श्रीरामचरितमानस — पृष्ठ 511–520
श्रीरामचरितमानस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 511–520
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* अयोध्याकाण्ड * ५० ९ सूर्यकुलके सूर्य राजा दशरथजी जिनके ससुर हैं, जिनको अमरावतीके स्वामी इन्द्र भी सिहाते थे ( ईर्ष्यापूर्वक उनके जैसा ऐश्वर्य और प्रताप पाना चाहते थे ); और प्रभु श्रीरघुनाथजी जिनके प्राणनाथ हैं, जो इतने बड़े हैं कि जो कोई भी बड़ा होता है, वह श्रीरामचन्द्रजीकी [दी हुई ] बड़ाईसे ही होता है;॥ ४ ॥
दो० - पति देवता सुतीय मनि सीय साँथरी देखि ।
बिहरत हृदउ न हहरि हर पबि तें कठिन बिसेषि ॥ १ ९९ ॥
उन श्रेष्ठ पतिव्रता स्त्रियोंमें शिरोमणि सीताजीकी साथरी ( कुशशय्या ) देखकर मेरा हृदय हहराकर ( दहलकर) फट नहीं जाता; हे शङ्कर! यह वज्रसे भी अधिक कठोर है! ॥ १ ९९ ॥
लालन जोगु लखन लघु लोने । भे न भाइ अस अहहिं न होने ॥
पुरजन प्रिय पितु मातु दुलारे ॥ सिय रघुबीरहि प्रानपिआरे ॥
मेरे छोटे भाई लक्ष्मण बहुत ही सुन्दर और प्यार करनेयोग्य हैं । ऐसे भाई न तो किसीके हुए, न हैं, न होनेके ही हैं । जो लक्ष्मण अवधके लोगोंको प्यारे, माता-पिताके दुलारे और श्रीसीतारामजीके प्राणप्यारे हैं; ॥ १ ॥
मृदु मूरति सुकुमार सुभाऊ । तात बाउ तन लाग न काऊ ॥
ते बन सहहिं बिपति सब भाँती । निदरे कोटि कुलिस एहिं छाती ॥
जिनकी कोमल मूर्ति और सुकुमार स्वभाव है, जिनके शरीरमें कभी गरम हवा भी नहीं लगी, वे वनमें सब प्रकारकी विपत्तियाँ सह रहे हैं । [हाय! ] इस मेरी छातीने [ कठोरतामें ] करोड़ों वज्रोंका भी निरादर कर दिया [ नहीं तो यह कभीकी फट गयी होती] ॥२ ॥
रूप सील सुख सब गुन सागर ॥राम जनमि गु कीन्ह उजागर ।
पुरजन परिजन गुर पितु माता । राम सुभाउ सबहि सुखदाता ॥
श्रीरामचन्द्रजीने जन्म ( अवतार ) लेकर जगत्को प्रकाशित ( परम सुशोभित ) कर दिया । वे रूप, शील, सुख और समस्त गुणोंके समुद्र हैं । पुरवासी, कुटुम्बी, गुरु, पिता- माता सभीको श्रीरामजीका स्वभाव सुख देनेवाला है ॥३ ॥
बैरिउ राम बड़ाईबड़ाई करहीं । बोलनि मिलनि बिनय मन हरहीं ॥
सारद कोटि कोटि सत सेषा । करिन सकहिं प्रभु गुन गन लेखा ॥
शत्रु भी श्रीरामजीकी बड़ाई करते हैं । बोल-चाल, मिलनेके ढंग और विनयसे वे मनको हर लेते हैं । करोड़ों सरस्वती और अरबों शेषजी भी प्रभु श्रीरामचन्द्रजीके गुणसमूहोंकी गिनती नहीं कर सकते ॥ ४ ॥
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*:*५१० रामचरितमानस
दो० - सुखस्वरूप रघुबंसमनि मंगल मोद निधान ।
ते सोवत कुस डासि महि बिधि गति अति बलवान ॥ २०० ॥
जो सुखस्वरूप रघुवंशशिरोमणि श्रीरामचन्द्रजी मङ्गल और आनन्दके भण्डार हैं, वे पृथ्वीपर
कुशा बिछाकर सोते हैं । विधाताकी गति बड़ी ही बलवान् है ॥ २०० ॥
राम सुना दुखु कान न काऊ । जीवनतरु जिमि जोगवइ राऊ ॥
पलक नयन फनि मनि जेहि भाँती । जोगवहिं जननि सकल दिन राती ॥
श्रीरामचन्द्रजीने कानोंसे भी कभी दुःखका नाम नहीं सुना । महाराज स्वयं जीवन- वृक्षकी तरह उनकी सार - सँभाल किया करते थे । सब माताएँ भी रात-दिन उनकी ऐसी सार-सँभाल करती थीं, जैसे पलक नेत्रोंकी और साँप अपनी मणिकी करते हैं ॥ १ ॥
ते अब फिरत बिपिन पदचारी । कंद मूल फल फूल अहारी ॥
धिग कैकई अमंगल मूला । भइसि प्रान प्रियतम प्रतिकूला ॥
वही श्रीरामचन्द्रजी अब जंगलोंमें पैदल फिरते हैं और कन्द-मूल तथा फल--फूलोंका भोजन करते हैं । अमङ्गलकी मूल कैकेयीको धिक्कार है, जो अपने प्राणप्रियतम पतिसे भी प्रतिकूल हो गयी ॥२ ॥
मैं धिग धिग अघ उदधि अभागी । सबु उतपातु भयउ जेहि लागी ॥
कुल कलंकु कर सृजेउ बिधाताँ । साइँदोह मोहि कीन्ह कुमाताँ ॥
मुझ पापोंके समुद्र और अभागेको धिक्कार है, धिक्कार है, जिसके कारण ये सब उत्पात हुए । विधाताने मुझे कुलका कलंक बनाकर पैदा किया और कुमाताने मुझे स्वामिद्रोही बना दिया ॥ ३ ॥
सुनि सप्रेम समुझाव निषादू । नाथ करिअ कत बादि बिषादू ।
राम तुम्हहि प्रिय तुम्ह प्रिय रामहि । यह निरजोसु दोसु बिधि बामहि ॥
यह सुनकर निषादराज प्रेमपूर्वक समझाने लगा- हे नाथ! आप व्यर्थ विषाद किसलिये करते हैं? श्रीरामचन्द्रजी आपको प्यारे हैं और आप श्रीरामचन्द्रजीको प्यारे हैं । यही निचोड़ ( निश्चित सिद्धान्त ) है, दोष तो प्रतिकूल विधाताको है ॥४ ॥
छं० – बिधि बाम की करनी कठिन जेहिं मातु कीन्ही बावरी ।
तेहि राति पुनि पुनि करहिं प्रभु सादर सरहना रावरी ॥
तुलसी न तुम्ह सो राम प्रीतमु कहतु हौं सौंहें किएँ ।
परिनाम मंगल जानि अपने आनिए धीरजु हिएँ ॥
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* ** अयोध्याकाण्ड ५११ प्रतिकूल विधाताकी करनी बड़ी कठोर है, जिसने माता कैकेयीको बावली बना दिया ( उसकी मति फेर दी ) । उस रातको प्रभु श्रीरामचन्द्रजी बार- बार आदरपूर्वक आपकी बड़ी सराहना करते थे । तुलसीदासजी कहते हैं - [ निषादराज कहता है कि- ] श्रीरामचन्द्रजीको आपके समान अतिशय प्रिय और कोई नहीं है, मैं सौगंध खाकर कहता हूँ । परिणाममें मङ्गल होगा, यह जानकर आप अपने हृदयमें धैर्य धारण कीजिये ।
सो० –- अंतरजामी रामु सकुच सप्रेम कृपायतन ।
चलिअ करिअ बिश्रामु यह बिचारि दृढ़ आनि मन ॥ २० ९ ॥
श्रीरामचन्द्रजी अन्तर्यामी तथा संकोच, प्रेम और कृपाके धाम हैं, यह विचारकर और मनमें दृढ़ता लाकर चलिये और विश्राम कीजिये ॥ २०१ ॥
सखा बचन सुनि उर धरि धीरा । बास चले सुमिरत रघुबीरा ॥
यह सुधि पाइ नगर नर नारी । चले बिलोकन आरत भारी ॥
सखाके वचन सुनकर, हृदयमें धीरज धरकर श्रीरामचन्द्रजीका स्मरण करते हुए भरतजी डेरेको चले । नगरके सारे स्त्री- पुरुष यह ( श्रीरामजीके ठहरनेके स्थानका ) समाचार पाकर बड़े आर होकर उस स्थानको देखने चले ॥१ ॥
परदखिना करि करहिं प्रनामा । देहिं कैकइहि खोरि निकामा ॥
भरि भरि बार बिलोचन लेहीं । बाम बिधातहि दूषन देहीं ॥
वे उस स्थानकी परिक्रमा करके प्रणाम करते हैं और कैकेयीको बहुत दोष देते हैं । नेत्रोंमें जल भर - भर लेते हैं और प्रतिकूल विधाताको दूषण देते हैं ॥२ ॥
एक सराहहिं भरत सनेहू । कोउ कह नृपति निबाहेउ नेहू॥
निंदहिं आपु सराहि निषादहि । को कहि सकइ बिमोह बिषादहि ॥
कोई भरतजीके स्नेहकी सराहना करते हैं और कोई कहते हैं कि राजाने अपना प्रेम खूब निबाहा । सब अपनी निन्दा करके निषादकी प्रशंसा करते हैं । उस समयके विमोह और विषादको कौन कह सकता है? ॥ ३ ॥
एहि बिधि राति लोग सबु जागा । भा भिनुसार गुदारा लागा ॥
गुरहि सुनावँ चढ़ाइ सुहाईं । नईं नाव सब मातु चढ़ाईं ॥
इस प्रकार रातभर सब लोग जागते रहे । सबेरा होते ही खेवा लगा । सुन्दर नावपर गुरुजीको चढ़ाकर फिर नयी नावपर सब माताओंको चढ़ाया ॥४ ॥
दंड चारि महँ भा सबु पारा । उतरि भरत तब सबहि सँभारा ॥
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* *५१२ रामचरितमानस
चार घड़ीमें सब गङ्गाजीके पार उतर गये । तब भरतजीने उतरकर सबको सँभाला ॥ ५ ॥
दो० - प्रातक्रिया करि मातु पद बंदि गुरहि सिरु नाइ ।
आगें किए निषाद गन दीन्हेउ कटकु चलाइ ॥ २०२ ॥
प्रातःकालकी क्रियाओंको करके माताके चरणोंकी वन्दना कर और गुरुजीको सिर नवाकर भरतजीने निषादगणोंको [रास्ता दिखलानेके लिये ] आगे कर लिया और सेना चला दी ॥ २०२ ॥
कियउ निषादनाथु अगुआईं । मातु पालकीं सकल चलाईं ॥
साथ बोलाइ भाइ लघु दीन्हा । बिप्रन्ह सहित गवनु गुर कीन्हा ॥
निषादराजको आगे करके पीछे सब माताओंकी पालकियाँ चलायीं । छोटे भाई शत्रुघ्नजीको
बुलाकर उनके साथ कर दिया । फिर ब्राह्मणोंसहित गुरुजीने गमन किया ॥१ ॥
आपु सुरसरिहि कीन्ह प्रनामू । सुमिरे लखन सहित सिय रामू ॥
। कोतल संग जाहिं डोरिआए ॥गवने भरत पयादेहिं पाए तदनन्तर आप ( भरतजी ) ने गङ्गाजीको प्रणाम किया और लक्ष्मणसहित श्रीसीतारामजीका स्मरण किया । भरतजी पैदल ही चले । उनके साथ कोतल ( बिना सवारके ) घोड़े बागडोरसे बँधे हुए चले जा रहे हैं ॥ २ ॥
कहहिं सुसेवक बारहिं बारा । होइअ नाथ अस्व असवारा ॥
रामु पयादेहि पायँ सिधाए । हम कहँ रथ गज बाजि बनाए ॥
उत्तम सेवक बार - बार कहते हैं कि हे नाथ! आप घोड़ेपर सवार हो लीजिये । [ भरतजी जवाब देते हैं कि] श्रीरामचन्द्रजी तो पैदल ही गये और हमारे लिये रथ, हाथी और घोड़े बनाये गये हैं ॥३ ॥
सिर भर जाउँ उचित अस मोरा । सब तें सेवक धरमु कठोरा ॥
देखि भरत गति सुनि मृदु बानी । सब सेवक गन गरहिं गलानी ॥
मुझे उचित तो ऐसा है कि मैं सिरके बल चलकर जाऊँ । सेवकका धर्म सबसे कठिन होता है । भरतजीकी दशा देखकर और कोमल वाणी सुनकर सब सेवकगण ग्लानिके मारे गले जा रहे हैं ॥ ४ ॥
दो० – भरत तीसरे पहर कहँ कीन्ह प्रबेसु प्रयाग ।
कहत राम सिय राम सिय उमगि उमगि अनुराग ॥ २०३ ॥
प्रेममें उमँग - उमँगकर सीताराम-सीताराम कहते हुए भरतजीने तीसरे पहर प्रयागमें प्रवेश किया ॥ २०३ ॥
झलका झलकत पायन्ह कैसें । पंकज कोस ओस कन जैसें ॥
भरत पयादेहिं आए आजू । भयउ दुखित सुनि सकल समाजू ॥
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* ** अयोध्याकाण्ड ५१३
उनके चरणोंमें छाले कैसे चमकते हैं, जैसे कमलकी कलीपर ओसकी बूँदें चमकती हों ।
भरतजी आज पैदल ही चलकर आये हैं, यह समाचार सुनकर सारा समाज दुःखी हो गया ॥ १ ॥
खबरि लीन्ह सब लोग नहाए । कीन्ह प्रनामु त्रिबेनिहिं आए ॥
सबिधि सितासित नीर नहाने । दिए दान महिसुर सनमाने ॥
जब भरतजीने यह पता पा लिया कि सब लोग स्नान कर चुके, तब त्रिवेणीपर आकर उन्हें प्रणाम किया । फिर विधिपूर्वक [ गङ्गा- यमुनाके ] श्वेत और श्याम जलमें स्नान किया और दान देकर ब्राह्मणोंका सम्मान किया ॥ २ ॥
देखत स्यामल धवल हलोरे । पुलकि सरीर भरत कर जोरे ॥
सकल कामप्रद तीरथराऊ । बेद बिदित जग प्रगट प्रभाऊ ॥
श्याम और सफेद ( यमुनाजी और गङ्गाजीकी ) लहरोंको देखकर भरतजीका शरीर पुलकित हो उठा और उन्होंने हाथ जोड़कर कहा- हे तीर्थराज! आप समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाले हैं । आपका प्रभाव वेदोंमें प्रसिद्ध और संसारमें प्रकट है ॥ ३ ॥
मागउँ भीख त्यागि निज धरमू । आरत काह न करइ कुकरमू॥
अस जियँ जानि सुजान सुदानी । सफल करहिं जग जाचक बानी ॥
मैं अपना धर्म ( न माँगनेका क्षत्रियधर्म ) त्यागकर आपसे भीख माँगता हूँ। आर्त्त मनुष्य कौन-सा कुकर्म नहीं करता? ऐसा हृदयमें जानकर सुजान उत्तम दानी जगत्में माँगनेवालेकी वाणीको सफल किया करते हैं ( अर्थात् वह जो माँगता है, सो दे देते हैं ) ॥ ४ ॥
दो० – अरथ न धरम न काम रुचि गति न चहउँ निरबान ।
जनम जनम रति राम पद यह बरदानु न आन ॥२०४ ॥
मुझे न अर्थकी रुचि ( इच्छा) है, न धर्मकी, न कामकी और न मैं मोक्ष ही चाहता हूँ । जन्म -जन्ममें मेरा श्रीरामजीके चरणोंमें प्रेम हो, बस, यही वरदान माँगता हूँ, दूसरा कुछ नहीं ॥ २०४ ॥
जानहुँ रामु कुटिल करि मोही । लोग कहउ गुर साहिब द्रोही ॥
सीता राम चरन रति मोरें । अनुदिन बढ़उ अनुग्रह तोरें ॥
स्वयं श्रीरामचन्द्रजी भी भले ही मुझे कुटिल समझें और लोग मुझे गुरुद्रोही तथा स्वामिद्रोही भले ही कहें; पर श्रीसीतारामजीके चरणोंमें मेरा प्रेम आपकी कृपासे दिन-दिन बढ़ता ही रहे ॥१ ॥
जलदु जनम भरि सुरति बिसारउ । जाचत जलु पबि पाहन डारउ ॥
चातकु रटनि घटें घटि जाई । बढ़ें प्रेमु सब भाँति भलाई ॥
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* *५१४ रामचरितमानस मेघ चाहे जन्मभर चातककी सुधि भुला दे और जल माँगनेपर वह चाहे वज्र और पत्थर ( ओले ) ही गिरावे, पर चातककी रटन घटनेसे तो उसकी बात ही घट जायगी ( प्रतिष्ठा ही नष्ट हो जायगी ) । उसकी तो प्रेम बढ़नेमें ही सब तरहसे भलाई है ॥२ ॥
कनकहिं बान चढ़इ जिमि दाहें । तिमि प्रियतम पद नेम निबाहें ॥
भरत बचन सुनि माझ त्रिबेनी । भइ मृदु बानि सुमंगल देनी ॥
जैसे तपानेसे सोनेपर आब ( चमक ) आ जाती है, वैसे ही प्रियतमके चरणोंमें प्रेमका नियम निबाहनेसे प्रेमी सेवकका गौरव बढ़ जाता है । भरतजीके वचन सुनकर बीच त्रिवेणीमेंसे सुन्दर मङ्गल देनेवाली कोमल वाणी हुई ॥ ३ ॥
तात भरत तुम्ह सब बिधि साधू । राम चरन अनुराग अगाधू॥
बादि गलानि करहु मन माहीं । तुम्ह सम रामहि कोउ प्रिय नाहीं ॥
हे तात भरत! तुम सब प्रकारसे साधु हो । श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंमें तुम्हारा अथाह प्रेम है । तुम व्यर्थ ही मनमें ग्लानि कर रहे हो । श्रीरामचन्द्रको तुम्हारे समान प्रिय कोई नहीं है ॥४ ॥
दो० – तनु पुलकेउ हियँ हरषु सुनि बेनि बचन अनुकूल ।
भरत धन्य कहि धन्य सुर हरषित बरषहिं फूल ॥ २०५ ॥
त्रिवेणीजीके अनुकूल वचन सुनकर भरतजीका शरीर पुलकित हो गया, हृदयमें हर्ष छा गया ।
भरतजी धन्य हैं, धन्य हैं, कहकर देवता हर्षित होकर फूल बरसाने लगे ॥२०५ ॥
प्रमुदित तीरथराज निवासी । बैखानस बटु गृही उदासी ॥
कहहिं परसपर मिलि दस पाँचा । भरत सनेहु सीलु सुचि साँचा ॥
तीर्थराज प्रयागमें रहनेवाले वानप्रस्थ, ब्रह्मचारी, गृहस्थ और उदासीन ( संन्यासी ) सब बहुत ही आनन्दित हैं और दस - पाँच मिलकर आपसमें कहते हैं कि भरतजीका प्रेम और शील पवित्र और सच्चा है ॥ १ ॥
सुनत राम गुन ग्राम सुहाए । भरद्वाज मुनिबर पहिं आए ॥
दंड प्रनामु करत मुनि देखे । मूरतिमंत भाग्य निज लेखे ॥
श्रीरामचन्द्रजीके सुन्दर गुणसमूहोंको सुनते हुए वे मुनिश्रेष्ठ भरद्वाजजीके पास आये । मुनिने भरतजीको दण्डवत्- प्रणाम करते देखा और उन्हें अपना मूर्तिमान् सौभाग्य समझा ॥२ ॥
धाइ उठाइ लाइ उर लीन्हे । दीन्हि असीस कृतारथ कीन्हे ॥
आसनु दीन्ह नाइ सिरु बैठे । चहत सकुच गृहँ जनु भजि पैठे ॥
उन्होंने दौड़कर भरतजीको उठाकर हृदयसे लगा लिया और आशीर्वाद देकर कृतार्थ किया । मुनिने उन्हें आसन दिया । वे सिर नवाकर इस तरह बैठे मानो भागकर संकोचके घरमें घुस जाना चाहते हैं ॥ ३ ॥
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* ** अयोध्याकाण्ड ५१५
मुनि पूँछब कछु यह बड़ सोचू । बोले रिषि लखि सीलु सँकोचू॥
सुनहु भरत हम सब सुधि पाई । बिधि करतब पर किछु न बसाई ॥
उनके मनमें यह बड़ा सोच है कि मुनि कुछ पूछेंगे [ तो मैं क्या उत्तर दूँगा ] । भरतजीके शील और संकोचको देखकर ऋषि बोले- भरत! सुनो, हम सब खबर पा चुके हैं । विधाताके कर्तव्यपर कुछ वश नहीं चलता ॥४ ॥
दो० –- तुम्ह गलानि जियँ जनि करहु समुझि मातु करतूति ।
तात कैकइहि दोसु नहिं गई गिरा मति धूति ॥ २०६ ॥
माताकी करतूतको समझकर ( याद करके ) तुम हृदयमें ग्लानि मत करो । हे तात! कैकेयीका कोई दोष नहीं है, उसकी बुद्धि तो सरस्वती बिगाड़ गयी थी ॥ २०६ ॥
यहउ कहत भल कहिहि न कोऊ । लोकु बेदु बुध संमत दोऊ ॥
तात तुम्हार बिमल जसु गाई । पाइहि लोकउ बेदु बड़ाई ॥
यह कहते भी कोई भला न कहेगा, क्योंकि लोक और वेद दोनों ही विद्वानोंको मान्य है ।
किन्तु हे तात! तुम्हारा निर्मल यश गाकर तो लोक और वेद दोनों बड़ाई पावेंगे ॥१ ॥
लोक बेद संमत सबु कहई । जेहि पितु देइ राजु सो लहई ॥
राउ सत्यब्रत तुम्हहि बोलाई । देत राजु सुखु धरमु बड़ाई ॥
यह लोक और वेद दोनोंको मान्य है और सब यही कहते हैं कि पिता जिसको राज्य दे वही पाता है । राजा सत्यव्रती थे; तुमको बुलाकर राज्य देते, तो सुख मिलता, धर्म रहता और बड़ाई होती ॥२ ॥
राम गवनु बन अनरथ मूला । जो सुनि सकल बिस्व भइ सूला ॥
सो भावी बस रानि अयानी । करि कुचालि अंतहुँ पछितानी ॥
सारे अनर्थकी जड़ तो श्रीरामचन्द्रजीका वनगमन है, जिसे सुनकर समस्त संसारको पीड़ा हुई । वह श्रीरामका वनगमन भी भावीवश हुआ । बेसमझ रानी तो भावीवश कुचाल करके अन्तमें पछतायी ॥ ३ ॥
तहँउँ तुम्हार अलप अपराधू । कहै सो अधम अयान असाधू ॥
करतेहु राजु त तुम्हहि न दोषू ॥ रामहि होत सुनत संतोषू॥
उसमें भी तुम्हारा कोई तनिक-सा भी अपराध कहे, तो वह अधम, अज्ञानी और असाधु है । यदि तुम राज्य करते तो भी तुम्हें दोष न होता । सुनकर श्रीरामचन्द्रजीको भी सन्तोष ही होता ॥ ४ ॥
दो० – अब अति कीन्हेहु भरत भल तुम्हहि उचित मत एहु ।
सकल सुमंगल मूल जग रघुबर चरन सनेहु ॥ २०७ ॥
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* * ५१६ रामचरितमानस हे भरत! अब तो तुमने बहुत ही अच्छा किया; यही मत तुम्हारे लिये उचित था । श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंमें प्रेम होना ही संसारमें समस्त सुन्दर मङ्गलोंका मूल है ॥ २०७ ॥
सो तुम्हार धनु जीवनु प्राना । भूरिभाग को तुम्हहि समाना ॥
यह तुम्हार आचरजु न ताता । दसरथ सुअन राम प्रिय भ्राता ॥
सो वह ( श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंका प्रेम) तो तुम्हारा धन, जीवन और प्राण ही है; तुम्हारे समान बड़भागी कौन है? हे तात! तुम्हारे लिये यह आश्चर्यकी बात नहीं है । क्योंकि तुम दशरथजीके पुत्र और श्रीरामचन्द्रजीके प्यारे भाई हो ॥ १ ॥
सुनहु भरत रघुबर मन माहीं । पेम पात्रु तुम्ह सम कोउ नाहीं ॥
लखन राम सीतहि अति प्रीती । निसि सब तुम्हहि सराहत बीती ॥
हे भरत! सुनो, श्रीरामचन्द्रजीके मनमें तुम्हारे समान प्रेमपात्र दूसरा कोई नहीं है । लक्ष्मणजी, श्रीरामजी और सीताजी तीनोंको सारी रात उस दिन अत्यन्त प्रेमके साथ तुम्हारी सराहना करते ही बीती ॥२ ॥
जाना मरमु नहात प्रयागा । मगन होहिं तुम्हरें अनुरागा ॥
तुम्ह पर अस सनेहु रघुबर कें । सुख जीवन जग जस जड़ नर कें ॥
प्रयागराजमें जब वे स्नान कर रहे थे, उस समय मैंने उनका यह मर्म जाना । वे तुम्हारे प्रेममें मग्न हो रहे थे । तुमपर श्रीरामचन्द्रजीका ऐसा ही ( अगाध ) स्नेह है जैसा मूर्ख ( विषयासक्त ) मनुष्यका संसारमें सुखमय जीवनपर होता है ॥३ ॥
यह न अधिक रघुबीर बड़ाई । प्रनत कुटुंब पाल रघुराई ॥
तुम्ह तौ भरत मोर मत एहू । धरें देह जनु राम सनेहू ॥
यह श्रीरघुनाथजीकी बहुत बड़ाई नहीं है । क्योंकि श्रीरघुनाथजी तो शरणागतके कुटुम्बभरको पालनेवाले हैं । हे भरत! मेरा यह मत है कि तुम तो मानो शरीरधारी श्रीरामजीके प्रेम ही हो ॥४ ॥
दो० — तुम्ह कहँ भरत कलंक यह हम सब कहँ उपदेसु ।
राम भगति रस सिद्धि हित भा यह समउ गनेसु ॥ २०८ ॥
हे भरत! तुम्हारे लिये ( तुम्हारी समझमें ) यह कलङ्क है, पर हम सबके लिये तो उपदेश है । श्रीरामभक्तिरूपी रसकी सिद्धिके लिये यह समय गणेश ( बड़ा शुभ) हुआ है ॥ २०८ ॥
नव बिधु बिमल तात जसु तोरा । रघुबर किंकर कुमुद चकोरा ॥
उदित सदा अँथइहि कबहूँ ना । घटिहि न जग नभ दिन दिन दूना ॥
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* ** अयोध्याकाण्ड ५१७ हे तात! तुम्हारा यश निर्मल नवीन चन्द्रमा है और श्रीरामचन्द्रजीके दास कुमुद और चकोर हैं [ वह चन्द्रमा तो प्रतिदिन अस्त होता और घटता है, जिससे कुमुद और चकोरको दुःख होता है ]; परन्तु यह तुम्हारा यशरूपी चन्द्रमा सदा उदय रहेगा; कभी अस्त होगा ही नहीं । जगद्रूपी आकाशमें यह घटेगा नहीं, वरं दिन-दिन दूना होगा ॥ १ ॥
कोक तिलोक प्रीति अति करिही । प्रभु प्रताप रबि छबिहि न हरिही ॥
निसि दिन सुखद सदा सब काहू । ग्रसिहि न कैकई करतबु राहू ॥
त्रैलोक्यरूपी चकवा इस यशरूपी चन्द्रमापर अत्यन्त प्रेम करेगा और प्रभु श्रीरामचन्द्रजीका प्रतापरूपी सूर्य इसकी छविको हरण नहीं करेगा । यह चन्द्रमा रात -दिन सदा सब किसीको सुख देनेवाला होगा । कैकेयीका कुकर्मरूपी राहु इसे ग्रास नहीं करेगा ॥२ ॥
पूरन राम सुपेम पियूषा । गुर अवमान दोष नहिं दूषा ॥
रामभगत अब अमिअँ अघाहूँ । कीन्हेहु सुलभ सुधा बसुधाहूँ ॥
यह चन्द्रमा श्रीरामचन्द्रजीके सुन्दर प्रेमरूपी अमृतसे पूर्ण है । यह गुरुके अपमानरूपी दोषसे दूषित नहीं है । तुमने इस यशरूपी चन्द्रमाकी सृष्टि करके पृथ्वीपर भी अमृतको सुलभ कर दिया । अब श्रीरामजीके भक्त इस अमृतसे तृप्त हो लें ॥३ ॥
भूप भगीरथ सुरसरि आनी । सुमिरत सकल सुमंगल खानी ॥
दसरथ गुन गन बरनि न जाहीं । अधिकु कहा जेहि सम जग नाहीं ॥
राजा भगीरथ गङ्गाजीको लाये, जिन ( गङ्गाजी ) का स्मरण ही सम्पूर्ण सुन्दर मङ्गलोंकी खान है । दशरथजीके गुणसमूहोंका तो वर्णन ही नहीं किया जा सकता; अधिक क्या, जिनकी बराबरीका जगत्में कोई नहीं है ॥ ४ ॥
दो० -जासु सनेह सकोच बस राम प्रगट भए आइ ।
जे हर हिय नयननि कबहुँ निरखे नहीं अघाइ ॥ २० ९ ॥
जिनके प्रेम और संकोच ( शील) के वशमें होकर स्वयं [ सच्चिदानन्दघन ] भगवान् श्रीराम आकर प्रकट हुए, जिन्हें श्रीमहादेवजी अपने हृदयके नेत्रोंसे कभी अघाकर नहीं देख पाये ( अर्थात् जिनका स्वरूप हृदयमें देखते -देखते शिवजी कभी तृप्त नहीं हुए) ॥ २० ९ ॥
कीरति बिधु तुम्ह कीन्ह अनूपा । जहँ बस राम पेम मृगरूपा ॥
तात गलानि करहु जियँ जाएँ । डरहु दरिद्रहि पारसु पाएँ ॥
[ परन्तु उनसे भी बढ़कर ] तुमने कीर्तिरूपी अनुपम चन्द्रमाको उत्पन्न किया, जिसमें श्रीरामप्रेम ही हिरनके [ चिह्नके ] रूपमें बसता है । हे तात! तुम व्यर्थ ही हृदयमें ग्लानि कर रहे हो । पारस पाकर भी तुम दरिद्रतासे डर रहे हो! ॥१ ॥
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* *५१८ रामचरितमानस
सुनहु भरत हम झूठ न कहहीं । उदासीन तापस बन रहहीं ॥
सब साधन कर सुफल सुहावा । लखन राम सिय दरसनु पावा ॥
हे भरत! सुनो, हम झूठ नहीं कहते । हम उदासीन हैं ( किसीका पक्ष नहीं करते ), तपस्वी हैं ( किसीकी मुँहदेखी नहीं कहते ) और वनमें रहते हैं ( किसीसे कुछ प्रयोजन नहीं रखते) । सब साधनोंका उत्तम फल हमें लक्ष्मणजी, श्रीरामजी और सीताजीका दर्शन प्राप्त हुआ ॥ २ ॥
तेहि फल कर फलु दरस तुम्हारा । सहित पयाग सुभाग हमारा ॥
भरत धन्य तुम्ह जसु जगु जयऊ । कहि अस पेम मगन मुनि भयऊ ॥
[ सीता - लक्ष्मणसहित श्रीरामदर्शनरूप] उस महान् फलका परम फल यह तुम्हारा दर्शन है । प्रयागराजसमेत हमारा बड़ा भाग्य है । हे भरत! तुम धन्य हो, तुमने अपने यशसे जगत्को जीत लिया है । ऐसा कहकर मुनि प्रेममें मग्न हो गये ॥ ३ ॥
सुनि मुनि बचन सभासद हरषे । साधु सराहि सुमन सुर बरवे ॥
धन्य धन्य धुनि गगन पयागा । सुनि सुनि भरतु मगन अनुरागा ॥
भरद्वाज मुनिके वचन सुनकर सभासद् हर्षित हो गये । ' साधु-साधु ' कहकर सराहना करते हुए देवताओंने फूल बरसाये । आकाशमें और प्रयागराजमें ' धन्य, धन्य ' की ध्वनि सुन- सुनकर भरतजी प्रेममें मग्न हो रहे हैं ॥४ ॥
दो० – पुलक गात हियँ रामु सिय सजल सरोरुह नैन ।
करि प्रनामु मुनि मंडलिहि बोले गदगद बैन ॥२१० ॥
भरतजीका शरीर पुलकित है, हृदयमें श्रीसीतारामजी हैं और कमलके समान नेत्र [ प्रेमाश्रुके ] जलसे भरे हैं । वे मुनियोंकी मण्डलीको प्रणाम करके गद्गद वचन बोले— ॥ २१० ॥
मुनि समाजु अरु तीरथराजू । साँचिहुँ सपथ अघाइ अकाजू॥
एहिं थल जौं किछु कहिअ बनाई । एहि सम अधिक न अघ अधमाई ॥
मुनियोंका समाज है और फिर तीर्थराज है । यहाँ सच्ची सौगंध खानेसे भी भरपूर हानि होती है । इस स्थानमें यदि कुछ बनाकर कहा जाय, तो इसके समान कोई बड़ा पाप और नीचता न होगी ॥ १ ॥
तुम्ह सर्बग्य कहउँ सतिभाऊ । उर अंतरजामी रघुराऊ ॥
मोहि न मातु करतब कर सोचू । नहिं दुखु जियँ जगु जानिहि पोचू ॥
मैं सच्चे भावसे कहता हूँ । आप सर्वज्ञ हैं, और श्रीरघुनाथजी हृदयके भीतरकी जाननेवाले हैं ( मैं कुछ भी असत्य कहूँगा तो आपसे और उनसे छिपा नहीं रह सकता) । मुझे माता कैकेयीकी करनीका कुछ भी सोच नहीं है । और न मेरे मनमें इसी बातका दुःख है कि जगत् मुझे नीच समझेगा ॥ २ ॥