श्रीरामचरितमानस — पृष्ठ 551–560
श्रीरामचरितमानस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 551–560
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* अयोध्याकाण्ड * ५४९
जनकसुता तब उर धरि धीरा । नील नलिन लोयन भरि नीरा ॥
मिली सकल सासुन्ह सिय जाई । तेहि अवसर करुना महि छाई ॥
तब जानकीजी हृदयमें धीरज धरकर, नील कमलके समान नेत्रोंमें जल भरकर, सब सासुओंसे जाकर मिलीं । उस समय पृथ्वीपर करुणा ( करुण -रस) छा गयी ॥ ४ ॥
दो० - लागि लागि पग सबनि सिय भेंटति अति अनुराग ।
हृदयँ असीसहिं पेम बस रहिअहु भरी सोहाग ॥ २४६ ॥
सीताजी सबके पैरों लग-लगकर अत्यन्त प्रेमसे मिल रही हैं, और सब सासुएँ स्नेहवश हृदयसे आशीर्वाद दे रही हैं कि तुम सुहागसे भरी रहो ( अर्थात् सदा सौभाग्यवती रहो ) ॥ २४६ ॥
बिकल सनेहँ सीय सब रानीं । बैठन सबहि कहेउ गुर ग्यानीं ॥
कहि जग गति मायिक मुनिनाथा । कहे कछुक परमारथ गाथा ॥
सीताजी और सब रानियाँ स्नेहके मारे व्याकुल हैं । तब ज्ञानी गुरुने सबको बैठ जानेके लिये कहा । फिर मुनिनाथ वसिष्ठजीने जगत्की गतिको मायिक कहकर ( अर्थात् जगत् मायाका है, इसमें कुछ भी नित्य नहीं है, ऐसा कहकर) कुछ परमार्थकी कथाएँ ( बातें ) कहीं ॥१ ॥
नृप कर सुरपुर गवनु सुनावा । सुनि रघुनाथ दुसह दुखु पावा ॥
मरन हेतु निज नेहु बिचारी । भे अति बिकल धीर धुर धारी ॥
तदनन्तर वसिष्ठजीने राजा दशरथजीके स्वर्गगमनकी बात सुनायी, जिसे सुनकर रघुनाथजीने दुःसह दुःख पाया । और अपने प्रति उनके स्नेहको उनके मरनेका कारण विचारकर धीरधुरन्धर श्रीरामचन्द्रजी अत्यन्त व्याकुल हो गये ॥ २ ॥
कुलिस कठोर सुनत कटु बानी । बिलपत लखन सीय सब रानी ॥
सोक बिकल अति सकल समाजू । मानहुँ राजु अकाजेउ आजू ॥
वज्रके समान कठोर, कड़वी वाणी सुनकर लक्ष्मणजी, सीताजी और सब रानियाँ विलाप करने लगीं । सारा समाज शोकसे अत्यन्त व्याकुल हो गया! मानो राजा आज ही मरे हों ॥ ३ ॥
मुनिबर बहुरि राम समुझाए । सहित समाज सुसरित नहाए ॥
ब्रतु निरंबु तेहि दिन प्रभु कीन्हा । मुनिहु कहें जलु काहुँ न लीन्हा ॥
फिर मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठजीने श्रीरामजीको समझाया । तब उन्होंने समाजसहित श्रेष्ठ नदी मन्दाकिनीजीमें स्नान किया । उस दिन प्रभु श्रीरामचन्द्रजीने निर्जल व्रत किया । मुनि वसिष्ठजीके कहनेपर भी किसीने जल ग्रहण नहीं किया ॥४ ॥
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*:*५५० रामचरितमानस
दो० - भोरु भएँ रघुनंदनहि जो मुनि आयसु दीन्ह ।
श्रद्धा भगति समेत प्रभु सो सबु सादरु कीन्ह ॥ २४७ ॥
दूसरे दिन सबेरा होनेपर मुनि वसिष्ठजीने श्रीरघुनाथजीको जो-जो आज्ञा दी, वह सब कार्य प्रभु श्रीरामचन्द्रजीने श्रद्धा- भक्तिसहित आदरके साथ किया ॥ २४७ ॥
करि पितु क्रिया बेद जसि बरनी । भे पुनीत पातक तम तरनी ॥
जासु नाम पावक अघ तूला । सुमिरत सकल सुमंगल मूला ॥
वेदोंमें जैसा कहा गया है, उसीके अनुसार पिताकी क्रिया करके, पापरूपी अन्धकारके नष्ट करनेवाले सूर्यरूप श्रीरामचन्द्रजी शुद्ध हुए! जिनका नाम पापरूपी रूईके [ तुरंत जला डालनेके ] लिये अग्नि है; और जिनका स्मरणमात्र समस्त शुभ मङ्गलोंका मूल है, ॥१ ॥
सुद्ध सो भयउ साधु संमत अस । तीरथ आवाहन सुरसरि जस ॥
सुद्ध भएँ दुइ बासर बीते । बोले गुर सन राम पिरीते ॥
वे [ नित्य शुद्ध - बुद्ध ] भगवान् श्रीरामजी शुद्ध हुए । साधुओंकी ऐसी सम्मति है कि उनका शुद्ध होना वैसे ही है जैसा तीर्थोंके आवाहनसे गङ्गाजी शुद्ध होती हैं! ( गङ्गाजी तो स्वभावसे ही शुद्ध हैं, उनमें जिन तीर्थोंका आवाहन किया जाता है उलटे वे ही गङ्गाजीके सम्पर्कमें आनेसे शुद्ध हो जाते हैं । इसी प्रकार सच्चिदानन्दरूप श्रीराम तो नित्य शुद्ध हैं, उनके संसर्गसे कर्म ही शुद्ध हो गये । ) जब शुद्ध हुए दो दिन बीत गये तब श्रीरामचन्द्रजी प्रीतिके साथ गुरुजीसे बोले– ॥२ ॥
नाथ लोग सब निपट दुखारी । कंद मूल फल अंबु अहारी ॥
सानुज भरतु सचिव सब माता । देखि मोहि पल जिमि जुग जाता ॥
हे नाथ! सब लोग यहाँ अत्यन्त दुखी हो रहे हैं । कन्द, मूल, फल और जलका ही आहार करते हैं । भाई शत्रुघ्नसहित भरतको, मन्त्रियोंको और सब माताओंको देखकर मुझे एक- एक पल युगके समान बीत रहा है ॥३ ॥
सब समेत पुर धारिअ पाऊ । आपु इहाँ अमरावति राऊ ॥
बहुत कहेउँ सब कियउँ ढिठाई । उचित होइ तस करिअ गोसाँई ॥
अतः सबके साथ आप अयोध्यापुरीको पधारिये ( लौट जाइये ) । आप यहाँ हैं, और राजा अमरावती ( स्वर्ग ) में हैं ( अयोध्या सूनी है )! मैंने बहुत कह डाला, यह सब बड़ी ढिठाई की है । हे गोसाईं! जैसा उचित हो, वैसा ही कीजिये ॥४ ॥
दो० – धर्म सेतु करुनायतन कस न कहहु अस राम ।
लोग दुखित दिन दुइ दरस देखि लहहुँ बिश्राम ॥ २४८ ॥
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* ** अयोध्याकाण्ड ५५१ [ वसिष्ठजीने कहा— ] हे राम! तुम धर्मके सेतु और दयाके धाम हो, तुम भला ऐसा क्यों न कहो? लोग दुखी हैं । दो दिन तुम्हारा दर्शन कर शान्ति लाभ कर लें ॥ २४८ ॥
राम बचन सुनि सभ्य समाजू । जनु जलनिधि महुँ बिकल जहाजू ॥
सुनि गुर गिरा सुमंगल मूला । भयउ मनहुँ मारुत अनुकूला ॥
श्रीरामजीके वचन सुनकर सारा समाज भयभीत हो गया । मानो बीच समुद्रमें जहाज डगमगा गया हो । परन्तु जब उन्होंने गुरु वसिष्ठजीकी श्रेष्ठ कल्याणमूलक वाणी सुनी, तो उस जहाजके लिये मानो हवा अनुकूल हो गयी ॥ १ ॥
पावन पयँ तिहुँ काल नहाहीं । जो बिलोकि अघ ओघ नसाहीं ॥
मंगलमूरति लोचन भरि भरि । निरखहिं हरषि दंडवत करि करि ॥
सब लोग पवित्र पयस्विनी नदीमें [ अथवा पयस्विनी नदीके पवित्र जलमें ] तीनों समय ( सबेरे, दोपहर और सायंकाल ) स्नान करते हैं, जिसके दर्शनसे ही पापोंके समूह नष्ट हो जाते हैं और मङ्गलमूर्ति श्रीरामचन्द्रजीको दण्डवत् प्रणाम कर- करके उन्हें नेत्र भर- भरकर देखते हैं ॥२ ॥
राम सैल बन देखन जाहीं । जहँ सुख सकल सकल दुख नाहीं ॥
झरना झरहिं सुधासम बारी । त्रिविध तापहर त्रिबिध बयारी ॥
सब श्रीरामचन्द्रजीके पर्वत ( कामदगिरि) और वनको देखने जाते हैं, जहाँ सभी सुख हैं और सभी दुःखोंका अभाव है । झरने अमृतके समान जल झरते हैं और तीन प्रकारकी ( शीतल, मन्द, सुगन्ध) हवा तीनों प्रकारके ( आध्यात्मिक, आधिभौतिक, आधिदैविक ) तापोंको हर लेती है ॥३ ॥
बिटप बेलि तृन अगनित जाती । फल प्रसून पल्लव बहु भाँती ॥
सुंदर सिला सुखद तरु छाहीं । जाइ बरनि बन छबि केहि पाहीं ॥
असंख्य जातिके वृक्ष, लताएँ और तृण हैं तथा बहुत तरहके फल, फूल और पत्ते हैं । सुन्दर शिलाएँ हैं । वृक्षोंकी छाया सुख देनेवाली है । वनकी शोभा किससे वर्णन की जा सकती है? ॥४ ॥
दो० – सरनि सरोरुह जल बिहग कूजत गुंजत भृंग ।
बैर बिगत बिहरत बिपिन मृग बिहंग बहुरंग ॥ २४९ ॥
तालाबोंमें कमल खिल रहे हैं, जलके पक्षी कूज रहे हैं, भौरे गुंजार कर रहे हैं और बहुत रंगोंके पक्षी और पशु वनमें वैररहित होकर विहार कर रहे हैं ॥ २४ ९ ॥
कोल किरात भिल्ल बनबासी । मधु सुचि सुंदर स्वादु सुधा सी ॥
भरि भरि परन पुटीं रचि रूरी । कंद मूल फल अंकुर जूरी ॥
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* *५५२ रामचरितमानस कोल, किरात और भील आदि वनके रहनेवाले लोग पवित्र, सुन्दर एवं अमृतके समान स्वादिष्ट मधु ( शहद ) को सुन्दर दोने बनाकर और उनमें भर- भरकर तथा कन्द, मूल, फल और अंकुर आदिकी जूड़ियों ( अँटियों ) को ॥१ ॥
सबहि देहिं करि बिनय प्रनामा । कहि कहि स्वाद भेद गुन नामा ॥
Iदेहिं लोग बहु मोल न लेहीं । फेरत राम दोहाई देहीं ॥
सबको विनय और प्रणाम करके उन चीजोंके अलग- अलग स्वाद, भेद ( प्रकार ), गुण और नाम बता- बताकर देते हैं । लोग उनका बहुत दाम देते हैं, पर वे नहीं लेते और लौटा देनेमें श्रीरामजीकी दुहाई देते हैं ॥२ ॥
कहहिं सनेह मगन मृदु बानी । मानत साधु पेम पहिचानी ॥
तुम्ह सुकृती हम नीच निषादा । पावा दरसनु राम प्रसादा ॥
प्रेममें मग्न हुए वे कोमल वाणीसे कहते हैं कि साधु लोग प्रेमको पहचानकर उसका सम्मान करते हैं ( अर्थात् आप साधु हैं, आप हमारे प्रेमको देखिये, दाम देकर या वस्तुएँ लौटाकर हमारे प्रेमका तिरस्कार न कीजिये । आप तो पुण्यात्मा हैं, हम नीच निषाद हैं । श्रीरामजीकी कृपासे ही हमने आपलोगोंके दर्शन पाये हैं ॥ ३ ॥
हमहि अगम अति दरसु तुम्हारा । जस मरु धरनि देवधुनि धारा ॥
राम कृपाल निषाद नेवाजा । परिजन प्रजउ चहिअ जस राजा ॥
हमलोगोंको आपके दर्शन बड़े ही दुर्लभ हैं, जैसे मरुभूमिके लिये गङ्गाजीकी धारा दुर्लभ है! [ देखिये, ] कृपालु श्रीरामचन्द्रजीने निषादपर कैसी कृपा की है । जैसे राजा हैं वैसा ही उनके परिवार और प्रजाको भी होना चाहिये ॥ ४ ॥
दो० –- यह जियँ जानि सँकोचु तजि करिअ छोहु लखि नेहु ।
हमहि कृतारथ करन लगि फल तृन अंकुर लेहु ॥ २५० ॥
हृदयमें ऐसा जानकर संकोच छोड़कर और हमारा प्रेम देखकर कृपा कीजिये और हमको कृतार्थ करनेके लिये ही फल, तृण और अंकुर लीजिये ॥ २५० ॥
तुम्ह प्रिय पाहुने बन पगु धारे । सेवा जोगु न भाग हमारे ॥
देब काह हम तुम्हहि गोसाँई ॥ ईंधनु पात किरात मिताई ॥
आप प्रिय पाहुने वनमें पधारे हैं । आपकी सेवा करनेके योग्य हमारे भाग्य नहीं हैं । हे स्वामी! हम आपको क्या देंगे? भीलोंकी मित्रता तो बस, ईंधन ( लकड़ी) और पत्तोंहीतक है ॥ १ ॥
यह हमारि अति बड़ि सेवकाई । लेहिं न बासन बसन चोराई ॥
हम जड़ जीव जीव गन घाती । कुटिल कुचाली कुमति कुजाती ॥
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* ** अयोध्याकाण्ड ५५३ हमारी तो यही बड़ी भारी सेवा है कि हम आपके कपड़े और बर्तन नहीं चुरा लेते । हमलोग जड़ जीव हैं, जीवोंकी हिंसा करनेवाले हैं, कुटिल, कुचाली, कुबुद्धि और कुजाति हैं ॥२ ॥
पाप करत निसि बासर जाहीं । नहिं पट कटि नहिं पेट अघाहीं ॥
सपनेहुँ धरमबुद्धि कस काऊ । यह रघुनंदन दरस प्रभाऊ ॥
हमारे दिन - रात पाप करते ही बीतते हैं । तो भी न तो हमारी कमरमें कपड़ा है और न पेट ही भरते हैं । हममें स्वप्नमें भी कभी धर्मबुद्धि कैसी? यह सब तो श्रीरघुनाथजीके दर्शनका प्रभाव है ॥ ३ ॥
जब तें प्रभु पद पदुम निहारे । मिटे दुसह दुख दोष हमारे ॥
बचन सुनत पुरजन अनुरागे । तिन्ह के भाग सराहन लागे ॥
जबसे प्रभुके चरणकमल देखे, तबसे हमारे दुःसह दुःख और दोष मिट गये । वनवासियोंके वचन सुनकर अयोध्याके लोग प्रेममें भर गये और उनके भाग्यकी सराहना करने लगे ॥ ४ ॥
छं० –लागे सराहन भाग सब अनुराग बचन सुनावहीं ।
बोलनि मिलनिसिय राम चरन सनेहु लखि सुखु पावहीं ॥
नर नारि निदरहिं नेहु निज सुनि कोल भिल्लनि की गिरा ।
तुलसी कृपा रघुबंसमनि की लोह लै लौका तिरा ॥
सब उनके भाग्यकी सराहना करने लगे और प्रेमके वचन सुनाने लगे । उन लोगोंके बोलने और मिलनेका ढंग तथा श्रीसीतारामजीके चरणोंमें उनका प्रेम देखकर सब सुख पा रहे हैं । उन कोल- भीलोंकी वाणी सुनकर सभी नर - नारी अपने प्रेमका निरादर करते हैं ( उसे धिक्कार देते हैं ) । तुलसीदासजी कहते हैं कि यह रघुवंशमणि श्रीरामचन्द्रजीकी कृपा है कि लोहा नौकाको अपने ऊपर लेकर तैर गया ।
सो० –- बिहरहिं बन चहु ओर प्रतिदिन प्रमुदित लोग सब ।
जल ज्यों दादुर मोर भए पीन पावस प्रथम ॥ २५१ ॥
सब लोग दिनोंदिन परम आनन्दित होते हुए वनमें चारों ओर विचरते हैं, जैसे पहली वर्षाके जलसे मेढक और मोर मोटे हो जाते हैं ( प्रसन्न होकर नाचते-कूदते हैं ) ॥ २५१ ॥
पुर जन नारि मगन अति प्रीती । बासर जाहिं पलक सम बीती ॥
सीय सासु प्रति बेष बनाई । सादर करइ सरिस सेवकाई ॥
अयोध्यापुरीके पुरुष और स्त्री सभी प्रेममें अत्यन्त मग्न हो रहे हैं । उनके दिन पलके समान बीत जाते हैं । जितनी सासुएँ थीं, उतने ही वेष ( रूप ) बनाकर सीताजी सब सासुओंकी आदरपूर्वक एक -सी सेवा करती हैं ॥१ ॥
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* *५५४ रामचरितमानस
लखा न मरमु राम बिनु काहूँ । माया सब सिय माया माहूँ ॥
सीयँ सासु सेवा बस कीन्हीं । तिन्ह लहि सुख सिख आसिष दीन्हीं ॥
श्रीरामचन्द्रजीके सिवा इस भेदको और किसीने नहीं जाना । सब मायाएँ [ पराशक्ति महामाया ] श्रीसीताजीकी मायामें ही हैं । सीताजीने सासुओंको सेवासे वशमें कर लिया । उन्होंने सुख पाकर सीख और आशीर्वाद दिये ॥ २ ॥
लखि सिय सहित सरल दोउ भाई । कुटिल रानि पछितानि अघाई ॥
अवनि जमहि जाचति कैकेई । महि न बीचु बिधि मीचु न देई ॥
सीताजीसमेत दोनों भाइयों ( श्रीराम-लक्ष्मण ) को सरल स्वभाव देखकर कुटिल रानी कैकेयी भरपेट पछतायी । वह पृथ्वी तथा यमराजसे याचना करती है, किन्तु धरती बीच ( फटकर समा जानेके लिये रास्ता ) नहीं देती और विधाता मौत नहीं देता ॥ ३ ॥
लोकहुँ बेद बिदित कबि कहहीं । राम बिमुख थलु नरक न लहहीं ॥
यहु संसउ सब के मन माहीं । राम गवनु बिधि अवध कि नाहीं ॥
लोक और वेदमें प्रसिद्ध है और कवि (ज्ञानी ) भी कहते हैं कि जो श्रीरामजीसे विमुख हैं उन्हें नरकमें भी ठौर नहीं मिलती । सबके मनमें यह सन्देह हो रहा था कि हे विधाता! श्रीरामचन्द्रजीका अयोध्या जाना होगा या नहीं ॥४ ॥
दो० – निसि न नीद नहिं भूख दिन भरतु बिकल सुचि सोच ।
नीच कीच बिच मगन जस मीनहि सलिल सँकोच ॥ २५२ ॥
भरतजीको न तो रातको नींद आती है, न दिनमें भूख ही लगती है । वे पवित्र सोचमें ऐसे विकल हैं, जैसे नीचे ( तल ) के कीचड़में डूबी हुई मछलीको जलकी कमीसे व्याकुलता होती है ॥ २५२ ॥
कीन्हि मातु मिस काल कुचाली । ईति भीति जस पाकत साली ॥
केहि बिधि होइ राम अभिषेकू । मोहि अवकलत उपाउ न एकू ॥
[ भरतजी सोचते हैं कि ] माताके मिससे कालने कुचाल की है । जैसे धानके पकते समय ईतिका भय आ उपस्थित हो । अब श्रीरामचन्द्रजीका राज्याभिषेक किस प्रकार हो, मुझे तो एक भी उपाय नहीं सूझ पड़ता ॥१ ॥
अवसि फिरहिं गुर आयसु मानी । मुनि पुनि कहब राम रुचि जानी ॥
मातु कहेहुँ बहुरहिं रघुराऊ । राम जननि हठ करबि कि काऊ ॥
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* ** अयोध्याकाण्ड ५५५ गुरुजीकी आज्ञा मानकर तो श्रीरामजी अवश्य ही अयोध्याको लौट चलेंगे । परन्तु मुनि वसिष्ठजी तो श्रीरामचन्द्रजीकी रुचि जानकर ही कुछ कहेंगे ( अर्थात् वे श्रीरामजीकी रुचि देखे बिना जानेको नहीं कहेंगे ) । माता कौसल्याजीके कहनेसे भी श्रीरघुनाथजी लौट सकते हैं; पर भला, श्रीरामजीको जन्म देनेवाली माता क्या कभी हठ करेगी? ॥२ ॥
मोहि अनुचर कर केतिक बाता । तेहि महँ कुसमउ बाम बिधाता ॥
जौं हठ करउँ त निपट कुकरमू । हरगिरि तें गुरु सेवक धरमू॥
मुझ सेवककी तो बात ही कितनी है? उसमें भी समय खराब है ( मेरे दिन अच्छे नहीं हैं ) और विधाता प्रतिकूल है । यदि मैं हठ करता हूँ तो यह घोर कुकर्म ( अधर्म ) होगा, क्योंकि सेवकका धर्म शिवजीके पर्वत कैलाससे भी भारी ( निबाहनेमें कठिन) है ॥ ३ ॥
एकउ जुगुति न मन ठहरानी । सोचत भरतहि रैनि बिहानी ॥
प्रात नहाइ प्रभुहि सिर नाई । बैठत पठए रिषयँ बोलाई ॥
एक भी युक्ति भरतजीके मनमें न ठहरी । सोचते -ही- सोचते रात बीत गयी । भरतजी प्रात: काल स्नान करके और प्रभु श्रीरामचन्द्रजीको सिर नवाकर बैठे ही थे कि ऋषि वसिष्ठजीने उनको बुलवा भेजा ॥४ ॥
दो० – गुर पद कमल प्रनामु करि बैठे आयसु पाइ ।
बिप्र महाजन सचिव सब जुरे सभासद आइ ॥ २५३ ॥
भरतजी गुरुके चरणकमलोंमें प्रणाम करके आज्ञा पाकर बैठ गये । उसी समय ब्राह्मण, महाजन, मन्त्री आदि सभी सभासद आकर जुट गये ॥२५३ ॥
बोले मुनिबरु समय समाना । सुनहु सभासद भरत सुजाना ॥
धरम धुरीन भानुकुल भानू । राजा रामु स्वबस भगवानू ॥
श्रेष्ठ मुनि वसिष्ठजी समयोचित वचन बोले- हे सभासदो! हे सुजान भरत! सुनो । सूर्यकुलके सूर्य महाराज श्रीरामचन्द्र धर्मधुरन्धर और स्वतन्त्र भगवान् हैं ॥१ ॥
सत्यसंध पालक श्रुति सेतू । राम जनमु जग मंगल हेतू ॥
गुर पितु मातु बचन अनुसारी । खल दलु दलन देव हितकारी ॥
वे सत्यप्रतिज्ञ हैं और वेदकी मर्यादाके रक्षक हैं । श्रीरामजीका अवतार ही जगत्के कल्याणके लिये हुआ है । वे गुरु, पिता और माताके वचनोंके अनुसार चलनेवाले हैं । दुष्टोंके दलका नाश करनेवाले और देवताओंके हितकारी हैं ॥२ ॥
नीति प्रीति परमारथ स्वारथु । कोउ न राम सम जान जथारथु ॥
बिधि हरि हरु ससि रबि दिसिपाला । माया जीव करम कुलि काला ॥
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* *५५६ रामचरितमानस नीति, प्रेम, परमार्थ और स्वार्थको श्रीरामजीके समान यथार्थ ( तत्त्वसे) कोई नहीं जानता । ब्रह्मा, विष्णु, महादेव, चन्द्र, सूर्य, दिक्पाल, माया, जीव, सभी कर्म और काल ॥३ ॥
अहिप महिप जहँ लगि प्रभुताई । जोग सिद्धि निगमागम गाई ॥
करि बिचार जियँ देखहु नीकें । राम रजाइ सीस सबही कें ॥
शेषजी और [ पृथ्वी एवं पातालके अन्यान्य ] राजा आदि जहाँतक प्रभुता है, और योगकी सिद्धियाँ, जो वेद और शास्त्रोंमें गायी गयी हैं, हृदयमें अच्छी तरह विचार कर देखो, [तो यह स्पष्ट दिखायी देगा कि ] श्रीरामजीकी आज्ञा इन सभीके सिरपर है ( अर्थात् श्रीरामजी ही सबके एकमात्र महान् महेश्वर हैं ) ॥ ४ ॥
दो० – राखें राम रजाइ रुख हम सब कर हित होइ ।
समुझि सयाने करहु अब सब मिलि संमत सोइ ॥ २५४ ॥
अतएव श्रीरामजीकी आज्ञा और रुख रखनेमें ही हम सबका हित होगा । [इस तत्त्व और रहस्यको समझकर] अब तुम सयाने लोग जो सबको सम्मत हो, वही मिलकर करो ॥ २५४ ॥
सब कहुँ सुखद राम अभिषेकू । मंगल मोद मूल मग एकू ॥
केहि बिधि अवध चलहिं रघुराऊ । कहहु समुझि सोइ करिअ उपाऊ ॥
श्रीरामजीका राज्याभिषेक सबके लिये सुखदायक है । मङ्गल और आनन्दका मूल यही एक मार्ग है । [ अब ] श्रीरघुनाथजी अयोध्या किस प्रकार चलें? विचारकर कहो, वही उपाय किया जाय ॥१ ॥
सब सादर सुनि मुनिबर बानी । नय परमारथ स्वारथ सानी ॥
उतरु न आव लोग भए भोरे । तब सिरु नाइ भरत कर जोरे ॥
मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठजीकी नीति, परमार्थ और स्वार्थ ( लौकिक हित ) में सनी हुई वाणी सबने आदरपूर्वक सुनी । पर किसीको कोई उत्तर नहीं आता, सब लोग भोले ( विचारशक्तिसे रहित ) हो गये । तब भरतने सिर नवाकर हाथ जोड़े ॥ २ ॥
भानुबंस भए भूप घनेरे । अधिक एक तें एक बड़ेरे ॥
जनम हेतु सब कहँ पितु माता । करम सुभासुभ देइ बिधाता ॥
[और कहा - ] सूर्यवंशमें एक-से -एक अधिक बड़े बहुत-से राजा हो गये हैं । सभीके जन्म कारण पिता- माता होते हैं और शुभ- अशुभ कर्मोंको ( कर्मोंका फल) विधाता देते हैं ॥ ३ ॥
दलि दुख सजइ सकल कल्याना । अस असीस राउरि जग जाना ॥
सो गोसाइँ बिधि गति जेहिं छेंकी । सकइ को टारि टेक जो टेकी ॥
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* ** अयोध्याकाण्ड ५५७ आपकी आशिष ही एक ऐसी है जो दुःखोंका दमन करके, समस्त कल्याणोंको सज देती है; यह जगत् जानता है । हे स्वामी! आप वही हैं जिन्होंने विधाताकी गति ( विधान ) को भी रोक दिया । आपने जो टेक टेक दी ( जो निश्चय कर दिया ) उसे कौन टाल सकता है? ॥ ४ ॥
दो० - बूझिअ मोहि उपाउ अब सो सब मोर अभागु ।
सुनि सनेहमय बचन गुर उर उमगा अनुरागु ॥ २५५ ॥
अब आप मुझसे उपाय पूछते हैं, यह सब मेरा अभाग्य है । भरतजीके प्रेममय वचनोंको सुनकर गुरुजीके हृदयमें प्रेम उमड़ आया ॥ २५५ ॥
तात बात फुरि राम कृपाहीं । राम बिमुख सिधि सपनेहुँ नाहीं ॥
सकुचउँ तात कहत एक बाता । अरध तजहिं बुध सरबस जाता ॥
[ वे बोले- ] हे तात! बात सत्य है, पर है रामजीकी कृपासे ही । रामविमुखको तो स्वप्नमें भी सिद्धि नहीं मिलती । हे तात! मैं एक बात कहनेमें सकुचाता हूँ । बुद्धिमान् लोग सर्वस्व जाता देखकर [ आधेकी रक्षाके लिये ] आधा छोड़ दिया करते हैं ॥१ ॥
तुम्ह कानन गवनहु दोउ भाई । फेरिअहिं लखन सीय रघुराई ॥
सुनि सुबचन हरषे दोउ भ्राता । भे प्रमोद परिपूरन गाता ॥
अतः तुम दोनों भाई ( भरत-शत्रुघ्र ) वनको जाओ और लक्ष्मण, सीता और श्रीरामचन्द्रको लौटा दिया जाय । ये सुन्दर वचन सुनकर दोनों भाई हर्षित हो गये । उनके सारे अंग परमानन्दसे परिपूर्ण हो गये ॥२ ॥
मन प्रसन्न तन तेजु बिराजा । जनु जिय राउ रामु भए राजा ॥
बहुत लाभ लोगन्ह लघु हानी । सम दुख सुख सब रोवहिं रानी ॥
उनके मन प्रसन्न हो गये । शरीरमें तेज सुशोभित हो गया । मानो राजा दशरथ जी उठे हों और श्रीरामचन्द्रजी राजा हो गये हों! अन्य लोगोंको तो इसमें लाभ अधिक और हानि कम प्रतीत हुई परन्तु रानियोंको दुःख-सुख समान ही थे ( राम-लक्ष्मण वनमें रहें या भरत- शत्रुघ्र, दो पुत्रोंका वियोग तो रहेगा ही ), यह समझकर वे सब रोने लगीं ॥ ३ ॥
कहहिं भरतु मुनि कहा सो कीन्हे । फलु जग जीवन्ह अभिमत दीन्हे ॥
कानन करउँ जनम भरि बासू । एहि तें अधिक न मोर सुपासू॥
भरतजी कहने लगे — मुनिने जो कहा, वह करनेसे जगत्भरके जीवोंको उनकी इच्छित वस्तु देनेका फल होगा । [चौदह वर्षकी कोई अवधि नहीं, ] मैं जन्मभर वनमें वास करूँगा । मेरे लिये इससे बढ़कर और कोई सुख नहीं है ॥४ ॥
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*:*५५८ रामचरितमानस
दो० –- अंतरजामी रामु सिय तुम्ह सरबग्य सुजान ।
जौं फुर कहहु त नाथ निज कीजिअ बचनु प्रवान ॥ २५६ ॥
श्रीरामचन्द्रजी और सीताजी हृदयकी जाननेवाले हैं और आप सर्वज्ञ तथा सुजान हैं । यदि आप यह सत्य कह रहे हैं तो हे नाथ! अपने वचनोंको प्रमाण कीजिये ( उनके अनुसार व्यवस्था कीजिये ) ॥ २५६ ॥
भरत बचन सुनि देखि सनेहू । सभा सहित मुनि भए बिदेहू ॥
भरत महा महिमा जलरासी । मुनि मति ठाढ़ि तीर अबला सी ॥
भरतजीके वचन सुनकर और उनका प्रेम देखकर सारी सभासहित मुनि वसिष्ठजी विदेह हो गये ( किसीको अपने देहकी सुधि न रही ) । भरतजीकी महान् महिमा समुद्र है, मुनिकी बुद्धि उसके तटपर अबला स्त्रीके समान खड़ी है ॥ १ ॥
गा चह पार जतनु हियँ हेरा । पावति नाव न बोहितु बेरा ॥
औरु करिहि को भरत बड़ाई । सरसी सीपि कि सिंधु समाई ॥
वह [ उस समुद्रके ] पार जाना चाहती है, इसके लिये उसने हृदयमें उपाय भी ढूँढ़े! पर [ उसे पार करनेका साधन ] नाव, जहाज या बेड़ा कुछ भी नहीं पाती । भरतजीकी बड़ाई और कौन करेगा? तलैयाकी सीपीमें भी कहीं समुद्र समा सकता है? ॥२ ॥
भरतु मुनिहि मन भीतर भाए । सहित समाज राम पहिं आए ॥
प्रभु प्रनामु करि दीन्ह सुआसनु । बैठे सब सुनि मुनि अनुसासनु ॥
मुनि वसिष्ठजीके अन्तरात्माको भरतजी बहुत अच्छे लगे और वे समाजसहित श्रीरामजीके पास आये । प्रभु श्रीरामचन्द्रजीने प्रणामकर उत्तम आसन दिया । सब लोग मुनिकी आज्ञा सुनकर बैठ गये ॥३ ॥
बोले मुनिबरु बचन बिचारी । देस काल अवसर अनुहारी ॥
सुनहु राम सरबग्य सुजाना । धरम नीति गुन ग्यान निधाना ॥
श्रेष्ठ मुनि देश, काल और अवसरके अनुसार विचार करके वचन बोले - हे सर्वज्ञ! हे सुजान! हे धर्म, नीति, गुण और ज्ञानके भण्डार राम! सुनिये —॥४ ॥
दो० – सब के उर अंतर बसहु जानहु भाउ कुभाउ ।
पुरजन जननी भरत हित होइ सो कहिअ उपाउ ॥ २५७ ॥
आप सबके हृदयके भीतर बसते हैं और सबके भले-बुरे भावको जानते हैं । जिसमें पुरवासियोंका, माताओंका और भरतका हित हो, वही उपाय बतलाइये ॥ २५७ ॥