श्रीरामचरितमानस — पृष्ठ 571–580
श्रीरामचरितमानस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 571–580
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* * अयोध्याकाण्ड ५६ ९ किन्तु संकोची श्रीरघुनाथजी चुप ही रह गये । प्रभुकी यह स्थिति (मौन ) देख सारी सभा सोचमें पड़ गयी । उसी समय जनकजीके दूत आये, यह सुनकर मुनि वसिष्ठजीने उन्हें तुरंत बुलवा लिया ॥२ ॥
करि प्रनाम तिन्ह रामु निहारे । बेषु देखि भए निपट दुखारे ॥
दूतन्ह मुनिबर बूझी बाता । कहहु बिदेह भूप कुसलाता ॥
उन्होंने [ आकर] प्रणाम करके श्रीरामचन्द्रजीको देखा । उनका [ मुनियोंका-सा ] वेष देखकर वे बहुत ही दुखी हुए । मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठजीने दूतोंसे बात पूछी कि राजा जनकका कुशल-समाचार कहो ॥ ३ ॥
सुनि सकुचाइ नाइ महि माथा । बोले चरबर जोरें हाथा ॥
बूझब राउर सादर साईं । कुसल हेतु सो भयउ गोसाईं ॥
यह ( मुनिका कुशलप्रश्न) सुनकर सकुचाकर पृथ्वीपर मस्तक नवाकर वे श्रेष्ठ दूत हाथ जोड़कर बोले — हे स्वामी! आपका आदरके साथ पूछना, यही हे गोसाईं! कुशलका कारण हो गया ॥४ ॥
दो० – नाहिं त कोसलनाथ के साथ कुसल गइ नाथ ।
मिथिला अवध बिसेष तें जगु सब भयउ अनाथ ॥ २७० ॥
नहीं तो हे नाथ! कुशल-क्षेम तो सब कोसलनाथ दशरथजीके साथ ही चली गयी । [ उनके चले जानेसे ] यों तो सारा जगत् ही अनाथ ( स्वामीके बिना असहाय ) हो गया, किन्तु मिथिला और अवध तो विशेषरूपसे अनाथ हो गये ॥ २७० ॥
कोसलपति गति सुनि जनकौरा । भे सब लोक सोकबस बौरा ॥
जेहिं देखे तेहि समय बिदेहू । नामु सत्य अस लाग न केहू॥
अयोध्यानाथकी गति ( दशरथजीका मरण ) सुनकर जनकपुरवासी सभी लोग शोकवश बावले हो गये ( सुध- बुध भूल गये ) । उस समय जिन्होंने विदेहको [ शोकमग्न ] देखा, उनमेंसे किसीको ऐसा न लगा कि उनका विदेह ( देहाभिमानरहित ) नाम सत्य है! [ क्योंकि देहाभिमानसे शून्य पुरुषको शोक कैसा? ] ॥१ ॥
रानि कुचालि सुनत नरपालहि । सूझ न कछु जस मनि बिनु ब्यालहि ॥
भरत राज रघुबर बनबासू । भा मिथिलेसहि हृदयँ हराँसू॥
रानीकी कुचाल सुनकर राजा जनकजीको कुछ सूझ न पड़ा, जैसे मणिके बिना साँपको नहीं सूझता । फिर भरतजीको राज्य और श्रीरामचन्द्रजीको वनवास सुनकर मिथिलेश्वर जनकजीके हृदयमें बड़ा दुःख हुआ ॥२ ॥
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* *५७० रामचरितमानस
नृप बूझे बुध सचिव समाजू। कहहु बिचारि उचित का आजू॥
समुझि अवध असमंजस दोऊ । चलिअ कि रहिअ न कह कछु कोऊ ॥
राजाने विद्वानों और मन्त्रियोंके समाजसे पूछा कि विचारकर कहिये, आज ( इस समय ) क्या करना उचित है? अयोध्याकी दशा समझकर और दोनों प्रकारसे असमंजस जानकर ‘ चलिये या रहिये? ' किसीने कुछ नहीं कहा ॥३ ॥
नृपहिं धीर धरि हृदयँ बिचारी । पठए अवध चतुर चर चारी ॥
बूझि भरत सति भाउ कुभाऊ । आएहु बेगि न होइ लखाऊ ॥
[जब किसीने कोई सम्मति नहीं दी] तब राजाने धीरज धर हृदयमें विचारकर चार चतुर गुप्तचर ( जासूस ) अयोध्याको भेजे [ और उनसे कह दिया कि ] तुमलोग [ श्रीरामजीके प्रति] भरतजीके सद्भाव ( अच्छे भाव, प्रेम ) या दुर्भाव ( बुरा भाव, विरोध ) का [ यथार्थ ] पता लगाकर जल्दी लौट आना, किसीको तुम्हारा पता न लगने पावे ॥४ ॥
दो० – गए अवध चर भरत गति बूझि देखि करतूति ।
चले चित्रकूटहि भरतु चार चले तेरहूति ॥ २७१ ॥
गुप्तचर अवधको गये और भरतजीका ढंग जानकर और उनकी करनी देखकर, जैसे ही भरतजी चित्रकूटको चले, वे तिरहुत ( मिथिला ) को चल दिये ॥ २७१ ॥
दूतन्ह आइ भरत कइ करनी । जनक समाज जथामति बरनी ॥
सुनि गुर परिजन सचिव महीपति । भे सब सोच सनेहँ बिकल अति ॥
[ गुप्त ] दूतोंने आकर राजा जनकजीकी सभामें भरतजीकी करनीका अपनी बुद्धिके अनुसार वर्णन किया । उसे सुनकर गुरु, कुटुम्बी, मन्त्री और राजा सभी सोच और स्नेहसे अत्यन्त व्याकुल हो गये ॥१ ॥
धरि धीरजु कर भरत बड़ाई । लिए सुभट साहनी बोलाई ॥
घर पुर देस राखि रखवारे । हय गय रथ बहु जान सँवारे ॥
फिर जनकजीने धीरज धरकर और भरतजीकी बड़ाई करके अच्छे योद्धाओं और साहनियोंको बुलाया । घर, नगर और देशमें रक्षकोंको रखकर घोड़े, हाथी, रथ आदि बहुत - सी सवारियाँ सजवायीं ॥ २ ॥
दुघरी साधि चले ततकाला । किए बिश्रामु न मग महिपाला ॥
भोरहिं आजु नहाइ प्रयागा । चले जमुन उतरन सबु लागा ॥
वे दुघड़िया मुहूर्त साधकर उसी समय चल पड़े । राजाने रास्तेमें कहीं विश्राम भी नहीं किया ।
आज ही सबेरे प्रयागराजमें स्नान करके चले हैं । जब सब लोग यमुनाजी उतरने लगे, ॥३ ॥
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* * अयोध्याकाण्ड ५७१
खबरि लेन हम पठए नाथा । तिन्ह कहि अस महि नायउ माथा ॥
साथ किरात छ सातक दीन्हे । मुनिबर तुरत बिदा चर कीन्हे ॥
तब हे नाथ! हमें खबर लेनेको भेजा । उन्होंने ( दूतोंने ) ऐसा कहकर पृथ्वीपर सिर नवाया । मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठजीने कोई छ: -सात भीलोंको साथ देकर दूतोंको तुरंत विदा कर दिया ॥ ४ ॥
दो० –- सुनत जनक आगवनु सबु हरषेउ अवध समाजु ।
रघुनंदनहि सकोचु बड़ सोच बिबस सुरराजु ॥ २७२ ॥
जनकजीका आगमन सुनकर अयोध्याका सारा समाज हर्षित हो गया । श्रीरामजीको बड़ा संकोच हुआ और देवराज इन्द्र तो विशेषरूपसे सोचके वशमें हो गये ॥ २७२ ॥
गरइ गलानि कुटिल कैकेई । काहि कहै केहि दूषनु देई ॥
अस मन आनि मुदित नर नारी । भयउ बहोरि रहब दिन चारी ॥
कुटिल कैकेयी मन--ही- मन ग्लानि ( पश्चात्ताप ) से गली जाती है । किससे कहे और किसको दोष दे? और सब नर-नारी मनमें ऐसा विचारकर प्रसन्न हो रहे हैं कि [अच्छा हुआ, जनकजीके आनेसे ] चार ( कुछ ) दिन और रहना हो गया ॥ १ ॥
एहि प्रकार गत बासर सोऊ । प्रात नहान लाग सबु कोऊ ॥
करि मज्जनु पूजहिं नर नारी । गनप गौरि तिपुरारि तमारी ॥
इस तरह वह दिन भी बीत गया । दूसरे दिन प्रात: काल सब कोई स्नान करने लगे । स्नान करके सब नर- नारी गणेशजी, गौरीजी, महादेवजी और सूर्यभगवान्की पूजा करते हैं ॥२ ॥
रमा रमन पद बंदि बहोरी । बिनवहिं अंजुलि अंचल जोरी ॥
राजा रामु जानकी रानी । आनँद अवधि अवध रजधानी ॥
फिर लक्ष्मीपति भगवान् विष्णुके चरणोंकी वन्दना करके, दोनों हाथ जोड़कर, आँचल पसारकर विनती करते हैं कि श्रीरामजी राजा हों, जानकीजी रानी हों तथा राजधानी अयोध्या आनन्दकी सीमा होकर - ॥ ३ ॥
सुबस बस फिरि सहित समाजा । भरतहि रामु करहुँ जुबराजा ॥
एहि सुख सुधाँ सींचि सब काहू । देव देहु जग जीवन लाहू॥
फिर समाजसहित सुखपूर्वक बसे और श्रीरामजी भरतजीको युवराज बनावें । हे देव! इस सुखरूपी अमृतसे सींचकर सब किसीको जगत्में जीनेका लाभ दीजिये ॥ ४ ॥
दो० -– गुर समाज भाइन्ह सहित राम राजु पुर होउ ।
अछत राम राजा अवध मरिअ माग सबु कोउ ॥ २७३ ॥
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* *५७२ रामचरितमानस गुरु, समाज और भाइयोंसमेत श्रीरामजीका राज्य अवधपुरीमें हो और श्रीरामजीके राजा रहते
ही हमलोग अयोध्यामें मरें । सब कोई यही माँगते हैं ॥ २७३ ॥
सुनि सनेहमय पुरजन बानी । निंदहिं जोग बिरति मुनि ग्यानी ॥
एहि बिधि नित्यकरम करि पुरजन । रामहि करहिं प्रनाम पुलकि तन ॥
अयोध्यावासियोंकी प्रेममयी वाणी सुनकर ज्ञानी मुनि भी अपने योग और वैराग्यकी निन्दा करते हैं । अवधवासी इस प्रकार नित्यकर्म करके श्रीरामजीको पुलकितशरीर हो प्रणाम करते हैं ॥१ ॥
ऊँच नीच मध्यम नर नारी । लहहिं दरसु निज निज अनुहारी ॥
सकल सराहत कृपानिधानहिं ॥सावधान सबही सनमानहिं । ऊँच, नीच और मध्यम सभी श्रेणियोंके स्त्री - पुरुष अपने -अपने भावके अनुसार श्रीरामजीका दर्शन प्राप्त करते हैं । श्रीरामचन्द्रजी सावधानीके साथ सबका सम्मान करते हैं और सभी कृपानिधान श्रीरामचन्द्रजीकी सराहना करते हैं ॥ २ ॥
लरिकाइहि तें रघुबर बानी । पालत नीति प्रीति पहिचानी ॥
सील सकोच सिंधु रघुराऊ । सुमुख सुलोचन सरल सुभाऊ ॥
श्रीरामजीकी लड़कपनसे ही यह बान है कि वे प्रेमको पहचानकर नीतिका पालन करते हैं । श्रीरघुनाथजी शील और संकोचके समुद्र हैं । वे सुन्दर मुखके [ या सबके अनुकूल रहनेवाले ], सुन्दर नेत्रवाले [ या सबको कृपा और प्रेमकी दृष्टिसे देखनेवाले ] और सरलस्वभाव हैं ॥३ ॥
कहत राम गुन गन अनुरागे । सब निज भाग सराहन लागे ॥
हम सम पुन्य पुंज जग थोरे । जिन्हहि रामु जानत करि मोरे ॥
श्रीरामजीके गुणसमूहोंको कहते- कहते सब लोग प्रेममें भर गये और अपने भाग्यकी सराहना करने लगे कि जगत्में हमारे समान पुण्यकी बड़ी पूँजीवाले थोड़े ही हैं; जिन्हें श्रीरामजी अपना करके जानते हैं ( ये मेरे हैं ऐसा जानते हैं ) ॥४ ॥
दो० – प्रेम मगन तेहि समय सब सुनि आवत मिथिलेसु ।
सहित सभा संभ्रम उठेउ रबिकुल कमल दिनेसु ॥ २७४ ॥
उस समय सब लोग प्रेममें मग्न हैं । इतनेमें ही मिथिलापति जनकजीको आते हुए सुनकर सूर्यकुलरूपी कमलके सूर्य श्रीरामचन्द्रजी सभासहित आदरपूर्वक जल्दीसे उठ खड़े हुए ॥२७४ ॥
भाइ सचिव गुर पुरजन साथा । आगे गवनु कीन्ह रघुनाथा ॥
गिरिबरु दीख जनकपति जबहीं । करि प्रनामु रथ त्यागेउ तबहीं ॥
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* ** अयोध्याकाण्ड ५७३ भाई, मन्त्री, गुरु और पुरवासियोंको साथ लेकर श्रीरघुनाथजी आगे ( जनकजीकी अगवानीमें ) चले । जनकजीने ज्यों ही पर्वतश्रेष्ठ कामदनाथको देखा, त्यों ही प्रणाम करके उन्होंने रथ छोड़ दिया (पैदल चलना शुरू कर दिया ) ॥ १ ॥
राम दरस लालसा उछाहू । पथ श्रम लेसु कलेसु न काहू ॥
मन तहँ जहँ रघुबर बैदेही । बिनु मन तन दुख सुख सुधि केही ॥
श्रीरामजीके दर्शनकी लालसा और उत्साहके कारण किसीको रास्तेकी थकावट और क्लेश जरा भी नहीं है । मन तो वहाँ है जहाँ श्रीराम और जानकीजी हैं । बिना मनके शरीरके सुख-दुःखकी सुध किसको हो? ॥ २ ॥
आवत जनकु चले एहि भाँती । सहित समाज प्रेम मति माती ॥
आए निकट देखि अनुरागे । सादर मिलन परसपर लागे ॥
जनकजी इस प्रकार चले आ रहे हैं । समाजसहित उनकी बुद्धि प्रेममें मतवाली हो रही है ।
निकट आये देखकर सब प्रेममें भर गये और आदरपूर्वक आपसमें मिलने लगे ॥३ ॥
लगे जनक मुनिजन पद बंदन । रिषिन्ह प्रनामु कीन्ह रघुनंदन ॥
भाइन्ह सहित रामु मिलि राजहि । चले लवाइ समेत समाजहि ॥
जनकजी [ वसिष्ठ आदि अयोध्यावासी ] मुनियोंके चरणोंकी वन्दना करने लगे और श्रीरामचन्द्रजीने [ शतानन्द आदि जनकपुरवासी ] ऋषियोंको प्रणाम किया । फिर भाइयोंसमेत श्रीरामजी राजा जनकजीसे मिलकर उन्हें समाजसहित अपने आश्रमको लिवा चले ॥४ ॥
दो० – आश्रम सागर सांत रस पूरन पावन पाथु ।
सेन मनहुँ करुना सरित लिएँ जाहिं रघुनाथु ॥ २७५ ॥
श्रीरामजीका आश्रम शान्तरसरूपी पवित्र जलसे परिपूर्ण समुद्र है । जनकजीकी सेना ( समाज ) मानो करुणा ( करुणरस ) की नदी है, जिसे श्रीरघुनाथजी [उस आश्रमरूपी शान्तरसके समुद्रमें मिलानेके लिये ] लिये जा रहे हैं ॥ २७५ ॥
बोरति ग्यान बिराग करारे । बचन ससोक मिलत नद नारे ॥
सोच उसास समीर तरंगा । धीरज तट तरुबर कर भंगा ॥
यह करुणाकी नदी [ इतनी बढ़ी हुई है कि] ज्ञान -वैराग्यरूपी किनारोंको डुबाती जाती है । शोकभरे वचन नद और नाले हैं, जो इस नदीमें मिलते हैं; और सोचकी लम्बी साँसें ( आहें ) ही वायुके झकोरोंसे उठनेवाली तरङ्गे हैं, जो धैर्यरूपी किनारेके उत्तम वृक्षोंको तोड़ रही हैं ॥ १ ॥
बिषम बिषाद तोरावति धारा । भय भ्रम भवँर अबर्त अपारा ॥
केवट बुध बिद्या बड़ि नावा । सकहिं न खेइ ऐक नहिं आवा ॥
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* *५७४ रामचरितमानस भयानक विषाद ( शोक ) ही उस नदीकी तेज धारा है । भय और भ्रम ( मोह ) ही उसके असंख्य भँवर और चक्र हैं । विद्वान् मल्लाह हैं, विद्या ही बड़ी नाव है । परन्तु वे उसे खे नहीं सकते हैं, ( उस विद्याका उपयोग नहीं कर सकते हैं ), किसीको उसकी अटकल ही नहीं आती है ॥२ ॥
बनचर कोल किरात बिचारे । थके बिलोकि पथिक हियँ हारे ॥
आश्रम उदधि मिली जब जाई । मनहुँ उठेउ अंबुधि अकुलाई ॥
वनमें विचरनेवाले बेचारे कोल -किरात ही यात्री हैं, जो उस नदीको देखकर हृदयमें हारकर थक गये हैं । यह करुणा- नदी जब आश्रम-समुद्रमें जाकर मिली, तो मानो वह समुद्र अकुला उठा ( खौल उठा) ॥३ ॥
सोक बिकल दोउ राज समाजा । रहा न ग्यानु न धीरजु लाजा ॥
भूप रूप गुन सील सराही । रोवहिं सोक सिंधु अवगाही ॥
दोनों राजसमाज शोकसे व्याकुल हो गये । किसीको न ज्ञान रहा, न धीरज और न लाज ही रही । राजा दशरथजीके रूप, गुण और शीलकी सराहना करते हुए सब रो रहे हैं और शोकसमुद्रमें डुबकी लगा रहे हैं ॥ ४ ॥
छं० – अवगाहि सोक समुद्र सोचहिं नारि नर ब्याकुल महा ।
दै दोष सकल सरोष बोलहिं बाम बिधि कीन्हो कहा ॥
सुरसिद्ध तापस जोगिजन मुनि देखि दसा बिदेह की ।
तुलसी न समरथु कोउ जो तरि सकै सरित सनेह की ॥
शोकसमुद्रमें डुबकी लगाते हुए सभी स्त्री- पुरुष महान् व्याकुल होकर सोच ( चिन्ता ) कर रहे हैं । वे सब विधाताको दोष देते हुए क्रोधयुक्त होकर कह रहे हैं कि प्रतिकूल विधाताने यह क्या किया? तुलसीदासजी कहते हैं कि देवता, सिद्ध, तपस्वी, योगी और मुनिगणोंमें कोई भी समर्थ नहीं है जो उस समय विदेह ( जनकराज ) की दशा देखकर प्रेमकी नदीको पार कर सके ( प्रेममें मग्न हुए बिना रह सके ) ।
सो० — किए अमित उपदेस जहँ तहँ लोगन्ह मुनिबरन्ह ।
धीरजु धरिअ नरेस कहेउ बसिष्ठ बिदेह सन ॥ २७६ ॥
जहाँ- तहाँ श्रेष्ठ मुनियोंने लोगोंको अपरिमित उपदेश दिये और वसिष्ठजीने विदेह ( जनकजी ) से कहा— हे राजन्! आप धैर्य धारण कीजिये ॥ २७६ ॥
जासु ग्यानु रबि भव निसि नासा । बचन किरन मुनि कमल बिकासा ॥
तेहि कि मोह ममता निअराई । यह सिय राम सनेह बड़ाई ॥
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* ** अयोध्याकाण्ड ५७५ जिन राजा जनकका ज्ञानरूपी सूर्य भव ( आवागमन ) रूपी रात्रिका नाश कर देता है, और जिनकी वचनरूपी किरणें मुनिरूपी कमलोंको खिला देती हैं ( आनन्दित करती हैं ), क्या मोह और ममता उनके निकट भी आ सकते हैं? यह तो श्रीसीतारामजीके प्रेमकी महिमा है! [ अर्थात् राजा जनककी यह दशा श्रीसीतारामजीके अलौकिक प्रेमके कारण हुई, लौकिक मोह-ममताके कारण नहीं । जो लौकिक मोह- ममताको पार कर चुके हैं उनपर भी श्रीसीतारामजीका प्रेम अपना प्रभाव दिखाये बिना नहीं रहता ] ॥ १ ॥
बिषई साधक सिद्ध सयाने ॥ त्रिबिध जीव जग बेद बखाने ॥
राम सनेह सरस मन जासू । साधु सभाँ बड़ आदर तासू॥
विषयी, साधक और ज्ञानवान् सिद्ध पुरुष- जगत्में ये तीन प्रकारके जीव वेदोंने बताये हैं । इन तीनोंमें जिसका चित्त श्रीरामजीके स्नेहसे सरस ( सराबोर ) रहता है, साधुओंकी सभामें उसीका बड़ा आदर होता है ॥२ ॥
सोह न राम पेम बिनु ग्यानू । करनधार बिनु जिमि जलजानू ॥
मुनि बहुबिधि बिदेहु समुझाए । राम घाट सब लोग नहाए ॥
श्रीरामजीके प्रेमके बिना ज्ञान शोभा नहीं देता, जैसे कर्णधारके बिना जहाज । वसिष्ठजीने विदेहराज (जनकजी ) को बहुत प्रकारसे समझाया । तदनन्तर सब लोगोंने श्रीरामजीके घाटपर स्नान किया ॥ ३ ॥
सकल सोक संकुल नर नारी । सो बासरु बीतेउ बिनु बारी ॥
पसु खग मृगन्ह न कीन्ह अहारू । प्रिय परिजन कर कौन बिचारू ॥
स्त्री- पुरुष सब शोकसे पूर्ण थे । वह दिन बिना ही जलके बीत गया ( भोजनकी बात तो दूर रही, किसीने जलतक नहीं पिया) । पशु, पक्षी और हिरनोंतकने कुछ आहार नहीं किया । तब प्रियजनों एवं कुटुम्बियोंका तो विचार ही क्या किया जाय? ॥४ ॥
दो० -दोउ समाज निमिराजु रघुराजु नहाने प्रात ।
बैठे सब बट बिटप तर मन मलीन कृस गात ॥ २७७ ॥
निमिराज जनकजी और रघुराज रामचन्द्रजी तथा दोनों ओरके समाजने दूसरे दिन सबेरे स्नान किया और सब बड़के वृक्षके नीचे जा बैठे । सबके मन उदास और शरीर दुबले हैं ॥ २७७ ॥
जे महिसुर दसरथ पुर बासी । जे मिथिलापति नगर निवासी ॥
हंस बंस गुर जनक पुरोधा । जिन्ह जग मगु परमारथु सोधा ॥
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* *५७६ रामचरितमानस जो दशरथजीकी नगरी अयोध्याके रहनेवाले और जो मिथिलापति जनकजीके नगर जनकपुरके रहनेवाले ब्राह्मण थे, तथा सूर्यवंशके गुरु वसिष्ठजी तथा जनकजीके पुरोहित शतानन्दजी, जिन्होंने सांसारिक अभ्युदयका मार्ग तथा परमार्थका मार्ग छान डाला था, ॥ १ ॥
लगे कहन उपदेस अनेका । सहित धरम नय बिरति बिबेका ॥
कौसिक कहि कहि कथा पुरानीं । समुझाई सब सभा सुबानीं ॥
वे सब धर्म, नीति, वैराग्य तथा विवेकयुक्त अनेकों उपदेश देने लगे । विश्वामित्रजीने पुरानी कथाएँ ( इतिहास ) कह कहकर सारी सभाको सुन्दर वाणीसे समझाया ॥२ ॥
तब रघुनाथ कौसिकहि कहेऊ । नाथ कालि जल बिनु सबु रहेऊ ॥
मुनि कह उचित कहत रघुराई । गयउ बीति दिन पहर अढ़ाई ॥
तब श्रीरघुनाथजीने विश्वामित्रजीसे कहा कि हे नाथ! कल सब लोग बिना जल पिये ही रह गये थे [ अब कुछ आहार करना चाहिये ] । विश्वामित्रजीने कहा कि श्रीरघुनाथजी उचित ही कह रहे हैं । ढाई पहर दिन [आज भी ] बीत गया ॥ ३ ॥
रिषि रुख लखि कह तेरहुतिराजू । इहाँ उचित नहिं असन अनाजू॥
कहा भूप भल सबहि सोहाना । पाइ रजायसु चले नहाना ॥
विश्वामित्रजीका रुख देखकर तिरहुतराज जनकजीने कहा - यहाँ अन्न खाना उचित नहीं है ।
राजाका सुन्दर कथन सबके मनको अच्छा लगा । सब आज्ञा पाकर नहाने चले ॥४ ॥
दो० – तेहि अवसर फल फूल दल मूल अनेक प्रकार ।
लइ आए बनचर बिपुल भरि भरि काँवरि भार ॥ २७८ ॥
उसी समय अनेकों प्रकारके बहुत-से फल, फूल, पत्ते, मूल आदि बहँगियों और बोझोंमें भर-भरकर वनवासी ( कोल-किरात ) लोग ले आये ॥२७८ ॥
कामद भे गिरि राम प्रसादा । अवलोकत अपहरत बिषादा ॥
सर सरिता बन भूमि बिभागा । जनु उमगत आनँद अनुरागा ॥
श्रीरामचन्द्रजीकी कृपासे सब पर्वत मनचाही वस्तु देनेवाले हो गये । वे देखनेमात्रसे ही दुःखोंको सर्वथा हर लेते थे । वहाँके तालाबों, नदियों, वन और पृथ्वीके सभी भागोंमें मानो आनन्द और प्रेम उमड़ रहा है ॥ १ ॥
बेलि बिटप सब सफल सफूला । बोलत खग मृग अलि अनुकूला ॥
तेहि अवसर बन अधिक उछाहू । त्रिबिध समीर सुखद सब काहू ॥
बेलें और वृक्ष सभी फल और फूलोंसे युक्त हो गये । पक्षी, पशु और भौंरे अनुकूल बोलने लगे । उस अवसरपर वनमें बहुत उत्साह ( आनन्द ) था, सब किसीको सुख देनेवाली शीतल, मन्द, सुगन्ध हवा चल रही थी ॥२ ॥
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* ** अयोध्याकाण्ड ५७७
जाइ न बरनि मनोहरताई । जनु महि करति जनक पहुनाई ॥
तब सब लोग नहाइ नहाई । राम जनक मुनि आयसु पाई ॥
देखि देखि तरुबर अनुरागे । जहँ तहँ पुरजन उतरन लागे ॥
दल फल मूल कंद बिधि नाना । पावन सुंदर सुधा समाना ॥
वनकी मनोहरता वर्णन नहीं की जा सकती, मानो पृथ्वी जनकजीकी पहुनाई कर रही है । तब जनकपुरवासी सब लोग नहा- नहाकर श्रीरामचन्द्रजी, जनकजी और मुनिकी आज्ञा पाकर, सुन्दर वृक्षोंको देख- देखकर प्रेममें भरकर जहाँ-तहाँ उतरने लगे । पवित्र, सुन्दर और अमृतके समान [ स्वादिष्ट ] अनेकों प्रकारके पत्ते, फल, मूल और कन्द— ॥३-४ ॥
दो० - सादर सब कहँ रामगुर पठए भरि भरि भार ।
पूजि पितर सुर अतिथि गुर लगे करन फरहार ॥ २७ ९ ॥
श्रीरामजीके गुरु वसिष्ठजीने सबके पास बोझे भर- भरकर आदरपूर्वक भेजे । तब वे पितर- देवता, अतिथि और गुरुकी पूजा करके फलाहार करने लगे ॥ २७९ ॥
एहि बिधि बासर बीते चारी । रामु निरखि नर नारि सुखारी ॥
दुहु समाज असि रुचि मन माहीं । बिनु सिय राम फिरब भल नाहीं ॥
इस प्रकार चार दिन बीत गये । श्रीरामचन्द्रजीको देखकर सभी नर-नारी सुखी हैं । दोनों समाजोंके मनमें ऐसी इच्छा है कि श्रीसीतारामजीके बिना लौटना अच्छा नहीं है ॥१ ॥
सीता राम संग बनबासू ॥ कोटि अमरपुर सरिस सुपासू॥
परिहरि लखन रामु बैदेही । जेहि घरु भाव बाम बिधि तेही ॥
श्रीसीतारामजीके साथ वनमें रहना करोड़ों देवलोकोंके [ निवासके ] समान सुखदायक है । श्रीलक्ष्मणजी, श्रीरामजी और श्रीजानकीजीको छोड़कर जिसको घर अच्छा लगे, विधाता उसके विपरीत हैं ॥२ ॥
दाहिन दइउ होइ जब सबही । राम समीप बसिअ बन तबही ॥
मंदाकिनि मज्जनु तिहु काला । राम दरसु मुद मंगल माला ॥
जब दैव सबके अनुकूल हो, तभी श्रीरामजीके पास वनमें निवास हो सकता है । मन्दाकिनीजीका तीनों समय स्नान और आनन्द तथा मङ्गलोंकी माला ( समूह ) रूप श्रीरामका दर्शन, ॥ ३ ॥
अटनु राम गिरि बन तापस थल । असनु अमिअ सम कंद मूल फल ॥
सुख समेत संबत दुइ साता । पल सम होहिं न जनिअहिं जाता ॥
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* *५७८ रामचरितमानस श्रीरामजीके पर्वत ( कामदनाथ ), वन और तपस्वियोंके स्थानोंमें घूमना और अमृतके समान कन्द, मूल, फलोंका भोजन । चौदह वर्ष सुखके साथ पलके समान हो जायँगे ( बीत जायँगे ), जाते हुए जान ही न पड़ेंगे ॥ ४ ॥
दो० –एहि सुख जोग न लोग सब कहहिं कहाँ अस भागु ।
सहज सुभायँ समाज दुहु राम चरन अनुरागु ॥ २८० ॥
सब लोग कह रहे हैं कि हम इस सुखके योग्य नहीं हैं, हमारे ऐसे भाग्य कहाँ? दोनों समाजोंका श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंमें सहज स्वभावसे ही प्रेम है ॥ २८० ॥
एहि बिधि सकल मनोरथ करहीं । बचन सप्रेम सुनत मन हरहीं ॥
सीय मातु तेहि समय पठाईं । दासीं देखि सुअवसरु आईं ॥
इस प्रकार सब मनोरथ कर रहे हैं । उनके प्रेमयुक्त वचन सुनते ही [ सुननेवालोंके ] मनोंको हर लेते हैं । उसी समय सीताजीकी माता श्रीसुनयनाजीकी भेजी हुई दासियाँ [ कौसल्याजी आदिके मिलनेका ] सुन्दर अवसर देखकर आयीं ॥ १ ॥
सावकास सुनि सब सिय सासू । आयउ जनकराज रनिवासू॥
कौसल्याँ सादर सनमानी । आसन दिए समय सम आनी ॥
उनसे यह सुनकर कि सीताकी सब सासुएँ इस समय फुरसतमें हैं, जनकराजका रनिवास उनसे मिलने आया । कौसल्याजीने आदरपूर्वक उनका सम्मान किया और समयोचित आसन लाकर दिये ॥२ ॥
सीलु सनेहु सकल दुहु ओरा । द्रवहिं देखि सुनि कुलिस कठोरा ॥
पुलक सिथिल तन बारि बिलोचन । महि नख लिखन लगीं सब सोचन ॥
दोनों ओर सबके शील और प्रेमको देखकर और सुनकर कठोर वज्र भी पिघल जाते हैं । शरीर पुलकित और शिथिल हैं और नेत्रोंमें [ शोक और प्रेमके ] आँसू हैं । सब अपने [ पैरोंके ] नखोंसे जमीन कुरेदने और सोचने लगीं ॥३ ॥
सब सिय राम प्रीति कि सि मूरति । जनु करुना बहु बेष बिसूरति ॥
सीय मातु कह बिधि बुधि बाँकी । जो पय फेनु फोर पबि टाँकी ॥
सभी श्रीसीतारामजीके प्रेमकी मूर्ति-सी हैं, मानो स्वयं करुणा ही बहुत- से वेष ( रूप) धारण करके विसूर रही हो ( दुःख कर रही हो ) । सीताजीकी माता सुनयनाजीने कहा- विधाताकी बुद्धि बड़ी टेढ़ी है, जो दूधके फेन -जैसी कोमल वस्तुको वज्रकी टाँकीसे फोड़ रहा है ( अर्थात् जो अत्यन्त कोमल और निर्दोष हैं उनपर विपत्ति--1पर-विपत्ति ढहा रहा है ) ॥४ ॥