श्रीरामचरितमानस — पृष्ठ 441–450
श्रीरामचरितमानस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 441–450
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* * अयोध्याकाण्ड ४३ ९
एक कलस भरि आनहिं पानी । अँचइअ नाथ कहहिं मृदु बानी ॥
सुनि प्रिय बचन प्रीति अति देखी । राम कृपाल सुसील बिसेषी ॥
कोई घड़ा भरकर पानी ले आते हैं और कोमल वाणीसे कहते हैं - नाथ! आचमन तो कर लीजिये । उनके प्यारे वचन सुनकर और उनका अत्यन्त प्रेम देखकर दयालु और परम सुशील श्रीरामचन्द्रजीने — ॥१ ॥
जानी श्रमित सीय मन माहीं । घरिक बिलंबु कीन्ह बट छाहीं ॥
मुदित नारि नर देखहिं सोभा । रूप अनूप नयन मनु लोभा ॥
मनमें सीताजीको थकी हुई जानकर घड़ीभर बड़की छायामें विश्राम किया । स्त्री - पुरुष आनन्दित होकर शोभा देखते हैं । अनुपम रूपने उनके नेत्र और मनोंको लुभा लिया है ॥२ ॥
एकटक सब सोहहिं चहुँ ओरा । रामचंद्र मुख चंद चकोरा ॥
तरुन तमाल बरन तनु सोहा । देखत कोटि मदन मनु मोहा ॥
सब लोग टकटकी लगाये श्रीरामचन्द्रजीके मुखचन्द्रको चकोरकी तरह ( तन्मय होकर ) देखते हुए चारों ओर सुशोभित हो रहे हैं । श्रीरामजीका नवीन तमाल वृक्षके रंगका ( श्याम ) शरीर अत्यन्त शोभा दे रहा है, जिसे देखते ही करोड़ों कामदेवोंके मन मोहित हो जाते हैं ॥३ ॥
दामिनि बरन लखन सुठि नीके । नख सिख सुभग भावते जी के ॥
मुनिपट कटिन्ह कसें तूनीरा । सोहहिं कर कमलनि धनु तीरा ॥
बिजलीके - से रंगके लक्ष्मणजी बहुत ही भले मालूम होते हैं । वे नखसे शिखातक सुन्दर हैं, और मनको बहुत भाते हैं । दोनों मुनियोंके ( वल्कल आदि ) वस्त्र पहने हैं और कमरमें तरकस कसे हुए हैं । कमलके समान हाथोंमें धनुष -बाण शोभित हो रहे हैं ॥४ ॥
दो० – जटा मुकुट सीसनि सुभग उर भुज नयन बिसाल ।
सरद परब बिधु बदन बर लसत स्वेद कन जाल ॥ ११५ ॥
उनके सिरोंपर सुन्दर जटाओंके मुकुट हैं; वक्ष: स्थल, भुजा और नेत्र विशाल हैं और शरत्पूर्णिमाके चन्द्रमाके समान सुन्दर मुखोंपर पसीनेकी बूँदोंका समूह शोभित हो रहा है ॥ ११५ ॥
बरनि न जाइ मनोहर जोरी । सोभा बहुत थोरि मति मोरी ॥
राम लखन सिय सुंदरताई । सब चितवहिं चित मन मति लाई ॥
उस मनोहर जोड़ीका वर्णन नहीं किया जा सकता; क्योंकि शोभा बहुत अधिक है, और मेरी बुद्धि थोड़ी है । श्रीराम, लक्ष्मण और सीताजीकी सुन्दरताको सब लोग मन, चित्त और बुद्धि तीनोंको लगाकर देख रहे हैं ॥ १ ॥
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* *४४० रामचरितमानस
थके नारि नर प्रेम पिआसे । मनहुँ मृगी मृग देखि दिआ से ॥
सीय समीप ग्रामतिय जाहीं । पूँछत अति सनेहँ सकुचाहीं ॥
प्रेमके प्यासे [ वे गाँवोंके ] स्त्री- पुरुष [ इनके सौन्दर्य- माधुर्यकी छटा देखकर ] ऐसे थकित रह गये जैसे दीपकको देखकर हिरनी और हिरन [निस्तब्ध रह जाते हैं ]! गाँवोंकी स्त्रियाँ सीताजीके पास जाती हैं; परन्तु अत्यन्त स्नेहके कारण पूछते सकुचाती हैं ॥२ ॥
बार बार सब लागहिं पाएँ । कहहिं बचन मृदु सरल सुभाएँ ॥
राजकुमारि बिनय हम करहीं । तिय सुभायँ कछु पूँछत डरहीं ॥
बार - बार सब उनके पाँव लगतीं और सहज ही सीधे -सादे कोमल वचन कहती हैं —हे राजकुमारी! हम विनती करती ( कुछ निवेदन करना चाहती हैं, परन्तु स्त्री- स्वभावके कारण कुछ पूछते हुए डरती हैं ॥ ३ ॥
स्वामिनि अबिनय छमबि हमारी । बिलगु न मानब जानि गवाँरी ॥
राजकुअर दोउ सहज सलोने । इन्ह तें लही दुति मरकत सोने ॥
हे स्वामिनि! हमारी ढिठाई क्षमा कीजियेगा और हमको गँवारी जानकर बुरा न मानियेगा । ये दोनों राजकुमार स्वभावसे ही लावण्यमय ( परम सुन्दर ) हैं । मरकतमणि ( पन्ने ) और सुवर्णने कान्ति इन्हींसे पायी है ( अर्थात् मरकतमणिमें और स्वर्णमें जो हरित और स्वर्णवर्णकी आभा है वह इनकी हरिताभनील और स्वर्णकान्तिके एक कणके बराबर भी नहीं है ) ॥४ ॥
दो० – स्यामल गौर किसोर बर सुंदर सुषमा ऐन ।
सरद सर्बरीनाथ मुखु सरद सरोरुह नैन ॥ ११६ ॥
श्याम और गौर वर्ण है, सुन्दर किशोर अवस्था है; दोनों ही परम सुन्दर और शोभाके धाम हैं । शरत्पूर्णिमाके चन्द्रमाके समान इनके मुख और शरद् ऋतुके कमलके समान इनके नेत्र हैं ॥ ११६ ॥
मासपारायण, सोलहवाँ विश्राम नवाह्नपारायण, चौथा विश्राम
कोटि मनोज लजावनिहारे । सुमुखि कहहु को आहिं तुम्हारे ॥
सुनि सनेहमय मंजुल बानी । सकुची सिय मन महुँ मुसुकानी ॥
हे सुमुखि! कहो तो अपनी सुन्दरतासे करोड़ों कामदेवोंको लजानेवाले ये तुम्हारे कौन हैं? उनकी ऐसी प्रेममयी सुन्दर वाणी सुनकर सीताजी सकुचा गयीं और मन ही मन मुसकरायीं ॥ १ ॥
तिन्हहि बिलोकि बिलोकति धरनी । दुहुँ सकोच सकुचति बरबरनी ॥
सकुचि सप्रेम बाल मृग नयनी । बोली मधुर बचन पिकबयनी ॥
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* * अयोध्याकाण्ड ४४१ उत्तम ( गौर ) वर्णवाली सीताजी उनको देखकर [ संकोचवश ] पृथ्वीकी ओर देखती हैं । वे दोनों ओरके संकोचसे सकुचा रही हैं ( अर्थात् न बतानेमें ग्रामकी स्त्रियोंको दुःख होनेका संकोच है और बतानेमें लज्जारूप संकोच) । हिरणके बच्चेके सदृश नेत्रवाली और कोकिलकी-सी वाणीवाली सीताजी सकुचाकर प्रेमसहित मधुर वचन बोलीं—॥२ ॥
सहज सुभाय सुभग तन गोरे । नामु लखनु लघु देवर मोरे ॥
बहुरि बदनु बिधु अंचल ढाँकी । पिय तन चितइ भौंह करि बाँकी ॥
ये जो सहजस्वभाव, सुन्दर और गोरे शरीरके हैं,उनका नाम लक्ष्मण है; ये मेरे छोटे देवर हैं । फिर सीताजीने [ लज्जावश ] अपने चन्द्रमुखको आँचलसे ढककर और प्रियतम ( श्रीरामजी ) की ओर निहारकर भौंहें टेढ़ी करके, ॥ ३ ॥
खंजन मंजु तिरीछे नयननि । निज पति कहेउ तिन्हहि सियँ सयननि ॥
भईं मुदित सब ग्रामबधूटीं । रंकन्ह राय रासि जनु लूटीं ॥
खंजन पक्षीके -से सुन्दर नेत्रोंको तिरछा करके सीताजीने इशारेसे उन्हें कहा कि ये ( श्रीरामचन्द्रजी ) मेरे पति हैं । यह जानकर गाँवकी सब युवती स्त्रियाँ इस प्रकार आनन्दित हुईं मानो कंगालोंने धनकी राशियाँ लूट ली हों ॥ ४ ॥
दो० – अति सप्रेम सिय पायँ परि बहुबिधि देहिं असीस ।
सदा सोहागिनि होहु तुम्ह जब लगि महि अहि सीस ॥ ११७ ॥
वे अत्यन्त प्रेमसे सीताजीके पैरों पड़कर बहुत प्रकारसे आशिष देती हैं ( शुभ कामना करती हैं ) कि जबतक शेषजीके सिरपर पृथ्वी रहे, तबतक तुम सदा सुहागिनी बनी रहो, ॥११७ ॥
पारबती सम पतिप्रिय होहू । देबि न हम पर छाड़ब छोहू ॥
पुनि पुनि बिनय करिअ कर जोरी । जौं एहि मारग फिरिअ बहोरी ॥
और पार्वतीजीके समान अपने पतिकी प्यारी होओ । हे देवि! हमपर कृपा न छोड़ना ( बनाये रखना ) । हम बार- बार हाथ जोड़कर विनती करती हैं जिसमें आप फिर इसी रास्ते लौटें, ॥ १ ॥
दरसनु देब जानि निज दासी । लखीं सीयँ सब प्रेम पिआसी ॥
मधुर बचन कहि कहि परितोषीं । जनु कुमुदिनीं कौमुदीं पोषीं ॥
और हमें अपनी दासी जानकर दर्शन दें । सीताजीने उन सबको प्रेमकी प्यासी देखा, और मधुर वचन कह- कहकर उनका भलीभाँति सन्तोष किया । मानो चाँदनीने कुमुदिनियोंको खिलाकर पुष्ट कर दिया हो ॥ २ ॥
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*:*४४२ रामचरितमानस
तबहिं लखन रघुबर रुख जानी । पूँछेउ मगु लोगन्हि मृदु बानी ॥
सुनत नारि नर भए दुखारी । पुलकित गात बिलोचन बारी ॥
उसी समय श्रीरामचन्द्रजीका रुख जानकर लक्ष्मणजीने कोमल वाणीसे लोगोंसे रास्ता पूछा । यह सुनते ही स्त्री-पुरुष दुःखी हो गये । उनके शरीर पुलकित हो गये और नेत्रोंमें [ वियोगकी सम्भावनासे प्रेमका ] जल भर आया ॥ ३ ॥
मिटा मोदु मन भए मलीने । बिधि निधि दीन्ह लेत जनु छीने ॥
समुझि करम गति धीरजु कीन्हा । सोधि सुगम मगु तिन्ह कहि दीन्हा ॥
उनका आनन्द मिट गया और मन ऐसे उदास हो गये मानो विधाता दी हुई सम्पत्ति छीने लेता हो । कर्मकी गति समझकर उन्होंने धैर्य धारण किया और अच्छी तरह निर्णय करके सुगम मार्ग बतला दिया ॥ ४ ॥
दो० – लखन जानकी सहित तब गवनु कीन्ह रघुनाथ ।
फेरे सब प्रिय बचन कहि लिए लाइ मन साथ ॥ ११८ ॥
तब लक्ष्मणजी और जानकीजीसहित श्रीरघुनाथजीने गमन किया और सब लोगोंको प्रिय वचन कहकर लौटाया, किन्तु उनके मनोंको अपने साथ ही लगा लिया ॥ ११८ ॥
फिरत नारि नर अति पछिताहीं । दैअहि दोषु देहिं मन माहीं ॥
सहित बिषाद परसपर कहहीं । बिधि करतब उलटे सब अहहीं ॥
लौटते हुए वे स्त्री- पुरुष बहुत ही पछताते हैं और मन-ही- मन दैवको दोष देते हैं । परस्पर [ बड़े ही ] विषादके साथ कहते हैं कि विधाताके सभी काम उलटे हैं ॥१ ॥
निपट निरंकुस निठुर निसंकू । जेहिं ससि कीन्ह सरुज सकलंकू ॥
रूख कलपतरु सागरु खारा । तेहिं पठए बन राजकुमारा ॥
वह विधाता बिलकुल निरंकुश (स्वतन्त्र), निर्दय और निडर है, जिसने चन्द्रमाको रोगी ( घटने -बढ़नेवाला ) और कलंकी बनाया, कल्पवृक्षको पेड़ और समुद्रको खारा बनाया । उसीने इन राजकुमारोंको वनमें भेजा है ॥२ ॥
जौं पै इन्हहि दीन्ह बनबासू । कीन्ह बादि बिधि भोग बिलासू॥
ए बिचरहिं मग बिनु पदत्राना । रचे बादि बिधि बाहन नाना ॥
जब विधाताने इनको वनवास दिया है, तब उसने भोग- विलास व्यर्थ ही बनाये । जब ये बिना जूतेके ( नंगे ही पैरों ) रास्तेमें चल रहे हैं, तब विधाता अनेकों वाहन ( सवारियाँ ) व्यर्थ ही रचे ॥३ ॥
ए महि परहिं डासि कुस पाता । सुभग सेज कत सृजत बिधाता ॥
तरुबर बास इन्हहि बिधि दीन्हा । धवल धाम रचि रचि श्रमु कीन्हा ॥
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* ** अयोध्याकाण्ड ४४३ जब ये कुश और पत्ते बिछाकर जमीनपर ही पड़े रहते हैं, तब विधाता सुन्दर सेज ( पलंग और बिछौने ) किसलिये बनाता है? विधाताने जब इनको बड़े - बड़े पेड़ों [ के नीचे ] का निवास दिया, तब उज्ज्वल महलोंको बना- बनाकर उसने व्यर्थ ही परिश्रम किया ॥४ ॥
दो० - जौं ए मुनि पट धर जटिल सुंदर सुठि सुकुमार ।
बिबिध भाँति भूषन बसन बादि किए करतार ॥ ११ ९ ॥
जो ये सुन्दर और अत्यन्त सुकुमार होकर मुनियोंके ( वल्कल ) वस्त्र पहनते और जटा धारण करते हैं, तो फिर करतार ( विधाता ) ने भाँति - भाँतिके गहने और कपड़े वृथा ही बनाये ॥ ११ ९ ॥
जौं ए कंद मूल फल खाहीं । बादि सुधादि असन जग माहीं ॥
एक कहहिं ए सहज सुहाए । आपु प्रगट भए बिधि न बनाए ॥
जो ये कन्द, मूल, फल खाते हैं तो जगत्में अमृत आदि भोजन व्यर्थ ही हैं । कोई एक कहते हैं — ये स्वभावसे ही सुन्दर हैं [ इनका सौन्दर्य- माधुर्य नित्य और स्वाभाविक है ] । ये अपने-आप प्रकट हुए हैं, ब्रह्माके बनाये नहीं हैं ॥१ ॥
जहँ लगि बेद कही बिधि करनी । श्रवन नयन मन गोचर बरनी ॥
देखहु खोजि भुअन दस चारी । कहँ अस पुरुष कहाँ असि नारी ॥
हमारे कानों, नेत्रों और मनके द्वारा अनुभवमें आनेवाली विधाताकी करनीको जहाँतक वेदोंने वर्णन करके कहा है, वहाँतक चौदहों लोकोंमें ढूँढ़ देखो, ऐसे पुरुष और ऐसी स्त्रियाँ कहाँ हैं? [ कहीं भी नहीं हैं, इसीसे सिद्ध है कि ये विधाताके चौदहों लोकोंसे अलग हैं और अपनी महिमासे ही आप निर्मित हुए हैं] ॥२ ॥
इन्हहि देखि बिधि मनु अनुरागा । पटतर जोग बनावै लागा ॥
कीन्ह बहुत श्रम ऐक न आए । तेहिं इरिषा बन आनि दुराए ॥
इन्हें देखकर विधाताका मन अनुरक्त ( मुग्ध) हो गया, तब वह भी इन्हींकी उपमाके योग्य दूसरे स्त्री- पुरुष बनाने लगा । उसने बहुत परिश्रम किया, परन्तु कोई उसकी अटकलमें ही नहीं आये ( पूरे नहीं उतरे ) । इसी ईर्ष्याके मारे उसने इनको जंगलमें लाकर छिपा दिया है ॥ ३ ॥
एक कहहिं हम बहुत न जानहिं । आपुहि परम धन्य करि मानहिं ॥
ते पुनि पुन्यपुंज हम लेखे ॥ जे देखहिं देखिहहिं जिन्ह देखे ॥
कोई एक कहते हैं— हम बहुत नहीं जानते । हाँ, अपनेको परम धन्य अवश्य मानते हैं [जो इनके दर्शन कर रहे हैं ] और हमारी समझमें वे भी बड़े पुण्यवान् हैं जिन्होंने इनको देखा है, जो देख रहे हैं और जो देखेंगे ॥ ४ ॥
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* *४४४ रामचरितमानस
दो० - एहि बिधि कहि कहि बचन प्रिय लेहिं नयन भरि नीर ।
किमि चलिहहिं मारग अगम सुठि सुकुमार सरीर ॥ १२० ॥
इस प्रकार प्रिय वचन कह कहकर सब नेत्रोंमें [ प्रेमाश्रुओंका ] जल भर लेते हैं और कहते हैं कि ये अत्यन्त सुकुमार शरीरवाले दुर्गम ( कठिन ) मार्गमें कैसे चलेंगे ॥ १२० ॥
नारि सनेह बिकल बस होहीं । चकईं साँझ समय जनु सोहीं ॥
मृदु पद कमल कठिन मगु जानी । गहबरि हृदयँ कहहिं बर बानी ॥
स्त्रियाँ स्नेहवश विकल हो जाती हैं । मानो सन्ध्याके समय चकवी [ भावी वियोगकी पीड़ासे ] सोह रही हों ( दुखी हो रही हों) । इनके चरणकमलोंको कोमल तथा मार्गको कठोर जानकर वे व्यथित हृदयसे उत्तम वाणी कहती हैं —॥१ ॥
परसत मृदुल चरन अरुनारे । सकुचति महि जिमि हृदय हमारे ॥
जौं जगदीस इन्हहि बनु दीन्हा । कस न सुमनमय मारगु कीन्हा ॥
इनके कोमल और लाल-लाल चरणों ( तलवों ) को छूते ही पृथ्वी वैसे ही सकुचा जाती है जैसे हमारे हृदय सकुचा रहे हैं । जगदीश्वरने यदि इन्हें वनवास ही दिया, तो सारे रास्तेको पुष्पमय क्यों नहीं बना दिया? ॥२ ॥
जौं मागा पाइअ बिधि पाहीं । ए रखिअहिं सखि आँखिन्ह माहीं ॥
जे नर नारि न अवसर आए । तिन्ह सिय रामु न देखन पाए ॥
यदि ब्रह्मासे माँगे मिले तो हे सखि! [हम तो उनसे माँगकर] इन्हें अपनी आँखोंमें ही रखें! जो स्त्री- पुरुष इस अवसरपर नहीं आये, वे श्रीसीतारामजीको नहीं देख सके ॥३ ॥
सुनि सुरूपु बूझहिं अकुलाई । अब लगि गए कहाँ लगि भाई ॥
समरथ धाइ बिलोकहिं जाई । प्रमुदित फिरहिं जनमफलु पाई ॥
उनके सौन्दर्यको सुनकर वे व्याकुल होकर पूछते हैं कि भाई! अबतक वे कहाँतक गये होंगे? और जो समर्थ हैं वे दौड़ते हुए जाकर उनके दर्शन कर लेते हैं और जन्मका परम फल पाकर, विशेष आनन्दित होकर लौटते हैं ॥ ४ ॥
दो० –- अबला बालक बृद्ध जन कर मीजहिं पछिताहिं ।
होहिं प्रेमबस लोग इमि रामु जहाँ जहँ जाहिं ॥ १२१ ॥
[गर्भवती, प्रसूता आदि ] अबला स्त्रियाँ, बच्चे और बूढ़े [ दर्शन न पानेसे ] हाथ मलते और पछताते हैं । इस प्रकार जहाँ -जहाँ श्रीरामचन्द्रजी जाते हैं, वहाँ -वहाँ लोग प्रेमके वशमें हो जाते हैं ॥१२१ ॥
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* * अयोध्याकाण्ड ४४५
गावँ गावँ अस होइ अनंदू । देखि भानुकुल कैरव चंदू॥
जे कछु समाचार सुनि पावहिं । ते नृप रानिहि दोसु लगावहिं ॥
सूर्यकुलरूपी कुमुदिनीके प्रफुल्लित करनेवाले चन्द्रमास्वरूप श्रीरामचन्द्रजीके दर्शनकर गाँव- गाँवमें ऐसा ही आनन्द हो रहा है । जो लोग [ वनवास दिये जानेका ] कुछ भी समाचार सुन पाते हैं, वे राजा-रानी [ दशरथ कैकेयी ] को दोष लगाते हैं ॥ १ ॥
कहहिं एक अति भल नरनाहू । दीन्ह हमहि जोड़ लोचन लाहू ॥
कहहिं परसपर लोग लोगाईं । बातें सरल सनेह सुहाई ॥
कोई एक कहते हैं कि राजा बहुत ही अच्छे हैं, जिन्होंने हमें अपने नेत्रोंका लाभ दिया । स्त्री- पुरुष सभी आपसमें सीधी, स्नेहभरी सुन्दर बातें कह रहे हैं ॥२ ॥
ते पितु मातु धन्य जिन्ह जाए । धन्य सो नगरु जहाँ तें आए ॥
धन्य सो देसु सैलु बन गाऊँ । जहँ जहँ जाहिं धन्य सोइ ठाऊँ ॥
[ कहते हैं— ] वे माता-पिता धन्य हैं जिन्होंने इन्हें जन्म दिया । वह नगर धन्य है जहाँसे ये आये हैं । वह देश, पर्वत, वन और गाँव धन्य है, और वही स्थान धन्य है जहाँ - जहाँ ये जाते हैं ॥३ ॥
सुखु पायउ बिरंचि रचि तेही । ए जेहि के सब भाँति सनेही ॥
राम लखन पथि कथा सुहाई । रही सकल मग कानन छाई ॥
ब्रह्माने उसीको रचकर सुख पाया है जिसके ये ( श्रीरामचन्द्रजी ) सब प्रकारसे स्नेही हैं । पथिकरूप श्रीराम- लक्ष्मणकी सुन्दर कथा सारे रास्ते और जंगलमें छा गयी है ॥४ ॥
दो० - एहि बिधि रघुकुल कमल रबि मग लोगन्ह सुख देत ।
जाहिं चले देखत बिपिन सिय सौमित्रि समेत ॥ १२२ ॥
रघुकुलरूपी कमलके खिलानेवाले सूर्य श्रीरामचन्द्रजी इस प्रकार मार्गके लोगोंको सुख देते हुए सीताजी और लक्ष्मणजीसहित वनको देखते हुए चले जा रहे हैं ॥ १२२ ॥
आगें रामु लखनु बने पाछें । तापस बेष बिराजत काछें ॥
उभय बीच सिय सोहति कैसें । ब्रह्म जीव बिच माया जैसें ॥
आगे श्रीरामजी हैं, पीछे लक्ष्मणजी सुशोभित हैं । तपस्वियोंके वेष बनाये दोनों बड़ी ही शोभा पा रहे हैं । दोनोंके बीचमें सीताजी कैसी सुशोभित हो रही हैं, जैसे ब्रह्म और जीवके बीचमें माया!॥ १ ॥
बहुरि कहउँ छबि जसि मन बसई । जनु मधु मदन मध्य रति लसई ॥
उपमा बहुरि कहउँ जियँ जोही । जनु बुध बिधु बिच रोहिनि सोही ॥
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* *४४६ रामचरितमानस फिर जैसी छबि मेरे मनमें बस रही है, उसको कहता हूँ- मानो वसन्त ऋतु और कामदेवके बीचमें रति ( कामदेवकी स्त्री) शोभित हो । फिर अपने हृदयमें खोजकर उपमा कहता हूँ कि मानो बुध ( चन्द्रमाके पुत्र ) और चन्द्रमाके बीचमें रोहिणी ( चन्द्रमाकी स्त्री ) सोह रही हो ॥२ ॥
प्रभु पद रेख बीच बिच सीता । धरति चरन मग चलति सभीता ॥
सीय राम पद अंक बराएँ । लखन चलहिं मगु दाहिन लाएँ ॥
प्रभु श्रीरामचन्द्रजीके [ जमीनपर अङ्कित होनेवाले दोनों ] चरणचिह्नोंके बीच - बीचमें पैर रखती हुई सीताजी [ कहीं भगवान्के चरणचिह्नोंपर पैर न टिक जाय इस बातसे ] डरती हुई मार्गमें चल रही हैं, और लक्ष्मणजी [ मर्यादाकी रक्षाके लिये ] सीताजी और श्रीरामचन्द्रजी दोनोंके चरणचिह्नोंको बचाते हुए उन्हें दाहिने रखकर रास्ता चल रहे हैं ॥ ३ ॥
राम लखन सिय प्रीति सुहाई । बचन अगोचर किमि कहि जाई ॥
खग मृग मगन देखि छबि होहीं । लिए चोरि चित राम बटोहीं ॥
श्रीरामजी, लक्ष्मणजी और सीताजीकी सुन्दर प्रीति वाणीका विषय नहीं है ( अर्थात् अनिर्वचनीय है ), अतः वह कैसे कही जा सकती है? पक्षी और पशु भी उस छविको देखकर ( प्रेमानन्दमें ) मग्न हो जाते हैं । पथिकरूप श्रीरामचन्द्रजीने उनके भी चित्त चुरा लिये हैं ॥४ ॥
दो०-जिन्हजिन्ह देखे पथिक प्रिय सिय समेत दोउ भाइ ।
भव मगु अगमु अनंदु तेइ बिनु श्रम रहे सिराइ ॥ १२३ ॥
प्यारे पथिक सीताजीसहित दोनों भाइयोंको जिन -जिन लोगोंने देखा, उन्होंने भवका अगम मार्ग ( जन्म- मृत्युरूपी संसारमें भटकनेका भयानक मार्ग) बिना ही परिश्रम आनन्दके साथ तै कर लिया ( अर्थात् वे आवागमनके चक्रसे सहज ही छूटकर मुक्त हो गये ) ॥ १२३ ॥
अजहुँ जासु उर सपनेहुँ काऊ । बसहुँ लखनु सिय रामु बटाऊ ॥
राम धाम पथ पाइहि सोई । जो पथ पाव कबहुँ मुनि कोई ॥
आज भी जिसके हृदयमें स्वप्नमें भी कभी लक्ष्मण, सीता, राम तीनों बटोही आ बसें, तो वह भी श्रीरामजीके परमधामके उस मार्गको पा जायगा जिस मार्गको कभी कोई बिरले ही मुनि पाते हैं ॥ १ ॥
तब रघुबीर श्रमित सिय जानी । देखि निकट बटु सीतल पानी ॥
तहँ बसि कंद मूल फल खाई । प्रात नहाइ चले रघुराई ॥
तब श्रीरामचन्द्रजी सीताजीको थकी हुई जानकर और समीप ही एक बड़का वृक्ष और ठंडा पानी देखकर उस दिन वहीं ठहर गये । कन्द, मूल, फल खाकर [ रातभर वहाँ रहकर] प्रात: काल स्नान करके श्रीरघुनाथजी आगे चले ॥ २ ॥
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* ** अयोध्याकाण्ड ४४७
देखत बन सर सैल सुहाए । बालमीकि आश्रम प्रभु आए ॥
राम दीख मुनि बासु सुहावन । सुंदर गिरि काननु जलु पावन ॥
सुन्दर वन, तालाब और पर्वत देखते हुए प्रभु श्रीरामचन्द्रजी वाल्मीकिजीके आश्रममें आये । श्रीरामचन्द्रजीने देखा कि मुनिका निवासस्थान बहुत सुन्दर है, जहाँ सुन्दर पर्वत, वन और पवित्र जल है ॥३ ॥
सरनि सरोज बिटप बन फूले । गुंजत मंजु मधुप रस भूले ॥
खग मृग बिपुल कोलाहल करहीं । बिरहित बैर मुदित मन चरहीं ॥
सरोवरोंमें कमल और वनोंमें वृक्ष फूल रहे हैं और मकरन्द -रसमें मस्त हुए भौरे सुन्दर गुंजार कर रहे हैं । बहुत - से पक्षी और पशु कोलाहल कर रहे हैं और वैरसे रहित होकर प्रसन्न मनसे विचर रहे हैं ॥४ ॥
दो० - सुचि सुंदर आश्रमु निरखि हरषे राजिवनेन ।
सुनि रघुबर आगमन मुनि आगें आयउ लेन ॥ १२४ ॥
पवित्र और सुन्दर आश्रमको देखकर कमलनयन श्रीरामचन्द्रजी हर्षित हुए । रघुश्रेष्ठ श्रीरामजीका आगमन सुनकर मुनि वाल्मीकिजी उन्हें लेनेके लिये आगे आये ॥ १२४ ॥
मुनि कहुँ राम दंडवत कीन्हा । आसिरबादु बिप्रबर दीन्हा ॥
देखि राम छबि नयन जुड़ाने । करि सनमानु आश्रमहिं आने ॥
श्रीरामचन्द्रजीने मुनिको दण्डवत् किया । विप्रश्रेष्ठ मुनिने उन्हें आशीर्वाद दिया । श्रीरामचन्द्रजीकी छवि देखकर मुनिके नेत्र शीतल हो गये । सम्मानपूर्वक मुनि उन्हें आश्रममें ले आये ॥१ ॥
मुनिबर अतिथि प्रानप्रिय पाए । कंद मूल फल मधुर मगाए ॥
सिय सौमित्रि राम फल खाए । तब मुनि आश्रम दिए सुहाए ॥
श्रेष्ठ मुनि वाल्मीकिजीने प्राणप्रिय अतिथियोंको पाकर उनके लिये मधुर कन्द, मूल और फल मँगवाये । श्रीसीताजी, लक्ष्मणजी और रामचन्द्रजीने फलोंको खाया । तब मुनिने उनको [ विश्राम करनेके लिये ] सुन्दर स्थान बतला दिये ॥ २ ॥
बालमीकि मन आनँदु भारी । मंगल मूरति नयन निहारी ॥
तब कर कमल जोरि रघुराई । बोले बचन श्रवन सुखदाई ॥
[ मुनि श्रीरामजीके पास बैठे हैं और उनकी ] मङ्गल- मूर्तिको नेत्रोंसे देखकर वाल्मीकिजीके मनमें बड़ा भारी आनन्द हो रहा है । तब श्रीरघुनाथजी कमलसदृश हाथोंको जोड़कर, कानोंको सुख देनेवाले मधुर वचन बोले— ॥ ३ ॥
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* *४४८ रामचरितमानस
तुम्ह त्रिकाल दरसी मुनिनाथा । बिस्व बदर जिमि तुम्हरें हाथा ॥
अस कहि प्रभु सब कथा बखानी । जेहि जेहि भाँति दीन्ह बनु रानी ॥
हे मुनिनाथ! आप त्रिकालदर्शी हैं । सम्पूर्ण विश्व आपके लिये हथेलीपर रखे हुए बेरके समान है । प्रभु श्रीरामचन्द्रजीने ऐसा कहकर फिर जिस-जिस प्रकारसे रानी कैकेयीने वनवास दिया, वह सब कथा विस्तारसे सुनायी ॥४ ॥
दो० –- तात बचन पुनि मातु हित भाइ भरत अस राउ ।
मो कहुँ दरस तुम्हार प्रभु सबु मम पुन्य प्रभाउ ॥ १२५ ॥
[और कहा- ] हे प्रभो! पिताकी आज्ञा [का पालन ], माताका हित और भरत- जैसे [ स्नेही एवं धर्मात्मा ] भाईका राजा होना और फिर मुझे आपके दर्शन होना, यह सब मेरे पुण्योंका प्रभाव है ॥१२५ ॥
देखि पाय मुनिराय तुम्हारे । भए सुकृत सब सुफल हमारे ॥
अब जहँ राउर आयसु होई । मुनि उदबेगु न पावै कोई ॥
हे मुनिराज! आपके चरणोंका दर्शन करनेसे आज हमारे सब पुण्य सफल हो गये ( हमें सारे पुण्योंका फल मिल गया) । अब जहाँ आपकी आज्ञा हो और जहाँ कोई भी मुनि उद्वेगको प्राप्त न हो— ॥१ ॥
मुनि तापस जिन्ह तें दुखु लहहीं । ते नरेस बिनु पावक दहहीं ॥
मंगल मूलमूल बिप्र परितोषू । दहइ कोटि कुल भूसुर रोषू॥
क्योंकि जिनसे मुनि और तपस्वी दुःख पाते हैं, वे राजा बिना अग्निके ही ( अपने दुष्ट कर्मोंसे ही ) जलकर भस्म हो जाते हैं । ब्राह्मणोंका संतोष सब मङ्गलोंकी जड़ है और भूदेव ब्राह्मणोंका क्रोध करोड़ों कुलोंको भस्म कर देता है ॥ २ ॥
असजियँ जानि कहिअ सोइ ठाऊँ । सिय सौमित्रि सहित जहँ जाऊँ ॥
तहँ रचि रुचिर परन तृन साला । बासु करौं कछु काल कृपाला ॥
ऐसा हृदयमें समझकर- वह स्थान बतलाइये जहाँ मैं लक्ष्मण और सीतासहित जाऊँ । और वहाँ सुन्दर पत्तों और घासकी कुटी बनाकर, हे दयालु! कुछ समय निवास करूँ ॥ ३ ॥
सहज सरल सुनि रघुबर बानी । साधु साधु बोले मुनि ग्यानी ॥
कस न कहहु अस रघुकुलकेतू । तुम्ह पालक संतत श्रुति सेतू ॥
श्रीरामजीकी सहज ही सरल वाणी सुनकर ज्ञानी मुनि वाल्मीकि बोले- धन्य! धन्य! हे रघुकुलके ध्वजास्वरूप! आप ऐसा क्यों न कहेंगे? आप सदैव वेदकी मर्यादाका पालन ( रक्षण ) करते हैं ॥४ ॥