श्रीरामचरितमानस — पृष्ठ 451–460

श्रीरामचरितमानस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 451–460

पृष्ठ 451

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* अयोध्याकाण्ड * ४४९

छं०- श्रुति सेतु पालक राम तुम्ह जगदीस माया जानकी ।

जो सृजतिजगु पालति हरति रुख पाइ कृपानिधान की ॥

जो सहससीसु अहीसु महिधरु लखनु सचराचर धनी ।

सुर काज धरि नरराज तनु चले दलन खल निसिचर अनी ॥

हे राम! आप वेदकी मर्यादाके रक्षक जगदीश्वर हैं और जानकीजी [ आपकी स्वरूपभूता ] माया हैं, जो कृपाके भण्डार आपकी रुख पाकर जगत्का सृजन, पालन और संहार करती हैं । जो हजार मस्तकवाले सर्पोंके स्वामी और पृथ्वीको अपने सिरपर धारण करनेवाले हैं, वही चराचरके स्वामी शेषजी लक्ष्मण हैं । देवताओंके कार्यके लिये आप राजाका शरीर धारण करके दुष्ट राक्षसोंकी सेनाका नाश करनेके लिये चले हैं ।

सो० - राम सरूप तुम्हार बचन अगोचर बुद्धिपर ।

अबिगत अकथ अपार नेति नेति नित निगम कह ॥ १२६ ॥

हे राम! आपका स्वरूप वाणीके अगोचर, बुद्धिसे परे, अव्यक्त, अकथनीय और अपार है ।

वेद निरन्तर उसका ' नेति नेति ' कहकर वर्णन करते हैं ॥ १२६ ॥

जगु पेखन तुम्ह देखनिहारे ॥ बिधि हरि संभु नचावनिहारे ॥॥

तेउ न जानहिं मरमु तुम्हारा । औरु तुम्हहि को जाननिहारा । हे राम! जगत् दृश्य है, आप उसके देखनेवाले हैं । आप ब्रह्मा, विष्णु और शङ्करको भी नचानेवाले हैं । जब वे भी आपके मर्मको नहीं जानते, तब और कौन आपको जाननेवाला है? ॥१ ॥

सोइ जानइ जेहि देहु जनाई । जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई ॥

तुम्हरिहि कृपाँ तुम्हहि रघुनंदन । जानहिं भगत भगत उर चंदन ॥

वही आपको जानता है जिसे आप जना देते हैं और जानते ही वह आपका ही स्वरूप बन जाता है । हे रघुनन्दन! हे भक्तोंके हृदयके शीतल करनेवाले चन्दन! आपकी ही कृपासे भक्त आपको जान पाते हैं ॥२ ॥

चिदानंदमय देह तुम्हारी । बिगत बिकार जान अधिकारी ॥

नर तनु धरेहु संत सुर काजा । कहहु करहु जस प्राकृत राजा ॥

आपकी देह चिदानन्दमय है ( यह प्रकृतिजन्य पञ्चमहाभूतोंकी बनी हुई कर्मबन्धनयुक्त, त्रिदेह– विशिष्ट मायिक नहीं है ) और [ उत्पत्ति-नाश, वृद्धि- क्षय आदि ] सब विकारोंसे रहित है; इस रहस्यको अधिकारी पुरुष ही जानते हैं । आपने देवता और संतोंके कार्यके लिये [ दिव्य ] नर- शरीर धारण किया है और प्राकृत ( प्रकृतिके तत्त्वोंसे निर्मित देहवाले, साधारण ) राजाओंकी तरहसे कहते और करते हैं ॥ ३ ॥

पृष्ठ 452

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* *४५० रामचरितमानस

राम देखि सुनि चरित तुम्हारे । जड़ मोहहिं बुध होहिं सुखारे ॥

तुम्ह जो कहहु करहु सबु साँचा । जस काछिअ तस चाहिअ नाचा ॥

हे राम! आपके चरित्रोंको देख और सुनकर मूर्ख लोग तो मोहको प्राप्त होते हैं और ज्ञानीजन सुखी होते हैं । आप जो कुछ कहते, करते हैं, वह सब सत्य ( उचित ) ही है; क्योंकि जैसा स्वाँग भरे वैसा ही नाचना भी तो चाहिये (इस समय आप मनुष्यरूपमें हैं, अतः मनुष्योचित व्यवहार करना ठीक ही है ) ॥ ४ ॥

दो० – पूँछेहु मोहि कि रहौं कहँ मैं पूँछत सकुचाउँ

जहँ न होहु तहँ देहु कहि तुम्हहि देखावौं ठाउँ ॥ १२७ ॥

आपने मुझसे पूछा कि मैं कहाँ रहूँ? परन्तु मैं यह पूछते सकुचाता हूँ कि जहाँ आप न हों,

वह स्थान बता दीजिये । तब मैं आपके रहनेके लिये स्थान दिखाऊँ ॥ १२७ ॥

सुनि मुनि बचन प्रेम रस साने । सकुचि राम मन महुँ मुसुकाने ॥

बालमीकि हँसि कहहिं बहोरी । बानी मधुर अमिअ रस बोरी ॥

मुनिके प्रेमरससे सने हुए वचन सुनकर श्रीरामचन्द्रजी [ रहस्य खुल जानेके डरसे ] सकुचाकर मनमें मुसकराये । वाल्मीकिजी हँसकर फिर अमृत-रसमें डुबोयी हुई मीठी वाणी बोले —॥१ ॥

सुनहु राम अब कहउँ निकेता । जहाँ बसहु सिय लखन समेता ॥

जिन्ह के श्रवन समुद्र समाना । कथा तुम्हारि सुभग सरि नाना ॥

हे रामजी! सुनिये, अब मैं वे स्थान बताता हूँ जहाँ आप सीताजी और लक्ष्मणजी - समेत निवास करिये । जिनके कान समुद्रकी भाँति आपकी सुन्दर कथारूपी अनेकों सुन्दर नदियोंसे—॥२ ॥

भरहिं निरंतर होहिं न पूरे । तिन्ह के हिय तुम्ह कहुँ गृह रूरे ॥

लोचन चातक जिन्ह करि राखे । रहहिं दरस जलधर अभिलाषे ॥

निरन्तर भरते रहते हैं, परन्तु कभी पूरे ( तृप्त ) नहीं होते, उनके हृदय आपके लिये सुन्दर घर हैं और जिन्होंने अपने नेत्रोंको चातक बना रखा है, जो आपके दर्शनरूपी मेघके लिये सदा लालायित रहते हैं; ॥ ३ ॥

निदरहिं सरित सिंधु सर भारी । रूप बिंदु जल होहिं सुखारी ॥

तिन्ह कें हृदय सदन सुखदायक । बसहु बंधु सिय सह रघुनायक ॥

तथा जो भारी - भारी नदियों, समुद्रों और झीलोंका निरादर करते हैं और आपके सौन्दर्य [ रूपी मेघ ] के एक बूँद जलसे सुखी हो जाते हैं ( अर्थात् आपके दिव्य सच्चिदानन्दमय स्वरूपके किसी एक अङ्गकी जरा - सी भी झाँकीके सामने स्थूल, सूक्ष्म और कारण तीनों जगत्के, अर्थात् पृथ्वी, स्वर्ग और ब्रह्मलोकतकके सौन्दर्यका तिरस्कार करते हैं ), हे रघुनाथजी! उन लोगोंके हृदयरूपी सुखदायी भवनोंमें आप भाई लक्ष्मणजी और सीताजीसहित निवास कीजिये ॥४ ॥

पृष्ठ 453

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* * अयोध्याकाण्ड ४५१

दो० –- जसु तुम्हार मानस बिमल हंसिनि जीहा जासु ।

मुकताहल गुन गन चुनइ राम बसहु हियँ तासु ॥ १२८ ॥

आपके यशरूपी निर्मल मानसरोवरमें जिसकी जीभ हंसिनी बनी हुई आपके गुणसमूहरूपी मोतियोंको चुगती रहती है, हे रामजी! आप उसके हृदयमें बसिये ॥ १२८ ॥

प्रभु प्रसाद सुचि सुभग सुबासा । सादर जासु लहइ नित नासा ॥

तुम्हहि निवेदित भोजन करहीं । प्रभु प्रसाद पट भूषन धरहीं ॥

जिसकी नासिका प्रभु ( आप ) के पवित्र और सुगन्धित [ पुष्पादि ] सुन्दर प्रसादको नित्य आदरके साथ ग्रहण करती ( सूँघती ) है, और जो आपको अर्पण करके भोजन करते हैं और आपके प्रसादरूप ही वस्त्राभूषण धारण करते हैं; ॥ १ ॥

सीस नवहिं सुर गुरु द्विज देखी । प्रीति सहित करि बिनय बिसेषी ॥

कर नित करहिं राम पद पूजा । राम भरोस हृदयँ नहिं दूजा ॥

जिनके मस्तक देवता, गुरु और ब्राह्मणोंको देखकर बड़ी नम्रताके साथ प्रेमसहित झुक जाते हैं; जिनके हाथ नित्य श्रीरामचन्द्रजी ( आप ) के चरणोंकी पूजा करते हैं, और जिनके हृदयमें श्रीरामचन्द्रजी ( आप ) का ही भरोसा है, दूसरा नहीं; ॥ २ ॥

चरन राम तीरथ चलि जाहीं । राम बसहु तिन्ह के मन माहीं ॥

मंत्रराजु नित जपहिं तुम्हारा । पूजहिं तुम्हहि सहित परिवारा ॥

तथा जिनके चरण श्रीरामचन्द्रजी ( आप ) के तीर्थोंमें चलकर जाते हैं; हे रामजी! आप उनके मनमें निवास कीजिये । जो नित्य आपके [रामनामरूप ] मन्त्रराजको जपते हैं और परिवार ( परिकर ) -सहित आपकी पूजा करते हैं ॥ ३ ॥

तरपन होम करहिं बिधि नाना । बिप्र जेवाँइ देहिं बहु दाना ॥

तुम्ह तें अधिक गुरहि जियँ जानी । सकल भायँ सेवहिं सनमानी ॥

जो अनेकों प्रकारसे तर्पण और हवन करते हैं, तथा ब्राह्मणोंको भोजन कराकर बहुत दान देते हैं; तथा जो गुरुको हृदयमें आपसे भी अधिक ( बड़ा ) जानकर सर्वभावसे सम्मान करके उनकी सेवा करते हैं; ॥४ ॥

दो० - सबु करि मागहिं एक फलु राम चरन रति होउ ।

तिन्ह कें मन मंदिर बसहु सिय रघुनंदन दोउ ॥ १२ ९ ॥

और ये सब कर्म करके सबका एकमात्र यही फल माँगते हैं कि श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंमें हमारी प्रीति हो; उन लोगोंके मनरूपी मन्दिरोंमें सीताजी और रघुकुलको आनन्दित करनेवाले आप दोनों बसिये ॥ १२ ९ ॥

पृष्ठ 454

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*:*४५२ रामचरितमानस

काम कोह मद मान न मोहा । लोभ न छोभ न राग न द्रोहा ॥

जिन्ह कें कपट दंभ नहिं माया । तिन्ह कें हृदय बसहु रघुराया ॥

जिनके न तो काम, क्रोध, मद, अभिमान और मोह है; न लोभ है, न क्षोभ है; न राग है, न द्वेष है; और न कपट, दम्भ और माया ही है -हे रघुराज! आप उनके हृदयमें निवास कीजिये ॥१ ॥

सब के प्रिय सब के हितकारी । दुख सुख सरिस प्रसंसा गारी ॥

कहहिं सत्य प्रिय बचन बिचारी । जागत सोवत सरन तुम्हारी ॥

जो सबके प्रिय और सबका हित करनेवाले हैं, जिन्हें दुःख और सुख तथा प्रशंसा ( बड़ाई ) और गाली (निन्दा ) समान हैं, जो विचारकर सत्य और प्रिय वचन बोलते हैं तथा जो जागते- सोते आपकी ही शरण हैं, ॥ २ ॥

तुम्हहि छाड़ि गति दूसरि नाहीं । राम बसहु तिन्ह के मन माहीं ॥

जननी सम जानहिं परनारी । धनु पराव बिष तें बिष भारी ॥

और आपको छोड़कर जिनके दूसरी कोई गति ( आश्रय ) नहीं है, हे रामजी! आप उनके मनमें बसिये । जो परायी स्त्रीको जन्म देनेवाली माताके समान जानते हैं और पराया धन जिन्हें विषसे भी भारी विष है; ॥ ३ ॥

जे हरषहिं पर संपति देखी । दुखित होहिं पर बिपति बिसेषी ॥

जिन्हहि राम तुम्ह प्रानपिआरे । तिन्ह के मन सुभ सदन तुम्हारे ॥

जो दूसरेकी सम्पत्ति देखकर हर्षित होते हैं और दूसरेकी विपत्ति देखकर विशेष रूपसे दुःखी होते हैं, और हे रामजी! जिन्हें आप प्राणोंके समान प्यारे हैं, उनके मन आपके रहनेयोग्य शुभ भवन हैं ॥४ ॥

दो० - स्वामिसखा पितु मातु गुर जिन्ह के सब तुम्ह तात ।

मन मंदिर तिन्ह कें बसहु सीय सहित दोउ भ्रात ॥ १३० ॥

हे तात! जिनके स्वामी, सखा, पिता, माता और गुरु सब कुछ आप ही हैं, उनके मनरूपी मन्दिरमें सीतासहित आप दोनों भाई निवास कीजिये ॥ १३० ॥

अवगुन तजि सब के गुन गहहीं । बिप्र धेनु हित संकट सहहीं ॥

नीति निपुन जिन्ह कइ जग लीका । घर तुम्हार तिन्ह कर मनु नीका ॥

जो अवगुणोंको छोड़कर सबके गुणोंको ग्रहण करते हैं, ब्राह्मण और गौके लिये संकट सहते हैं, नीति -निपुणतामें जिनकी जगत्में मर्यादा है, उनका सुन्दर मन आपका घर है ॥१ ॥

पृष्ठ 455

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* ** अयोध्याकाण्ड ४५३

गुन तुम्हार समुझइ निज दोसा । जेहि सब भाँति तुम्हार भरोसा ॥

राम भगत प्रिय लागहिं जेही । तेहि उर बसहु सहित बैदेही ॥

जो गुणोंको आपका और दोषोंको अपना समझता है, जिसे सब प्रकारसे आपका ही भरोसा है, और रामभक्त जिसे प्यारे लगते हैं, उसके हृदयमें आप सीतासहित निवास कीजिये ॥२ ॥

जाति पाँति धनु धरमु बड़ाई । प्रिय परिवार सदन सुखदाई ॥

सब तजि तुम्हहि रहइ उर लाई । तेहि के हृदयँ रहहु रघुराई ॥

जाति, पाँति, धन, धर्म, बड़ाई, प्यारा परिवार और सुख देनेवाला घर – सबको छोड़कर जो केवल आपको ही हृदयमें धारण किये रहता है, हे रघुनाथजी! आप उसके हृदयमें रहिये ॥३ ॥

सरगु नरकु अपबरगु समाना । जहँ तहँ देख धरें धनु बाना ॥

करम बचन मन राउर चेरा । राम करहु तेहि कें उर डेरा ॥

स्वर्ग, नरक और मोक्ष जिसकी दृष्टिमें समान हैं, क्योंकि वह जहाँ-तहाँ ( सब जगह ) केवल धनुष -बाण धारण किये आपको ही देखता है; और जो कर्मसे, वचनसे और मनसे आपका दास है, हे रामजी! आप उसके हृदयमें डेरा कीजिये ॥४ ॥

दो० — जाहि न चाहिअ कबहुँ कछु तुम्ह सन सहज सनेहु ।

बसहु निरंतर तासु मन सो राउर निज गेहु ॥ १३१ ॥

जिसको कभी कुछ भी नहीं चाहिये और जिसका आपसे स्वाभाविक प्रेम है, आप उसके मनमें निरन्तर निवास कीजिये; वह आपका अपना घर है ॥ १३१ ॥

एहि बिधि मुनिबर भवन देखाए । बचन सप्रेम राम मन भाए ॥

कह मुनि सुनहु भानुकुलनायक । आश्रम कहउँ समय सुखदायक ॥

इस प्रकार मुनिश्रेष्ठ वाल्मीकिजीने श्रीरामचन्द्रजीको घर दिखाये । उनके प्रेमपूर्ण वचन श्रीरामजीके मनको अच्छे लगे । फिर मुनिने कहा-हे सूर्यकुलके स्वामी! सुनिये, अब मैं इस समयके लिये सुखदायक आश्रम कहता हूँ ( निवासस्थान बतलाता हूँ) ॥ १ ॥

चित्रकूट गिरि करहु निवासू । तहँ तुम्हार सब भाँति सुपासू॥

सैलु सुहावन कानन चारू । करि केहरि मृग बिहग बिहारू ॥

आप चित्रकूट पर्वतपर निवास कीजिये, वहाँ आपके लिये सब प्रकारकी सुविधा है । सुहावना

पर्वत है और सुन्दर वन है । वह हाथी, सिंह, हिरन और पक्षियोंका विहारस्थल है ॥ २ ॥

नदी पुनीत पुरान बखानी । अत्रिप्रिया निज तप बल आनी ॥

सुरसरि धार नाउँ मंदाकिनि । जो सब पातक पोतक डाकिनि ॥

पृष्ठ 456

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* *४५४ रामचरितमानस वहाँ पवित्र नदी है, जिसकी पुराणोंने प्रशंसा की है, और जिसको अत्रि ऋषिकी पत्नी अनसूयाजी अपने तपोबलसे लायी थीं । वह गङ्गाजीकी धारा है, उसका मन्दाकिनी नाम है । वह सब पापरूपी बालकोंको खा डालनेके लिये डाकिनी ( डाइन ) रूप है ॥३ ॥

अत्रि आदि मुनिबर बहु बसहीं । करहिं जोग जप तप तन कसहीं ॥

चलहु सफल श्रम सब कर करहू । राम देहु गौरव गिरिबरहू ॥

अत्रि आदि बहुत- से श्रेष्ठ मुनि वहाँ निवास करते हैं, जो योग, जप और तप करते हुए शरीरको कसते हैं । हे रामजी! चलिये, सबके परिश्रमको सफल कीजिये और पर्वतश्रेष्ठ चित्रकूटको भी गौरव दीजिये ॥४ ॥

दो० – चित्रकूट महिमा अमित कही महामुनि गाइ ।

आइ नहाए सरित बर सिय समेत दोउ भाइ ॥ १३२ ॥

महामुनि वाल्मीकिजीने चित्रकूटकी अपरिमित महिमा बखानकर कही । तब सीताजीसहित दोनों भाइयोंने आकर श्रेष्ठ नदी मन्दाकिनीमें स्नान किया ॥ १३२ ॥

रघुबर कहेउ लखन भल घाटू । करहु कतहुँ अब ठाहर ठाटू॥

लखन दीख पय उतर करारा । चहुँ दिसि फिरेउ धनुष जिमि नारा ॥

श्रीरामचन्द्रजीने कहा— लक्ष्मण! बड़ा अच्छा घाट है । अब यहीं कहीं ठहरनेकी व्यवस्था करो । तब लक्ष्मणजीने पयस्विनी नदीके उत्तरके ऊँचे किनारेको देखा [और कहा कि- ] इसके चारों ओर धनुषके -जैसा एक नाला फिरा हुआ है ॥१ ॥

नदी पनच सर सम दम दाना । सकल कलुष कलि साउज नाना ॥

चित्रकूट जनु अचल अहेरी । चुकइ न घात मार मुठभेरी ॥

नदी ( मन्दाकिनी ) उस धनुषकी प्रत्यञ्चा ( डोरी ) है और शम, दम, दान बाण हैं । कलियुगके समस्त पाप उसके अनेकों हिंसक पशु [रूप निशाने ] हैं । चित्रकूट ही मानो अचल शिकारी है, जिसका निशाना कभी चूकता नहीं, और जो सामनेसे मारता है ॥२ ॥

अस कहि लखन ठाउँ देखरावा । थलु बिलोकि रघुबर सुखु पावा ॥

रमेउ राम मनु देवन्ह जाना । चले सहित सुर थपति प्रधाना ॥

ऐसा कहकर लक्ष्मणजीने स्थान दिखलाया । स्थानको देखकर श्रीरामचन्द्रजीने सुख पाया । जब देवताओंने जाना कि श्रीरामचन्द्रजीका मन यहाँ रम गया तब वे देवताओंके प्रधान थवई ( मकान बनानेवाले ) विश्वकर्माको साथ लेकर चले ॥३ ॥

पृष्ठ 457

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* * अयोध्याकाण्ड ४५५

कोल किरात बेष सब आए । रचे परन तृन सदन सुहाए ॥

बरनि न जाहिं मंजु दुइ साला । एक ललित लघु एक बिसाला ॥

सब देवता कोल- भीलोंके वेषमें आये और उन्होंने [ दिव्य ] पत्तों और घासोंके सुन्दर घर बना दिये । दो ऐसी सुन्दर कुटियाँ बनायीं जिनका वर्णन नहीं हो सकता । उनमें एक बड़ी सुन्दर छोटी-सी थी और दूसरी बड़ी थी ॥४ ॥

दो० - लखन जानकी सहित प्रभु राजत रुचिर निकेत ।

सोह मदनु मुनि बेष जनु रति रितुराज समेत ॥ १३३ ॥

लक्ष्मणजी और जानकीजीसहित प्रभु श्रीरामचन्द्रजी सुन्दर घास-पत्तोंके घरमें शोभायमान हैं । मानो कामदेव मुनिका वेष धारण करके पत्नी रति और वसन्त ऋतुके साथ सुशोभित हो ॥१३३ ॥

मासपारायण, सत्रहवाँ विश्राम

अमर नाग किंनर दिसिपाला । चित्रकूट आए तेहि काला ॥

राम प्रनामु कीन्ह सब काहू । मुदित देव लहि लोचन लाहू॥

उस समय देवता, नाग, किन्नर और दिक्पाल चित्रकूटमें आये और श्रीरामचन्द्रजीने सब

किसीको प्रणाम किया । देवता नेत्रोंका लाभ पाकर आनन्दित हुए ॥१ ॥

बरषि सुमन कह देव समाजू । नाथ सनाथ भए हम आजू ॥

करि बिनती दुख दुसह सुनाए । हरषित निज निज सदन सिधाए ॥

फूलोंकी वर्षा करके देवसमाजने कहा- हे नाथ! आज [ आपका दर्शन पाकर] हम सनाथ हो गये । फिर विनती करके उन्होंने अपने दुःसह दुःख सुनाये और [दुःखोंके नाशका आश्वासन पाकर ] हर्षितचित्रकूटहोकर अपने -रघुनंदनुअपने स्थानोंको चलेछाएगये ।॥ समाचार२ ॥ सुनि सुनि मुनि आए ।

आवत देखि मुदित मुनिबृंदा । कीन्ह दंडवत रघुकुल चंदा ॥

श्रीरघुनाथजी चित्रकूटमें आ बसे हैं, यह समाचार सुन- सुनकर बहुत -से मुनि आये । रघुकुलके चन्द्रमा श्रीरामचन्द्रजीने मुदित हुई मुनिमण्डलीको आते देखकर दण्डवत् प्रणाम किया ॥३ ॥

मुनि रघुबरहि लाइ उर लेहीं । सुफल होन हित आसिष देहीं ॥

सिय सौमित्रि राम छबि देखहिं । साधन सकल सफल करि लेखहिं ॥

मुनिगण श्रीरामजीको हृदयसे लगा लेते हैं और सफल होनेके लिये आशीर्वाद देते हैं । वे सीताजी, लक्ष्मणजी और श्रीरामचन्द्रजीकी छबि देखते हैं और अपने सारे साधनोंको सफल हुआ समझते हैं ॥४ ॥

पृष्ठ 458

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*:*४५६ रामचरितमानस

दो० –-जथाजोग सनमानि प्रभु बिदा किए मुनिवृंद ।

करहिं जोग जप जाग तप निज आश्रमन्हि सुछंद ॥ १३४ ॥

प्रभु श्रीरामचन्द्रजीने यथायोग्य सम्मान करके मुनिमण्डलीको विदा किया । [ श्रीरामचन्द्रजीके आ जानेसे ] वे सब अपने - अपने आश्रमोंमें अब स्वतन्त्रताके साथ योग, जप, यज्ञ और तप करने लगे ॥ १३४ ॥

यह सुधि कोल किरातन्ह पाई । हरषे जनु नव निधि घर आई ॥

कंद मूल फल भरि भरि दोना I। चले रंक जनु लूटन सोना ॥

यह ( श्रीरामजीके आगमनका) समाचार जब कोल- भीलोंने पाया, तो वे ऐसे हर्षित हुए मानो नवों निधियाँ उनके घरहीपर आ गयी हों । वे दोनोंमें कन्द, मूल, फल भर- भरकर चले । मानो दरिद्र सोना लूटने चले हों ॥१ ॥

तिन्ह महँ जिन्ह देखे दोउ भ्राता । अपर तिन्हहि पूँछहिं मगु जाता ॥

कहत सुनत रघुबीर निकाई । आइ सबन्हि देखे रघुराई ॥

उनमेंसे जो दोनों भाइयोंको [ पहले ] देख चुके थे, उनसे दूसरे लोग रास्तेमें जाते हुए पूछते हैं । इस प्रकार श्रीरामचन्द्रजीकी सुन्दरता कहते- सुनते सबने आकर श्रीरघुनाथजीके दर्शन किये ॥ २ ॥

करहिं जोहारु भेंट धरि आगे । प्रभुहि बिलोकहिं अति अनुरागे ॥

चित्र लिखे जनु जहँ तहँ ठाढ़े । पुलक सरीर नयन जल बाढ़े ॥

भेंट आगे रखकर वे लोग जोहार करते हैं और अत्यन्त अनुरागके साथ प्रभुको देखते हैं । वे मुग्ध हुए जहाँ- के - तहाँ मानो चित्रलिखे -से खड़े हैं । उनके शरीर पुलकित हैं और नेत्रोंमें प्रेमाश्रुओंके जलकी बाढ़ आ रही है ॥३ ॥

राम सनेह मगन सब जाने । कहि प्रिय बचन सकल सनमाने ॥

प्रभुहि जोहारि बहोरि बहोरी । बचन बिनीत कहहिं कर जोरी ॥

श्रीरामजीने उन सबको प्रेममें मग्न जाना, और प्रिय वचन कहकर सबका सम्मान किया । वे बार- बार प्रभु श्रीरामचन्द्रजीको जोहार करते हुए हाथ जोड़कर विनीत वचन कहते हैं- ॥४ ॥

दो० – अब हम नाथ सनाथ सब भए देखि प्रभु पाय ।

भाग हमारें आगमनु राउर कोसलराय ॥ १३५ ॥

हे नाथ! प्रभु ( आप ) के चरणोंका दर्शन पाकर अब हम सब सनाथ हो गये । हे कोसलराज! हमारे ही भाग्यसे आपका यहाँ शुभागमन हुआ है ॥ १३५ ॥

धन्य भूमि बन पंथ पहारा । जहँ जहँ नाथ पाउ तुम्ह धारा ॥

धन्य बिहग मृग काननचारी । सफल जनम भए तुम्हहि निहारी ॥

पृष्ठ 459

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* * अयोध्याकाण्ड ४५७ हे नाथ! जहाँ- जहाँ आपने अपने चरण रखे हैं, वे पृथ्वी, वन, मार्ग और पहाड़ धन्य हैं, वे वनमें विचरनेवाले पक्षी और पशु धन्य हैं, जो आपको देखकर सफलजन्म हो गये ॥ १ ॥

हम सब धन्य सहित परिवारा । दीख दरसु भरि नयन तुम्हारा ॥

कीन्ह बासु भल ठाउँ बिचारी । इहाँ सकल रितु रहब सुखारी ॥

हम सब भी अपने परिवारसहित धन्य हैं, जिन्होंने नेत्र भरकर आपका दर्शन किया । आपने

बड़ी अच्छी जगह विचारकर निवास किया है । यहाँ सभी ऋतुओंमें आप सुखी रहियेगा ॥२ ॥

हम सब भाँति करब सेवकाई । करि केहरि अहि बाघ बराई ॥

बन बेहड़ गिरि कंदर खोहा । सब हमार प्रभु पग पग जोहा ॥

हमलोग सब प्रकारसे हाथी, सिंह, सर्प और बाघोंसे बचाकर आपकी सेवा करेंगे । हे प्रभो! यहाँके बीहड़ वन, पहाड़, गुफाएँ और खोह ( दर्रे ) सब पग-पग हमारे देखे हुए हैं ॥३ ॥

तहँ तहँ तुम्हहि अहेर खेलाउब । सर निरझर जलठाउँ देखाउब ॥

हम सेवक परिवार समेता । नाथ न सकुचब आयसु देता ॥

हम वहाँ- वहाँ ( उन-उन स्थानोंमें ) आपको शिकार खिलावेंगे और तालाब, झरने आदि जलाशयोंको दिखावेंगे । हम कुटुम्बसमेत आपके सेवक हैं । हे नाथ! इसलिये हमें आज्ञा देनेमें संकोच न कीजियेगा ॥ ४ ॥

दो० - बेद बचन मुनि मन अगम ते प्रभु करुना ऐन ।

बचन किरातन्ह के सुनतजिमि पितु बालक बैन ॥ १३६ ॥

जो वेदोंके वचन और मुनियोंके मनको भी अगम हैं, वे करुणाके धाम प्रभु श्रीरामचन्द्रजी भीलोंके वचन इस तरह सुन रहे हैं जैसे पिता बालकोंके वचन सुनता है ॥ १३६ ॥

रामहि केवल प्रेमु पिआरा । जानि लेउ जो जाननिहारा ॥

राम सकल बनचर तब तोषे । कहि मृदु बचन प्रेम परिपोषे ॥

श्रीरामचन्द्रजीको केवल प्रेम प्यारा है; जो जाननेवाला हो ( जानना चाहता हो ), वह जान ले । तब श्रीरामचन्द्रजीने प्रेमसे परिपुष्ट हुए (प्रेमपूर्ण ) कोमल वचन कहकर उन सब वनमें विचरण करनेवाले लोगोंको संतुष्ट किया ॥१ ॥

बिदा किए सिर नाइ सिधाए । प्रभु गुन कहत सुनत घर आए ॥

एहि बिधि सिय समेत दोउ भाई । बसहिं बिपिन सुर मुनि सुखदाई ॥

फिर उनको विदा किया । वे सिर नवाकर चले और प्रभुके गुण कहते-सुनते घर आये । इस प्रकार देवता और मुनियोंको सुख देनेवाले दोनों भाई सीताजीसमेत वनमें निवास करने लगे ॥ २ ॥

पृष्ठ 460

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* *४५८ रामचरितमानस

जब तें आइ रहे रघुनायकु । तब तें भयउ बनु मंगलदायकु ॥

फूलहिं फलहिं बिटप बिधि नाना । मंजु बलित बर बेलि बिताना ॥

जबसे श्रीरघुनाथजी वनमें आकर रहे तबसे वन मङ्गलदायक हो गया । अनेकों प्रकारके वृक्ष फूलते और फलते हैं और उनपर लिपटी हुई सुन्दर बेलोंके मण्डप तने हैं ॥३ ॥

सुरतरु सरिस सुभायँ सुहाए । मनहुँ बिबुध बन परिहरि आए ॥

गुंज मंजुतर मधुकर श्रेनी । त्रिबिध बयार बहइ सुख देनी ॥

वे कल्पवृक्षके समान स्वाभाविक ही सुन्दर हैं । मानो वे देवताओंके वन ( नन्दनवन ) को छोड़कर आये हों । भौंरोंकी पंक्तियाँ बहुत ही सुन्दर गुंजार करती हैं और सुख देनेवाली शीतल, मन्द, सुगन्धित हवा चलती रहती है ॥ ४ ॥

दो० -– नीलकंठ कलकंठ सुक चातक चक्क चकोर ।

भाँति भाँति बोलहिं बिहग श्रवन सुखद चित चोर ॥ १३७ ॥

नीलकण्ठ, कोयल, तोते, पपीहे, चकवे और चकोर आदि पक्षी कानोंको सुख देनेवाली और चित्तको चुरानेवाली तरह -तरहकी बोलियाँ बोलते हैं ॥१३७ ॥

करि केहरि कपि कोल कुरंगा । बिगतबैर बिचरहिं सब संगा ॥

फिरत अहेर राम छबि देखी । होहिं मुदित मृगबूंद बिसेषी ॥

हाथी, सिंह, बंदर, सूअर और हिरन – ये सब वैर छोड़कर साथ-साथ विचरते हैं । शिकारके लिये फिरते हुए श्रीरामचन्द्रजीकी छबिको देखकर पशुओंके समूह विशेष आनन्दित होते हैं ॥ १ ॥

बिबुध बिपिन जहँ लगि जग माहीं । देखि रामबनु सकल सिहाहीं ॥

सुरसरि सरसइ दिनकर कन्या । मेकलसुता गोदावरि धन्या ॥

जगत्में जहाँतक ( जितने ) देवताओंके वन हैं,सब श्रीरामजीके वनको देखकर सिहाते हैं । गङ्गा, सरस्वती, सूर्यकुमारी यमुना, नर्मदा, गोदावरी आदि धन्य ( पुण्यमयी ) नदियाँ, ॥ २ ॥

सब सर सिंधु नदीं नद नाना । मंदाकिनि कर करहिं बखाना ॥

उदय अस्त गिरि अरु कैलासू । मंदर मेरु सकल सुरबासू॥

सारे तालाब, समुद्र, नदी और अनेकों नद सब मन्दाकिनीकी बड़ाई करते हैं । उदयाचल, अस्ताचल, कैलास, मन्दराचल और सुमेरु आदि सब, जो देवताओंके रहनेके स्थान हैं, ॥ ३ ॥

सैल हिमाचल आदिक जेते । चित्रकूट जसु गावहिं तेते ॥

बिंधि मुदित मन सुखु न समाई । श्रम बिनु बिपुल बड़ाई पाई ॥