श्रीरामचरितमानस — पृष्ठ 661–670
श्रीरामचरितमानस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 661–670
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* अरण्यकाण्ड * ६५ ९ गृध्रराज जटायुने सीताजीकी दुःखभरी वाणी सुनकर पहचान लिया कि ये रघुकुलतिलक श्रीरामचन्द्रजीकी पत्नी हैं । [उसने देखा कि ] नीच राक्षस इनको [ बुरी तरह ] लिये जा रहा है, जैसे कपिला गाय म्लेच्छके पाले पड़ गयी हो ॥४ ॥
सीते पुत्रि करसि जनि त्रासा । करिहउँ जातुधान कर नासा ॥
धावा क्रोधवंत खग कैसें । छूटइ पबि परबत कहुँ जैसें ॥
[ वह बोला— ] हे सीते पुत्री! भय मत कर । मैं इस राक्षसका नाश करूँगा । [ यह कहकर ] वह पक्षी क्रोधमें भरकर कैसे दौड़ा, जैसे पर्वतकी ओर वज्र छूटता हो ॥५ ॥
रे रे दुष्ट ठाढ़ किन होही । निर्भय चलेसि न जानेहि मोही ॥
आवत देखि कृतांत समाना । फिरि दसकंधर कर अनुमाना ॥
[ उसने ललकारकर कहा- ] रे रे दुष्ट! खड़ा क्यों नहीं होता? निडर होकर चल दिया! मुझे तूने नहीं जाना? उसको यमराजके समान आता हुआ देखकर रावण घूमकर मनमें अनुमान करने लगा- ॥ ६ ॥
की मैनाक कि खगपति होई । मम बल जान सहित पति सोई ॥
जाना जरठ जटायू एहा । मम कर तीरथ छाँड़िहि देहा ॥
यह या तो मैनाक पर्वत है या पक्षियोंका स्वामी गरुड़ । पर वह ( गरुड़ ) तो अपने स्वामी विष्णुसहित मेरे बलको जानता है! [ कुछ पास आनेपर ] रावणने उसे पहचान लिया [ और बोला— ] यह तो बूढ़ा जटायु है! यह मेरे हाथरूपी तीर्थमें शरीर छोड़ेगा ॥७ ॥
सुनत गीध क्रोधातुर धावा । कह सुनु रावन मोर सिखावा ॥
तजि जानकिहि कुसल गृह जाहू । नाहिं त अस होइहि बहुबाहू ॥
यह सुनते ही गीध क्रोधमें भरकर बड़े वेगसे दौड़ा और बोला- रावण! मेरी सिखावन सुन । जानकीजीको छोड़कर कुशलपूर्वक अपने घर चला जा । नहीं तो हे बहुत भुजाओंवाले! ऐसा होगा कि ॥८ ॥
राम रोष पावक अति घोरा । होइहि सकल सलभ कुल तोरा ॥
उतरु न देत दसानन जोधा । तबहिं गीध धावा करि क्रोधा ॥
श्रीरामजीके क्रोधरूपी अत्यन्त भयानक अग्निमें तेरा सारा वंश पतिंगा [होकर भस्म ] हो
जायगा । योद्धा रावण कुछ उत्तर नहीं देता । तब गीध क्रोध करके दौड़ा ॥९ ॥
धरि कच बिरथ कीन्ह महि गिरा । सीतहि राखि गीध पुनि फिरा ॥
चोचन्ह मारि बिदारेसि देही । दंड एक भइ मुरुछा तेही ॥
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* *६६० रामचरितमानस उसने [ रावणके ] बाल पकड़कर उसे रथके नीचे उतार लिया, रावण पृथ्वीपर गिर पड़ा । गीध सीताजीको एक ओर बैठाकर फिर लौटा और चोंचोंसे मार- मारकर रावणके शरीरको विदीर्ण कर डाला । इससे उसे एक घड़ीके लिये मूर्च्छा हो गयी ॥१० ॥
तब सक्रोध निसिचर खिसिआना । काढ़ेसि परम कराल कृपाना ॥
काटेसि पंख परा खग धरनी । सुमिरि राम करि अदभुत करनी ॥
तब खिसियाये हुए रावणने क्रोधयुक्त होकर अत्यन्त भयानक कटार निकाली और उससे जटायुके पंख काट डाले । पक्षी (जटायु ) श्रीरामजीकी अद्भुत लीलाका स्मरण करके पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥११ ॥
सीतहि जान चढ़ाइ बहोरी । चला उताइल त्रास न थोरी ॥
करति बिलाप जाति नभ सीता । ब्याध बिबस जनु मृगी सभीता ॥
सीताजीको फिर रथपर चढ़ाकर रावण बड़ी उतावलीके साथ चला, उसे भय कम न था । सीताजी आकाशमें विलाप करती हुई जा रही हैं । मानो व्याधके वशमें पड़ी हुई ( जालमें फँसी हुई ) कोई भयभीत हिरनी हो! ॥१२ ॥
गिरि पर बैठे कपिन्ह निहारी । कहि हरि नाम दीन्ह पट डारी ॥
एहि बिधि सीतहि सो लै गयऊ । बन असोक महँ राखत भयऊ ॥
पर्वतपर बैठे हुए बंदरोंको देखकर सीताजीने हरिनाम लेकर वस्त्र डाल दिया । इस प्रकार वह सीताजीको ले गया और उन्हें अशोकवनमें जा रखा ॥ १३ ॥
दो० - हारि परा खल बह बिधि भय अरु प्रीति देखाइ ।
तब असोक पादप तर राखिसि जतन कराइ ॥ २ ९ ( क) ॥
सीताजीको बहुत प्रकारसे भय और प्रीति दिखलाकर जब वह दुष्ट हार गया, तब उन्हें यत्न कराके ( सब व्यवस्था ठीक कराके ) अशोक- वृक्षके नीचे रख दिया ॥ २ ९ ( क ) ॥ नवाह्नपारायण, छठा विश्राम
जेहि बिधि कपट कुरंग सँग धाइ चले श्रीराम ।
सो छबि सीता राखि उर रटति रहति हरिनाम ॥ २ ९ ( ख) ॥
जिस प्रकार कपटमृगके साथ श्रीरामजी दौड़ चले थे, उसी छविको हृदयमें रखकर वे हरिनाम ( रामनाम ) रटती रहती हैं ॥ २ ९ ( ख ) ॥
रघुपति अनुजहि आवत देखी । बाहिज चिंता कीन्हि बिसेषी ॥
जनकसुता परिहरिहु अकेली । आयहु तात बचन मम पेली ॥
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* अरण्यकाण्ड * ६६१ [ इधर ] श्रीरघुनाथजीने छोटे भाई लक्ष्मणजीको आते देखकर बाह्यरूपमें बहुत चिन्ता की [और कहा- ] हे भाई! तुमने जानकीको अकेली छोड़ दिया और मेरी आज्ञाका उल्लङ्घन कर यहाँ चले आये! ॥१ ॥
निसिचर निकर फिरहिं बन माहीं । मम मन सीता आश्रम नाहीं ॥
गहि पद कमल अनुज कर जोरी । कहेउ नाथ कछु मोहि न खोरी ॥
राक्षसोंके झुंड वनमें फिरते रहते हैं । मेरे मनमें ऐसा आता है कि सीता आश्रममें नहीं है । छोटे भाई लक्ष्मणजीने श्रीरामजीके चरणकमलोंको पकड़कर हाथ जोड़कर कहा-हे नाथ! मेरा कुछ भी दोष नहीं है ॥२ ॥
अनुज समेत गए प्रभु तहवाँ । गोदावरि तट आश्रम जहवाँ ॥
आश्रम देखि जानकी हीना । भए बिकल जस प्राकृत दीना ॥
लक्ष्मणजीसहित प्रभु श्रीरामजी वहाँ गये जहाँ गोदावरीके तटपर उनका आश्रम था । आश्रमको जानकीजीसे रहित देखकर श्रीरामजी साधारण मनुष्यकी भाँति व्याकुल और दीन ( दुखी ) हो गये ॥ ३ ॥
हा गुन खानि जानकी सीता । रूप सील ब्रत नेम पुनीता ॥
लछिमन समुझाए बहु भाँती । पूछत चले लता तरु पाँती ॥
[ वे विलाप करने लगे- ] हा गुणोंकी खान जानकी! हा रूप, शील, व्रत और नियमोंमें पवित्र सीते! लक्ष्मणजीने बहुत प्रकारसे समझाया । तब श्रीरामजी लताओं और वृक्षोंकी पंक्तियोंसे पूछते हुए चले ॥४ ॥
हे खग मृग हे मधुकर श्रेनी । तुम्ह देखी सीता मृगनैनी ॥
खंजन सुक कपोत मृग मीना ।। मधुप निकर कोकिला प्रबीना ॥
हे पक्षियो! हे पशुओ! हे भौंरोंकी पंक्तियो! तुमने कहीं मृगनयनी सीताको देखा है? खंजन, तोता, कबूतर, हिरन, मछली, भौंरोंका समूह, प्रवीण कोयल, ॥ ५ ॥
कुंद कली दाड़िम दामिनी । कमल सरद ससि अहिभामिनी ॥
बरुन पास मनोज धनु हंसा । गज केहरि निज सुनत प्रसंसा ॥
कुन्दकली, अनार, बिजली, कमल, शरद्का चन्द्रमा और नागिनी, वरुणका पाश, कामदेवका धनुष, हंस, गज और सिंह-ये सब आज अपनी प्रशंसा सुन रहे हैं ॥६ ॥
श्रीफल कनक कदलि हरषाहीं । नेकु न संक सकुच मन माहीं ॥
सुनु जानकी तोहि बिनु आजू । हरषे सकल पाइ जनु राजू ॥
बेल, सुवर्ण और केला हर्षित हो रहे हैं । इनके मनमें जरा भी शङ्का और संकोच नहीं है । हे जानकी! सुनो, तुम्हारे बिना ये सब आज ऐसे हर्षित हैं, मानो राज पा गये हों । ( अर्थात् तुम्हारे अंगोंके सामने ये सब तुच्छ, अपमानित और लज्जित थे । आज तुम्हें न देखकर ये अपनी शोभाके अभिमानमें फूल रहे हैं ) ॥७ ॥
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* *६६२ रामचरितमानस
किमि सहि जात अनख तोहि पाहीं । प्रिया बेगि प्रगटसि कस नाहीं ॥
एहि बिधि खोजत बिलपत स्वामी । मनहु महा बिरही अति कामी ॥
तुमसे यह अनख ( स्पर्धा ) कैसे सही जाती है? हे प्रिये! तुम शीघ्र ही प्रकट क्यों नहीं होती? इस प्रकार [ अनन्त ब्रह्माण्डोंके अथवा महामहिमामयी स्वरूपाशक्ति श्रीसीताजीके ] स्वामी श्रीरामजी सीताजीको खोजते हुए [ इस प्रकार] विलाप करते हैं, मानो कोई महाविरही और अत्यन्त कामी पुरुष हो ॥ ८ ॥
पूरनकाम राम सुख रासी । मनुजचरित कर अज अबिनासी ॥
आगें परा गीधपति देखा । सुमिरत राम चरन जिन्ह रेखा ॥
पूर्णकाम, आनन्दकी राशि, अजन्मा और अविनाशी श्रीरामजी मनुष्योंके - से चरित्र कर रहे हैं । आगे [ जानेपर ] उन्होंने गृध्रपति जटायुको पड़ा देखा । वह श्रीरामजीके चरणोंका स्मरण कर रहा था, जिनमें [ ध्वजा - कुलिश आदिकी ] रेखाएँ ( चिह्न ) हैं॥९॥
दो० – कर सरोज सिर परसेउ कृपासिंधु रघुबीर ।
निरखि राम छबि धाम मुख बिगत भई सब पीर ॥ ३० ॥
कृपासागर श्रीरघुवीरने अपने करकमलसे उसके सिरका स्पर्श किया ( उसके सिरपर कर- कमल फेर दिया ) । शोभाधाम श्रीरामजीका [ परम सुन्दर ] मुख देखकर उसकी सब पीड़ा जाती रही ॥३० ॥
तब कह गीध बचन धरि धीरा । सुनहु राम भंजन भव भीरा ॥
नाथ दसानन यह गति कीन्ही । तेहिं खल जनकसुता हरि लीन्ही ॥
तब धीरज धरकर गीधने यह वचन कहा- हे भव ( जन्म- मृत्यु ) के भयका नाश करनेवाले श्रीरामजी! सुनिये । हे नाथ! रावणने मेरी यह दशा की है । उसी दुष्टने जानकीजीको हर लिया है ॥१ ॥
लै दच्छिन दिसि गयउ गोसाईं । बिलपति अति कुररी की नाईं ॥
दरस लागि प्रभु राखेउँ प्राना । चलन चहत अब कृपानिधाना ॥
हे गोसाईं! वह उन्हें लेकर दक्षिण दिशाको गया है । सीताजी कुररी ( कुर्ज ) की तरह अत्यन्त विलाप कर रही थीं । हे प्रभो! मैंने आपके दर्शनोंके लिये ही प्राण रोक रखे थे । हे कृपानिधान! अब ये चलना ही चाहते हैं ॥ २ ॥
राम कहा तनु राखहु ताता । मुख मुसुकाइ कही तेहिं बाता ॥
जा कर नाम मरत मुख आवा । अधमउ मुकुत होइ श्रुति गावा ॥
श्रीरामचन्द्रजीने कहा — हे तात! शरीरको बनाये रखिये । तब उसने मुसकराते हुए मुँहसे यह बात कही – मरते समय जिनका नाम मुखमें आ जानेसे अधम ( महान् पापी ) भी मुक्त हो जाता है, ऐसा वेद गाते हैं —॥३ ॥
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* अरण्यकाण्ड * ६६३
सो मम लोचन गोचर आगें । राखौं देह नाथ केहि खाँगें ॥
जल भरि नयन कहहिं रघुराई । तात कर्म निज तें गति पाई ॥
वही ( आप ) मेरे नेत्रोंके विषय होकर सामने खड़े हैं । हे नाथ! अब मैं किस कमी [की पूर्ति] के लिये देहको रखूँ? नेत्रोंमें जल भरकर श्रीरघुनाथजी कहने लगे - हे तात! आपने अपने श्रेष्ठ कर्मोंसे [ दुर्लभ ] गति पायी है ॥४ ॥
परहित बस जिन्ह के मन माहीं । तिन्ह कहुँ जग दुर्लभ कछु नाहीं ॥
तनु तजि तात जाहु मम धामा । देउँ काह तुम्ह पूरनकामा ॥
जिनके मनमें दूसरेका हित बसता है ( समाया रहता है ), उनके लिये जगत्में कुछ भी ( कोई भी गति ) दुर्लभ नहीं है । हे तात! शरीर छोड़कर आप मेरे परम धाममें जाइये । मैं आपको क्या दूँ? आप तो पूर्णकाम हैं ( सब कुछ पा चुके हैं ) ॥५ ॥
दो० –- सीता हरन तात जनि कहहु पिता सन जाइ ।
जौं मैं राम त कुल सहित कहिहि दसानन आइ ॥३१ ॥
हे तात! सीताहरणकी बात आप जाकर पिताजीसे न कहियेगा । यदि मैं राम हूँ तो दशमुख रावण कुटुम्बसहित वहाँ आकर स्वयं ही कहेगा ॥३१ ॥
गीध देह तजि धरि हरि रूपा । भूषन बहु पट पीत अनूपा ॥
स्याम गात बिसाल भुज चारी । अस्तुति करत नयन भरि बारी ॥
जटायुने गीधकी देह त्यागकर हरिका रूप धारण किया और बहुत -से अनुपम ( दिव्य ) आभूषण और [ दिव्य ] पीताम्बर पहन लिये । श्याम शरीर है, विशाल चार भुजाएँ हैं और नेत्रोंमें [प्रेम तथा आनन्दके आँसुओंका ] जल भरकर वह स्तुति कर रहा है —॥१ ॥
छं० – जय राम रूप अनूप निर्गुन सगुन गुन प्रेरक सही ।
दससीस बाहु प्रचंड खंडन चंड सर मंडन मही ॥
पाथोद गात सरोज मुख राजीव आयत लोचनं ।
नित नौमि रामु कृपाल बाहु बिसाल भव भय मोचनं ॥
हे रामजी! आपकी जय हो । आपका रूप अनुपम है, आप निर्गुण हैं, सगुण हैं और सत्य ही गुणोंके ( मायाके ) प्रेरक हैं । दस सिरवाले रावणकी प्रचण्ड भुजाओंको खण्ड-खण्ड करनेके लिये प्रचण्ड बाण धारण करनेवाले, पृथ्वीको सुशोभित करनेवाले, जलयुक्त मेघके समान श्याम शरीरवाले, कमलके समान मुख और [ लाल ] कमलके समान विशाल नेत्रोंवाले, विशाल भुजाओंवाले और भव - भयसे छुड़ानेवाले कृपालु श्रीरामजीको मैं नित्य नमस्कार करता हूँ॥१ ॥
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* *६६४ रामचरितमानस बलमप्रमेयमनादिमजमब्यक्तमेकमगोचरं गोबिंद गोपर द्वंद्वहर बिग्यानघन धरनीधरं ॥
जे राम मंत्र जपंत संत अनंत जन मन रंजनं ।
नित नौमि राम अकाम प्रिय कामादि खल दल गंजनं ॥ २ ॥
आप अपरिमित बलवाले हैं, अनादि, अजन्मा, अव्यक्त ( निराकार ), एक, अगोचर ( अलक्ष्य ), गोविन्द ( वेदवाक्योंद्वारा जाननेयोग्य ), इन्द्रियोंसे अतीत, [जन्म - मरण, सुख-दुःख, हर्ष -शोकादि ] द्वन्द्वोंको हरनेवाले, विज्ञानकी घनमूर्ति और पृथ्वीके आधार हैं तथा जो संत राम- मन्त्रको जपते हैं, उन अनन्त सेवकोंके मनको आनन्द देनेवाले हैं । उन निष्कामप्रिय ( निष्कामजनोंके प्रेमी अथवा उन्हें प्रिय ) तथा काम आदि दुष्टों ( दुष्ट- वृत्तियों ) के दलका दलन करनेवाले श्रीरामजीको मैं नित्य नमस्कार करता हूँ॥२ ॥
जेहि श्रुतिनिरंजन ब्रह्म ब्यापक बिरज अज कहि गावहीं ।
करि ध्यान ग्यान बिराग जोग अनेक मुनि जेहि पावहीं ॥
सो प्रगट करुना कंद सोभा बृंद अग जग मोहई ।
मम हृदय पंकज भृंग अंग अनंग बहु छबि सोहई ॥ ३ ॥
जिनको श्रुतियाँ निरञ्जन ( मायासे परे ), ब्रह्म, व्यापक, निर्विकार और जन्मरहित कहकर गान करती हैं । मुनि जिन्हें ध्यान, ज्ञान, वैराग्य और योग आदि अनेक साधन करके पाते हैं । वे ही करुणाकन्द, शोभाके समूह [ स्वयं श्रीभगवान्] प्रकट होकर जड़ -चेतन समस्त जगत्को मोहित कर रहे हैं । मेरे हृदय - कमलके भ्रमररूप उनके अंग- अंगमें बहुत-से कामदेवोंकी छवि शोभा पा रही है ॥३ ॥
जो अगम सुगम सुभाव निर्मल असम सम सीतल सदा ।
पस्यंति जं जोगी जतन करि करत मन गो बस सदा ॥
सो राम रमा निवास संतत दास बस त्रिभुवन धनी ।
मम उर बसउ सो समन संसृति जासु कीरति पावनी ॥ ४ ॥
जो अगम और सुगम हैं, निर्मलस्वभाव हैं, विषम और सम हैं और सदा शीतल ( शान्त ) हैं । मन और इन्द्रियोंको सदा वशमें करते हुए योगी बहुत साधन करनेपर जिन्हें देख पाते हैं, वे तीनों लोकोंके स्वामी, रमानिवास श्रीरामजी निरन्तर अपने दासोंके वशमें रहते हैं, वे ही मेरे हृदयमें निवास करें, जिनकी पवित्र कीर्ति आवागमनको मिटानेवाली है ॥४ ॥
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* अरण्यकाण्ड * ६६५
दो०- अबिरल भगति मागि बर गीध गयउ हरिधाम ।
तेहि की क्रिया जथोचित निज कर कीन्ही राम ॥ ३२ ॥
अखण्ड भक्तिका वर माँगकर गृध्रराज जटायु श्रीहरिके परमधामको चला गया । श्रीरामचन्द्रजीने उसकी [ दाहकर्म आदि सारी ] क्रियाएँ यथायोग्य अपने हाथोंसे कीं ॥३२ ॥
कोमल चित अति दीनदयाला । कारन बिनु रघुनाथ कृपाला ॥
गीध अधम खग आमिष भोगी । गति दीन्ही जो जाचत जोगी ॥
श्रीरघुनाथजी अत्यन्त कोमल चित्तवाले, दीनदयालु और बिना ही कारण कृपालु हैं । गीध [ पक्षियोंमें भी ] अधम पक्षी और मांसाहारी था, उसको भी वह दुर्लभ गति दी, जिसे योगीजन माँगते रहते हैं ॥१ ॥
सुनहु उमा ते लोग अभागी । हरि तजि होहिं बिषय अनुरागी ॥
पुनि सीतहि खोजत द्वौ भाई । चले बिलोकत बन बहुताई ॥
[शिवजी कहते हैं— ] हे पार्वती! सुनो, वे लोग अभागे हैं जो भगवान्को छोड़कर विषयोंसे अनुराग करते हैं । फिर दोनों भाई सीताजीको खोजते हुए आगे चले । वे वनकी सघनता देखते जाते हैं ॥२ ॥
संकुल लता बिटप घन कानन । बहु खग मृग तहँ गज पंचानन ॥
आवत पंथ कबंध निपाता । तेहिं सब कही साप कै बाता ॥
वह सघन वन लताओं और वृक्षोंसे भरा है । उसमें बहुत-से पक्षी, मृग, हाथी और सिंह रहते हैं । श्रीरामजीने रास्तेमें आते हुए कबंध राक्षसको मार डाला । उसने अपने शापकी सारी बात कही ॥३ ॥
दुरबासा मोहि दीन्ही सापा । प्रभु पद पेखि मिटा सो पापा ॥
सुनु गंधर्ब कहउँ मैं तोही । मोहि न सोहाइ ब्रह्मकुल द्रोही ॥
[ वह बोला— ] दुर्वासाजीने मुझे शाप दिया था । अब प्रभुके चरणोंको देखनेसे वह पाप मिट गया । [ श्रीरामजीने कहा- ] हे गन्धर्व! सुनो, मैं तुम्हें कहता हूँ, ब्राह्मणकुलसे द्रोह करनेवाला मुझे नहीं सुहाता ॥४ ॥
दो० — मन क्रम बचन कपट तजि जो कर भूसुर सेव ।
मोहि समेत बिरंचि सिव बस ताकें सब देव ॥ ३३ ॥
मन, वचन और कर्मसे कपट छोड़कर जो भूदेव ब्राह्मणोंकी सेवा करता है, मुझसमेत ब्रह्मा, शिव आदि सब देवता उसके वशमें हो जाते हैं ॥३३ ॥
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*:*६६६ रामचरितमानस
सापत ताड़त परुष कहंता । बिप्र पूज्य अस गावहिं संता ॥
पूजिअ बिप्र सील गुन हीना । सूद्र न गुन गन ग्यान प्रबीना ॥
शाप देता हुआ, मारता हुआ और कठोर वचन कहता हुआ भी ब्राह्मण पूजनीय है, ऐसा संत कहते हैं । शील और गुणसे हीन भी ब्राह्मण पूजनीय है । और गुणगणोंसे युक्त और ज्ञानमें निपुण भी शूद्र पूजनीय नहीं है ॥ १ ॥
कहि निज धर्म ताहि समुझावा । निज पद प्रीति देखि मन भावा ॥
रघुपति चरन कमल सिरु नाई । गयउ गगन आपनि गति पाई ॥
श्रीरामजीने अपना धर्म ( भागवत - धर्म ) कहकर उसे समझाया । अपने चरणोंमें प्रेम देखकर वह उनके मनको भाया । तदनन्तर श्रीरघुनाथजीके चरणकमलोंमें सिर नवाकर वह अपनी गति ( गन्धर्वका स्वरूप ) पाकर आकाशमें चला गया ॥२ ॥
ताहि देइ गति राम उदारा । सबरी कें आश्रम पगु धारा ॥
सबरी देखि राम गृहँ आए । मुनि के बचन समुझि जियँ भाए ॥
उदार श्रीरामजी उसे गति देकर शबरीजीके आश्रममें पधारे । शबरीजीने श्रीरामचन्द्रजीको घरमें आये देखा, तब मुनि मतङ्गजीके वचनोंको याद करके उनका मन प्रसन्न हो गया ॥३ ॥
सरसिज लोचन बाहु बिसाला । जटा मुकुट सिर उर बनमाला ॥
स्याम गौर सुंदर दोउ भाई । सबरी परी चरन लपटाई ॥
कमल - सदृश नेत्र और विशाल भुजावाले, सिरपर जटाओंका मुकुट और हृदयपर वनमाला धारण किये हुए सुन्दर साँवले और गोरे दोनों भाइयोंके चरणोंमें शबरीजी लिपट पड़ीं ॥४ ॥
प्रेम मगन मुख बचन न आवा । पुनि पुनि पद सरोज सिर नावा ॥
सादर जल लै चरन पखारे । पुनि सुंदर आसन बैठारे ॥
वे प्रेममें मग्न हो गयीं, मुखसे वचन नहीं निकलता । बार- बार चरण- कमलोंमें सिर नवा रही हैं । फिर उन्होंने जल लेकर आदरपूर्वक दोनों भाइयोंके चरण धोये और फिर उन्हें सुन्दर आसनोंपर बैठाया ॥ ५ ॥
दो० - कंद मूल फल सुरस अति दिए राम कहुँ आनि ।
प्रेम सहित प्रभु खाए बारंबार बखानि ॥ ३४ ॥
उन्होंने अत्यन्त रसीले और स्वादिष्ट कन्द, मूल और फल लाकर श्रीरामजीको दिये । प्रभुने बार-बार प्रशंसा करके उन्हें प्रेमसहित खाया ॥३४ ॥
पानि जोरि आगें भइ ठाढ़ी । प्रभुहि बिलोकि प्रीति अति बाढ़ी ॥
केहि बिधि अस्तुति करौं तुम्हारी । अधम जाति मैं जड़मति भारी ॥
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* अरण्यकाण्ड * ६६७ फिर वे हाथ जोड़कर आगे खड़ी हो गयीं । प्रभुको देखकर उनका प्रेम अत्यन्त बढ़ गया । [ उन्होंने कहा— ] मैं किस प्रकार आपकी स्तुति करूँ? मैं नीच जातिकी और अत्यन्त मूढबुद्धि हूँ ॥ १ ॥
अधम ते अधम अधम अति नारी । तिन्ह महँ मैं मतिमंद अघारी ॥
कह रघुपति सुनु भामिनि बाता । मानउँ एक भगति कर नाता ॥
जो अधमसे भी अधम हैं, स्त्रियाँ उनमें भी अत्यन्त अधम हैं; और उनमें भी हे पापनाशन! मैं मन्दबुद्धि हूँ । श्रीरघुनाथजीने कहा–हे भामिनि! मेरी बात सुन । मैं तो केवल एक भक्तिहीका सम्बन्ध मानता हूँ॥२ ॥
जाति पाँति कुल धर्म बड़ाई । धन बल परिजन गुन चतुराई ॥
भगति हीन नर सोहइ कैसा । बिनु जल बारिद देखिअ जैसा ॥
जाति, पाँति, कुल, धर्म, बड़ाई, धन, बल, कुटुम्ब, गुण और चतुरता–इन सबके होनेपर भी भक्तिसे रहित मनुष्य कैसा लगता है, जैसे जलहीन बादल [ शोभाहीन ] दिखायी पड़ता है ॥३ ॥
नवधा भगति कहउँ तोहि पाहीं । सावधान सुनु धरु मन माहीं ॥
प्रथम भगति संतन्ह कर संगा । दूसरि रति मम कथा प्रसंगा ॥
मैं तुझसे अब अपनी नवधा भक्ति कहता हूँ | तू सावधान होकर सुन और मनमें धारण कर । पहली भक्ति है संतोंका सत्संग । दूसरी भक्ति है मेरे कथा- प्रसंगमें प्रेम ॥४ ॥
दो० –- गुर पद पंकज सेवा तीसरि भगति अमान ।
चौथ भगति मम गुन गन करइ कपट तजि गान ॥ ३५ ॥
तीसरी भक्ति है अभिमानरहित होकर गुरुके चरणकमलोंकी सेवा और चौथी भक्ति यह है कि कपट छोड़कर मेरे गुणसमूहोंका गान करे ॥ ३५ ॥
मंत्र जाप मम दृढ़ बिस्वासा । पंचम भजन सो बेद प्रकासा ॥
छठ दम सील बिरति बहु करमा । निरत निरंतर सज्जन धरमा ॥
मेरे ( राम ) मन्त्रका जाप और मुझमें दृढ़ विश्वास– यह पाँचवीं भक्ति है, जो वेदोंमें प्रसिद्ध है । छठी भक्ति है इन्द्रियोंका निग्रह, शील ( अच्छा स्वभाव या चरित्र ), बहुत कार्योंसे वैराग्य और निरंतर संत पुरुषोंके धर्म ( आचरण ) में लगे रहना ॥१ ॥
सातवँ सम मोहि मय जग देखा । मोतें संत अधिक करि लेखा ॥
आठव जथालाभ संतोषा । सपनेहुँ नहिं देखइ परदोषा ॥
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* * ६६८ रामचरितमानस सातवीं भक्ति है जगत्भरको समभावसे मुझमें ओतप्रोत ( राममय ) देखना और संतोंको मुझसे भी अधिक करके मानना । आठवीं भक्ति है जो कुछ मिल जाय उसीमें संतोष करना और स्वप्नमें भी पराये दोषोंको न देखना ॥२ ॥
नवम सरल सब सन छलहीना । मम भरोस हियँ हरष न दीना ॥
नव महुँ एकउ जिन्ह कें होई । नारि पुरुष सचराचर कोई ॥
नवीं भक्ति है सरलता और सबके साथ कपटरहित बर्ताव करना, हृदयमें मेरा भरोसा रखना और किसी भी अवस्थामें हर्ष और दैन्य ( विषाद) का न होना । इन नवोंमेंसे जिनके एक भी होती है, वह स्त्री- पुरुष, जड़ -चेतन कोई भी हो–॥३ ॥
सोइ अतिसय प्रिय भामिनि मोरें । सकल प्रकार भगति दृढ़ तोरें ॥
जोगि बूंद दुरलभ गति जोई । तो कहुँ आजु सुलभ भइ सोई ॥
हे भामिनि! मुझे वही अत्यन्त प्रिय है । फिर तुझमें तो सभी प्रकारकी भक्ति दृढ़ है । अतएव जो गति योगियोंको भी दुर्लभ है, वही आज तेरे लिये सुलभ हो गयी है ॥४ ॥
मम दरसन फल परम अनूपा । जीव पाव निज सहज सरूपा ॥
जनकसुता कइ सुधि भामिनी । जानहि कहु करिबरगामिनी ॥
मेरे दर्शनका परम अनुपम फल यह है कि जीव अपने सहज स्वरूपको प्राप्त हो जाता है ।
हे भामिनि! अब यदि तू गजगामिनी जानकीकी कुछ खबर जानती हो तो बता ॥५ ॥
पंपा सरहि जाहु रघुराई । तहँ होइहि सुग्रीव मिताई ॥
सो सब कहिहि देव रघुबीरा । जानतहूँ पूछहु मतिधीरा ॥
[ शबरीने कहा— ] हे रघुनाथजी! आप पंपा नामक सरोवरको जाइये, वहाँ आपकी सुग्रीवसे मित्रता होगी । हे देव! हे रघुवीर! वह सब हाल बतावेगा । हे धीरबुद्धि! आप सब जानते हुए भी मुझसे पूछते हैं! ॥६ ॥
बार बार प्रभु पद सिरु नाई । प्रेम सहित सब कथा सुनाई ॥
बार- बार प्रभुके चरणोंमें सिर नवाकर, प्रेमसहित उसने सब कथा सुनायी ॥७ ॥
छं० – कहि कथा सकल बिलोकि हरि मुख हृदयँ पद पंकज धरे ।
तजि जोग पावक देह हरि पद लीन भइ जहँ नहिं फिरे ।
नर बिबिध कर्म अधर्म बहु मत सोकप्रद सब त्यागहू ।
बिस्वास करि कह दास तुलसी राम पद अनुरागहू ॥