श्रीरामचरितमानस — पृष्ठ 501–510

श्रीरामचरितमानस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 501–510

पृष्ठ 501

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* ** अयोध्याकाण्ड ४९९

राम दरस बस सब नर नारी । जनु करि करिनि चले तकि बारी ॥

बन सिय रामु समुझि मन माहीं । सानुज भरत पयादेहिं जाहीं ॥

श्रीरामचन्द्रजीके दर्शनके वशमें हुए ( दर्शनकी अनन्य लालसासे ) सब नर-नारी ऐसे चले मानो प्यासे हाथी - हथिनी जलको तककर [ बड़ी तेजीसे बावले -से हुए ] जा रहे हों । श्रीसीतारामजी [ सब सुखोंको छोड़कर ] वनमें हैं, मनमें ऐसा विचार करके छोटे भाई शत्रुघ्नजीसहित भरतजी पैदल ही चले जा रहे हैं ॥१ ॥

देखि सनेहु लोग अनुरागे । उतरि चले हय गय रथ त्यागे ॥

जाइ समीप राखि निज डोली । राम मातु मृदु बानी बोली ॥

उनका स्नेह देखकर लोग प्रेममें मग्न हो गये और सब घोड़े, हाथी, रथोंको छोड़कर उनसे उतरकर पैदल चलने लगे । तब श्रीरामचन्द्रजीकी माता कौसल्याजी भरतजीके पास जाकर और अपनी पालकी उनके समीप खड़ी करके कोमल वाणीसे बोलीं- ॥२ ॥

तात चढ़हु रथ बलि महतारी । होइहि प्रिय परिवारु दुखारी ॥

तुम्हरें चलत चलिहि सबु लोगू । सकल सोक कृस नहिं मग जोगू ॥

हे बेटा! माता बलैयाँ लेती है, तुम रथपर चढ़ जाओ, नहीं तो सारा प्यारा परिवार दुखी हो जायगा । तुम्हारे पैदल चलनेसे सभी लोग पैदल चलेंगे । शोकके मारे सब दुबले हो रहे हैं, पैदल रास्तेके ( पैदल चलनेके ) योग्य नहीं हैं ॥ ३ ॥

सिर धरि बचन चरन सिरु नाई । रथ चढ़ि चलत भए दोउ भाई ॥

तमसा प्रथम दिवस करि बासू ॥ दूसर गोमति तीर निवासू॥

माताकी आज्ञाको सिर चढ़ाकर और उनके चरणोंमें सिर नवाकर दोनों भाई रथपर चढ़कर चलने लगे । पहले दिन तमसापर वास ( मुकाम) करके दूसरा मुकाम गोमतीके तीरपर किया ॥ ४ ॥

दो० – पय अहार फल असन एक निसि भोजन एक लोग ।

करत राम हित नेम ब्रत परिहरि भूषन भोग ॥ १८८ ॥

कोई दूध ही पीते, कोई फलाहार करते और कुछ लोग रातको एक ही बार भोजन करते हैं । सईभूषण औरतीरभोग- विलासकोबसि चलेछोड़कर बिहानेसब लोग श्रीरामचन्द्रजीके। सुंगबेरपुरलिये नियमसबऔर व्रत करतेनिअरानेहैं ॥ १८८ ॥॥

समाचार सब सुने निषादा । हृदयँ बिचार करइ सबिषादा ॥

रातभर सई नदीके तीरपर निवास करके सबेरे वहाँसे चल दिये और सब शृङ्गवेरपुरके समीप जा पहुँचे । निषादराजने सब समाचार सुने, तो वह दुखी होकर हृदयमें विचार करने लगा- ॥१ ॥

पृष्ठ 502

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* *५०० रामचरितमानस

कारन कवन भरतु बन जाहीं । है कछु कपट भाउ मन माहीं ॥

जौं पै जियँ न होति कुटिलाई । तौ कत लीन्ह संग कटकाई ॥

क्या कारण है जो भरत वनको जा रहे हैं, मनमें कुछ कपट- भाव अवश्य है । यदि मनमें कुटिलता न होती, तो साथमें सेना क्यों ले चले हैं ॥२ ॥

जानहिं सानुज रामहि मारी । करउँ अकंटक राजु सुखारी ॥

भरत न राजनीति उर आनी । तब कलंकु अब जीवन हानी ॥

समझते हैं कि छोटे भाई लक्ष्मणसहित श्रीरामको मारकर सुखसे निष्कण्टक राज्य करूँगा । भरतने हृदयमें राजनीतिको स्थान नहीं दिया ( राजनीतिका विचार नहीं किया) । तब ( पहले ) तो कलंक ही लगा था, अब तो जीवनसे ही हाथ धोना पड़ेगा ॥ ३ ॥

सकल सुरासुर जुरहिं जुझारा । रामहि समर न जीतनिहारा ॥

का आचरजु भरतु अस करहीं । नहिं बिष बेलि अमिअ फल फरहीं ॥

सम्पूर्ण देवता और दैत्य वीर जुट जायँ, तो भी श्रीरामजीको रणमें जीतनेवाला कोई नहीं है । भरत जो ऐसा कर रहे हैं, इसमें आश्चर्य ही क्या है? विषकी बेलें अमृतफल कभी नहीं फलतीं! ॥४ ॥

दो ० - अस बिचारि गुहँ ग्याति सन कहेउ सजग सब होहु ।

हथवाँसहु बोरहु तरनि कीजिअ घाटारोहु ॥ १८ ९ ॥

ऐसा विचारकर गुह ( निषादराज ) ने अपनी जातिवालोंसे कहा कि सब लोग सावधान हो जाओ । नावोंको हाथमें ( कब्जेमें ) कर लो और फिर उन्हें डुबा दो तथा सब घाटोंको रोक दो ॥१८ ९ ॥

होहु सँजोइल रोकहु घाटा । ठाटहु सकल मरे के ठाटा ॥

सनमुख लोह भरत सन लेऊँ । जिअत न सुरसरि उतरन देऊँ ॥

सुसज्जित होकर घाटोंको रोक लो और सब लोग मरनेके साज सजा लो ( अर्थात् भरतसे युद्धमें लड़कर मरनेके लिये तैयार हो जाओ ) । मैं भरतसे सामने ( मैदानमें ) लोहा लूँगा ( मुठभेड़ करूँगा ) और जीते -जी उन्हें गङ्गापार न उतरने दूँगा ॥ १ ॥

समर मरनु पुनि सुरसरि तीरा । राम काजु छनभंगु सरीरा ॥

भरत भाइ नृपु मैं जन नीचू । बड़ें भाग असि पाइअ मीचू॥

युद्धमें मरण, फिर गङ्गाजीका तट, श्रीरामजीका काम और क्षणभङ्गुर शरीर ( जो चाहे जब नाश हो जाय ); भरत श्रीरामजीके भाई और राजा ( उनके हाथसे मरना ) और मैं नीच सेवक - बड़े भाग्यसे ऐसी मृत्यु मिलती है ॥२ ॥

पृष्ठ 503

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* ** अयोध्याकाण्ड ५०१

स्वामि काज करिहउँ रन रारी । जस धवलिहउँ भुवन दस चारी ॥

तजउँ प्रान रघुनाथ निहोरें । दुहूँ हाथ मुद मोदक मोरें ॥

मैं स्वामीके कामके लिये रणमें लड़ाई करूँगा और चौदहों लोकोंको अपने यशसे उज्ज्वल कर दूँगा । श्रीरघुनाथजीके निमित्त प्राण त्याग दूँगा । मेरे तो दोनों ही हाथोंमें आनन्दके लड्डू हैं ( अर्थात् जीत गया तो रामसेवकका यश प्राप्त करूँगा और मारा गया तो श्रीरामजीकी नित्य सेवा प्राप्त करूँगा ) ॥३ ॥

साधु समाज न जाकर लेखा । राम भगत महुँ जासु न रेखा ॥

जायँ जिअत जग सो महिभारू । जननी जौबन बिटप कुठारू ॥

साधुओंके समाजमें जिसकी गिनती नहीं और श्रीरामजीके भक्तोंमें जिसका स्थान नहीं, वह जगत्में पृथ्वीका भार होकर व्यर्थ ही जीता है । वह माताके यौवनरूपी वृक्षके काटनेके लिये कुल्हाड़ामात्र है ॥४ ॥

दो० - बिगत बिषाद निषादपति सबहि बढ़ाइ उछाहु ।

सुमिरि राम मागेउ तुरत तरकस धनुष सनाहु ॥ १ ९० ॥

[ इस प्रकार श्रीरामजीके लिये प्राणसमर्पणका निश्चय करके ] निषादराज विषादसे रहित हो गया और सबका उत्साह बढ़ाकर तथा श्रीरामचन्द्रजीका स्मरण करके उसने तुरंत ही तरकस, धनुष और कवच माँगा ॥ १ ९ ० ॥

बेगहु भाइहु सजहु सँजोऊ । सुनि रजाइ कदराइ न कोऊ ॥

भलेहिं नाथ सब कहहिं सहरषा । एकहिं एक बढ़ावइ करषा ॥

[ उसने कहा— ] हे भाइयो! जल्दी करो और सब सामान सजाओ । मेरी आज्ञा सुनकर कोई मनमें कायरता न लावे | सब हर्षके साथ बोल उठे - हे नाथ! बहुत अच्छा; और आपसमें एक- दूसरेका जोश बढ़ाने लगे ॥१ ॥

चले निषाद जोहारि जोहारी । सूर सकल रन रूचइ रारी ॥

सुमिरि राम पद पंकज पनहीं । भाथीं बाँधि चढ़ाइन्हि धनहीं ॥

निषादराजको जोहार कर-करके सब निषाद चले । सभी बड़े शूरवीर हैं और संग्राममें लड़ना उन्हें बहुत अच्छा लगता है । श्रीरामचन्द्रजीके चरणकमलोंकी जूतियोंका स्मरण करके उन्होंने भाथियाँ ( छोटे - छोटे तरकस ) बाँधकर धनुहियों (छोटे -छोटे धनुषों )) -- पर प्रत्यञ्चा चढ़ायीं ॥२ ॥

अँगरी पहिरि कूँड़ि सिर धरहीं । फरसा बाँस सेल सम करहीं ॥

एक कुसल अति ओड़न खाँड़े । कूदहिं गगन मनहुँ छिति छाँड़े ॥

पृष्ठ 504

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* *५०२ रामचरितमानस कवच पहनकर सिरपर लोहेका टोप रखते हैं और फरसे, भाले तथा बरछोंको सीधा कर रहे हैं ( सुधार रहे हैं ) । कोई तलवारके वार रोकनेमें अत्यन्त ही कुशल हैं । वे ऐसे उमंगमें भरे हैं मानो धरती छोड़कर आकाशमें कूद ( उछल) रहे हों ॥ ३ ॥

निज निज साजु समाजु बनाई । गुह राउतहि जोहारे जाई ॥

देखि सुभट सब लायक जाने । लै लै नाम सकल सनमाने ॥

अपना - अपना साज-समाज ( लड़ाईका सामान और दल ) बनाकर उन्होंने जाकर निषादराज गुहको जोहार की । निषादराजने सुन्दर योद्धाओंको देखकर, सबको सुयोग्य जाना और नाम ले-लेकर सबका सम्मान किया ॥४ ॥

दो० - भाइहु लावहु धोख जनि आजु काज बड़ मोहि ।

सुनि सरोष बोले सुभट बीर अधीर न होहि ॥ १ ९ १ ॥

[ उसने कहा— ] हे भाइयो! धोखा न लाना ( अर्थात् मरनेसे न घबराना ), आज मेरा बड़ा भारी काम है । यह सुनकर सब योद्धा बड़े जोशके साथ बोल उठे -हे वीर! अधीर मत हो ॥१ ९ १ ॥

राम प्रताप नाथ बल तोरे । करहिं कटकु बिनु भट बिनु घोरे ॥

जीवत पाउ न पाछें धरहीं । रुंड मुंडमय मेदिनि करहीं ॥

हे नाथ! श्रीरामचन्द्रजीके प्रतापसे और आपके बलसे हमलोग भरतकी सेनाको बिना वीर और बिना घोड़ेकी कर देंगे ( एक-एक वीर और एक-एक घोड़ेको मार डालेंगे ) । जीते - जी पीछे पाँव न रखेंगे । पृथ्वीको रुण्ड-मुण्डमयी कर देंगे ( सिरों और धड़ोंसे छा देंगे ) ॥ १ ॥

दीख निषादनाथ भल टोलू । कहेउ बजाउ जुझाऊ ढोलू॥

एतना कहत छींक भइ बाँए । कहेउ सगुनिअन्ह खेत सुहाए ॥

निषादराजने वीरोंका बढ़िया दल देखकर कहा-जुझाऊ ( लड़ाईका ) ढोल बजाओ । इतना कहते ही बायीं ओर छींक हुई । शकुन विचारनेवालोंने कहा कि खेत सुन्दर हैं ( जीत होगी ) ॥ २ ॥

बूढ़ एकु कह सगुन बिचारी । भरतहि मिलिअ न होइहि रारी ॥

रामहि भरतु मनावन जाहीं । सगुन कहइ अस बिग्रहु नाहीं ॥

एक बूढ़ेने शकुन विचारकर कहा- भरतसे मिल लीजिये, उनसे लड़ाई नहीं होगी । भरत

श्रीरामचन्द्रजीको मनाने जा रहे हैं । शकुन ऐसा कह रहा है कि विरोध नहीं है ॥३ ॥

सुनि गुह कहइ नीक कह बूढ़ा । सहसा करि पछिताहिं बिमूढ़ा ॥

भरत सुभाउ सीलु बिनु बूझें । बड़ि हित हानि जानि बिनु जूझें ॥

पृष्ठ 505

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* ** अयोध्याकाण्ड ५०३ यह सुनकर निषादराज गुहने कहा- बूढ़ा ठीक कह रहा है । जल्दीमें ( बिना विचारे ) कोई काम करके मूर्ख लोग पछताते हैं । भरतजीका शील-स्वभाव बिना समझे और बिना जाने युद्ध करनेमें हितकी बहुत बड़ी हानि है ॥४ ॥

दो० –गहहु घाट भट समिटि सब लेउँ मरम मिलि जाइ ।

बूझि मित्र अरि मध्य गति तस तब करिहउँ आइ ॥ १ ९ २ ॥

अतएव हे वीरो! तुमलोग इकट्ठे होकर सब घाटोंको रोक लो, मैं जाकर भरतजीसे मिलकर उनका भेद लेता हूँ । उनका भाव मित्रका है या शत्रुका या उदासीनका, यह जानकर तब आकर वैसा ( उसीके अनुसार ) प्रबन्ध करूँगा ॥ १ ९ २ ॥

लखब सनेहु सुभायँ सुहाएँ । बैरु प्रीति नहिं दुरइँ दुराएँ ॥

अस कहि भेंट सँजोवन लागे । कंद मूल फल खग मृग मागे ॥

उनके सुन्दर स्वभावसे मैं उनके स्नेहको पहचान लूँगा । वैर और प्रेम छिपानेसे नहीं छिपते । ऐसा कहकर वह भेंटका सामान सजाने लगा । उसने कन्द, मूल, फल, पक्षी और हिरन मँगवाये ॥ १ ॥

मीन पीन पाठीन पुराने । भरि भरि भार कहारन्ह आने ॥

मिलन साजु सजि मिलन सिधाए । मंगल मूल सगुन सुभ पाए ॥

कहार लोग पुरानी और मोटी पहिना नामक मछलियोंके भार भर- भरकर लाये । भेंटका सामान सजाकर मिलनेके लिये चले तो मङ्गलदायक शुभ शकुन मिले ॥ २ ॥

देखि दूरि तें कहि निज नामू । कीन्ह मुनीसहि दंड प्रनामू॥

जानि रामप्रिय दीन्हि असीसा । भरतहि कहेउ बुझाइ मुनीसा ॥

निषादराजने मुनिराज वसिष्ठजीको देखकर अपना नाम बतलाकर दूरहीसे दण्डवत् प्रणाम किया । मुनीश्वर वसिष्ठजीने उसको रामका प्यारा जानकर आशीर्वाद दिया और भरतजीको समझाकर कहा [ कि यह श्रीरामजीका मित्र है ] ॥ ३ ॥

राम सखा सुनि संदनु त्यागा । चले उतरि उमगत अनुरागा ॥

गाउँ जाति गुहँ नाउँ सुनाई । कीन्ह जोहारु माथ महि लाई ॥

यह श्रीरामका मित्र है, इतना सुनते ही भरतजीने रथ त्याग दिया । वे रथसे उतरकर प्रेममें उमँगते हुए चले । निषादराज गुहने अपना गाँव, जाति और नाम सुनाकर पृथ्वीपर माथा टेककर जोहार की ॥४ ॥

दो० – करत दंडवत देखि तेहि भरत लीन्ह उर लाइ ।

मनहुँ लखन सन भेंट भइ प्रेमु न हृदयँ समाइ ॥ १ ९ ३ ॥

पृष्ठ 506

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* *५०४ रामचरितमानस दण्डवत् करते देखकर भरतजीने उठाकर उसको छातीसे लगा लिया । हृदयमें प्रेम समाता नहीं है, मानो स्वयं लक्ष्मणजीसे भेंट हो गयी हो ॥१ ९ ३ ॥

भेंट भरतु ताहि अति प्रीती । लोग सिहाहिं प्रेम कै रीती ॥

धन्य धन्य धुनि मंगल मूला । सुर सराहि तेहि बरिसहिं फूला ॥

भरतजी गुहको अत्यन्त प्रेमसे गले लगा रहे हैं । प्रेमकी रीतिको सब लोग सिहा रहे हैं ( ईर्ष्यापूर्वक प्रशंसा कर रहे हैं ), मङ्गलकी मूल ' धन्य- धन्य ' की ध्वनि करके देवता उसकी सराहना करते हुए फूल बरसा रहे हैं ॥ १ ॥

लोक बेद सब भाँतिहिं नीचा । जासु छाँह छुइ लेइअ सींचा ॥

तेहि भरि अंक राम लघु भ्राता । मिलत पुलक परिपूरित गाता ॥

[ वे कहते हैं— ] जो लोक और वेद दोनोंमें सब प्रकारसे नीचा माना जाता है, जिसकी छायाके छू जानेसे भी स्नान करना होता है, उसी निषादसे अँकवार भरकर ( हृदयसे चिपटाकर ) श्रीरामचन्द्रजीके छोटे भाई भरतजी [ आनन्द और प्रेमवश ] शरीरमें पुलकावलीसे परिपूर्ण हो मिल रहे हैं ॥२ ॥

राम राम कहि जे जमुहाहीं । तिन्हहि न पाप पुंज समुहाहीं ॥

यह तौ राम लाइ उर लीन्हा । कुल समेत जगु पावन कीन्हा ॥

जो लोग राम - राम कहकर जँभाई लेते हैं ( अर्थात् आलस्यसे भी जिनके मुँहसे रामनामका उच्चारण हो जाता है ), पापोंके समूह ( कोई भी पाप ) उनके सामने नहीं आते । फिर इस गुहको तो स्वयं श्रीरामचन्द्रजीने हृदयसे लगा लिया और कुलसमेत इसे जगत्पावन ( जगत्को पवित्र करनेवाला ) बना दिया ॥ ३ ॥

करमनास जलु सुरसरि परई । तेहि को कहहु सीस नहिं धरई ॥

उलटा नामु जपत जगु जाना । बालमीकि भए ब्रह्म समाना ॥

कर्मनाशा नदीका जल गङ्गाजीमें पड़ जाता है ( मिल जाता है ), तब कहिये, उसे कौन सिरपर धारण नहीं करता? जगत् जानता है कि उलटा नाम ( मरा - मरा ) जपते -जपते वाल्मीकिजी ब्रह्मके समान हो गये ॥ ४ ॥

दो० – स्वपच सबर खस जमन जड़ पावँर कोल किरात ।

रामु कहत पावन परम होत भुवन बिख्यात ॥ १ ९ ४ ॥

मूर्ख और पामर चाण्डाल, शबर, खस, यवन, कोल और किरात भी रामनाम कहते ही परम पवित्र और त्रिभुवनमें विख्यात हो जाते हैं ॥ १ ९ ४ ॥

पृष्ठ 507

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* '* अयोध्याकाण्ड ५०५

नहि अचिरिजु जुग जुग चलि आई । केहि न दीन्हि रघुबीर बड़ाई ॥

राम नाम महिमा सुर कहहीं । सुनि सुनि अवध लोग सुखु लहहीं ॥

इसमें कोई आश्चर्य नहीं है, युग-युगान्तरसे यही रीति चली आ रही है । श्रीरघुनाथजीने किसको बड़ाई नहीं दी? इस प्रकार देवता रामनामकी महिमा कह रहे हैं और उसे सुन- सुनकर अयोध्याके लोग सुख पा रहे हैं ॥१ ॥

रामसखहि मिलि भरत सप्रेमा । पूँछी कुसल सुमंगल खेमा ॥

देखि भरत कर सीलु सनेहू । भा निषाद तेहि समय बिदेहू ॥

रामसखा निषादराजसे प्रेमके साथ मिलकर भरतजीने कुशल, मङ्गल और क्षेम पूछी । भरतजीका शील और प्रेम देखकर निषाद उस समय विदेह हो गया ( प्रेममुग्ध होकर देहकी सुध भूल गया ) ॥ २ ॥

सकुच सनेहु मोदु मन बाढ़ा । भरतहि चितवत एकटक ठाढ़ा ॥

धरि धीरजु पद बंदि बहोरी । बिनय सप्रेम करत कर जोरी ॥

उसके मनमें संकोच, प्रेम और आनन्द इतना बढ़ गया कि वह खड़ा-खड़ा टकटकी लगाये भरतजीको देखता रहा । फिर धीरज धरकर भरतजीके चरणोंकी वन्दना करके प्रेमके साथ हाथ जोड़कर विनती करने लगा— ॥ ३ ॥

कुसल मूल पद पंकज पेखी । मैं तिहुँ काल कुसल निज लेखी ॥

अब प्रभु परम अनुग्रह तोरें । सहित कोटि कुल मंगल मोरें ॥

हे प्रभो! कुशलके मूल आपके चरणकमलोंके दर्शन कर मैंने तीनों कालोंमें अपना कुशल जान लिया । अब आपके परम अनुग्रहसे करोड़ों कुलों ( पीढ़ियों ) - सहित मेरा मङ्गल ( कल्याण ) हो गया ॥४ ॥

दो० - समुझि मोरिकरतूति कुलु प्रभु महिमा जियँ जोइ ।

जो न भजइ रघुबीर पद जग बिधि बंचित सोइ ॥ १ ९ ५ ॥

मेरी करतूत और कुलको समझकर और प्रभु श्रीरामचन्द्रजीकी महिमाको मनमें देख ( विचार ) कर ( अर्थात् कहाँ तो मैं नीच जाति और नीच कर्म करनेवाला जीव, और कहाँ अनन्तकोटि ब्रह्माण्डोंके स्वामी भगवान् श्रीरामचन्द्रजी! पर उन्होंने मुझ जैसे नीचको भी अपनी अहैतुकी कृपावश अपना लिया- यह समझकर ) जो रघुवीर श्रीरामजीके चरणोंका भजन नहीं करता, वह जगत्में विधाताके द्वारा ठगा गया है ॥ १ ९ ५ ॥

कपटी कायर कुमति कुजाती । लोक बेद बाहेर सब भाँती ॥

राम कीन्ह आपन जबही तें । भयउँ भुवन भूषन तबही तें ॥

पृष्ठ 508

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* *५०६ रामचरितमानस मैं कपटी, कायर, कुबुद्धि और कुजाति हूँ और लोक- वेद दोनोंसे सब प्रकारसे बाहर हूँ । पर जबसे श्रीरामचन्द्रजीने मुझे अपनाया है, तभीसे मैं विश्वका भूषण हो गया ॥१ ॥

देखि प्रीति सुनि बिनय सुहाई । मिलेउ बहोरि भरत लघु भाई ॥

कहि निषाद निज नाम सुबानीं । सादर सकल जोहारीं रानीं ॥

निषादराजकी प्रीतिको देखकर और सुन्दर विनय सुनकर फिर भरतजीके छोटे भाई शत्रुघ्नजी उससे मिले । फिर निषादने अपना नाम ले - लेकर सुन्दर ( नम्र और मधुर) वाणीसे सब रानियोंको आदरपूर्वक जोहार की ॥२ ॥

जानि लखन सम देहिं असीसा । जिअहु सुखी सय लाख बरीसा ॥

निरखि निषादु नगर नर नारी । भए सुखी जनु लखनु निहारी ॥

रानियाँ उसे लक्ष्मणजीके समान समझकर आशीर्वाद देती हैं कि तुम सौ लाख वर्षोंतक सुखपूर्वक जिओ । नगरके स्त्री -पुरुष निषादको देखकर ऐसे सुखी हुए, मानो लक्ष्मणजीको देख रहे हों ॥३ ॥

कहहिं लहेउ एहिं जीवन लाहू । भेंटेउ रामभद्र भरि बाहू ॥

सुनि निषादु निज भाग बड़ाई । प्रमुदित मन लइ चलेउ लेवाई ॥

सब कहते हैं कि जीवनका लाभ तो इसीने पाया है, जिसे कल्याणस्वरूप श्रीरामचन्द्रजीने भुजाओंमें बाँधकर गले लगाया है । निषाद अपने भाग्यकी बड़ाई सुनकर मनमें परम आनन्दित हो सबको अपने साथ लिवा ले चला ॥ ४ ॥

दो०– सनकारे सेवक सकल चले स्वामि रुख पाइ ।

घर तरु तर सर बाग बन बास बनाएन्हि जाइ ॥ १ ९ ६ ॥

उसने अपने सब सेवकोंको इशारेसे कह दिया । वे स्वामीका रुख पाकर चले और उन्होंने घरोंमें, वृक्षोंके नीचे, तालाबोंपर तथा बगीचों और जंगलोंमें ठहरनेके लिये स्थान बना दिये ॥ १ ९ ६ ॥

संगबेरपुर भरत दीख जब । भे सनेहँ सब अंग सिथिल तब ॥

सोहत दिएँ निषादहि लागू । जनु तनु धरें बिनय अनुरागू ॥

भरतजीने जब शृङ्गवेरपुरको देखा, तब उनके सब अङ्ग प्रेमके कारण शिथिल हो गये । वे निषादको लाग दिये ( अर्थात् उसके कंधेपर हाथ रखे चलते हुए ) ऐसे शोभा दे रहे हैं, मानो विनय और प्रेम शरीर धारण किये हुए हों ॥ १ ॥

एहि बिधि भरत सेनु सबु संगा । दीखि जाइ जग पावनि गंगा ॥

रामघाट कहँ कीन्ह प्रनामू । भा मनु मगनु मिले जनु रामू॥

पृष्ठ 509

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* * अयोध्याकाण्ड ५०७ इस प्रकार भरतजीने सब सेनाको साथमें लिये हुए जगत्को पवित्र करनेवाली गङ्गाजीके दर्शन किये । श्रीरामघाटको [जहाँ श्रीरामजीने स्नान-सन्ध्या की थी ] प्रणाम किया । उनका मन इतना आनन्दमग्न हो गया, मानो उन्हें स्वयं श्रीरामजी मिल गये हों ॥२ ॥

करहिं प्रनाम नगर नर नारी । मुदित ब्रह्ममय बारि निहारी ॥

करि मज्जनु मागहिं कर जोरी । रामचंद्र पद प्रीति न थोरी ॥

नगरके नर - नारी प्रणाम कर रहे हैं और गङ्गाजीके ब्रह्मरूप जलको देख -देखकर आनन्दित हो रहे हैं । गङ्गाजीमें स्नानकर हाथ जोड़कर सब यही वर माँगते हैं कि श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंमें हमारा प्रेम कम न हो ( अर्थात् बहुत अधिक हो) ॥ ३ ॥

भरत कहेउ सुरसरि तव रेनू । सकल सुखद सेवक सुरधेनू ॥

जोरि पानि बर मागउँ एहू । सीय राम पद सहज सनेहू ॥

भरतजीने कहा — हे गङ्गे! आपकी रज सबको सुख देनेवाली तथा सेवकके लिये तो कामधेनु ही है । मैं हाथ जोड़कर यही वरदान माँगता हूँ कि श्रीसीतारामजीके चरणोंमें मेरा स्वाभाविक प्रेम हो ॥४ ॥

दो० –एहि बिधि मज्जनु भरतु करि गुर अनुसासन पाइ ।

मातु नहानीं जानि सब डेरा चले लवाइ ॥ १ ९ ७ ॥

इस प्रकार भरतजी स्नान कर और गुरुजीकी आज्ञा पाकर तथा यह जानकर कि सब माताएँ स्नान कर चुकी हैं, डेरा उठा ले चले ॥१९ ७ ॥

जहँ तहँ लोगन्ह डेरा कीन्हा । भरत सोधु सबही कर लीन्हा ॥

सुर सेवा करि आयसु पाई । राम मातु पहिं गे दोउ भाई ॥

लोगोंने जहाँ-तहाँ डेरा डाल दिया । भरतजीने सभीका पता लगाया [कि सब लोग आकर आरामसे टिक गये हैं या नहीं ] । फिर देवपूजन करके आज्ञा पाकर दोनों भाई श्रीरामचन्द्रजीकी माता कौसल्याजीके पास गये ॥ १ ॥

चरन चाँपि कहि कहि मृदु बानी । जननीं सकल भरत सनमानी ॥

भाइहि सौंपि मातु सेवकाई । आपु निषादहि लीन्ह बोलाई॥

चरण दबाकर और कोमल वचन कह कहकर भरतजीने सब माताओंका सत्कार किया । फिर भाई शत्रुघ्नको माताओंकी सेवा सौंपकर आपने निषादको बुला लिया ॥ २ ॥

चले सखा कर सों कर जोरें । सिथिल सरीरु सनेह न थोरें ॥

पूँछत सखहि सो ठाउँ देखाऊ । नेकु नयन मन जरनि जुड़ाऊ ॥

पृष्ठ 510

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* *५०८ रामचरितमानस सखा निषादराजके हाथसे हाथ मिलाये हुए भरतजी चले । प्रेम कुछ थोड़ा नहीं है ( अर्थात् बहुत अधिक प्रेम है ), जिससे उनका शरीर शिथिल हो रहा है । भरतजी सखासे पूछते हैं कि मुझे वह स्थान दिखलाओ— और नेत्र और मनकी जलन कुछ ठंडी करो- ॥३ ॥

जहँ सिय रामु लखनु निसि सोए । कहत भरे जल लोचन कोए ॥

भरत बचन सुनि भयउ बिषादू । तुरत तहाँ लइ गयउ निषादू ॥

जहाँ सीताजी, श्रीरामजी और लक्ष्मण रातको सोये थे । ऐसा कहते ही उनके नेत्रोंके कोयोंमें [ प्रेमाश्रुओंका ] जल भर आया । भरतजीके वचन सुनकर निषादको बड़ा विषाद हुआ । वह तुरंत ही उन्हें वहाँ ले गया—॥४ ॥

दो० – जहँ सिंसुपा पुनीत तर रघुबर किय बिश्रामु ।

अति सनेहँ सादर भरत कीन्हेउ दंड प्रनामु ॥ १ ९८ ॥

जहाँ पवित्र अशोकके वृक्षके नीचे श्रीरामजीने विश्राम किया था । भरतजीने वहाँ अत्यन्त प्रेमसे आदरपूर्वक दण्डवत्-प्रणाम किया ॥१ ९८ ॥

कुस साँथरी निहारि सुहाई । कीन्ह प्रनामु प्रदच्छिन जाई ॥

चरन रेख रज आँखिन्ह लाई । बनइ न कहत प्रीति अधिकाई ॥

कुशोंकी सुन्दर साथरी देखकर उसकी प्रदक्षिणा करके प्रणाम किया । श्रीरामचन्द्रजीके चरण- चिह्नोंकी रज आँखोंमें लगायी । [उस समयके ] प्रेमकी अधिकता कहते नहीं बनती ॥ १ ॥

कनक बिंदु दुइ चारिक देखे । राखे सीस सीय सम लेखे ॥

सजल बिलोचन हृदयँ गलानी । कहत सखा सन बचन सुबानी ॥

भरतजीने दो - चार स्वर्णविन्दु ( सोनेके कण या तारे आदि जो सीताजीके गहने - कपड़ोंसे गिर पड़े थे ) देखे तो उनको सीताजीके समान समझकर सिरपर रख लिया । उनके नेत्र [ प्रेमाश्रुके ] जलसे

भरे हैं और हृदयमें ग्लानि भरी है । वे सखासे सुन्दर वाणीमें ये वचन बोले— ॥२ ॥

श्रीहत सीय बिरहँ दुतिहीना । जथा अवध नर नारि बिलीना ॥

पिता जनक देउँ पटतर केही । करतल भोगु जोगु जग जेही ॥

ये स्वर्णके कण या तारे भी सीताजीके विरहसे ऐसे श्रीहत ( शोभाहीन ) एवं कान्तिहीन हो रहे हैं, जैसे [ रामवियोगमें ] अयोध्याके नर-नारी विलीन ( शोकके कारण क्षीण ) हो रहे हैं । जिन सीताजीके पिता राजा जनक हैं, इस जगत्में भोग और योग दोनों ही जिनकी मुट्ठीमें हैं, उन जनकजीको मैं किसकी उपमा दूँ? ॥३ ॥

ससुर भानुकुल भानु भुआलू । जेहि सिहात अमरावतिपालू ॥

प्राननाथु रघुनाथ गोसाईं । जो बड़ होत सो राम बड़ाईं ॥