श्रीरामचरितमानस — पृष्ठ 421–430
श्रीरामचरितमानस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 421–430
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* ** अयोध्याकाण्ड ४१ ९ वही श्रीसीता और श्रीरामजी आज घास- फूसकी साथरीपर थके हुए बिना वस्त्रके ही सोये हैं । ऐसी दशामें वे देखे नहीं जाते । माता, पिता, कुटुम्बी, पुरवासी ( प्रजा ), मित्र, अच्छे शील-स्वभावके दास और दासियाँ- ॥ २ ॥
जोगवहिं जिन्हहि प्रान की नाईं । महि सोवत तेइ राम गोसाईं ॥
पिता जनक जग बिदित प्रभाऊ । ससुर सुरेस सखा रघुराऊ ॥
सब जिनकी अपने प्राणोंकी तरह सार-सँभार करते थे, वही प्रभु श्रीरामचन्द्रजी आज पृथ्वीपर सो रहे हैं । जिनके पिता जनकजी हैं, जिनका प्रभाव जगत्में प्रसिद्ध है; जिनके ससुर इन्द्रके मित्र रघुराज दशरथजी हैं, ॥ ३ ॥
रामचंदु पति सो बैदेही । सोवत महि बिधि बाम न केही ॥
सिय रघुबीर कि कानन जोगू । करम प्रधान सत्य कह लोगू ॥
और पति श्रीरामचन्द्रजी हैं, वही जानकीजी आज जमीनपर सो रही हैं । विधाता किसको प्रतिकूल नहीं होता! सीताजी और श्रीरामचन्द्रजी क्या वनके योग्य हैं? लोग सच कहते हैं कि कर्म ( भाग्य ) ही प्रधान है ॥४ ॥
दो० – कैकयनंदिनि मंदमति कठिन कुटिलपनु कीन्ह ।
जेहिं रघुनंदन जानकिहि सुख अवसर दुखु दीन्ह॥ ९ १ ॥
कैकयराजकी लड़की नीचबुद्धि कैकेयीने बड़ी ही कुटिलता की, जिसने रघुनन्दन श्रीरामजीको और जानकीजीको सुखके समय दुःख दिया ॥९ १ ॥
भइ दिनकर कुल बिटप कुठारी । कुमति कीन्ह सब बिस्व दुखारी ॥
भयउ बिषाद निषादहि भारी । राम सीय महि सयन निहारी ॥
वह सूर्यकुलरूपी वृक्षके लिये कुल्हाड़ी हो गयी । उस कुबुद्धिने सम्पूर्ण विश्वको दुःखी कर दिया । श्रीराम - सीताको जमीनपर सोते हुए देखकर निषादको बड़ा दुःख हुआ ॥ १ ॥
बोले लखन मधुर मृदु बानी । ग्यान बिराग भगति रस सानी ॥
काहु न कोउ सुख दुख कर दाता । निज कृत करम भोग सबु भ्राता ॥
तब लक्ष्मणजी ज्ञान, वैराग्य और भक्तिके रससे सनी हुई मीठी और कोमल वाणी बोले-हे भाई! कोई किसीको सुख-दुःखका देनेवाला नहीं है । सब अपने ही किये हुए कर्मोंका फल भोगते हैं ॥२ ॥
जोग बियोग भोग भल मंदा । हित अनहित मध्यम भ्रम फंदा ॥
जनमु मरनु जहँ लगि जग जालू । संपति बिपति करमु अरु कालू॥
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* *४२० रामचरितमानस संयोग ( मिलना ), वियोग ( बिछुड़ना ), भले- बुरे भोग, शत्रु, मित्र और उदासीन — ये सभी भ्रमके फंदे हैं । जन्म- मृत्यु, सम्पत्ति-विपत्ति, कर्म और काल– जहाँतक जगत्के जंजाल हैं; ॥३ ॥
धरनि धामु धनु पुर परिवारू । सरगु नरकु जहँ लगि ब्यवहारू ॥
देखिअ सुनिअ गुनिअ मन माहीं । मोह मूल परमारथु नाहीं ॥
धरती, घर, धन, नगर, परिवार, स्वर्ग और नरक आदि जहाँतक व्यवहार हैं जो देखने, सुनने और मनके अंदर विचारनेमें आते हैं, इन सबका मूल मोह ( अज्ञान ) ही है । परमार्थतः ये नहीं हैं ॥४ ॥
दो० –- सपनें होइ भिखारि नृपु रंकु नाकपति होइ ।
जागें लाभु न हानि कछु तिमि प्रपंच जियँ जोइ ॥ ९ २ ॥
जैसे स्वप्नमें राजा भिखारी हो जाय या कंगाल स्वर्गका स्वामी इन्द्र हो जाय, तो जागनेपर लाभ या हानि कुछ भी नहीं है; वैसे ही इस दृश्य-प्रपञ्चको हृदयसे देखना चाहिये॥९ २ ॥
अस बिचारि नहिं कीजिअ रोसू । काहुहि बादि न देइअ दोसू॥
मोह निसाँ सबु सोवनिहारा । देखिअ सपन अनेक प्रकारा ॥
ऐसा विचारकर क्रोध नहीं करना चाहिये और न किसीको व्यर्थ दोष ही देना चाहिये । सब एहिंलोग मोहरूपीजग जामिनिरात्रिमें सोनेवालेजागहिंहैं औरजोगीसोते हुए। उन्हेंपरमारथीअनेकों प्रकारकेप्रपंचस्वप्न दिखायीबियोगीदेते हैं ॥ १ ॥॥
जानिअ तबहिं जीव जग जागा । जब सब बिषय बिलास बिरागा ॥
इस जगत्रूपी रात्रिमें योगीलोग जागते हैं, जो परमार्थी हैं और प्रपञ्च ( मायिक जगत्) से छूटे हुए हैं । जगत्में जीवको जागा हुआ तभी जानना चाहिये जब सम्पूर्ण भोग- विलासोंसे वैराग्य हो जाय ॥ २ ॥
होइ बिबेकु मोह भ्रम भागा । तब रघुनाथ चरन अनुरागा ॥
सखा परम परमारथु एहू । मन क्रम बचन राम पद नेहू ॥
विवेक होनेपर मोहरूपी भ्रम भाग जाता है, तब ( अज्ञानका नाश होनेपर ) श्रीरघुनाथजीके चरणोंमें प्रेम होता है । हे सखा! मन, वचन और कर्मसे श्रीरामजीके चरणोंमें प्रेम होना, यही सर्वश्रेष्ठ परमार्थ ( पुरुषार्थ ) है ॥ ३ ॥
राम ब्रह्म परमारथ रूपा । अबिगत अलख अनादि अनूपा ॥
सकल बिकार रहित गतभेदा । कहि नित नेति निरूपहिं बेदा ॥
श्रीरामजी परमार्थस्वरूप ( परमवस्तु ) परब्रह्म हैं । वे अविगत ( जाननेमें न आनेवाले ), अलख (स्थूल दृष्टिसे देखनेमें न आनेवाले ), अनादि ( आदिरहित), अनुपम ( उपमारहित ), सब विकारोंसे रहित और भेदशून्य हैं, वेद जिनका नित्य ' नेति नेति' कहकर निरूपण करते हैं ॥४ ॥
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* ** अयोध्याकाण्ड ४२१
दो० - भगत भूमि भूसुर सुरभि सुर हित लागि कृपाल ।
करत चरित धरि मनुज तनु सुनत मिटहिं जग जाल ॥ ९ ३ ॥
वही कृपालु श्रीरामचन्द्रजी भक्त, भूमि, ब्राह्मण, गौ और देवताओंके हितके लिये मनुष्यशरीर धारण करके लीलाएँ करते हैं, जिनके सुननेसे जगत्के जंजाल मिट जाते हैं॥९ ३ ॥ मासपारायण, पंद्रहवाँ विश्राम
सखा समुझि अस परिहरि मोहू । सिय रघुबीर चरन रत होहू॥
कहत राम गुन भा भिनुसारा । जागे जग मंगल सुखदारा ॥
हे सखा! ऐसा समझ, मोहको त्यागकर श्रीसीतारामजीके चरणोंमें प्रेम करो । इस प्रकार श्रीरामचन्द्रजीके गुण कहते- कहते सबेरा हो गया! तब जगत्का मङ्गल करनेवाले और उसे सुख देनेवाले श्रीरामजी जागे ॥ १ ॥
सकल सौच करि राम नहावा । सुचि सुजान बट छीर मगावा ॥
अनुज सहित सिर जटा बनाए । देखि सुमंत्र नयन जल छाए ॥
शौचके सब कार्य करके [ नित्य ] पवित्र और सुजान श्रीरामचन्द्रजीने स्नान किया । फिर बड़का दूध मँगाया और छोटे भाई लक्ष्मणजीसहित उस दूधसे सिरपर जटाएँ बनायीं । यह देखकर सुमन्त्रजीके नेत्रोंमें जल छा गया ॥२ ॥
हृदयँ दाहु अति बदन मलीना । कह कर जोरि बचन अति दीना ॥
नाथ कहेउ अस कोसलनाथा । लै रथु जाहु राम कें साथा ॥
उनका हृदय अत्यन्त जलने लगा, मुँह मलिन ( उदास ) हो गया । वे हाथ जोड़कर अत्यन्त दीन वचन बोले — हे नाथ! मुझे कोसलनाथ दशरथजीने ऐसी आज्ञा दी थी कि तुम रथ लेकर श्रीरामजीके साथ जाओ; ॥३ ॥
बनु देखाइ सुरसरि अन्हवाई । आनेहु फेरि बेगि दोउ भाई ॥
लखनु रामु सिय आनेहु फेरी । संसय सकल सँकोच निबेरी ॥
वन दिखाकर, गङ्गास्नान कराकर दोनों भाइयोंको तुरंत लौटा लाना । सब संशय और संकोचको दूर करके लक्ष्मण, राम, सीताको फिरा लाना ॥४ ॥
दो० - नृप अस कहेउ गोसाइँ जस कहइ करौं बलि सोइ ।
करि बिनती पायन्ह परेउ दीन्ह बाल जिमि रोइ ॥ ९ ४ ॥
महाराजने ऐसा कहा था, अब प्रभु जैसा कहें, मैं वही करूँ; मैं आपकी बलिहारी हूँ । इस प्रकार विनती करके वे श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंमें गिर पड़े और उन्होंने बालककी तरह रो दिया ॥ ९ ४ ॥
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* *४२२ रामचरितमानस
तात कृपा करि कीजिअ सोई । जातें अवध अनाथ न होई ॥
मंत्रिहि राम उठाइ प्रबोधा । तात धरम मतु तुम्ह सबु सोधा ॥
[ और कहा— ] हे तात! कृपा करके वही कीजिये जिससे अयोध्या अनाथ न हो । श्रीरामजीने मन्त्रीको उठाकर धैर्य बँधाते हुए समझाया कि हे तात! आपने तो धर्मके सभी सिद्धान्तोंको छान डाला है ॥१ ॥
सिबि दधीच हरिचंद नरेसा । सहे धरम हित कोटि कलेसा ॥
रंतिदेव बलि भूप सुजाना । धरमु धरेउ सहि संकट नाना ॥
शिबि, दधीचि और राजा हरिश्चन्द्रने धर्मके लिये करोड़ों ( अनेकों ) कष्ट सहे थे । बुद्धिमान् राजा रन्तिदेव और बलि बहुत-से संकट सहकर भी धर्मको पकड़े रहे ( उन्होंने धर्मका परित्याग नहीं किया ) ॥२ ॥
धरमु न दूसर सत्य समाना । आगम निगम पुरान बखाना ॥
मैं सोइ धरमु सुलभ करि पावा । तजें तिहूँ पुर अपजसु छावा ॥
वेद, शास्त्र और पुराणोंमें कहा गया है कि सत्यके समान दूसरा धर्म नहीं है । मैंने उस धर्मको सहज ही पा लिया है । इस [सत्यरूपी धर्म ] का त्याग करनेसे तीनों लोकोंमें अपयश छा जायगा ॥ ३ ॥
संभावित कहुँ अपजस लाहू । मरन कोटि सम दारुन दाहू ॥
तुम्ह सन तात बहुत का कहऊँ । दिएँ उतरु फिरि पातकु लहऊँ ॥
प्रतिष्ठित पुरुषके लिये अपयशकी प्राप्ति करोड़ों मृत्युके समान भीषण सन्ताप देनेवाली है । हे तात! मैं आपसे अधिक क्या कहूँ! लौटकर उत्तर देनेमें भी पापका भागी होता हूँ ॥४ ॥
दो० –- पितु पद गहि कहि कोटि नति बिनय करब कर जोरि ।
चिंता कवनिहु बात कै तात करिअ जनि मोरि॥ ९ ५ ॥
आप जाकर पिताजीके चरण पकड़कर करोड़ों नमस्कारके साथ ही हाथ जोड़कर विनती करियेगा कि हे तात! आप मेरी किसी बातकी चिन्ता न करें ॥ ९ ५ ॥
तुम्ह पुनि पितु सम अति हित मोरें । बिनती करउँ तात कर जोरें ॥
सब बिधि सोइ करतब्य तुम्हारें । दुख न पाव पितु सोच हमारें ॥
आप भी पिताके समान ही मेरे बड़े हितैषी हैं । हे तात! मैं हाथ जोड़कर आपसे विनती करता हूँ कि आपका भी सब प्रकारसे वही कर्तव्य है जिसमें पिताजी हमलोगोंके सोचमें दुःख न पावें ॥१ ॥
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* ** अयोध्याकाण्ड ४२३
सुनि रघुनाथ सचिव संबादू । भयउ सपरिजन बिकल निषाद् ॥
पुनि कछु लखन कही कटु बानी । प्रभु बरजे बड़ अनुचित जानी ॥
श्रीरघुनाथजी और सुमन्त्रका यह संवाद सुनकर निषादराज कुटुम्बियोंसहित व्याकुल हो गया । फिर लक्ष्मणजीने कुछ कड़वी बात कही । प्रभु श्रीरामचन्द्रजीने उसे बहुत ही अनुचित जानकर उनको मना किया ॥ २ ॥
सकुचि राम निज सपथ देवाई । लखन सँदेसु कहिअ जनि जाई ॥
कह सुमंत्र पुनि भूप सँदेसू । सहि न सकिहि सिय बिपिन कलेसू॥
श्रीरामचन्द्रजीने सकुचाकर, अपनी सौगंध दिलाकर सुमन्त्रजीसे कहा कि आप जाकर लक्ष्मणका यह सन्देश न कहियेगा । सुमन्त्रने फिर राजाका सन्देश कहा कि सीता वनके क्लेश न सह सकेंगी ॥३ ॥
जेहि बिधि अवध आव फिरि सीया । सोइ रघुबरहि तुम्हहि करनीया ॥
नतरु निपट अवलंब बिहीना । मैं न जिअब जिमि जल बिनु मीना ॥
अतएव जिस तरह सीता अयोध्याको लौट आवें, तुमको और श्रीरामचन्द्रजीको वही उपाय करना चाहिये । नहीं तो मैं बिलकुल ही बिना सहारेका होकर वैसे ही नहीं जीऊँगा जैसे बिना जलके मछली नहीं जीती ॥४ ॥
दो० –- मइकें ससुरें सकल सुख जबहिं जहाँ मनु मान ।
तहँ तब रहिहि सुखेन सिय जब लगि बिपति बिहान ॥ ९ ६ ॥
सीताके मायके ( पिताके घर ) और ससुरालमें सब सुख हैं । जबतक यह विपत्ति दूर नहीं होती, तबतक वे जब जहाँ जी चाहे, वहीं सुखसे रहेंगी॥९ ६ ॥
बिनती भूप कीन्ह जेहि भाँती । आरति प्रीति न सो कहि जाती ॥
पितु सँदेसु सुनि कृपानिधाना । सियहि दीन्ह सिख कोटि बिधाना ॥
राजाने जिस तरह (जिस दीनता और प्रेमसे ) विनती की है, वह दीनता और प्रेम कहा नहीं जा सकता । कृपानिधान श्रीरामचन्द्रजीने पिताका सन्देश सुनकर सीताजीको करोड़ों ( अनेकों ) प्रकारसे सीख दी ॥ १ ॥
सासु ससुर गुर प्रिय परिवारू । फिरहु त सब कर मिटै खभारू ॥
सुनि पति बचन कहति बैदेही । सुनहु प्रानपति परम सनेही ॥
[ उन्होंने कहा— ] जो तुम घर लौट जाओ, तो सास, ससुर, गुरु, प्रियजन एवं कुटुम्बी सबकी चिन्ता मिट जाय । पतिके वचन सुनकर जानकीजी कहती हैं-हे प्राणपति! हे परम स्नेही! सुनिये ॥२ ॥
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* *४२४ रामचरितमानस
प्रभु करुनामय परम बिबेकी । तनु तजि रहति छाँह किमि छेंकी ॥
प्रभा जाइ कहँ भानु बिहाई । कहँ चंद्रिका चंदु तजि जाई ॥
हे प्रभो! आप करुणामय और परम ज्ञानी हैं । [ कृपा करके विचार तो कीजिये ] शरीरको छोड़कर छाया अलग कैसे रोकी रह सकती है? सूर्यकी प्रभा सूर्यको छोड़कर कहाँ जा सकती है? और चाँदनी चन्द्रमाको त्यागकर कहाँ जा सकती है? ॥३ ॥
पतिहि प्रेममय बिनय सुनाई । कहति सचिव सन गिरा सुहाई ॥
तुम्ह पितु ससुर सरिस हितकारी । उतरु देउँ फिरि अनुचित भारी ॥
इस प्रकार पतिको प्रेममयी विनती सुनाकर सीताजी मन्त्रीसे सुहावनी वाणी कहने लगीं- आप मेरे पिताजी और ससुरजीके समान मेरा हित करनेवाले हैं । आपको मैं बदलेमें उत्तर देती हूँ, यह बहुत ही अनुचित है ॥४ ॥
दो० - आरति बस सनमुख भइउँ बिलगु न मानब तात ।
आरजसुत पद कमल बिनु बादि जहाँ लगि नात ॥ ९ ७ ॥
किन्तु हे तात! मैं आर्त्त होकर ही आपके सम्मुख हुई हूँ, आप बुरा न मानियेगा । आर्यपुत्र ( स्वामी ) के चरणकमलोंके बिना जगत्में जहाँतक नाते हैं सभी मेरे लिये व्यर्थ हैं ॥ ९ ७ ॥
पितु बैभव बिलास मैं डीठा । नृप मनि मुकुट मिलित पद पीठा ॥
सुखनिधान अस पितु गृह मोरें । पिय बिहीन मन भाव न भोरें ॥
मैंने पिताजीके ऐश्वर्यकी छटा देखी है, जिनके चरण रखनेकी चौकीसे सर्वशिरोमणि राजाओंके मुकुट मिलते हैं ( अर्थात् बड़े - बड़े राजा जिनके चरणोंमें प्रणाम करते हैं ) ऐसे पिताका घर भी, जो सब प्रकारके सुखोंका भण्डार है, पतिके बिना मेरे मनको भूलकर भी नहीं भाता ॥१ ॥
ससुर चक्कवड़ कोसलराऊ । भुवन चारिदस प्रगट प्रभाऊ ॥
आगें होइ जेहि सुरपति लेई । अरध सिंघासन आसनु देई ॥
मेरे ससुर कोसलराज चक्रवर्ती सम्राट्हैं, जिनका प्रभाव चौदहों लोकोंमें प्रकट है; इन्द्र भी आगे होकर जिनका स्वागत करता है और अपने आधे सिंहासनपर बैठनेके लिये स्थान देता है, ॥ २ ॥
ससुर एतादृस अवध निवासू । प्रिय परिवारु मातु सम सासू ॥
बिनु रघुपति पद पदुम परागा । मोहि केउ सपनेहुँ सुखद न लागा ॥
ऐसे [ ऐश्वर्य और प्रभावशाली ] ससुर; [उनकी राजधानी ] अयोध्याका निवास; प्रिय कुटुम्बी और माताके समान सासुएँ— ये कोई भी श्रीरघुनाथजीके चरणकमलोंकी रजके बिना मुझे स्वप्नमें भी सुखदायक नहीं लगते ॥३ ॥
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* * अयोध्याकाण्ड ४२५
अगम पंथ बनभूमि पहारा । करि केहरि सर सरित अपारा ॥
कोल किरात कुरंग बिहंगा । मोहि सब सुखद प्रानपति संगा ॥
दुर्गम रास्ते, जंगली धरती, पहाड़, हाथी, सिंह, अथाह तालाब एवं नदियाँ; कोल, भील, हिरन और पक्षी- प्राणपति ( रघुनाथजी ) के साथ रहते ये सभी मुझे सुख देनेवाले होंगे ॥४ ॥
दो० – सासु ससुर सन मोरि हुँति बिनय करबि परि पायँ ।
मोर सोचु जनि करिअ कछु मैं बन सुखी सुभायँ ॥ ९ ८ ॥
अतः सास और ससुरके पाँव पड़कर, मेरी ओरसे विनती कीजियेगा कि वे मेरा कुछ भी सोच न करें; मैं वनमें स्वभावसे ही सुखी हूँ॥ ९८ ॥
प्राननाथ प्रिय देवर साथा । बीर धुरीन धरें धनु भाथा ॥
नहिं मग श्रमु भ्रमु दुख मन मोरें । मोहि लगि सोचु करिअ जनि भोरें ॥
वीरोंमें अग्रगण्य तथा धनुष और [ बाणोंसे भरे ] तरकश धारण किये मेरे प्राणनाथ और प्यारे देवर साथ हैं । इससे मुझे न रास्तेकी थकावट है, न भ्रम है, और न मेरे मनमें कोई दुःख ही है । आप मेरे लिये भूलकर भी सोच न करें ॥ १ ॥
सुनि सुमंत्र सिय सीतलि बानी । भयउ बिकल जनु फनि मनि हानी ॥
नयन सूझ नहिं सुनइ न काना । कहि न सकइ कछु अति अकुलाना ॥
सुमन्त्र सीताजीकी शीतल वाणी सुनकर ऐसे व्याकुल हो गये, जैसे साँप मणि खो जानेपर । नेत्रोंसे कुछ सूझता नहीं, कानोंसे सुनायी नहीं देता । वे बहुत व्याकुल हो गये, कुछ कह नहीं सकते ॥ २ ॥
राम प्रबोधु कीन्ह बहु भाँती । तदपि होति नहिं सीतलि छाती ॥
जतन अनेक साथ हित कीन्हे । उचित उतर रघुनंदन दीन्हे ॥
श्रीरामचन्द्रजीने उनका बहुत प्रकारसे समाधान किया । तो भी उनकी छाती ठंडी न हुई । साथ चलनेके लिये मन्त्रीने अनेकों यत्न किये ( युक्तियाँ पेश कीं ), पर रघुनन्दन श्रीरामजी [ उन सब युक्तियोंका ] यथोचित उत्तर देते गये ॥३ ॥
मेटि जाइ नहिं राम रजाई । कठिन करमगति कछु न बसाई ॥
राम लखन सिय पद सिरु नाई । फिरेउ बनिक जिमि मूर गवाँई ॥
श्रीरामजीकी आज्ञा मेटी नहीं जा सकती । कर्मकी गति कठिन है, उसपर कुछ भी वश नहीं चलता । श्रीराम, लक्ष्मण और सीताजीके चरणोंमें सिर नवाकर सुमन्त्र इस तरह लौटे जैसे कोई व्यापारी अपना मूलधन ( पूँजी ) गँवाकर लौटे ॥ ४ ॥
दो० – रथ हाँकेउ हय राम तन हेरि हेरि हिहिनाहिं ।
देखि निषाद बिषादबस धुनहिं सीस पछिताहिं ॥ ९९ ॥
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* *४२६ रामचरितमानस सुमन्त्रने रथको हाँका, घोड़े श्रीरामचन्द्रजीकी ओर देख-देखकर हिनहिनाते हैं । यह देखकर निषादलोग विषादके वश होकर सिर धुन-धुनकर ( पीट- पीटकर) पछताते हैं॥९९॥
जासु बियोग बिकल पसु ऐसें । प्रजा मातु पितु जिइहहिं कैसें ॥
बरबस राम सुमंत्र पठाए । सुरसरि तीर आपु तब आए ॥
जिनके वियोगमें पशु इस प्रकार व्याकुल हैं, उनके वियोगमें प्रजा, माता और पिता कैसे जीते रहेंगे? श्रीरामचन्द्रजीने जबर्दस्ती सुमन्त्रको लौटाया । तब आप गङ्गाजीके तीरपर आये ॥१ ॥
मागी नाव न केवटु आना । कहइ तुम्हार मरमु मैं जाना ॥
चरन कमल रज कहुँ सबु कहई । मानुष करनि मूरि कछु अहई ॥
श्रीरामने केवटसे नाव माँगी, पर वह लाता नहीं । वह कहने लगा- मैंने तुम्हारा मर्म ( भेद ) जान लिया । तुम्हारे चरणकमलोंकी धूलके लिये सब लोग कहते हैं कि वह मनुष्य बना देनेवाली कोई जड़ी है, ॥२ ॥
छुअत सिला भइ नारि सुहाई । पाहन तें न काठ कठिनाई ॥
तरनिउ मुनि घरिनी होइ जाई । बाट परइ मोरि नाव उड़ाई ॥
जिसके छूते ही पत्थरकी शिला सुन्दरी स्त्री हो गयी [ मेरी नाव तो काठकी है ] । काठ पत्थरसे कठोर तो होता नहीं । मेरी नाव भी मुनिकी स्त्री हो जायगी और इस प्रकार मेरी नाव उड़ जायगी, मैं लुट जाऊँगा [ अथवा रास्ता रुक जायगा जिससे आप पार न हो सकेंगे और मेरी रोजी मारी जायगी ] ( मेरी कमाने-खानेकी राह ही मारी जायगी ) ॥३ ॥
एहिं प्रतिपालउँ सबु परिवारू । नहिं जानउँ कछु अउर कबारू ॥
जौं प्रभु पार अवसि गा चहू । मोहि पद पदुम पखारन कहहू ॥
मैं तो इसी नावसे सारे परिवारका पालन-पोषण करता हूँ । दूसरा कोई धंधा नहीं जानता । हे प्रभु! यदि तुम अवश्य ही पार जाना चाहते हो तो मुझे पहले अपने चरण- कमल पखारने ( धो लेने ) के लिये कह दो ॥४ ॥
छं० –- पद कमल धोइ चढ़ाइ नाव न नाथ उतराई चहौं ।
मोहि राम राउरि आन दसरथ सपथ सब साची कहौं । बरु तीर मारहुँ लखनु पै जब लगि न पाय पखारिहौं । तब लगि न तुलसीदास नाथ कृपाल पारु उतारिहौं ।
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* ** अयोध्याकाण्ड ४२७ हे नाथ! मैं चरणकमल धोकर आपलोगोंको नावपर चढ़ा लूँगा; मैं आपसे कुछ उतराई नहीं चाहता । हे राम! मुझे आपकी दुहाई और दशरथजीकी सौगंध है, मैं सब सच-सच कहता I लक्ष्मण भले ही मुझे तीर मारें, पर जबतक मैं पैरोंको पखार न लूँगा, तबतक हे तुलसीदासके नाथ! हे कृपालु! मैं पार नहीं उतारूँगा ।
सो० - सुनि केवट के बैन प्रेम लपेटे अटपटे ।
बिहसे करुनाऐन चितइ जानकी लखन तन ॥ १०० ॥
केवटके प्रेममें लपेटे हुए अटपटे वचन सुनकर करुणाधाम श्रीरामचन्द्रजी जानकीजी और लक्ष्मणजीकी ओर देखकर हँसे ॥ १०० ॥
कृपासिंधु बोलेबोले मुसुकाई । सोइ करु जेहिं तव नाव न जाई ॥
बेगि आनु जल पाय पखारू । होत बिलंबु उतारहि पारू ॥
कृपाके समुद्र श्रीरामचन्द्रजी केवटसे मुसकराकर बोले- भाई! तू वही कर जिससे तेरी नाव
न जाय । जल्दी पानी ला और पैर धो ले । देर हो रही है, पार उतार दे ॥१ ॥
जासु नाम सुमिरत एक बारा । उतरहिं नर भवसिंधु अपारा ॥
सोइ कृपालु केवटहि निहोरा । जेहिं जगु किय तिहु पगहु ते थोरा ॥
एक बार जिनका नाम स्मरण करते ही मनुष्य अपार भवसागरके पार उतर जाते हैं, और जिन्होंने [ वामनावतारमें ] जगत्को तीन पगसे भी छोटा कर दिया था ( दो ही पगमें त्रिलोकीको नाप लिया था ), वही कृपालु श्रीरामचन्द्रजी [ गङ्गाजीसे पार उतारनेके लिये ] केवटका निहोरा कर रहे हैं! ॥२ ॥
पद नख निरखि देवसरि हरषी । सुनि प्रभु बचन मोहँ मति करषी ॥
केवट राम रजायसु पावा । पानि कठवता भरि लेइ आवा ॥
प्रभुके इन वचनोंको सुनकर गङ्गाजीकी बुद्धि मोहसे खिंच गयी थी [ कि ये साक्षात् भगवान् होकर भी पार उतारनेके लिये केवटका निहोरा कैसे कर रहे हैं ] । परन्तु [ समीप आनेपर अपनी उत्पत्तिके स्थान ] पदनखोंको देखते ही [ उन्हें पहचानकर] देवनदी गङ्गाजी हर्षित हो गयीं । ( वे समझ गयीं कि भगवान् नरलीला कर रहे हैं, इससे उनका मोह नष्ट हो गया; और इन चरणोंका स्पर्श प्राप्त करके मैं धन्य होऊँगी, यह विचारकर वे हर्षित हो गयीं । ) केवट श्रीरामचन्द्रजीकी आज्ञा पाकर कठौतेमें भरकर जल ले आया ॥३ ॥
अति आनंद उमगि अनुरागा । चरन सरोज पखारन लागा ॥
बरषि सुमन सुर सकल सिहाहीं । एहि सम पुन्यपुंज कोउ नाहीं ॥
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* *४२८ रामचरितमानस अत्यन्त आनन्द और प्रेममें उमँगकर वह भगवान्के चरणकमल धोने लगा । सब देवता फूल बरसाकर सिहाने लगे कि इसके समान पुण्यकी राशि कोई नहीं है ॥४ ॥
दो० – पद पखारि जलु पान करि आपु सहित परिवार ।
पितर पारु करि प्रभुहि पुनि मुदित गयउ लेइ पार ॥ १०१ ॥
चरणोंको धोकर और सारे परिवारसहित स्वयं उस जल ( चरणोदक ) को पीकर पहले [ उस महान् पुण्यके द्वारा ] अपने पितरोंको भवसागरसे पारकर फिर आनन्दपूर्वक प्रभु श्रीरामचन्द्रको गङ्गाजीके पार ले गया ॥१०१ ॥
उतरि ठाढ़ भए सुरसरि रेता । सीय रामु गुह लखन समेता ॥
केवट उतरि दंडवत कीन्हा । प्रभुहि सकुच एहि नहिं कछु दीन्हा ॥
निषादराज और लक्ष्मणजीसहित श्रीसीताजी और श्रीरामचन्द्रजी [नावसे ] उतरकर गङ्गाजीकी रेत ( बालू ) में खड़े हो गये । तब केवटने उतरकर दण्डवत् की । [ उसको दण्डवत् करते देखकर ] प्रभुको संकोच हुआ कि इसको कुछ दिया नहीं ॥१ ॥
पिय हिय की सिय जाननिहारी । मनि मुदरी मन मुदित उतारी ॥
कहेउ कृपाल लेहि उतराई ॥ केवट चरन गहे अकुलाई ॥
पतिके हृदयकी जाननेवाली सीताजीने आनन्दभरे मनसे अपनी रत्नजटित अँगूठी [ अँगुलीसे ] उतारी । कृपालु श्रीरामचन्द्रजीने केवटसे कहा, नावकी उतराई लो । केवटने व्याकुल होकर चरण पकड़ लिये ॥ २ ॥
नाथ आजु मैं काह न पावा । मिटे दोष दुख दारिद दावा ॥
बहुत काल मैं कीन्हि मजूरी । आजु दीन्ह बिधि बनि भलि भूरी ॥
[ उसने कहा— ] हे नाथ! आज मैंने क्या नहीं पाया! मेरे दोष, दुःख और दरिद्रताकी आग आज अबबुझ गयीकछुहै । मैंनेनाथबहुत नसमयतकचाहिअमजदूरी मोरेंकी । विधाताने। दीनदयालआज बहुत अच्छीअनुग्रहभरपूर मजदूरी दे तोरेंदी ॥ ३ ॥॥
फिरती बार मोहि जो देबा । सो प्रसादु मैं सिर धरि लेबा ॥
हे नाथ! हे दीनदयाल! आपकी कृपासे अब मुझे कुछ नहीं चाहिये | लौटती बार आप मुझे जो कुछ देंगे, वह प्रसाद मैं सिर चढ़ाकर लूँगा ॥४ ॥
दो० – बहुत कीन्ह प्रभु लखन सियँ नहिं कछु केवटु लेइ ।
बिदा कीन्ह करुनायतन भगति बिमल बरु देइ ॥ १०२ ॥
प्रभु श्रीरामजी, लक्ष्मणजी और सीताजीने बहुत आग्रह [ या यत्न ] किया, पर केवट कुछ नहीं लेता । तब करुणाके धाम भगवान् श्रीरामचन्द्रजीने निर्मल भक्तिका वरदान देकर उसे विदा किया ॥ १०२ ॥