श्रीरामचरितमानस — पृष्ठ 461–470

श्रीरामचरितमानस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 461–470

पृष्ठ 461

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* ** अयोध्याकाण्ड ४५९ और हिमालय आदि जितने पर्वत हैं, सभी चित्रकूटका यश गाते हैं । विन्ध्याचल बड़ा आनन्दित है, उसके मनमें सुख समाता नहीं; क्योंकि उसने बिना परिश्रम ही बहुत बड़ी बड़ाई पा ली है ॥ ४ ॥

दो० - चित्रकूट के बिहग मृग बेलि बिटप तृन जाति ।

पुन्य पुंज सब धन्य अस कहहिं देव दिन राति ॥ १३८ ॥

चित्रकूटके पक्षी, पशु, बेल, वृक्ष, तृण-अंकुरादिकी सभी जातियाँ पुण्यकी राशि हैं और धन्य हैं – देवता दिन- रात ऐसा कहते हैं ॥ १३८ ॥

नयनवंत रघुबरहि बिलोकी । पाइ जनम फल होहिं बिसोकी ॥

परसि चरन रज अचर सुखारी । भए परम पद के अधिकारी ॥

आँखोंवाले जीव श्रीरामचन्द्रजीको देखकर जन्मका फल पाकर शोकरहित हो जाते हैं, और अचर ( पर्वत, वृक्ष, भूमि, नदी आदि) भगवान्‌की चरण-रजका स्पर्श पाकर सुखी होते हैं । यों सभी परमपद ( मोक्ष) के अधिकारी हो गये ॥ १ ॥

सो बनु सैलु सुभायँ सुहावन । मंगलमय अति पावन पावन ॥

महिमा कहिअ कवनि बिधि तासू । सुखसागर जहँ कीन्ह निवासू ॥

वह वन और पर्वत स्वाभाविक ही सुन्दर, मङ्गलमय और अत्यन्त पवित्रोंको भी पवित्र करनेवाला है । उसकी महिमा किस प्रकार कही जाय, जहाँ सुखके समुद्र श्रीरामजीने निवास किया है ॥२ ॥

पय पयोधि तजि अवध बिहाई । जहँ सिय लखनु रामु रहे आई ॥

कहि न सकहिं सुषमा जसि कानन । जौं सत सहस होहिं सहसानन ॥

क्षीरसागरको त्यागकर और अयोध्याको छोड़कर जहाँ सीताजी, लक्ष्मणजी और श्रीरामचन्द्रजी आकर रहे, उस वनकी जैसी परम शोभा है, उसको हजार मुखवाले जो लाख शेषजी हों तो वे भी नहीं कह सकते ॥ ३ ॥

सो मैं बरनि कहौं बिधि केहीं । डाबर कमठ कि मंदर लेहीं ॥

सेवहिं लखनु करम मन बानी । जाइ न सीलु सनेहु बखानी ॥

उसे भला, मैं किस प्रकारसे वर्णन करके कह सकता हूँ । कहीं पोखरेका [ क्षुद्र] कछुआ भी मन्दराचल उठा सकता है? लक्ष्मणजी मन, वचन और कर्मसे श्रीरामचन्द्रजीकी सेवा करते हैं । उनके शील और स्नेहका वर्णन नहीं किया जा सकता ॥४ ॥

दो० - छिनु छिनु लखि सिय राम पद जानि आपु पर नेहु ।

करत न सपनेहुँ लखनु चितु बंधु मातु पितु गेहु ॥ १३ ९ ॥

क्षण- क्षणपर श्रीसीतारामजीके चरणोंको देखकर और अपने ऊपर उनका स्नेह जानकर लक्ष्मणजी स्वप्नमें भी भाइयों, माता-पिता और घरकी याद नहीं करते ॥ १३ ९ ॥

पृष्ठ 462

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* *४६० रामचरितमानस

राम संग सिय रहति सुखारी । पुर परिजन गृह सुरति बिसारी ॥

छिनु छिनु पिय बिधु बदनु निहारी । प्रमुदित मनहुँ चकोरकुमारी ॥

श्रीरामचन्द्रजीके साथ सीताजी अयोध्यापुरी, कुटुम्बके लोग और घरकी याद भूलकर बहुत ही सुखी रहती हैं । क्षण- क्षणपर पति श्रीरामचन्द्रजीके चन्द्रमाके समान मुखको देखकर वे वैसे ही परम प्रसन्न रहती हैं जैसे चकोरकुमारी ( चकोरी ) चन्द्रमाको देखकर! ॥ १ ॥

नाह नेहु नित बढ़त बिलोकी । हरषित रहति दिवस जिमि कोकी ॥

सिय मनु राम चरन अनुरागा । अवध सहस सम बनु प्रिय लागा ॥

स्वामीका प्रेम अपने प्रति नित्य बढ़ता हुआ देखकर सीताजी ऐसी हर्षित रहती हैं जैसे दिनमें चकवी! सीताजीका मन श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंमें अनुरक्त है इससे उनको वन हजारों अवधके समान प्रिय लगता है ॥ २ ॥

परनकुटी प्रिय प्रियतम संगा । प्रिय परिवारु कुरंग बिहंगा ॥

सासु ससुर सम मुनितिय मुनिबर । असनु अमिअ सम कंद मूल फर ॥

प्रियतम ( श्रीरामचन्द्रजी ) के साथ पर्णकुटी प्यारी लगती है । मृग और पक्षी प्यारे कुटुम्बियोंके समान लगते हैं । मुनियोंकी स्त्रियाँ सासके समान, श्रेष्ठ मुनि ससुरके समान और कन्द - मूल- फलोंका आहार उनको अमृतके समान लगता है ॥ ३ ॥

नाथ साथ साँथरी सुहाई । मयन सयन सय सम सुखदाई ॥

लोकप होहिं बिलोकत जासू । तेहि कि मोहि सक बिषय बिलासू ॥

स्वामीके साथ सुन्दर साथरी ( कुश और पत्तोंकी सेज) सैकड़ों कामदेवकी सेजोंके समान सुख देनेवाली है । जिनके [ कृपापूर्वक ] देखनेमात्रसे जीव लोकपाल हो जाते हैं, उनको कहीं भोग-विलास मोहित कर सकते हैं! ॥ ४ ॥

दो० – सुमिरत रामहि तजहिं जन तृन सम बिषय बिलासु ।

रामप्रिया जग जननि सिय कछु न आचरजु तासु ॥ १४० ॥

जिन श्रीरामचन्द्रजीका स्मरण करनेसे ही भक्तजन तमाम भोग- विलासको तिनकेके समान त्याग देते हैं, उन श्रीरामचन्द्रजीकी प्रिय पत्नी और जगत्की माता सीताजीके लिये यह [ भोग- विलासका त्याग ] कुछ भी आश्चर्य नहीं है ॥१४० ॥

सीय लखन जेहि बिधि सुखु लहहीं । सोइ रघुनाथ करहिं सोइ कहहीं ।

कहहिं पुरातन कथा कहानी । सुनहिं लखनु सिय अति सुखु मानी ॥

सीताजी और लक्ष्मणजीको जिस प्रकार सुख मिले, श्रीरघुनाथजी वही करते और वही कहते हैं । भगवान् प्राचीन कथाएँ और कहानियाँ कहते हैं और लक्ष्मणजी तथा सीताजी अत्यन्त सुख मानकर सुनते हैं ॥ १ ॥

पृष्ठ 463

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* ** अयोध्याकाण्ड ४६१

जब जब रामु अवध सुधि करहीं । तब तब बारि बिलोचन भरहीं ॥

सुमिरि मातु पितु परिजन भाई । भरत सनेहु सीलु सेवकाई ॥

जब -जब श्रीरामचन्द्रजी अयोध्याकी याद करते हैं, तब- तब उनके नेत्रोंमें जल भर आता है । माता- पिता, कुटुम्बियों और भाइयों तथा भरतके प्रेम, शील और सेवाभावको याद करके – ॥ २ ॥

कृपासिंधु प्रभु होहिं दुखारी । धीरजु धरहिं कुसमउ बिचारी ॥

लखि सिय लखनु बिकल होड़ जाहीं । जिमि पुरुषहि अनुसर परिछाहीं ॥

कृपाके समुद्र प्रभु श्रीरामचन्द्रजी दु:खी हो जाते हैं, किन्तु फिर कुसमय समझकर धीरज धारण कर लेते हैं । श्रीरामचन्द्रजीको दुखी देखकर सीताजी और लक्ष्मणजी भी व्याकुल हो जाते हैं, जैसे किसी मनुष्यकी परछाहीं उस मनुष्यके समान ही चेष्टा करती है ॥ ३ ॥

प्रिया बंधु गति लखि रघुनंदनु । धीर कृपाल भगत उर चंदनु ॥

लगे कहन कछु कथा पुनीता । सुनि सुखु लहहिं लखनु अरु सीता ॥

तब धीर, कृपालु और भक्तोंके हृदयोंको शीतल करनेके लिये चन्दनरूप रघुकुलको आनन्दित करनेवाले श्रीरामचन्द्रजी प्यारी पत्नी और भाई लक्ष्मणकी दशा देखकर कुछ पवित्र कथाएँ कहने लगते हैं,जिन्हें सुनकर लक्ष्मणजी और सीताजी सुख प्राप्त करते हैं ॥ ४ ॥

दो० - रामु लखन सीता सहित सोहत परन निकेत ।

जिमि बासव बस अमरपुर सची जयंत समेत ॥ १४१ ॥

लक्ष्मणजी और सीताजीसहित श्रीरामचन्द्रजी पर्णकुटीमें ऐसे सुशोभित हैं जैसे अमरावतीमें इन्द्र अपनी पत्नी शची और पुत्र जयन्तसहित बसता है ॥१४१ ॥

जोगवहिं प्रभु सिय लखनहि कैसें । पलक बिलोचन गोलक जैसें ॥

सेवहिं लखनु सीय रघुबीरहि । जिमि अबिबेकी पुरुष सरीरहि ॥

प्रभु श्रीरामचन्द्रजी सीताजी और लक्ष्मणजीकी कैसी सँभाल रखते हैं, जैसे पलकें नेत्रोंके गोलकोंकी । इधर लक्ष्मणजी श्रीसीताजी और श्रीरामचन्द्रजीकी [अथवा लक्ष्मणजी और सीताजी श्रीरामचन्द्रजीकी ] ऐसी सेवा करते हैं जैसे अज्ञानी मनुष्य शरीरकी करते हैं ॥१ ॥

एहि बिधि प्रभु बन बसहिं सुखारी । खग मृग सुर तापस हितकारी ॥

कहेउँ राम बन गवनु सुहावा । सुनहु सुमंत्र अवध जिमि आवा ॥

पक्षी, पशु, देवता और तपस्वियोंके हितकारी प्रभु इस प्रकार सुखपूर्वक वनमें निवास कर रहे हैं । तुलसीदासजी कहते हैं— मैंने श्रीरामचन्द्रजीका सुन्दर वनगमन कहा । अब जिस तरह सुमन्त्र अयोध्यामें आये वह [ कथा] सुनो ॥ २ ॥

पृष्ठ 464

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* *४६२ रामचरितमानस

फिरेउ निषादु प्रभुहि पहुँचाई । सचिव सहित रथ देखेसि आई ॥

मंत्री बिकल बिलोकि निषादू । कहि न जाइ जस भयउ बिषादू ॥

प्रभु श्रीरामचन्द्रजीको पहुँचाकर जब निषादराज लौटा, तब आकर उसने रथको मन्त्री ( सुमन्त्र ) -सहित देखा । मन्त्रीको व्याकुल देखकर निषादको जैसा दुःख हुआ, वह कहा नहीं जाता ॥ ३ ॥

राम राम सिय लखन पुकारी । परेउ धरनितल ब्याकुल भारी ॥

देखि दखिन दिसि हय हिहिनाहीं । जनु बिनु पंख बिहग अकुलाहीं ॥

[ निषादको अकेले आया देखकर] सुमन्त्र हा राम! हा राम! हा सीते! हा लक्ष्मण! पुकारते हुए, बहुत व्याकुल होकर धरतीपर गिर पड़े । [रथके ] घोड़े दक्षिण दिशाकी ओर [ जिधर श्रीरामचन्द्रजी गये थे ] देख-देखकर हिनहिनाते हैं । मानो बिना पंखके पक्षी व्याकुल हो रहे हों ॥४ ॥

दो० – नहिं तृन चरहिं न पिअहिं जलु मोचहिं लोचन बारि ।

ब्याकुल भए निषाद सब रघुबर बाजि निहारि ॥ १४२ ॥

वे न तो घास चरते हैं, न पानी पीते हैं । केवल आँखोंसे जल बहा रहे हैं । श्रीरामचन्द्रजीके घोड़ोंको इस दशामें देखकर सब निषाद व्याकुल हो गये ॥ १४२ ॥

धरि धीरजु तब कहइ निषादू । अब सुमंत्र परिहरहु बिषादू ।

तुम्ह पंडित परमारथ ग्याता । धरहु धीर लखि बिमुख बिधाता ॥

तब धीरज धरकर निषादराज कहने लगा-हे सुमन्त्रजी! अब विषादको छोड़िये । आप पण्डित

और परमार्थके जाननेवाले हैं । विधाताको प्रतिकूल जानकर धैर्य धारण कीजिये ॥ १ ॥

बिबिधि कथा कहि कहि मृदु बानी । रथ बैठारेउ बरबस आनी ॥

सोक सिथिल रथु सकइ न हाँकी । रघुबर बिरह पीर उर बाँकी ॥

कोमल वाणीसे भाँति- भाँतिकी कथाएँ कहकर निषादने जबर्दस्ती लाकर सुमन्त्रको रथपर बैठाया । परन्तु शोकके मारे वे इतने शिथिल हो गये कि रथको हाँक नहीं सकते । उनके हृदयमें श्रीरामचन्द्रजीके विरहकी बड़ी तीव्र वेदना है ॥२ ॥

चरफराहिं मग चलहिं न घोरे । बन मृग मनहुँ आनि रथ जोरे ॥

अढ़कि परहिं फिरि हेरहिं पीछें । राम बियोगि बिकल दुख तीछें ॥

घोड़े तड़फड़ाते हैं और [ठीक ] रास्तेपर नहीं चलते । मानो जंगली पशु लाकर रथमें जोत दिये गये हों । वे श्रीरामचन्द्रजीके वियोगी घोड़े कभी ठोकर खाकर गिर पड़ते हैं, कभी घूमकर

पीछेकी ओर देखने लगते हैं । वे तीक्ष्ण दुःखसे व्याकुल हैं ॥ ३ ॥

पृष्ठ 465

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* * अयोध्याकाण्ड ४६३

जो कह रामु लखनु बैदेही । हिंकरि हिंकरि हित हेरहिं तेही ॥

बाजि बिरह गति कहि किमि जाती । बिनुमनि फनिक बिकल जेहि भाँती ॥

जो कोई राम, लक्ष्मण या जानकीका नाम ले लेता है, घोड़े हिकर-हिकरकर उसकी ओर प्यारसे देखने लगते हैं । घोड़ोंकी विरहदशा कैसे कही जा सकती है? वे ऐसे व्याकुल हैं जैसे मणिके बिना साँप व्याकुल होता है ॥४ ॥

दो० भयउ निषादु बिषादबस देखत सचिव तुरंग । -0बोलि सुसेवक चारि तब दिए सारथी संग ॥ १४३ ॥

मन्त्री और घोड़ोंकी यह दशा देखकर निषादराज विषादके वश हो गया । तब उसने अपने चार

उत्तम सेवक बुलाकर सारथीके साथ कर दिये ॥१४३ ॥

गुह सारथिहि फिरेउ पहुँचाई । बिरहु बिषादु बरनि नहिं जाई ॥

चले अवध लेइ रथहि निषादा । होहिं छनहिं छन मगन बिषादा ॥

निषादराज गुह सारथी ( सुमन्त्रजी ) -को पहुँचाकर ( विदा करके ) लौटा । उसके विरह और दुःखका वर्णन नहीं किया जा सकता । वे चारों निषाद रथ लेकर अवधको चले । [ सुमन्त्र और घोड़ोंको देख - देखकर ] वे भी क्षण-क्षणभर विषादमें डूबे जाते थे ॥ १ ॥

सोच सुमंत्र बिकल दुख दीना । धिग जीवन रघुबीर बिहीना ॥

रहिहि न अंतहुँ अधम सरीरू । जसु न लहेउ बिछुरत रघुबीरू ॥

व्याकुल और दुःखसे दीन हुए सुमन्त्रजी सोचते हैं कि श्रीरघुवीरके बिना जीनेको धिक्कार है । आखिर यह अधम शरीर रहेगा तो है ही नहीं । अभी श्रीरामचन्द्रजीके बिछुड़ते ही छूटकर इसने यश [ क्यों ] नहीं ले लिया ॥२ ॥

भए अजस अघ भाजन प्राना । कवन हेतु नहिं करत पयाना ॥

अहह मंद मनु अवसर चूका । अजहुँ न हृदय होत दुइ टूका ॥

ये प्राण अपयश और पापके भाँड़े हो गये । अब ये किस कारण कूच नहीं करते ( निकलते नहीं )? हाय! नीच मन [ बड़ा अच्छा ] मौका चूक गया । अब भी तो हृदयके दो टुकड़े नहीं हो जाते! ॥३ ॥

मीजि हाथ सिरु धुनि पछिताई । मनहुँ कृपन धन रासि गवाँई ॥

बिरिद बाँधि बर बीरु कहाई । चलेउ समर जनु सुभट पराई ॥

सुमन्त्र हाथ मल- मलकर और सिर पीट- पीटकर पछताते हैं । मानो कोई कंजूस धनका खजाना खो बैठा हो । वे इस प्रकार चले मानो कोई बड़ा योद्धा वीरका बाना पहनकर और उत्तम शूरवीर कहलाकर युद्धसे भाग चला हो! ॥ ४ ॥

पृष्ठ 466

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* *४६४ रामचरितमानस

दो० –-बिप्र बिबेकी बेदबिद संमत साधु सुजाति ।

जिमि धोखें मदपान कर सचिव सोच तेहि भाँति ॥ १४४ ॥

जैसे कोई विवेकशील, वेदका ज्ञाता, साधुसम्मत आचरणोंवाला और उत्तम जातिका ( कुलीन ) ब्राह्मण धोखेसे मदिरा पी ले और पीछे पछतावे, उसी प्रकार मन्त्री सुमन्त्र सोच कर रहे ( पछता रहे ) हैं ॥१४४ ॥

जिमि कुलीन तिय साधु सयानी । पतिदेवता करम मन बानी ॥

रहै करम बस परिहरि नाहू । सचिव हृदयँ तिमि दारुन दाहू ॥

जैसे किसी उत्तम कुलवाली, साधुस्वभावकी, समझदार और मन, वचन, कर्मसे पतिको ही देवता माननेवाली पतिव्रता स्त्रीको भाग्यवश पतिको छोड़कर ( पतिसे अलग ) रहना पड़े, उस समय उसके हृदयमें जैसे भयानक सन्ताप होता है, वैसे ही मन्त्रीके हृदयमें हो रहा है ॥१ ॥

लोचन सजल डीठि भइ थोरी । सुनइ न श्रवन बिकल मति भोरी ॥

सूखहिं अधर लागि मुहँ लाटी । जिउ न जाइ उर अवधि कपाटी ॥

नेत्रोंमें जल भरा है, दृष्टि मन्द हो गयी है । कानोंसे सुनायी नहीं पड़ता, व्याकुल हुई बुद्धि बेठिकाने हो रही है । ओठ सूख रहे हैं, मुँहमें लाटी लग गयी है । किन्तु [ ये सब मृत्युके लक्षण हो जानेपर भी] प्राण नहीं निकलते; क्योंकि हृदयमें अवधिरूपी किवाड़ लगे हैं ( अर्थात् चौदह वर्ष बीत जानेपर भगवान् फिर मिलेंगे, यही आशा रुकावट डाल रही है) ॥२ ॥

बिबरन भयउ न जाइ निहारी । मारेसि मनहुँ पिता महतारी ॥

हानि गलानि बिपुल मन ब्यापी । जमपुर पंथ सोच जिमि पापी ॥

सुमन्त्रजीके मुखका रंग बदल गया है, जो देखा नहीं जाता । ऐसा मालूम होता है मानो इन्होंने माता- पिताको मार डाला हो । उनके मनमें रामवियोगरूपी हानिकी महान् ग्लानि ( पीड़ा) छा रही है, जैसे कोई पापी मनुष्य नरकको जाता हुआ रास्तेमें सोच कर रहा हो ॥३ ॥

बचनु न आव हृदयँ पछिताई । अवध काह मैं देखब जाई ॥

राम रहित रथ देखिहि जोई । सकुचिहि मोहि बिलोकत सोई ॥

मुँहसे वचन नहीं निकलते । हृदयमें पछताते हैं कि मैं अयोध्यामें जाकर क्या देखूँगा? श्रीरामचन्द्रजीसे शून्य रथको जो भी देखेगा, वही मुझे देखनेमें संकोच करेगा ( अर्थात् मेरा मुँह नहीं देखना चाहेगा) ॥४ ॥

पृष्ठ 467

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* * अयोध्याकाण्ड ४६५

दो० – धाइ पूँछिहहिं मोहि जब बिकल नगर नर नारि ।

उतरु देब मैं सबहि तब हृदयँ बजु बैठारि ॥ १४५ ॥

नगरके सब व्याकुल स्त्री- पुरुष जब दौड़कर मुझसे पूछेंगे, तब मैं हृदयपर वज्र रखकर सबको उत्तर दूँगा ॥१४५ ॥

पुछिहहिं दीन दुखित सब माता । कहब काह मैं तिन्हहि बिधाता ॥

पूछिहि जबहिं लखन महतारी । कहिहउँ कवन सँदेस सुखारी ॥

जब दीन - दुखी सब माताएँ पूछेंगी, तब हे विधाता! मैं उन्हें क्या कहूँगा? जब लक्ष्मणजीकी माता मुझसे पूछेंगी, तब मैं उन्हें कौन-सा सुखदायी सँदेसा कहूँगा? ॥ १ ॥

राम जननि जब आइहि धाई । सुमिरि बच्छु जिमि धेनु लवाई ॥

पूँछत उतरु देब मैं तेही । गे बनु राम लखनु बैदेही ॥

श्रीरामजीकी माता जब इस प्रकार दौड़ी आवेंगी जैसे नयी ब्यायी हुई गौ बछड़ेको याद करके दौड़ी आती है, तब उनके पूछनेपर मैं उन्हें यह उत्तर दूँगा कि श्रीराम, लक्ष्मण, सीता वनको चले गये! ॥२ ॥

जोइ पूँछिहि तेहि ऊतरु देबा । जाइ अवध अब यहु सुखु लेबा ॥

पूँछहि जबहिं राउ दुख दीना । जिवनु जासु रघुनाथ अधीना ॥

जो भी पूछेगा उसे यही उत्तर देना पड़ेगा! हाय! अयोध्या जाकर अब मुझे यही सुख लेना है! जब दुःखसे दीन महाराज, जिनका जीवन श्रीरघुनाथजीके [ दर्शनके ] ही अधीन है, मुझसे पूछेंगे, ॥ ३ ॥

देहउँ उतरु कौनु मुहु लाई । आयउँ कुसल कुअँर पहुँचाई ॥

सुनत लखन सिय राम सँदेसू । तृन जिमि तनु परिहरिहि नरेसू॥

तब मैं कौन - सा मुँह लेकर उन्हें उत्तर दूँगा कि मैं राजकुमारोंको कुशलपूर्वक पहुँचा आया हूँ! लक्ष्मण, सीता और श्रीरामका समाचार सुनते ही महाराज तिनकेकी तरह शरीरको त्याग देंगे ॥ ४ ॥

दो०-– हृदउ न बिदरेउ पंक जिमि बिछुरत प्रीतमु नीरु ।

जानत हौं मोहि दीन्ह बिधि यहु जातना सरीरु ॥ १४६ ॥

प्रियतम ( श्रीरामजी ) रूपी जलके बिछुड़ते ही मेरा हृदय कीचड़की तरह फट नहीं गया, इससे मैं जानता हूँ कि विधाताने मुझे यह ' यातनाशरीर' ही दिया है [ जो पापी जीवोंको नरक भोगनेके लिये मिलता है ] ॥ १४६ ॥

एहि बिधि करत पंथ पछितावा । तमसा तीर तुरत रथु आवा ॥

बिदा किए करि बिनय निषादा । फिरे पायँ परि बिकल बिषादा ॥

पृष्ठ 468

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* *४६६ रामचरितमानस सुमन्त्र इस प्रकार मार्गमें पछतावा कर रहे थे, इतनेमें ही रथ तुरंत तमसा नदीके तटपर आ पहुँचा । मन्त्रीने विनय करके चारों निषादोंको विदा किया । वे विषादसे व्याकुल होते हुए सुमन्त्रके पैरों पड़कर लौटे ॥१ ॥

पैठत नगर सचिव सकुचाई । जनु मारेसि गुर बाँभन गाई ॥

बैठि बिटप तर दिवसु गवाँवा । साँझ समय तब अवसरु पावा ॥

नगरमें प्रवेश करते मन्त्री [ ग्लानिके कारण ] ऐसे सकुचाते हैं, मानो गुरु, ब्राह्मण या गौको मारकर आये हों । सारा दिन एक पेड़के नीचे बैठकर बिताया । जब सन्ध्या हुई तब मौका मिला ॥ २ ॥

अवध प्रबेसु कीन्ह अँधिआरें । पैठ भवन रशु राखि दुआरें ॥

जिन्ह जिन्ह समाचार सुनि पाए । भूप द्वार रथु देखन आए ॥

अँधेरा होनेपर उन्होंने अयोध्यामें प्रवेश किया और रथको दरवाजेपर खड़ा करके वे [ चुपके- से ] महलमें घुसे । जिन- जिन लोगोंने यह समाचार सुन पाया, वे सभी रथ देखनेको राजद्वारपर आये ॥ ३ ॥

रथु पहिचानि बिकल लखि घोरे । गरहिं गात जिमि आतप ओरे ॥

नगर नारि नर ब्याकुल कैसें । निघटत नीर मीनगन जैसें ॥

रथको पहचानकर और घोड़ोंको व्याकुल देखकर उनके शरीर ऐसे गले जा रहे हैं ( क्षीण हो रहे हैं ) जैसे घाममें ओले! नगरके स्त्री - पुरुष कैसे व्याकुल हैं जैसे जलके घटनेपर मछलियाँ [ व्याकुल होती हैं ] ॥ ४ ॥

दो० – सचिव आगमनु सुनत सबु बिकल भयउ रनिवासु ।

भवनु भयंकरु लाग तेहि मानहुँ प्रेत निवासु ॥ १४७ ॥

मन्त्रीका [ अकेले ही ] आना सुनकर सारा रनिवास व्याकुल हो गया । राजमहल उनको ऐसा भयानक लगा मानो प्रेतोंका निवासस्थान ( श्मशान) हो ॥ १४७ ॥।

अति आरति सब पूँछहिं रानी । उतरु न आव बिकल भइ बानी ॥

सुनइ न श्रवन नयन नहिं सूझा । कहहु कहाँ नृपु तेहि तेहि बूझा ॥

अत्यन्त आर्त होकर सब रानियाँ पूछती हैं; पर सुमन्त्रको कुछ उत्तर नहीं आता, उनकी वाणी विकल हो गयी ( रुक गयी ) है । न कानोंसे सुनायी पड़ता है और न आँखोंसे कुछ सूझता है । वे जो भी सामने आता है उस उससे पूछते हैं - कहो, राजा कहाँ हैं? ॥१ ॥

दासिन्ह दीख सचिव बिकलाई । कौसल्या गृहँ गईं लवाई ॥

जाइ सुमंत्र दीख कस राजा । अमिअ रहित जनु चंदु बिराजा ॥

दासियाँ मन्त्रीको व्याकुल देखकर उन्हें कौसल्याजीके महलमें लिवा गयीं । सुमन्त्रने जाकर वहाँ राजाको कैसा [ बैठे ] देखा मानो बिना अमृतका चन्द्रमा हो ॥ २ ॥

पृष्ठ 469

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* * अयोध्याकाण्ड ४६७

आसन सयन बिभूषन हीना । परेउ भूमितल निपट मलीना ॥

लेइ उसासु सोच एहि भाँती । सुरपुर तें जनु खँसेउ जजाती ॥

राजा आसन, शय्या और आभूषणोंसे रहित बिलकुल मलिन ( उदास ) पृथ्वीपर पड़े हुए हैं । वे लंबी साँसें लेकर इस प्रकार सोच करते हैं मानो राजा ययाति स्वर्गसे गिरकर सोच कर रहे हों ॥३ ॥

लेत सोच भरि छिनु छिनु छाती । जनु जरि पंख परेउ संपाती ॥

राम राम कह राम सनेही । पुनि कह राम लखन बैदेही ॥

राजा क्षण- क्षणमें सोचसे छाती भर लेते हैं । ऐसी विकल दशा है मानो [ गीधराज जटायुका भाई] सम्पाती पंखोंके जल जानेपर गिर पड़ा हो । राजा [ बार- बार ] ' राम, राम ', ' हा स्नेही ( प्यारे ) राम! ' कहते हैं, फिर ' हा राम, हा लक्ष्मण, हा जानकी ' ऐसा कहने लगते हैं ॥ ४ ॥

दो० –देखि सचिवँ जय जीव कहि कीन्हेउ दंड प्रनामु ।

सुनत उठेउ ब्याकुल नृपति कहु सुमंत्र कहँ रामु ॥ १४८ ॥

मन्त्रीने देखकर ‘ जयजीव ' कहकर दण्डवत् प्रणाम किया । सुनते ही राजा व्याकुल होकर उठे और बोले- सुमन्त्र! कहो, राम कहाँ हैं? ॥ १४८ ॥

भूप सुमंत्र लीन्ह उर लाई । बूड़त कछु अधार जनु पाई ॥

सहित सनेह निकट बैठारी । पूँछत राउ नयन भरि बारी ॥

राजाने सुमन्त्रको हृदयसे लगा लिया । मानो डूबते हुए आदमीको कुछ सहारा मिल गया हो ।

मन्त्रीको स्नेहके साथ पास बैठाकर नेत्रोंमें जल भरकर राजा पूछने लगे –॥१ ॥

राम कुसल कहु सखा सनेही ॥ कहँ रघुनाथु लखनु बैदेही ॥

आने फेरि कि बनहि सिधाए । सुनत सचिव लोचन जल छाए ॥

हे मेरे प्रेमी सखा! श्रीरामकी कुशल कहो । बताओ, श्रीराम, लक्ष्मण और जानकी कहाँ हैं? उन्हें लौटा लाये हो कि वे वनको चले गये? यह सुनते ही मन्त्रीके नेत्रोंमें जल भर आया ॥२ ॥

सोक बिकल पुनि पूँछ नरेसू । कहु सिय राम लखन संदेसू॥

राम रूप गुन सील सुभाऊ । सुमिरि सुमिरि उर सोचत राऊ ॥

शोकसे व्याकुल होकर राजा फिर पूछने लगे- सीता, राम और लक्ष्मणका सँदेसा तो कहो । श्रीरामचन्द्रजीके रूप, गुण, शील और स्वभावको याद कर-करके राजा हृदयमें सोच करते हैं ॥ ३ ॥

राउ सुनाइ दीन्ह बनबासू । सुनि मन भयउ न हरषु हाँसू॥

सो सुत बिछुरत गए न प्राना । को पापी बड़ मोहि समाना ॥

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*:*४६८ रामचरितमानस [और कहते हैं - ] मैंने राजा होनेकी बात सुनाकर वनवास दे दिया, यह सुनकर भी जिस ( राम ) के मनमें हर्ष और विषाद नहीं हुआ, ऐसे पुत्रके बिछुड़नेपर भी मेरे प्राण नहीं गये, तब मेरे समान बड़ा पापी कौन होगा? ॥४ ॥

दो० –सखा रामु सिय लखनु जहँ तहाँ मोहि पहुँचाउ ।

नाहिं त चाहत चलन अब प्रान कहउँ सतिभाउ ॥ १४९ ॥

हे सखा! श्रीराम, जानकी और लक्ष्मण जहाँ हैं, मुझे भी वहीं पहुँचा दो । नहीं तो मैं सत्य भावसे कहता हूँ कि मेरे प्राण अब चलना ही चाहते हैं ॥१४९ ॥

पुनि पुनि पूँछत मंत्रिहि राऊ । प्रियतम सुअन सँदेस सुनाऊ ॥

करहि सखा सोइ बेगि उपाऊ । रामु लखनु सिय नयन देखाऊ ॥

राजा बार- बार मन्त्रीसे पूछते हैं - मेरे प्रियतम पुत्रोंका सँदेसा सुनाओ । हे सखा! तुम तुरंत वही उपाय करो जिससे श्रीराम, लक्ष्मण और सीताको मुझे आँखों दिखा दो ॥१ ॥

सचिव धीर धरि कह मृदु बानी । महाराज तुम्ह पंडित ग्यानी ॥

सुधीर धुरंधर देवा । साधु समाजु सदा तुम्ह सेवा ॥

मन्त्री धीरज धरकर कोमल वाणी बोले - महाराज! आप पण्डित और ज्ञानी हैं । हे देव! आप शूरवीर तथा उत्तम धैर्यवान् पुरुषोंमें श्रेष्ठ हैं । आपने सदा साधुओंके समाजका सेवन किया है ॥२ ॥

जनम मरन सब दुख सुख भोगा । हानि लाभु प्रिय मिलन बियोगा ॥

काल करम बस होहिं गोसाईं । बरबस राति दिवस की नाईं ॥

जन्म- मरण, सुख- दुःखके भोग, हानि-लाभ, प्यारोंका मिलना-बिछुड़ना, ये सब हे स्वामी! काल और कर्मके अधीन रात और दिनकी तरह बरबस होते रहते हैं ॥ ३ ॥

सुख हरषहिं जड़ दुख बिलखाहीं । दोउ सम धीर धरहिं मन माहीं ॥

धीरज धरहु बिबेकु बिचारी । छाड़िअ सोच सकल हितकारी ॥

मूर्खलोग सुखमें हर्षित होते और दुःखमें रोते हैं, पर धीर पुरुष अपने मनमें दोनोंको समान समझते हैं । हे सबके हितकारी (रक्षक )! आप विवेक विचारकर धीरज धरिये और शोकका परित्याग कीजिये ॥४ ॥

दो० - प्रथम बासु तमसा भयउ दूसर सुरसरि तीर ।

न्हाइ रहे जलपानु करि सिय समेत दोउ बीर ॥ १५० ॥

श्रीरामजीका पहला निवास ( मुकाम) तमसाके तटपर हुआ, दूसरा गङ्गातीरपर । सीताजीसहित दोनों भाई उस दिन स्नान करके जल पीकर ही रहे । १५० ॥