श्रीरामचरितमानस — पृष्ठ 431–440
श्रीरामचरितमानस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 431–440
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* ** अयोध्याकाण्ड ४२९
तब मज्जनु करि रघुकुलनाथा । पूजि पारथिव नायउ माथा ॥
सियँ सुरसरिहि कहेउ कर जोरी । मातु मनोरथ पुरउबि मोरी ॥
फिर रघुकुलके स्वामी श्रीरामचन्द्रजीने स्नान करके पार्थिवपूजा की और शिवजीको सिर नवाया । सीताजीने हाथ जोड़कर गङ्गाजीसे कहा -हे माता! मेरा मनोरथ पूरा कीजियेगा ॥१ ॥
पति देवर सँग कुसल बहोरी । आइ करौं जेहिं पूजा तोरी ॥
सुनि सिय बिनय प्रेम रस सानी । भइ तब बिमल बारि बर बानी ॥
जिससे मैं पति और देवरके साथ कुशलपूर्वक लौट आकर तुम्हारी पूजा करूँ । सीताजीकी प्रेमरसमें सनी हुई विनती सुनकर तब गङ्गाजीके निर्मल जलमेंसे श्रेष्ठ वाणी हुई— ॥२ ॥
सुनु रघुबीर प्रिया बैदेही । तव प्रभाउ जग बिदित न केही ॥
लोकप होहिं बिलोकत तोरें । तोहि सेवहिं सब सिधि कर जोरें ॥
हे रघुवीरकी प्रियतमा जानकी! सुनो, तुम्हारा प्रभाव जगत्में किसे नहीं मालूम है? तुम्हारे [ कृपादृष्टिसे ] देखते ही लोग लोकपाल हो जाते हैं । सब सिद्धियाँ हाथ जोड़े तुम्हारी सेवा करती हैं ॥३ ॥
तुम्ह जो हमहि बड़ि बिनय सुनाई । कृपा कीन्हि मोहि दीन्हि बड़ाई ।
तदपि देबि मैं देबि असीसा । सफल होन हित निज बागीसा ॥
तुमने जो मुझको बड़ी विनती सुनायी, यह तो मुझपर कृपा की और मुझे बड़ाई दी है । तो भी हे देवि! मैं अपनी वाणी सफल होनेके लिये तुम्हें आशीर्वाद दूँगी ॥४ ॥
दो० – प्राननाथ देवर सहित कुसल कोसला आइ ।
पूजिहि सब मनकामना सुजसु रहिहि जग छाइ ॥ १०३ ॥
तुम अपने प्राणनाथ और देवरसहित कुशलपूर्वक अयोध्या लौटोगी 1। तुम्हारी सारी मन: कामनाएँ पूरी होंगी और तुम्हारा सुन्दर यश जगत्भरमें छा जायगा ॥१०३ ॥
गंग बचन सुनि मंगल मूला । मुदित सीय सुरसरि अनुकूला ॥
तब प्रभु गुहहि कहेउ घर जाहू । सुनत सूख मुखु भा उर दाहू॥
मङ्गलके मूल गङ्गाजीके वचन सुनकर और देवनदीको अनुकूल देखकर सीताजी आनन्दित हुईं तब प्रभु श्रीरामचन्द्रजीने निषादराज गुहसे कहा कि भैया! अब तुम घर जाओ । यह सुनते ही उसका मुँह सूख गया और हृदयमें दाह उत्पन्न हो गया ॥१ ॥
दीन बचन गुह कह कर जोरी । बिनय सुनहु रघुकुलमनि मोरी ॥
नाथ साथ रहि पंथु देखाई । करि दिन चारि चरन सेवकाई ॥
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* *४३० रामचरितमानस गुह हाथ जोड़कर दीन वचन बोला-हे रघुकुलशिरोमणि! मेरी विनती सुनिये । मैं नाथ ( आप ) के साथ रहकर, रास्ता दिखाकर, चार ( कुछ ) दिन चरणोंकी सेवा करके —॥२ ॥
जेहिं बन जाइ रहब रघुराई । परनकुटी मैं करबि सुहाई ॥
तब मोहि कहँ जसि देब रजाई । सोइ करिहउँ रघुबीर दोहाई ॥
हे रघुराज! जिस वनमें आप जाकर रहेंगे, वहाँ मैं सुन्दर पर्णकुटी ( पत्तोंकी कुटिया ) बना दूँगा । तब मुझे आप जैसी आज्ञा देंगे, मुझे रघुवीर ( आप ) की दुहाई है, मैं वैसा ही करूँगा ॥३ ॥
सहज सनेह राम लखि तासू । संग लीन्ह गुह हृदयँ हुलासू ॥
पुनि गुहँ ग्याति बोलि सब लीन्हे । करि परितोषु बिदा तब कीन्हे ॥
उसके स्वाभाविक प्रेमको देखकर श्रीरामचन्द्रजीने उसको साथ ले लिया, इससे गुहके हृदयमें बड़ा आनन्द हुआ । फिर गुह ( निषादराज ) ने अपनी जातिके लोगोंको बुला लिया और उनका संतोष कराके तब उनको विदा किया ॥४ ॥
दो० – तब गनपति सिव सुमिरिप्रभु नाइ सुरसरिहि माथ ।
सखा अनुज सिय सहित बन गवनु कीन्ह रघुनाथ ॥ १०४ ॥
तब प्रभु श्रीरघुनाथजी गणेशजी और शिवजीका स्मरण करके तथा गङ्गाजीको मस्तक नवाकर सखा निषादराज, छोटे भाई लक्ष्मणजी और सीताजीसहित वनको चले ॥ १०४ ॥
तेहि दिन भयउ बिटप तर बासू । लखन सखाँ सब कीन्ह सुपासू॥
प्रात प्रातकृत करि रघुराई । तीरथराजु दीख प्रभु जाई ॥
उस दिन पेड़के नीचे निवास हुआ । लक्ष्मणजी और सखा गुहने [ विश्रामकी ] सब सुव्यवस्था कर दी । प्रभु श्रीरामचन्द्रजीने सबेरे प्रात:कालकी सब क्रियाएँ करके जाकर तीर्थोंके राजा प्रयागके दर्शन किये ॥१ ॥
सचिव सत्य श्रद्धा प्रिय नारी । माधव सरिस मीतु हितकारी ॥
चारि पदारथ भरा भँडारू । पुन्य प्रदेस देस अति चारू ॥
उस राजाका सत्य मन्त्री है, श्रद्धा प्यारी स्त्री है और श्रीवेणीमाधवजी- सरीखे हितकारी मित्र हैं । चार पदार्थों ( धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष ) से भण्डार भरा है और वह पुण्यमय प्रान्त ही उस राजाका सुन्दर देश है ॥२ ॥
छेत्रु अगम गढु गाढ़ सुहावा । सपनेहुँ नहिं प्रतिपच्छिन्ह पावा ॥
सेन सकल तीरथ बर बीरा । कलुष अनीक दलन रनधीरा ॥
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* ** अयोध्याकाण्ड ४३१ प्रयाग क्षेत्र ही दुर्गम, मजबूत और सुन्दर गढ़ ( किला ) है, जिसको स्वप्नमें भी [ पापरूपी ] शत्रु नहीं पा सके हैं । सम्पूर्ण तीर्थ ही उसके श्रेष्ठ वीर सैनिक हैं, जो पापकी सेनाको कुचल डालनेवाले और बड़े रणधीर हैं ॥ ३ ॥
संगमु सिंहासनु सुठि सोहा । छत्रु अखयबटु मुनि मनु मोहा ॥
चवँर जमुन अरु गंग तरंगा । देखि होहिं दुख दारिद भंगा ॥
[ गङ्गा, यमुना और सरस्वतीका ] सङ्गम ही उसका अत्यन्त सुशोभित सिंहासन है । अक्षयवट छत्र है, जो मुनियोंके भी मनको मोहित कर लेता है । यमुनाजी और गङ्गाजीकी तरंगें उसके [ श्याम और श्वेत ] चँवर हैं, जिनको देखकर ही दुःख और दरिद्रता नष्ट हो जाती है ॥४ ॥
दो० – सेवहिं सुकृती साधु सुचि पावहिं सब मनकाम ।
बंदी बेद पुरान गन कहहिं बिमल गुन ग्राम ॥१०५ ॥
पुण्यात्मा, पवित्र साधु उसकी सेवा करते हैं और सब मनोरथ पाते हैं । वेद और पुराणोंके समूह भाट हैं, जो उसके निर्मल गुणगणोंका बखान करते हैं ॥ १०५ ॥
को कहि सकइ प्रयाग प्रभाऊ । कलुष पुंज कुंजर मृगराऊ ॥
अस तीरथपति देखि सुहावा । सुख सागर रघुबर सुखु पावा ॥
पापोंके समूहरूपी हाथीके मारनेके लिये सिंहरूप प्रयागराजका प्रभाव ( महत्त्व- माहात्म्य ) कौन कह सकता है । ऐसे सुहावने तीर्थराजका दर्शन कर सुखके समुद्र रघुकुलश्रेष्ठ श्रीरामजीने भी सुख पाया ॥ १ ॥
कहि सिय लखनहि सखहि सुनाई । श्रीमुख तीरथराज बड़ाई ॥
करि प्रनामु देखत बन बागा । कहत महातम अति अनुरागा ॥
उन्होंने अपने श्रीमुखसे सीताजी, लक्ष्मणजी और सखा गुहको तीर्थराजकी महिमा कहकर सुनायी । तदनन्तर प्रणाम करके, वन और बगीचोंको देखते हुए और बड़े प्रेमसे माहात्म्य कहते हुए—॥२ ॥
एहि बिधि आइ बिलोकी बेनी । सुमिरत सकल सुमंगल देनी ॥
मुदित नहाइ कीन्हि सिव सेवा । पूजि जथाबिधि तीरथ देवा ॥
इस प्रकार श्रीरामने आकर त्रिवेणीका दर्शन किया, जो स्मरण करनेसे ही सब सुन्दर मङ्गलोंको देनेवाली है । फिर आनन्दपूर्वक [ त्रिवेणीमें ] स्नान करके शिवजीकी सेवा ( पूजा ) की और विधिपूर्वक तीर्थदेवताओंका पूजन किया ॥ ३ ॥
तब प्रभु भरद्वाज पहिं आए । करत दंडवत मुनि उर लाए ॥
मुनि मन मोद न कछु कहि जाई । ब्रह्मानंद रासि जनु पाई ॥
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* *४३२ रामचरितमानस [ स्नान, पूजन आदि सब करके ] तब प्रभु श्रीरामजी भरद्वाजजीके पास आये । उन्हें दण्डवत् करते हुए ही मुनिने हृदयसे लगा लिया । मुनिके मनका आनन्द कुछ कहा नहीं जाता । मानो उन्हें ब्रह्मानन्दकी राशि मिल गयी हो ॥४ ॥
दो० - दीन्हि असीस मुनीस उर अति अनंदु अस जानि ।
लोचन गोचर सुकृत फल मनहुँ किए बिधि आनि ॥ १०६ ॥
मुनीश्वर भरद्वाजजीने आशीर्वाद दिया । उनके हृदयमें ऐसा जानकर अत्यन्त आनन्द हुआ कि आज विधाताने [ श्रीसीताजी और लक्ष्मणजीसहित प्रभु श्रीरामचन्द्रजीके दर्शन कराकर ] मानो हमारे सम्पूर्ण पुण्योंके फलको लाकर आँखोंके सामने कर दिया ॥ १०६ ॥
कुसल प्रस्त्र करि आसन दीन्हे । पूजि प्रेम परिपूरन कीन्हे ॥
कंद मूल फल अंकुर नीके । दिए आनि मुनि मनहुँ अमी के ॥
कुशल पूछकर मुनिराजने उनको आसन दिये और प्रेमसहित पूजन करके उन्हें सन्तुष्ट कर दिया । फिर मानो अमृतके ही बने हों, ऐसे अच्छे-अच्छे कन्द, मूल, फल और अंकुर लाकर दिये ॥ १ ॥
सीय लखन जन सहित सुहाए । अति रुचि राम मूल फल खाए ॥
भए बिगतश्रम रामु सुखारे । भरद्वाज मृदु बचन उचारे ॥
सीताजी, लक्ष्मणजी और सेवक गुहसहित श्रीरामचन्द्रजीने उन सुन्दर मूल- फलोंको बड़ी रुचिके साथ खाया । थकावट दूर होनेसे श्रीरामचन्द्रजी सुखी हो गये । तब भरद्वाजजीने उनसे कोमल वचन कहे—॥२ ॥
आजु सुफल तपु तीरथ त्यागू । आजु सुफल जप जोग बिराग ॥
सफल सकल सुभ साधन साजू । राम तुम्हहि अवलोकत आजू॥
हे राम! आपका दर्शन करते ही आज मेरा तप, तीर्थसेवन और त्याग सफल हो गया । आज मेरा जप, योग और वैराग्य सफल हो गया और आज मेरे सम्पूर्ण शुभ साधनोंका समुदाय भी सफल हो गया ॥३ ॥
लाभ अवधि सुख अवधि न दूजी । तुम्हरें दरस आस सब पूजी ॥
अब करि कृपा देहु बर एहू । निज पद सरसिज सहज सनेहू ॥
लाभकी सीमा और सुखकी सीमा [प्रभुके दर्शनको छोड़कर ] दूसरी कुछ भी नहीं है । आपके दर्शनसे मेरी सब आशाएँ पूर्ण हो गयीं । अब कृपा करके यह वरदान दीजिये कि आपके चरणकमलोंमें मेरा स्वाभाविक प्रेम हो ॥४ ॥
दो०– करमबचन मन छाड़ि छलु जब लगि जनु न तुम्हार ।
तब लगि सुखु सपनेहुँ नहीं किएँ कोटि उपचार ॥ १०७ ॥
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* * अयोध्याकाण्ड ४३३ जबतक कर्म, वचन और मनसे छल छोड़कर मनुष्य आपका दास नहीं हो जाता, तबतक करोड़ों उपाय करनेसे भी, स्वप्नमें भी वह सुख नहीं पाता ॥१०७ ॥
सुनि मुनि बचन रामु सकुचाने । भाव भगति आनंद अघाने ॥
तब रघुबर मुनि सुजसु सुहावा । कोटि भाँति कहि सबहि सुनावा ॥
मुनिके वचन सुनकर, उनकी भाव- भक्तिके कारण आनन्दसे तृप्त हुए भगवान् श्रीरामचन्द्रजी [ लीलाकी दृष्टिसे ] सकुचा गये । तब [ अपने ऐश्वर्यको छिपाते हुए ] श्रीरामचन्द्रजीने भरद्वाज मुनिका सुन्दर सुयश करोड़ों ( अनेकों) प्रकारसे कहकर सबको सुनाया ॥ १ ॥
सो बड़ सो सब गुन गन गेहू । जेहि मुनीस तुम्ह आदर देहू॥
मुनि रघुबीर परसपर नवहीं । बचन अगोचर सुख अनुभवहीं ॥
[ उन्होंने कहा— ] हे मुनीश्वर! जिसको आप आदर दें, वही बड़ा है और वही सब गुणसमूहोंका घर है । इस प्रकार श्रीरामजी और मुनि भरद्वाजजी दोनों परस्पर विनम्र हो रहे हैं और अनिर्वचनीय सुखका अनुभव कर रहे हैं ॥२ ॥
यह सुधि पाइ प्रयाग निवासी । बटु तापस मुनि सिद्ध उदासी ॥
भरद्वाज आश्रम सब आए । देखन दसरथ सुअन सुहाए ॥
यह ( श्रीराम, लक्ष्मण और सीताजीके आनेकी ) खबर पाकर प्रयागनिवासी ब्रह्मचारी, तपस्वी, मुनि, सिद्ध और उदासी सब श्रीदशरथजीके सुन्दर पुत्रोंको देखनेके लिये भरद्वाजजीके आश्रमपर आये ॥ ३ ॥
देहिंराम प्रनामअसीस कीन्हपरम सबसुखु काहूपाई ॥ मुदितफिरे भएसराहतलहि लोयनसुंदरताईलाहू॥॥ श्रीरामचन्द्रजीने सब किसीको प्रणाम किया । नेत्रोंका लाभ पाकर सब आनन्दित हो गये और परम सुख पाकर आशीर्वाद देने लगे । श्रीरामजीके सौन्दर्यकी सराहना करते हुए वे लौटे ॥ ४ ॥
दो० - राम कीन्ह बिश्राम निसि प्रात प्रयाग नहाइ ।
चले सहित सिय लखन जन मुदित मुनिहि सिरु नाइ ॥ १०८ ॥
श्रीरामजीने रातको वहीं विश्राम किया और प्रातः काल प्रयागराजका स्नान करके और प्रसन्नताके साथ मुनिको सिर नवाकर श्रीसीताजी, लक्ष्मणजी और सेवक गुहके साथ वे चले ॥ १०८ ॥
राम सप्रेम कहेउ मुनि पाहीं । नाथ कहिअ हम केहि मग जाहीं ॥
मुनि मन बिहसि राम सन कहहीं । सुगम सकल मग तुम्ह कहुँ अहहीं ॥
[ चलते समय ] बड़े प्रेमसे श्रीरामजीने मुनिसे कहा- हे नाथ! बताइये हम किस मार्गसे जायँ । मुनि मनमें हँसकर श्रीरामजीसे कहते हैं कि आपके लिये सभी मार्ग सुगम हैं ॥१ ॥
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*:*४३४ रामचरितमानस
साथ लागि मुनि सिष्य बोलाए । सुनि मन मुदित पचासक आए ॥
सबन्हि राम पर प्रेम अपारा । सकल कहहिं मगु दीख हमारा ॥
फिर उनके साथके लिये मुनिने शिष्योंको बुलाया । [ साथ जानेकी बात] सुनते ही चित्तमें हर्षित हो कोई पचास शिष्य आ गये । सभीका श्रीरामजीपर अपार प्रेम है । सभी कहते हैं कि मार्ग हमारा देखा हुआ है ॥२ ॥
मुनि बटु चारि संग तब दीन्हे । जिन्ह बहु जनम सुकृत सब कीन्हे ॥
करि प्रनामु रिषि आयसु पाई । प्रमुदित हृदयँ चले रघुराई ॥
तब मुनिने [ चुनकर ] चार ब्रह्मचारियोंको साथ कर दिया, जिन्होंने बहुत जन्मोंतक सब सुकृत ( पुण्य ) किये थे । श्रीरघुनाथजी प्रणाम कर और ऋषिकी आज्ञा पाकर हृदयमें बड़े ही आनन्दित होकर चले ॥३ ॥
ग्राम निकट जब निकसहिं जाई । देखहिं दरसु नारि नर धाई ॥
होहिं सनाथ जनम फलु पाई । फिरहिं दुखित मनु संग पठाई ॥
जब वे किसी गाँवके पास होकर निकलते हैं तब स्त्री - पुरुष दौड़कर उनके रूपको देखने लगते हैं । जन्मका फल पाकर वे [सदाके अनाथ ] सनाथ हो जाते हैं और मनको नाथके साथ भेजकर [ शरीरसे साथ न रहनेके कारण] दुःखी होकर लौट आते हैं ॥ ४ ॥
दो० - बिदा किए बटु बिनय करि फिरे पाइ मन काम ।
उतरि नहाए जमुन जल जो सरीर सम स्याम ॥ १० ९ ॥
तदनन्तर श्रीरामजीने विनती करके चारों ब्रह्मचारियोंको विदा किया; वे मनचाही वस्तु ( अनन्य भक्ति) पाकर लौटे । यमुनाजीके पार उतरकर सबने यमुनाजीके जलमें स्नान किया, जो श्रीरामचन्द्रजीके शरीरके समान ही श्याम रंगका था ॥ १० ९ ॥
सुनत तीरबासी नर नारी । धाए निज निज काज बिसारी ॥
लखन राम सिय सुंदरताई । देखि करहिं निज भाग्य बड़ाई ॥
यमुनाजीके किनारेपर रहनेवाले स्त्री- पुरुष [ यह सुनकर कि निषादके साथ दो परम सुन्दर सुकुमार नवयुवक और एक परम सुन्दरी स्त्री आ रही है ] सब अपना- अपना काम भूलकर दौड़े और लक्ष्मणजी, श्रीरामजी और सीताजीका सौन्दर्य देखकर अपने भाग्यकी बड़ाई करने लगे ॥१ ॥
अति लालसा बसहिं मन माहीं । नाउँ गाउँ बूझत सकुचाहीं ॥
जे तिन्ह महुँ बयबिरिध सयाने । तिन्ह करि जुगुति रामु पहिचाने ॥
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* ** अयोध्याकाण्ड ४३५ उनके मनमें [ परिचय जाननेकी ] बहुत - सी लालसाएँ भरी हैं । पर वे नाम - गाँव पूछते सकुचाते हैं । उन लोगोंमें जो वयोवृद्ध और चतुर थे; उन्होंने युक्तिसे श्रीरामचन्द्रजीको पहचान लिया ॥ २ ॥
सकल कथा तिन्ह सबहि सुनाई । बनहि चले पितु आयसु पाई ॥
सुनि सबिषाद सकल पछिताहीं । रानी रायँ कीन्ह भल नाहीं ॥
उन्होंने सब कथा सब लोगोंको सुनायी कि पिताकी आज्ञापाकर ये वनको चले हैं । यह सुनकर सब लोग दु:खित हो पछता रहे हैं कि रानी और राजाने अच्छा नहीं किया ॥३ ॥
तेहि अवसर एक तापसु आवा । तेजपुंज लघुबयस सुहावा ॥
कबि अलखित गति बेषु बिरागी । मन क्रम बचन राम अनुरागी ॥
उसी अवसरपर वहाँ एक तपस्वी आया, जो तेजका पुञ्ज, छोटी अवस्थाका और सुन्दर था । उसकी गति कवि नहीं जानते [ अथवा वह कवि था जो अपना परिचय नहीं देना चाहता ] । वह वैरागी वेषमें था और मन, वचन तथा कर्मसे श्रीरामचन्द्रजीका प्रेमी था ॥ ४ ॥
[ इस तेजःपुञ्ज तापसके प्रसंगको कुछ टीकाकार क्षेपक मानते हैं और कुछ लोगोंके देखनेमें यह अप्रासंगिक और ऊपरसे जोड़ा हुआ -सा जान भी पड़ता है, परन्तु यह सभी प्राचीन प्रतियोंमें है । गुसाईंजी अलौकिक अनुभवी पुरुष थे । पता नहीं, यहाँ इस प्रसंगके रखनेमें क्या रहस्य है; परन्तु यह क्षेपक तो नहीं है । इस तापसको जब ' कबि अलखित गति ' कहते हैं, तब निश्चयपूर्वक कौन क्या कह सकता है । हमारी समझसे ये तापस या तो श्रीहनुमानजी थे अथवा ध्यानस्थ तुलसीदासजी! ]
दो० – सजल नयन तन पुलकि निज इष्टदेउ पहिचानि ।
परेड दंड जिमि धरनितल दसा न जाइ बखानि ॥ ११० ॥
अपने इष्टदेवको पहचानकर उसके नेत्रोंमें जल भर आया और शरीर पुलकित हो गया । वह दण्डकी भाँति पृथ्वीपर गिर पड़ा, उसकी [प्रेमविह्वल ] दशाका वर्णन नहीं किया जा सकता ॥ ११० ॥
राम सप्रेम पुलकि उर लावा । परम रंक जनु पारसु पावा ॥
मनहुँ प्रेमु परमारथु दोऊ । मिलत धरें तन कह सबु कोऊ । श्रीरामजीने प्रेमपूर्वक पुलकित होकर उसको हृदयसे लगा लिया । [ उसे इतना आनन्द हुआ ] मानो कोई महादरिद्री मनुष्य पारस पा गया हो । सब कोई [ देखनेवाले ] कहने लगे कि मानो प्रेम और परमार्थ ( परम तत्त्व) दोनों शरीर धारण करके मिल रहे हैं ॥ १ ॥
बहुरि लखन पायन्ह सोइ लागा । लीन्ह उठाइ उमगि अनुरागा ॥
पुनि सिय चरन धूरि धरि सीसा । जननि जानि सिसु दीन्हि असीसा ॥
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* *४३६ रामचरितमानस फिर वह लक्ष्मणजीके चरणों लगा । उन्होंने प्रेमसे उमँगकर उसको उठा लिया । फिर उसने सीताजीकी चरणधूलिको अपने सिरपर धारण किया । माता सीताजीने भी उसको अपना छोटा बच्चा जानकर आशीर्वाद दिया ॥ २ ॥
कीन्ह निषाद दंडवत तेही ॥ मिलेउ मुदित लखि राम सनेही ॥
पिअत नयन पुट रूपु पियूषा । मुदित सुअसनु पाइ जिमि भूखा ॥
फिर निषादराजने उसको दण्डवत् की । श्रीरामचन्द्रजीका प्रेमी जानकर वह उस ( निषाद ) से आनन्दित होकर मिला । वह तपस्वी अपने नेत्ररूपी दोनोंसे श्रीरामजीकी सौन्दर्य- सुधाका पान करने लगा और ऐसा आनन्दित हुआ जैसे कोई भूखा आदमी सुन्दर भोजन पाकर आनन्दित होता है ॥३ ॥
ते पितु मातु कहहु सखि कैसे । जिन्ह पठए बन बालक ऐसे ॥
राम लखन सिय रूप निहारी । होहिं सनेह बिकल नर नारी ॥
[ इधर गाँवकी स्त्रियाँ कह रही हैं - ] हे सखी! कहो तो,वे माता - पिता कैसे हैं जिन्होंने ऐसे ( सुन्दर सुकुमार ) बालकोंको वनमें भेज दिया है । श्रीरामजी, लक्ष्मणजी और सीताजीके रूपको देखकर सब स्त्री- पुरुष स्नेहसे व्याकुल हो जाते हैं ॥ ४ ॥
दो० – तब रघुबीर अनेक बिधि सखहि सिखावनु दीन्ह ।
राम रजायसु सीस धरि भवन गवनु तेइँ कीन्ह ॥ १११ ॥
तब श्रीरामचन्द्रजीने सखा गुहको अनेकों तरहसे [घर लौट जानेके लिये ] समझाया ।
श्रीरामचन्द्रजीकी आज्ञाको सिर चढ़ाकर उसने अपने घरको गमन किया ॥ १११ ॥
पुनि सियँ राम लखन कर जोरी । जमुनहि कीन्ह प्रनामु बहोरी ॥
चले ससीय मुदित दोउ भाई । रबितनुजा कइ करत बड़ाई ॥
फिर सीताजी, श्रीरामजी और लक्ष्मणजीने हाथ जोड़कर यमुनाजीको पुनः प्रणाम किया और सूर्यकन्या यमुनाजीकी बड़ाई करते हुए सीताजीसहित दोनों भाई प्रसन्नतापूर्वक आगे चले ॥ १ ॥
पथिक अनेक मिलहिं मग जाता । कहहिं सप्रेम देखि दोउ भ्राता ॥
राज लखन सब अंग तुम्हारें । देखि सोचु अति हृदय हमारें ॥
रास्तेमें जाते हुए उन्हें अनेकों यात्री मिलते हैं । वे दोनों भाइयोंको देखकर उनसे प्रेमपूर्वक कहते हैं कि तुम्हारे सब अङ्गोंमें राजचिह्न देखकर हमारे हृदयमें बड़ा सोच होता है ॥२ ॥
मारग चलहु पयादेहि पाएँ । ज्योतिषु झूठ हमारें भाएँ ॥
अगमु पंथु गिरि कानन भारी । तेहि महँ साथ नारि सुकुमारी ॥
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* ** अयोध्याकाण्ड ४३७ [ ऐसे राजचिह्नोंके होते हुए भी ] तुमलोग रास्तेमें पैदल ही चल रहे हो, इससे हमारी समझमें आता है कि ज्योतिष - शास्त्र झूठा ही है । भारी जंगल और बड़े - बड़े पहाड़ोंका दुर्गम रास्ता है । तिसपर तुम्हारे साथ सुकुमारी स्त्री है ॥ ३ ॥
करि केहरि बन जाइ न जोई । हम सँग चलहिं जो आयसु होई ॥
जाब जहाँ लगि तहँ पहुँचाई । फिरब बहोरि तुम्हहि सिरु नाई ॥
हाथी और सिंहोंसे भरा यह भयानक वन देखातक नहीं जाता । यदि आज्ञा हो तो हम साथ चलें । आप जहाँतक जायँगे वहाँतक पहुँचाकर, फिर आपको प्रणाम करके हम लौट आवेंगे ॥४ ॥
दो० – एहि बिधि पूँछहिं प्रेम बस पुलक गात जलु नैन ।
कृपासिंधु फेरहिं तिन्हहि कहि बिनीत मृदु बैन ॥ ११२ ॥
इस प्रकार वे यात्री प्रेमवश पुलकितशरीर हो और नेत्रोंमें [ प्रेमाश्रुओंका ] जल भरकर पूछते हैं । किन्तु कृपाके समुद्र श्रीरामचन्द्रजी कोमल विनययुक्त वचन कहकर उन्हें लौटा देते हैं ॥ ११२ ॥
जे पुर गाँव बसहिं मग माहीं । तिन्हहि नाग सुर नगर सिहाहीं ॥
केहि सुकृतीं केहि घरीं बसाए । धन्य पुन्यमय परम सुहाए ॥
जो गाँव और पुरवे रास्तेमें बसे हैं, नागों और देवताओंके नगर उनको देखकर प्रशंसापूर्वक ईर्ष्या करते और ललचाते हुए कहते हैं कि किस पुण्यवान्ने किस शुभ घड़ीमें इनको बसाया था, जो आज ये इतने धन्य और पुण्यमय तथा परम सुन्दर हो रहे हैं ॥१ ॥
जहँ जहँ राम चरन चलि जाहीं । तिन्ह समान अमरावति नाहीं ॥
पुन्यपुंज मग निकट निवासी । तिन्हहि सराहहिं सुरपुरबासी ॥
जहाँ- जहाँ श्रीरामचन्द्रजीके चरण चले जाते हैं, उनके समान इन्द्रकी पुरी अमरावती भी नहीं है । रास्तेके समीप बसनेवाले भी बड़े पुण्यात्मा हैं - स्वर्गमें रहनेवाले देवता भी उनकी सराहना करते हैं - ॥२ ॥
जे भरि नयन बिलोकहिं रामहि । सीता लखन सहित घनस्यामहि ॥
जे सर सरित राम अवगाहहिं । तिन्हहि देव सर सरित सराहहिं ॥
जो नेत्र भरकर सीताजी और लक्ष्मणजीसहित घनश्याम श्रीरामजीके दर्शन करते हैं, जिन तालाबों और नदियोंमें श्रीरामजी स्नान कर लेते हैं, देवसरोवर और देवनदियाँ भी उनकी बड़ाई करती हैं ॥ ३ ॥
जेहि तरु तर प्रभु बैठहिं जाई । करहिं कलपतरु तासु बड़ाई ॥
परसि राम पद पदुम परागा । मानति भूमि भूरि निज भागा ॥
जिस वृक्षके नीचे प्रभु जा बैठते हैं, कल्पवृक्ष भी उसकी बड़ाई करते हैं । श्रीरामचन्द्रजीके चरणकमलोंकी रजका स्पर्श करके पृथ्वी अपना बड़ा सौभाग्य मानती है ॥४ ॥
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* *४३८ रामचरितमानस
दो०– छाँह करहिं घन बिबुधगन बरषहिं सुमन सिहाहिं ।
देखत गिरि बन बिहग मृग रामु चले मग जाहिं ॥ ११३ ॥
रास्तेमें बादल छाया करते हैं और देवता फूल बरसाते और सिहाते हैं । पर्वत, वन और पशु-पक्षियोंको देखते हुए श्रीरामजी रास्तेमें चले जा रहे हैं ॥११३ ॥
सीता लखन सहित रघुराई । गाँव निकट जब निकसहिं जाई ॥
सुनि सब बाल बृद्ध नर नारी । चलहिं तुरत गृह काजु बिसारी ॥
सीताजी और लक्ष्मणजीसहित श्रीरघुनाथजी जब किसी गाँवके पास जा निकलते हैं तब उनका आना सुनते ही बालक- बूढ़े, स्त्री- पुरुष सब अपने घर और काम- काजको भूलकर तुरंत उन्हें देखनेके लिये चल देते हैं ॥१ ॥
राम लखन सिय रूप निहारी । पाइ नयन फलु होहिं सुखारी ॥
सजल बिलोचन पुलक सरीरा । सब भए मगन देखि दोउ बीरा ॥
श्रीराम, लक्ष्मण और सीताजीका रूप देखकर, नेत्रोंका [ परम ] फल पाकर वे सुखी होते हैं । दोनों भाइयोंको देखकर सब प्रेमानन्दमें मग्न हो गये । उनके नेत्रोंमें जल भर आया और शरीर पुलकित हो गये ॥ २ ॥
बरनि न जाइ दसा तिन्ह केरी । लहि जनु रंकन्ह सुरमनि ढेरी ॥
एकन्ह एक बोलि सिख देहीं । लोचन लाहु लेहु छन एहीं ॥
उनकी दशा वर्णन नहीं की जाती । मानो दरिद्रोंने चिन्तामणिकी ढेरी पा ली हो । वे एक-एकको पुकारकर सीख देते हैं कि इसी क्षण नेत्रोंका लाभ ले लो ॥३ ॥
रामहि देखि एक अनुरागे । चितवत चले जाहिं सँग लागे ॥
एक नयन मग छबि उर आनी । होहिं सिथिल तन मन बर बानी ॥
कोई श्रीरामचन्द्रजीको देखकर ऐसे अनुरागमें भर गये हैं कि वे उन्हें देखते हुए उनके साथ लगे चले जा रहे हैं । कोई नेत्रमार्गसे उनकी छविको हृदयमें लाकर शरीर, मन और श्रेष्ठ वाणीसे शिथिल हो जाते हैं ( अर्थात् उनके शरीर, मन और वाणीका व्यवहार बंद हो जाता है ) ॥ ४ ॥
दो०– एक देखि बट छाँह भलि डासि मृदुल तृन पात ।
कहहिं गवाँइअ छिनुकु श्रमु गवनब अबहिं कि प्रात ॥ ११४ ॥
कोई बड़की सुन्दर छाया देखकर, वहाँ नरम घास और पत्ते बिछाकर कहते हैं कि क्षणभर
यहाँ बैठकर थकावट मिटा लीजिये । फिर चाहे अभी चले जाइयेगा, चाहे सबेरे ॥ ११४ ॥