श्रीरामचरितमानस — पृष्ठ 541–550
श्रीरामचरितमानस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 541–550
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* ** अयोध्याकाण्ड ५३ ९ उस समय भरतकी दशा कैसी है? जैसी जल प्रवाहमें जलके भौरेकी गति होती है । भरतजीका सोच और प्रेम देखकर उस समय निषाद विदेह हो गया ( देहकी सुध- बुध भूल गया ) ॥४ ॥
दो० – लगे होन मंगल सगुन सुनि गुनि कहत निषादु ।
मिटिहि सोचु होइहि हरषु पुनि परिनाम बिषादु ॥ २३४ ॥
मङ्गल- शकुन होने लगे । उन्हें सुनकर और विचारकर निषाद कहने लगा- सोच मिटेगा, हर्ष होगा, पर फिर अन्तमें दुःख होगा ॥ २३४ ॥
सेवक बचन सत्य सब जाने । आश्रम निकट जाइ निअराने ॥
भरत दीख बन सैल समाजू । मुदित छुधित जनु पाइ सुनाजू॥
भरतजीने सेवक ( गुह ) के सब वचन सत्य जाने और वे आश्रमके समीप जा पहुँचे । वहाँके वन और पर्वतोंके समूहको देखा तो भरतजी इतने आनन्दित हुए मानो कोई भूखा अच्छा अन्न ( भोजन ) पा गया हो ॥ १ ॥
ईति भीति जनु प्रजा दुखारी । त्रिविध ताप पीड़ित ग्रह मारी ॥
जाइ सुराज सुदेस सुखारी । होहिं भरत गति तेहि अनुहारी ॥
जैसे ईतिके भयसे दु:खी हुई और तीनों ( आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक ) तापों तथा क्रूर ग्रहों और महामारियोंसे पीड़ित प्रजा किसी उत्तम देश और उत्तम राज्यमें जाकर सुखी हो जाय, भरतजीकी गति ( दशा ) ठीक उसी प्रकारकी हो रही है ॥२ ॥
[ अधिक जल बरसना, न बरसना, चूहोंका उत्पात, टिड्डियाँ, तोते और दूसरे राजाकी चढ़ाई— खेतोंमें बाधा देनेवाले इन छः उपद्रवोंको ' ईति ' कहते हैं । ]
राम बास बन संपति भ्राजा । सुखी प्रजा जनु पाइ सुराजा ॥
सचिव बिरागु बिबेकु नरेसू । बिपिन सुहावन पावन देसू॥
श्रीरामचन्द्रजीके निवाससे वनकी सम्पत्ति ऐसी सुशोभित है मानो अच्छे राजाको पाकर प्रजा सुखी हो । सुहावना वन ही पवित्र देश है । विवेक उसका राजा है और वैराग्य मन्त्री है ॥३ ॥
भट जम नियम सैल रजधानी । सांति सुमति सुचि सुंदर रानी ॥
सकल अंग संपन्न सुराऊ । राम चरन आश्रित चित चाऊ ॥
यम ( अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह ) तथा नियम ( शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वरप्रणिधान) योद्धा हैं | पर्वत राजधानी है, शान्ति तथा सुबुद्धि दो सुन्दर पवित्र रानियाँ हैं । वह श्रेष्ठ राजा राज्यके सब अङ्गोंसे पूर्ण है और श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंके आश्रित रहनेसे उसके चित्तमें चाव ( आनन्द या उत्साह ) है ॥४ ॥
[ स्वामी, अमात्य, सुहृद्, कोष, राष्ट्र, दुर्ग और सेना- राज्यके ये सात अङ्ग हैं । ]
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*:*५४० रामचरितमानस
दो० –- जीति मोह महिपालु दल सहित बिबेक भुआलु ।
करत अकंटक राजु पुरं सुख संपदा सुकालु ॥ २३५ ॥
मोहरूपी राजाको सेनासहित जीतकर विवेकरूपी राजा निष्कण्टक राज्य कर रहा है । उसके नगरमें सुख, सम्पत्ति और सुकाल वर्तमान है ॥ २३५ ॥
बन प्रदेस मुनि बास घनेरे । जनु पुर नगर गाउँ गन खेरे ॥
बिपुल बिचित्र बिहग मृग नाना । प्रजा समाजु न जाइ बखाना ॥
वनरूपी प्रान्तोंमें जो मुनियोंके बहुत-से निवासस्थान हैं वही मानो शहरों, नगरों, गाँवों और खेड़ोंका समूह है । बहुत-से विचित्र पक्षी और अनेकों पशु ही मानो प्रजाओंका समाज है, जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता ॥ १ ॥
खगहा करि हरि बाघ बराहा । देखि महिष बृष साजु सराहा ॥
बयरु बिहाइ चरहिं एक संगा । जहँ तहँ मनहुँ सेन चतुरंगा ॥
गैंडा, हाथी, सिंह, बाघ, सूअर, भैंसे और बैलोंको देखकर राजाके साजको सराहते ही बनता है । ये सब आपसका वैर छोड़कर जहाँ -तहाँ एक साथ विचरते हैं । यही मानो चतुरङ्गिणी सेना है ॥ २ ॥
झरना झरहिं मत्त गज गाजहिं । मनहुँ निसान बिबिधि बिधि बाजहिं ॥
चक चकोर चातक सुक पिक गन । कूजत मंजु मराल मुदित मन ॥
पानीके झरने झर रहे हैं और मतवाले हाथी चिंघाड़ रहे । वे ही मानो वहाँ अनेकों प्रकारके नगाड़े बज रहे हैं । चकवा, चकोर, पपीहा, तोता तथा कोयलोंके समूह और सुन्दर हंस प्रसन्न मनसे कूज रहे हैं ॥३ ॥
अलिगन गावत नाचत मोरा । जनु सुराज मंगल चहु ओरा ॥
बेलि बिटप तृन सफल सफूला । सब समाजु मुद मंगल मूला ॥
भौंरोंके समूह गुंजार कर रहे हैं और मोर नाच रहे हैं । मानो उस अच्छे राज्यमें चारों ओर मङ्गल हो रहा है । बेल, वृक्ष, तृण सब फल और फूलोंसे युक्त हैं । सारा समाज आनन्द और मङ्गलका मूल बन रहा है ॥४ ॥
दो० – राम सैल सोभा निरखि भरत हृदयँ अति पे ।
तापस तप फलु पाइ जिमि सुखी सिरानें नेमु ॥ २३६ ॥
श्रीरामजीके पर्वतकी शोभा देखकर भरतजीके हृदयमें अत्यन्त प्रेम हुआ । जैसे तपस्वी नियमकी समाप्ति होनेपर तपस्याका फल पाकर सुखी होता है ॥ २३६ ॥
मासपारायण, बीसवाँ विश्राम नवाह्नपारायण, पाँचवाँ विश्राम
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* ** अयोध्याकाण्ड ५४१
तब केवट ऊँचें चढ़ि धाई । कहेउ भरत सन भुजा उठाई ॥
नाथ देखिअहिं बिटप बिसाला । पाकरि जंबु रसाल तमाला ॥
तब केवट दौड़कर ऊँचे चढ़ गया और भुजा उठाकर भरतजीसे कहने लगा— हे नाथ! ये जो पाकर, जामुन, आम और तमालके विशाल वृक्ष दिखायी देते हैं, ॥१ ॥
जिन्ह तरुबरन्ह मध्य बटु सोहा । मंजु बिसाल देखि मनु मोहा ॥
नील सघन पल्लव फल लाला । अबिरल छाहँ सुखद सब काला ॥
जिन श्रेष्ठ वृक्षोंके बीचमें एक सुन्दर विशाल बड़का वृक्ष सुशोभित है, जिसको देखकर मन मोहित हो जाता है, उसके पत्ते नीले और सघन हैं और उसमें लाल फल लगे हैं । उसकी घनी छाया सब ऋतुओंमें सुख देनेवाली है ॥२ ॥
मानहुँ तिमिर अरुनमय रासी । बिरची बिधि सँकेलि सुषमा सी ॥
ए तरु सरित समीप गोसाँई । रघुबर परनकुटी जहँ छाई ॥
मानो ब्रह्माजीने परम शोभाको एकत्र करके अन्धकार और लालिमामयी राशि -सी रच दी है ।
हे गुसाईं! ये वृक्ष नदीके समीप हैं, जहाँ श्रीरामकी पर्णकुटी छायी है ॥३ ॥
तुलसी तरुबर बिबिध सुहाए । कहुँ कहुँ सियँ कहुँ लखन लगाए ॥
बट छायाँ बेदिका बनाई । सियँ निज पानि सरोज सुहाई ॥
वहाँ तुलसीजीके बहुत-से सुन्दर वृक्ष सुशोभित हैं, जो कहीं-कहीं सीताजीने और कहीं लक्ष्मणजीने लगाये हैं । इसी बड़की छायामें सीताजीने अपने करकमलोंसे सुन्दर वेदी बनायी है || 8 ||
दो० – जहाँ बैठि मुनिगन सहित नित सिय रामु सुजान ।
सुनहिं कथा इतिहास सब आगम निगम पुरान ॥ २३७ ॥
जहाँ सुजान श्रीसीतारामजी मुनियोंके वृन्दसमेत बैठकर नित्य शास्त्र, वेद और पुराणोंके सब कथा - इतिहास सुनते हैं ॥ २३७ ॥
सखा बचन सुनि बिटप निहारी । उमगे भरत बिलोचन बारी ॥
करत प्रनाम चले दोउ भाई । कहत प्रीति सारद सकुचाई ॥
सखाके वचन सुनकर और वृक्षोंको देखकर भरतजीके नेत्रोंमें जल उमड़ आया । दोनों भाई प्रणाम करते हुए चले । उनके प्रेमका वर्णन करनेमें सरस्वतीजी भी सकुचाती हैं ॥१ ॥
हरषहिं निरखि राम पद अंका । मानहुँ पारसुपारसु पायउ रंका ॥
रज सिर धरि हियँ नयनन्हि लावहिं । रघुबर मिलन सरिस सुख पावहिं ॥
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* *५४२ रामचरितमानस श्रीरामचन्द्रजीके चरणचिह्न देखकर दोनों भाई ऐसे हर्षित होते हैं मानो दरिद्र पारस पा गया हो । वहाँकी रजको मस्तकपर रखकर हृदयमें और नेत्रोंमें लगाते हैं और श्रीरघुनाथजीके मिलनेके समान सुख पाते हैं ॥ २ ॥
देखि भरत गति अकथ अतीवा । प्रेम मगन मृग खग जड़ जीवा ॥
सखहि सनेह बिबस मग भूला । कहि सुपंथ सुर बरषहिं फूला ॥
भरतजीकी अत्यन्त अनिर्वचनीय दशा देखकर वनके पशु, पक्षी और जड़ ( वृक्षादि ) जीव प्रेममें मग्न हो गये । प्रेमके विशेष वश होनेसे सखा निषादराजको भी रास्ता भूल गया । तब देवता सुन्दर रास्ता बतलाकर फूल बरसाने लगे ॥ ३ ॥
निरखि सिद्ध साधक अनुरागे । सहज सनेहु सराहन लागे ॥
होत न भूतल भाउ भरत को । अचर सचर चर अचर करत को ॥
भरतके प्रेमकी इस स्थितिको देखकर सिद्ध और साधकलोग भी अनुरागसे भर गये और उनके स्वाभाविक प्रेमकी प्रशंसा करने लगे कि यदि इस पृथ्वीतलपर भरतका जन्म [ अथवा प्रेम ] न होता, तो जड़को चेतन और चेतनको जड़ कौन करता? ॥४ ॥
दो० – पेम अमिअ मंदरु बिरहु भरतु पयोधि गँभीर ।
मथि प्रगटे सुर साधु हित कृपासिंधु रघुबीर ॥ २३८ ॥
प्रेम अमृत है, विरह मन्दराचल पर्वत है, भरतजी गहरे समुद्र हैं । कृपाके समुद्र श्रीरामचन्द्रजीने देवता और साधुओंके हितके लिये स्वयं [ इस भरतरूपी गहरे समुद्रको अपने विरहरूपी मन्दराचलसे ] मथकर यह प्रेमरूपी अमृत प्रकट किया है ॥ २३८ ॥
सखा समेत मनोहर जोटा । लखेउ न लखन सघन बन ओटा ॥
भरत दीख प्रभु आश्रमु पावन । सकल सुमंगल सदनु सुहावन ॥
सखा निषादराजसहित इस मनोहर जोड़ीको सघन वनकी आड़के कारण लक्ष्मणजी नहीं देख पाये । भरतजीने प्रभु श्रीरामचन्द्रजीके समस्त सुमङ्गलोंके धाम और सुन्दर पवित्र आश्रमको देखा ॥ १ ॥
करत प्रबेस मिटे दुख दावा । जनु जोगीं परमारथु पावा ॥
देखे भरत लखन प्रभु आगे । पूँछे बचन कहत अनुरागे ॥
आश्रममें प्रवेश करते ही भरतजीका दुःख और दाह ( जलन ) मिट गया, मानो योगीको परमार्थ (परमतत्त्व) की प्राप्ति हो गयी हो । भरतजीने देखा कि लक्ष्मणजी प्रभुके आगे खड़े हैं और पूछे हुए वचन प्रेमपूर्वक कह रहे हैं ( पूछी हुई बातका प्रेमपूर्वक उत्तर दे रहे हैं ) ॥२ ॥
सीस जटा कटि मुनि पट बाँधें । तून कसें कर सरु धनु काँधे ॥
बेदी पर मुनि साधु समाजू। सीय सहित राजत रघुराजू॥
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* ** अयोध्याकाण्ड ५४३ सिरपर जटा है । कमरमें मुनियोंका ( वल्कल ) वस्त्र बाँधे हैं और उसीमें तरकस कसे हैं । हाथमें बाण तथा कंधेपर धनुष है । वेदीपर मुनि तथा साधुओंका समुदाय बैठा है और सीताजीसहित श्रीरघुनाथजी विराजमान हैं ॥३ ॥
बलकल बसन जटिल तनु स्यामा । जनु मुनिबेष कीन्ह रति कामा ॥
कर कमलनि धनु सायकु फेरत । जिय की जरनि हरत हँसि हेरत ॥
श्रीरामजीके वल्कल वस्त्र हैं, जटा धारण किये हैं, श्याम शरीर है [ सीतारामजी ऐसे लगते हैं ] मानो रति और कामदेवने मुनिका वेष धारण किया हो । श्रीरामजी अपने करकमलोंसे धनुष-बाण फेर रहे हैं, और हँसकर देखते ही जीकी जलन हर लेते हैं ( अर्थात् जिसकी ओर भी एक बार हँसकर देख लेते हैं, उसीको परम आनन्द और शान्ति मिल
जाती है । ) ॥ ४ ॥
दो० - लसत मंजु मुनि मंडली मध्य सीय रघुचंदु ।
ग्यान सभाँ जनु तनु धरें भगति सच्चिदानंदु ॥ २३ ९ ॥
सुन्दर मुनिमण्डलीके बीचमें सीताजी और रघुकुलचन्द्र श्रीरामचन्द्रजी ऐसे सुशोभित हो रहे हैं मानो ज्ञानकी सभामें साक्षात् भक्ति और सच्चिदानन्द शरीर धारण करके विराजमान हैं ॥ २३ ९ ॥
सानुज सखा समेत मगन मन । बिसरे हरष सोक सुख दुख गन ॥
पाहि नाथ कहि पाहि गोसाईं । भूतल परे लकुट की नाईं ॥
छोटे भाई शत्रुघ्न और सखा निषादराजसमेत भरतजीका मन [प्रेममें ] मग्न हो रहा है । हर्ष-शोक, सुख-दुःख आदि सब भूल गये । ' हे नाथ! रक्षा कीजिये, हे गुसाईं! रक्षा कीजिये ' ऐसा कहकर वे पृथ्वीपर दण्डकी तरह गिर पड़े ॥१ ॥
बचन सपेम लखन पहिचाने । करत प्रनामु भरत जियँ जाने ॥
बंधु सनेह सरस एहि ओरा । उत साहिब सेवा बस जोरा ॥
प्रेमभरे वचनोंसे लक्ष्मणजीने पहचान लिया और मनमें जान लिया कि भरतजी प्रणाम कर रहे हैं । [ वे श्रीरामजीकी ओर मुँह किये खड़े थे, भरतजी पीठ पीछे थे; इससे उन्होंने देखा नहीं । ] अब इस ओर तो भाई भरतजीका सरस प्रेम और उधर स्वामी श्रीरामचन्द्रजीकी सेवाकी प्रबल परवशता ॥२ ॥
मिलि न जाइ नहिं गुदरत बनई । सुकबि लखन मन की गति भनई ॥
रहे राखि सेवा पर भारू । चढ़ी चंग जनु खैच खेलारू ॥
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* *५४४ रामचरितमानस न तो [ क्षणभरके लिये भी सेवासे पृथक् होकर ] मिलते ही बनता है और न [प्रेमवश ] छोड़ते ( उपेक्षा करते ) ही । कोई श्रेष्ठ कवि ही लक्ष्मणजीके चित्तकी इस गति ( दुविधा ) का वर्णन कर सकता है । वे सेवापर भार रखकर रह गये ( सेवाको ही विशेष महत्त्वपूर्ण समझकर उसीमें लगे रहे ) मानो चढ़ी हुई पतंगको खिलाड़ी ( पतंग उड़ानेवाला) खींच रहा हो ॥३ ॥
कहत सप्रेम नाइ महि माथा । भरत प्रनाम करत रघुनाथा ॥
उठे रामु सुनि पेम अधीरा । कहुँ पट कहुँ निषंग धनु तीरा ॥
लक्ष्मणजीने प्रेमसहित पृथ्वीपर मस्तक नवाकर कहा–हे रघुनाथजी! भरतजी प्रणाम कर रहे हैं । यह सुनते ही श्रीरघुनाथजी प्रेममें अधीर होकर उठे । कहीं वस्त्र गिरा, कहीं तरकस, कहीं धनुष और कहीं बाण ॥ ४ ॥
दो० – बरबस लिए उठाइ उर लाए कृपानिधान ।
भरत राम की मिलनि लखि बिसरे सबहि अपान ॥ २४० ॥
कृपानिधान श्रीरामचन्द्रजीने उनको जबरदस्ती उठाकर हृदयसे लगा लिया । भरतजी और श्रीरामजीके मिलनेकी रीतिको देखकर सबको अपनी सुध भूल गयी ॥ २४० ॥
मिलनि प्रीति किमि जाइ बखानी । कबिकुल अगम करम मन बानी ॥
परम पेम पूरन दोउ भाई । मन बुधि चित अहमिति बिसराई ॥
मिलनकी प्रीति कैसे बखानी जाय? वह तो कविकुलके लिये कर्म, मन, वाणी तीनोंसे अगम है । दोनों भाई ( भरतजी और श्रीरामजी ) मन, बुद्धि, चित्त और अहंकारको भुलाकर परम प्रेमसे पूर्ण हो रहे हैं ॥ १ ॥
कहहु सुपेम प्रगट को करई । केहि छाया कबि मति अनुसरई ॥
कबिहि अरथ आखर बलु साँचा । अनुहरि ताल गतिहि नटु नाचा ॥
कहिये, उस श्रेष्ठ प्रेमको कौन प्रकट करे? कविकी बुद्धि किसकी छायाका अनुसरण करे? कविको तो अक्षर और अर्थका ही सच्चा बल है । नट तालकी गतिके अनुसार ही नाचता है! ॥ २ ॥
अगम सनेह भरत रघुबर को । जहँ न जाइ मनु बिधि हरि हर को ॥
सो मैं कुमति कहौं केहि भाँती । बाज सुराग कि गाँडर ताँती ॥
भरतजी और श्रीरघुनाथजीका प्रेम अगम्य है, जहाँ ब्रह्मा, विष्णु और महादेवका भी मन नहीं जा सकता । उस प्रेमको मैं कुबुद्धि किस प्रकार कहूँ! भला, गाँडरकी ताँतसे भी कहीं सुन्दर राग बज सकता है? ॥३ ॥
[तालाबों और झीलोंमें एक तरहकी घास होती है, उसे गाँडर कहते हैं । ]
मिलनि बिलोकि भरत रघुबर की । सुरगन सभय धकधकी धरकी ॥
समुझाए सुरगुरु जड़ जागे । बरषि प्रसून प्रसंसन लागे ॥
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* * अयोध्याकाण्ड ५४५ भरतजी और श्रीरामचन्द्रजीके मिलनेका ढंग देखकर देवता भयभीत हो गये, उनकी धुकधुकी धड़कने लगी । देवगुरु बृहस्पतिजीने समझाया, तब कहीं वे मूर्ख चेते और फूल बरसाकर प्रशंसा करने लगे ॥ ४ ॥
दो० - मिलि सपेम रिपुसूदनहि केवटु भेंटेउ राम ।
भूरि भायँ भेंटे भरत लछिमन करत प्रनाम ॥ २४१ ॥
फिर श्रीरामजी प्रेमके साथ शत्रुघ्नसे मिलकर तब केवट ( निषादराज ) से मिले । प्रणाम करते हुए लक्ष्मणजीसे भरतजी बड़े ही प्रेमसे मिले ॥ २४१ ॥
भेंटेड लखन ललकि लघु भाई । बहुरि निषादु लीन्ह उर लाई ॥
पुनि मुनिगन दुहुँ भाइह बंदे । अभिमत आसिष पाइ अनंदे ॥
तब लक्ष्मणजी ललककर ( बड़ी उमंगके साथ ) छोटे भाई शत्रुघ्नसे मिले । फिर उन्होंने निषादराजको हृदयसे लगा लिया । फिर भरत-शत्रुघ्न दोनों भाइयोंने [ उपस्थित ] मुनियोंको प्रणाम किया और इच्छित आशीर्वाद पाकर वे आनन्दित हुए ॥१ ॥
सानुज भरत उमगि अनुरागा । धरि सिर सिय पद पदुम परागा ॥
पुनि पुनि करत प्रनाम उठाए । सिर कर कमल परसि बैठाए ॥
छोटे भाई शत्रुघ्नसहित भरतजी प्रेममें उमँगकर सीताजीके चरणकमलोंकी रज सिरपर धारणकर बार- बार प्रणाम करने लगे । सीताजीने उन्हें उठाकर उनके सिरको अपने करकमलसे स्पर्शकर ( सिरपर हाथ फेरकर ) उन दोनोंको बैठाया ॥२ ॥
सीयँ असीस दीन्हि मन माहीं । मगन सनेहँ देह सुधि नाहीं ॥
सब बिधि सानुकूल लखि सीता । भे निसोच उर अपडर बीता ॥
सीताजीने मन-ही- मन आशीर्वाद दिया; क्योंकि वे स्नेहमें मग्न हैं, उन्हें देहकी सुध- बुध नहीं है । सीताजीको सब प्रकारसे अपने अनुकूल देखकर भरतजी सोचरहित हो गये और उनके हृदयका कल्पित भय जाता रहा ॥३ ॥
कोउ किछु कहइ न कोउ किछु पूँछा । प्रेम भरा मन निज गति घूँछा ॥
तेहि अवसर केवटु धीरजु धरि । जोरि पानि बिनवत प्रनामु करि ॥
उस समय न तो कोई कुछ कहता है, न कोई कुछ पूछता है । मन प्रेमसे परिपूर्ण है, वह अपनी गतिसे खाली है ( अर्थात् संकल्प- विकल्प और चाञ्चल्यसे शून्य है ) । उस अवसरपर केवट ( निषादराज ) धीरज धर और हाथ जोड़कर प्रणाम करके विनती करने लगा—॥४ ॥
दो० – नाथ साथ मुनिनाथ के मातु सकल पुर लोग ।
सेवक सेनप सचिव सब आए बिकल बियोग ॥ २४२ ॥
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* *५४६ रामचरितमानस हे नाथ! मुनिनाथ वसिष्ठजीके साथ सब माताएँ, नगरनिवासी, सेवक, सेनापति, मन्त्री – सब आपके वियोगसे व्याकुल होकर आये हैं ॥ २४२ ॥
सीलसिंधु सुनि गुर आगवनू । सिय समीप राखे रिपुदवनू ॥
चले सबेग रामु तेहि काला । धीर धरम धुर दीनदयाला ॥
गुरुका आगमन सुनकर शीलके समुद्र श्रीरामचन्द्रजीने सीताजीके पास शत्रुघ्नजीको रख दिया और वे परम धीर, धर्मधुरन्धर, दीनदयालु श्रीरामचन्द्रजी उसी समय वेगके साथ चल पड़े ॥१ ॥
गुरहि देखि सानुज अनुरागे । दंड प्रनाम करन प्रभु लागे ॥
मुनिबर धाइ लिए उर लाई । प्रेम उमगि भेंटे दोउ भाई ॥
गुरुजीके दर्शन करके लक्ष्मणजीसहित प्रभु श्रीरामचन्द्रजी प्रेममें भर गये और दण्डवत् प्रणाम करने लगे । मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठजीने दौड़कर उन्हें हृदयसे लगा लिया और प्रेममें उमँगकर वे दोनों भाइयोंसे मिले ॥२ ॥
प्रेम पुलकि केवट कहि नामू । कीन्ह दूरि तें दंड प्रनामू॥
रामसखा रिषि बरबस भेंटा । जनु महि लुठत सनेह समेटा ॥
फिर प्रेमसे पुलकित होकर केवट ( निषादराज ) ने अपना नाम लेकर दूरसे ही वसिष्ठजीको दण्डवत् प्रणाम किया । ऋषि वसिष्ठजीने रामसखा जानकर उसको जबर्दस्ती हृदयसे लगा लिया । मानो जमीनपर लोटते हुए प्रेमको समेट लिया हो ॥३ ॥
रघुपति भगति सुमंगल मूला । नभ सराहि सुर बरिसहिं फूला ॥
एहि सम निपट नीच कोउ नाहीं । बड़ बसिष्ठ सम को जग माहीं ॥
श्रीरघुनाथजीकी भक्ति सुन्दर मङ्गलोंका मूल है, इस प्रकार कहकर सराहना करते हुए देवता आकाशसे फूल बरसाने लगे । वे कहने लगे-जगत्में इसके समान सर्वथा नीच कोई नहीं और वसिष्ठजीके समान बड़ा कौन हैं? ॥ ४ ॥
दो० – जेहि लखि लखनहु तें अधिक मिले मुदित मुनिराउ ।
सो सीतापति भजन को प्रगट प्रताप प्रभाउ ॥२४३ ॥
जिस ( निषाद ) को देखकर मुनिराज वसिष्ठजी लक्ष्मणजीसे भी अधिक उससे आनन्दित होकर मिले । यह सब सीतापति श्रीरामचन्द्रजीके भजनका प्रत्यक्ष प्रताप और प्रभाव है ॥ २४३ ॥
आरत लोग राम सबु जाना । करुनाकर सुजान भगवाना ॥
जो जेहि भायँ रहा अभिलाषी । तेहि तेहि कै तसि तसि रुख राखी ॥
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* ** अयोध्याकाण्ड ५४७ दयाकी खान, सुजान भगवान् श्रीरामजीने सब लोगोंको दुखी ( मिलनेके लिये व्याकुल ) जाना । तब जो जिस भावसे मिलनेका अभिलाषी था, उस उसका उस-उस प्रकारका रुख रखते हुए (उसकी रुचिके अनुसार ) ॥ १ ॥
सानुज'मिलि पल महुँ सब काहू । कीन्ह दूरि दुखु दारुन दाहू॥
यह बड़ि बात राम कै नाहीं । जिमि घट कोटि एक रबि छाहीं ॥
उन्होंने लक्ष्मणजीसहित पलभरमें सब किसीसे मिलकर उनके दुःख और कठिन संतापको दूर कर दिया । श्रीरामचन्द्रजीके लिये यह कोई बड़ी बात नहीं है । जैसे करोड़ों घड़ोंमें एक ही सूर्यकी [ पृथक् - पृथक् ] छाया ( प्रतिबिम्ब ) एक साथ ही दीखती है ॥२ ॥
मिलि केवटहि उमगि अनुरागा । पुरजन सकल सराहहिं भागा ॥
देखीं राम दुखित महतारीं । जनु सुबेलि अवलीं हिम मारीं ॥
समस्त पुरवासी प्रेममें उमँगकर केवटसे मिलकर [ उसके ] भाग्यकी सराहना करते हैं । श्रीरामचन्द्रजीने सब माताओंको दुखी देखा । मानो सुन्दर लताओंकी पंक्तियोंको पाला मार गया हो ॥३ ॥
प्रथम राम भेंटी कैकेई । सरल सुभायँ भगति मति भेई ॥
पग परि कीन्ह प्रबोधु बहोरी । काल करम बिधि सिर धरि खोरी ॥
सबसे पहले रामजी कैकेयीसे मिले और अपने सरल स्वभाव तथा भक्तिसे उसकी बुद्धिको तर कर दिया । फिर चरणोंमें गिरकर काल, कर्म और विधाताके सिर दोष मँढ़कर, श्रीरामजीने उनको सान्त्वना दी ॥४ ॥
दो०- भेटीं रघुबर मातु सब करि प्रबोधु परितोषु ।
अंब ईस आधीन जगु काहु न देइअ दोषु ॥ २४४ ॥
फिर श्रीरघुनाथजी सब माताओंसे मिले । उन्होंने सबको समझा- बुझाकर सन्तोष कराया कि हे माता! जगत् ईश्वरके अधीन है, किसीको भी दोष नहीं देना चाहिये ॥ २४४ ॥
गुरतिय पद बंदे दुहु भाईं । सहित बिप्रतिय जे सँग आईं ॥
गंग गौरि सम सब सनमानीं । देहिं असीस मुदित मृदु बानीं ॥
फिर दोनों भाइयोंने ब्राह्मणोंकी स्त्रियोंसहित –जो भरतजीके साथ आयी थीं, गुरुजीकी पत्नी अरुन्धतीजीके चरणोंकी वन्दना की और उन सबका गङ्गाजी तथा गौरीजीके समान सम्मान किया । वे सब आनन्दित होकर कोमल वाणीसे आशीर्वाद देने लगीं ॥१ ॥
गहि पद लगे सुमित्रा अंका । जनु भेंटी संपति अति रंका ॥
पुनि जननी चरननि दोउ भ्राता । परे पेम ब्याकुल सब गाता ॥
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* *५४८ रामचरितमानस तब दोनों भाई पैर पकड़कर सुमित्राजीकी गोदमें जा चिपटे । मानो किसी अत्यन्त दरिद्रको सम्पत्तिसे भेंट हो गयी हो । फिर दोनों भाई माता कौसल्याजीके चरणोंमें गिर पड़े । प्रेमके मारे उनके सारे अंग शिथिल हैं ॥ २ ॥
अति अनुराग अंब उर लाए । नयन सनेह सलिल अन्हवाए ॥
तेहि अवसर कर हरष बिषादू । किमि कबि कहै मूक जिमि स्वादू ॥
बड़े ही स्नेहसे माताने उन्हें हृदयसे लगा लिया और नेत्रोंसे बहे हुए प्रेमाश्रुओंके जलसे उन्हें नहला दिया । उस समयके हर्ष और विषादको कवि कैसे कहे? जैसे गूँगा स्वादको कैसे बतावे? ॥ ३ ॥
मिलि जननिहि सानुज रघुराऊ । गुर सन कहेउ कि धारिअ पाऊ ॥
पुरजन पाइ मुनीस नियोगू । जल थल तकि तकि उतरेउ लोगू ॥
श्रीरघुनाथजीने छोटे भाई लक्ष्मणजीसहित माता कौसल्यासे मिलकर गुरुसे कहा कि आश्रमपर पधारिये । तदनन्तर मुनीश्वर वसिष्ठजीकी आज्ञा पाकर अयोध्यावासी सब लोग जल और थलका सुभीता देख- देखकर उतर गये ॥४ ॥
दो० – महिसुर मंत्री मातु गुर गने लोग लिए साथ ।
पावन आश्रम गवनु किय भरत लखन रघुनाथ ॥ २४५ ॥
ब्राह्मण, मन्त्री, माताएँ और गुरु आदि गिने - चुने लोगोंको साथ लिये हुए, भरतजी, लक्ष्मणजी और श्रीरघुनाथजी पवित्र आश्रमको चले ॥ २४५ ॥
सीय आइ मुनिबर पग लागी । उचित असीस लही मन मागी ॥
गुरपतिनिहि मुनितियन्ह समेता । मिली पेमु कहि जाइ न जेता ॥
सीताजी आकर मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठजीके चरणों लगीं और उन्होंने मनमाँगी उचित आशिष पायी । फिर मुनियोंकी स्त्रियोंसहित गुरुपत्नी अरुन्धतीजीसे मिलीं । उनका जितना प्रेम था, वह कहा नहीं जाता ॥ १ ॥
बंदि बंदि पग सिय सबही के । आसिरबचन लहे प्रिय जी के ॥
सासु सकल जब सीयँ निहारीं । मूदे नयन सहमि सुकुमारीं ॥
सीताजीने सभीके चरणोंकी अलग- अलग वन्दना करके अपने हृदयको प्रिय ( अनुकूल ) लगनेवाले आशीर्वाद पाये । जब सुकुमारी सीताजीने सब सासुओंको देखा, तब उन्होंने सहमकर अपनी आँखें बंद कर लीं ॥ २ ॥
परीं बधिक बस मनहुँ मरालीं । काह कीन्ह करतार कुचालीं ॥
तिन्ह सिय निरखि निपट दुखु पावा । सो सबु सहिअ जो दैउ सहावा ॥
[सासुओंकी बुरी दशा देखकर ] उन्हें ऐसा प्रतीत हुआ मानो राजहंसिनियाँ बधिकके वशमें पड़ गयी हों । [ मनमें सोचने लगीं कि] कुचाली विधाताने क्या कर डाला? उन्होंने भी सीताजीको देखकर बड़ा दुःख पाया । [ सोचा ] जो कुछ दैव सहावे, वह सब सहना ही पड़ता है ॥ ३ ॥