श्रीरामचरितमानस — पृष्ठ 481–490
श्रीरामचरितमानस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 481–490
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* ** अयोध्याकाण्ड ४७९ माताकी कुटिलता सुनकर शत्रुघ्नजीके सब अङ्ग क्रोधसे जल रहे हैं, पर कुछ वश नहीं चलता । उसी समय भाँति - भाँतिके कपड़ों और गहनोंसे सजकर कुबरी ( मन्थरा ) वहाँ आयी ॥१ ॥
लखि रिस भरेउ लखन लघु भाई । बरत अनल घृत आहुति पाई ॥
हुमगि लात तकि कूबर मारा । परि मुह भर महि करत पुकारा ॥
उसे [ सजी ] देखकर लक्ष्मणके छोटे भाई शत्रुघ्नजी क्रोधमें भर गये । मानो जलती हुई आगको घीकी आहुति मिल गयी हो । उन्होंने जोरसे तककर कूबड़पर एक लात जमा दी । वह चिल्लाती हुई मुँहके बल जमीनपर गिर पड़ी ॥२ ॥
कूबर टूटेउ फूट कपारू । दलित दसन मुख रुधिर प्रचारू ॥
आह दइअ मैं काह नसावा । करत नीक फलु अनइस पावा ॥
उसका कूबड़ टूट गया, कपाल फूट गया, दाँत टूट गये और मुँहसे खून बहने लगा । [ वह कराहती हुई बोली- ] हाय दैव! मैंने क्या बिगाड़ा? जो भला करते बुरा फल पाया ॥ ३ ॥
सुनि रिपुहन लखि नख सिख खोटी । लगे घसीटन धरि धरि झोंटी ॥
भरत दयानिधि दीन्हि छड़ाई । कौसल्या पहिं गे दोउ भाई ॥
उसकी यह बात सुनकर और उसे नखसे शिखातक दुष्ट जानकर शत्रुघ्नजी झोंटा पकड़-पकड़कर उसे घसीटने लगे । तब दयानिधि भरतजीने उसको छुड़ा दिया और दोनों भाई [ तुरंत ] कौसल्याजीके पास गये ॥४ ॥
दो० – मलिन बसन बिबरन बिकल कृस सरीर दुख भार ।
कनक कलप बर बेलि बन मानहुँ हनी तुसार ॥ १६३ ॥
कौसल्याजी मैले वस्त्र पहने हैं, चेहरेका रंग बदला हुआ है, व्याकुल हो रही हैं, दुःखके बोझसे शरीर सूख गया है । ऐसी दीख रही हैं मानो सोनेकी सुन्दर कल्पलताको वनमें पाला मार गया हो ॥ १६३ ॥
भरतहि देखि मातु उठि धाई । मुरुछित अवनि परी झइँ आई ॥
देखत भरतु बिकल भए भारी ॥ परे चरन तन दसा बिसारी ॥
भरतको देखते ही माता कौसल्याजी उठ दौड़ीं । पर चक्कर आ जानेसे मूर्च्छित होकर पृथ्वीपर गिर पड़ीं । यह देखते ही भरतजी बड़े व्याकुल हो गये और शरीरकी सुध भुलाकर चरणोंमें गिर पड़े ॥१ ॥
मातु तात कहँ देहि देखाई । कहँ सिय रामु लखनु दोउ भाई ॥
कैकड़ कत जनमी जग माझा । जौं जनमि त भइ काहे न बाँझा ॥
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* *४८० रामचरितमानस [फिर बोले- ] माता! पिताजी कहाँ हैं? उन्हें दिखा दे । सीताजी तथा मेरे दोनों भाई श्रीराम-लक्ष्मण कहाँ हैं? [ उन्हें दिखा दे । ] कैकेयी जगत्में क्यों जनमी? और यदि जनमी ही तो फिर बाँझ क्यों न हुई? – ॥२ ॥
कुल कलंकु जेहिं जनमेउ मोही । अपजस भाजन प्रियजन द्रोही ॥
को तिभुवन मोहि सरिस अभागी । गति असि तोरि मातु जेहि लागी ॥
जिसने कुलके कलंक, अपयशके भाँड़े और प्रियजनोंके द्रोही मुझ जैसे पुत्रको उत्पन्न किया । तीनों लोकोंमें मेरे समान अभागा कौन है? जिसके कारण, हे माता! तेरी यह दशा हुई! ॥ ३ ॥
पितु सुरपुर बन रघुबर केतू । मैं केवल सब अनरथ हेतू ॥
धिग मोहि भयउँ बेनु बन आगी । दुसह दाह दुख दूषन भागी ॥
पिताजी स्वर्गमें हैं और श्रीरामजी वनमें हैं । केतुके समान केवल मैं ही इन सब अनर्थोंका कारण हूँ । मुझे धिक्कार है! मैं बाँसके वनमें आग उत्पन्न हुआ और कठिन दाह, दुःख और दोषोंका भागी बना ॥४ ॥
दो० – मातु भरत के बचन मृदु सुनि पुनि उठी सँभारि ।
लिए उठाइ लगाइ उर लोचन मोचति बारि ॥ १६४ ॥
भरतजीके कोमल वचन सुनकर माता कौसल्याजी फिर सँभलकर उठीं । उन्होंने भरतको उठाकर छातीसे लगा लिया और नेत्रोंसे आँसू बहाने लगीं ॥ १६४ ॥
सरल सुभाय मायँ हियँ लाए । अति हित मनहुँ राम फिरि आए ॥
भेंटेउ बहुरि लखन लघु भाई । सोकु सनेहु न हृदयँ समाई ॥
सरल स्वभाववाली माताने बड़े प्रेमसे भरतजीको छातीसे लगा लिया; मानो श्रीरामजी ही लौटकर आ गये हों । फिर लक्ष्मणजीके छोटे भाई शत्रुघ्नको हृदयसे लगाया । शोक और स्नेह हृदयमें समाता नहीं है ॥१ ॥
देखि सुभाउ कहत सबु कोई । राम मातु अस काहे न होई ॥
माताँ भरतु गोद बैठारे । आँसु पोंछि मृदु बचन उचारे ॥
कौसल्याजीका स्वभाव देखकर सब कोई कह रहे हैं - श्रीरामकी माताका ऐसा स्वभाव क्यों न हो । माताने भरतजीको गोदमें बैठा लिया और उनके आँसू पोंछकर कोमल वचन बोलीं- ॥२ ॥
अजहुँ बच्छ बलि धीरज धरहू । कुसमउ समुझि सोक परिहरहू ॥
जनि मानहु हियँ हानि गलानी । काल करम गति अघटित जानी ॥
हे वत्स! मैं बलैया लेती हूँ। तुम अब भी धीरज धरो । बुरा समय जानकर शोक त्याग दो ।
काल और कर्मकी गति अमिट जानकर हृदयमें हानि और ग्लानि मत मानो ॥३ ॥
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* ** अयोध्याकाण्ड ४८१
काहि दोसु देहु जनि ताता । भा मोहि सब बिधि बाम बिधाता ॥
जो तेहुँ दुख मोहिजिआवा । अजहुँ को जानइ का तेहि भावा ॥
हे तात! किसीको दोष मत दो । विधाता मुझको सब प्रकारसे उलटा हो गया है, जो इतने
दुःखपर भी मुझे जिला रहा है । अब भी कौन जानता है, उसे क्या भा रहा है? ॥४ ॥
दो० –- पितु आयस भूषन बसन तात तजे रघुबीर ।
बिसमउ हरषु न हृदयँ कछु पहिरे बलकल चीर ॥ १६५ ॥
हे तात! पिताकी आज्ञासे श्रीरघुवीरने भूषण- वस्त्र त्याग दिये और वल्कल- वस्त्र पहन लिये । उनके हृदयमें न कुछ विषाद था, न हर्ष! ॥ १६५ ॥
मुख प्रसन्न मन रंग न रोषू । सब कर सब बिधि करि परितोषू ॥
चले बिपिन सुनि सिय सँग लागी । रहइ न राम चरन अनुरागी ॥
उनका मुख प्रसन्न था, मनमें न आसक्ति थी, न रोष (द्वेष ) । सबका सब तरहसे सन्तोष कराकर वे वनको चले । यह सुनकर सीता भी उनके साथ लग गयीं । श्रीरामके चरणोंकी अनुरागिणी वे किसी तरह न रहीं ॥ १ ॥
सुनतहिं लखनु चले उठि साथा । रहहिं न जतन किए रघुनाथा ॥
तब रघुपति सबही सिरु नाई । चले संग सिय अरु लघु भाई ॥
सुनते ही लक्ष्मण भी साथ ही उठ चले । श्रीरघुनाथने उन्हें रोकनेके बहुत यत्न किये, पर वे न रहे । तब श्रीरघुनाथजी सबको सिर नवाकर सीता और छोटे भाई लक्ष्मणको साथ लेकर चले गये ॥२ ॥
रामु लखनु सिय बनहि सिधाए । गइउँ न संग न प्रान पठाए ॥
यहु सबु भा इन्ह आँखिन्ह आगें । तउ न तजा तनु जीव अभागें ॥
श्रीराम, लक्ष्मण और सीता वनको चले गये । मैं न तो साथ ही गयी और न मैंने अपने प्राण ही उनके साथ भेजे । यह सब इन्हीं आँखोंके सामने हुआ । तो भी अभागे जीवने शरीर नहीं छोड़ा ॥ ३ ॥
मोहि न लाज निज नेहु निहारी । राम सरिस सुत मैं महतारी ॥
जिऐ मेरै भल भूपति जाना । मोर हृदय सत कुलिस समाना ॥
अपने स्नेहकी ओर देखकर मुझे लाज भी नहीं आती; राम- सरीखे पुत्रकी मैं माता! जीना और
मरना तो राजाने खूब जाना । मेरा हृदय तो सैकड़ों वज्रोंके समान कठोर है ॥४ ॥
दो० – कौसल्या के बचन सुनि भरत सहित रनिवासु ।
ब्याकुल बिलपत राजगृह मानहुँ सोक नेवासुनेवासु ॥१६६॥ १६६ ॥॥
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* *४८२ रामचरितमानस
कौसल्याजीके वचनोंको सुनकर भरतसहित सारा रनिवास व्याकुल होकर विलाप करने लगा ।
राजमहल मानो शोकका निवास बन गया ॥ १६६ ॥
बिलपहिं बिकल भरत दोउ भाई । कौसल्याँ लिए हृदयँ लगाई ॥
भाँति अनेक भरतु समुझाए ॥ कहि बिबेकमय बचन सुनाए । भरत, शत्रुघ्न दोनों भाई विकल होकर विलाप करने लगे । तब कौसल्याजीने उनको हृदयसे लगा लिया । अनेकों प्रकारसे भरतजीको समझाया और बहुत-सी विवेकभरी बातें उन्हें कहकर सुनायीं ॥ १ ॥
भरतहुँ मातु सकल समुझाईं । कहि पुरान श्रुति कथा सुहाई ॥
छल बिहीन सुचि सरल सुबानी । बोले भरत जोरि जुग पानी ॥
भरतजीने भी सब माताओंको पुराण और वेदोंकी सुन्दर कथाएँ कहकर समझाया । दोनों हाथ जोड़कर भरतजी छलरहित, पवित्र और सीधी सुन्दर वाणी बोले- ॥ २ ॥
जे अघ मातु पिता सुत मारें । गाइ गोठ महिसुर पुर जारें ॥
जे अघ तिय बालक बध कीन्हें । मीत महीपति माहुर दीन्हें ॥
जो पाप माता - पिता और पुत्रके मारनेसे होते हैं और जो गोशाला और ब्राह्मणोंके नगर जलानेसे होते हैं; जो पाप स्त्री और बालककी हत्या करनेसे होते हैं और जो मित्र और राजाको जहर देनेसे होते हैं— ॥ ३ ॥
जे पातक उपपातक अहहीं । करम बचन मन भव कबि कहहीं ॥
ते पातक मोहि होहुँ बिधाता । जौं यहु होइ मोर मत माता ॥
कर्म, वचन और मनसे होनेवाले जितने पातक एवं उपपातक ( बड़े - छोटे पाप ) हैं, जिनको कवि लोग कहते हैं; हे विधाता! यदि इस काममें मेरा मत हो, तो हे माता! वे सब पाप मुझे लगें ॥४ ॥
दो० –जे परिहरि हरि हर चरन भजहिं भूतगन घोर ।
तेहि कड़ गति मोहि देउ बिधि जौं जननी मत मोर ॥ १६७ ॥
जो लोग श्रीहरि और श्रीशंकरजीके चरणोंको छोड़कर भयानक भूत -प्रेतोंको भजते हैं, हे माता! यदि इसमें मेरा मत हो तो विधाता मुझे उनकी गति दे ॥ १६७ ॥
बेचहिं बेदु धरमु दुहि लेहीं । पिसुन पराय पाप कहि देहीं ॥
कपटी कुटिल कलहप्रिय क्रोधी । बेद बिदूषक बिस्व बिरोधी ॥
जो लोग वेदोंको बेचते हैं, धर्मको दुह लेते हैं, चुगलखोर हैं, दूसरोंके पापोंको कह देते हैं; जो कपटी, कुटिल, कलहप्रिय और क्रोधी हैं, तथा जो वेदोंकी निन्दा करनेवाले और विश्वभरके विरोधी हैं; ॥ १ ॥
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* ** अयोध्याकाण्ड ४८३
लोभी लंपट लोलुपचारा । जे ताकहिं परधनु परदारा ॥
पावौं मैं तिन्ह कै गति घोरा । जौं जननी यहु संमत मोरा ॥
जो लोभी, लम्पट और लालचियोंका आचरण करनेवाले हैं; जो पराये धन और परायी स्त्रीकी ताकमें रहते हैं; हे जननी! यदि इस काममें मेरी सम्मति हो तो मैं उनकी भयानक गतिको पाऊँ ॥२ ॥
जे नहिं साधुसंग अनुरागे । परमारथ पथ बिमुख अभागे ॥
जे न भजहिं हरि नर तनु पाई । जिन्हहि न हरि हर सुजसु सोहाई ॥
जिनका सत्सङ्गमें प्रेम नहीं है; जो अभागे परमार्थके मार्गसे विमुख हैं; जो मनुष्यशरीर पाकर श्रीहरिका भजन नहीं करते; जिनको हरि-हर ( भगवान् विष्णु और शंकरजी ) का सुयश नहीं सुहाता;॥ ३ ॥
तजि श्रुतिपंथु बाम पथ चलहीं । बंचक बिरचि बेष जगु छलहीं ॥
तिन्ह कै गति मोहि संकर देऊ । जननी जौं यहु जानौं भेऊ ॥
जो वेदमार्गको छोड़कर वाम ( वेदप्रतिकूल ) मार्गपर चलते हैं; जो ठग हैं और वेष बनाकर जगत्को छलते हैं; हे माता! यदि मैं इस भेदको जानता भी होऊँ तो शंकरजी मुझे उन लोगोंकी गति दें ॥४ ॥
दो० - मातु भरत के बचन सुनि साँचे सरल सुभायँ ।
कहति राम प्रिय तात तुम्ह सदा बचन मन कायँ ॥ १६८ ॥
माता कौसल्याजी भरतजीके स्वाभाविक ही सच्चे और सरल वचनोंको सुनकर कहने लगीं— हे तात! तुम तो मन, वचन और शरीरसे सदा ही श्रीरामचन्द्रके प्यारे हो ॥१६८ ॥
राम प्रानहु तें प्रान तुम्हारे । तुम्ह रघुपतिहि प्रानहु तें प्यारे ॥
बिधु बिष चवै स्रवै हिमु आगी । होइ बारिचर बारि बिरागी ॥
श्रीराम तुम्हारे प्राणोंसे भी बढ़कर प्राण ( प्रिय ) हैं और तुम भी श्रीरघुनाथको प्राणोंसे भी अधिक प्यारे हो । चन्द्रमा चाहे विष चुआने लगे और पाला आग बरसाने लगे; जलचर जीव जलसे विरक्त हो जाय, ॥ १ ॥
भएँ ग्यानु बरु मिटै न मोहू । तुम्ह रामहि प्रतिकूल न होहू॥
मत तुम्हार यहु जो जग कहहीं । सो सपनेहुँ सुख सुगति न लहहीं ॥
और ज्ञान हो जानेपर भी चाहे मोह न मिटे; पर तुम श्रीरामचन्द्रके प्रतिकूल कभी नहीं हो सकते । इसमें तुम्हारी सम्मति है, जगत्में जो कोई ऐसा कहते हैं वे स्वप्नमें भी सुख और शुभ गति नहीं पावेंगे ॥२ ॥
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* *४८४ रामचरितमानस
अस कहि मातु भरतु हियँ लाए । थन पय स्त्रवहिं नयन जल छाए ॥
करत बिलाप बहुत एहि भाँती । बैठेहिं बीति गई सब राती ॥
ऐसा कहकर माता कौसल्याने भरतजीको हृदयसे लगा लिया । उनके स्तनोंसे दूध बहने लगा और नेत्रोंमें [ प्रेमाश्रुओंका ] जल छा गया । इस प्रकार बहुत विलाप करते हुए सारी रात बैठे -ही-बैठे बीत गयी ॥ ३ ॥
बामदेउ बसिष्ठ तब आए । सचिव महाजन सकल बोलाए ॥
मुनि बहु भाँति भरत उपदेसे । कहि परमारथ बचन सुदेसे ॥
तब वामदेवजी और वसिष्ठजी आये । उन्होंने सब मन्त्रियों तथा महाजनोंको बुलवाया । फिर मुनि वसिष्ठजीने परमार्थके सुन्दर समयानुकूल वचन कहकर बहुत प्रकारसे भरतजीको उपदेश दिया ॥ ४ ॥
दो० – तात हृदयँ धीरजु धरहु करहु जो अवसर आजु ।
उठे भरत गुर बचन सुनि करन कहेउ सबु साजु ॥ १६ ९ ॥
[वसिष्ठजीने कहा- ] हे तात! हृदयमें धीरज धरो और आज जिस कार्यके करनेका अवसर है, उसे करो । गुरुजीके वचन सुनकर भरतजी उठे और उन्होंने सब तैयारी करनेके लिये कहा ॥ १६ ९ ॥
नृप तनु बेद बिदित अन्हवावा । परम बिचित्र बिमानु बनावा ॥
गहि पद भरत मातु सब राखी । रहीं रानि दरसन अभिलाषी ॥
वेदोंमें बतायी हुई विधिसे राजाकी देहको स्नान कराया गया और परम विचित्र विमान बनाया गया । भरतजीने सब माताओंको चरण पकड़कर रखा ( अर्थात् प्रार्थना करके उनको सती होनेसे रोक लिया ) । वे रानियाँ भी [ श्रीरामके ] दर्शनकी अभिलाषासे रह गयीं ॥१ ॥
चंदन अगर भार बहु आए । अमित अनेक सुगंध सुहाए ॥
सरजु तीर रचि चिता बनाई । जनु सुरपुर सोपान सुहाई ॥
चन्दन और अगरके तथा और भी अनेकों प्रकारके अपार [ कपूर, गुग्गुल, केसर आदि ] -- -, [सुगन्ध द्रव्योंकेद्र बहुत से बोझ आये । सरयूजीके तटपर सुन्दर चिता रचकर बनायी गयी जो ऐसी मालूम होती थी ] मानो स्वर्गकी सुन्दर सीढ़ी हो ॥२ ॥
एहि बिधि दाह क्रिया सब कीन्ही । बिधिवत न्हाइ तिलांजुलि दीन्ही ॥
सोधि सुमृति सब बेद पुराना । कीन्ह भरत दसगात बिधाना ॥
इस प्रकार सब दाहक्रिया की गयी और सबने विधिपूर्वक स्नान करके तिलाञ्जलि दी । फिर वेद, स्मृति और पुराण सबका मत निश्चय करके उसके अनुसार भरतजीने पिताका दशगात्र-विधान( दस दिनोंके कृत्य ) किया ॥ ३ ॥
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* * अयोध्याकाण्ड ४८५
जहँ जस मुनिबर आयसु दीन्हा । तहँ तस सहस भाँति सबु कीन्हा ॥
भए बिसुद्ध दिए सब दाना । धेनु बाजि गज बाहन नाना ॥
मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठजीने जहाँ जैसी आज्ञा दी, वहाँ भरतजीने सब वैसा ही हजारों प्रकारसे किया । शुद्ध हो जानेपर [ विधिपूर्वक ] सब दान दिये । गौएँ तथा घोड़े, हाथी आदि अनेक प्रकारकी सवारियाँ, ॥ ४ ॥
दो० - सिंघासन भूषन बसन अन्न धरनि धन धाम ।
दिए भरत लहि भूमिसुर भे परिपूरन काम॥ १७० ॥
सिंहासन, गहने, कपड़े, अन्न, पृथ्वी, धन और मकान भरतजीने दिये; भूदेव ब्राह्मण दान पाकर परिपूर्णकाम हो गये ( अर्थात् उनकी सारी मनोकामनाएँ अच्छी तरहसे पूरी हो गयीं ) ॥ १७० ॥
पितु हित भरत कीन्हि जसि करनी । सो मुख लाख जाइ नहिं बरनी ॥
सुदिनु सोधि मुनिबर तब आए । सचिव महाजन सकल बोलाए ॥
पिताजीके लिये भरतजीने जैसी करनी की वह लाखों मुखोंसे भी वर्णन नहीं की जा सकती । तब शुभ दिन शोधकर श्रेष्ठ मुनि वसिष्ठजी आये और उन्होंने मन्त्रियों तथा सब महाजनोंको बुलवाया ॥ १ ॥
बैठे राजसभाँ सब जाई । पठए बोलि भरत दोउ भाई ॥
भरतु बसिष्ठ निकट बैठारे । नीति धरममय बचन उचारे ॥
सब लोग राजसभामें जाकर बैठ गये । तब मुनिने भरतजी तथा शत्रुघ्नजी दोनों भाइयोंको बुलवा भेजा । भरतजीको वसिष्ठजीने अपने पास बैठा लिया और नीति तथा धर्मसे भरे हुए वचन कहे ॥२ ॥
प्रथम कथा सब मुनिबर बरनी । कैकइ कुटिल कीन्हि जसि करनी ॥
भूप धरमब्रतु सत्य सराहा । जेहिं तनु परिहरि प्रेमु निबाहा ॥
पहले तो कैकेयीने जैसी कुटिल करनी की थी, श्रेष्ठ मुनिने वह सारी कथा कही । फिर राजाके धर्मव्रत और सत्यकी सराहना की, जिन्होंने शरीर त्यागकर प्रेमको निबाहा ॥३ ॥
कहत राम गुन सील सुभाऊ । सजल नयन पुलकेउ मुनिराऊ ॥
बहुरि लखन सिय प्रीति बखानी । सोक सनेह मगन मुनि ग्यानी ॥
श्रीरामचन्द्रजीके गुण, शील और स्वभावका वर्णन करते- करते तो मुनिराजके नेत्रोंमें जल भर आया और वे शरीरसे पुलकित हो गये । फिर लक्ष्मणजी और सीताजीके प्रेमकी बड़ाई करते हुए ज्ञानी मुनि शोक और स्नेहमें मग्न हो गये ॥ ४ ॥
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* *४८६ रामचरितमानस
दो० –- सुनहु भरत भावी प्रबल बिलखि कहेउ मुनिनाथ ।
हानि लाभु जीवनु मरनु जसु अपजसु बिधि हाथ ॥ १७१ ॥
मुनिनाथने विलखकर ( दुखी होकर ) कहा- हे भरत! सुनो, भावी ( होनहार ) बड़ी बलवान् है । हानि-लाभ, जीवन- मरण और यश- अपयश, ये सब विधाताके हाथ हैं ॥ १७१ ॥
अस बिचारि केहि देइअ दोसू । ब्यरथ काहि पर कीजिअ रोसू॥
तात बिचारु करहु मन माहीं । सोच जोगु दसरथु नृषु नाहीं ॥
ऐसा विचारकर किसे दोष दिया जाय? और व्यर्थ किसपर क्रोध किया जाय? हे तात! मनमें विचार करो । राजा दशरथ सोच करनेके योग्य नहीं हैं ॥ १ ॥
सोचिअ बिप्र जो बेद बिहीना । तजि निज धरमु बिषय लयलीना ॥
सोचिअ नृपति जो नीति न जाना । जेहि न प्रजा प्रिय प्रान समाना ॥
सोच उस ब्राह्मणका करना चाहिये जो वेद नहीं जानता और जो अपना धर्म छोड़कर विषय- भोगमें ही लीन रहता है । उस राजाका सोच करना चाहिये जो नीति नहीं जानता और जिसको प्रजा प्राणोंके समान प्यारी नहीं है ॥ २ ॥
सोचिअ बयसु कृपन धनवानू । जो न अतिथि सिव भगति सुजानू ॥
सोचिअ सूद्रु बिप्र अवमानी । मुखर मानप्रिय ग्यान गुमानी ॥
उस वैश्यका सोच करना चाहिये जो धनवान् होकर भी कंजूस है, और जो अतिथिसत्कार तथा शिवजीकी भक्ति करनेमें कुशल नहीं है । उस शूद्रका सोच करना चाहिये जो ब्राह्मणोंका अपमान करनेवाला, बहुत बोलनेवाला, मान--बड़ाई चाहनेवाला और ज्ञानका घमंड रखनेवाला है ॥३ ॥
सोचिअ पुनि पति बंचक नारी । कुटिल कलहप्रिय इच्छाचारी ॥
सोचिअ बटु निज ब्रतु परिहरई । जो नहिं गुर आयसु अनुसरई ॥
पुनः उस स्त्रीका सोच करना चाहिये जो पतिको छलनेवाली, कुटिल, कलहप्रिय और स्वेच्छाचारिणी है । उस ब्रह्मचारीका सोच करना चाहिये जो अपने ब्रह्मचर्य- व्रतको छोड़ देता है और गुरुकी आज्ञाके अनुसार नहीं चलता ॥ ४ ॥
दो० –- सोचिअ गृही जो मोह बस करइ करम पथ त्याग ।
सोचिअ जती प्रपंच रत बिगत बिबेक बिराग ॥ १७२ ॥
उस गृहस्थका सोच करना चाहिये जो मोहवश कर्ममार्गका त्याग कर देता है; उस संन्यासीका सोच करना चाहिये जो दुनियाके प्रपञ्चमें फँसा हुआ है और ज्ञान-वैराग्यसे हीन है ॥ १७२ ॥
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* ** अयोध्याकाण्ड ४८७
बैखानस सोइ सोचै जोगू । तपु बिहाइ जेहि भावइ भोगू॥
सोचिअ पिसुन अकारन क्रोधी । जननि जनक गुर बंधु बिरोधी ॥
वानप्रस्थ वही सोच करनेयोग्य है जिसको तपस्या छोड़कर भोग अच्छे लगते हैं । सोच उसका करना चाहिये जो चुगलखोर है, बिना ही कारण क्रोध करनेवाला है तथा माता, पिता, गुरु एवं भाई-बन्धुओंके साथ विरोध रखनेवाला है ॥१ ॥
सब बिधि सोचिअ पर अपकारी । निज तनु पोषक निरदय भारी ।
सोचनीय सबहीं बिधि सोई । जो न छाड़ि छलु हरि जन होई ॥
सब प्रकारसे उसका सोच करना चाहिये जो दूसरोंका अनिष्ट करता है, अपने ही शरीरका पोषण करता है और बड़ा भारी निर्दयी है । और वह तो सभी प्रकारसे सोच करनेयोग्य है जो छल छोड़कर हरिका भक्त नहीं होता ॥२ ॥
सोचनीय नहिं कोसलराऊ । भुवन चारिदस प्रगट प्रभाऊ ॥
भयउ न अहइ न अब होनिहारा । भूप भरत जस पिता तुम्हारा ॥
कोसलराज दशरथजी सोच करनेयोग्य नहीं हैं, जिनका प्रभाव चौदहों लोकोंमें प्रकट है ।
हे भरत! तुम्हारे पिता-जैसा राजा तो न हुआ, न है और न अब होनेका ही है ॥३ ॥
बिधि हरि हरु सुरपति दिसिनाथा । बरनहिं सब दसरथ गुन गाथा ॥
ब्रह्मा, विष्णु, शिव, इन्द्र और दिक्पाल सभी दशरथजीके गुणोंकी कथाएँ कहा करते हैं ॥४ ॥
दो० — कहहु तात केहि भाँति कोउ करिहि बड़ाई तासु ।
राम लखन तुम्ह सत्रुहन सरिस सुअन सुचि जासु ॥ १७३ ॥
हे तात! कहो, उनकी बड़ाई कोई किस प्रकार करेगा जिनके श्रीराम, लक्ष्मण, तुम और शत्रुघ्न-सरीखे पवित्र पुत्र हैं? ॥ १७३ ॥
सब प्रकार भूपति बड़भागी । बादि बिषादु करिअ तेहि लागी ॥
यह सुनि समुझि सोचु परिहरहू । सिर धरि राज रजायसु करहू ॥
राजा सब प्रकारसे बड़भागी थे । उनके लिये विषाद करना व्यर्थ है । यह सुन और समझकर सोच त्याग दो और राजाकी आज्ञा सिर चढ़ाकर तदनुसार करो ॥ १ ॥
रायँ राजपदु तुम्ह कहुँ दीन्हा । पिता बचनु फुर चाहि कीन्हा ॥
तजे रामु जेहिं बचनहि लागी । तनु परिहरेउ राम बिरहागी ॥
राजाने राजपद तुमको दिया है । पिताका वचन तुम्हें सत्य करना चाहिये, जिन्होंने वचनके लिये ही श्रीरामचन्द्रजीको त्याग दिया और रामविरहकी अग्निमें अपने शरीरकी आहुति दे दी ॥ २ ॥
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* *४८८ रामचरितमानस
नृपहि बचन प्रिय नहिं प्रिय प्राना । करहु तात पितु बचन प्रवाना ॥
करहु सीस धरि भूप रजाई । हइ तुम्ह कहँ सब भाँति भलाई ॥
राजाको वचन प्रिय थे, प्राण प्रिय नहीं थे । इसलिये हे तात! पिताके वचनोंको प्रमाण ( सत्य ) करो! राजाकी आज्ञा सिर चढ़ाकर पालन करो, इसमें तुम्हारी सब तरह भलाई है ॥३ ॥
परसुराम पितु अग्या राखी । मारी मातु लोक सब साखी ॥
तनय जजातिहि जौबनु दयऊ । पितु अग्याँ अघ अजसु न भयऊ ॥
परशुरामजीने पिताकी आज्ञा रखी और माताको मार डाला; सब लोक इस बातके साक्षी हैं । राजा ययातिके पुत्रने पिताको अपनी जवानी दे दी । पिताकी आज्ञा पालन करनेसे उन्हें पाप और अपयश नहीं हुआ ॥ ४ ॥
दो० - अनुचित उचित बिचारु तजि जे पालहिं पितु बैन ।
ते भाजन सुख सुजस के बसहिं अमरपति ऐन ॥ १७४ ॥
जो अनुचित और उचितका विचार छोड़कर पिताके वचनोंका पालन करते हैं, वे [ यहाँ ] सुख और सुयशके पात्र होकर अन्तमें इन्द्रपुरी ( स्वर्ग ) में निवास करते हैं ॥१७४ ॥
अवसि नरेस बचन फुर करहू । पालहु प्रजा सोकु परिहरहू ॥
सुरपुर नृपु पाइहि परितोषू । तुम्ह कहुँ सुकृतु सुजसु नहिं दोषू ॥
राजाका वचन अवश्य सत्य करो । शोक त्याग दो और प्रजाका पालन करो । ऐसा करनेसे स्वर्गमें राजा सन्तोष पावेंगे और तुमको पुण्य और सुन्दर यश मिलेगा, दोष नहीं लगेगा ॥ १ ॥
बेद बिदित संमत सबही का । जेहि पितु देइ सो पावइ टीका ॥
मानहु मोर बचन हित जानी ॥करहु राजु परिहरहु गलानी । यह वेदमें प्रसिद्ध है और [ स्मृति-पुराणादि ] सभी शास्त्रोंके द्वारा सम्मत है कि पिता जिसको दे वही राजतिलक पाता है । इसलिये तुम राज्य करो, ग्लानिका त्याग कर दो । मेरे वचनको हित समझकर मानो ॥ २ ॥
सुनि सुखु लहब राम बैदेहीं । अनुचित कहब न पंडित केहीं ॥
कौसल्यादि सकल महतारीं । तेउ प्रजा सुख होहिं सुखारीं ॥
इस बातको सुनकर श्रीरामचन्द्रजी और जानकीजी सुख पावेंगे और कोई पण्डित इसे अनुचित नहीं कहेगा । कौसल्याजी आदि तुम्हारी सब माताएँ भी प्रजाके सुखसे सुखी होंगी ॥३ ॥
परम तुम्हार राम कर जानिहि । सो सब बिधि तुम्ह सन भल मानिहि ॥
सौंपेहु राजु राम के आएँ । सेवा करेहु सनेह सुहाएँ ॥