श्रीरामचरितमानस — पृष्ठ 591–600
श्रीरामचरितमानस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 591–600
पृष्ठ 591
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
* ** अयोध्याकाण्ड ५८ ९ इस समाज और [ पुण्य] स्थलमें आप [जैसे ज्ञानी और पूज्य] का पूछना! इसपर यदि मैं मौन रहता हूँ तो मलिन समझा जाऊँगा; और बोलना पागलपन होगा तथापि मैं छोटे मुँह बड़ी बात कहता हूँ । हे तात! विधाताको प्रतिकूल जानकर क्षमा कीजियेगा ॥ ३ ॥
आगम निगम प्रसिद्ध पुराना । सेवाधरमु कठिन जगु जाना ॥
स्वामि धरम स्वारथहि बिरोधू । बैरु अंध प्रेमहि न प्रबोधू॥
वेद, शास्त्र और पुराणोंमें प्रसिद्ध है और जगत् जानता है कि सेवाधर्म बड़ा कठिन है । स्वामिधर्ममें ( स्वामीके प्रति कर्तव्यपालनमें ) और स्वार्थमें विरोध है ( दोनों एक साथ नहीं निभ सकते ) । वैर अंधा होता है और प्रेमको ज्ञान नहीं रहता [ मैं स्वार्थवश कहूँगा या प्रेमवश, दोनोंमें ही भूल होनेका भय है ] ॥४ ॥
दो० – राखि राम रुख धरमु ब्रतु पराधीन मोहि जानि ।
सब कें संमत सर्ब हित करिअ पेमु पहिचानि ॥ २ ९ ३ ॥
अतएव मुझे पराधीन जानकर ( मुझसे न पूछकर ) श्रीरामचन्द्रजीके रुख ( रुचि ), धर्म और [ सत्यके ] व्रतको रखते हुए, जो सबके सम्मत और सबके लिये हितकारी हो आप सबका प्रेम पहचानकर वही कीजिये ॥ २ ९ ३ ॥
भरत बचन सुनि देखि सुभाऊ । सहित समाज सराहत राऊ ॥
सुगम अगम मृदु मंजु कठोरे । अरथु अमित अति आखर थोरे ॥
भरतजीके वचन सुनकर और उनका स्वभाव देखकर समाजसहित राजा जनक उनकी सराहना करने लगे । भरतजीके वचन सुगम और अगम, सुन्दर, कोमल और कठोर हैं । उनमें अक्षर थोड़े हैं, परन्तु अर्थ अत्यन्त अपार भरा हुआ है ॥ १ ॥
ज्यों मुखु मुकुर मुकुरु निज पानी । गहि न जाइ अस अदभुत बानी ॥
भूप भरतु मुनि सहित समाजू । गे जहँ बिबुध कुमुद द्विजराजू ॥
जैसे मुख [का प्रतिबिम्ब ] दर्पणमें दीखता है और दर्पण अपने हाथमें है, फिर भी वह ( मुखका प्रतिबिम्ब ) पकड़ा नहीं जाता, इसी प्रकार भरतजीकी यह अद्भुत वाणी भी पकड़में नहीं आती ( शब्दोंसे उसका आशय समझमें नहीं आता ) । [किसीसे कुछ उत्तर देते नहीं बना ] तब राजा जनकजी, भरतजी तथा मुनि वसिष्ठजी समाजके साथ वहाँ गये जहाँ देवतारूपी कुमुदोंके खिलानेवाले ( सुख देनेवाले ) चन्द्रमा श्रीरामचन्द्रजी थे ॥२ ॥
सुनि सुधि सोच बिकल सब लोगा । मनहुँ मीनगन नव जल जोगा ॥
देवँ प्रथम कुलगुर गति देखी । निरखि बिदेह सनेह बिसेषी ॥
पृष्ठ 592
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
* *५९ ० रामचरितमानस यह समाचार सुनकर सब लोग सोचसे व्याकुल हो गये; जैसे नये ( पहली वर्षाके ) जलके संयोगसे मछलियाँ व्याकुल होती हैं । देवताओंने पहले कुलगुरु वसिष्ठजीकी [ प्रेमविह्वल ] दशा देखी, फिर विदेहजीके विशेष स्नेहको देखा; ॥ ३ ॥
राम भगतिमय भरतु निहारे । सुर स्वारथी हहरि हियँ हारे ॥
सब कोउ राम पेममय पेखा । भए अलेख सोच बस लेखा ॥
और तब श्रीरामभक्तिसे ओतप्रोत भरतजीको देखा । इन सबको देखकर स्वार्थी देवता घबड़ाकर हृदयमें हार मान गये ( निराश हो गये ) । उन्होंने सब किसीको श्रीरामप्रेममें सराबोर देखा । इससे देवता इतने सोचके वश हो गये कि जिसका कोई हिसाब नहीं ॥ ४ ॥
दो० – रामु सनेह सकोच बस कह ससोच सुरराजु ।
रचहु प्रपंचहि पंच मिलि नाहिं त भयउ अकाजु ॥ २ ९ ४ ॥
देवराज इन्द्र सोचमें भरकर कहने लगे कि श्रीरामचन्द्रजी तो स्नेह और संकोचके वशमें हैं । इसलिये सब लोग मिलकर कुछ प्रपञ्च ( माया ) रचो; नहीं तो काम बिगड़ा [ ही समझो ] ॥ २ ९ ४ ॥
सुरन्ह सुमिरि सारदा सराही । देबि देव सरनागत पाही ॥
फेरि भरत मति करि निज माया । पालु बिबुध कुल करि छल छाया ॥
देवताओंने सरस्वतीका स्मरण कर उनकी सराहना ( स्तुति ) की और कहा- हे देवि! देवता आपके शरणागत हैं, उनकी रक्षा कीजिये । अपनी माया रचकर भरतजीकी बुद्धिको फेर दीजिये । और छलकी छाया कर देवताओंके कुलका पालन ( रक्षा ) कीजिये ॥ १ ॥
बिबुध बिनय सुनि देबि सयानी । बोली सुर स्वारथ जड़ जानी ॥
मोसन कहहु भरत मति फेरू । लोचन सहस न सूझ सुमेरू ॥
देवताओंकी विनती सुनकर और देवताओंको स्वार्थके वश होनेसे मूर्ख जानकर बुद्धिमती सरस्वतीजी बोलीं - मुझसे कह रहे हो कि भरतजीकी मति पलट दो! हजार नेत्रोंसे भी तुमको सुमेरु नहीं सूझ पड़ता! ॥ २ ॥
बिधि हरि हर माया बड़ि भारी । सोउ न भरत मति सकइ निहारी ॥
सो मति मोहि कहत करु भोरी । चंदिनि कर कि चंडकर चोरी ॥
ब्रह्मा, विष्णु और महेशकी माया बड़ी प्रबल है! किन्तु वह भी भरतजीकी बुद्धिकी ओर ताक नहीं सकती । उस बुद्धिको, तुम मुझसे कह रहे हो कि भोली कर दो ( भुलावेमें डाल दो)! अरे! चाँदनी कहीं प्रचण्ड किरणवाले सूर्यको चुरा सकती है? ॥ ३ ॥
भरत हृदयँ सिय राम निवासू । तहँ कि तिमिर जहँ तरनि प्रकासू ॥
अस कहि सारद गइ बिधि लोका । बिबुध बिकल निसि मानहुँ कोका ॥
पृष्ठ 593
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
* ** अयोध्याकाण्ड ५ ९ १ भरतजीके हृदयमें श्रीसीतारामजीका निवास है । जहाँ सूर्यका प्रकाश है, वहाँ कहीं अँधेरा रह सकता है? ऐसा कहकर सरस्वतीजी ब्रह्मलोकको चली गयीं । देवता ऐसे व्याकुल हुए जैसे रात्रिमें चकवा व्याकुल होता है ॥४ ॥
दो० - सुर स्वारथी मलीन मन कीन्ह कुमंत्र कुठाटु ।
रचि प्रपंच माया प्रबल भय भ्रम अरति उचाटु ॥ २ ९५ ॥
मलिन मनवाले स्वार्थी देवताओंने बुरी सलाह करके बुरा ठाट ( षड्यन्त्र) रचा । प्रबल मायाजाल रचकर भय, भ्रम, अप्रीति और उच्चाटन फैला दिया ॥ २ ९ ५ ॥
करि कुचालि सोचत सुरराजू । भरत हाथ सबु काजु अकाजू॥
गए जनकु रघुनाथ समीपा । सनमाने सब रबिकुल दीपा ॥
कुचाल करके देवराज इन्द्र सोचने लगे कि कामका बनना-बिगड़ना सब भरतजीके हाथ है । इधर राजा जनकजी [ मुनि वसिष्ठ आदिके साथ ] श्रीरघुनाथजीके पास गये । सूर्यकुलके दीपक श्रीरामचन्द्रजीने सबका सम्मान किया, ॥ १ ॥
समय समाज धरम अबिरोधा । बोले तब रघुबंस पुरोधा ॥
जनक भरत संबादु सुनाई । भरत कहाउति कही सुहाई ॥
तब रघुकुलके पुरोहित वसिष्ठजी समय, समाज और धर्मके अविरोधी ( अर्थात् अनुकूल ) वचन बोले । उन्होंने पहले जनकजी और भरतजीका संवाद सुनाया । फिर भरतजीकी कही हुई सुन्दर बातें कह सुनायीं ॥ २ ॥
तात राम जस आयसु देहू । सो सबु करै मोर मत एहू ॥
सुनि रघुनाथ जोरि जुग पानी । बोले सत्य सरल मृदु बानी ॥
[ फिर बोले— ] हे तात राम! मेरा मत तो यह है कि तुम जैसी आज्ञा दो, वैसी ही सब करें! यह सुनकर दोनों हाथ जोड़कर श्रीरघुनाथजी सत्य, सरल और कोमल वाणी बोले- ॥३ ॥
। मोर कहब सब भाँति भदेसू॥बिद्यमान आपुनि मिथिलेसू । राउरि सपथ सही सिर सोई ॥राउर राय रजायसु होई आपके और मिथिलेश्वर जनकजीके विद्यमान रहते मेरा कुछ कहना सब प्रकारसे भद्दा ( अनुचित ) है । आपकी और महाराजकी जो आज्ञा होगी, मैं आपकी शपथ करके कहता हूँ वह सत्य ही सबको शिरोधार्य होगी ॥४ ॥
दो० - राम सपथ सुनि मुनि जनकु सकुचे सभा समेत ।
सकल बिलोकत भरत मुखु बनइ न ऊतरु देत ॥ २ ९ ६ ॥
पृष्ठ 594
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
* *५ ९ २ रामचरितमानस श्रीरामचन्द्रजीकी शपथ सुनकर सभासमेत मुनि और जनकजी सकुचा गये ( स्तम्भित रह गये ) । किसीसे उत्तर देते नहीं बनता, सब लोग भरतजीका मुँह ताक रहे हैं ॥ २ ९ ६ ॥
सभा सकुच बस भरत निहारी । रामबंधु धरि धीरजु भारी ॥
कुसमउ देखि सनेहु सँभारा । बढ़त बिंधि जिमि घटज निवारा ॥
भरतजीने सभाको संकोचके वश देखा । रामबन्धु ( भरतजी ) ने बड़ा भारी धीरज धरकर और कुसमय देखकर अपने [उमड़ते हुए ] प्रेमको सँभाला, जैसे बढ़ते हुए विन्ध्याचलको अगस्त्यजीने रोका था ॥१ ॥
सोक कनकलोचन मति छोनी । हरी बिमल गुन गन जगजोनी ॥
भरत बिबेक बराहँ बिसाला । अनायास उधरी तेहि काला ॥
शोकरूपी हिरण्याक्षने [ सारी सभाकी ] बुद्धिरूपी पृथ्वीको हर लिया जो विमल गुणसमूहरूपी जगत्की योनि ( उत्पन्न करनेवाली ) थी । भरतजीके विवेकरूपी विशाल वराह ( वराहरूपधारी भगवान्) ने [ शोकरूपी हिरण्याक्षको नष्ट कर ] बिना ही परिश्रम उसका उद्धार कर दिया! ॥२ ॥
करि प्रनामु सब कहँ कर जोरे । रामु राउ गुर साधु निहोरे ॥
छमब आजु अति अनुचित मोरा । कहउँ बदन मृदु बचन कठोरा ॥
भरतजीने प्रणाम करके सबके प्रति हाथ जोड़े तथा श्रीरामचन्द्रजी, राजा जनकजी, गुरु वसिष्ठजी और साधु - संत सबसे विनती की और कहा-आज मेरे इस अत्यन्त अनुचित बर्तावको क्षमा कीजियेगा । मैं कोमल (छोटे ) मुखसे कठोर ( धृष्टतापूर्ण) वचन कह रहा हूँ॥ ३ ॥
हियँ सुमिरी सारदा सुहाई । मानस तें मुख पंकज आई ॥
बिमल बिबेक धरम नय साली । भरत भारती मंजु मराली ॥
फिर उन्होंने हृदयमें सुहावनी सरस्वतीजीका स्मरण किया । वे मानससे ( उनके मनरूपी मानसरोवरसे ) उनके मुखारविन्दपर आ विराजीं । निर्मल विवेक, धर्म और नीतिसे युक्त भरतजीकी वाणी सुन्दर हंसिनी [ के समान गुण-दोषका विवेचन करनेवाली ] है ॥४ ॥
दो० – निरखि बिबेक बिलोचनन्हि सिथिल सनेहँ समाजु ।
करि प्रनामु बोले भरतु सुमिरि सीय रघुराजु ॥ २ ९ ७ ॥
विवेकके नेत्रोंसे सारे समाजको प्रेमसे शिथिल देख, सबको प्रणामकर, श्रीसीताजी और श्रीरघुनाथजीका स्मरण करके भरतजी बोले- ॥ २ ९७ ॥
प्रभु पितु मातु सुहृद गुर स्वामी । पूज्य परम हित अंतरजामी ॥
सरल सुसाहिबु सील निधानू । प्रनतपाल सर्बग्य सुजानू ॥
पृष्ठ 595
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
* ** अयोध्याकाण्ड ५ ९ ३ हे प्रभु! आप पिता, माता, सुहृद् ( मित्र ), गुरु, स्वामी, पूज्य, परम हितैषी और अन्तर्यामी हैं । सरलहृदय, श्रेष्ठ मालिक, शीलके भण्डार, शरणागतकी रक्षा करनेवाले, सर्वज्ञ, सुजान ॥ १ ॥
समरथ सरनागत हितकारी । गुनगाहकु अवगुन अघ हारी ॥
स्वामि गोसाँइहि सरिस गोसाईं । मोहि समान मैं साइँ दोहाई ॥
समर्थ, शरणागतका हित करनेवाले, गुणोंका आदर करनेवाले और अवगुणों तथा पापोंको हरनेवाले हैं । हे गोसाईं! आप - सरीखे स्वामी आप ही हैं और स्वामीके साथ द्रोह करनेमें मेरे समान मैं ही हूँ॥२ ॥
प्रभु पितु बचन मोह बस पेली । आयउँ इहाँ समाजु सकेली ॥
जग भल पोच ऊँच अरु नीचू । अमिअ अमरपद माहुरु मीचू॥
मैं मोहवश प्रभु ( आप) के और पिताजीके वचनोंका उल्लङ्घनकर और समाज बटोरकर यहाँ आया हूँ । जगत्में भले - बुरे, ऊँचे और नीचे, अमृत और अमरपद ( देवताओंका पद ), विष और मृत्यु आदि–॥३ ॥
राम रजाइ मेट मन माहीं । देखा सुना कतहुँ कोउ नाहीं ॥
सो मैं सब बिधि कीन्हि ढिठाई । प्रभु मानी सनेह सेवकाई ॥
किसीको भी कहीं ऐसा नहीं देखा-सुना जो मनमें भी श्रीरामचन्द्रजी ( आप ) की आज्ञाको मेट दे । मैंने सब प्रकारसे वही ढिठाई की, परन्तु प्रभुने उस ढिठाईको स्नेह और सेवा मान लिया! ॥४ ॥
दो० – कृपाँ भलाईं आपनी नाथ कीन्ह भल मोर ।
दूषन भे भूषन सरिस सुजसु चारु चहु ओर ॥ २ ९८ ॥
हे नाथ! आपने अपनी कृपा और भलाईसे मेरा भला किया, जिससे मेरा दूषण ( दोष ) भी भूषण ( गुण ) के समान हो गये और चारों ओर मेरा सुन्दर यश छा गया ॥२९ ८ ॥
राउरि रीति सुबानि बड़ाई । जगत बिदित निगमागम गाई ॥
कूर कुटिल खल कुमति कलंकी । नीच निसील निरीस निसंकी ॥
हे नाथ! आपकी रीति और सुन्दर स्वभावकी बड़ाई जगत् में प्रसिद्ध है, और वेद - शास्त्रोंने गायी है । जो क्रूर, कुटिल, दुष्ट, कुबुद्धि, कलंकी, नीच, शीलरहित, निरीश्वरवादी (नास्तिक ) और नि: शंक ( निडर ) हैं ॥१ ॥
तेउ सुनि सरन सामुहें आए । सकृत प्रनामु किहें अपनाए ॥
देखि दोष कबहुँ न उर आने । सुनि गुन साधु समाज बखाने ॥
पृष्ठ 596
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
* *५ ९४ रामचरितमानस उन्हें भी आपने शरणमें सम्मुख आया सुनकर एक बार प्रणाम करनेपर ही अपना लिया । उन ( शरणागतों ) के दोषोंको देखकर भी आप कभी हृदयमें नहीं लाये और उनके गुणोंको सुनकर साधुओंके समाजमें उनका बखान किया ॥ २ ॥
को साहिब सेवकहि नेवाजी । आपु समाज साज सब साजी ॥
निज करतूति न समुझिअ सपनें । सेवक सकुच सोचु उर अपनें ॥
ऐसा सेवकपर कृपा करनेवाला स्वामी कौन है जो आप ही सेवकका सारा साज-सामान सज दे ( उसकी सारी आवश्यकताओंको पूर्ण कर दे) और स्वप्नमें भी अपनी कोई करनी न समझकर ( अर्थात् मैंने सेवकके लिये कुछ किया है ऐसा न जानकर ) उलटा सेवकको संकोच होगा, इसका सोच अपने हृदयमें रखे! ॥३ ॥
सो गोसाइँ नहिं दूसर कोपी । भुजा उठाइ कहउँ पन रोपी ॥
पसु नाचत सुक पाठ प्रबीना । गुन गति नट पाठक आधीना ॥
मैं भुजा उठाकर और प्रण रोपकर ( बड़े जोरके साथ ) कहता हूँ, ऐसा स्वामी आपके सिवा दूसरा कोई नहीं है । [ बंदर आदि ] पशु नाचते और तोते [ सीखे हुए ] पाठमें प्रवीण हो जाते हैं । परन्तु तोतेका [ पाठप्रवीणतारूप ] गुण और पशुके नाचनेकी गति [ क्रमश: ] पढ़ानेवाले और नचानेवालेके अधीन है ॥४ ॥
दो० - यों सुधारि सनमानि जन किए साधु सिरमोर ।
को कृपाल बिनु पालिहै बिरिदावलि बरजोर ॥ २ ९९ ॥
इस प्रकार अपने सेवकोंकी ( बिगड़ी ) बात सुधारकर और सम्मान देकर आपने उन्हें साधुओंका शिरोमणि बना दिया । कृपालु ( आप ) के सिवा अपनी विरदावलीका और कौन जबर्दस्ती ( हठपूर्वक ) पालन करेगा? ॥ २ ९९ ॥
सोक सनेहँ कि बाल सुभाएँ । आयउँ लाइ रजायसु बाएँ ॥
तबहुँ कृपाल हेरि निज ओरा । सबहि भाँति भल मानेउ मोरा ॥
मैं शोक या स्नेहसे या बालकस्वभावसे आज्ञाको बायें लाकर ( न मानकर ) चला आया, तो भी कृपालु स्वामी ( आप) ने अपनी ओर देखकर सभी प्रकारसे मेरा भला ही माना ( मेरे इस अनुचित कार्यको अच्छा ही समझा) ॥ १ ॥
देखेउँ पाय सुमंगल मूला । जानेउँ स्वामि सहज अनुकूला ॥
बड़ें समाज बिलोकेउँ भागू । बड़ीं चूक साहिब अनुरागू ॥
मैंने सुन्दर मङ्गलोंके मूल आपके चरणोंका दर्शन किया, और यह जान लिया कि स्वामी मुझपर स्वभावसे ही अनुकूल हैं । इस बड़े समाजमें अपने भाग्यको देखा कि इतनी बड़ी चूक होनेपर भी स्वामीका मुझपर कितना अनुराग है! ॥ २ ॥
पृष्ठ 597
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
* ** अयोध्याकाण्ड ५ ९५
कृपा अनुग्रहु अंगु अघाई । कीन्हि कृपानिधि सब अधिकाई ॥
राखा मोर दुलार गोसाईं । अपनें सील सुभायँ भलाईं ॥
कृपानिधानने मुझपर साङ्गोपाङ्ग भरपेट कृपा और अनुग्रह, सब अधिक ही किये हैं ( अर्थात् मैं जिसके जरा भी लायक नहीं था उतनी अधिक सर्वाङ्गपूर्ण कृपा आपने मुझपर की है ) । हे गोसाईं! आपने अपने शील, स्वभाव और भलाईसे मेरा दुलार रखा ॥३ ॥
नाथ निपट मैं कीन्हि ढिठाई । स्वामि समाज सकोच बिहाई ॥
अबिनय बिनय जथारुचि बानी । छमिहि देउ अति आरति जानी ॥
हे नाथ! मैंने स्वामी और समाजके संकोचको छोड़कर अविनय या विनयभरी जैसी रुचि हुई वैसी ही वाणी कहकर सर्वथा ढिठाई की है । हे देव! मेरे आर्तभाव ( आतुरता ) को जानकर आप क्षमा करेंगे ॥४ ॥
दो० - सुहृद सुजान सुसाहिबहि बहुत कहब बाड़ खोरि ।
आयसु देइअ देव अब सबइ सुधारी मोरि॥ ३०० ॥
सुहृद् ( बिना ही हेतुके हित करनेवाले ), बुद्धिमान् और श्रेष्ठ मालिकसे बहुत कहना बड़ा अपराध है । इसलिये हे देव! अब मुझे आज्ञा दीजिये, आपने मेरी सभी बात सुधार दी ॥ ३०० ॥
प्रभु पद पदुम पराग दोहाई । सत्य सुकृत सुख सीवँ सुहाई ॥
सो करि कहउँ हिए अपने की । रुचि जागत सोवत सपने की ॥
प्रभु ( आप ) के चरणकमलोंकी रज, जो सत्य, सुकृत ( पुण्य ) और सुखकी सुहावनी सीमा ( अवधि ) है, उसकी दुहाई करके मैं अपने हृदयकी जागते, सोते और स्वप्नमें भी बनी रहनेवाली रुचि ( इच्छा ) कहता हूँ॥१ ॥
सहज सनेहँ स्वामि सेवकाई । स्वारथ छल फल चारि बिहाई ॥
अग्या सम न सुसाहिब सेवा । सो प्रसादु जन पावै देवा ॥
वह रुचि है— कपट, स्वार्थ और [ अर्थ- धर्म -काम- मोक्षरूप ] चारों फलोंको छोड़कर स्वाभाविक प्रेमसे स्वामीकी सेवा करना । और आज्ञापालनके समान श्रेष्ठ स्वामीकी और कोई सेवा नहीं है । हे देव! अब वही आज्ञारूप प्रसाद सेवकको मिल जाय ॥२ ॥
अस कहि प्रेम बिबस भए भारी । पुलक सरीर बिलोचन बारी ॥
प्रभु पद कमल गहे अकुलाई । समउ सनेहु न सो कहि जाई ॥
पृष्ठ 598
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
* *५ ९ ६ रामचरितमानस भरतजी ऐसा कहकर प्रेमके बहुत ही विवश हो गये । शरीर पुलकित हो उठा, नेत्रोंमें [प्रेमाश्रुओंका ] जल भर आया । अकुलाकर ( व्याकुल होकर ) उन्होंने प्रभु श्रीरामचन्द्रजी चरणकमल पकड़ लिये । उस समयको और स्नेहको कहा नहीं जा सकता ॥३ ॥
कृपासिंधु सनमानि सुबानी । बैठाए समीप गहि पानी ॥
भरत बिनय सुनि देखि सुभाऊ । सिथिल सनेहँ सभा रघुराऊ ॥
कृपासिन्धु श्रीरामचन्द्रजीने सुन्दर वाणीसे भरतजीका सम्मान करके हाथ पकड़कर उनको अपने पास बिठा लिया । भरतजीकी विनती सुनकर और उनका स्वभाव देखकर सारी सभा और श्रीरघुनाथजी स्नेहसे शिथिल हो गये ॥४ ॥
छं० – रघुराउ सिथिल सनेहँ साधु समाज मुनि मिथिला धनी ।
मन महुँ सराहत भरत भायप भगति की महिमा घनी ॥
भरतहि प्रसंसत बिबुध बरषत सुमन मानस मलिन से ।
तुलसी बिकल सब लोग सुनि सकुचे निसागम नलिन से ॥
श्रीरघुनाथजी, साधुओंका समाज, मुनि वसिष्ठजी और मिथिलापति जनकजी स्नेहसे शिथिल हो गये । सब मन -ही - मन भरतजीके भाईपन और उनकी भक्तिकी अतिशय महिमाको सराहने लगे । देवता मलिन मनसे भरतजीकी प्रशंसा करते हुए उनपर फूल बरसाने लगे । तुलसीदासजी कहते हैं-- सब लोग भरतजीका भाषण सुनकर व्याकुल हो गये और ऐसे सकुचा गये जैसे रात्रिके आगमनसे कमल
सो०- देखि दुखारी दीन दुहु समाज नर नारि सब ।
मघवा महा मलीन मुए मारि मंगल चहत ॥३०१ ॥
दोनों समाजोंके सभी नर- नारियोंको दीन और दुखी देखकर महामलिन- मन इन्द्र मरे हुओंको मारकर अपना मङ्गल चाहता है ॥ ३०१ ॥
कपट कुचालि सीवँ सुरराजू । पर अकाज प्रिय आपन काजू॥
काक समान पाकरिपु रीती । छली मलीन कतहुँ न प्रतीती ॥
देवराज इन्द्र कपट और कुचालकी सीमा है । उसे परायी हानि और अपना लाभ ही प्रिय है । इन्द्रकी रीति कौएके समान है । वह छली और मलिन-मन है, उसका कहीं किसीपर विश्वास नहीं है ॥१ ॥
प्रथम कुमत कपटु सँकेला । सो उचाटु सब के सिर मेला ॥
सुरमायाँ सब लोग बिमोहे । राम प्रेम अतिसय न बिछोहे ॥
पृष्ठ 599
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
* अयोध्याकाण्ड ** ५ ९७ पहले तो कुमत ( बुरा विचार) करके कपटको बटोरा ( अनेक प्रकारके कपटका साज सजा ) । फिर वह ( कपटजनित) उचाट सबके सिरपर डाल दिया । फिर देवमायासे सब लोगोंको विशेषरूपसे मोहित कर दिया । किन्तु श्रीरामचन्द्रजीके प्रेमसे उनका अत्यन्त बिछोह नहीं हुआ ( अर्थात् उनका श्रीरामजीके प्रति प्रेम कुछ तो बना ही रहा) ॥ २ ॥
भय उचाट बस मन थिर नाहीं । छन बन रुचि छन सदन सोहाहीं ॥
दुबिध मनोगति प्रजा दुखारी । सरित सिंधु संगम जनु बारी ॥
भय और उचाटके वश किसीका मन स्थिर नहीं है । क्षणमें उनकी वनमें रहनेकी इच्छा होती है और क्षणमें उन्हें घर अच्छे लगने लगते हैं । मनकी इस प्रकारकी दुविधामयी स्थितिसे प्रजा दुखी हो रही है । मानो नदी और समुद्रके सङ्गमका जल क्षुब्ध हो रहा हो । ( जैसे नदी और समुद्रके सङ्गमका जल स्थिर नहीं रहता, कभी इधर आता और कभी उधर जाता है, उसी प्रकारकी दशा प्रजाके मनकी हो गयी ) ॥ ३ ॥
दुचित कतहुँ परितोषु न लहहीं । एक एक सन मरमु न कहहीं ॥
लखि हियँ हँसि कह कृपानिधानू । सरिस स्वान मघवान जुबानू ॥
चित्त दोतरफा हो जानेसे वे कहीं सन्तोष नहीं पाते और एक-दूसरेसे अपना मर्म भी नहीं कहते । कृपानिधान श्रीरामचन्द्रजी यह दशा देखकर हृदयमें हँसकर कहने लगे- कुत्ता, इन्द्र और नवयुवक ( कामी पुरुष ) एक- सरीखे ( एक ही स्वभावके ) हैं । [ पाणिनीय व्याकरणके अनुसार श्वन्, युवन् और मघवन् शब्दोंके रूप भी एक- सरीखे होते हैं ] ॥४ ॥
दो० -– भरतु जनकु मुनिजन सचिव साधु सचेत बिहाइ ।
लागि देवमाया सबहि जथाजोगु जनु पाइ ॥ ३०२ ॥
भरतजी, जनकजी, मुनिजन, मन्त्री और ज्ञानी साधु- संतोंको छोड़कर अन्य सभीपर जिस मनुष्यको जिस योग्य ( जिस प्रकृति और जिस स्थितिका ) पाया, उसपर वैसे ही देवमाया लग गयी ॥३०२ ॥
कृपासिंधु लखि लोग दुखारे । निज सनेहँ सुरपति छल भारे ॥
सभा राउ गुर महिसुर मंत्री । भरत भगति सब कै मति जंत्री ॥
कृपासिन्धु श्रीरामचन्द्रजीने लोगोंको अपने स्नेह और देवराज इन्द्रके भारी छलसे दुखी देखा । सभा, राजा जनक, गुरु, ब्राह्मण और मन्त्री आदि सभीकी बुद्धिको भरतजीकी भक्तिने कील दिया ॥१ ॥
रामहि चितवत चित्र लिखे से । सकुचत बोलत बचन सिखे से ॥
भरत प्रीति नति बिनय बड़ाई । सुनत सुखद बरनत कठिनाई ॥
सब लोग चित्रलिखे - से श्रीरामचन्द्रजीकी ओर देख रहे हैं । सकुचाते हुए सिखाये हुए - से वचन बोलते हैं । भरतजीकी प्रीति, नम्रता, विनय और बड़ाई सुननेमें सुख देनेवाली है, पर उसके वर्णन करनेमें कठिनता है ॥२ ॥
पृष्ठ 600
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
५ ९८ * रामचरितमानस:*
जासु बिलोकि भगति लवलेसू । प्रेम मगन मुनिगन मिथिलेसू॥
महिमा तासु कहै किमि तुलसी । भगति सुभायँ सुमति हियँ हुलसी ॥
जिनकी भक्तिका लवलेश देखकर मुनिगण और मिथिलेश्वर जनकजी प्रेममें मग्न हो गये, उन भरतजीकी महिमा तुलसीदास कैसे कहे? उनकी भक्ति और सुन्दर भावसे [ कविके ] हृदयमें सुबुद्धि हुलस रही है ( विकसित हो रही है ) ॥ ३ ॥
आपु छोटि महिमा बड़ि जानी । कबिकुल कानि मानि सकुचानी ॥
कहि न सकति गुन रुचि अधिकाई । मति गति बाल बचन की नाई ॥
परन्तु वह बुद्धि अपनेको छोटी और भरतजीकी महिमाको बड़ी जानकर कविपरम्पराकी मर्यादाको मानकर सकुचा गयी ( उसका वर्णन करनेका साहस नहीं कर सकी) । उसकी गुणोंमें रुचि तो बहुत है; पर उन्हें कह नहीं सकती । बुद्धिकी गति बालकके वचनोंकी तरह हो गयी ( वह कुण्ठित हो गयी)! ॥४ ॥
दो० – भरत बिमल जसु बिमल बिधु सुमति चकोरकुमारि ।
उदित बिमल जन हृदय नभ एकटक रही निहारि ॥ ३०३ ॥
भरतजीका निर्मल यश निर्मल चन्द्रमा है और कविकी सुबुद्धि चकोरी है, जो भक्तोंके हृदयरूपी निर्मल आकाशमें उस चन्द्रमाको उदित देखकर उसकी ओर टकटकी लगाये देखती ही रह गयी है [ तब उसका वर्णन कौन करे? ] ॥ ३०३ ॥
भरत सुभाउ न सुगम निगमहूँ । लघु मति चापलता कबि छमहूँ ॥
कहत सुनत सति भाउ भरत को । सीय राम पद होइ न रत को ॥
भरतजीके स्वभावका वर्णन वेदोंके लिये भी सुगम नहीं है । [ अतः ] मेरी तुच्छ बुद्धिक चञ्चलताको कविलोग क्षमा करें! भरतजीके सद्भावको कहते- सुनते कौन मनुष्य श्रीसीतारामजी चरणोंमें अनुरक्त न हो जायगा ॥ १ ॥
सुमिरत भरतहि प्रेमु राम को । जेहि न सुलभु तेहि सरिस बाम को ॥
देखि दयाल दसा सबही की । राम सुजान जानि जन जी की ॥
भरतजीका स्मरण करनेसे जिसको श्रीरामजीका प्रेम सुलभ न हुआ, उसके समान वाम ( अभागा ) और कौन होगा? दयालु और सुजान श्रीरामजीने सभीकी दशा देखकर और भक्त ( भरतजी ) के हृदयकी स्थिति जानकर, ॥ २ ॥
धरम धुरीन धीर नय नागर । सत्य सनेह सील सुख सागर ॥
देसु कालु लखि समउ समाजू । नीति प्रीति पालक रघुराजू॥