श्रीरामचरितमानस — पृष्ठ 471–480
श्रीरामचरितमानस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 471–480
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* * अयोध्याकाण्ड ४६ ९
केवट कीन्हि बहुत सेवकाई । सो जामिनि सिंगरौर गवाँई ॥
होत प्रात बट छीरु मगावा । जटा मुकुट निज सीस बनावा ॥
केवट ( निषादराज ) ने बहुत सेवा की । वह रात सिंगरौर ( शृंगवेरपुर ) में ही बितायी । दूसरे दिन सबेरा होते ही बड़का दूध मँगवाया और उससे श्रीराम -लक्ष्मणने अपने सिरोंपर जटाओंके मुकुट बनाये ॥ १ ॥
राम सखाँ तब नाव मगाई । प्रिया चढ़ाई चढ़े रघुराई ॥
लखन बान धनु धरे बनाई । आपु चढ़े प्रभु आयसु पाई ॥
तब श्रीरामचन्द्रजीके सखा निषादराजने नाव मँगवायी । पहले प्रिया सीताजीको उसपर चढ़ाकर फिर श्रीरघुनाथजी चढ़े । फिर लक्ष्मणजीने धनुष - बाण सजाकर रखे और प्रभु श्रीरामचन्द्रजीकी आज्ञा पाकर स्वयं चढ़े ॥ २ ॥
बिकल बिलोकि मोहि रघुबीरा । बोले मधुर बचन धरि धीरा ॥
तात प्रनामु तात सन कहेहू । बार बार पद पंकज गहेहू ॥
मुझे व्याकुल देखकर श्रीरामचन्द्रजी धीरज धरकर मधुर वचन बोले- हे तात! पिताजीसे मेरा प्रणाम कहना और मेरी ओरसे बार-बार उनके चरणकमल पकड़ना ॥३ ॥
कब पायँ परि बिनय बहोरी । तात करिअ जनि चिंता मोरी ॥
बन मग मंगल कुसल हमारें । कृपा अनुग्रह पुन्य तुम्हारें ॥
फिर पाँव पकड़कर विनती करना कि हे पिताजी! आप मेरी चिन्ता न कीजिये । आपकी कृपा, अनुग्रह और पुण्यसे वनमें और मार्गमें हमारा कुशल- मङ्गल होगा ॥ ४ ॥
छं० – तुम्हरें अनुग्रह तात कानन जात सब सुख पाइहौं ।
प्रतिपालि आयसु कुसल देखन पाय पुनि फिरि आइहौं ।
जननीं सकल परितोषि परि परि पायँ करि बिनती घनी ।
तुलसी करेहु सोइ जतनु जेहिं कुसली रहहिं कोसलधनी ॥
हे पिताजी! आपके अनुग्रहसे मैं वन जाते हुए सब प्रकारका सुख पाऊँगा । आज्ञाका भलीभाँति पालन करके चरणोंका दर्शन करने कुशलपूर्वक फिर लौट आऊँगा । सब माताओंके पैरों पड़- पड़कर उनका समाधान करके और उनसे बहुत विनती करके -तुलसीदास कहते हैं — तुम वही प्रयत्न करना जिसमें कोसलपति पिताजी कुशल रहें ।
सो०– गुर सन कहब सँदेसु बार बार पद पदुम गहि ।
करब सोइ उपदेसु जेहिं न सोच मोहि अवधपति ॥ १५१ ॥
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* *४७० रामचरितमानस बार- बार चरणकमलोंको पकड़कर गुरु वसिष्ठजीसे मेरा सँदेसा कहना कि वे वही उपदेश दें जिससे अवधपति पिताजी मेरा सोच न करें ॥ १५१ ॥
पुरजन परिजन सकल निहोरी । तात सुनाएहु बिनती मोरी ॥
सोइ सब भाँति मोर हितकारी । जातें रह नरनाहु सुखारी ॥
हे तात! सब पुरवासियों और कुटुम्बियोंसे निहोरा ( अनुरोध ) करके मेरी विनती सुनाना कि वही मनुष्य मेरा सब प्रकारसे हितकारी है जिसकी चेष्टासे महाराज सुखी रहें ॥१ ॥
कहब सँदेसु भरत के आएँ । नीति न तजिअ राजपदु पाएँ ॥
पालेहु प्रजहि करम मन बानी । सेएहु मातु सकल सम जानी ॥
भरतके आनेपर उनको मेरा सँदेसा कहना कि राजाका पद पा जानेपर नीति न छोड़ देना; कर्म, वचन और मनसे प्रजाका पालन करना और सब माताओंको समान जानकर उनकी सेवा करना ॥ २ ॥
ओर निबाहेहु भायप भाई । करि पितु मातु सुजन सेवकाई ॥
तात भाँति तेहि राखब राऊ । सोच मोर जेहिं करै न काऊ ॥
और हे भाई! पिता, माता और स्वजनोंकी सेवा करके भाईपनेको अन्ततक निबाहना । हे तात! राजा ( पिताजी ) को उसी प्रकारसे रखना जिससे वे कभी ( किसी तरह भी ) मेरा सोच न करें ॥ ३ ॥
लखन कहे कछु बचन कठोरा । बरजि राम पुनि मोहि निहोरा ॥
बार बार निज सपथ देवाई । कहबि न तात लखन लरिकाई ॥
लक्ष्मणजीने कुछ कठोर वचन कहे । किन्तु श्रीरामजीने उन्हें बरजकर फिर मुझसे अनुरोध किया और बार - बार अपनी सौगंध दिलायी [और कहा- ] हे तात! लक्ष्मणका लड़कपन वहाँ न कहना ॥४ ॥
दो० - कहि प्रनामु कछु कहन लिय सिय भइ सिथिल सनेह ।
थकित बचन लोचन सजल पुलक पल्लवित देह ॥ १५२ ॥
प्रणामकर सीताजी भी कुछ कहने लगी थीं, परन्तु स्नेहवश वे शिथिल हो गयीं । उनकी वाणी रुक गयी, नेत्रोंमें जल भर आया और शरीर रोमाञ्चसे व्याप्त हो गया ॥ १५२ ॥
तेहि अवसर रघुबर रुख पाई । केवट पारहि नाव चलाई ॥
रघुकुलतिलक चले एहि भाँती । देखउँ ठाढ़ कुलिस धरि छाती ॥
उसी समय श्रीरामचन्द्रजीका रुख पाकर केवटने पार जानेके लिये नाव चला दी । इस प्रकार रघुवंशतिलक श्रीरामचन्द्रजी चल दिये और मैं छातीपर वज्र रखकर खड़ा -खड़ा देखता रहा ॥१ ॥
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* ** अयोध्याकाण्ड ४७१
मैं आपन किमि कहौं कलेसू । जिअत फिरेउँ लेइ राम सँदेसू॥
अस कहि सचिव बचन रहि गयऊ । हानि गलानि सोच बस भयऊ ॥
मैं अपने क्लेशको कैसे कहूँ, जो श्रीरामजीका यह सँदेसा लेकर जीता ही लौट आया! ऐसा कहकर मन्त्रीकी वाणी रुक गयी (वे चुप हो गये ) और वे हानिकी ग्लानि और सोचके वश हो गये ॥२ ॥
सूत बचन सुनतहिं नरनाहू । परेउ धरनि उर दारुन दाहू ॥
तलफत बिषम मोह मन मापा । माजा मनहुँ मीन कहुँ ब्यापा ॥
सारथी सुमन्त्रके वचन सुनते ही राजा पृथ्वीपर गिर पड़े, उनके हृदयमें भयानक जलन होने लगी । वे तड़पने लगे, उनका मन भीषण मोहसे व्याकुल हो गया । मानो मछलीको माँजा व्याप गया हो ( पहली वर्षाका जल लग गया हो) ॥ ३ ॥
करि बिलाप सब रोवहिं रानी । महा बिपति किमि जाइ बखानी ॥
सुनि बिलाप दुखहू दुखु लागा । धीरजहू कर धीरजु भागा ॥
सब रानियाँ विलाप करके रो रही हैं । उस महान् विपत्तिका कैसे वर्णन किया जाय? उस समयके विलापको सुनकर दुःखको भी दुःख लगा और धीरजका भी धीरज भाग गया! ॥ ४ ॥
दो० - भयउ कोलाहलु अवध अति सुनि नृप राउर सोरु ।
बिपुल बिहग बन परेउ निसि मानहु कुलिस कठोरु ॥ १५३ ॥
राजाके रावले ( रनिवास ) में [ रोनेका ] शोर सुनकर अयोध्याभरमें बड़ा भारी कुहराम मच गया! [ ऐसा जान पड़ता था ] मानो पक्षियोंके विशाल वनमें रातके समय कठोर वज्र गिरा हो ॥ १५३ ॥
प्रान कंठगत भयउ भुआलू । मनि बिहीन जनु ब्याकुल ब्यालू ॥
इंद्रीं सकल बिकल भइँ भारी । जनु सर सरसिज बनु बिनु बारी ॥
राजाके प्राण कण्ठमें आ गये । मानो मणिके बिना साँप व्याकुल ( मरणासन्न ) हो गया हो । इन्द्रियाँ सब बहुत ही विकल हो गयीं, मानो बिना जलके तालाबमें कमलोंका वन मुरझा गया हो ॥१ ॥
कौसल्याँ नृपु दीख मलाना । रबिकुल रबि अँथयउ जियँ जाना ॥
उर धरि धीर राम महतारी । बोली बचन समय अनुसारी ॥
कौसल्याजीने राजाको बहुत दुखी देखकर अपने हृदयमें जान लिया कि अब सूर्यकुलका सूर्य अस्त हो चला! तब श्रीरामचन्द्रजीकी माता कौसल्या हृदयमें धीरज धरकर समयके अनुकूल वचन बोलीं— ॥ २ ॥
नाथ समुझि मन करिअ बिचारू । राम बियोग पयोधि अपारू ॥
करनधार तुम्ह अवध जहाजू । चढ़ेउ सकल प्रिय पथिक समाजू ॥
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* *४७२ रामचरितमानस हे नाथ! आप मनमें समझकर विचार कीजिये कि श्रीरामचन्द्रका वियोग अपार समुद्र है । अयोध्या जहाज है और आप उसके कर्णधार ( खेनेवाले ) हैं । सब प्रियजन ( कुटुम्बी और प्रजा ) ही यात्रियोंका समाज है जो इस जहाजपर चढ़ा हुआ है ॥ ३ ॥
धीरजु धरिअ त पाइअ पारू । नाहिं त बूड़िहि सबु परिवारू ॥
जौं जियँ धरिअ बिनय पिय मोरी । रामु लखनु सिय मिलहिं बहोरी ॥
आप धीरज धरियेगा तो सब पार पहुँच जायँगे । नहीं तो सारा परिवार डूब जायगा । हे प्रिय स्वामी! यदि मेरी विनती हृदयमें धारण कीजियेगा तो श्रीराम, लक्ष्मण, सीता फिर आ मिलेंगे ॥ ४ ॥
दो० – प्रिया बचन मृदु सुनत नृपु चितयउ आँखि उघारि ।
तलफत मीन मलीन जनु सींचत सीतल बारि ॥ १५४ ॥
प्रिय पत्नी कौसल्याके कोमल वचन सुनते हुए राजाने आँखें खोलकर देखा! मानो तड़पती हुई दीन मछलीपर कोई शीतल जल छिड़क रहा हो ॥१५४ ॥
धरि धीरजु उठि बैठ भुआलू । कहु सुमंत्र कहँ राम कृपालू॥
कहाँ लखनु कहँ रामु सनेही । कहँ प्रिय पुत्रबधू बैदेही ॥
धीरज धरकर राजा उठ बैठे और बोले- सुमन्त्र! कहो, कृपालु श्रीराम कहाँ हैं? लक्ष्मण कहाँ हैं? स्नेही राम कहाँ हैं? और मेरी प्यारी बहू जानकी कहाँ है? ॥ १ ॥
बिलपत राउ बिकल बहु भाँती । भइ जुग सरिस सिराति न राती ॥
तापस अंध साप सुधि आई । कौसल्यहि सब कथा सुनाई ॥
राजा व्याकुल होकर बहुत प्रकारसे विलाप कर रहे हैं । वह रात युगके समान बड़ी हो गयी, बीतती ही नहीं । राजाको अंधे तपस्वी ( श्रवणकुमारके पिता ) के शापकी याद आ गयी । उन्होंने सब कथा कौसल्याको कह सुनायी ॥ २ ॥
भयउ बिकल बरनत इतिहासा । राम रहित धिग जीवन आसा ॥
सो तनु राखि करब मैं काहा । जेहिं न प्रेम पनु मोर निबाहा ॥
उस इतिहासका वर्णन करते- करते राजा व्याकुल हो गये और कहने लगे कि श्रीरामके बिना जीनेकी आशाको धिक्कार है । मैं उस शरीरको रखकर क्या करूँगा जिसने मेरा प्रेमका प्रण नहीं निबाहा? ॥३ ॥
हा रघुनंदन प्रान पिरीते । तुम्ह बिनु जिअत बहुत दिन बीते ॥
हा जानकी लखन हा रघुबर । हा पितु हित चित चातक जलधर ॥
हा रघुकुलको आनन्द देनेवाले मेरे प्राणप्यारे राम! तुम्हारे बिना जीते हुए मुझे बहुत दिन बीत गये । हा जानकी, लक्ष्मण! हा रघुवर! हा पिताके चित्तरूपी चातकके हित करनेवाले मेघ! ॥४ ॥
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* * अयोध्याकाण्ड ४७३
दो० –- राम राम कहि राम कहि राम राम कहि राम ।
तनु परिहरि रघुबर बिरहँ राउ गयउ सुरधाम ॥ १५५ ॥
राम- राम कहकर, फिर राम कहकर, फिर राम-राम कहकर और फिर राम कहकर राजा श्रीरामके विरहमें शरीर त्याग कर सुरलोकको सिधार गये ॥ १५५ ॥
जिअन मरन फलु दसरथ पावा । अंड अनेक अमल जसु छावा ॥
जित राम बिधु बदनु निहारा । राम बिरह करि मरनु सँवारा ॥
जीने और मरनेका फल तो दशरथजीने ही पाया, जिनका निर्मल यश अनेकों ब्रह्माण्डोंमें छा गया । जीते - जी तो श्रीरामचन्द्रजीके चन्द्रमाके समान मुखको देखा और श्रीरामके विरहको निमित्त बनाकर अपना मरण सुधार लिया ॥ १ ॥
सोक बिकल सब रोवहिं रानी । रूपु सीलु बलु तेजु बखानी ॥
करहिं बिलाप अनेक प्रकारा । परहिं भूमितल बारहिं बारा ॥
सब रानियाँ शोकके मारे व्याकुल होकर रो रही हैं । वे राजाके रूप, शील, बल और तेजका बखान कर- करके अनेकों प्रकारसे विलाप कर रही हैं और बार- बार धरतीपर गिर-गिर पड़ती हैं ॥२ ॥
बिलपहिं बिकल दास अरु दासी । घर घर रुदनु करहिं पुरबासी ॥
अँथयउ आजु भानुकुल भानू । धरम अवधि गुन रूप निधानू॥
दास- दासीगण व्याकुल होकर विलाप कर रहे हैं और नगरनिवासी घर- घर रो रहे हैं । कहते हैं कि आज धर्मकी सीमा, गुण और रूपके भण्डार सूर्यकुलके सूर्य अस्त हो गये! ॥३ ॥
गारीं सकल कैकइहि देहीं । नयन बिहीन कीन्ह जग जेहीं ॥
एहि बिधि बिलपत रैनि बिहानी । आए सकल महामुनि ग्यानी ॥
सब कैकेयीको गालियाँ देते हैं, जिसने संसारभरको बिना नेत्रका ( अंधा ) कर दिया! इस प्रकार
विलाप करते रात बीत गयी । प्रात: काल सब बड़े - बड़े ज्ञानी मुनि आये ॥४ ॥
दो० - तब बसिष्ठ मुनि समय सम कहि अनेक इतिहास ।
सोक नेवारेउ सबहि कर निज बिग्यान प्रकास ॥ १५६ ॥
तब वसिष्ठ मुनिने समयके अनुकूल अनेक इतिहास कहकर अपने विज्ञानके प्रकाशसे सबका शोक दूर किया ॥ १५६ ॥
तेल नावँ भरि नृप तनु राखा । दूत बोलाइ बहुरि अस भाषा ॥
धावहु बेगि भरत पहिं जाहू । नृप सुधि कतहुँ कहहु जनि काहू ।
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* *४७४ रामचरितमानस वसिष्ठजीने नावमें तेल भरवाकर राजाके शरीरको उसमें रखवा दिया । फिर दूतोंको बुलवाकर उनसे ऐसा कहा – तुमलोग जल्दी दौड़कर भरतके पास जाओ । राजाकी मृत्युका समाचार कहीं किसीसे न कहना ॥१ ॥
एतनेइ कहेहु भरत सन जाई । गुर बोलाइ पठयउ दोउ भाई ॥
सुनि मुनि आयसु धावन धाए । चले बेग बर बाजि लजाए ॥
जाकर भरतसे इतना ही कहना कि दोनों भाइयोंको गुरुजीने बुलवा भेजा है । मुनिकी आज्ञा
सुनकर धावन ( दूत ) दौड़े । वे अपने वेगसे उत्तम घोड़ोंको भी लजाते हुए चले ॥२ ॥
अनरथु अवध अरंभेउ जब तें । कुसगुन होहिं भरत कहूँ तब तें ॥
देखहिं राति भयानक सपना । जागि करहिं कटु कोटि कलपना ॥
जबसे अयोध्यामें अनर्थ प्रारम्भ हुआ, तभीसे भरतजीको अपशकुन होने लगे । वे रातको भयङ्कर स्वप्न देखते थे और जागनेपर [ उन स्वप्नोंके कारण ] करोड़ों ( अनेकों ) तरहकी बुरी - बुरी कल्पनाएँ किया करते थे ॥ ३ ॥
बिप्र जेवाँइ देहिं दिन दाना । सिव अभिषेक करहिं बिधि नाना ॥
मागहिं हृदयँ महेस मनाई । कुसल मातु पितु परिजन भाई ॥॥
[ अनिष्टशान्तिके लिये ] वे प्रतिदिन ब्राह्मणोंको भोजन कराकर दान देते थे । अनेकों विधियोंसे रुद्राभिषेक करते थे । महादेवजीको हृदयमें मनाकर उनसे माता-पिता, कुटुम्बी और भाइयोंका कुशल- क्षेम माँगते थे ॥४ ॥
दो० – एहि बिधि सोचत भरत मन धावन पहुँचे आइ ।
गुर अनुसासन श्रवन सुनि चले गनेसु मनाइ ॥ १५७ ॥
भरतजी इस प्रकार मनमें चिन्ता कर रहे थे कि दूत आ पहुँचे । गुरुजीकी आज्ञा कानोंसे सुनते ही वे गणेशजीको मनाकर चल पड़े ॥ १५७ ॥
चले समीर बेग हय हाँके । नाघत सरित सैल बन बाँके ॥
हृदयँ सोचु बड़ कछु न सोहाई । अस जानहिं जियँ जाउँ उड़ाई ॥
हवाके समान वेगवाले घोड़ोंको हाँकते हुए वे विकट नदी, पहाड़ तथा जंगलोंको लाँघते हुए चले । उनके हृदयमें बड़ा सोच था, कुछ सुहाता न था । मनमें ऐसा सोचते थे कि उड़कर पहुँच जाऊँ॥१ ॥
एक निमेष बरष सम जाई । एहि बिधि भरत नगर निअराई ॥
असगुन होहिं नगर पैठारा । रटहिं कुभाँति कुखेत करारा ॥
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* * अयोध्याकाण्ड ४७५ एक- एक निमेष वर्षके समान बीत रहा था । इस प्रकार भरतजी नगरके निकट पहुँचे । नगरमें प्रवेश करते समय अपशकुन होने लगे । कौए बुरी जगह बैठकर बुरी तरहसे काँव-काँव कर रहे हैं ॥२ ॥
खर सिआर बोलहिं प्रतिकूला । सुनि सुनि होइ भरत मन सूला ॥
श्रीहत सर सरिता बन बागा । नगरु बिसेषि भयावनु लागा ॥
गदहे और सियार विपरीत बोल रहे हैं । यह सुन- सुनकर भरतके मनमें बड़ी पीड़ा हो रही है । तालाब, नदी, वन, बगीचे सब शोभाहीन हो रहे हैं । नगर बहुत ही भयानक लग रहा है ॥ ३ ॥
खग मृग हय गय जाहिं न जोए । राम बियोग कुरोग बिगोए ॥
नगर नारि नर निपट दुखारी । मनहुँ सबन्हि सब संपति हारी ॥
श्रीरामजीके वियोगरूपी बुरे रोगसे सताये हुए पक्षी-पशु, घोड़े -हाथी [ ऐसे दुखी हो रहे हैं कि ] देखे नहीं जाते । नगरके स्त्री- पुरुष अत्यन्त दुखी हो रहे हैं । मानो सब अपनी सारी सम्पत्ति हार बैठे हों ॥४ ॥
दो० -– पुरजन मिलहिं न कहहिं कछु गवँहिं जोहारहिं जाहिं ।
भरत कुसल पूँछि न सकहिं भय बिषाद मन माहिं ॥ १५८ ॥
नगरके लोग मिलते हैं, पर कुछ कहते नहीं; गौंसे ( चुपकेसे ) जोहार ( वन्दना ) करके चले जाते हैं । भरतजी भी किसीसे कुशल नहीं पूछ सकते, क्योंकि उनके मनमें भय और विषाद छा रहा है ॥ १५८ ॥
हाट बाट नहिं जाइ निहारी । जनु पुर दहँ दिसि लागि दवारी ॥
आवत सुत सुनि कैकयनंदिनि । हरषी रबिकुल जलरुह चंदिनि ॥
बाजार और रास्ते देखे नहीं जाते । मानो नगरमें दसों दिशाओंमें दावाग्नि लगी है! पुत्रको आते सुनकर सूर्यकुलरूपी कमलके लिये चाँदनीरूपी कैकेयी [ बड़ी ] हर्षित हुई ॥१ ॥
सजि आरती मुदित उठि धाई । द्वारेहिं भेंटि भवन लेइ आई ॥
भरत दुखित परिवारु निहारा । मानहुँ तुहिन बनज बनु मारा ॥
वह आरती सजाकर आनन्दमें भरकर उठ दौड़ी और दरवाजेपर ही मिलकर भरत- शत्रुघ्नको महलमें ले आयी । भरतने सारे परिवारको दुखी देखा I। मानो कमलोंके वनको पाला मार गया हो ॥ २ ॥
कैकेई हरषित एहि भाँती । मनहुँ मुदित दव लाइ किराती ॥
सुतहि ससोच देखि मनु मारें । पूँछति नैहर कुसल हमारें ॥
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* *४७६ रामचरितमानस एक कैकेयी ही इस तरह हर्षित दीखती है मानो भीलनी जंगलमें आग लगाकर आनन्दमें भर रही हो । पुत्रको सोचवश और मनमारे ( बहुत उदास ) देखकर वह पूछने लगी- हमारे नैहरमें कुशल तो है? ॥३ ॥
सकल कुसल कहि भरत सुनाई । पूँछी निज कुल कुसल भलाई ॥
कहु कहँ तात कहाँ सब माता । कहँ सिय राम लखन प्रिय भ्राता ॥
भरतजीने सब कुशल कह सुनायी । फिर अपने कुलकी कुशल- क्षेम पूछी । [ भरतजीने कहा— ] कहो, पिताजी कहाँ हैं? मेरी सब माताएँ कहाँ हैं? सीताजी और मेरे प्यारे भाई राम- लक्ष्मण कहाँ हैं?॥ ४ ॥
दो० - सुनि सुत बचन सनेहमय कपट नीर भरि नैन ।
भरत श्रवन मन सूल सम पापिनि बोली बैन ॥ १५ ९ ॥
पुत्रके स्नेहमय वचन सुनकर नेत्रोंमें कपटका जल भरकर पापिनी कैकेयी भरतके कानोंमें और मनमें शूलके समान चुभनेवाले वचन बोली- ॥ १५ ९ ॥
तात बात मैं सकल सँवारी । भै मंथरा सहाय बिचारी ॥
कछुक काज बिधि बीच बिगारेउ । भूपति सुरपति पुर पगु धारेउ ॥
हे तात! मैंने सारी बात बना ली थी । बेचारी मन्थरा सहायक हुई । पर विधाताने बीचमें जरा-सा काम बिगाड़ दिया । वह यह कि राजा देवलोकको पधार गये ॥१ ॥
सुनत भरतु भए बिबस बिषादा । जनु सहमेउ करि केहरि नादा ॥
तात तात हा तात पुकारी । परे भूमितल ब्याकुल भारी ॥
भरत यह सुनते ही विषादके मारे विवश ( बेहाल ) हो गये । मानो सिंहकी गर्जना सुनकर हाथी सहम गया हो । वे ' तात! तात! हा तात! ' पुकारते हुए अत्यन्त व्याकुल होकर जमीनपर गिर पड़े ॥२ ॥
चलत न देखन पायउँ तोही । तात न रामहि सौंपेहु मोही ॥
बहुरि धीर धरि उठे सँभारी । कहु पितु मरन हेतु महतारी ॥
[और विलाप करने लगे कि ] हे तात! मैं आपको [स्वर्गके लिये ] चलते समय देख भी न सका । [ हाय! ] आप मुझे श्रीरामजीको सौंप भी नहीं गये! फिर धीरज धरकर वे सँभलकर उठे और बोले— माता! पिताके मरनेका कारण तो बताओ ॥३ ॥
सुनि सुत बचन कहति कैकेई । मरमु पाँछि जनु माहुर देई ॥
आदिहु तें सब आपनि करनी । कुटिल कठोर मुदित मन बरनी ॥
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* * अयोध्याकाण्ड ४७७ पुत्रका वचन सुनकर कैकेयी कहने लगी । मानो मर्मस्थानको पाछकर (चाकूसे चीरकर ) उसमें जहर भर रही हो । कुटिल और कठोर कैकेयीने अपनी सब करनी शुरूसे [ आखीरतक बड़े ] प्रसन्न मनसे सुना दी ॥४ ॥
दो० - भरतहि बिसरेउ पितु मरन सुनत राम बन गौनु ।
हेतु अपनप जानि जियँ थकित रहे धरि मौनु ॥ १६० ॥
श्रीरामचन्द्रजीका वन जाना सुनकर भरतजीको पिताका मरण भूल गया और हृदयमें इस सारे अनर्थका कारण अपनेको ही जानकर वे मौन होकर स्तम्भित रह गये ( अर्थात् उनकी बोली बंद हो गयी और वे सन्न रह गये ) ॥ १६० ॥
बिकल बिलोकि सुतहि समुझावति । मनहुँ जरे पर लोनु लगावति ॥
तात राउ नहिं सोचै जोगू । बिढ़इ सुकृत जसु कीन्हेउ भोगू॥
पुत्रको व्याकुल देखकर कैकेयी समझाने लगी । मानो जलेपर नमक लगा रही हो । [ वह बोली- ] हे तात! राजा सोच करने योग्य नहीं हैं । उन्होंने पुण्य और यश कमाकर उसका पर्याप्त भोग किया ॥ १ ॥
जीवत सकल जनम फल पाए । अंत अमरपति सदन सिधाए ॥
अस अनुमानि सोच परिहरहू । सहित समाज राज पुर करहू ॥
जीवनकालमें ही उन्होंने जन्म लेनेके सम्पूर्ण फल पा लिये और अन्तमें वे इन्द्रलोकको चले गये । ऐसा विचारकर सोच छोड़ दो और समाजसहित नगरका राज्य करो ॥२ ॥
सुनि सुठि सहमेउ राजकुमारू । पाकें छत जनु लाग अँगारू ॥
धीरज धरि भरि लेहिं उसासा । पापिनि सबहि भाँति कुल नासा ॥
राजकुमार भरतजी यह सुनकर बहुत ही सहम गये । मानो पके घावपर अँगार छू गया हो । उन्होंने धीरज धरकर बड़ी लंबी साँस लेते हुए कहा - पापिनी! तूने सभी तरहसे कुलका नाश कर दिया ॥ ३ ॥
जौं पै कुरुचि रही अति तोही । जनमत काहे न मारे मोही ॥
पेड़ काटि तैं पालउ सींचा । मीन जिअन निति बारि उलीचा ॥
हाय! यदि तेरी ऐसी ही अत्यन्त बुरी रुचि ( दुष्ट इच्छा ) थी, तो तूने जन्मते ही मुझे मार क्यों नहीं डाला? तूने पेड़को काटकर पत्तेको सींचा है और मछलीके जीनेके लिये पानीको उलीच डाला! ( अर्थात् मेरा हित करने जाकर उलटा तूने मेरा अहित कर डाला ) ॥४ ॥
दो० – हंसबंसु दसरथु जनकु राम लखन से भाइ ।
जननी तूंजननी भई बिधि सन कछु न बसाइ ॥ १६१ ॥
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* *४७८ रामचरितमानस मुझे सूर्यवंश [ -सा वंश ], दशरथजी [ - सरीखे ] पिता और राम- लक्ष्मण-से भाई मिले । पर हे जननी! मुझे जन्म देनेवाली माता तू हुई! [ क्या किया जाय! ] विधातासे कुछ भी वश नहीं चलता ॥ १६१ ॥
जब तैं कुमति कुमत जियँ ठयऊ । खंड खंड होइ हृदउ न गयऊ ॥
बर मागत मन भइ नहिं पीरा । गरि न जीह मुहँ परेउ न कीरा ॥
अरी कुमति! जब तूने हृदयमें यह बुरा विचार (निश्चय ) ठाना, उसी समय तेरे हृदयके टुकड़े-टुकड़े [ क्यों ] न हो गये? वरदान माँगते समय तेरे मनमें कुछ भी पीड़ा नहीं हुई? तेरी जीभ गल नहीं गयी? तेरे मुँहमें कीड़े नहीं पड़ गये? ॥१ ॥
भू प्रतीति तोरि किमि कीन्ही । मरन काल बिधि मति हरि लीन्ही ॥
बिधिहुँ न नारि हृदय गति जानी । सकल कपट अघ अवगुन खानी ॥
राजाने तेरा विश्वास कैसे कर लिया? [जान पड़ता है, ] विधाताने मरनेके समय उनकी बुद्धि हर ली थी । स्त्रियोंके हृदयकी गति ( चाल ) विधाता भी नहीं जान सके । वह सम्पूर्ण कपट, पाप और अवगुणोंकी खान है ॥ २ ॥
सरल सुसील धरम रत राऊ । सो किमि जानै तीय सुभाऊ ॥
अस को जीव जंतु जग माहीं । जेहि रघुनाथ प्रानप्रिय नाहीं ॥
फिर राजा तो सीधे, सुशील और धर्मपरायण थे । वे भला, स्त्री - स्वभावको कैसे जानते? अरे, जगत्के जीव- जन्तुओंमें ऐसा कौन है जिसे श्रीरघुनाथजी प्राणोंके समान प्यारे नहीं हैं ॥३ ॥
भे अति अहित रामु तेउ तोही । को तू अहसि सत्य कहु मोही ॥
जो हसि सो हसि मुहँ मसि लाई । आँखि ओट उठि बैठहि जाई ॥
वे श्रीरामजी भी तुझे अहित हो गये ( वैरी लगे )! तू कौन है? मुझे सच- सच कह! तू जो है, सो है, अब मुँहमें स्याही पोतकर ( मुँह काला करके ) उठकर मेरी आँखोंकी ओटमें जा बैठ॥४ ॥
दो० – राम बिरोधी हृदय तें प्रगट कीन्ह बिधि मोहि ।
मो समान को पातकी बादि कहउँ कछु तोहि ॥ १६२ ॥
विधाताने मुझे श्रीरामजीसे विरोध करनेवाले ( तेरे ) हृदयसे उत्पन्न किया [ अथवा विधाताने मुझे हृदयसे रामका विरोधी जाहिर कर दिया ] । मेरे बराबर पापी दूसरा कौन है? मैं व्यर्थ ही तुझे कुछ कहता हूँ॥१६२ ॥
सुनि सत्रुघुन मातु कुटिलाई । जरहिं गात रिस कछु न बसाई ॥
तेहि अवसर कुबरी तहँ आई । बसन बिभूषन बिबिध बनाई ॥