श्रीरामचरितमानस — पृष्ठ 491–500
श्रीरामचरितमानस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 491–500
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* ** अयोध्याकाण्ड ४८९ जो तुम्हारे और श्रीरामचन्द्रजीके श्रेष्ठ सम्बन्धको जान लेगा, वह सभी प्रकारसे तुमसे भला मानेगा । श्रीरामचन्द्रजीके लौट आनेपर राज्य उन्हें सौंप देना और सुन्दर स्नेहसे उनकी सेवा करना ॥४ ॥
दो० - कीजिअ गुर आयसु अवसि कहहिं सचिव कर जोरि ।
रघुपति आएँ उचित जस तस तब करब बहोरि ॥ १७५ ॥
मन्त्री हाथ जोड़कर कह रहे हैं - गुरुजीकी आज्ञाका अवश्य ही पालन कीजिये । श्रीरघुनाथजीके लौट आनेपर जैसा उचित हो, तब फिर वैसा ही कीजियेगा ॥ १७५ ॥
कौसल्या धरि धीरजु कहई । पूत पथ्य गुर आयसु अहई ॥
सो आदरिअ करिअ हित मानी । तजिअ बिषादु काल गति जानी ॥
कौसल्याजी भी धीरज धरकर कह रही हैं - हे पुत्र! गुरुजीकी आज्ञा पथ्यरूप है । उसका आदर करना चाहिये और हित मानकर उसका पालन करना चाहिये । कालकी गतिको जानकर विषादका त्याग कर देना चाहिये ॥ १ ॥
बन रघुपति सुरपुर नरनाहू । तुम्ह एहि भाँति तात कदराहू॥
परिजन प्रजा सचिव सब अंबा । तुम्हही सुत सब कहँ अवलंबा ॥
श्रीरघुनाथजी वनमें हैं, महाराज स्वर्गका राज्य करने चले गये । और हे तात! तुम इस प्रकार कातर हो रहे हो । हे पुत्र! कुटुम्ब, प्रजा, मन्त्री और सब माताओंके - सबके एक तुम ही सहारे हो ॥ २ ॥
लखि बिधि बाम कालु कठिनाई । धीरजु धरहु मातु बलि जाई ॥
सिर धरि गुर आयसु अनुसरहू । प्रजा पालि परिजन दुखु हरहू ॥
विधाताको प्रतिकूल और कालको कठोर देखकर धीरज धरो, माता तुम्हारी बलिहारी जाती है । गुरुकी आज्ञाको सिर चढ़ाकर उसीके अनुसार कार्य करो और प्रजाका पालन कर कुटुम्बियोंका दुःख हरो ॥३ ॥
गुर के बचन सचिव अभिनंदनु । सुने भरत हिय हित जनु चंदनु ॥
सुनी बहोरि मातु मृदु बानी । सील सनेह सरल रस सानी ॥
भरतजीने गुरुके वचनों और मन्त्रियोंके अभिनन्दन ( अनुमोदन ) को सुना, जो उनके हृदयके लिये मानो चन्दनके समान [ शीतल] थे । फिर उन्होंने शील, स्नेह और सरलताके रसमें सनी हुई माता कौसल्याकी कोमल वाणी सुनी ॥ ४ ॥
छं० – सानी सरल रस मातु बानी सुनि भरतु ब्याकुल भए ।
लोचन सरोरुह स्त्रवत सींचत बिरह उर अंकुर नए ॥
सो दसा देखत समय तेहि बिसरी सबहि सुधि देह की ।
तुलसी सराहत सकल सादर सीवँ सहज सनेह की ॥
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* *४ ९ ० रामचरितमानस सरलताके रसमें सनी हुई माताकी वाणी सुनकर भरतजी व्याकुल हो गये । उनके नेत्र- कमल जल ( आँसू) बहाकर हृदयके विरहरूपी नवीन अंकुरको सींचने लगे । ( नेत्रोंके आँसुओंने उनके वियोग-दुःखको बहुत ही बढ़ाकर उन्हें अत्यन्त व्याकुल कर दिया । ) उनकी वह दशा देखकर उस समय सबको अपने शरीरकी सुध भूल गयी । तुलसीदासजी कहते हैं - स्वाभाविक प्रेमकी सीमा श्रीभरतजीकी सब लोग आदरपूर्वक सराहना करने लगे ।
सो० – भरतु कमल कर जोरि धीर धुरंधर धीर धरि ।
बचन अमिअँ जनु बोरि देत उचित उत्तर सबहि ॥ १७६ ॥
धैर्यकी धुरीको धारण करनेवाले भरतजी धीरज धरकर, कमलके समान हाथोंको जोड़कर, वचनोंको मानो अमृतमें डुबाकर सबको उचित उत्तर देने लगे- ॥ १७६ ॥
मासपारायण, अठारहवाँ विश्राम
मोहि उपदेसु दीन्ह गुर नीका । प्रजा सचिव संमत सबही का ॥
मातु उचित धरि आयसु दीन्हा । अवसि सीस धरि चाहउँ कीन्हा ॥
गुरुजीने मुझे सुन्दर उपदेश दिया । [फिर] प्रजा, मन्त्री आदि सभीको यही सम्मत है । माताने भी उचित समझकर ही आज्ञा दी है और मैं भी अवश्य उसको सिर चढ़ाकर वैसा ही करना चाहता हूँ॥१ ॥
गुरपितु मातु स्वामि हित बानी । सुनि मन मुदित करिअ भलि जानी ॥
उचित कि अनुचित किएँ बिचारू । धरमु जाइ सिर पातक भारू ॥
[ क्योंकि] गुरु, पिता, माता, स्वामी और सुहृद् ( मित्र ) की वाणी सुनकर प्रसन्न मनसे उसे अच्छी समझकर करना ( मानना ) चाहिये । उचित- अनुचितका विचार करनेसे धर्म जाता है और सिरपर पापका भार चढ़ता है ॥२ ॥
तुम्ह तौ देहु सरल सिख सोई । जो आचरत मोर भल होई ॥
जद्यपि यह समुझत हउँ नीकें । तदपि होत परितोषु न जी कें ॥
आप तो मुझे वही सरल शिक्षा दे रहे हैं, जिसके आचरण करनेमें मेरा भला हो । यद्यपि मैं इस बातको भलीभाँति समझता हूँ, तथापि मेरे हृदयको सन्तोष नहीं होता॥३ ॥
अब तुम्ह बिनय मोरि सुनि लेहू । मोहि अनुहरत सिखावनु देहू ॥
ऊतरु देउँ छमब अपराधू । दुखित दोष गुन गनहिं न साधू॥
अब आपलोग मेरी विनती सुन लीजिये और मेरी योग्यताके अनुसार मुझे शिक्षा दीजिये । मैं उत्तर दे रहा हूँ, यह अपराध क्षमा कीजिये । साधु पुरुष दुखी मनुष्यके दोष-गुणोंको नहीं गिनते ॥ ४ ॥
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* ** अयोध्याकाण्ड ४९ १
दो० – -पितु सुरपुर सिय रामु बन करन कहहु मोहि राजु ।
एहि तें जानहु मोर हित के आपन बड़ काजु ॥ १७७ ॥
पिताजी स्वर्गमें हैं, श्रीसीतारामजी वनमें हैं और मुझे आप राज्य करनेके लिये कह रहे हैं । इसमें आप मेरा कल्याण समझते हैं या अपना कोई बड़ा काम [ होनेकी आशा रखते हैं ]? ॥ १७७ ॥
हित हमार सियपति सेवकाईं । सो हरि लीन्ह मातु कुटिलाईं ॥
मैं अनुमानि दीख मन माहीं । आन उपायँ मोर हित नाहीं ॥
मेरा कल्याण तो सीतापति श्रीरामजीकी चाकरीमें है, सो उसे माताकी कुटिलताने छीन लिया । मैंने अपने मनमें अनुमान करके देख लिया है कि दूसरे किसी उपायसे मेरा कल्याण नहीं है ॥१ ॥
सोक समाजु राजु केहि लेखें । लखन राम सिय बिनु पद देखें ॥
बादि बसन बिनु भूषन भारू । बादि बिरति बिनु ब्रह्मबिचारू ॥
यह शोकका समुदाय राज्य लक्ष्मण, श्रीरामचन्द्रजी और सीताजीके चरणोंको देखे बिना किस गिनतीमें है ( इसका क्या मूल्य है )? जैसे कपड़ोंके बिना गहनोंका बोझ व्यर्थ है । वैराग्यके बिना ब्रह्मविचार व्यर्थ है ॥२ ॥
सरुज सरीर बादि बहु भोगा । बिनु हरिभगति जायँ जप जोगा ॥
जायँ जीव बिनु देह सुहाई । बादि मोर सबु बिनु रघुराई ॥
रोगी शरीरके लिये नाना प्रकारके भोग व्यर्थ हैं । श्रीहरिकी भक्तिके बिना जप और योग व्यर्थ हैं । जीवके बिना सुन्दर देह व्यर्थ है । वैसे ही श्रीरघुनाथजीके बिना मेरा सब कुछ व्यर्थ है ॥३ ॥
जाउँ राम पहिं आयसु देहू । एकहिं आँक मोर हित एहू॥
मोहि नृप करि भल आपन चहहू । सोउ सनेह जड़ता बस कहहू ॥
मुझे आज्ञा दीजिये, मैं श्रीरामजीके पास जाऊँ! एक ही आँक (निश्चयपूर्वक ) मेरा हित इसीमें है । और मुझे राजा बनाकर आप अपना भला चाहते हैं, यह भी आप स्नेहकी जड़ता ( मोह ) के वश होकर ही कह रहे हैं ॥ ४ ॥
दो० -– कैकेई सुअ कुटिलमति राम बिमुख गतलाज ।
तुम्ह चाहत सुखु मोहबस मोहि से अधम कें राज ॥ १७८ ॥
कैकेयीके पुत्र, कुटिलबुद्धि, रामविमुख और निर्लज्ज मुझ से अधमके राज्यसे आप मोहके वश होकर ही सुख चाहते हैं ॥१७८ ॥
कहउँ साँचु सब सुनि पतिआहू । चाहिअ धरमसील नरनाहू ॥
मोहि राजु हठि देइहहु जबहीं । रसा रसातल जाइहि तबहीं ॥
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* *४ ९२ रामचरितमानस मैं सत्य कहता हूँ, आप सब सुनकर विश्वास करें, धर्मशीलको ही राजा होना चाहिये । आप मुझे हठ करके ज्यों ही राज्य देंगे त्यों ही पृथ्वी पातालमें धँस जायगी ॥१ ॥
मोहि समान को पापनिवासू । जेहि लगि सीय राम बनबासू॥
रायँ राम कहुँ काननु दीन्हा । बिछुरत गमनु अमरपुर कीन्हा ॥
मेरे समान पापोंका घर कौन होगा, जिसके कारण सीताजी और श्रीरामजीका वनवास हुआ? राजाने श्रीरामजीको वन दिया और उनके बिछुड़ते ही स्वयं स्वर्गको गमन किया ॥२ ॥
मैं सठु सब अनरथ कर हेतू । बैठ बात सब सुनउँ सचेतू॥
बिनु रघुबीर बिलोकि अबासू । रहे प्रान सहि जग उपहासू॥
और मैं दुष्ट, जो सारे अनर्थोंका कारण हूँ, होश-हवासमें बैठा सब बातें सुन रहा हूँ! श्रीरघुनाथजीसे रहित घरको देखकर और जगत्का उपहास सहकर भी ये प्राण बने हुए हैं ॥३ ॥
राम पुनीत बिषय रस रूखे । लोलुप भूमि भोग के भूखे ॥
कहँ लगि कहौं हृदय कठिनाई । निदरि कुलिस जेहिं लही बड़ाई ॥
[ इसका यही कारण है कि ये प्राण] श्रीरामरूपी पवित्र विषय-रसमें आसक्त नहीं हैं । ये लालची भूमि और भोगोंके ही भूखे हैं । मैं अपने हृदयकी कठोरता कहाँतक कहूँ? जिसने वज्रका भी तिरस्कार करके बड़ाई पायी है ॥ ४ ॥
दो० - कारन तें कारजु कठिन होइ दोसु नहिं मोर ॥
कुलिस अस्थि तें उपल तें लोह कराल कठोर ॥ १७ ९ ॥
कारणसे कार्य कठिन होता ही है, इसमें मेरा दोष नहीं । हड्डीसे वज्र और पत्थरसे लोहा भयानक और कठोर होता है ॥ १७९ ॥
कैकेई भव तनु अनुरागे । पावर प्रान अघाइ अभागे ॥
जौं प्रिय बिरहँ प्रान प्रिय लागे । देखब सुनब बहुत अब आगे ॥
कैकेयीसे उत्पन्न देहमें प्रेम करनेवाले ये पामर प्राण भरपेट ( पूरी तरहसे ) अभागे हैं । जब प्रियके वियोगमें भी मुझे प्राण प्रिय लग रहे हैं तब अभी आगे मैं और भी बहुत कुछ देखूँ- सुनूँगा ॥१ ॥
लखन राम सिय कहुँ बनु दीन्हा । पठइ अमरपुर पति हित कीन्हा ॥
लीन्ह बिधवपन अपजसु आपू । दीन्हेउ प्रजहि सोकु संतापू॥
लक्ष्मण, श्रीरामजी और सीताजीको तो वन दिया; स्वर्ग भेजकर पतिका कल्याण किया; स्वयं विधवापन और अपयश लिया; प्रजाको शोक और सन्ताप दिया;॥ २ ॥
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* * अयोध्याकाण्ड ४ ९३
मोहि दीन्ह सुखु सुजसु सुराजू । कीन्ह कैकईं सब कर काजू॥
एहि तें मोर काह अब नीका । तेहि पर देन कहहु तुम्ह टीका ॥
और मुझे सुख, सुन्दर यश और उत्तम राज्य दिया! कैकेयीने सभीका काम बना दिया! इससे अच्छा अब मेरे लिये और क्या होगा? उसपर भी आप लोग मुझे राजतिलक देनेको कहते हैं! ॥३ ॥
कैकड़ जठर जनमि जग माहीं । यह मोहि कहँ कछु अनुचित नाहीं ॥
मोरि बात सब बिधिहिं बनाई । प्रजा पाँच कत करहु सहाई ॥
कैकेयीके पेटसे जगत्में जन्म लेकर यह मेरे लिये कुछ भी अनुचित नहीं है । मेरी सब बात तो विधाताने ही बना दी है । [फिर] उसमें प्रजा और पंच ( आप लोग ) क्यों सहायता कर रहे हैं? ॥४ ॥
दो० – ग्रह ग्रहीत पुनि बात बस तेहि पुनि बीछी मार ।
तेहि पिआइअ बारुनी कहहु काह उपचार ॥ १८० ॥
जिसे कुग्रह लगे हों [ अथवा जो पिशाचग्रस्त हो ], फिर जो वायुरोगसे पीड़ित हो और उसीको फिर बिच्छू डंक मार दे, उसको यदि मदिरा पिलायी जाय, तो कहिये यह कैसा इलाज है!॥ १८० ॥
कैकइ सुअन जोगु जग जोई । चतुर बिरंचि दीन्ह मोहि सोई॥
दसरथ तनय राम लघु भाई । दीन्हि मोहि बिधि बादि बड़ाई ॥
कैकेयीके लड़केके लिये संसारमें जो कुछ योग्य था, चतुर विधाताने मुझे वही दिया । पर ' दशरथजीका पुत्र ' और ' रामका छोटा भाई ' होनेकी बड़ाई मुझे विधाताने व्यर्थ ही दी ॥ १ ॥
तुम्ह सब कहहु कढ़ावन टीका । राय रजायसु सब कहँ नीका ॥
उतरु देउँ केहि बिधि केहि केही । कहहु सुखेन जथा रुचि जेही ॥
आप सब लोग भी मुझे टीका कढ़ानेके लिये कह रहे हैं! राजाकी आज्ञा सभीके लिये अच्छी है । मैं किस- किसको किस-किस प्रकारसे उत्तर दूँ? जिसकी जैसी रुचि हो, आपलोग सुखपूर्वक वही कहें ॥२ ॥
मोहि कुमातु समेत बिहाई । कहहु कहिहि के कीन्ह भलाई ॥
मो बिनु को सचराचर माहीं । जेहि सिय रामु प्रानप्रिय नाहीं ॥
मेरी कुमाता कैकेयीसमेत मुझे छोड़कर, कहिये, और कौन कहेगा कि यह काम अच्छा किया गया जड़ - चेतन जगत्में मेरे सिवा और कौन है जिसको श्रीसीतारामजी प्राणोंके समान प्यारे न हों ॥ ३ ॥
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४ ९४ * रामचरितमानस:*
परम हानि सब कहँ बड़ लाहू । अदिनु मोर नहिं दूषन काहू॥
संसय सील प्रेम बस अहहू । सबुइ उचित सब जो कछु कहहू ॥
जो परम हानि है, उसीमें सबको बड़ा लाभ दीख रहा है । मेरा बुरा दिन है किसीका दोष नहीं । आप सब जो कुछ कहते हैं सो सब उचित ही है । क्योंकि आप लोग संशय, शील और प्रेमके वश हैं ॥४ ॥
दो० - राम मातु सुठि सरलचित मो पर प्रेमु बिसेषि ।
कहइ सुभाय सनेह बस मोरि दीनता देखि ॥ १८ ९ ॥
श्रीरामचन्द्रजीकी माता बहुत ही सरलहृदय हैं और मुझपर उनका विशेष प्रेम है । इसलिये मेरी दीनता देखकर वे स्वाभाविक स्नेहवश ही ऐसा कह रही हैं ॥ १८१ ॥
गुर बिबेक सागर जगु जाना । जिन्हहि बिस्व कर बदर समाना ॥
मो कहँ तिलक साज सज सोऊ । भएँ बिधि बिमुख बिमुख सबु कोऊ ॥
गुरुजी ज्ञानके समुद्र हैं, इस बातको सारा जगत् जानता है, जिनके लिये विश्व हथेलीपर रखे हुए बेरके समान है, वे भी मेरे लिये राजतिलकका साज सज रहे हैं । सत्य है, विधाताके विपरीत होनेपर सब कोई विपरीत हो जाते हैं ॥ १ ॥
परिहरि रामु सीय जग माहीं । कोउ न कहिहि मोर मत नाहीं ॥
सो मैं सुनब सहब सुख मानी । अंतहुँ कीच तहाँ जहँ पानी ॥
श्रीरामचन्द्रजी और सीताजीको छोड़कर जगत्में कोई यह नहीं कहेगा कि इस अनर्थमें मेरी सम्मति नहीं है । मैं उसे सुखपूर्वक सुनूँगा और सहूँगा । क्योंकि जहाँ पानी होता है, वहाँ अन्तमें कीचड़ होता ही है ॥२ ॥
डरु न मोहि जग कहिहि कि पोचू । परलोकहु कर नाहिन सोचू॥
एकइ उर बस दुसह दवारी । मोहि लगि भे सिय रामु दुखारी ॥
मुझे इसका डर नहीं है कि जगत् मुझे बुरा कहेगा और न मुझे परलोकका ही सोच है । मेरे हृदयमें तो बस, एक ही दुःसह दावानल धधक रहा है कि मेरे कारण श्रीसीतारामजी दुखी हुए ॥३ ॥
जीवन लाहु लखन भल पावा । सबु तजि राम चरन मनु लावा ॥
मोर जनम रघुबर बन लागी । झूठ काह पछिताउँ अभागी ॥
जीवनका उत्तम लाभ तो लक्ष्मणने पाया, जिन्होंने सब कुछ तजकर श्रीरामजीके चरणोंमें मन लगाया । मेरा जन्म तो श्रीरामजीके वनवासके लिये ही हुआ था । मैं अभागा झूठ- मूठ क्या पछताता हूँ? ॥४ ॥
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* * अयोध्याकाण्ड ४ ९५
दो० – आपनि दारुन दीनता कहउँ सबहि सिरु नाइ ।
देखें बिनु रघुनाथ पद जिय कै जरनि न जाइ ॥ १८२ ॥
सबको सिर झुकाकर मैं अपनी दारुण दीनता कहता हूँ । श्रीरघुनाथजीके चरणोंके दर्शन किये बिना मेरे जीकी जलन न जायगी ॥ १८२ ॥
आन उपाउ मोहि नहिं सूझा । को जिय कै रघुबर बिनु बूझा ॥
एकहिं आँक इहइ मन माहीं । प्रातकाल चलिहउँ प्रभु पाहीं ॥
मुझे दूसरा कोई उपाय नहीं सूझता । श्रीरामजीके बिना मेरे हृदयकी बात कौन जान सकता है? मनमें एक ही आँक ( निश्चयपूर्वक ) यही है कि प्रातःकाल प्रभु श्रीरामजीके पास चल दूँगा ॥१ ॥
जद्यपि मैं अनभल अपराधी । भै मोहि कारन सकल उपाधी ॥
तदपि सरन सनमुख मोहि देखी । छमि सब करिहहिं कृपा बिसेषी ॥
यद्यपि मैं बुरा हूँ और अपराधी हूँ, और मेरे ही कारण यह सब उपद्रव हुआ है, तथापि श्रीरामजी मुझे शरणमें सम्मुख आया हुआ देखकर सब अपराध क्षमा करके मुझपर विशेष कृपा करेंगे ॥२ ॥
सील सकुच सुठि सरल सुभाऊ । कृपा सनेह सदन रघुराऊ ॥
अरिहुक अनभल कीन्ह न रामा । मैं सिसु सेवक जद्यपि बामा ॥
श्रीरघुनाथजी शील, संकोच, अत्यन्त सरल स्वभाव, कृपा और स्नेहके घर हैं । श्रीरामजीने कभी शत्रुका भी अनिष्ट नहीं किया । मैं यद्यपि टेढ़ा हूँ पर हूँ तो उनका बच्चा और गुलाम ही ॥ ३ ॥
तुम्ह पै पाँच मोर भल मानी । आयसु आसिष देहु सुबानी ॥
जेहिं सुनि बिनय मोहि जनु जानी । आवहिं बहुरि रामु रजधानी ॥
आप पंच ( सब ) लोग भी इसीमें मेरा कल्याण मानकर सुन्दर वाणीसे आज्ञा और आशीर्वाद दीजिये, जिसमें मेरी विनती सुनकर और मुझे अपना दास जानकर श्रीरामचन्द्रजी राजधानीको लौट आवें ॥ ४ ॥
दो० –जद्यपि जनमु कुमातु तें मैं सठु सदा सदोस ।
आपन जानि न त्यागिहहिं मोहि रघुबीर भरोस ॥ १८३ ॥
यद्यपि मेरा जन्म कुमातासे हुआ है और मैं दुष्ट तथा सदा दोषयुक्त भी हूँ, तो भी मुझे श्रीरामजीका भरोसा है कि वे मुझे अपना जानकर त्यागेंगे नहीं ॥ १८३ ॥
भरत बचन सब कहँ प्रिय लागे । राम सनेह सुधाँ जनु पागे ॥
लोग बियोग बिषम बिष दागे । मंत्र सबीज सुनत जनु जागे ॥
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* *४ ९६ रामचरितमानस भरतजीके वचन सबको प्यारे लगे । मानो वे श्रीरामजीके प्रेमरूपी अमृतमें पगे हुए थे । श्रीरामवियोगरूपी भीषण विषसे सब लोग जले हुए थे । वे मानो बीजसहित मन्त्रको सुनते ही जाग उठे ॥१ ॥
मातु सचिव गुर पुर नर नारी । सकल सनेहँ बिकल भए भारी ॥
भरतहि कहहिं सराहि सराही । राम प्रेम मूरति तनु आही ॥
माता, मन्त्री, गुरु, नगरके स्त्री- पुरुष सभी स्नेहके कारण बहुत ही व्याकुल हो गये । सब भरतजीको सराह -सराहकर कहते हैं कि आपका शरीर श्रीरामप्रेमकी साक्षात् मूर्ति ही है ॥२ ॥
तात भरत अस काहे न कहहू । प्रान समान राम प्रिय अहहू ॥
जो पावरु अपनी जड़ताईं । तुम्हहि सुगाइ मातु कुटिलाई ॥
हे तात भरत! आप ऐसा क्यों न कहें । श्रीरामजीको आप प्राणोंके समान प्यारे हैं । जो नीच अपनी मूर्खतासे आपकी माता कैकेयीकी कुटिलताको लेकर आपपर सन्देह करेगा, ॥३ ॥
सो सठु कोटिक पुरुष समेता । बसिहि कलप सत नरक निकेता ॥
अहि अघ अवगुन नहिं मनि गहई । हरइ गरल दुख दारिद दहई ॥
वह दुष्ट करोड़ों पुरखोंसहित सौ कल्पोंतक नरकके घरमें निवास करेगा । साँपके पाप और अवगुणको मणि नहीं ग्रहण करती । बल्कि वह विषको हर लेती है और दुःख तथा दरिद्रताको भस्म कर देती है ॥४ ॥
दो० – अवसि चलिअ बन रामु जहँ भरत मंत्र भल कीन्ह ।
सोक सिंधु बूड़त सबहि तुम्ह अवलंबनु दीन्ह ॥ १८४ ॥
हे भरतजी! वनको अवश्य चलिये, जहाँ श्रीरामजी हैं; आपने बहुत अच्छी सलाह विचारी ।
शोकसमुद्रमें डूबते हुए सब लोगोंको आपने [ बड़ा ] सहारा दे दिया ॥ १८४ ॥
भा सब के मन मोदु न थोरा । जनु घन धुनि सुनि चातक मोरा ॥
चलत प्रात लखि निरनउ नीके । भरतु प्रानप्रिय भे सबही के ॥
सबके मनमें कम आनन्द नहीं हुआ ( अर्थात् बहुत ही आनन्द हुआ)! मानो मेघोंकी गर्जना सुनकर चातक और मोर आनन्दित हो रहे हों । [ दूसरे दिन] प्रात: काल चलनेका सुन्दर निर्णय देखकर भरतजी सभीको प्राणप्रिय हो गये ॥१ ॥
मुनिहि बंदि भरतहि सिरु नाई । चले सकल घर बिदा कराई ॥
धन्य भरत जीवनु जग माहीं ॥ सीलु सनेहु सराहत जाहीं ॥
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* अयोध्याकाण्ड ** ४ ९७ मुनि वसिष्ठजीकी वन्दना करके और भरतजीको सिर नवाकर, सब लोग विदा लेकर अपने- अपने घरको चले । जगत्में भरतजीका जीवन धन्य है, इस प्रकार कहते हुए वे उनके शील और स्नेहकी सराहना करते जाते हैं ॥ २ ॥
कहहिं परसपर भा बड़ काजू । सकल चलै कर साजहिं साजू॥
जेहि राखहिं रहु घर रखवारी । सो जानइ जनु गरदनि मारी ॥
आपसमें कहते हैं, बड़ा काम हुआ । सभी चलनेकी तैयारी करने लगे । जिसको भी घरकी रखवालीके लिये रहो, ऐसा कहकर रखते हैं, वही समझता है मानो मेरी गर्दन मारी गयी ॥३ ॥
कोउ कह रहन कहिअ नहिं काहू । को न चहइ जग जीवन लाहू ॥
कोई- कोई कहते हैं — रहनेके लिये किसीको भी मत कहो, जगत्में जीवनका लाभ कौन नहीं चाहता? ॥४ ॥
दो० - जरउ सो संपति सदन सुखु सुहृद मातु पितु भाइ ।
सनमुख होत जो राम पद करै न सहस सहाइ ॥। १८५ ॥
वह सम्पत्ति, घर, सुख, मित्र, माता, पिता, भाई जल जाय जो श्रीरामजीके चरणोंके सम्मुख होनेमें हँसते हुए ( प्रसन्नतापूर्वक ) सहायता न करे ॥ १८५ ॥
घर घर साजहिं बाहन नाना । हरषु हृदयँ परभात पयाना ॥
भरत जाइ घर कीन्ह बिचारू । नगरु बाजि गज भवन भँडारू ॥
घर- घर लोग अनेकों प्रकारकी सवारियाँ सजा रहे हैं । हृदयमें [ बड़ा ] हर्ष है कि सबेरे चलना है । भरतजीने घर जाकर विचार किया कि नगर, घोड़े, हाथी, महल-खजाना आदि–॥१ ॥
संपति सब रघुपति कै आही । जौं बिनु जतन चलौं तजि ताही ॥
तौ परिनाम न मोरि भलाई । पाप सिरोमनि साइँ दोहाई ॥
सारी सम्पत्ति श्रीरघुनाथजीकी है । यदि उसकी [रक्षाकी ] व्यवस्था किये बिना उसे ऐसे ही छोड़कर चल दूँ, तो परिणाममें मेरी भलाई नहीं है । क्योंकि स्वामीका द्रोह सब पापोंमें शिरोमणि ( श्रेष्ठ ) है ॥२ ॥
करइ स्वामि हित सेवकु सोई । दूषन कोटि देइ किन कोई ॥
अस बिचारि सुचि सेवक बोले । जे सपनेहुँ निज धरम न डोले ॥
सेवक वही है जो स्वामीका हित करे, चाहे कोई करोड़ों दोष क्यों न दे । भरतजीने ऐसा विचारकर ऐसे विश्वासपात्र सेवकोंको बुलाया जो कभी स्वप्नमें भी अपने धर्मसे नहीं डिगे थे ॥ ३ ॥
कहि सबु मरमु धरमु भल भाषा । जो जेहि लायक सो तेहिं राखा ॥
करि सबु जतनु राखि रखवारे । राम मातु पहिं भरतु सिधारे ॥
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* *४ ९ ८ रामचरितमानस भरतजीने उनको सब भेद समझाकर फिर उत्तम धर्म बतलाया; और जो जिस योग्य था, उसे उसी कामपर नियुक्त कर दिया । सब व्यवस्था करके, रक्षकोंको रखकर भरतजी राममाता कौसल्याजीके पास गये ॥४ ॥
दो० –- आरत जननी जानि सब भरत सनेह सुजान ।
कहेउ बनावन पालकीं सजन सुखासन जान ॥ १८६ ॥
स्नेहके सुजान ( प्रेमके तत्त्वको जाननेवाले ) भरतजीने सब माताओंको आर्त ( दुखी ) जानकर उनके लिये पालकियाँ तैयार करने तथा सुखासन यान ( सुखपाल) सजानेके लिये कहा ॥ १८६ ॥
चक्क चक्कि जिमि पुर नर नारी । चहत प्रात उर आरत भारी ॥
जागत सब निसि भयउ बिहाना । भरत बोलाए सचिव सुजाना ॥
नगरके नर-नारी चकवे -चकवीकी भाँति हृदयमें अत्यन्त आर्त होकर प्रातः कालका होना चाहते हैं । सारी रात जागते -जागते सबेरा हो गया । तब भरतजीने चतुर मन्त्रियोंको बुलवाया- ॥१ ॥
कहेउ लेहु सबु तिलक समाजू । बनहिं देब मुनि रामहि राजू ॥
बेगि चलहु सुनि सचिव जोहारे । तुरत तुरग रथ नाग सँवारे ॥
और कहा— तिलकका सब सामान ले चलो । वनमें ही मुनि वसिष्ठजी श्रीरामचन्द्रजीको राज्य देंगे, जल्दी चलो । यह सुनकर मन्त्रियोंने वन्दना की और तुरंत घोड़े, रथ और हाथी सजवा दिये ॥२ ॥
अरुंधती अरु अगिनि समाऊ । रथ चढ़ चले प्रथम मुनिराऊ ॥
बिप्र बूंद चढ़ि बाहन नाना । चले सकल तप तेज निधाना ॥
सबसे पहले मुनिराज वसिष्ठजी अरुन्धती और अग्निहोत्रकी सब सामग्रीसहित रथपर सवार होकर चले । फिर ब्राह्मणोंके समूह, जो सब के सब तपस्या और तेजके भण्डार थे, अनेकों सवारियोंपर चढ़कर चले ॥३ ॥
नगर लोग सब सजि सजि जाना । चित्रकूट कहँ कीन्ह पयाना ॥
सिबिका सुभग न जाहिं बखानी । चढ़ि चढ़ढ़ चलत भईं सब रानी ॥
नगरके सब लोग रथोंको सजा- सजाकर चित्रकूटको चल पड़े । जिनका वर्णन नहीं हो सकता, ऐसी सुन्दर पालकियोंपर चढ़ चढ़कर सब रानियाँ चलीं ॥४ ॥
दो० – सौंपि नगर सुचि सेवकनि सादर सकल चलाइ ।
सुमिरि राम सिय चरन तब चले भरत दोउ भाइ ॥ १८७ ॥
विश्वासपात्र सेवकोंको नगर सौंपकर और सबको आदरपूर्वक रवाना करके, तब श्रीसीतारामजीके चरणोंको स्मरण करके भरत- शत्रुघ्न दोनों भाई चले ॥ १८७ ॥