श्रीरामचरितमानस — पृष्ठ 561–570
श्रीरामचरितमानस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 561–570
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* '* अयोध्याकाण्ड ५५ ९
आरत कहहिं बिचारि न काऊ । सूझ जुआरिहि आपन दाऊ ॥
सुनि मुनि बचन कहत रघुराऊ । नाथ तुम्हारेहि हाथ उपाऊ ॥
आर्त ( दुखी ) लोग कभी विचारकर नहीं कहते । जुआरीको अपना ही दाँव सूझता है । मुनिके वचन सुनकर श्रीरघुनाथजी कहने लगे- हे नाथ! उपाय तो आपहीके हाथ है ॥१ ॥
सब कर हित रुख राउरि राखें । आयसु किएँ मुदित फुर भाषें ॥
प्रथम जो आयसु मो कहुँ होई । माथें मानि करौं सिख सोई ॥
आपका रुख रखनेमें और आपकी आज्ञाको सत्य कहकर प्रसन्नतापूर्वक पालन करनेमें ही सबका हित है । पहले तो मुझे जो आज्ञा हो, मैं उसी शिक्षाको माथेपर चढ़ाकर करूँ ॥ २ ॥
पुनि जेहि कहँ जस कहब गोसाईं । सो सब भाँति घटिहि सेवकाईं ॥
कह मुनि राम सत्य तुम्ह भाषा । भरत सनेहँ बिचारु न राखा ॥
फिर हे गोसाईं! आप जिसको जैसा कहेंगे वह सब तरहसे सेवामें लग जायगा ( आज्ञापालन करेगा ) । मुनि वसिष्ठजी कहने लगे-हे राम! तुमने सच कहा । पर भरतके प्रेमने विचारको नहीं रहने दिया ॥३ ॥
तेहि तें कहउँ बहोरि बहोरी । भरत भगति बस भइ मति मोरी ॥
मोरें जान भरत रुचि राखी । जो कीजिअ सो सुभ सिव साखी ॥
इसीलिये मैं बार- बार कहता हूँ, मेरी बुद्धि भरतकी भक्तिके वश हो गयी है । मेरी समझमें तो भरतकी रुचि रखकर जो कुछ किया जायगा, शिवजी साक्षी हैं, वह सब शुभ ही होगा ॥ ४ ॥
दो० – भरत बिनय सादर सुनिअ करिअ बिचारु बहोरि ।
करब साधुमत लोकमत नृपनय निगम निचोरि ॥ २५८ ॥
पहले भरतकी विनती आदरपूर्वक सुन लीजिये, फिर उसपर विचार कीजिये । तब साधुमत, लोकमत, राजनीति और वेदोंका निचोड़ ( सार) निकालकर वैसा ही ( उसीके अनुसार ) कीजिये ॥ २५८ ॥
गुर अनुरागु भरत पर देखी । राम हृदयँ आनंदु बिसेषी ॥
भरतहि धरम धुरंधर जानी । निज सेवक तन मानस बानी ॥
भरतजीपर गुरुजीका स्नेह देखकर श्रीरामचन्द्रजीके हृदयमें विशेष आनन्द हुआ । भरतजीको धर्मधुरन्धर और तन, मन, वचनसे अपना सेवक जानकर—॥१ ॥
बोले गुर आयस अनुकूला । बचन मंजु मृदु मंगलमूला ॥
नाथ सपथ पितु चरन दोहाई । भयउ न भुअन भरत सम भाई ॥
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* *५६० रामचरितमानस श्रीरामचन्द्रजी गुरुकी आज्ञाके अनुकूल मनोहर, कोमल और कल्याणके मूल वचन बोले- हे नाथ! आपकी सौगन्ध और पिताजीके चरणोंकी दुहाई है (मैं सत्य कहता हूँ कि) विश्वभरमें भरतके समान भाई कोई हुआ ही नहीं ॥ २ ॥
जे गुर पद अंबुज अनुरागी । ते लोकहुँ बेदहुँ बड़भागी ॥
राउर जा पर अस अनुरागू। को कहि सकइ भरत कर भागू॥
जो लोग गुरुके चरणकमलोंके अनुरागी हैं, वे लोकमें ( लौकिक दृष्टिसे ) भी और वेदमें ( पारमार्थिक दृष्टिसे ) भी बड़भागी होते हैं! [फिर ] जिसपर आप ( गुरु ) का ऐसा स्नेह है, उस भरतके भाग्यको कौन कह सकता है? ॥३ ॥
लखि लघु बंधु बुद्धि सकुचाई । करत बदन पर भरत बड़ाई ॥
भरतु कहहिं सोइ किएँ भलाई । अस कहि राम रहे अरगाई ॥
छोटा भाई जानकर भरतके मुँहपर उसकी बड़ाई करनेमें मेरी बुद्धि सकुचाती है । ( फिर भी मैं तो यही कहूँगा कि ) भरत जो कुछ कहें, वही करनेमें भलाई है । ऐसा कहकर श्रीरामचन्द्रजी चुप हो रहे ॥४ ॥
दो० – तब मुनि बोले भरत सन सब सँकोचु तजि तात ।
कृपासिंधु प्रिय बंधु सन कहहु हृदय कै बात ॥ २५ ९ ॥
तब मुनि भरतजीसे बोले- हे तात! सब सङ्कोच त्यागकर कृपाके समुद्र अपने प्यारे भाईसे अपने हृदयकी बात कहो ॥ २५ ९ ॥
सुनि मुनि बचन राम रुख पाई । गुरु साहिब अनुकूल अघाई ॥
लखि अपनें सिर सबु छरु भारू । कहि न सकहिं कछु करहिं बिचारू ॥
मुनिके वचन सुनकर और श्रीरामचन्द्रजीका रुख पाकर- गुरु तथा स्वामीको भरपेट अपने अनुकूल जानकर — सारा बोझ अपने ही ऊपर समझकर भरतजी कुछ कह नहीं सकते । वे विचार करने लगे ॥१ ॥
पुलकि सरीर सभाँ भए ठाढ़े । नीरज नयन नेह जल बाढ़े ॥
कहब मोर मुनिनाथ निबाहा । एहि तें अधिक कहौं मैं काहा ॥
शरीरसे पुलकित होकर वे सभामें खड़े हो गये । कमलके समान नेत्रोंमें प्रेमाश्रुओंकी बाढ़ आ गयी । [ वे बोले— ] मेरा कहना तो मुनिनाथने ही निबाह दिया ( जो कुछ मैं कह सकता था वह
उन्होंने ही कह दिया ) । इससे अधिक मैं क्या कहूँ? ॥२ ॥
मैं जानउँ निज नाथ सुभाऊ । अपराधिहु पर कोह न काऊ ॥
मो पर कृपा सनेहु बिसेषी । खेलत खुनिस न कबहूँ देखी ॥
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* * अयोध्याकाण्ड ५६१ अपने स्वामीका स्वभाव मैं जानता हूँ । वे अपराधीपर भी कभी क्रोध नहीं करते । मुझपर तो उनकी विशेष कृपा और स्नेह है । मैंने खेलमें भी कभी उनकी रिस ( अप्रसन्नता ) नहीं देखी ॥३ ॥
सिसुपन तें परिहरेउँ न संगू । कबहुँ न कीन्ह मोर मन भंगू॥
मैं प्रभु कृपा रीति जियँ जोही ॥ हारेहुँ खेल जितावहिं मोही ॥
बचपनसे ही मैंने उनका साथ नहीं छोड़ा और उन्होंने भी मेरे मनको कभी नहीं तोड़ा ( मेरे मनके प्रतिकूल कोई काम नहीं किया ) । मैंने प्रभुकी कृपाकी रीतिको हृदयमें भलीभाँति देखा ( अनुभव किया है ) । मेरे हारनेपर भी खेलमें प्रभु मुझे जिता देते रहे हैं ॥४ ॥
दो० – महूँ सनेह सकोच बस सनमुख कही न बैन ।
दरसन तृपित न आजु लगि पेम पिआसे नैन ॥ २६० ॥
मैंने भी प्रेम और संकोचवश कभी सामने मुँह नहीं खोला । प्रेमके प्यासे मेरे नेत्र आजतक प्रभुके दर्शनसे तृप्त नहीं हुए ॥ २६० ॥
बिधि न सकेउ सहि मोर दुलारा । नीच बीचु जननी मिस पारा ॥
यह कहत मोहि आजु न सोभा । अपनीं समुझि साधु सुचि को भा ॥
परन्तु विधाता मेरा दुलार न सह सका । उसने नीच माताके बहाने [ मेरे और स्वामीके बीच ] अन्तर डाल दिया । यह भी कहना आज मुझे शोभा नहीं देता । क्योंकि अपनी समझसे कौन साधु और पवित्र हुआ है? ( जिसको दूसरे साधु और पवित्र मानें, वही साधु है ) ॥१ ॥
मातु मंदि मैं साधु सुचाली । उर अस आनत कोटि कुचाली ॥
फरइ कि कोदव बालि सुसाली । मुकता प्रसव कि संबुक काली ॥
माता नीच है और मैं सदाचारी और साधु हूँ, ऐसा हृदयमें लाना ही करोड़ दुराचारोंके समान है । क्या कोदोंकी बाली उत्तम धान फल सकती है? क्या काली घोंघी मोती उत्पन्न कर सकती है? ॥२ ॥
सपनेहुँ दोसक लेसु न काहू । मोर अभाग उदधि अवगाहू ॥
बिनु समुझें निज अघ परिपाकू । जारिउँ जायँ जननि कहि काकू ॥
स्वप्नमें भी किसीको दोषका लेश भी नहीं है । मेरा अभाग्य ही अथाह समुद्र है । मैंने अपने पापोंका परिणाम समझे बिना ही माताको कटु वचन कहकर व्यर्थ ही जलाया ॥३ ॥
हृदयँ हेरि हारेउँ सब ओरा । एकहि भाँति भलेहिं भल मोरा ॥
गुर गोसाइँ साहिब सिय रामू । लागत मोहि नीक परिनामू॥
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५६२ * रामचरितमानस * मैं अपने हृदयमें सब ओर खोजकर हार गया ( मेरी भलाईका कोई साधन नहीं सूझता) । एक ही प्रकार भले ही (निश्चय ही ) मेरा भला है । वह यह है कि गुरु महाराज सर्वसमर्थ हैं और
श्रीसीतारामजी मेरे स्वामी हैं । इसीसे परिणाम मुझे अच्छा जान पड़ता है ॥४ ॥
दो० - साधु सभाँ गुर प्रभु निकट कहउँ सुथल सतिभाउ ।
प्रेम प्रपंच कि झूठ फुर जानहिं मुनि रघुराउ ॥ २६१ ॥
साधुओंकी सभामें गुरुजी और स्वामीके समीप इस पवित्र तीर्थ-स्थानमें मैं सत्य भावसे कहता हूँ । यह प्रेम है या प्रपञ्च ( छल- कपट )? झूठ है या सच? इसे [ सर्वज्ञ ] मुनि वसिष्ठजी और [अन्तर्यामी ] श्रीरघुनाथजी जानते हैं ॥ २६१ ॥
भूपति मरन पेम पनु राखी । जननी कुमति जगतु सबु साखी ॥
देखि न जाहिं बिकल महतारीं । जरहिं दुसह जर पुर नर नारीं ॥
प्रेमके प्रणको निबाहकर महाराज ( पिताजी ) का मरना और माताकी कुबुद्धि, दोनोंका सारा संसार साक्षी है । माताएँ व्याकुल हैं, वे देखी नहीं जातीं । अवधपुरीके नर- नारी दुःसह तापसे जल रहे हैं ॥ १ ॥
महीं सकल अनरथ कर मूला । सो सुनि समुझि सहिउँ सब सूला ॥
सुनि बन गवनु कीन्ह रघुनाथा । करि मुनि बेष लखन सिय साथा ॥
बिनु पानहिन्ह पयादेहि पाएँ । संकरु साखि रहेउँ एहि घाएँ ॥
बहुरि निहारि निषाद सनेहू । कुलिस कठिन उर भयउ न बेहू ॥
मैं ही इन सारे अनर्थोंका मूल हूँ, यह सुन और समझकर मैंने सब दुःख सहा है । श्रीरघुनाथजी लक्ष्मण और सीताजीके साथ मुनियोंका- सा वेष धारणकर बिना जूते पहने पाँव- प्यादे ( पैदल ) ही वनको चले गये, यह सुनकर, शङ्करजी साक्षी हैं, इस घावसे भी मैं जीता रह गया ( यह सुनते ही मेरे प्राण नहीं निकल गये )! फिर निषादराजका प्रेम देखकर भी इस वज्रसे भी कठोर हृदयमें छेद नहीं हुआ ( यह फटा नहीं ) ॥ २-३ ॥
अब सबु आँखिन्ह देखेउँ आई । जिअत जीव जड़ सबइ सहाई ॥
जिन्हहि निरखि मग साँपिनि बीछी । तजहिं बिषम बिषु तामस तीछी ॥
अब यहाँ आकर सब आँखों देख लिया । यह जड़ जीव जीता रहकर सभी सहावेगा । जिनको देखकर रास्तेकी साँपिनी और बीछी भी अपने भयानक विष और तीव्र क्रोधको त्याग देती हैं ॥४ ॥
दो० – तेइ रघुनंदनु लखनु सिय अनहित लागे जाहि ।
तासु तनय तजि दुसह दुख दैउ सहावइ काहि ॥ २६२ ॥
वे ही श्रीरघुनन्दन, लक्ष्मण और सीता जिसको शत्रु जान पड़े, उस कैकेयीके पुत्र मुझको छोड़कर दैव दुःसह दुःख और किसे सहावेगा? ॥ २६२ ॥
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* ** अयोध्याकाण्ड ५६३
सुनि अति बिकल भरत बर बानी । आरति प्रीति बिनय नय सानी ॥
सोक मगन सब सभाँ खभारू । मनहुँ कमल बन परेउ तुसारू ॥
अत्यन्त व्याकुल तथा दुःख, प्रेम, विनय और नीतिमें सनी हुई भरतजीकी श्रेष्ठ वाणी सुनकर सब लोग शोकमें मग्न हो गये, सारी सभामें विषाद छा गया । मानो कमलके वनपर पाला पड़ गया हो ॥१ ॥
कहि अनेक बिधि कथा पुरानी । भरत प्रबोधु कीन्ह मुनि ग्यानी ॥
बोले उचित बचन रघुनंदू । दिनकर कुल कैरव बन चंदू॥
तब ज्ञानी मुनि वसिष्ठजीने अनेक प्रकारकी पुरानी ( ऐतिहासिक ) कथाएँ कहकर भरतजीका समाधान किया । फिर सूर्यकुलरूपी कुमुदवनके प्रफुल्लित करनेवाले चन्द्रमा श्रीरघुनन्दन उचित वचन बोले- ॥२ ॥
तात जायँ जियँ करहु गलानी । ईस अधीन जीव गति जानी ॥
तीनि काल तिभुअन मत मोरें । पुन्यसिलोक तात तर तोरें ॥
हे तात! तुम अपने हृदयमें व्यर्थ ही ग्लानि करते हो । जीवकी गतिको ईश्वरके अधीन जानो । मेरे मतमें [ भूत, भविष्य, वर्तमान ] तीनों कालों और [ स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल ] तीनों लोकोंके सब पुण्यात्मा पुरुष तुमसे नीचे हैं ॥ ३ ॥
उर आनत तुम्ह पर कुटिलाई । जाइ लोकु परलोकु नसाई ॥
दोसु देहिं जननिहि जड़ तेई । जिन्ह गुर साधु सभा नहिं सेई ॥
हृदयमें भी तुमपर कुटिलताका आरोप करनेसे यह लोक ( यहाँके सुख, यश आदि ) बिगड़ जाता है और परलोक भी नष्ट हो जाता है ( मरनेके बाद भी अच्छी गति नहीं मिलती ) । माता कैकेयीको तो वे ही मूर्ख दोष देते हैं जिन्होंने गुरु और साधुओंकी सभाका सेवन नहीं किया है ॥४ ॥
दो० - मिटिहहिं पाप प्रपंच सब अखिल अमंगल भार ।
लोक सुजसु परलोक सुखु सुमिरत नामु तुम्हार ॥ २६३ ॥
हे भरत! तुम्हारा नाम - स्मरण करते ही सब पाप, प्रपञ्च ( अज्ञान ) और समस्त अमङ्गलोंके समूह मिट जायँगे तथा इस लोकमें सुन्दर यश और परलोकमें सुख प्राप्त होगा ॥२६३ ॥
कहउँ सुभाउ सत्य सिव साखी । भरत भूमि रह राउरि राखी ॥
तात कुतरक करहु जनि जाएँ । बैर पेम नहिं दुरइ दुराएँ॥
हे भरत! मैं स्वभावसे ही सत्य कहता हूँ, शिवजी साक्षी हैं, यह पृथ्वी तुम्हारी ही रखी रह
रही है । हे तात! तुम व्यर्थ कुतर्क न करो । वैर और प्रेम छिपाये नहीं छिपते ॥१ ॥
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* *५६४ रामचरितमानस
मुनिगन निकट बिहग मृग जाहीं । बाधक बधिक बिलोकि पराहीं ॥
हित अनहित पसु पच्छिउ जाना । मानुष तनु गुन ग्यान निधाना ॥
पक्षी और पशु मुनियोंके पास [ बेधड़क ] चले जाते हैं, पर हिंसा करनेवाले बधिकोंको देखते ही भाग जाते हैं । मित्र और शत्रुको पशु- पक्षी भी पहचानते हैं । फिर मनुष्यशरीर तो गुण और ज्ञानका भण्डार ही है ॥२ ॥
तात तुम्हहि मैं जानउँ नीकें । करौं काह असमंजस जीकें ॥
राखेउ रायँ सत्य मोहि त्यागी । तनु परिहरेउ पेम पन लागी ॥
हे तात! मैं तुम्हें अच्छी तरह जानता हूँ! क्या करूँ? जीमें बड़ा असमञ्जस ( दुविधा ) है । राजाने मुझे त्यागकर सत्यको रखा और प्रेम-प्रणके लिये शरीर छोड़ दिया ॥३ ॥
तासु बचन मेटत मन सोचू। तेहि तें अधिक तुम्हार सँकोचू॥
ता पर गुर मोहि आयसु दीन्हा । अवसि जो कहहु चहउँ सोइ कीन्हा ॥
उनके वचनको मेटते मनमें सोच होता है । उससे भी बढ़कर तुम्हारा संकोच है । उसपर भी गुरुजीने मुझे आज्ञा दी है । इसलिये अब तुम जो कुछ कहो, अवश्य ही मैं वही करना चाहता हूँ ॥४ ॥
दो० – मनु प्रसन्न करि सकुच तजि कहहु करौं सोइ आजु ।
सत्यसंध रघुबर बचन सुनि भा सुखी समाजु ॥ २६४ ॥
तुम मनको प्रसन्न कर और संकोचको त्याग कर जो कुछ कहो, मैं आज वही करूँ । सत्यप्रतिज्ञ रघुकुलश्रेष्ठ श्रीरामजीका यह वचन सुनकर सारा समाज सुखी हो गया॥ २६४ ॥
सुर गन सहित सभय सुरराजू । सोचहिं चाहत होन अकाजू॥
बनत उपाउ करत कछु नाहीं । राम सरन सब गे मन माहीं ॥
देवगणोंसहित देवराज इन्द्र भयभीत होकर सोचने लगे कि अब बना- बनाया काम बिगड़ना ही चाहता है । कुछ उपाय करते नहीं बनता । तब वे सब मन-ही-मन श्रीरामजीकी शरण गये ॥ १ ॥
बहुरि बिचारि परस्पर कहहीं । रघुपति भगत भगति बस अहहीं ॥
सुधि करि अंबरीष दुरबासा । भे सुर सुरपति निपट निरासा ॥
फिर वे विचार करके आपसमें कहने लगे कि श्रीरघुनाथजी तो भक्तकी भक्तिके वश हैं । अम्बरीष और दुर्वासाकी [ घटना ] याद करके तो देवता और इन्द्र बिलकुल ही निराश हो गये ॥२ ॥
सहे सुरन्ह बहु काल बिषादा । नरहरि किए प्रगट प्रहलादा ॥
लगि लगि कान कहहिं धुनि माथा । अब सुर काज भरत के हाथा ॥
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* ** अयोध्याकाण्ड ५६५ पहले देवताओंने बहुत समयतक दुःख सहे । तब भक्त प्रह्लादने ही नृसिंहभगवान्को प्रकट किया था । सब देवता परस्पर कानोंसे लग लगकर और सिर धुनकर कहते हैं कि अब ( इस बार ) देवताओंका काम भरतजीके हाथ है ॥ ३ ॥
आन उपाउ न देखिअ देवा । मानत रामु सुसेवक सेवा ॥
हियँ सपेम सुमिरहु सब भरतहि । निज गुन सील राम बस करतहि ॥
हे देवताओ! और कोई उपाय नहीं दिखायी देता । श्रीरामजी अपने श्रेष्ठ सेवकोंकी सेवाको मानते हैं ( अर्थात् उनके भक्तकी कोई सेवा करता है तो उसपर बहुत प्रसन्न होते हैं ) । अतएव अपने गुण और शीलसे श्रीरामजीको वशमें करनेवाले भरतजीका ही सब लोग अपने - अपने हृदयमें प्रेमसहित स्मरण करो ॥४ ॥
दो० - सुनि सुरमत सुरगुर कहेउ भल तुम्हार बड़ भागु ।
सकल सुमंगल मूल जग भरत चरन अनुरागु ॥ २६५ ॥
देवताओंका मत सुनकर देवगुरु बृहस्पतिजीने कहा- अच्छा विचार किया, तुम्हारे बड़े भाग्य हैं । भरतजीके चरणोंका प्रेम जगत्में समस्त शुभ मङ्गलोंका मूल है ॥ २६५ ॥
सीतापति सेवक सेवकाई । कामधेनु सय सरिस सुहाई ॥
भरत भगति तुम्हरें मन आई । तजहु सोचु बिधि बात बनाई ॥
सीतानाथ श्रीरामजीके सेवककी सेवा सैकड़ों कामधेनुओंके समान सुन्दर है । तुम्हारे मनमें
भरतजीकी भक्ति आयी है, तो अब सोच छोड़ दो । विधाताने बात बना दी ॥ १ ॥
देखु देवपति भरत प्रभाऊ । सहज सुभायँ बिबस रघुराऊ ॥
मन थिर करहु देव डरु नाहीं । भरतहि जानि राम परिछाहीं ॥
हे देवराज! भरतजीका प्रभाव तो देखो । श्रीरघुनाथजी सहज स्वभावसे ही उनके पूर्णरूपसे वशमें हैं । हे देवताओ! भरतजीको श्रीरामचन्द्रजीकी परछाईं ( परछाईंकी भाँति उनका अनुसरण करनेवाला ) जानकर मन स्थिर करो, डरकी बात नहीं है ॥२ ॥
सुनि सुरगुर सुर संमत सोचू। अंतरजामी प्रभुहि सकोचू ॥
निज सिर भारु भरत जियँ जाना । करत कोटि बिधि उर अनुमाना ॥
देवगुरु बृहस्पतिजी और देवताओंकी सम्मति ( आपसका विचार) और उनका सोच सुनकर अन्तर्यामी प्रभु श्रीरामजीको संकोच हुआ । भरतजीने अपने मनमें सब बोझा अपने ही सिर जाना और वे हृदयमें करोड़ों ( अनेकों ) प्रकारके अनुमान ( विचार ) करने लगे ॥३ ॥
करि बिचारु मन दीन्ही ठीका । राम रजायस आपन नीका ॥
निज पन तजि राखेउ पनु मोरा । छोहु सनेहु कीन्ह नहिं थोरा ॥
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* *५६६ रामचरितमानस सब तरहसे विचार करके अन्तमें उन्होंने मनमें यही निश्चय किया कि श्रीरामजीकी आज्ञामें ही अपना कल्याण है । उन्होंने अपना प्रण छोड़कर मेरा प्रण रखा । यह कुछ कम कृपा और स्नेह नहीं किया ( अर्थात् अत्यन्त ही अनुग्रह और स्नेह किया ) ॥४ ॥
दो०- कीन्ह अनुग्रह अमित अति सब बिधि सीतानाथ ।
करि प्रनामु बोले भरतु जोरि जलज जुग हाथ ॥ २६६ ॥
श्रीजानकीनाथजीने सब प्रकारसे मुझपर अत्यन्त अपार अनुग्रह किया । तदनन्तर भरतजी दोनों कर- कमलोंको जोड़कर प्रणाम करके बोले- ॥ २६६ ॥
कहौं कहावौं का अब स्वामी ॥ कृपा अंबुनिधि अंतरजामी ॥
गुर प्रसन्न साहिब अनुकूला । मिटी मलिन मन कलपित सूला ॥
हे स्वामी! हे कृपाके समुद्र! हे अन्तर्यामी! अब मैं [ अधिक ] क्या कहूँ और क्या कहाऊँ? गुरु महाराजको प्रसन्न और स्वामीको अनुकूल जानकर मेरे मलिन मनकी कल्पित पीड़ा मिट गयी ॥ १ ॥
अपडर डरेउँ न सोच समूलें । रबिहि न दोसु देव दिसि भूलें ॥
मोर अभागु मातु कुटिलाई । बिधि गति बिषम काल कठिनाई ॥
मैं मिथ्या डरसे ही डर गया था । मेरे सोचकी जड़ ही न थी । दिशा भूल जानेपर हे देव! सूर्यका दोष नहीं है । मेरा दुर्भाग्य, माताकी कुटिलता, विधाताकी टेढ़ी चाल और कालकी कठिनता, ॥ २ ॥
पाउ रोपि सब मिलि मोहि घाला । प्रनतपाल पन आपन पाला ॥
यह नइ रीति न राउरि होई । लोकहुँ बेद बिदित नहिं गोई ॥
इन सबने मिलकर पैर रोपकर ( प्रण करके ) मुझे नष्ट कर दिया था । परन्तु शरणागतके रक्षक आपने अपना [ शरणागतकी रक्षाका ] प्रण निबाहा ( मुझे बचा लिया) । यह आपकी कोई नयी रीति नहीं है । यह लोक और वेदोंमें प्रकट है, छिपी नहीं है ॥ ३ ॥
जगु अनभल भल एकु गोसाईं । कहिअ होइ भल कासु भलाईं ॥
देउ देवतरु सरिस सुभाऊ । सनमुख बिमुख न काहुहि काऊ ॥
सारा जगत् बुरा [ करनेवाला] हो; किन्तु हे स्वामी! केवल एक आप ही भले ( अनुकूल ) हों, तो फिर कहिये, किसकी भलाईसे भला हो सकता है? हे देव! आपका स्वभाव कल्पवृक्षके समान है; वह न कभी किसीके सम्मुख ( अनुकूल ) है, न विमुख ( प्रतिकूल ) ॥४ ॥
दो० –जाइ निकट पहिचानि तरु छाहँ समनि सब सोच ।
मागत अभिमत पाव जग राउ रंकु भल पोच ॥ २६७ ॥
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* ** अयोध्याकाण्ड ५६७ उस वृक्ष ( कल्पवृक्ष ) को पहचानकर जो उसके पास जाय, तो उसकी छाया ही सारी चिन्ताओंका नाश करनेवाली है । राजा -रंक, भले - बुरे, जगत्में सभी उससे माँगते ही मनचाही वस्तु पाते हैं ॥ २६७ ॥
खि सब बिधि र स्वामि सनेहू । मिटेउ छोभु नहिं मन संदेहू ॥
अब करुनाकर कीजिअ सोई । जन हित प्रभु चित छोभु न होई ॥
गुरु और स्वामीका सब प्रकारसे स्नेह देखकर मेरा क्षोभ मिट गया, मनमें कुछ भी सन्देह नहीं रहा । हे दयाकी खान! अब वही कीजिये जिससे दासके लिये प्रभुके चित्तमें क्षोभ ( किसी प्रकारका विचार ) न हो ॥१ ॥
जो सेवकु साहिबहि सँकोची । निज हित चहइ तासु मति पोची ॥
सेवक हित साहिब सेवकाई । करै सकल सुख लोभ बिहाई ॥
जो सेवक स्वामीको संकोचमें डालकर अपना भला चाहता है, उसकी बुद्धि नीच है । सेवकका हित तो इसीमें है कि वह समस्त सुखों और लोभोंको छोड़कर स्वामीकी सेवा ही करे ॥ २ ॥
स्वारथु नाथ फिरें सबही का । किएँ रजाइ कोटि बिधि नीका ॥
यह स्वारथ परमारथ सारू । सकल सुकृत फल सुगति सिंगारू ॥
हे नाथ! आपके लौटनेमें सभीका स्वार्थ है, और आपकी आज्ञा पालन करनेमें करोड़ों प्रकारसे कल्याण है । यही स्वार्थ और परमार्थका सार ( निचोड़ ) है, समस्त पुण्योंका फल और सम्पूर्ण शुभ गतियोंका शृङ्गार है ॥३ ॥
देव एक बिनती सुनि मोरी । उचित होइ तस करब बहोरी ॥
तिलक समाजु साजि सबु आना । करिअ सुफल प्रभु जौं मनु माना ॥
हे देव! आप मेरी एक विनती सुनकर, फिर जैसा उचित हो वैसा ही कीजिये । राजतिलककी सब सामग्री सजाकर लायी गयी है, जो प्रभुका मन माने तो उसे सफल कीजिये ( उसका उपयोग कीजिये ) ॥४ ॥
दो० – सानुज पठइअ मोहि बन कीजिअ सबहि सनाथ ।
नतरु फेरिअहिं बंधु दोउ नाथ चलौं मैं साथ ॥ २६८ ॥
छोटे भाई शत्रुघ्नसमेत मुझे वनमें भेज दीजिये और [ अयोध्या लौटकर ] सबको सनाथ कीजिये । नहीं तो किसी तरह भी ( यदि आप अयोध्या जानेको तैयार न हों ) हे नाथ! लक्ष्मण और शत्रुघ्न दोनों भाइयोंको लौटा दीजिये और मैं आपके साथ चलूँ॥ २६८ ॥
नतरु जाहिं बन तीनिउ भाई । बहुरिअ सीय सहित रघुराई ॥
जेहि बिधि प्रभु प्रसन्न मन होई । करुना सागर कीजिअ सोई ॥
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* * ५६८ रामचरितमानस अथवा हम तीनों भाई वन चले जायँ और हे श्रीरघुनाथजी! आप श्रीसीताजीसहित [ अयोध्याको ] लौट जाइये । हे दयासागर! जिस प्रकारसे प्रभुका मन प्रसन्न हो, वही कीजिये ॥ १ ॥
देवँ दीन्ह सबु मोहि अभारू । मोरें नीति न धरम बिचारू ॥
कहउँ बचन सब स्वारथ हेतू । रहत न आरत कें चित चेतू॥
हे देव! आपने सारा भार (जिम्मेवारी ) मुझपर रख दिया । पर मुझमें न तो नीतिका विचार है, न धर्मका । मैं तो अपने स्वार्थके लिये सब बातें कह रहा हूँ । आर्त ( दुखी ) मनुष्यके चित्तमें चेत ( विवेक ) नहीं रहता ॥ २ ॥
उतरु देइ सुनि स्वामि रजाई । सो सेवकु लखि लाज लजाई ॥
अस मैं अवगुन उदधि अगाधू । स्वामि सनेहँ सराहत साधू॥
स्वामीकी आज्ञा सुनकर जो उत्तर दे, ऐसे सेवकको देखकर लज्जा भी लजा जाती है । मैं अवगुणोंका ऐसा अथाह समुद्र हूँ [ कि प्रभुको उत्तर दे रहा हूँ] । किन्तु स्वामी ( आप ) स्नेहवश साधु कहकर मुझे सराहते हैं! ॥३ ॥
अब कृपाल मोहि सो मत भावा । सकुच स्वामि मन जाइँ न पावा ॥
प्रभु पद सपथ कहउँ सति भाऊ । जग मंगल हित एक उपाऊ ॥
हे कृपालु! अब तो वही मत मुझे भाता है, जिससे स्वामीका मन संकोच न पावे । प्रभुके चरणोंकी शपथ है, मैं सत्य भावसे कहता हूँ, जगत्के कल्याणके लिये एक यही उपाय है ॥४ ॥
दो० - प्रभु प्रसन्न मन सकुच तजि जो जेहि आयसु देब ।
सो सिर धरि धरि करिहि सबु मिटिहि अनट अवरेब ॥ २६ ९ ॥
प्रसन्न मनसे संकोच त्यागकर प्रभु जिसे जो आज्ञा देंगे, उसे सब लोग सिर चढ़ा- चढ़ाकर [ पालन ] करेंगे और सब उपद्रव और उलझनें मिट जायँगी ॥ २६ ९ ॥
भरत बचन सुचि सुनि सुर हरषे । साधु सराहि सुमन सुर बरषे ॥
असमंजस बस अवध नेवासी । प्रमुदित मन तापस बनबासी ॥
भरतजीके पवित्र वचन सुनकर देवता हर्षित हुए और ' साधु -साधु ' कहकर सराहना करते हुए देवताओंने फूल बरसाये । अयोध्यानिवासी असमंजसके वश हो गये [ कि देखें अब श्रीरामजी क्या कहते हैं ] । तपस्वी तथा वनवासी लोग [ श्रीरामजीके वनमें बने रहनेकी आशासे ] मनमें परम आनन्दित हुए ॥१ ॥
चुपहिं रहे रघुनाथ सँकोची । प्रभु गति देखि सभा सब सोची ॥
जनक दूत तेहि अवसर आए । मुनि बसिष्ठ सुनि बेगि बोलाए ॥