसान परिजन जनु भूता । सुत हित मीत मनहुँ जमदूता ॥
बान्ह बिटप बेलि कुम्हिलाहीं । सरित सरोबर देखि न जाहीं ॥
घर श्मशान, कुटुम्बी भूत-प्रेत और पुत्र, हितैषी और मित्र मानो यमराजके दूत हैं । बगीचोंमें वृक्ष और बेलें कुम्हला रही हैं । नदी और तालाब ऐसे भयानक लगते हैं कि उनकी ओर देखा भी नहीं जाता ॥ ४ ॥
दो० - हय गय कोटिन्ह केलिमृग पुरपसु चातक मोर ।
पिक रथांग सुक सारिका सारस हंस चकोर ॥ ८३ ॥
करोड़ों घोड़े, हाथी, खेलनेके लिये पाले हुए हिरन, नगरके [ गाय, बैल, बकरी आदि] पशु, पपीहे, मोर, कोयल, चकवे, तोते, मैना, सारस, हंस और चकोर- ॥८३ ॥
राम बियोग बिकल सब ठाढ़े । जहँ तहँ मनहुँ चित्र लिखि काढ़े ॥
नगरु सफल बनु गहबर भारी । खग मृग बिपुल सकल नर नारी ॥
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* * अयोध्याकाण्ड ४१३ श्रीरामजीके वियोगमें सभी व्याकुल हुए जहाँ- तहाँ [ ऐसे चुपचाप स्थिर होकर ] खड़े हैं, मानो तसवीरोंमें लिखकर बनाये हुए हैं । नगर मानो फलोंसे परिपूर्ण बड़ा भारी सघन वन था । नगरनिवासी सब स्त्री - पुरुष बहुत -से पशु - पक्षी थे । ( अर्थात् अवधपुरी अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष चारों फलोंको देनेवाली नगरी थी और सब स्त्री- पुरुष सुखसे उन फलोंको प्राप्त करते थे । ) ॥ १ ॥
बिधि कैकई किरातिनि कीन्ही । जेहिं दव दुसह दसहुँ दिसि दीन्ही ॥
सहि न सके रघुबर बिरहागी । चले लोग सब ब्याकुल भागी ॥
विधाताने कैकेयीको भीलनी बनाया, जिसने दसों दिशाओंमें दुःसह दावाग्नि ( भयानक आग) लगा दी । श्रीरामचन्द्रजीके विरहकी इस अग्निको लोग सह न सके । सब लोग व्याकुल होकर भाग चले ॥२ ॥
सबहिं बिचारु कीन्ह मन माहीं । राम लखन सिय बिनु सुख नाहीं ॥
जहाँ रामु तहँ सबुइ समाजू । बिनु रघुबीर अवध नहिं काजू॥
सबने मनमें विचार कर लिया कि श्रीरामजी, लक्ष्मणजी और सीताजीके बिना सुख नहीं है । जहाँ श्रीरामजी रहेंगे, वहीं सारा समाज रहेगा । श्रीरामचन्द्रजीके बिना अयोध्यामें हमलोगोंका कुछ काम नहीं है ॥ ३ ॥
चले साथ अस मंत्र दृढ़ाई । सुर दुर्लभ सुख सदन बिहाई ॥
राम चरन पंकज प्रिय जिन्हही । बिषय भोग बस करहिं कि तिन्ही ॥
ऐसा विचार दृढ़ करके देवताओंको भी दुर्लभ सुखोंसे पूर्ण घरोंको छोड़कर सब , उन्हें क्या कभी श्रीरामचन्द्रजीके साथ चल पड़े । जिनको श्रीरामजीके चरणकमल प्यारे हैं विषयभोग वशमें कर सकते हैं ॥४ ॥
दो० - बालक बृद्ध बिहाइ गृहँ लगे लोग सब साथ ।
तमसा तीर निवासु किय प्रथम दिवस रघुनाथ ॥ ८४ ॥
बच्चों और बूढ़ोंको घरोंमें छोड़कर सब लोग साथ हो लिये । पहले दिन श्रीरघुनाथजीने तमसा नदीके तीरपर निवास किया ॥ ८४ ॥
रघुपति प्रजा प्रेमबस देखी । सदय हृदयँ दुखु भयउ बिसेषी ॥
करुनामय रघुनाथ गोसाँई । बेगि पाइअहिं पीर पराई ॥
प्रजाको प्रेमवश देखकर श्रीरघुनाथजीके दयालु हृदयमें बड़ा दुःख हुआ । प्रभु श्रीरघुनाथजी करुणामय हैं । परायी पीड़ाको वे तुरंत पा जाते हैं ( अर्थात् दूसरेका दुःख देखकर वे तुरंत स्वयं दुःखित हो जाते हैं ) ॥ १ ॥
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* *४१४ रामचरितमानस
कहि सप्रेम मृदु बचन सुहाए । बहुबिधि राम लोग समुझाए ॥
किए धरम उपदेस घनेरे । लोग प्रेम बस फिरहिं न फेरे ॥
प्रेमयुक्त कोमल और सुन्दर वचन कहकर श्रीरामजीने बहुत प्रकारसे लोगोंको समझाया और बहुतेरे धर्मसम्बन्धी उपदेश दिये; परन्तु प्रेमवश लोग लौटाये लौटते नहीं ॥२ ॥
सीलु सनेहु छाड़ि नहिं जाई । असमंजस बस भे रघुराई ॥
लोग सोग श्रम बस गए सोई । कछुक देवमायाँ मति मोई ॥
शील और स्नेह छोड़ा नहीं जाता । श्रीरघुनाथजी असमञ्जसके अधीन हो गये ( दुविधामें पड़ गये ) । शोक और परिश्रम ( थकावट ) के मारे लोग सो गये और कुछ देवताओंकी मायासे भी उनकी बुद्धि मोहित हो गयी ॥३ ॥
जबहिं जाम जुग जामिनि बीती । राम सचिव सन कहेउ सप्रीती ॥
खोज मारि रथ हाँकहु ताता । आन उपायँ बनिहि नहिं बाता ॥
जब दो पहर रात बीत गयी, तब श्रीरामचन्द्रजीने प्रेमपूर्वक मन्त्री सुमन्त्रसे कहा- हे तात! रथके खोज मारकर ( अर्थात् पहियोंके चिह्नोंसे दिशाका पता न चले इस प्रकार ) रथको हाँकिये । और किसी उपायसे बात नहीं बनेगी ॥ ४ ॥
दो० - राम लखन सिय जान चढ़ि संभु चरन सिरु नाइ ।
सचिवँ चलायउ तुरत रथु इत उत खोज दुराइ ॥ ८५ ॥
शंकरजीके चरणोंमें सिर नवाकर श्रीरामजी, लक्ष्मणजी और सीताजी रथपर सवार हुए । मन्त्रीने तुरंत ही रथको, इधर- उधर खोज छिपाकर चला दिया ॥ ८५ ॥
जागे सकल लोग भएँ भोरू । गे रघुनाथ भयउ अति सोरू ॥
रथ कर खोज कतहुँ नहिं पावहिं । राम राम कहि चहुँ दिसि धावहिं ॥
सबेरा होते ही सब लोग जागे, तो बड़ा शोर मचा कि श्रीरघुनाथजी चले गये । कहीं रथका खोज नहीं पाते, सब ‘ हा राम! हा राम! ' पुकारते हुए चारों ओर दौड़ रहे हैं ॥१ ॥
मनहुँ बारिनिधि बूड़ जहाजू । भयउ बिकल बड़ बनिक समाजू॥
एकहि एक देहिं उपदेसू । तजे राम हम जानि कलेसू॥
मानो समुद्रमें जहाज डूब गया हो, जिससे व्यापारियोंका समुदाय बहुत ही व्याकुल हो उठा हो । वे एक- दूसरेको उपदेश देते हैं कि श्रीरामचन्द्रजीने, हमलोगोंको क्लेश होगा, यह जानकर छोड़ दिया है ॥ २ ॥
निंदहिं आपु सराहहिं मीना । धिग जीवनु रघुबीर बिहीना ॥
जौं पै प्रिय बियोगु बिधि कीन्हा । तौ कस मरनु न मागें दीन्हा ॥
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* ** अयोध्याकाण्ड ४१५ वे लोग अपनी निन्दा करते हैं और मछलियोंकी सराहना करते हैं । [कहते हैं— ] श्रीरामचन्द्रजीके बिना हमारे जीनेको धिक्कार है । विधाताने यदि प्यारेका वियोग ही रचा, तो फिर उसने माँगनेपर मृत्यु क्यों नहीं दी! ॥ ३ ॥
एहि बिधि करत प्रलाप कलापा । आए अवध भरे परितापा ॥
बिषम बियोगु न जाइ बखाना । अवधि आस सब राखहिं प्राना ॥
इस प्रकार बहुत -से प्रलाप करते हुए वे सन्तापसे भरे हुए अयोध्याजीमें आये । उन लोगोंके विषम वियोगकी दशाका वर्णन नहीं किया जा सकता । [ चौदह सालकी ] अवधिकी आशासे ही वे प्राणोंको रख रहे हैं ॥४ ॥
दो० –राम दरस हित नेम ब्रत लगे करन नर नारि ।
मनहुँ कोक कोकी कमल दीन बिहीन तमारि ॥ ८६ ॥
[ सब ] स्त्री- पुरुष श्रीरामचन्द्रजीके दर्शनके लिये नियम और व्रत करने लगे और ऐसे दुःखी हो गये जैसे चकवा, चकवी और कमल सूर्यके बिना दीन हो जाते हैं ॥८६ ॥
सीता सचिव सहित दोउ भाई । संगबेरपुर पहुँचे जाई ॥
उतरे राम देवसरि देखी । कीन्ह दंडवत हरषु बिसेषी ॥
सीताजी और मन्त्रीसहित दोनों भाई श्रृंगवेरपुर जा पहुँचे । वहाँ गङ्गाजीको देखकर श्रीरामजी रथसे उतर पड़े और बड़े हर्षके साथ उन्होंने दण्डवत् की ॥१ ॥
लखन सचिवँ सियँ किए प्रनामा । सबहि सहित सुखु पायउ रामा ॥
गंग सकल मुद मंगल मूला । सब सुख करनि हरनि सब सूला ॥
लक्ष्मणजी, सुमन्त्र और सीताजीने भी प्रणाम किया । सबके साथ श्रीरामचन्द्रजीने सुख पाया । गङ्गाजी समस्त आनन्द - मङ्गलोंकी मूल हैं । वे सब सुखोंकी करनेवाली और सब पीड़ाओंकी हरनेवाली हैं ॥ २ ॥
कहि कहि कोटिक कथा प्रसंगा । रामु बिलोकहिं गंग तरंगा ॥
सचिवहि अनुजहि प्रियहि सुनाई । बिबुध नदी महिमा अधिकाई ॥
अनेक कथा- प्रसङ्ग कहते हुए श्रीरामजी गङ्गाजीकी तरङ्गोंको देख रहे हैं । उन्होंने मन्त्रीको, छोटे भाई लक्ष्मणजीको और प्रिया सीताजीको देवनदी गङ्गाजीकी बड़ी महिमा सुनायी ॥ ३ ॥
मज्जनु कीन्ह पंथ श्रम गयऊ । सुचि जलु पिअत मुदित मन भयऊ ॥
सुमिरत जाहि मिटइ श्रम भारू । तेहि श्रम यह लौकिक ब्यवहारू ॥
इसके बाद सबने स्नान किया, जिससे मार्गका सारा श्रम ( थकावट) दूर हो गया और पवित्र जल पीते ही मन प्रसन्न हो गया । जिनके स्मरणमात्रसे [ बार- बार जन्मने और मरनेका ] महान् श्रम मिट जाता है, उनको ‘ श्रम ' होना- यह केवल लौकिक व्यवहार ( नरलीला) है ॥४ ॥
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* *४१६ रामचरितमानस
दो०– सुद्ध सच्चिदानंदमय कंद भानुकुल केतु ।
चरित करत नर अनुहरत संसृति सागर सेतु ॥ ८७ ॥
शुद्ध ( प्रकृतिजन्य त्रिगुणोंसे रहित, मायातीत दिव्य मङ्गलविग्रह) सच्चिदानन्द- कन्दस्वरूप सूर्यकुलके ध्वजारूप भगवान् श्रीरामचन्द्रजी मनुष्योंके सदृश ऐसे चरित्र करते हैं जो संसाररूपी समुद्रके पार उतरनेके लिये पुलके समान हैं ॥ ८७ ॥
यह सुधि गुहँ निषाद जब पाई । मुदित लिए प्रिय बंधु बोलाई ॥
लिए फल मूल भेंट भरि भारा । मिलन चलेउ हियँ हरषु अपारा ॥
जब निषादराज गुहने यह खबर पायी, तब आनन्दित होकर उसने अपने प्रियजनों और भाई- बन्धुओंको बुला लिया और भेंट देनेके लिये फल, मूल ( कन्द ) लेकर और उन्हें भारों ( बहँगियों ) -में भरकर मिलनेके लिये चला । उसके हृदयमें हर्षका पार नहीं था ॥१ ॥
करि दंडवत भेंट धरि आगें । प्रभुहि बिलोकत अति अनुरागें ॥
सहज सनेह बिबस रघुराई । पूँछी कुसल निकट बैठाई ॥
दण्डवत् करके भेंट सामने रखकर वह अत्यन्त प्रेमसे प्रभुको देखने लगा । श्रीरघुनाथजीने स्वाभाविक स्नेहके वश होकर उसे अपने पास बैठाकर कुशल पूछी ॥ २ ॥
नाथ कुसल पद पंकज देखें । भयउँ भागभाजन जन लेखें ॥
देव धरनि धनु धामु तुम्हारा । मैं जनु नीचु सहित परिवारा ॥
निषादराजने उत्तर दिया– हे नाथ! आपके चरणकमलके दर्शनसे ही कुशल है [ आपके चरणारविन्दोंके दर्शनकर] आज मैं भाग्यवान् पुरुषोंकी गिनतीमें आ गया । हे देव! यह पृथ्वी, धन और घर सब आपका है । मैं तो परिवारसहित आपका नीच सेवक हूँ॥३ ॥
कृपा करिअ पुर धारिअ पाऊ ॥ थापिअ जनु सबु लोगु सिहाऊ ॥
कहेहु सत्य सबु सखा सुजाना । मोहि दीन्ह पितु आयसु आना ॥
अब कृपा करके पुर ( शृंगवेरपुर ) - में पधारिये और इस दासकी प्रतिष्ठा बढ़ाइये, जिससे सब लोग मेरे भाग्यकी बड़ाई करें । श्रीरामचन्द्रजीने कहा-हे सुजान सखा! तुमने जो कुछ कहा सब सत्य है । परन्तु पिताजीने मुझको और ही आज्ञा दी है ॥४ ॥
दो० – बरष चारिदस बासु बन मुनि ब्रत बेषु अहारु ।
ग्राम बासु नहिं उचित सुनि गुहहि भयउ दुखु भारु ॥ ८८ ॥
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* * अयोध्याकाण्ड ४१७ [ उनके आज्ञानुसार ] मुझे चौदह वर्षतक मुनियोंका व्रत और वेष धारणकर और मुनियोंके योग्य आहार करते हुए वनमें ही बसना है, गाँवके भीतर निवास करना उचित नहीं है । यह सुनकर गुहको बड़ा दुःख हुआ ॥ ८८ ॥
राम लखन सिय रूप निहारी । कहहिं सप्रेम ग्राम नर नारी ॥
ते पितु मातु कहहु सखि कैसे । जिन्ह पठए बन बालक ऐसे ॥
श्रीरामजी, लक्ष्मणजी और सीताजीके रूपको देखकर गाँवके स्त्री- पुरुष प्रेमके साथ चर्चा करते हैं । [ कोई कहती है— ] हे सखी! कहो तो, वे माता- पिता कैसे हैं, जिन्होंने ऐसे [ सुन्दर सुकुमार ] बालकोंको वनमें भेज दिया है! ॥ १ ॥
एक कहहिं भल भूपति कीन्हा । लोयन लाहु हमहि बिधि दीन्हा ॥
तब निषादपति उर अनुमाना । तरु सिंसुपा मनोहर जाना ॥
कोई एक कहते हैं - राजाने अच्छा ही किया, इसी बहाने हमें भी ब्रह्माने नेत्रोंका लाभ दिया । तब निषादराजने हृदयमें अनुमान किया, तो अशोकके पेड़को [ उनके ठहरनेके लिये ] मनोहर समझा ॥ २ ॥
लै रघुनाथहि ठाउँ देखावा । कहेउ राम सब भाँति सुहावा ॥
पुरजन करि जोहारु घर आए । रघुबर संध्या करन सिधाए ॥
उसने श्रीरघुनाथजीको ले जाकर वह स्थान दिखाया । श्रीरामचन्द्रजीने [ देखकर ] कहा कि यह सब प्रकारसे सुन्दर है । पुरवासी लोग जोहार ( वन्दना) करके अपने- अपने घर लौटे और श्रीरामचन्द्रजी सन्ध्या करने पधारे ॥ ३ ॥
गुहँ सँवारि साँथरी डसाई । कुस किसलयमय मृदुल सुहाई ॥
सुचि फल मूल मधुर मृदु जानी । दोना भरि भरि राखेसि पानी ॥
गुहने [ इसी बीच ] कुश और कोमल पत्तोंकी कोमल और सुन्दर साथरी सजाकर बिछा दी; और पवित्र, मीठे और कोमल देख-देखकर दोनोंमें भर- भरकर फल-मूल और पानी रख दिया [ अथवा अपने हाथसे फल- मूल दोनोंमें भर- भरकर रख दिये ] ॥४ ॥
दो० -सिय सुमंत्र भ्राता सहित कंद मूल फल खाइ ।
सयन कीन्ह रघुबंसमनि पाय पलोटत भाइ ॥ ८ ९ ॥
सीताजी, सुमन्त्रजी और भाई लक्ष्मणजीसहित कन्द - मूल- फल खाकर रघुकुलमणि श्रीरामचन्द्रजी लेट गये । भाई लक्ष्मणजी उनके पैर दबाने लगे ॥८९ ॥
उठे लखनु प्रभु सोवत जानी । कहि सचिवहि सोवन मृदु बानी ॥
कछुक दूरि सजि बान सरासन । जागन लगे बैठि बीरासन ॥
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* *४१८ रामचरितमानस फिर प्रभु श्रीरामचन्द्रजीको सोते जानकर लक्ष्मणजी उठे और कोमल वाणीसे मन्त्री सुमन्त्रजीको सोनेके लिये कहकर वहाँसे कुछ दूरपर धनुष-बाणसे सजकर, वीरासनसे बैठकर जागने ( पहरा देने ) लगे ॥१ ॥
गुहँ बोलाइ पाहरू प्रतीती । ठावँ ठावँ राखे अति प्रीती ॥
आपु लखन पहिं बैठेउ जाई । कटि भाथी सर चाप चढ़ाई ॥
गुहने विश्वासपात्र पहरेदारोंको बुलाकर अत्यन्त प्रेमसे जगह -जगह नियुक्त कर दिया । और आप कमरमें तरकस बाँधकर तथा धनुषपर बाण चढ़ाकर लक्ष्मणजीके पास जा बैठा ॥२ ॥
सोवत प्रभुहि निहारि निषादू । भयउ प्रेम बस हृदयँ बिषादू ॥
तनु पुलकित जलु लोचन बहई । बचन सप्रेम लखन सन कहई ॥
प्रभुको जमीनपर सोते देखकर प्रेमवश निषादराजके हृदयमें विषाद हो आया । उसका शरीर पुलकित हो गया और नेत्रोंसे [ प्रेमाश्रुओंका ] जल बहने लगा । वह प्रेमसहित लक्ष्मणजीसे वचन कहने लगा—॥३ ॥
भूपति भवन सुभायँ सुहावा । सुरपति सदनु न पटतर पावा ॥
मनिमय रचित चारु चौबारे । जनु रतिपति निज हाथ सँवारे ॥
महाराज दशरथजीका महल तो स्वभावसे ही सुन्दर है, इन्द्रभवन भी जिसकी समानता नहीं पा सकता । उसमें सुन्दर मणियोंके रचे चौबारे ( छतके ऊपर बँगले ) हैं, जिन्हें मानो रतिके पति कामदेवने अपने ही हाथों सजाकर बनाया है; ॥४ ॥
दो० - सुचि सुबिचित्र सुभोगमय सुमन सुगंध सुबास ।
पलँग मंजु मनि दीप जहँ सब बिधि सकल सुपास॥९० ॥
जो पवित्र, बड़े ही विलक्षण, सुन्दर भोगपदार्थोंसे पूर्ण और फूलोंकी सुगन्धसे सुवासित हैं; जहाँ सुन्दर पलँग और मणियोंके दीपक हैं तथा सब प्रकारका पूरा आराम है; ॥ ९ ० ॥
बिबिध बसन उपधान तुराईं । छीर फेन मृदु बिसद सुहाईं ॥
तहँ सिय रामु सयन निसि करहीं । निज छबि रति मनोज मदु हरहीं ॥
जहाँ [ ओढ़ने - बिछानेके ] अनेकों वस्त्र, तकिये और गद्दे हैं, जो दूधके फेनके समान कोमल, निर्मल ( उज्ज्वल ) और सुन्दर हैं; वहाँ ( उन चौबारोंमें ) श्रीसीताजी और श्रीरामचन्द्रजी रातको सोया करते थे और अपनी शोभासे रति और कामदेवके गर्वको हरण करते थे ॥ १ ॥
ते सिय रामु साथरीं सोए । श्रमित बसन बिनु जाहिं न जोए ॥
मातु पिता परिजन पुरबासी । सखा सुसील दास अरु दासी ॥