श्रीरामचरितमानस — पृष्ठ 601–610
श्रीरामचरितमानस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 601–610
पृष्ठ 601
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
* ** अयोध्याकाण्ड ५ ९९ धर्मधुरन्धर, धीर, नीतिमें चतुर; सत्य, स्नेह, शील और सुखके समुद्र; नीति और प्रीतिके पालन करनेवाले श्रीरघुनाथजी देश, काल, अवसर और समाजको देखकर, ॥३ ॥
बोले बचन बानि सरबसु से । हित परिनाम सुनत ससि रसु से ॥
तात भरत तुम्ह धरम धुरीना । लोक बेद बिद प्रेम प्रबीना ॥
[तदनुसार ] ऐसे वचन बोले जो मानो वाणीके सर्वस्व ही थे, परिणाममें हितकारी थे और सुननेमें चन्द्रमाके रस ( अमृत ) - सरीखे थे । [ उन्होंने कहा- ] हे तात भरत! तुम धर्मकी धुरीको धारण करनेवाले हो, लोक और वेद दोनोंके जाननेवाले और प्रेममें प्रवीण हो ॥ ४ ॥
दो० – करम बचन मानस बिमल तुम्ह समान तुम्ह तात ।
गुर समाज लघु बंधु गुन कुसमयँ किमि कहि जात ॥ ३०४ ॥
हे तात! कर्मसे, वचनसे और मनसे निर्मल तुम्हारे समान तुम्हीं हो । गुरुजनोंके समाजमें और ऐसे कुसमयमें छोटे भाईके गुण किस तरह कहे जा सकते हैं? ॥ ३०४ ॥
जानहु तात तरनि कुल रीती । सत्यसंध पितु कीरति प्रीती ॥
समउ समाजु लाज गुरजन की । उदासीन हित अनहित मन की ॥
हे तात! तुम सूर्यकुलकी रीतिको, सत्यप्रतिज्ञ पिताजीकी कीर्ति और प्रीतिको, समय, समाज और गुरुजनोंकी लज्जा ( मर्यादा ) को तथा उदासीन, मित्र और शत्रु सबके मनकी बातको जानते हो ॥१ ॥
तुम्हहि बिदित सबही कर करमू । आपन मोर परम हित धरमू।
मोहि सब भाँति भरोस तुम्हारा । तदपि कहउँ अवसर अनुसारा ॥
तुमको सबके कर्मों ( कर्तव्यों ) का और अपने तथा मेरे परम हितकारी धर्मका पता है । यद्यपि मुझे तुम्हारा सब प्रकारसे भरोसा है, तथापि मैं समयके अनुसार कुछ कहता हूँ॥२ ॥
तात तात बिनु बात हमारी । केवल गुरकुल कृपाँ सँभारी ॥
नतरु प्रजा परिजन परिवारू । हमहि सहित सबु होत खुआरू ॥
हे तात! पिताजीके बिना ( उनकी अनुपस्थितिमें ) हमारी बात केवल गुरुवंशकी कृपाने ही सम्हाल रखी है; नहीं तो हमारे समेत प्रजा, कुटुम्ब, परिवार सभी बर्बाद हो जाते ॥ ३ ॥
जौं बिनु अवसर अथवँ दिनेसू । जग केहि कहहु न होइ कलेसू॥
तस उतपातु तात बिधि कीन्हा । मुनि मिथिलेस राखि सबु लीन्हा ॥
यदि बिना समयके ( संध्यासे पूर्व ही ) सूर्य अस्त हो जाय तो कहो जगत्में किसको क्लेश न होगा? हे तात! उसी प्रकारका उत्पात विधाताने यह (पिताकी असामयिक मृत्यु ) किया है । पर मुनि महाराजने तथा मिथिलेश्वरने सबको बचा लिया ॥४ ॥
पृष्ठ 602
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
* *६०० रामचरितमानस
दो० –- राज काज सब लाज पति धरम धरनि धन धाम ।
गुर प्रभाउ पालिहि सबहि भल होइहि परिनाम ॥ ३०५ ॥
राज्यका सब कार्य, लज्जा, प्रतिष्ठा, धर्म, पृथ्वी, धन, घर–इन सभीका पालन (रक्षण ) गुरुजीका प्रभाव ( सामर्थ्य ) करेगा और परिणाम शुभ होगा ॥ ३०५ ॥
सहित समाज तुम्हार हमारा । घर बन गुर प्रसाद रखवारा ॥
मातु पिता गुर स्वामि निदेसू । सकल धरम धरनीधर सेसू ॥
गुरुजीका प्रसाद ( अनुग्रह ) ही घरमें और वनमें समाजसहित तुम्हारा और हमारा रक्षक है | माता, पिता, गुरु और स्वामीकी आज्ञा [का पालन ] समस्त धर्मरूपी पृथ्वीको धारण करनेमें शेषजीके समान है ॥१ ॥
सो तुम्ह करहु करावहु मोहू । तात तरनिकुल पालक होहू ॥
साधक एक सकल सिधि देनी । कीरति सुगति भूतिमय बेनी ॥
हे तात! तुम वही करो और मुझसे भी कराओ तथा सूर्यकुलके रक्षक बनो । साधकके लिये यह एक ही ( आज्ञापालनरूपी साधना ) सम्पूर्ण सिद्धियोंकी देनेवाली, कीर्तिमयी, सद्गतिमयी और ऐश्वर्यमयी त्रिवेणी है ॥२ ॥
सो बिचारि सहि संकटु भारी । करहु प्रजा परिवारु सुखारी ॥
बाँटी बिपति सबहिं मोहि भाई । तुम्हहि अवधि भरि बड़ि कठिनाई ॥
इसे विचारकर भारी संकट सहकर भी प्रजा और परिवारको सुखी करो । हे भाई! मेरी विपत्ति सभीने बाँट ली है, परन्तु तुमको तो अवधि ( चौदह वर्ष ) -तक बड़ी कठिनाई है ( सबसे अधिक दुःख है ) ॥३ ॥
जानि तुम्हहि मृदु कहउँ कठोरा । कुसमयँ तात न अनुचित मोरा ॥
होहिं कुठायँ सुबंधु सहाए । ओड़िअहिं हाथ असनिहु के घाए । तुमको कोमल जानकर भी मैं कठोर ( वियोगकी बात) कह रहा हूँ । हे तात! बुरे समयमें मेरे लिये यह कोई अनुचित बात नहीं है । कुठौर ( कुअवसर ) में श्रेष्ठ भाई ही सहायक होते हैं । वज्रके आघात भी हाथसे ही रोके जाते हैं ॥४ ॥
दो० – सेवक कर पद नयन से मुख सो साहिबु होइ ।
तुलसी प्रीतिकि रीति सुनि सुकबि सराहहिं सोइ ॥ ३०६ ॥
सेवक हाथ, पैर और नेत्रोंके समान और स्वामी मुखके समान होना चाहिये । तुलसीदासजी कहते हैं कि सेवक - स्वामीकी ऐसी प्रीतिकी रीति सुनकर सुकवि उसकी सराहना करते हैं ॥ ३०६ ॥
पृष्ठ 603
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
* * अयोध्याकाण्ड ६०१
सभा सकल सुनि रघुबर बानी । प्रेम पयोधि अमिअँ जनु सानी ॥
सिथिल समाज सनेह समाधी । देखि दसा चुप सारद साधी ॥
श्रीरघुनाथजीकी वाणी सुनकर, जो मानो प्रेमरूपी समुद्रके [ मन्थनसे निकले हुए ] अमृतमें सनी हुई थी, सारा समाज शिथिल हो गया; सबको प्रेमसमाधि लग गयी । यह दशा देखकर सरस्वतीने चुप साध ली ॥१ ॥
भरतहि भयउ परम संतोषू । सनमुख स्वामि बिमुख दुख दोषू ॥
मुख प्रसन्न मन मिटा बिषादू । भा जनु गूँगेहि गिरा प्रसादू॥
भरतजीको परम सन्तोष हुआ । स्वामीके सम्मुख ( अनुकूल) होते ही उनके दुःख और दोषोंने मुँह मोड़ लिया ( वे उन्हें छोड़कर भाग गये ) । उनका मुख प्रसन्न हो गया और मनका विषाद मिट गया । मानो गूँगेपर सरस्वतीकी कृपा हो गयी हो ॥२ ॥
कीन्ह सप्रेम प्रनामु बहोरी । बोले पानि पंकरुह जोरी ॥
नाथ भयउ सुखु साथ गए को । लहेउँ लाहु जग जनमु भए को ॥
उन्होंने फिर प्रेमपूर्वक प्रणाम किया और करकमलोंको जोड़कर वे बोले– हे नाथ! मुझे आपके साथ जानेका सुख प्राप्त हो गया और मैंने जगत्में जन्म लेनेका लाभ भी पा लिया ॥ ३ ॥
अब कृपाल जस आयसु होई । करौं सीस धरि सादर सोई ॥
सो अवलंब देव मोहि देई । अवधि पारु पाव जेहि सेई ॥
हे कृपालु! अब जैसी आज्ञा हो, उसीको मैं सिरपर धरकर आदरपूर्वक करूँ! परन्तु देव! आप मुझे वह अवलम्बन ( कोई सहारा ) दें जिसकी सेवा कर मैं अवधिका पार पा जाऊँ ( अवधिको बिता दूँ) ॥ ४ ॥
दो० –देव देव अभिषेक हित गुर अनुसासनु पाइ ।
आनेउँ सब तीरथ सलिलु तेहि कहँ काह रजाइ ॥३०७ ॥
हे देव! स्वामी ( आप ) के अभिषेकके लिये गुरुजीकी आज्ञा पाकर मैं सब तीर्थोंका जल लेता आया हूँ; उसके लिये क्या आज्ञाहोती है? ॥ ३०७ ॥
एकु मनोरथु बड़ मन माहीं । सभयँ सकोच जात कहि नाहीं ॥
कहहु तात प्रभु आयसु पाई । बोले बानि सनेह सुहाई ॥
मेरे मनमें एक और बड़ा मनोरथ है, जो भय और संकोचके कारण कहा नहीं जाता । [ श्रीरामचन्द्रजीने कहा— ] हे भाई! कहो । तब प्रभुकी आज्ञा पाकर भरतजी स्नेहपूर्ण सुन्दर वाणी बोले—॥१ ॥
पृष्ठ 604
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
* *६०२ रामचरितमानस
चित्रकूट सुचि थल तीरथ बन । खग मृग सर सरि निर्झर गिरिगन ॥
प्रभु पद अंकित अवनि बिसेषी । आयसु होइ त आवौं देखी ॥
आज्ञा हो तो चित्रकूटके पवित्र स्थान, तीर्थ, वन, पक्षी -पशु, तालाब - नदी, झरने और पर्वतोंके समूह तथा विशेषकर प्रभु ( आप) के चरणचिह्नोंसे अंकित भूमिको देख आऊँ ॥२ ॥
अवसि अत्रि आयसु सिर धरहू । तात बिगतभय कानन चरहू॥
मुनि प्रसाद बनु मंगल दाता । पावन परम सुहावन भ्राता ॥
[ श्रीरघुनाथजी बोले– ] अवश्य ही अत्रि ऋषिकी आज्ञाको सिरपर धारण करो ( उनसे पूछकर वे जैसा कहें वैसा करो ) और निर्भय होकर वनमें विचरो । हे भाई! अत्रि मुनिके प्रसादसे वन मङ्गलोंका देनेवाला, परम पवित्र और अत्यन्त सुन्दर है — ॥३ ॥
रिषिनायकु जहँ आयसु देहीं । राखेहु तीरथ जलु थल तेहीं ॥
सुनि प्रभु बचन भरत सुखु पावा । मुनि पद कमल मुदित सिरु नावा ॥
और ऋषियोंके प्रमुख अत्रिजी जहाँ आज्ञा दें, वहीं [ लाया हुआ ] तीर्थोंका जल स्थापित कर देना । प्रभुके वचन सुनकर भरतजीने सुख पाया और आनन्दित होकर मुनि अत्रिजीके चरणकमलोंमें सिर नवाया ॥४ ॥
दो० – भरत राम संबाद सुनि सकल सुमंगल मूल ।
सुर स्वारथी सराहि कुल बरषत सुरतरु फूल ॥ ३०८ ॥
समस्त सुन्दर मङ्गलोंका मूल भरतजी और श्रीरामचन्द्रजीका संवाद सुनकर स्वार्थी देवता रघुकुलकी सराहना करके कल्पवृक्षके फूल बरसाने लगे ॥३०८ ॥
धन्य भरत जय राम गोसाईं । कहत देव हरषत बरिआईं ॥
मुनि मिथिलेस सभाँ सब काहू । भरत बचन सुनि भयउ उछाहू ॥
‘ भरतजी धन्य हैं, स्वामी श्रीरामजीकी जय हो! ' ऐसा कहते हुए देवता बलपूर्वक ( अत्यधिक ) हर्षित होने लगे । भरतजीके वचन सुनकर मुनि वसिष्ठजी, मिथिलापति जनकजी और सभामें सब किसीको बड़ा उत्साह ( आनन्द) हुआ ॥ १ ॥
भरत राम गुन ग्राम सनेहू । पुलकि प्रसंसत राउ बिदेहू ॥
सेवक स्वामि सुभाउ सुहावन । नेमु पेमु अति पावन पावन ॥
भरतजी और श्रीरामचन्द्रजीके गुणसमूहकी तथा प्रेमकी विदेहराज जनकजी पुलकित होकर प्रशंसा कर रहे हैं । सेवक और स्वामी दोनोंका सुन्दर स्वभाव है । इनके नियम और प्रेम पवित्रको भी अत्यन्त पवित्र करनेवाले हैं ॥२ ॥
पृष्ठ 605
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
* * अयोध्याकाण्ड ६०३
मति अनुसार सराहन लागे । सचिव सभासद सब अनुरागे ॥
सुनि सुनि राम भरत संबादू । दुहु समाज हियँ हरषु बिषादू ॥
मन्त्री और सभासद सभी प्रेममुग्ध होकर अपनी- अपनी बुद्धिके अनुसार सराहना करने लगे । श्रीरामचन्द्रजी और भरतजीका संवाद सुन-सुनकर दोनों समाजोंके हृदयोंमें हर्ष और विषाद ( भरतजीके सेवाधर्मको देखकर हर्ष और रामवियोगकी सम्भावनासे विषाद ) दोनों हुए ॥३ ॥
राम मातु दुखु सुखु सम जानी । कहि गुन राम प्रबोधीं रानी ॥
एक कहहिं रघुबीर बड़ाई । एक सराहत भरत भलाई ॥
श्रीरामचन्द्रजीकी माता कौसल्याजीने दुःख और सुखको समान जानकर श्रीरामजीके गुण कहकर दूसरी रानियोंको धैर्य बँधाया । कोई श्रीरामजीकी बड़ाई ( बड़प्पन ) की चर्चा कर रहे हैं, तो कोई भरतजीके अच्छेपनकी सराहना करते हैं ॥४ ॥
दो० – अत्रि कहेउ तब भरत सन सैल समीप सुकूप ।
राखिअ तीरथ तोय तहँ पावन अमिअ अनूप ॥ ३० ९ ॥
तब अत्रिजीने भरतजीसे कहा- इस पर्वतके समीप ही एक सुन्दर कुआँ है । इस पवित्र, अनुपम और अमृत - जैसे तीर्थजलको उसीमें स्थापित कर दीजिये ॥ ३० ९ ॥
भरत अत्रि अनुसासन पाई । जल भाजन सब दिए चलाई ॥
सानुज आपु अत्रि मुनि साधू। सहित गए जहँ कूप अगाधू॥
भरतजीने अत्रिमुनिकी आज्ञा पाकर जलके सब पात्र रवाना कर दिये और छोटे भाई शत्रुघ्न, अत्रि मुनि तथा अन्य साधु-सन्तोंसहित आप वहाँ गये जहाँ वह अथाह कुआँ था ॥१ ॥
पावन पाथ पुन्यथल राखा । प्रमुदित प्रेम अत्रि अस भाषा ॥
तात अनादि सिद्ध थल एहू । लोपेउ काल बिदित नहिं केहू ॥
और उस पवित्र जलको उस पुण्यस्थलमें रख दिया । तब अत्रि ऋषिने प्रेमसे आनन्दित होकर ऐसा कहा— हे तात! यह अनादि सिद्धस्थल है । कालक्रमसे यह लोप हो गया था इसलिये किसीको इसका पता नहीं था ॥ २ ॥
तब सेवकन्ह सरस थलु देखा । कीन्ह सुजल हित कूप बिसेषा ॥
बिधिबस भयउ बिस्व उपकारू । सुगम अगम अति धरम बिचारू ॥
तब [ भरतजीके ] सेवकोंने उस जलयुक्त स्थानको देखा और उस सुन्दर [ तीर्थोंके ] जलके लिये एक खास कुआँ बना लिया । दैवयोगसे विश्वभरका उपकार हो गया । धर्मका विचार जो अत्यन्त अगम था, वह [ इस कूपके प्रभावसे ] सुगम हो गया ॥३ ॥
पृष्ठ 606
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
* *६०४ रामचरितमानस
भरतकूप अब कहिहहिं लोगा । अति पावन तीरथ जल जोगा ॥
प्रेम सनेम निमज्जत प्रानी । होइहहिं बिमल करम मन बानी ॥
अब इसको लोग भरतकूप कहेंगे । तीर्थोंके जलके संयोगसे तो यह अत्यन्त ही पवित्र हो गया । इसमें प्रेमपूर्वक नियमसे स्नान करनेपर प्राणी मन, वचन और कर्मसे निर्मल हो जायँगे ॥४ ॥
दो० –- कहत कूप महिमा सकल गए जहाँ रघुराउ ।
अत्रि सुनायउ रघुबरहि तीरथ पुन्य प्रभाउ ॥३१०॥ ३१० ॥॥
कूपकी महिमा कहते हुए सब लोग वहाँ गये जहाँ श्रीरघुनाथजी थे । श्रीरघुनाथजीको अत्रिजीने उस तीर्थका पुण्य प्रभाव सुनाया ॥ ३१० ॥
कहत धरम इतिहास सप्रीती । भयउ भोरु निसि सो सुख बीती ॥
नित्य निबाहि भरत दोउ भाई । राम अत्रि गुर आयसु पाई ॥
प्रेमपूर्वक धर्मके इतिहास कहते वह रात सुखसे बीत गयी और सबेरा हो गया । भरत- शत्रुघ्न दोनों भाई नित्यक्रिया पूरी करके, श्रीरामजी, अत्रिजी और गुरु वसिष्ठजीकी आज्ञा पाकर, ॥१ ॥
सहित समाज साज सब सादें । चले राम बन अटन पयादें ॥
कोमल चरन चलत बिनु पनहीं । भइ मृदु भूमि सकुचि मन मनहीं ॥
समाजसहित सब सादे साजसे श्रीरामजीके वनमें भ्रमण ( प्रदक्षिणा ) करनेके लिये पैदल ही चले । कोमल चरण हैं और बिना जूतेके चल रहे हैं, यह देखकर पृथ्वी मन -ही- मन सकुचाकर कोमल हो गयी ॥२ ॥
कुस कंटक काँकरीं कुराईं । कटुक कठोर कुबस्तु दुराईं ॥
महि मंजुल मृदु मारग कीन्हे । बहत समीर त्रिबिध सुख लीन्हे ॥
कुश, काँटे, कंकड़ी, दरारें आदि कड़वी, कठोर और बुरी वस्तुओंको छिपाकर पृथ्वीने सुन्दर और कोमल मार्ग कर दिये । सुखोंको साथ लिये ( सुखदायक ) शीतल, मन्द, सुगन्ध हवा चलने लगी ॥ ३ ॥
सुमन बरषि सुर घन करि छाहीं । बिटप फूलि फलि तृन मृदुताहीं ॥
मृग बिलोकि खग बोलि सुबानी । सेवहिं सकल राम प्रिय जानी ॥
रास्तेमें देवता फूल बरसाकर, बादल छाया करके, वृक्ष फूल- फलकर, तृण अपनी कोमलतासे, मृग ( पशु ) देखकर और पक्षी सुन्दर वाणी बोलकर- सभी भरतजीको श्रीरामचन्द्रजीके प्यारे जानकर उनकी सेवा करने लगे ॥ ४ ॥
दो० - सुलभ सिद्धि सब प्राकृतहु राम कहत जमुहात ।
राम प्रानप्रिय भरत कहुँ यह न होइ बड़ि बात ॥ ३११ ॥
पृष्ठ 607
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
* ** अयोध्याकाण्ड ६०५ जब एक साधारण मनुष्यको भी [ आलस्यसे ] जँभाई लेते समय ' राम ' कह देनेसे ही सब सिद्धियाँ सुलभ हो जाती हैं, तब श्रीरामचन्द्रजीके प्राणप्यारे भरतजीके लिये यह कोई बड़ी ( आश्चर्यकी ) बात नहीं है ॥३११ ॥
एहि बिधि भरतु फिरत बन माहीं । नेमु प्रेमु लखि मुनि सकुचाहीं ॥
पुन्य जलाश्रय भूमि बिभागा । खग मृग तरु तृन गिरि बन बागा ॥
इस प्रकार भरतजी वनमें फिर रहे हैं । उनके नियम और प्रेमको देखकर मुनि भी सकुचा जाते हैं । पवित्र जलके स्थान ( नदी, बावली, कुण्ड आदि ), पृथ्वीके पृथक् - पृथक् भाग, पक्षी, पशु, वृक्ष, तृण ( घास ), पर्वत, वन और बगीचे-॥१ ॥
चारु बिचित्र पबित्र बिसेषी । बूझत भरतु दिब्य सब देखी ॥
सुनि मन मुदित कहत रिषिराऊ । हेतु नाम गुन पुन्य प्रभाऊ ॥
सभी विशेषरूपसे सुन्दर, विचित्र, पवित्र और दिव्य देखकर भरतजी पूछते हैं और उनका प्रश्न सुनकर ऋषिराज अत्रिजी प्रसन्न मनसे सबके कारण, नाम, गुण और पुण्य-प्रभावको कहते हैं ॥२ ॥
कतहुँ निमज्जन कतहुँ प्रनामा । कतहुँ बिलोकत मन अभिरामा ॥
कतहुँ बैठि मुनि आयसु पाई । सुमिरत सीय सहित दोउ भाई॥
भरतजी कहीं स्नान करते हैं, कहीं प्रणाम करते हैं, कहीं मनोहर स्थानोंके दर्शन करते हैं और कहीं मुनि अत्रिजीकी आज्ञा पाकर बैठकर, सीताजीसहित श्रीराम-लक्ष्मण दोनों भाइयोंका स्मरण करते हैं ॥३ ॥
देखि सुभाउ सनेहु सुसेवा । देहिं असीस मुदित बनदेवा ॥
फिरहिं गएँ दिनु पहर अढ़ाई । प्रभु पद कमल बिलोकहिं आई ॥
भरतजीके स्वभाव, प्रेम और सुन्दर सेवाभावको देखकर वनदेवता आनन्दित होकर आशीर्वाद देते हैं । यों घूम- फिरकर ढाई पहर दिन बीतनेपर लौट पड़ते हैं और आकर प्रभु श्रीरघुनाथजीके चरणकमलोंका दर्शन करते हैं ॥४ ॥
दो०- देखे थल तीरथ सकल भरत पाँच दिन माझ ।
कहत सुनत हरि हर सुजसु गयउ दिवसु भइ साँझ ॥ ३१२ ॥
भरतजीने पाँच दिनमें सब तीर्थस्थानोंके दर्शन कर लिये । भगवान् विष्णु और महादेवजीका सुन्दर यश कहते - सुनते वह ( पाँचवाँ) दिन भी बीत गया, सन्ध्या हो गयी ॥३१२ ॥
भोर न्हाइ सबु जुरा समाजू । भरत भूमिसुर तेरहुति राजू ॥
भल दिन आजु जानि मन माहीं । रामु कृपाल कहत सकुचाहीं ॥
पृष्ठ 608
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
* *६०६ रामचरितमानस [ अगले छठे दिन ] सबेरे स्नान करके भरतजी, ब्राह्मण, राजा जनक और सारा समाज आ जुटा । आज सबको विदा करनेके लिये अच्छा दिन है, यह मनमें जानकर भी कृपालु श्रीरामजी कहनेमें सकुचा रहे हैं ॥१ ॥
गुर नृप भरत सभा अवलोकी । सकुचि राम फिरि अवनि बिलोकी ॥
सील सराहि सभा सब सोची । कहुँ न राम सम स्वामि सँकोची ॥
श्रीरामचन्द्रजीने गुरु वसिष्ठजी, राजा जनकजी, भरतजी और सारी सभाकी ओर देखा, किन्तु फिर सकुचाकर दृष्टि फेरकर वे पृथ्वीकी ओर ताकने लगे । सभा उनके शीलकी सराहना करके सोचती है कि श्रीरामचन्द्रजीके समान संकोची स्वामी कहीं नहीं हैं ॥२ ॥
भरत सुजान राम रुख देखी । उठि सप्रेम धरि धीर बिसेषी ॥
करि दंडवत कहत कर जोरी । राखीं नाथ सकल रुचि मोरी ॥
सुजान भरतजी श्रीरामचन्द्रजीका रुख देखकर प्रेमपूर्वक उठकर, विशेषरूपसे धीरज धारणकर दण्डवत् करके हाथ जोड़कर कहने लगे-हे नाथ! आपने मेरी सभी रुचियाँ रखीं ॥ ३ ॥
मोहि लगि सहेउ सबहिं संतापू । बहुत भाँति दुखु पावा आपू॥
अब गोसाइँ मोहि देउ रजाई । सेवौं अवध अवधि भरि जाई ॥
मेरे लिये सब लोगोंने सन्ताप सहा और आपने भी बहुत प्रकारसे दुःख पाया । अब स्वामी मुझे आज्ञा दें । मैं जाकर अवधिभर ( चौदह वर्षतक ) अवधका सेवन करूँ ॥४ ॥
दो० – जेहिं उपाय पुनि पाय जनु देखै दीनदयाल ।
सो सिख देइअ अवधि लगि कोसलपाल कृपाल ॥ ३१३ ॥
हे दीनदयालु! जिस उपायसे यह दास फिर चरणोंका दर्शन करे - हे कोसलाधीश! हे कृपालु! अवधिभरके लिये मुझे वही शिक्षा दीजिये ॥ ३१३ ॥
पुरजन परिजन प्रजा गोसाईं । सब सुचि सरस सनेहँ सगाईं ॥
राउर बदि भल भव दुख दाहू । प्रभु बिनु बादि परम पद लाहू ॥
हे गोसाईं! आपके प्रेम और सम्बन्धसे अवधपुरवासी, कुटुम्बी और प्रजा सभी पवित्र और रस ( आनन्द ) से युक्त हैं । आपके लिये भवदुःख ( जन्म- मरणके दुःख ) की ज्वालामें जलना भी अच्छा है और प्रभु ( आप ) के बिना परमपद ( मोक्ष ) का लाभ भी व्यर्थ है ॥१ ॥
स्वामि सुजानु जानि सब ही की । रुचि लालसा रहनि जन जी की ॥
प्रनतपालु पालिहि सब काहू । देउ दुहू दिसि ओर निबाहू॥
पृष्ठ 609
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
* * अयोध्याकाण्ड ६०७ हे स्वामी! आप सुजान हैं, सभीके हृदयकी और मुझ सेवकके मनकी रुचि, लालसा ( अभिलाषा ) और रहनी जानकर, हे प्रणतपाल! आप सब किसीका पालन करेंगे और हे देव! दोनों तरफको ओर-अन्ततक निबाहेंगे ॥ २ ॥
अस मोहि सब बिधि भूरि भरोसो । किएँ बिचारु न सोचु खरो सो ॥
आरति मोर नाथ कर छोहू । दुहुँ मिलि कीन्ह ढीठु हठि मोहू ॥
मुझे सब प्रकारसे ऐसा बहुत बड़ा भरोसा है । विचार करनेपर तिनकेके बराबर ( जरा - सा ) भी सोच नहीं रह जाता । मेरी दीनता और स्वामीका स्नेह दोनोंने मिलकर मुझे जबर्दस्ती ढीठ बना दिया है ॥ ३ ॥
यह बड़ दोषु दूरि करि स्वामी । तजि सकोच सिखइअ अनुगामी ॥
भरत बिनय सुनि सबहिं प्रसंसी । खीर नीर बिबरन गति हंसी ॥
हे स्वामी! इस बड़े दोषको दूर करके संकोच त्यागकर मुझ सेवकको शिक्षा दीजिये । दूध और जलको अलग - अलग करनेमें हंसिनीकी - सी गतिवाली भरतजीकी विनती सुनकर उसकी सभीने प्रशंसा की ॥ ४ ॥
दो० - दीनबंधु सुनि बंधु के बचन दीन छलहीन ॥
देस काल अवसर सरिस बोले रामु प्रबीन ॥ ३१४ ॥
दीनबन्धु और परम चतुर श्रीरामजी भाई भरतजीके दीन और छलरहित वचन सुनकर देश, काल और अवसरके अनुकूल वचन बोले- ॥३१४ ॥
तात तुम्हारि मोरि परिजन की । चिंता गुरहि नृपहि घर बन की ॥
माथे पर गुर मुनि मिथिलेसू । हमहि तुम्हहि सपनेहुँ न कलेसू॥
हे तात! तुम्हारी, मेरी, परिवारकी, घरकी और वनकी सारी चिन्ता गुरु वसिष्ठजी और महाराज जनकजीको है । हमारे सिरपर जब गुरुजी, मुनि विश्वामित्रजी और मिथिलापति जनकजी हैं, तब हमें और तुम्हें स्वप्नमें भी क्लेश नहीं है ॥ १ ॥
मोर तुम्हार परम पुरुषारथु । स्वारथु सुजसु धरमु परमारथु ॥
पितु आयसु पालिहिं दुहु भाईं । लोक बेद भल भूप भलाई ॥
मेरा और तुम्हारा तो परम पुरुषार्थ, स्वार्थ, सुयश, धर्म और परमार्थ इसी में है कि हम दोनों भाई पिताजीकी आज्ञाका पालन करें । राजाकी भलाई ( उनके व्रतकी रक्षा) से ही लोक और वेद दोनोंमें भला है ॥२ ॥
गुरपितु मातु स्वामि सिख पालें । चलेहुँ कुमग पग परहिं न खालें ॥
अस बिचारि सब सोच बिहाई । पालहु अवध अवधि भरि जाई ॥
गुरु, पिता, माता और स्वामीकी शिक्षा ( आज्ञा ) का पालन करनेसे कुमार्गपर भी चलनेसे पैर गड्ढेमें नहीं पड़ता ( पतन नहीं होता ) । ऐसा विचारकर सब सोच छोड़कर अवध जाकर अवधिभर उसका पालन करो ॥ ३ ॥
पृष्ठ 610
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
* *६०८ रामचरितमानस
देसु कोसु परिजन परिवारू । गुर पद रजहिं लाग छरुभारू ॥
तुम्ह मुनि मातु सचिव सिख मानी । पालेहु पुहुमि प्रजा रजधानी ॥
देश, खजाना, कुटुम्ब, परिवार आदि सबकी जिम्मेदारी तो गुरुजीकी चरण-रजपर है । तुम तो मुनि वसिष्ठजी, माताओं और मन्त्रियोंकी शिक्षा मानकर तदनुसार पृथ्वी, प्रजा और राजधानीका पालन ( रक्षा ) -भर करते रहना ॥४ ॥
दो० - मुखिआ मुखु सो चाहिऐ खान पान कहुँ एक ।
पालइ पोषइ सकल अँग तुलसी सहित बिबेक ॥ ३१५ ॥
तुलसीदासजी कहते हैं - [ श्रीरामजीने कहा- ] मुखिया मुखके समान होना चाहिये, जो खाने-पीनेको तो एक ( अकेला ) है, परन्तु विवेकपूर्वक सब अंगोंका पालन - पोषण करता है ॥३१५ ॥
राजधरम सरबसु एतनोई । जिमि मन माहँ मनोरथ गोई ॥
बंधु प्रबोधु कीन्ह बहु भाँती । बिनु अधार मन तोषु न साँती ॥
राजधर्मका सर्वस्व ( सार) भी इतना ही है । जैसे मनके भीतर मनोरथ छिपा रहता है । श्रीरघुनाथजीने भाई भरतको बहुत प्रकारसे समझाया । परन्तु कोई अवलम्बन पाये बिना उनके मनमें न सन्तोष हुआ, न शान्ति ॥ १ ॥
भरत सील गुर सचिव समाजू । सकुच सनेह बिबस रघुराजू॥
प्रभु करि कृपा पाँवरीं दीन्हीं । सादर भरत सीस धरि लीन्हीं ॥
इधर तो भरतजीका शील ( प्रेम ) और उधर गुरुजनों, मन्त्रियों तथा समाजकी उपस्थिति! यह देखकर श्रीरघुनाथजी संकोच तथा स्नेहके विशेष वशीभूत हो गये । ( अर्थात् भरतजीके प्रेमवश उन्हें पाँवरी देना चाहते हैं, किन्तु साथ ही गुरु आदिका संकोच भी होता है । ) आखिर [ भरतजीके प्रेमवश] प्रभु श्रीरामचन्द्रजीने कृपाकर खड़ाऊँ दे दीं और भरतजीने उन्हें आदरपूर्वक सिरपर धारण कर लिया ॥ २ ॥
चरनपीठ करुनानिधान के । जनु जुग जामिक प्रजा प्रान के ॥
संपुट भरत सनेह रतन के । आखर जुग जनु जीव जतन के ॥
करुणानिधान श्रीरामचन्द्रजीके दोनों खड़ाऊँ प्रजाके प्राणोंकी रक्षाके लिये मानो दो पहरेदार हैं । भरतजीके प्रेमरूपी रत्नके लिये मानो डिब्बा है और जीवके साधनके लिये मानो राम--नामके दो अक्षर हैं ॥ ३ ॥
कुल कपाट कर कुसल करम के । बिमल नयन सेवा सुधरम के ॥
भरत मुदित अवलंब लहे तें । अस सुख जस सिय रामु रहे तें ॥
रघुकुल [ की रक्षा ] के लिये दो किवाड़ हैं । कुशल ( श्रेष्ठ ) कर्म करनेके लिये दो हाथकी भाँति ( सहायक ) हैं । और सेवारूपी श्रेष्ठ धर्मके सुझानेके लिये निर्मल नेत्र हैं । भरतजी इस अवलम्बके मिल जानेसे परम आनन्दित हैं । उन्हें ऐसा ही सुख हुआ, जैसा श्रीसीतारामजीके रहनेसे होता ॥ ४ ॥