श्रीरामचरितमानस — पृष्ठ 521–530

श्रीरामचरितमानस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 521–530

पृष्ठ 521

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* ** अयोध्याकाण्ड ५१ ९

नाहिन डरु बिगरिहि परलोकू । पितहु मरन कर मोहि न सोकू ॥

सुकृत सुजस भरि भुअन सुहाए । लछिमन राम सरिस सुत पाए ॥

न यही डर है कि मेरा परलोक बिगड़ जायगा और न पिताजीके मरनेका ही मुझे शोक है । क्योंकि उनका सुन्दर पुण्य और सुयश विश्वभरमें सुशोभित है । उन्होंने श्रीराम- लक्ष्मण- सरीखे पुत्र पाये ॥३ ॥

राम बिरहँ तजि तनु छ्नभंगू । भूप सोच कर कवन प्रसंगू॥

राम लखन सिय बिनु पग पनहीं । करि मुनि बेष फिरहिं बन बनहीं ॥

फिर जिन्होंने श्रीरामचन्द्रजीके विरहमें अपने क्षणभङ्गुर शरीरको त्याग दिया, ऐसे राजाके लिये सोच करनेका कौन प्रसंग है? [ सोच इसी बातका है कि ] श्रीरामजी, लक्ष्मणजी और सीताजी पैरोंमें बिना जूतीके मुनियोंका वेष बनाये वन-वनमें फिरते हैं ॥ ४ ॥

दो० – अजिन बसन फल असन महि सयन डासि कुस पात ।

बसि तरु तर नित सहत हिम आतप बरषा बात ॥ २११ ॥

वे वल्कल वस्त्र पहनते हैं, फलोंका भोजन करते हैं, पृथ्वीपर कुश और पत्ते बिछाकर सोते हैं और वृक्षोंके नीचे निवास करके नित्य सर्दी, गर्मी, वर्षा और हवा सहते हैं ॥ २११ ॥

एहि दुख दाहँ दहइ दिन छाती । भूख न बासर नीद न राती ॥

एहि कुरोग कर औषधु नाहीं । सोधेउँ सकल बिस्व मन माहीं ॥

इसी दुःखकी जलनसे निरन्तर मेरी छाती जलती रहती है । मुझे न दिनमें भूख लगती है, न रातको नींद आती है । मैंने मन-ही--मन समस्त विश्वको खोज डाला, पर इस कुरोगकी औषध कहीं नहीं है ॥१ ॥

मातु कुमत बढ़ई अघ मूला । तेहिं हमार हित कीन्ह बँसूला ॥

कलि कुकाठ कर कीन्ह कुजं । गाड़ि अवधि पढ़ि कठिन कुमंत्र ॥

माताका कुमत ( बुरा विचार ) पापोंका मूल बढ़ई है । उसने हमारे हितका बसूला बनाया । उससे कलहरूपी कुकाठका कुयन्त्र बनाया और चौदह वर्षकी अवधिरूपी कठिन कुमन्त्र पढ़कर उस यन्त्रको गाड़ दिया । [ यहाँ माताका कुविचार बढ़ई है, भरतको राज्य बसूला है, रामका वनवास कुयन्त्र है और चौदह वर्षकी अवधि कुमन्त्र है ] ॥ २ ॥

मोहि लगि यहु कुठाटु तेहिं ठाटा । घालेसि सब जगु बारहबाटा ॥

मिटइ कुजोगु राम फिरि आएँ । बसइ अवध नहिं आन उपाएँ ॥

पृष्ठ 522

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* *५२० रामचरितमानस मेरे लिये उसने यह सारा कुठाट ( बुरा साज ) रचा और सारे जगत्को बारहबाट ( छिन्न- भिन्न ) करके नष्ट कर डाला । यह कुयोग श्रीरामचन्द्रजीके लौट आनेपर ही मिट सकता है और तभी अयोध्या बस सकती है, दूसरे किसी उपायसे नहीं ॥ ३ ॥

भरत बचन सुनि मुनि सुखु पाई । सबहिं कीन्हि बहु भाँति बड़ाई ।

तात करहु जनि सोचु बिसेषी । सब दुखु मिटिहि राम पग देखी ॥

भरतजीके वचन सुनकर मुनिने सुख पाया और सभीने उनकी बहुत प्रकारसे बड़ाई की । [ मुनिने कहा— ] हे तात! अधिक सोच मत करो । श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंका दर्शन करते ही सारा दुःख मिट जायगा ॥ ४ ॥

दो० - करि प्रबोधु मुनिबर कहेउ अतिथि पेमप्रिय होहु ।

कंद मूल फल फूल हम देहिं लेहु करि छोहु ॥ २१२ ॥

इस प्रकार मुनिश्रेष्ठ भरद्वाजजीने उनका समाधान करके कहा- अब आपलोग हमारे प्रेमप्रिय अतिथि बनिये और कृपा करके कन्द- मूल, फल-फूल जो कुछ हम दें, स्वीकार कीजिये ॥ २१२ ॥

सुनि मुनि बचन भरत हियँ सोचू । भयउ कुअवसर कठिन सँकोचू॥

जानि गरुड़ गुर गिरा बहोरी । चरन बंदि बोले कर जोरी ॥

मुनिके वचन सुनकर भरतके हृदयमें सोच हुआ कि यह बेमौके बड़ा बेढब संकोच आ पड़ा! फिर गुरुजनोंकी वाणीको महत्त्वपूर्ण ( आदरणीय ) समझकर, चरणोंकी वन्दना करके हाथ जोड़कर बोले—॥१ ॥

सिर धरि आयसु करिअ तुम्हारा । परम धरम यहु नाथ हमारा ॥

भरत बचन मुनिबर मन भाए । सुचि सेवक सिष निकट बोलाए ॥

हे नाथ! आपकी आज्ञाको सिर चढ़ाकर उसका पालन करना, यह हमारा परम धर्म है । भरतजीके ये वचन मुनिश्रेष्ठके मनको अच्छे लगे । उन्होंने विश्वासपात्र सेवकों और शिष्योंको पास बुलाया ॥ २ ॥

चाहिअ कीन्हि भरत पहुनाई । कंद मूल फल आनहु जाई ॥

भलेहिं नाथ कहि तिन्ह सिर नाए । प्रमुदित निज निज काज सिधाए ॥

[ और कहा कि ] भरतकी पहुनई करनी चाहिये । जाकर कन्द, मूल और फल लाओ । उन्होंने ' हे नाथ! बहुत अच्छा ' कहकर सिर नवाया और तब वे बड़े आनन्दित होकर अपने - अपने कामको चल दिये ॥३ ॥

मुनिहि सोच पाहुन बड़ नेवता । तसि पूजा चाहिअ जस देवता ॥

सुनि रिधि सिधि अनिमादिक आईं । आयसु होइ सो करहिं गोसाईं ॥

पृष्ठ 523

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* ** अयोध्याकाण्ड ५२१ मुनिको चिन्ता हुई कि हमने बहुत बड़े मेहमानको न्योता है । अब जैसा देवता हो, वैसी ही उसकी पूजा भी होनी चाहिये । यह सुनकर ऋद्धियाँ और अणिमादि सिद्धियाँ आ गयीं [ और बोलीं- ] हे गोसाईं! जो आपकी आज्ञा हो सो हम करें ॥ ४ ॥

दो० - राम बिरह ब्याकुल भरतु सानुज सहित समाज ।

पहुनाई करि हरहु श्रम कहा मुदित मुनिराज ॥ २१३ ॥

मुनिराजने प्रसन्न होकर कहा-छोटे भाई शत्रुघ्न और समाजसहित भरतजी श्रीरामचन्द्रजीके विरहमें व्याकुल हैं, इनकी पहुनाई ( आतिथ्य - सत्कार) करके इनके श्रमको दूर करो ॥ २१३ ॥

रिधि सिधि सिर धरि मुनिबर बानी । बड़भागिनि आपुहि अनुमानी ॥

कहहिं परसपर सिधि समुदाई । अतुलित अतिथि राम लघु भाई ॥

ऋद्धि- सिद्धिने मुनिराजकी आज्ञाको सिर चढ़ाकर अपनेको बड़भागिनी समझा । सब सिद्धियाँ आपसमें कहने लगीं— श्रीरामचन्द्रजीके छोटे भाई भरत ऐसे अतिथि हैं, जिनकी तुलनामें कोई नहीं आ सकता ॥ १ ॥

मुनि पद बंदि करिअ सोइ आजू । होइ सुखी सब राज समाजू॥

अस कहि रचेउ रुचिर गृह नाना । जेहि बिलोकि बिलखाहिं बिमाना ॥

अतः मुनिके चरणोंकी वन्दना करके आज वही करना चाहिये जिससे सारा राज- समाज सुखी हो । ऐसा कहकर उन्होंने बहुत-से सुन्दर घर बनाये, जिन्हें देखकर विमान भी विलखते हैं ( लजा जाते हैं ) ॥२ ॥

भोग बिभूति भूरि भरि राखे । देखत जिन्हहि अमर अभिलाषे ॥

दासी दास साजु सब लीन्हें । जोगवत रहहिं मनहि मनु दीन्हें ॥

उन घरोंमें बहुत - से भोग ( इन्द्रियोंके विषय) और ऐश्वर्य ( ठाट- बाट ) का सामान भरकर रख दिया, जिन्हें देखकर देवता भी ललचा गये । दासी-दास सब प्रकारकी सामग्री लिये हुए मन लगाकर उनके मनोंको देखते रहते हैं ( अर्थात् उनके मनकी रुचिके अनुसार करते रहते हैं ) ॥ ३ ॥

सब समाजु सजि सिधि पल माहीं । जे सुख सुरपुर सपनेहुँ नाहीं ॥

प्रथमहिं बास दिए सब केही । सुंदर सुखद जथा रुचि जेही ॥

जो सुखके सामान स्वर्गमें भी स्वप्नमें भी नहीं हैं ऐसे सब सामान सिद्धियोंने पलभरमें सज दिये । पहले तो उन्होंने सब किसीको, जिसकी जैसी रुचि थी वैसे ही, सुन्दर सुखदायक निवासस्थान दिये ॥ ४ ॥

दो० - बहुरि सपरिजन भरत कहुँ रिषि अस आयसु दीन्ह ।

बिधि बिसमय दायकु बिभव मुनिबर तपबल कीन्ह ॥ २१४ ॥

पृष्ठ 524

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* *५२२ रामचरितमानस और फिर कुटुम्बसहित भरतजीको दिये, क्योंकि ऋषि भरद्वाजजीने ऐसी ही आज्ञा दे रखी थी । [ भरतजी चाहते थे कि उनके सब संगियोंको आराम मिले, इसलिये उनके मनकी बात जानकर मुनिने पहले उन लोगोंको स्थान देकर पीछे सपरिवार भरतजीको स्थान देनेके लिये आज्ञा दी थी । ] मुनिश्रेष्ठने तपोबलसे ब्रह्माको भी चकित कर देनेवाला वैभव रच दिया ॥ २१४ ॥

मुनि प्रभाउ जब भरत बिलोका । सब लघु लगे लोकपति लोका ॥

सुख समाजु नहिं जाइ बखानी । देखत बिरति बिसारहिं ग्यानी ॥

जब भरतजीने मुनिके प्रभावको देखा तो उसके सामने उन्हें [ इन्द्र, वरुण, यम, कुबेर आदि ] सभी लोकपालोंके लोक तुच्छ जान पड़े । सुखकी सामग्रीका वर्णन नहीं हो सकता, जिसे देखकर ज्ञानीलोग भी वैराग्य भूल जाते हैं ॥ १ ॥

आसन सयन सुबसन बिताना । बन बाटिका बिहग मृग नाना ॥

सुरभि फूल फल अमिअ समाना । बिमल जलासय बिबिध बिधाना ॥

आसन, सेज, सुन्दर वस्त्र, चँदोवे, वन, बगीचे, भाँति- भाँतिके पक्षी और पशु, सुगन्धित फूल और अमृतके समान स्वादिष्ट फल, अनेकों प्रकारके ( तालाब, कुएँ, बावली आदि ) निर्मल जलाशय, ॥ २ ॥

असन पान सुचि अमिअ अमी से । देखि लोग सकुचात जमी से ॥

सुर सुरभी सुरतरु सबही कें । लखि अभिलाषु सुरेस सची कें ॥

तथा अमृतके भी अमृत- सरीखे पवित्र खान-पानके पदार्थ थे, जिन्हें देखकर सब लोग संयमी पुरुषों ( विरक्त मुनियों ) की भाँति सकुचा रहे हैं । सभीके डेरोंमें [ मनोवाञ्छित वस्तु देनेवाले ] कामधेनु और कल्पवृक्ष हैं, जिन्हें देखकर इन्द्र और इन्द्राणीको भी अभिलाषा होती है ( उनका भी मन ललचा जाता है ) ॥ ३ ॥

रितु बसंत बह त्रिबिध बयारी । सब कहँ सुलभ पदारथ चारी ॥

स्त्रक चंदन बनितादिक भोगा । देखि हरष बिसमय बस लोगा ॥

वसन्त ऋतु है । शीतल, मन्द, सुगन्ध तीन प्रकारकी हवा बह रही है । सभीको [ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष] चारों पदार्थ सुलभ हैं । माला, चन्दन, स्त्री आदिक भोगोंको देखकर सब लोग हर्ष और विषादके वश हो रहे हैं । [ हर्ष तो भोग- सामग्रियोंको और मुनिके तप: प्रभावको देखकर होता है और विषाद इस बातसे होता है कि श्रीरामके वियोगमें नियम -व्रतसे रहनेवाले हमलोग भोग -विलासमें क्यों आ फँसे; कहीं इनमें आसक्त होकर हमारा मन नियम-व्रतोंको न त्याग दे] ॥४ ॥

दो० – संपति चकई भरतु चक मुनि आयस खेलवार ।

तेहि निसि आश्रम पिंजराँ राखे भा भिनुसार ॥ २१५ ॥

पृष्ठ 525

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* * अयोध्याकाण्ड ५२३ सम्पत्ति ( भोग- विलासकी सामग्री ) चकवी है और भरतजी चकवा हैं और मुनिकी आज्ञा खेल है, जिसने उस रातको आश्रमरूपी पिंजड़े में दोनोंको बंद कर रखा और ऐसे ही सबेरा हो गया । [ जैसे किसी बहेलियेके द्वारा एक पिंजड़े में रखे जानेपर भी चकवी -चकवेका रातको संयोग नहीं होता, वैसे ही भरद्वाजजीकी आज्ञासे रातभर भोग-सामग्रियोंके साथ रहनेपर भी भरतजीने मनसे

भी उनका स्पर्शतक नहीं किया । ] ॥ २१५ ॥

मासपारायण, उन्नीसवाँ विश्राम

कीन्ह निमज्जनु तीरथराजा । नाइ मुनिहि सिरु सहित समाजा ॥

रिषि आयसु असीस सिर राखी । करि दंडवत बिनय बहु भाषी ॥

[प्रात: काल ] भरतजीने तीर्थराजमें स्नान किया और समाजसहित मुनिको सिर नवाकर और ऋषिकी आज्ञा तथा आशीर्वादको सिर चढ़ाकर दण्डवत् करके बहुत विनती की ॥१ ॥

पथ गति कुसल साथ सब लीन्हें । चले चित्रकूटहिं चितु दीन्हें ॥

रामसखा कर दीन्हें लागू । चलत देह धरि जनु अनुरागू ॥

तदनन्तर रास्तेकी पहचान रखनेवाले लोगों ( कुशल पथप्रदर्शकों ) के साथ सब लोगोंको लिये हुए भरतजी चित्रकूटमें चित्त लगाये चले । भरतजी रामसखा गुहके हाथमें हाथ दिये हुए ऐसे जा रहे हैं, मानो साक्षात् प्रेम ही शरीर धारण किये हुए हो ॥ २ ॥

नहिं पद त्रान सीस नहिं छाया । पेमु नेमु ब्रतु धरमु अमाया ॥

लखन राम सिय पंथ कहानी । पूँछत सखहि कहत मृदु बानी ॥

न तो उनके पैरोंमें जूते हैं और न सिरपर छाया है । उनका प्रेम, नियम, व्रत और धर्म निष्कपट ( सच्चा ) है । वे सखा निषादराजसे लक्ष्मणजी, श्रीरामचन्द्रजी और सीताजीके रास्तेकी बातें पूछते हैं, और वह कोमल वाणीसे कहता है ॥३ ॥

राम बास थल बिटप बिलोकें । उर अनुराग रहत नहिं रोकें ॥

देखि दसा सुर बरिसहिं फूला । भइ मृदु महि मगु मंगल मूला ॥

श्रीरामचन्द्रजीके ठहरनेकी जगहों और वृक्षोंको देखकर उनके हृदयमें प्रेम रोके नहीं रुकता । भरतजीकी यह दशा देखकर देवता फूल बरसाने लगे । पृथ्वी कोमल हो गयी और मार्ग मङ्गलका मूल बन गया॥४ ॥

दो० – किएँ जाहिं छाया जलद सुखद बहइ बर बात ।

तस मगु भयउ न राम कहँ जस भा भरतहिजात ॥ २१६ ॥

बादल छाया किये जा रहे हैं, सुख देनेवाली सुन्दर हवा बह रही है । भरतजीके जाते समय मार्ग जैसा सुखदायक हुआ, वैसा श्रीरामचन्द्रजीको भी नहीं हुआ था ॥२१६ ॥

पृष्ठ 526

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* *५२४ रामचरितमानस

जड़ चेतन मग जीव घनेरे । जे चितए प्रभु जिन्ह प्रभु हेरे ॥

ते सब भए परम पद जोगू । भरत दरस मेटा भव रोगू॥

रास्तेमें असंख्य जड़ - चेतन जीव थे । उनमेंसे जिनको प्रभु श्रीरामचन्द्रजीने देखा, अथवा जिन्होंने प्रभु श्रीरामचन्द्रजीको देखा वे सब [उसी समय ] परमपदके अधिकारी हो गये । परन्तु अब भरतजीके दर्शनने तो उनका भव ( जन्म- मरण) -रूपी रोग मिटा ही दिया । [ श्रीरामदर्शनसे तो वे परमपदके अधिकारी ही हुए थे, परन्तु भरतदर्शनसे उन्हें वह परमपद प्राप्त हो गया ] ॥ १ ॥

यह बड़ि बात भरत कइ नाहीं । सुमिरत जिनहि रामु मन माहीं ॥

बारक राम कहत जग जेऊ । होत तरन तारन नर तेऊ ॥

भरतजीके लिये यह कोई बड़ी बात नहीं है, जिन्हें श्रीरामजी स्वयं अपने मनमें स्मरण करते रहते हैं । जगत्में जो भी मनुष्य एक बार ' राम ' कह लेते हैं, वे भी तरने - तारनेवाले हो जाते हैं! ॥२ ॥

भरतु राम प्रिय पुनि लघु भ्राता । कस न होइ मगु मंगलदाता ॥

सिद्ध साधु मुनिबर अस कहहीं । भरतहि निरखि हरषु हियँ लहहीं ॥

फिर भरतजी तो श्रीरामचन्द्रजीके प्यारे तथा उनके छोटे भाई ठहरे । तब भला उनके लिये मार्ग मङ्गल ( सुख ) दायक कैसे न हो? सिद्ध, साधु और श्रेष्ठ मुनि ऐसा कह रहे हैं और भरतजीको देखकर हृदयमें हर्ष- लाभ करते हैं ॥ ३ ॥

देखि प्रभाउ सुरेसहि सोचू । जगु भल भलेहि पोच कहुँ पोचू॥

गुर सन कहेउ करिअ प्रभु सोई । रामहि भरतहि भेट न होई ॥

भरतजीके [इस प्रेमके ] प्रभावको देखकर देवराज इन्द्रको सोच हो गया [कि कहीं इनके प्रेमवश श्रीरामजी लौट न जायँ और हमारा बना-बनाया काम बिगड़ जाय ] | संसार भलेके लिये भला और बुरेके लिये बुरा है ( मनुष्य जैसा आप होता है जगत् उसे वैसा ही दीखता है ) । उसने गुरु बृहस्पतिजीसे कहा- हे प्रभो! वही उपाय कीजिये जिससे श्रीरामचन्द्रजी और भरतजीकी भेंट ही न हो ॥४ ॥

दो० - रामु सँकोची प्रेम बस भरत सपेम पयोधि ।

बनी बात बेगरन चहति करिअ जतनु छलु सोधि ॥ २१७ ॥

श्रीरामचन्द्रजी संकोची और प्रेमके वश हैं और भरतजी प्रेमके समुद्र हैं । बनी - बनायी बात बिगड़ना चाहती है, इसलिये कुछ छल ढूँढ़कर इसका उपाय कीजिये ॥ २१७ ॥

बचन सुनत सुरगुरु मुसुकाने । सहसनयन बिनु लोचन जाने ॥

मायापति सेवक सन माया । करइ त उलटि परइ सुरराया ॥

पृष्ठ 527

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* * अयोध्याकाण्ड ५२५ इन्द्रके वचन सुनते ही देवगुरु बृहस्पतिजी मुसकराये । उन्होंने हजार नेत्रोंवाले इन्द्रको [ ज्ञानरूपी ] नेत्रोंसे रहित ( मूर्ख ) समझा और कहा- हे देवराज! मायाके स्वामी श्रीरामचन्द्रजीके सेवकके साथ कोई माया करता है तो वह उलटकर अपने ही ऊपर आ पड़ती है ॥१ ॥

तब किछु कीन्ह राम रुख जानी । अब कुचालि करि होइहि हानी ॥

सुनु सुरेस रघुनाथ सुभाऊ । निज अपराध रिसाहिं न काऊ ॥

उस समय ( पिछली बार ) तो श्रीरामचन्द्रजीका रुख जानकर कुछ किया था । परन्तु इस समय कुचाल करनेसे हानि ही होगी । हे देवराज! श्रीरघुनाथजीका स्वभाव सुनो, वे अपने प्रति किये हुए अपराधसे कभी रुष्ट नहीं होते ॥ २ ॥

जो अपराधु भगत कर करई । राम रोष पावक सो जरई ॥

लोकहुँ बेद बिदित इतिहासा । यह महिमा जानहिं दुरबासा ॥

पर जो कोई उनके भक्तका अपराध करता है, वह श्रीरामकी क्रोधाग्निमें जल जाता है । लोक और वेद दोनोंमें इतिहास ( कथा ) प्रसिद्ध है । इस महिमाको दुर्वासाजी जानते हैं ॥ ३ ॥

भरत सरिस को राम सनेही । जगु जप राम रामु जप जेही ॥

सारा जगत् श्रीरामको जपता है, वे श्रीरामजी जिनको जपते हैं उन भरतजीके समान श्रीरामचन्द्रजीका प्रेमी कौन होगा? ॥ ४ ॥

दो० – मनहुँ न आनिअ अमरपति रघुबर भगत अकाजु ।

अजसु लोक परलोक दुख दिन दिन सोक समाजु ॥ २१८ ॥

हे देवराज! रघुकुलश्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजीके भक्तका काम बिगाड़नेकी बात मनमें भी न लाइये । ऐसा करनेसे लोकमें अपयश और परलोकमें दुःख होगा और शोकका सामान दिनोंदिन बढ़ता ही चला जायगा ॥ २१८ ॥

सुनु सुरेस उपदेसु हमारा । रामहि सेवकु परम पिआरा ॥

मानत सुखु सेवक सेवकाईं । सेवक बैर बैरु अधिकाई ॥

हे देवराज! हमारा उपदेश सुनो । श्रीरामजीको अपना सेवक परम प्रिय है । वे अपने सेवककी सेवासे सुख मानते हैं और सेवकके साथ वैर करनेसे बड़ा भारी वैर मानते हैं ॥१ ॥

जद्यपि सम नहिं राग न रोषू । गहहिं न पाप पूनु गुन दोषू॥

करम प्रधान बिस्व करि राखा । जो जस करइ सो तस फल चाखा ॥

यद्यपि वे सम हैं — उनमें न राग है, न रोष है । और न वे किसीका पाप- पुण्य और गुण-दोष ही ग्रहण करते हैं । उन्होंने विश्वमें कर्मको ही प्रधान कर रखा है । जो जैसा करता है, वह वैसा ही फल भोगता है ॥२ ॥

पृष्ठ 528

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* *५२६ रामचरितमानस

तदपि करहिं सम बिषम बिहारा । भगत अभगत हृदय अनुसारा ॥

अगुन अलेप अमान एकरस । रामु सगुन भए भगत पेम बस ॥

तथापि वे भक्त और अभक्तके हृदयके अनुसार सम और विषम व्यवहार करते हैं ( भक्तको प्रेमसे गले लगा लेते हैं और अभक्तको मारकर तार देते हैं ) । गुणरहित, निर्लेप, मानरहित और सदा एकरस भगवान् श्रीराम भक्तके प्रेमवश ही सगुण हुए हैं ॥ ३ ॥

राम सदा सेवक रुचि राखी । बेद पुरान साधु सुर साखी ॥

अस जियँ जानि तजहु कुटिलाई । करहु भरत पद प्रीति सुहाई ॥

श्रीरामजी सदा अपने सेवकों ( भक्तों ) की रुचि रखते आये हैं । वेद, पुराण, साधु और देवता इसके साक्षी हैं । ऐसा हृदयमें जानकर कुटिलता छोड़ दो और भरतजीके चरणोंमें सुन्दर प्रीति करो ॥ ४ ॥

दो० – राम भगत परहित निरत पर दुख दुखी दयाल ।

भगत सिरोमनि भरत तें जनि डरपहु सुरपाल ॥ २१ ९ ॥

हे देवराज इन्द्र! श्रीरामचन्द्रजीके भक्त सदा दूसरोंके हितमें लगे रहते हैं, वे दूसरोंके दुःखसे दु: खी और दयालु होते हैं । फिर, भरतजी तो भक्तोंके शिरोमणि हैं, उनसे बिलकुल न डरो ॥ २१ ९ ॥

सत्यसंध प्रभु सुर हितकारी । भरत राम आयस अनुसारी ॥

स्वारथ बिबस बिकल तुम्ह होहू । भरत दोसु नहिं राउर मोहू ॥

प्रभु श्रीरामचन्द्रजी सत्यप्रतिज्ञ और देवताओंका हित करनेवाले हैं । और भरतजी श्रीरामजीकी आज्ञाके अनुसार चलनेवाले हैं । तुम व्यर्थ ही स्वार्थके विशेष वश होकर व्याकुल हो रहे हो । इसमें भरतजीका कोई दोष नहीं, तुम्हारा ही मोह है ॥ १ ॥

सुनि सुरबर सुरगुर बर बानी । भा प्रमोद मन मिटी गलानी ॥

बरषि प्रसून हरषि सुरराऊ । लगे सराहन भरत सुभाऊ ॥

देवगुरु बृहस्पतिजीकी श्रेष्ठ वाणी सुनकर इन्द्रके मनमें बड़ा आनन्द हुआ और उनकी चिन्ता मिट गयी । तब हर्षित होकर देवराज फूल बरसाकर भरतजीके स्वभावकी सराहना करने लगे ॥२ ॥

एहि बिधि भरत चले मग जाहीं । दसा देखि मुनि सिद्ध सिहाहीं ॥

जबहिं रामु कहि लेहिं उसासा । उमगत पेमु मनहुँ चहु पासा ॥

इस प्रकार भरतजी मार्गमें चले जा रहे हैं । उनकी [ प्रेममयी ] दशा देखकर मुनि और सिद्ध लोग भी सिहाते हैं । भरतजी जभी ' राम ' कहकर लंबी साँस लेते हैं, तभी मानो चारों ओर प्रेम उमड़ पड़ता है ॥ ३ ॥

द्रवहिं बचन सुनि कुलिस पषाना । पुरजन पेमु न जाइ बखाना ॥

बीच बास करि जमुनहिं आए । निरखि नीरु लोचन जल छाए ॥

पृष्ठ 529

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* ** अयोध्याकाण्ड ५२७ उनके [ प्रेम और दीनतासे पूर्ण ] वचनोंको सुनकर वज्र और पत्थर भी पिघल जाते हैं । अयोध्यावासियोंका प्रेम कहते नहीं बनता । बीचमें निवास ( मुकाम) करके भरतजी यमुनाजीके तटपर आये । यमुनाजीका जल देखकर उनके नेत्रोंमें जल भर आया ॥४ ॥

दो० - रघुबर बरन बिलोकि बर बारि समेत समाज ।

होत मगन बारिधि बिरह चढ़े बिबेक जहाज ॥२२० ॥

श्रीरघुनाथजीके ( श्याम ) रंगका सुन्दर जल देखकर सारे समाजसहित भरतजी [ प्रेमविह्वल होकर ] श्रीरामजीके विरहरूपी समुद्रमें डूबते- डूबते विवेकरूपी जहाजपर चढ़ गये ( अर्थात् यमुनाजीका श्यामवर्ण जल देखकर सब लोग श्यामवर्ण भगवान्‌के प्रेममें विह्वल हो गये और उन्हें न पाकर विरहव्यथासे पीड़ित हो गये; तब भरतजीको यह ध्यान आया कि जल्दी चलकर उनके साक्षात् दर्शन करेंगे, इस विवेकसे वे फिर उत्साहित हो गये) ॥ २२० ॥

जमुन तीर तेहि दिन करि बासू । भयउ समय सम सबहि सुपासू ॥

रातिहिं घाट घाट की तरनी । आईं अगनित जाहिं न बरनी ॥

उस दिन यमुनाजीके किनारे निवास किया । समयानुसार सबके लिये [ खान - पान आदिकी ] सुन्दर व्यवस्था हुई । [निषादराजका सङ्केत पाकर ] रात -ही- रातमें घाट-घाटकी अगणित नावें वहाँ आ गयीं, जिनका वर्णन नहीं किया जा सकता ॥१ ॥

प्रात पार भए एकहि खेवाँ । तोषे रामसखा की सेवाँ ॥

चले नहाइ नदिहि सिर नाई । साथ निषादनाथ दोउ भाई ॥

सबेरे एक ही खेवेमें सब लोग पार हो गये और श्रीरामचन्द्रजीके सखा निषादराजकी इस सेवासे सन्तुष्ट हुए । फिर स्नान करके और नदीको सिर नवाकर निषादराजके साथ दोनों भाई चले ॥ २ ॥

आगें मुनिबर बाहन आछें । राजसमाज जाइजाइ सबु पाछें ॥

तेहि पाछें दोउ बंधु पयादें । भूषन बसन बेष सुठि सादें ॥

आगे अच्छी- अच्छी सवारियोंपर श्रेष्ठ मुनि हैं, उनके पीछे सारा राजसमाज जा रहा है । उसके पीछे दोनों भाई बहुत सादे भूषण-वस्त्र और वेषसे पैदल चल रहे हैं ॥३ ॥

सेवक सुहृद सचिवसुत साथा । सुमिरत लखनु सीय रघुनाथा ॥

जहँ जहँ राम बास बिश्रामा । तहँ तहँ करहिं सप्रेम प्रनामा ॥

सेवक, मित्र और मन्त्रीके पुत्र उनके साथ हैं । लक्ष्मण, सीताजी और श्रीरघुनाथजीका स्मरण करते जा रहे हैं । जहाँ -जहाँ श्रीरामजीने निवास और विश्राम किया था, वहाँ -वहाँ वे प्रेमसहित प्रणाम करते हैं ॥ ४ ॥

पृष्ठ 530

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* *५२८ रामचरितमानस

दो० –- मगबासी नर नारि सुनि धाम काम तजि धाइ ।

देखि सरूप सनेह सब मुदित जनम फलु पाइ ॥ २२१ ॥

मार्गमें रहनेवाले स्त्री- पुरुष यह सुनकर घर और काम-काज छोड़कर दौड़ पड़ते हैं और उनके रूप ( सौन्दर्य ) और प्रेमको देखकर वे सब जन्म लेनेका फल पाकर आनन्दित होते हैं ॥ २२१ ॥

कहहिं सपेम एक एक पाहीं । रामु लखनु सखि होहिं कि नाहीं ॥

बय बपु बरन रूपु सोइ आली । सीलु सनेहु सरिस सम चाली ॥

गाँवोंकी स्त्रियाँ एक- दूसरीसे प्रेमपूर्वक कहती हैं -सखी! ये राम-लक्ष्मण हैं कि नहीं? हे सखी! इनकी अवस्था, शरीर और रंग-रूप तो वही है । शील, स्नेह उन्हींके सदृश है और चाल भी उन्हींके समान है ॥१ ॥

बेषु न सो सखि सीय न संगा । आगें अनी चली चतुरंगा ॥

नहिं प्रसन्न मुख मानस खेदा । सखि संदेहु होइ एहिं भेदा ॥

परन्तु हे सखी! इनका न तो वह वेष ( वल्कलवस्त्रधारी मुनिवेष ) है, न सीताजी ही संग हैं । और इनके आगे चतुरङ्गिणी सेना चली जा रही है । फिर इनके मुख प्रसन्न नहीं हैं, इनके मनमें खेद है । हे सखी! इसी भेदके कारण सन्देह होता है ॥२ ॥

तासु तरक तियगन मन मानी । कहहिं सकल तेहि सम न सयानी ॥

तेहि सराहि बानी फुरि पूजी । बोली मधुर बचन तिय दूजी ॥

उसका तर्क ( युक्ति) अन्य स्त्रियोंके मन भाया । सब कहती हैं कि इसके समान सयानी ( चतुर) कोई नहीं है । उसकी सराहना करके और ' तेरी वाणी सत्य है ' इस प्रकार उसका सम्मान करके दूसरी स्त्री मीठे वचन बोली ॥३ ॥

कहि सपेम सब कथाप्रसंग । जेहि बिधि राम राज रस भंगू॥

भरतहि बहुरि सराहन लागी । सील सनेह सुभाय सुभागी ॥

श्रीरामजीके राजतिलकका आनन्द जिस प्रकारसे भंग हुआ था वह सब कथाप्रसंग प्रेमपूर्वक कहकर फिर वह भाग्यवती स्त्री श्रीभरतजीके शील, स्नेह और स्वभावकी सराहना करने लगी ॥४ ॥

दो० – चलत पयादें खात फल पिता दीन्ह तजि राजु ।

जात मनावन रघुबरहि भरत सरिस को आजु ॥ २२२ ॥

[ वह बोली– ] देखो, ये भरतजी पिताके दिये हुए राज्यको त्यागकर पैदल चलते और फलाहार करते हुए श्रीरामजीको मनानेके लिये जा रहे हैं । इनके समान आज कौन है? ॥ २२२ ॥