श्रीरामचरितमानस — पृष्ठ 531–540
श्रीरामचरितमानस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 531–540
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* ** अयोध्याकाण्ड ५२ ९
भायप भगति भरत आचरनू । कहत सुनत दुख दूषन हरनू॥
जो किछु कहब थोर सखि सोई । राम बंधु अस काहे न होई ॥
भरतजीका भाईपना, भक्ति और इनके आचरण कहने और सुननेसे दुःख और दोषोंके हरनेवाले हैं । हे सखी! उनके सम्बन्धमें जो कुछ भी कहा जाय, वह थोड़ा है । श्रीरामचन्द्रजीके भाई ऐसे क्यों न हों? ॥ १ ॥
हम सब सानुज भरतहि देखें । भइन्ह धन्य जुबती जन लेखें ॥
सुनि गुन देखि दसा पछिताहीं । कैकई जननि जोगु सुतु नाहीं ॥
छोटे भाई शत्रुघ्नसहित भरतजीको देखकर हम सब भी आज धन्य ( बड़भागिनी ) स्त्रियोंकी गिनतीमें आ गयीं । इस प्रकार भरतजीके गुण सुनकर और उनकी दशा देखकर स्त्रियाँ पछताती हैं और कहती हैं — यह पुत्र कैकेयी-जैसी माताके योग्य नहीं है ॥२ ॥
कोउ कह दूषनु रानिहि नाहिन । बिधि सबु कीन्ह हमहि जो दाहिन ।
कहँ हम लोक बेद बिधि हीनी । लघु तिय कुल करतूति मलीनी ॥
कोई कहती हैं - इसमें रानीका भी दोष नहीं है । यह सब विधाताने ही किया है, जो हमारे अनुकूल है । कहाँ तो हम लोक और वेद दोनोंकी विधि ( मर्यादा ) से हीन, कुल और करतूत दोनोंसे मलिन तुच्छ स्त्रियाँ, ॥ ३ ॥
बसहिं कुदेस कुगाँव कुबामा । कहँ यह दरसु पुन्य परिनामा ॥
अस अनंदु अचिरिजु प्रति ग्रामा । जनु मरुभूमि कलपतरु जामा ॥
जो बुरे देश ( जंगली प्रान्त) और बुरे गाँवमें बसती हैं और [ स्त्रियोंमें भी ] नीच स्त्रियाँ हैं! और कहाँ यह महान् पुण्योंका परिणामस्वरूप इनका दर्शन! ऐसा ही आनन्द और आश्चर्य गाँव-गाँवमें हो रहा है । मानो मरुभूमिमें कल्पवृक्ष उग गया हो ॥४ ॥
दो०– भरत दरसु देखत खुलेउ मग लोगन्ह कर भागु ।
जनु सिंघलबासिन्ह भयउ बिधि बस सुलभ प्रयागु ॥ २२३ ॥
भरतजीका स्वरूप देखते ही रास्तेमें रहनेवाले लोगोंके भाग्य खुल गये! मानो दैवयोगसे सिंहलद्वीपके बसनेवालोंको तीर्थराज प्रयाग सुलभ हो गया हो! ॥ २२३ ॥
निज गुन सहित राम गुन गाथा । सुनत जाहिं सुमिरत रघुनाथा ॥
तीरथ मुनि आश्रम सुरधामा । निरखि निमज्जहिं करहिं प्रनामा ॥
[ इस प्रकार ] अपने गुणोंसहित श्रीरामचन्द्रजीके गुणोंकी कथा सुनते और श्रीरघुनाथजीको स्मरण करते हुए भरतजी चले जा रहे हैं । वे तीर्थ देखकर स्नान और मुनियोंके आश्रम तथा देवताओंके मन्दिर देखकर प्रणाम करते हैं, ॥ १ ॥
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*:*५३० रामचरितमानस
मनहीं मन मागहिं बरु एहू । सीय राम पद पदुम सनेहू ॥
मिलहिं किरात कोल बनबासी । बैखानस बटु जती उदासी ॥
और मन-ही- मन यह वरदान माँगते हैं कि श्रीसीतारामजीके चरणकमलोंमें प्रेम हो । मार्गमें भील, कोल आदि वनवासी तथा वानप्रस्थ, ब्रह्मचारी, संन्यासी और विरक्त मिलते हैं ॥२ ॥
करि प्रनामु पूँछहिं जेहि तेही । केहि बन लखनु रामु बैदेही ॥
ते प्रभु समाचार सब कहहीं । भरतहि देखि जनम फलु लहहीं ॥
उनमेंसे जिस- तिससे प्रणाम करके पूछते हैं कि लक्ष्मणजी, श्रीरामजी और जानकीजी किस वनमें हैं? वे प्रभुके सब समाचार कहते हैं और भरतजीको देखकर जन्मका फल पाते हैं ॥३ ॥
जे जन कहहिं कुसल हम देखे । ते प्रिय राम लखन सम लेखे ॥
एहि बिधि बूझत सबहि सुबानी । सुनत राम बनबास कहानी ॥
जो लोग कहते हैं कि हमने उनको कुशलपूर्वक देखा है, उनको ये श्रीराम- लक्ष्मणके समान ही प्यारे मानते हैं । इस प्रकार सबसे सुन्दर वाणीसे पूछते और श्रीरामजीके वनवासकी कहानी सुनते जाते हैं ॥४ ॥
दो० – तेहि बासर बसि प्रातहीं चले सुमिरि रघुनाथ ।
राम दरस की लालसा भरत सरिस सब साथ ॥२२४ ॥
उस दिन वहीं ठहरकर दूसरे दिन प्रातः काल ही श्रीरघुनाथजीका स्मरण करके चले । साथके सब लोगोंको भी भरतजीके समान ही श्रीरामजीके दर्शनकी लालसा [ लगी हुई ] है ॥ २२४ ॥
मंगल सगुन होहिं सब काहू । फरकहिं सुखद बिलोचन बाहू ॥
भरतहि सहित समाज उछाहू । मिलिहहिं रामु मिटिहि दुख दाहू ॥
सबको मङ्गलसूचक शकुन हो रहे हैं । सुख देनेवाले [ पुरुषोंके दाहिने और स्त्रियोंके बायें ] नेत्र और भुजाएँ फड़क रही हैं । समाजसहित भरतजीको उत्साह हो रहा है कि श्रीरामचन्द्रजी मिलेंगे और दुःखका दाह मिट जायगा ॥१ ॥
करत मनोरथ जस जियँ जाके । जाहिं सनेह सुराँ सब छाके ॥
सिथिल अंग पग मग डगि डोलहिं । बिहबल बचन पेम बस बोलहिं ॥
जिसके जीमें जैसा है, वह वैसा ही मनोरथ करता है । सब स्नेहरूपी मदिरासे छके ( प्रेममें मतवाले हुए) चले जा रहे हैं । अङ्ग शिथिल हैं, रास्तेमें पैर डगमगा रहे हैं और प्रेमवश विह्वल वचन बोल रहे हैं ॥ २ ॥
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* * अयोध्याकाण्ड ५३१
रामसखाँ तेहि समय देखावा । सैल सिरोमनि सहज सुहावा ॥
जासु समीप सरित पय तीरा । सीय समेत बसहिं दोउ बीरा ॥
रामसखा निषादराजने उसी समय स्वाभाविक ही सुहावना पर्वतशिरोमणि कामदगिरि दिखलाया, जिसके निकट ही पयस्विनी नदीके तटपर सीताजीसमेत दोनों भाई निवास करते हैं ॥३ ॥
देखि करहिं सब दंड प्रनामा । कहि जय जानकि जीवन रामा ॥
प्रेम मगन अस राजसमाजू । जनु फिरि अवध चले रघुराजू॥
सब लोग उस पर्वतको देखकर 'जानकी-जीवन श्रीरामचन्द्रजीकी जय हो । ' ऐसा कहकर दण्डवत् प्रणाम करते हैं । राजसमाज प्रेममें ऐसा मग्न है मानो श्रीरघुनाथजी अयोध्याको लौट चले हों ॥४ ॥
दो० – भरत प्रेमु तेहि समय जस तस कहि सकइ न सेषु ।
कबिहि अगमजिमि ब्रह्मसुखु अह मम मलिन जनेषु ॥ २२५ ॥
भरतजीका उस समय जैसा प्रेम था, वैसा शेषजी भी नहीं कह सकते । कविके लिये तो वह वैसा ही अगम है जैसा अहंता और ममतासे मलिन मनुष्योंके लिये ब्रह्मानन्द! ॥ २२५ ॥
सकल सनेह सिथिल रघुबर कें । गए कोस दुइ दिनकर ढरकें ॥
जलु थलु देखि बसे निसि बीतें । कीन्ह गवन रघुनाथ पिरीतें ॥
सब लोग श्रीरामचन्द्रजीके प्रेमके मारे शिथिल होनेके कारण सूर्यास्त होनेतक ( दिनभरमें ) दो ही कोस चल पाये और जल-स्थलका सुपास देखकर रातको वहीं [ बिना खाये - पीये ही ] रह गये । रात बीतनेपर श्रीरघुनाथजीके प्रेमी भरतजीने आगे गमन किया ॥१ ॥
उहाँ रामु रजनी अवसेषा । जागे सीयँ सपन अस देखा ॥
सहित समाज भरत जनु आए । नाथ बियोग ताप तन ताए ॥
उधर श्रीरामचन्द्रजी रात शेष रहते ही जागे । रातको सीताजीने ऐसा स्वप्न देखा [ जिसे वे श्रीरामजीको सुनाने लगीं ] मानो समाजसहित भरतजी यहाँ आये हैं । प्रभुके वियोगकी अग्निसे उनका शरीर संतप्त है ॥२ ॥
।सकल मलिन मन दीन दुखारी देखीं सासु आन अनुहारी ॥
सुनि सिय सपन भरे जल लोचन । भए सोचबस सोच बिमोचन ॥
सभी लोग मनमें उदास, दीन और दु:खी हैं । सासुओंको दूसरी ही सूरतमें देखा । सीताजीका स्वप्न सुनकर श्रीरामचन्द्रजीके नेत्रोंमें जल भर आया और सबको सोचसे छुड़ा देनेवाले प्रभु स्वयं [लीलासे ] सोचके वश हो गये ॥३ ॥
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* * ५३२ रामचरितमानस
लखन सपन यह नीक न होई । कठिन कुचाह सुनाइहि कोई ॥
अस कहि बंधु समेत नहाने । पूजि पुरारि साधु सनमाने ॥
[ और बोले- ] लक्ष्मण! यह स्वप्न अच्छा नहीं है । कोई भीषण कुसमाचार ( बहुत ही बुरी खबर ) सुनावेगा । ऐसा कहकर उन्होंने भाईसहित स्नान किया और त्रिपुरारि महादेवजीका पूजन करके साधुओंका सम्मान किया ॥४ ॥
छं० – सनमानि सुर मुनि बंदि बैठे उतर दिसि देखत भए ।
नभ धूरि खग मृग भूरि भागे बिकल प्रभु आश्रम गए ॥
तुलसी उठे अवलोकि कारनु काह चित सचकित रहे ।
सब समाचार किरात कोलन्हि आइ तेहि अवसर कहे ॥
देवताओंका सम्मान ( पूजन) और मुनियोंकी वन्दना करके श्रीरामचन्द्रजी बैठ गये और उत्तर दिशाकी ओर देखने लगे । आकाशमें धूल छा रही है; बहुत-से पक्षी और पशु व्याकुल होकर भागे हुए प्रभुके आश्रमको आ रहे हैं । तुलसीदासजी कहते हैं कि प्रभु श्रीरामचन्द्रजी यह देखकर उठे और सोचने लगे कि क्या कारण है? वे चित्तमें आश्चर्ययुक्त हो गये । उसी समय कोल- भीलोंने आकर सब समाचार कहे ।
सो०- सुनत सुमंगल बैन मन प्रमोद तन पुलक भर ।
सरद सरोरुह नैन तुलसी भरे सनेह जल ॥ २२६ ॥
तुलसीदासजी कहते हैं कि सुन्दर मङ्गल वचन सुनते ही श्रीरामजीके मनमें बड़ा आनन्द हुआ । शरीरमें पुलकावली छा गयी, और शरद् ऋतुके कमलके समान नेत्र प्रेमाश्रुओंसे भर गये ॥ २२६ ॥
बहुरि सोचबस भे सियरवनू । कारन कवन भरत आगवनू॥
एक आइ अस कहा बहोरी । सेन संग चतुरंग न थोरी ॥
सीतापति श्रीरामचन्द्रजी पुनः सोचके वश हो गये कि भरतके आनेका क्या कारण है? फिर एकने आकर ऐसा कहा कि उनके साथमें बड़ी भारी चतुरङ्गिणी सेना भी है ॥ १ ॥
सो सुनि रामहि भा अति सोचू। इत पितु बच इत बंधु सकोचू॥
भरत सुभाउ समुझि मन माहीं । प्रभु चित हित थिति पावत नाहीं ॥
यह सुनकर श्रीरामचन्द्रजीको अत्यन्त सोच हुआ । इधर तो पिताके वचन और इधर भाई भरतजीका संकोच! भरतजीके स्वभावको मनमें समझकर तो प्रभु श्रीरामचन्द्रजी चित्तको ठहरानेके लिये कोई स्थान ही नहीं पाते हैं ॥२ ॥
समाधान तब भा यह जाने । भरतु कहे महुँ साधु सयाने ॥
लखन लखेउ प्रभु हृदयँ खभारू । कहत समय सम नीति बिचारू ॥
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* * अयोध्याकाण्ड ५३३ तब यह जानकर समाधान हो गया कि भरत साधु और सयाने हैं तथा मेरे कहनेमें ( आज्ञाकारी ) हैं । लक्ष्मणजीने देखा कि प्रभु श्रीरामजीके हृदयमें चिन्ता है तो वे समयके अनुसार अपना नीतियुक्त विचार कहने लगे -॥३ ॥
बिनु पूछें कछु कहउँ गोसाईं । सेवकु समयँ न ढीठ ढिठाई ॥
तुम्ह सर्बग्य सिरोमनि स्वामी । आपनि समुझि कहउँ अनुगामी ॥
हे स्वामी! आपके बिना ही पूछे मैं कुछ कहता हूँ; सेवक समयपर ढिठाई करनेसे ढीठ नहीं समझा जाता ( अर्थात् आप पूछें तब मैं कहूँ, ऐसा अवसर नहीं है; इसीलिये यह मेरा कहना ढिठाई नहीं होगा) । हे स्वामी! आप सर्वज्ञोंमें शिरोमणि हैं ( सब जानते ही हैं ) । मैं सेवक तो अपनी समझकी बात कहता हूँ ॥४ ॥
दो० - नाथ सुहृद सुठि सरल चित सील सनेह निधान ।
सब पर प्रीति प्रतीतिजियँ जानिअ आपु समान ॥ २२७ ॥
हे नाथ! आप परम सुहृद् ( बिना ही कारण परम हित करनेवाले ), सरलहृदय तथा शील और स्नेहके भण्डार हैं, आपका सभीपर प्रेम और विश्वास है और अपने हृदयमें सबको अपने ही समान जानते हैं ॥ २२७ ॥
बिषई जीव पाइ प्रभुताई । मूढ़ मोह बस होहिं जनाई ॥
भरतु नीति रत साधु सुजाना । प्रभु पद प्रेमु सकल जग जाना ॥
परन्तु मूढ़ विषयी जीव प्रभुता पाकर मोहवश अपने असली स्वरूपको प्रकट कर देते हैं । भरत नीतिपरायण, साधु और चतुर हैं तथा प्रभु ( आप) के चरणोंमें उनका प्रेम है, इस बातको सारा जगत् जानता है ॥१ ॥
तेऊ आजु राम पदु पाई । चले धरम मरजाद मेटाई ॥
कुटिल कुबंधु कुअवसरु ताकी । जानि राम बनबास एकाकी ॥
वे भरत भी आज श्रीरामजी ( आप ) का पद ( सिंहासन या अधिकार ) पाकर धर्मकी मर्यादाको मिटाकर चले हैं । कुटिल खोटे भाई भरत कुसमय देखकर और यह जानकर कि रामजी ( आप ) वनवासमें अकेले ( असहाय ) हैं, ॥२ ॥
करि कुमंत्र मन साजि समाजू । आए करै अकंटक राजू ॥
कोटि प्रकार कलपि कुटिलाई । आए दल बटोरि दोउ भाई ॥
अपने मनमें बुरा विचार करके, समाज जोड़कर राज्यको निष्कण्टक करनेके लिये यहाँ आये हैं । करोड़ों ( अनेकों ) प्रकारकी कुटिलताएँ रचकर सेना बटोरकर दोनों भाई आये हैं ॥३ ॥
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* *५३४ रामचरितमानस
जौं जियँ होति न कपट कुचाली । केहि सोहाति रथ बाजि गजाली ॥
भरतहि दोसु देइ को जाएँ । जग बौराइ राज पदु पाएँ ॥
यदि इनके हृदयमें कपट और कुचाल न होती, तो रथ, घोड़े और हाथियोंकी कतार [ ऐसे समय ] किसे सुहाती? परन्तु भरतको ही व्यर्थ कौन दोष दे? राजपद पा जानेपर सारा जगत् ही पागल ( मतवाला ) हो जाता है ॥४ ॥
दो० – ससि गुर तिय गामी नघुषु चढ़ेउ भूमिसुर जान ।
लोक बेद तें बिमुख भा अधम न बेन समान ॥ २२८ ॥
चन्द्रमा गुरुपत्नीगामी हुआ, राजा नहुष ब्राह्मणोंकी पालकीपर चढ़ा । और राजा वेनके समान नीच तो कोई नहीं होगा, जो लोक और वेद दोनोंसे विमुख हो गया ॥२२८ ॥
सहसबाहु सुरनाथु त्रिसंकू । केहि न राजमद दीन्ह कलंकू ॥
भरत कीन्ह यह उचित उपाऊ । रिपु रिन रंच न राखब काऊ ॥
सहस्रबाहु, देवराज इन्द्र और त्रिशंकु आदि किसको राजमदने कलङ्क नहीं दिया? भरतने यह उपाय उचित ही किया है । क्योंकि शत्रु और ऋणको कभी जरा भी शेष नहीं रखना चाहिये ॥ १ ॥
एक कीन्हि नहिं भरत भलाई । निदरे रामु जानि असहाई ॥
समुझि परिहि सोउ आजु बिसेषी । समर सरोष राम मुखु पेखी ॥
हाँ, भरतने एक बात अच्छी नहीं की, जो रामजी ( आप) को असहाय जानकर उनका निरादर किया! पर आज संग्राममें श्रीरामजी ( आप) का क्रोधपूर्ण मुख देखकर यह बात भी उनकी समझमें विशेषरूपसे आ जायगी ( अर्थात् इस निरादरका फल भी वे अच्छी तरह पा जायँगे ) ॥२ ॥
एतना कहत नीति रस भूला । रन रस बिटपु पुलक मिस फूला ॥
प्रभु पद बंदि सीस रज राखी । बोले सत्य सहज बलु भाषी ॥
इतना कहते ही लक्ष्मणजी नीतिरस भूल गये और युद्धरसरूपी वृक्ष पुलकावलीके बहानेसे फूल उठा ( अर्थात् नीतिकी बात कहते- कहते उनके शरीरमें वीर- रस छा गया ) । वे प्रभु श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंकी वन्दना करके, चरण-रजको सिरपर रखकर सच्चा और स्वाभाविक बल कहते हुए बोले ॥ ३ ॥
अनुचित नाथ न मानब मोरा । भरत हमहि उपचार न थोरा ॥
कहँ लगि सहिअ रहिअ मनु मारें । नाथ साथ धनु हाथ हमारें ॥
हे नाथ! मेरा कहना अनुचित न मानियेगा । भरतने हमें कम नहीं प्रचारा है ( हमारे साथ कम छेड़छाड़ नहीं की है ) । आखिर कहाँतक सहा जाय और मन मारे रहा जाय, जब स्वामी हमारे साथ हैं और धनुष हमारे हाथमें है! ॥४ ॥
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* * अयोध्याकाण्ड ५३५
दो० - छत्रि जाति रघुकुल जनमु राम अनुग जगु जान ।
लातहुँ मारें चढ़ति सिर नीच को धूरि समान ॥२२ ९ ॥
क्षत्रिय जाति, रघुकुलमें जन्म और फिर मैं श्रीरामजी ( आप ) का अनुगामी ( सेवक ) हूँ, यह जगत् जानता है । [ फिर भला कैसे सहा जाय? ] धूलके समान नीच कौन है, परन्तु वह भी लात मारनेपर सिर ही चढ़ती है ॥२२९ ॥
उठि कर जोरि रजायसु मागा । मनहुँ बीर रस सोवत जागा ॥
बाँधि जटा सिर कसि कटि भाथा । साजि सरासनु सायकु हाथा ॥
यों कहकर लक्ष्मणजीने उठकर, हाथ जोड़कर आज्ञा माँगी । मानो वीररस सोतेसे जाग उठा हो । सिरपर जटा बाँधकर कमरमें तरकस कस लिया और धनुषको सजकर तथा बाणको हाथमें लेकर कहा- ॥१ ॥
आजु राम सेवक जसु लेऊँ । भरतहि समर सिखावन देऊँ ॥
राम निरादर कर फलु पाई । सोवहुँ समर सेज दोउ भाई ॥
आज मैं श्रीराम ( आप ) का सेवक होनेका यश लूँ और भरतको संग्राममें शिक्षा दूँ । श्रीरामचन्द्रजी ( आप ) के निरादरका फल पाकर दोनों भाई ( भरत- शत्रुघ्न ) रणशय्यापर सोवें! ॥ २ ॥
आइ बना भल सकल समाजू। प्रगट करउँ रिस पाछिल आजू॥
जिमि करि निकर दलइ मृगराजू । लेइ लपेटि लवा जिमि बाजू॥
अच्छा हुआ जो सारा समाज आकर एकत्र हो गया । आज मैं पिछला सब क्रोध प्रकट करूँगा । जैसे सिंह हाथियोंके झुंडको कुचल डालता है और बाज जैसे लवेको लपेटमें ले लेता है ॥३ ॥
तैसेहिं भरतहि सेन समेता । सानुज निदरि निपातउँ खेता ॥
जौं सहाय कर संकरु आई । तौ मारउँ रन राम दोहाई ॥
वैसे ही भरतको सेनासमेत और छोटे भाईसहित तिरस्कार करके मैदानमें पछाडूंगा । यदि शङ्करजी भी आकर उनकी सहायता करें, तो भी, मुझे रामजीकी सौगन्ध है, मैं उन्हें युद्धमें [ अवश्य ] मार डालूँगा ( छोडूंगा नहीं ) ॥४ ॥
दो० –- अति सरोष माखे लखनु लखि सुनि सपथ प्रवान ।
सभय लोक सब लोकपति चाहत भभरि भगान ॥ २३० ॥
लक्ष्मणजीको अत्यन्त क्रोधसे तमतमाया हुआ देखकर और उनकी प्रामाणिक ( सत्य ) सौगन्ध सुनकर सब लोग भयभीत हो जाते हैं और लोकपाल घबड़ाकर भागना चाहते हैं॥२३० ॥
जगु भय मगन गगन भइ बानी । लखन बाहुबलु बिपुल बखानी ॥
तात प्रताप प्रभाउ तुम्हारा । को कहि सकइ को जाननिहारा ॥
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* *५३६ रामचरितमानस सारा जगत् भयमें डूब गया । तब लक्ष्मणजीके अपार बाहुबलकी प्रशंसा करती हुई आकाशवाणी हुई-हे तात! तुम्हारे प्रताप और प्रभावको कौन कह सकता है और कौन जान सकता है? ॥ १ ॥
अनुचित उचित काजु किछु होऊ । समुझि करिअ भल कह सबु कोऊ ॥
सहसा करि पाछें पछिताहीं । कहहिं बेद बुध ते बुध नाहीं ॥
परन्तु कोई भी काम हो, उसे अनुचित-उचित खूब समझ- बूझकर किया जाय तो सब कोई अच्छा कहते हैं । वेद और विद्वान् कहते हैं कि जो बिना विचारे जल्दीमें किसी कामको करके पीछे पछताते हैं, वे बुद्धिमान् नहीं हैं ॥२ ॥
सुनि सुर बचन लखन सकुचाने । राम सीयँ सादर सनमाने ॥
कही तात तुम्ह नीति सुहाई । सब तें कठिन राजमदु भाई ॥
देववाणी सुनकर लक्ष्मणजी सकुचा गये । श्रीरामचन्द्रजी और सीताजीने उनका आदरके साथ सम्मान किया [ और कहा- ] हे तात! तुमने बड़ी सुन्दर नीति कही I। हे भाई! राज्यका मद सबसे कठिन मद है ॥३ ॥
जो अचवँत नृप मातहिं तेई । नाहिन साधुसभा जेहिं सेई ॥
सुनहु लखन भल भरत सरीसा । बिधि प्रपंच महँ सुना न दीसा ॥
जिन्होंने साधुओंकी सभाका सेवन ( सत्सङ्ग) नहीं किया, वे ही राजा राजमदरूपी मदिराका आचमन करते ही ( पीते ही ) मतवाले हो जाते हैं । हे लक्ष्मण! सुनो, भरत- सरीखा उत्तम पुरुष ब्रह्माकी सृष्टिमें न तो कहीं सुना गया है, न देखा ही गया है ॥४ ॥
दो०- भरतहि होइ न राजमदु बिधि हरि हर पद पाइ ।
कबहुँ कि काँजी सीकरनि छीरसिंधु बिनसाइ ॥ २३१ ॥
[ अयोध्याके राज्यकी तो बात ही क्या है ] ब्रह्मा, विष्णु और महादेवका पद पाकर भी भरतको राज्यका मद नहीं होनेका! क्या कभी काँजीकी बूँदोंसे क्षीरसमुद्र नष्ट हो सकता ( फट सकता ) है? ॥ २३१ ॥
तिमिरु तरुन तरनिहि मकु गिलई । गगनु मगन मकु मेघहिं मिलई ॥
गोपद जल बूड़हिं घटजोनी । सहज छमा बरु छाड़ै छोनी ॥
अन्धकार चाहे तरुण ( मध्याह्नके ) सूर्यको निगल जाय । आकाश चाहे बादलोंमें समाकर मिल जाय । गौके खुर- इतने जलमें अगस्त्यजी डूब जायँ और पृथ्वी चाहे अपनी स्वाभाविक क्षमा ( सहनशीलता ) को छोड़ दे ॥१ ॥
मसक फूँक मकु मेरु उड़ाई । होइ न नृपमदु भरतहि भाई ॥
लखन तुम्हार सपथ पितु आना । सुचि सुबंधु नहिं भरत समाना ॥
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* * अयोध्याकाण्ड ५३७ मच्छरकी फूँकसे चाहे सुमेरु उड़ जाय । परन्तु हे भाई! भरतको राजमद कभी नहीं हो सकता । हे लक्ष्मण! मैं तुम्हारी शपथ और पिताजीकी सौगन्ध खाकर कहता हूँ, भरतके समान पवित्र और उत्तम भाई संसारमें नहीं है ॥२ ॥
सगुनु खीरु अवगुन जलु ताता । मिलइ रचइ परपंचु बिधाता ॥
भरतु हंस रबिबंस तड़ागा । जनमि कीन्ह गुन दोष बिभागा ॥
हे तात! गुणरूपी दूध और अवगुणरूपी जलको मिलाकर विधाता इस दृश्य- प्रपञ्च ( जगत् ) को रचता है । परन्तु भरतने सूर्यवंशरूपी तालाबमें हंसरूप जन्म लेकर गुण और दोषका विभाग कर दिया ( दोनोंको अलग- अलग कर दिया ) ॥ ३ ॥
गहि गुन पय तजि अवगुन बारी । निज जस जगत कीन्हि उजिआरी ॥
कहत भरत गुन सीलु सुभाऊ । पेम पयोधि मगन रघुराऊ ॥
गुणरूपी दूधको ग्रहणकर और अवगुणरूपी जलको त्यागकर भरतने अपने यशसे जगत्में उजियाला कर दिया है । भरतजीके गुण, शील और स्वभावको कहते - कहते श्रीरघुनाथजी प्रेमसमुद्रमें मग्न हो गये ॥४ ॥
दो० – सुनि रघुबर बानी बिबुध देखि भरत पर हेतु ।
सकल सराहत राम सो प्रभु को कृपानिकेतु ॥ २३२ ॥
श्रीरामचन्द्रजीकी वाणी सुनकर और भरतजीपर उनका प्रेम देखकर समस्त देवता उनकी सराहना करने लगे [ और कहने लगे ] कि श्रीरामचन्द्रजीके समान कृपाके धाम प्रभु और कौन हैं? ॥ २३२ ॥
जौं न होत जग जनम भरत को । सकल धरम धुर धरनि धरत को ॥
कब कुल अगम भरत गुन गाथा । को जानइ तुम्ह बिनु रघुनाथा ॥
यदि जगत्में भरतका जन्म न होता, तो पृथ्वीपर सम्पूर्ण धर्मोंकी धुरीको कौन धारण करता? हे रघुनाथजी! कविकुलके लिये अगम ( उनकी कल्पनासे अतीत ) भरतजीके गुणोंकी कथा आपके सिवा और कौन जान सकता है? ॥ १ ॥
इहाँलखनभरतुराम सियँसब सुनिसहितसुरसहाएबानी ॥ अतिमंदाकिनींसुखु लहेउपुनीतन जाइ बखानीनहाए ॥॥ लक्ष्मणजी, श्रीरामचन्द्रजी और सीताजीने देवताओंकी वाणी सुनकर अत्यन्त सुख पाया, जो वर्णन नहीं किया जा सकता । यहाँ भरतजीने सारे समाजके साथ पवित्र मन्दाकिनीमें स्नान किया ॥२ ॥
सरित समीप राखि सब लोगा । मागि मातु गुर सचिव नियोगा ॥
चले भरतु जहँ सिय रघुराई । साथ निषादनाथु लघु भाई ॥
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* *५३८ रामचरितमानस फिर सबको नदीके समीप ठहराकर तथा माता, गुरु और मन्त्रीकी आज्ञा माँगकर निषादराज और शत्रुघ्नको साथ लेकर भरतजी वहाँको चले जहाँ श्रीसीताजी और श्रीरघुनाथजी थे ॥ ३ ॥
समुझि मातु करतब सकुचाहीं । करत कुतरक कोटि मन माहीं ॥
रामु लखनु सिय सुनि मम नाऊँ । उठि जनि अनत जाहिं तजि ठाऊँ ॥
भरतजी अपनी माता कैकेयीकी करनीको समझकर ( याद करके ) सकुचाते हैं और मनमें करोड़ों ( अनेकों ) कुतर्क करते हैं [ सोचते हैं— ] श्रीराम, लक्ष्मण और सीताजी मेरा नाम सुनकर स्थान छोड़कर कहीं दूसरी जगह उठकर न चले जायँ ॥४ ॥
दो० - मातु मते महुँ मानि मोहि जो कछु करहिं सो थोर ।
अघ अवगुन छमि आदरहिं समुझि आपनी ओर ॥ २३३ ॥
मुझे माता मतमें मानकर वे जो कुछ भी करें सो थोड़ा है, पर वे अपनी ओर समझकर ( अपने विरद और सम्बन्धको देखकर ) मेरे पापों और अवगुणोंको क्षमा करके मेरा आदर ही करेंगे ॥ २३३ ॥
जौं परिहरहिं मलिन मनु जानी । जौं सनमानहिं सेवकु मानी ॥
मोरें सरन रामहि की पनही । राम सुस्वामि दोसु सब जनही ॥
चाहे मलिन- मन जानकर मुझे त्याग दें, चाहे अपना सेवक मानकर मेरा सम्मान करें ( कुछ भी करें ); मेरे तो श्रीरामचन्द्रजीकी जूतियाँ ही शरण हैं । श्रीरामचन्द्रजी तो अच्छे स्वामी हैं, दोष तो सब दासका ही है ॥ १ ॥
जग जस भाजन चातक मीना । नेम पेम निज निपुन नबीना ॥
अस मन गुनत चले मग जाता । सकुच सनेहँ सिथिल सब गाता ॥
जगत्में यशके पात्र तो चातक और मछली ही हैं, जो अपने नेम और प्रेमको सदा नया बनाये रखनेमें निपुण हैं । ऐसा मनमें सोचते हुए भरतजी मार्गमें चले जाते हैं । उनके सब अङ्ग संकोच और प्रेमसे शिथिल हो रहे हैं ॥२ ॥
फेरति मनहुँ मातु कृत खोरी । चलत भगति बल धीरज धोरी ॥
जब समुझत रघुनाथ सुभाऊ । तब पथ परत उताइल पाऊ ॥
माताकी की हुई बुराई मानो उन्हें लौटाती है, पर धीरजकी धुरीको धारण करनेवाले भरतजी भक्तिके बलसे चले जाते हैं । जब श्रीरघुनाथजीके स्वभावको समझते ( स्मरण करते ) हैं तब मार्गमें उनके पैर जल्दी-जल्दी पड़ने लगते हैं ॥ ३ ॥
भरत दसा तेहि अवसर कैसी । जल प्रबाहँ जल अलि गति जैसी ॥
देखि भरत कर सोचु सनेहू । भा निषाद तेहि समयँ बिदेहू ॥