श्रीरामचरितमानस — पृष्ठ 581–590
श्रीरामचरितमानस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 581–590
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* * अयोध्याकाण्ड ५७९
दो० - सुनिअ सुधा देखिअहिं गरल सब करतूति कराल ।
जहँ तहँ काक उलूक बक मानस सकृत मराल ॥ २८१ ॥
अमृत केवल सुननेमें आता है और विष जहाँ - तहाँ प्रत्यक्ष देखे जाते हैं । विधाताकी सभी करतूतें भयङ्कर हैं । जहाँ- तहाँ कौए, उल्लू और बगुले ही [दिखायी देते ] हैं; हंस तो एक मानसरोवरमें ही है ॥ २८१ ॥
सुन ससोच कह देबि सुमित्रा । बिधि गति बड़ि बिपरीत बिचित्रा ॥
जो सृजि पालइ हरड़ बहोरी । बालकेलि सम बिधि मति भोरी ॥
यह सुनकर देवी सुमित्राजी शोकके साथ कहने लगीं-विधाताकी चाल बड़ी ही विपरीत और विचित्र है, जो सृष्टिको उत्पन्न करके पालता है और फिर नष्ट कर डालता है । विधाताकी बुद्धि बालकोंके खेलके समान भोली ( विवेकशून्य ) है ॥१ ॥
कौसल्या कह दोसु न काहू । करम बिबस दुख सुख छति लाहू ॥
कठिन करम गति जान बिधाता । जो सुभ असुभ सकल फल दाता ॥
कौसल्याजीने कहा — किसीका दोष नहीं है; दुःख-सुख, हानि-लाभ सब कर्मके अधीन हैं । कर्मकी गति कठिन ( दुर्विज्ञेय ) है, उसे विधाता ही जानता है, जो शुभ और अशुभ सभी फलोंका देनेवाला है ॥२ ॥
ईस रजाइ सीस सबही कें । उतपति थिति लय बिषहु अमी कें ॥
देबि मोह बस सोचिअ बादी । बिधि प्रपंच अस अचल अनादी ॥
ईश्वरकी आज्ञा सभीके सिरपर है । उत्पत्ति, स्थिति ( पालन ) और लय ( संहार ) तथा अमृत और विषके भी सिरपर है ( ये सब भी उसीके अधीन हैं ) । हे देवि! मोहवश सोच करना व्यर्थ है । विधाताका प्रपञ्च ऐसा ही अचल और अनादि है ॥३ ॥
भूपति जिअब मरब उर आनी । सोचिअ सखि लखि निज हित हानी ॥
सीय मातु कह सत्य सुबानी । सुकृती अवधि अवधपति रानी ॥
महाराजके मरने और जीनेकी बातको हृदयमें याद करके जो चिन्ता करती हैं, वह तो हे सखी! हम अपने ही हितकी हानि देखकर ( स्वार्थवश ) करती हैं । सीताजीकी माताने कहा- आपका कथन उत्तम और सत्य है । आप पुण्यात्माओंके सीमारूप अवधपति ( महाराज दशरथजी ) की ही तो रानी हैं । [फिर भला ऐसा क्यों न कहेंगी ] ॥ ४ ॥
दो० - लखनु रामु सिय जाहुँ बन भल परिनाम न पोचु ।
गहबरि हियँ कह कौसिला मोहि भरत कर सोचु ॥ २८२ ॥
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* *५८० रामचरितमानस कौसल्याजीने दुःखभरे हृदयसे कहा– श्रीराम, लक्ष्मण और सीता वनमें जायँ, इसका परिणाम
तो अच्छा ही होगा, बुरा नहीं । मुझे तो भरतकी चिन्ता है ॥ २८२ ॥
ईस प्रसाद असीस तुम्हारी । सुत सुतबधू देवसरि बारी ॥
राम सपथ मैं कीन्हि न काऊ । सो करि कहउँ सखी सति भाऊ ॥
ईश्वरके अनुग्रह और आपके आशीर्वादसे मेरे [चारों ] पुत्र और [ चारों ] बहुएँ गङ्गाजीके जलके समान पवित्र हैं । हे सखी! मैंने कभी श्रीरामकी सौगन्ध नहीं की, सो आज श्रीरामकी शपथ करके सत्य भावसे कहती हूँ—॥१ ॥
भरत सील गुन बिनय बड़ाई । भायप भगति भरोस भलाई ॥
कहत सारदहु कर मति हीचे । सागर सीप कि जाहिं उलीचे ॥
भरतके शील, गुण, नम्रता, बड़प्पन, भाईपन, भक्ति, भरोसे और अच्छेपनका वर्णन करनेमें
सरस्वतीजीकी बुद्धि भी हिचकती है । सीपसे कहीं समुद्र उलीचे जा सकते हैं? ॥२ ॥
जानउँ सदा भरत कुलदीपा । बार बार मोहि कहेउ महीपा ॥
कसें कनकु मनि पारिख पाएँ । पुरुष परिखिअहिं समयँ सुभाएँ ॥
मैं भरतको सदा कुलका दीपक जानती हूँ । महाराजने भी बार-बार मुझे यही कहा था । सोना कसौटीपर कसे जानेपर और रत्न पारखी (जौहरी ) के मिलनेपर ही पहचाना जाता है । वैसे ही पुरुषकी परीक्षा समय पड़नेपर उसके स्वभावसे ही ( उसका चरित्र देखकर ) हो जाती है ॥३ ॥
अनुचित आजु कहब अस मोरा । सोक सनेहँ सयानप थोरा ॥
सुनि सुरसरि सम पावनि बानी । भईं सनेह बिकल सब रानी ॥
किन्तु आज मेरा ऐसा कहना भी अनुचित है । शोक और स्नेहमें सयानापन ( विवेक ) कम हो जाता है ( लोग कहेंगे कि मैं स्नेहवश भरतकी बड़ाई कर रही हूँ) । कौसल्याजीकी गङ्गाजीके समान पवित्र करनेवाली वाणी सुनकर सब रानियाँ स्नेहके मारे विकल हो उठीं ॥४ ॥
दो० – कौसल्या कह धीर धरि सुनहु देबि मिथिलेसि ।
को बिबेकनिधि बल्लभहि तुम्हहि सकइ उपदेसि ॥ २८३ ॥
कौसल्याजीने फिर धीरज धरकर कहा-हे देवि मिथिलेश्वरी! सुनिये, ज्ञानके भण्डार श्रीजनकजीकी प्रिया आपको कौन उपदेश दे सकता है? ॥ २८३ ॥
रानि राय सन अवसरु पाई । अपनी भाँति कहब समुझाई ॥
रखिअहिं लखनु भरतु गवनहिं बन । जौं यह मत मानै महीप मन ॥
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* ** अयोध्याकाण्ड ५८१ हे रानी! मौका पाकर आप राजाको अपनी ओरसे जहाँतक हो सके समझाकर कहियेगा कि लक्ष्मणको घर रख लिया जाय और भरत वनको जायँ । यदि यह राय राजाके मनमें [ठीक ] जँच जाय,॥ १ ॥
तौ भल जतनु करब सुबिचारी । मोरें सोचु भरत कर भारी ॥
गूढ़ सनेह भरत मन माहीं । रहें नीक मोहि लागत नाहीं ॥
तो भलीभाँति खूब विचारकर ऐसा यत्न करें । मुझे भरतका अत्यधिक सोच है । भरतके मनमें गूढ़ प्रेम है । उनके घर रहनेमें मुझे भलाई नहीं जान पड़ती ( यह डर लगता है कि उनके प्राणोंको कोई भय न हो जाय ) ॥२ ॥
लखि सुभाउ सुनि सरल सुबानी । सब भइ मगन करुन रस रानी ॥
नभ प्रसून झरि धन्य धन्य धुनि । सिथिल सनेहँ सिद्ध जोगी मुनि ॥
कौसल्याजीका स्वभाव देखकर और उनकी सरल और उत्तम वाणीको सुनकर सब रानियाँ करुणरसमें निमग्न हो गयीं । आकाशसे पुष्पवर्षाकी झड़ी लग गयी और धन्य- धन्यकी ध्वनि होने लगी । सिद्ध, योगी और मुनि स्नेहसे शिथिल हो गये ॥३ ॥
सबु रनिवासु बिकि लखि रहेऊ । तब धरि धीर सुमित्राँ कहेऊ ॥
देबि दंड जुग जामिनि बीती । राम मातु सुनि उठी सप्रीती ॥
सारा रनिवास देखकर थकित रह गया ( निस्तब्ध हो गया ), तब सुमित्राजीने धीरज धरके कहा कि हे देवि! दो घड़ी रात बीत गयी है । यह सुनकर श्रीरामजीकी माता कौसल्याजी प्रेमपूर्वक उठीं ॥ ४ ॥
दो० – बेगि पाउ धारिअ थलहि कह सनेहँ सतिभाय ।
हमरें तौ अब ईस गति के मिथिलेस सहाय ॥ २८४ ॥
और प्रेमसहित सद्भावसे बोलीं- अब आप शीघ्र डेरेको पधारिये । हमारे तो अब ईश्वर ही गति हैं, अथवा मिथिलेश्वर जनकजी सहायक हैं ॥ २८४ ॥
लखि सनेह सुनि बचन बिनीता । जनकप्रिया गह पाय पुनीता ॥
देबि उचित असि बिनय तुम्हारी । दसरथ घरिनि राम महतारी ॥
कौसल्याजीके प्रेमको देखकर और उनके विनम्र वचनोंको सुनकर जनकजीकी प्रिय पत्नीने उनके पवित्र चरण पकड़ लिये और कहा - हे देवि! आप राजा दशरथजीकी रानी और श्रीरामजीकी माता हैं । आपकी ऐसी नम्रता उचित ही है ॥१ ॥
प्रभु अपने नीचहु आदरहीं । अगिनि धूम गिरि सिर तिनु धरहीं ॥
सेवकु राउ करम मन बानी । सदा सहाय महेसु भवानी ॥
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* *५८२ रामचरितमानस प्रभु अपने नीच जनोंका भी आदर करते हैं । अग्नि धुएँको और पर्वत तृण ( घास ) को अपने सिरपर धारण करते हैं । हमारे राजा तो कर्म, मन और वाणीसे आपके सेवक हैं और सदा सहायक तो श्रीमहादेव- पार्वतीजी हैं ॥ २ ॥
रउरे अंग जोगु जग को है । दीप सहाय कि दिनकर सोहै ॥
रामु जाइ बनु करि सुर काजू । अचल अवधपुर करिहहिं राजू ॥
आपका सहायक होने योग्य जगत्में कौन है? दीपक सूर्यकी सहायता करने जाकर कहीं शोभा पा सकता है? श्रीरामचन्द्रजी वनमें जाकर देवताओंका कार्य करके अवधपुरीमें अचल राज्य करेंगे ॥३ ॥
अमर नाग नर राम बाहुबल । सुख बसिहहिं अपनें अपनें थल ॥
यह सब जागबलिक कहि राखा । देबि न होइ मुधा मुनि भाषा ॥
देवता, नाग और मनुष्य सब श्रीरामचन्द्रजीकी भुजाओंके बलपर अपने- अपने स्थानों ( लोकों ) में सुखपूर्वक बसेंगे । यह सब याज्ञवल्क्य मुनिने पहलेहीसे कह रखा है । हे देवि! मुनिका कथन व्यर्थ (झूठा ) नहीं हो सकता ॥४ ॥
दो० - अस कहि पग परि पेम अति सिय हित बिनय सुनाइ ।
सिय समेत सियमातु तब चली सुआयसु पाइ ॥ २८५ ॥
ऐसा कहकर बड़े प्रेमसे पैरों पड़कर सीताजी [ को साथ भेजने ] के लिये विनती करके और सुन्दर आज्ञा पाकर तब सीताजीसमेत सीताजीकी माता डेरेको चलीं ॥ २८५ ॥
प्रिय परिजनहि मिली बैदेही । जो जेहि जोगु भाँति तेहि तेही ॥
तापस बेष जानकी देखी । भा सबु बिकल बिषाद बिसेषी ॥
जानकीजी अपने प्यारे कुटुम्बियोंसे -जो जिस योग्य था, उससे उसी प्रकार मिलीं ।
जानकीजीको तपस्विनीके वेषमें देखकर सभी शोकसे अत्यन्त व्याकुल हो गये ॥ १ ॥
जनक राम गुर आयसु पाई । चले थलहि सिय देखी आई ॥
लीन्हि लाइ उर जनक जानकी । पाहुनि पावन पेम प्रान की ॥
जनकजी श्रीरामजीके गुरु वसिष्ठजीकी आज्ञा पाकर डेरेको चले और आकर उन्होंने सीताजीको देखा । जनकजीने अपने पवित्र प्रेम और प्राणोंकी पाहुनी जानकीजीको हृदयसे लगा लिया ॥२ ॥
उर उमगेउ अंबुधि अनुरागू ॥ भयउ भूप मनु मनहुँ पयागू ॥
सिय सनेह बटु बाढ़त जोहा । ता पर राम पेम सिसु सोहा ॥
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* ** अयोध्याकाण्ड ५८३ उनके हृदयमें [ वात्सल्य] प्रेमका समुद्र उमड़ पड़ा । राजाका मन मानो प्रयाग हो गया । उस समुद्रके अंदर उन्होंने [ आदिशक्ति] सीताजीके [ अलौकिक ] स्नेहरूपी अक्षयवटको बढ़ते हुए देखा । उस ( सीताजीके प्रेमरूपी वट ) पर श्रीरामजीका प्रेमरूपी बालक ( बालरूपधारी भगवान्) सुशोभित हो रहा है ॥ ३ ॥
चिरजीवी मुनि ग्यान बिकल जनु । बूड़त लहेउ बाल अवलंबनु ॥
मोह मगन मति नहिं बिदेह की । महिमा सिय रघुबर सनेह की ॥
जनकजीका ज्ञानरूपी चिरंजीवी ( मार्कण्डेय ) मुनि व्याकुल होकर डूबते- डूबते मानो उस श्रीरामप्रेमरूपी बालकका सहारा पाकर बच गया । वस्तुतः [ज्ञानिशिरोमणि ] विदेहराजकी बुद्धि मोहमें मग्न नहीं है । यह तो श्रीसीतारामजीके प्रेमकी महिमा है [जिसने उन-जैसे महान् ज्ञानीके ज्ञानको भी विकल कर दिया ] ॥ ४ ॥
दो० - सिय पितु मातु सनेह बस बिकल न सकी सँभारि ।
धरनिसुताँ धीरजु धरेउ समउ सुधरमु बिचारि ॥ २८६ ॥
पिता- माताके प्रेमके मारे सीताजी ऐसी विकल हो गयीं कि अपनेको सँभाल न सकीं । [ परन्तु परम धैर्यवती ] पृथ्वीकी कन्या सीताजीने समय और सुन्दर धर्मका विचार कर धैर्य धारण किया ॥ २८६ ॥
तापस बेष जनक सिय देखी ॥ भयउ पेमु परितोषु बिसेषी ॥॥
पुत्रि पबित्र किए कुल दोऊ । सुजस धवल जगु कह सबु कोऊ ॥
सीताजीको तपस्विनी – वेषमें देखकर जनकजीको विशेष प्रेम और सन्तोष हुआ । [ उन्होंने कहा- ] बेटी! तूने दोनों कुल पवित्र कर दिये । तेरे निर्मल यशसे सारा जगत् उज्वल हो रहा है; ऐसा सब कोई कहते हैं ॥ १ ॥
जिति सुरसरि कीरति सरि तोरी । गवनु कीन्ह बिधि अंड करोरी ॥
गंग अवनि थल तीनि बड़ेरे । एहिं किए साधु समाज घनेरे ॥
तेरी कीर्तिरूपी नदी देवनदी गङ्गाजीको भी जीतकर [जो एक ही ब्रह्माण्डमें बहती है ] करोड़ों ब्रह्माण्डोंमें बह चली है । गङ्गाजीने तो पृथ्वीपर तीन ही स्थानों ( हरिद्वार, प्रयागराज और गङ्गासागर ) को बड़ा ( तीर्थ ) बनाया है । पर तेरी इस कीर्तिनदीने तो अनेकों संतसमाजरूपी तीर्थस्थान बना दिये हैं ॥ २ ॥
पितु कह सत्य सनेहँ सुबानी । सीय सकुच महुँ मनहुँ समानी ॥
पुनि पितु मातु लीन्हि उर लाई । सिख आसिष हित दीन्हि सुहाई ॥
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*:*५८४ रामचरितमानस पिता जनकजीने तो स्नेहसे सच्ची सुन्दर वाणी कही । परन्तु अपनी बड़ाई सुनकर सीताजी मानो संकोचमें समा गयीं । पिता-माताने उन्हें फिर हृदयसे लगा लिया और हितभरी सुन्दर सीख और आशिष दी ॥३ ॥
कहति न सीय सकुचि मन माहीं । इहाँ बसब रजनीं भल नाहीं ॥
लखि रुख रानि जनायउ राऊ । हृदयँ सराहत सीलु सुभाऊ ॥
सीताजी कुछ कहती नहीं हैं, परन्तु मनमें सकुचा रही हैं कि रातमें [ सासुओंकी सेवा छोड़कर] यहाँ रहना अच्छा नहीं है । रानी सुनयनाजीने जानकीजीका रुख देखकर ( उनके मनकी बात समझकर ) राजा जनकजीको जना दिया । तब दोनों अपने हृदयोंमें सीताजीके शील और स्वभावकी सराहना करने लगे ॥४ ॥
दो० - बार बार मिलि भेंटि सिय बिदा कीन्हि सनमानि ।
कही समय सिर भरत गति रानि सुबानि सयानि ॥ २८७ ॥
राजा-रानीने बार-बार मिलकर और हृदयसे लगाकर तथा सम्मान करके सीताजीको विदा किया । चतुर रानीने समय पाकर राजासे सुन्दर वाणीमें भरतजीकी दशाका वर्णन किया ॥ २८७ ॥
सुनि भूपाल भरत ब्यवहारू । सोन सुगंध सुधा ससि सारू ॥
मूदे सजल नयन पुलके तन । सुजसु सराहन लगे मुदित मन ॥
सोनेमें सुगंध और [ समुद्रसे निकली हुई ] सुधामें चन्द्रमाके सार अमृतके समान भरतजीका व्यवहार सुनकर राजाने [प्रेमविह्वल होकर] अपने [ प्रेमाश्रुओंके ] जलसे भरे नेत्रोंको मूँद लिया ( वे भरतजीके प्रेममें मानो ध्यानस्थ हो गये) । वे शरीरसे पुलकित हो गये और मनमें आनन्दित होकर भरतजीके सुन्दर यशकी सराहना करने लगे ॥१ ॥
सावधान सुनु सुमुखि सुलोचनि । भरत कथा भव बंध बिमोचनि ॥
धरम राजनय ब्रह्मबिचारू । इहाँ जथामति मोर प्रचारू ॥
[ वे बोले— ] हे सुमुखि! हे सुनयनी! सावधान होकर सुनो । भरतजीकी कथा संसारके बन्धनसे छुड़ानेवाली है । धर्म, राजनीति और ब्रह्मविचार– इन तीनों विषयोंमें अपनी बुद्धिके अनुसार मेरी [ थोड़ी - बहुत ] गति है ( अर्थात् इनके सम्बन्धमें मैं कुछ जानता हूँ) ॥ २ ॥
सो मति मोरि भरत महिमाही । कहै काह छलि छुअति न छाँही ॥
बिधि गनपति अहिपति सिव सारद । कबि कोबिद बुध बुद्धि बिसारद ॥
वह ( धर्म, राजनीति और ब्रह्मज्ञानमें प्रवेश रखनेवाली ) मेरी बुद्धि भरतजीकी महिमाका वर्णन तो क्या करे, छल करके भी उसकी छायातकको नहीं छू पाती! ब्रह्माजी, गणेशजी, शेषजी, महादेवजी, सरस्वतीजी, कवि, ज्ञानी, पण्डित और बुद्धिमान्- ॥ ३ ॥
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* ** अयोध्याकाण्ड ५८५
भरत चरित कीरति करतूती । धरम सील गुन बिमल बिभूती ॥
समुझत सुनत सुखद सब काहू । सुचि सुरसरि रुचि निदर सुधाहू ॥
सब किसीको भरतजीके चरित्र, कीर्ति, करनी, धर्म, शील, गुण और निर्मल ऐश्वर्य समझनेमें और सुननेमें सुख देनेवाले हैं और पवित्रतामें गङ्गाजीका तथा स्वाद ( मधुरता) में अमृतका भी तिरस्कार करनेवाले हैं ॥ ४ ॥
दो० – निरवधि गुन निरुपम पुरुषु भरतु भरत सम जानि ।
कहिअ सुमेरु कि सेर सम कबिकुल मति सकुचानि ॥ २८८ ॥
भरतजी असीम गुणसम्पन्न और उपमारहित पुरुष हैं । भरतजीके समान बस, भरतजी ही हैं, ऐसा जानो । सुमेरु पर्वतको क्या सेरके बराबर कह सकते हैं? इसलिये ( उन्हें किसी पुरुषके साथ उपमा देनेमें ) कविसमाजकी बुद्धि भी सकुचा गयी! ॥ २८८ ॥
अगम सबहि बरनत बरबरनी । जिमि जलहीन मीन गमु धरनी ॥
भरत अमित महिमा सुनु रानी । जानहिं रामु न सकहिं बखानी ॥
हे श्रेष्ठ वर्णवाली! भरतजीकी महिमाका वर्णन करना सभीके लिये वैसे ही अगम है जैसे जलरहित पृथ्वीपर मछलीका चलना । हे रानी! सुनो, भरतजीकी अपरिमित महिमाको एक श्रीरामचन्द्रजी ही जानते हैं; किन्तु वे भी उसका वर्णन नहीं कर सकते ॥१ ॥
बरनि सप्रेम भरत अनुभाऊ । तियजिय की रुचि लखि कह राऊ ॥
बहुरहिं लखनु भरतु बन जाहीं । सब कर भल सब के मन माहीं ॥
इस प्रकार प्रेमपूर्वक भरतजीके प्रभावका वर्णन करके, फिर पत्नीके मनकी रुचि जानकर राजाने कहा— लक्ष्मणजी लौट जायँ और भरतजी वनको जायँ, इसमें सभीका भला है और यही सबके मनमें है ॥२ ॥
देबि परंतु भरत रघुबर की । प्रीति प्रतीति जाइ नहिं तरकी ॥
भरतु अवधि सनेह ममता की । जद्यपि रामु सीम समता की ॥
परन्तु हे देवि! भरतजी और श्रीरामचन्द्रजीका प्रेम और एक- दूसरेपर विश्वास, बुद्धि और विचारकी सीमामें नहीं आ सकता । यद्यपि श्रीरामचन्द्रजी समताकी सीमा हैं, तथापि भरतजी प्रेम और ममताकी सीमा हैं ॥ ३ ॥
परमारथ स्वारथ सुख सारे । भरत न सपनेहुँ मनहुँ निहारे ॥
साधन सिद्धि राम पग नेहू । मोहि लखि परत भरत मत एहू॥
[ श्रीरामचन्द्रजीके प्रति अनन्य प्रेमको छोड़कर ] भरतजीने समस्त परमार्थ, स्वार्थ और सुखोंकी ओर स्वप्नमें भी मनसे भी नहीं ताका है । श्रीरामजीके चरणोंका प्रेम ही उनका साधन है और वही सिद्धि है । मुझे तो भरतजीका बस, यही एकमात्र सिद्धान्त जान पड़ता है ॥४ ॥
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* *५८६ रामचरितमानस
दो० –- भोरेहुँ भरत न पेलिहहिं मनसहुँ राम रजाइ ।
करिअ न सोचु सनेह बस कहेउ भूप बिलखाइ ॥ २८ ९ ॥
राजाने बिलखकर ( प्रेमसे गद्गद होकर) कहा- भरतजी भूलकर भी श्रीरामचन्द्रजीकी आज्ञाको मनसे भी नहीं टालेंगे । अतः स्नेहके वश होकर चिन्ता नहीं करनी चाहिये ॥ २८ ९ ॥
राम भरत गुन गनत सप्रीती । निसि दंपतिहि पलक सम बीती ॥
राज समाज प्रात जुग जागे । न्हाइ न्हाइ सुर पूजन लागे ॥
श्रीरामजी और भरतजीके गुणोंकी प्रेमपूर्वक गणना करते ( कहते- सुनते ) पति - पत्नीको रात पलकके समान बीत गयी । प्रातः काल दोनों राजसमाज जागे और नहा-नहाकर देवताओंकी पूजा करने लगे ॥१ ॥
गे नहाइ गुर पहिं रघुराई । बंदि चरन बोले रुख पाई ॥
नाथ भरतु पुरजन महतारी । सोक बिकल बनबास दुखारी ॥
श्रीरघुनाथजी स्नान करके गुरु वसिष्ठजीके पास गये और चरणोंकी वन्दना करके उनका रुख पाकर बोले — हे नाथ! भरत, अवधपुरवासी तथा माताएँ, सब शोकसे व्याकुल और वनवाससे दुखी हैं ॥२ ॥
सहित समाज राउ मिथिलेसू । बहुत दिवस भए सहत कलेसू॥
उचित होइ सोइ कीजिअ नाथा । हित सबही कर रौरें हाथा ॥
मिथिलापति राजा जनकजीको भी समाजसहित क्लेश सहते बहुत दिन हो गये । इसलिये हे
नाथ! जो उचित हो वही कीजिये । आपहीके हाथ सभीका हित है ॥ ३ ॥
अस कहि अति सकुचे रघुराऊ । मुनि पुलके लखि सीलु सुभाऊ ॥
तुम्ह बिनु राम सकल सुख साजा । नरक सरिस दुहु राज समाजा ॥
ऐसा कहकर श्रीरघुनाथजी अत्यन्त ही सकुचा गये । उनका शील- स्वभाव देखकर [प्रेम और आनन्दसे ] मुनि वसिष्ठजी पुलकित हो गये । [ उन्होंने खुलकर कहा- ] हे राम! तुम्हारे बिना [घर- बार आदि] सम्पूर्ण सुखोंके साज दोनों राजसमाजोंको नरकके समान हैं ॥४ ॥
दो० –- प्रान प्रान के जीव के जिव सुख के सुख राम ।
तुम्ह तजि तात सोहात गृह जिन्हहि तिन्हहि बिधि बाम ॥ २ ९० ॥
हे राम! तुम प्राणोंके भी प्राण, आत्माके भी आत्मा और सुखके भी सुख हो । हे तात! तुम्हें छोड़कर जिन्हें घर सुहाता है, उन्हें विधाता विपरीत है ॥२ ९ ० ॥
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* ** अयोध्याकाण्ड ५८७
सो सुखु करमु धरमु जरि जाऊ । जहँ न राम पद पंकज भाऊ ॥
जोगु कुजोगु ग्यानु अग्यानू । जहँ नहिं राम पेम परधानू॥
जहाँ श्रीरामके चरणकमलोंमें प्रेम नहीं है, वह सुख, कर्म और धर्म जल जाय । जिसमें श्रीरामप्रेमकी प्रधानता नहीं है, वह योग कुयोग है और वह ज्ञान अज्ञान है ॥ १ ॥
तुम्ह बिनु दुखी सुखी तुम्ह तेहीं । तुम्ह जानहु जिय जो जेहि केहीं ॥
राउर आयसु सिर सबही कें । बिदित कृपालहि गति सब नीकें ॥
तुम्हारे बिना ही सब दुखी हैं और जो सुखी हैं वे तुम्हींसे सुखी हैं । जिस किसीके जीमें जो कुछ है तुम सब जानते हो । आपकी आज्ञा सभीके सिरपर है । कृपालु ( आप ) को सभीकी स्थिति अच्छी तरह मालूम है ॥२ ॥
आपु आश्रमहि धारिअ पाऊ । भयउ सनेह सिथिल मुनिराऊ ॥
करि प्रनामु तब रामु सिधाए । रिषि धरि धीर जनक पहिं आए ॥
अतः आप आश्रमको पधारिये । इतना कह मुनिराज स्नेहसे शिथिल हो गये । तब श्रीरामजी प्रणाम करके चले गये और ऋषि वसिष्ठजी धीरज धरकर जनकजीके पास आये ॥ ३ ॥
राम बचन गुरु नृपहि सुनाए ॥ सील सनेह सुभायँ सुहाए ॥ महाराज अब कीजिअ सोई ॥ सब कर धरम सहित हित होई ॥ गुरुजीने श्रीरामचन्द्रजीके शील और स्नेहसे युक्त स्वभावसे ही सुन्दर वचन राजा जनकजीको सुनाये [ और कहा— ] हे महाराज! अब वही कीजिये जिसमें सबका धर्मसहित हित हो ॥४ ॥
दो० – ग्यान निधान सुजान सुचि धरम धीर नरपाल ।
तुम्ह बिनु असमंजस समन को समरथ एहि काल ॥ २ ९ १ ॥
हे राजन्! तुम ज्ञानके भण्डार, सुजान, पवित्र और धर्ममें धीर हो । इस समय तुम्हारे बिना इस दुविधाको दूर करनेमें और कौन समर्थ है? ॥ २ ९ १ ॥
सुनि मुनि बचन जनक अनुरागे । लखि गति ग्यानु बिरागु बिरागे ॥
सिथिल सनेहँ गुनत मन माहीं । आए इहाँ कीन्ह भल नाहीं ॥
मुनि वसिष्ठजीके वचन सुनकर जनकजी प्रेममें मग्न हो गये । उनकी दशा देखकर ज्ञान और वैराग्यको भी वैराग्य हो गया ( अर्थात् उनके ज्ञान-वैराग्य छूट- से गये ) । वे प्रेमसे शिथिल हो गये और मनमें विचार करने लगे कि हम यहाँ आये, यह अच्छा नहीं किया ॥ १ ॥
रामहि रायँ कहेउ बन जाना । कीन्ह आपु प्रिय प्रेम प्रवाना ॥
हम अब बन तें बनहि पठाई । प्रमुदित फिरब बिबेक बड़ाई ॥
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* *५८८ रामचरितमानस राजा दशरथजीने श्रीरामजीको वन जानेके लिये कहा और स्वयं अपने प्रियके प्रेमको प्रमाणित ( सच्चा ) कर दिया ( प्रियवियोगमें प्राण त्याग दिये ) । परन्तु हम अब इन्हें वनसे [और गहन ] वनको भेजकर अपने विवेककी बड़ाईमें आनन्दित होते हुए लौटेंगे [कि हमें जरा भी मोह नहीं है; हम श्रीरामजीको वनमें छोड़कर चले आये, दशरथजीकी तरह मरे नहीं! ] ॥ २ ॥
तापस मुनि महिसुर सुनि देखी । भए प्रेम बस बिकल बिसेषी ॥
समउ समुझि धरि धीरजु राजा । चले भरत पहिं सहित समाजा ॥
तपस्वी, मुनि और ब्राह्मण यह सब सुन और देखकर प्रेमवश बहुत ही व्याकुल हो गये ।
समयका विचार करके राजा जनकजी धीरज धरकर समाजसहित भरतजीके पास चले ॥३ ॥
भरत आइ आगे भइ लीन्हे । अवसर सरिस सुआसन दीन्हे ॥
तात भरत कह तेरहुति राऊ । तुम्हहि बिदित रघुबीर सुभाऊ ॥
भरतजीने आकर उन्हें आगे होकर लिया ( सामने आकर उनका स्वागत किया ) और समयानुकूल अच्छे आसन दिये । तिरहुतराज जनकजी कहने लगे-हे तात भरत! तुमको श्रीरामजीका स्वभाव मालूम ही है ॥४ ॥
दो० – राम सत्यब्रत धरम रत सब कर सीलु सनेहु ।
संकट सहत सकोच बस कहिअ जो आयसु देहु ॥ २ ९ २ ॥
श्रीरामचन्द्रजी सत्यव्रती और धर्मपरायण हैं, सबका शील और स्नेह रखनेवाले हैं । इसीलिये वे संकोचवश संकट सह रहे हैं; अब तुम जो आज्ञा दो, वह उनसे कही जाय ॥२ ९ २ ॥
सुनि तन पुलकि नयन भरि बारी । बोले भरतु धीर धरि भारी ॥
प्रभु प्रिय पूज्य पिता सम आपू । कुलगुरु सम हित माय न बापू॥
भरतजी यह सुनकर पुलकितशरीर हो नेत्रोंमें जल भरकर बड़ा भारी धीरज धरकर बोले— हे प्रभो! आप हमारे पिताके समान प्रिय और पूज्य हैं । और कुलगुरु श्रीवसिष्ठजीके समान हितैषी तो माता-पिता भी नहीं हैं ॥ १ ॥
कौसिकादि मुनि सचिव समाजू । ग्यान अंबुनिधि आपुनु आजू॥
सिसु सेवकु आयसु अनुगामी । जानि मोहि सिख देइअ स्वामी ॥
विश्वामित्रजी आदि मुनियों और मन्त्रियोंका समाज है । और आजके दिन ज्ञानके समुद्र आप भी उपस्थित हैं । हे स्वामी! मुझे अपना बच्चा, सेवक और आज्ञानुसार चलनेवाला समझकर शिक्षा दीजिये ॥ २ ॥
एहिं समाज थल बूझब राउर । मौन मलिन मैं बोलब बाउर ॥
छोटे बदन कहउँ बड़ि बाता । छमब तात लखि बाम बिधाता ॥